Saturday, June 9, 2018

गुरुद्वारा लिखनसर साहिब – यहां लिखा गया गुरुग्रंथ साहिब

तलवंडी साबो के दमदमा साहिब गुरुद्वारा परिसर में गुरुद्वारा लिखनसर साहिब नजर आता है। यहां आने वाले श्रद्धालु गुरुद्वारा के बगल में बने स्थल पर पेंसिल से कुछ सदविचार लिखते नजर आते हैं। खास तौर पर यहां आने वाले बच्चों से जरूर यहां कुछ लिखवाया जाता है। यह बच्चों में ज्ञान की ज्योति डालने की परंपरा है।

लिखनसर साहिब गुरुद्वारा का अपना इतिहास है। साल 1705 में 10 वें सिख गुरु, गुरु गोबिंद सिंह ने सिख शास्त्र जिन्हे श्री गुरु ग्रन्थ साहिब कहा जाता है के पूर्ण संस्करण को यहीं पर तैयार कराया था। यहीं पर बैठकर शहीद बाबा दीप सिंह ने आदि श्री ग्रन्थ साहिब जी की चार अतिरिक्त प्रतियां लिखी और उन्हें अन्य चार तख्तों में भेज दिया। इसलिए सिख इतिहास में इस स्थल का महत्व बढ़ जाता है।

बाबा दीप सिंह बहादुर सेनानी के साथ ही उच्च कोटि के विद्वान भी थे। श्री आनंदपुर साहिब रह कर दीप सिंह ने शस्त्र व शास्त्र विद्या में बराबरी से महारत हासिल कर ली थी। 20-22 साल की उम्र तक दीप सिंह ने जहां भाई मनी सिंह जैसे उस्ताद से गुरबाणी का अच्छा-खासा ज्ञान हासिल कर लिया वहीं वह एक निपुण सिपाही भी बन गए थे।
दमदमा साहिब के जत्थेदार रहते हुए बाबा जी बाद में अमृतसर के युद्ध में बहादुरी से लड़ते हुए शहीद हुए। कहते हैं कि उनका खडग 18 सेर का था। अपने आखिरी पल में वे सिर कट जाने के बाद भी लड़ते रहे। ऐसे वीरों के लिए ही लिखा गया है – पुरजा पुरजा कट मरे तबहूं न छाड़े खेत।

सिखों में कोई अनपढ़ न रहे - तलवंडी साबो को को गुरु की काशी का नाम यहां कि साहित्यिक गतिविधियों के कारण ही दिया गया है। गुरु गोबिंद सिंह यहां अपने एक साल के प्रवास के दौरान काफी व्यस्त रहे। कहा जाता है की एक दिन गुरु गोबिंद सिंह जी ने संगत के दौरान दराज से मुठी भरकर कलम निकले और उनके सिर पर रखकर कहा की यहां हम साहित्य के एक कुंड का निर्माण करेंगे।
गुरु ने कहा, मेरे सिखों में कोई भी अनपढ़ नहीं रहना चाहिए। साक्षर होने के महत्व को गुरु जी ने बहुत सिद्दत से समझा था। यह भी कहा जाता है की गुरु ग्रन्थ साहिब का दमदमा वाली बीर को यहीं पर सम्पूर्ण किया गया था, जिसको गुरु जी के एक अनुयायी भाई मणि सिंह ने पूरा किया था। ये उस समय की बात है जब सिखों के नौवें गुरु और गुरु गोविन्द सिंह जी के पिता, गुरु तेग बहादुर साहिब के प्रवचनों को बीर में सम्मिलित किया गया था।

इस तरह से देखें तो गुरुद्वारा लिखनसर साहिब बहुत ही प्रेरक स्थली है। मैं गुरुद्वारा परिसर में भ्रमण और तमाम स्थलों पर नमन करने के बाद गुरु के लंगर की ओर बढ़ता हूं। लंगर में प्रसाद ग्रहण करने के बाद बाहर आ जाता हूं। बायीं तरफ एक अचार की मोबाइल दुकान लगी है। वे कई किस्म के अचार बेच रहे हैं। मैं अपना प्रिय डेला का अचार उनसे खरीदता हूं। इसके बाद तलवंडी साबो का बाजार देखते हुए वापस चल पड़ा हूं। बस स्टैंड में आकर पटियाला की तरफ जाने वाली बस में बैठ जाता हूं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
-        (SIKH HISTORY, TALWANDI SABO, BABA DEEP SINGH , FIFTH  TAKHAT )



1 comment:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन चौधरी दिगम्बर सिंह और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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