Monday, June 25, 2018

अजमेर - क्या है ढाई दिन का झोपड़ा

आखिर क्या है ढाई दिन का झोपड़ा। नाम से कुछ अजीब लगता है। पर यह झोपड़ा नहीं पक्की इमारत है। यह एक इबादतगाह है। मसजिद है। पर कभी यह एक संस्कृत स्कूल हुआ करता था। यह अजमेर में ख्वाजा मोउनुद्दीन चिश्ती दरगाह के पीछे स्थित है।
अजमेर पुष्कर कई बार पहले भी आ चुका हूं, तो इस बार ढाई दिन का झोपड़ा जाने की चाह थी। दरगाह शरीफ के दाहिनी तरफ चलकर रास्ता फिर बाएं मुड़ जाता है। थोड़ी दूर चलने के बाद दाहिनी तरफ कुछ सीढ़ियां चढ़े, और पहुंच गए ढाई दिन का झोपड़ा।
क्यों नाम है ढाई दिन का झोपड़ा -
ऐसा माना जाता है कि संस्कृत स्कूल की इमारत को ध्वंस कर को ढाई दिन में यहां पर मस्जिद का निर्माण करा दिया गया। तो क्या सचमुच इस मस्जिद को बनवाने में सिर्फ़ ढाई दिन ही लगे थे, इसलिए इसे ढाई दिन का झोपड़ा कहा जाता है । वैसे यह भी माना जाता है कि यहां हर साल चलने वाले ढाई दिन के उर्श के कारण इसका ये नाम पड़ा। वैसे उर्स वाली बात तार्किक लगती है।
ग्यारहवीं सदी के अंत में मुहम्मद गोरी ने तराईन के युद्ध में महाराजा पृथ्वीराज चौहान को जब परास्त कर दिया और उसकी फौजों ने अजमेर में प्रवेश के लिए कूच किया। इस दौरान गोरी ने वहां नमाज अदा करने के लिए मस्जिद बनाने की इच्छा प्रकट की और इसके लिए अपने कारिंदों को महज 60 घंटे की समय सीमा प्रदान की। तब गोरी के लोगों ने संस्कृत विद्यालय की इमारत को रद्दोबदल कर महज ढाई दिन में उसे मस्जिद का रूप दे डाला। इस तरह इसका नाम ढाई दिन का झोपड़ा पड़ गया।

वहीं यह भी कहा जाता है कि ढाई दिन का झोपड़ा का निर्माण मोहम्मद ग़ोरी के आदेश पर कुतुब-उद-दीन ऐबक ने वर्ष 1192 में शुरू करवा दिया था। यह वर्ष 1199 में बन कर तैयार हो गया। इस स्थान पर पहले संस्कृत शिक्षा के लिए विशाल महाविद्यालय था, जिसका निर्माण वीसलदेव विग्रहराजा ने किया था।
जब आप ढाई दिन के झोपड़ा दो देखते हैं तो यहां भारतीय शैली में अलंकृत स्तंभों का प्रयोग नजर आता है। इनके ऊपर छत का निर्माण किया गया है I मस्जिद के प्रत्येक कोने में चक्राकार एवं बांसुरी के आकार की मीनारे निर्मित है Iयह पूरी मस्जिद एक दीवार से घिरी हुई है जिसमें कुल सात मेहराबें हैं। इन मेहराबों पर कुरान की आयतें लिखी गई हैं। हेरत के अबू बकर द्वारा डिजाइन की गई यह मस्जिद भारतीय- मुस्लिम वास्तुकला का एक उदाहरण है।
ढाई दिन के झोपड़ा में हमेशा सैलानियों और श्रद्धालुओं की आमद रहती है। सीढ़ियों पर भीक्षा मांगने बैठे लोग नजर आते हैं । मस्जिद के चारों तरफ नजर दौड़ाएं तो पहाड़ की चोटियां नजर आती हैं।



आसपास क्या देखें - अजमेर का तारागढ़ किला ढाई दिन का झोपड़ा से डेढ़ घंटे की सीधी चढ़ाई पर एक पहाड़ी पर है। यहां पर आपको तारागढ़ जाने वाले वाहन मिल जाएंगे। अक्सर जीप वाले शेयरिंग सवारी बिठाकर तारागढ़ ले जाते हैं, फिर वापस यहीं छोड़ देते हैं।
कैसे पहुंचे – अजमेर रेलवे स्टेशन से ख्वाजा साहब की दरगाह पर पहुंचे। यहां से त्रिपोली गेट। त्रिपोली गेट के पास ही ढाई दिन का झोपड़ा स्थित है। दरगाह के गेट से इसकी दूरी महज एक फर्लांग है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य 
( DHAI DIN KA JHOPDA, MASJID, SANSKRIT SCHOOL, AJMER )  


Saturday, June 23, 2018

अजमेर का जैन चैत्यालय - अयोध्या का अदभुत नजारा

अजमेर का अद्भुत आकर्षण है सोनी जी का नसिया। वैसे इसका असली नाम श्री सिद्धकूट जैन चैत्यालय है। पर निर्माताओं के नाम पर स्थानीय लोग इसे सोनी जी का नसिया कहते हैं। मैं बस स्टैंड से आटो से चला था ढाई दिन का झोपड़ा देखने के लिए पर आटो वाले ने चौराहे पर उतार दिया और कहा यहां से पैदल ढाई दिन के झोपड़ा तक जा सकते हैं। वैसे देखना चाहें तो सामने सोनी जी का नसिया भी है।

अजमेर के पृथ्वीराज रोड पर स्थित यह मंदिर दिगंबर जैन समाज की श्रद्धा का प्रतीक है। जैन धर्म के 24 तीर्थंकरों में  से प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव जी को समर्पित है यह मंदिर। इसका निर्माण 10 अक्तूबर 1864 को आरंभ हुआ। 26 मई 1865 को इसमें प्राण प्रतिष्ठा की गई। मंदिर की मध्य वेदी पर भगवान आदिनाथ ( ऋषभदेव जी) की प्रतिमा स्थापित है।
मंदिर के भवन के निर्माण में करौली के लाल पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। इसलिए लोग इसे लाल मंदिर भी कहते हैं। इसके निर्माण में सेठ मूलचंद सोनी का बड़ा योगदान रहा, तो सोनी जी नसिया भी कहलाता है।

मुख्य मंदिर में तीन वेदियां हैं। इस पर जैन तीर्थंकरों की प्रतिमाएं स्थापित हैं। मंदिर के इस हिस्से में सिर्फ जैन धर्म के लोगों को प्रार्थना पूजा करने की अनुमति है। पर मंदिर का मुख्य आकर्षण है अयोध्या का अदभुत नजारा। इसे देखने के लिए मामूली सा प्रवेश टिकट है। प्रवेश द्वार पर जूते आदि उतार कर टिकट लेकर सीढ़ियों से ऊपर जाने पर आप मंदिर का भव्यता निहार सकते हैं।
वास्तव में मंदिर बनने के पांच साल बाद सेठ मूलचंद सोनी की इच्छा हुई कि मंदिर में जैन शास्त्रों में वर्णित भगवान ऋषभदेव के पंचकल्याणकों का मूर्त रूप स्थापित किया जाए। इसके बाद मंदिर में अयोध्या नगरी और सुमेरू पर्वत के निर्माण कार्य की शुरुआत हुई। सुनहले रंग की इस अदभुत रचना का निर्माण जयपुर में आरंभ हुआ। इसमें तकरीन 25 साल का समय लगा। पूरी रचना सोने के वर्क से ढकी है। जब सीसे के अंदर अयोध्या नगरी का भव्य नजारा देखते हैं तो आंखे चौंधिया जाती है। आप ये नजारा दूसरी और तीसरी मंजिल से अलग अलग झरोखों से देख सकते हैं।
हर झरोखे से देखने पर कुछ अलग नजारा दिखाई देता है। पहले ये रचनाएं जयपुर में ही प्रदर्शित की गई थीं। वहां दस दिन के मेले में काफी लोग इसे देखने आए। पर 1895 में इसे अजमेर स्थानांतरित किया गया। इसके लिए मंदिर के पीछे भवन का निर्माण कराया गया। इसके बाद यह अजमेर शहर का प्रमुख आकर्षण बन गया।
जैन चैत्यालय में प्रवेश करते समय आपको विशाल टावर दिखाई देता है। यह मान स्तंभ है। 82 फीट ऊंचा यह स्तंभ रायबहादुर सेठ टीकम चंद सोनी द्वारा निर्माण कराया गया। यह इस मंदिर परिसर की सबसे नवीनतम रचना है। यह 1953 में बनकर तैयार हुआ।
अजमेर के इस स्थल का मुआयना करने देश विदेश की महान विभूतियां पधार चुकी हैं। यहां देश के पहले राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद, प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू, मोरारजी देसाई, राजीव गांधी जैसे लोग पधार चुके हैं।
कैसे पहुंचे – अजमेर रेलवे स्टेशन या बस स्टैंड से दो किलोमीटर के दायरे में स्थित है सोनी जी का नसियां। शेयर आटो रिक्शा से यहां पहुंचा जा सकता है। प्रसिद्ध अजमेर शरीफ दरगाह से भी पैदल चलकर 10 मिनट में पहुंचा जा सकता है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
( RAJSTHAN, TEMPLE, SIDHAKUT JAIN CHAITYALYA ) 
  

Thursday, June 21, 2018

दिल्ली से अजमेर और मां अन्नपूर्णा रसोई में सस्ता भोजन


एक बार फिर राजस्थान की ओर चल पड़ा हूं। दिल्ली से देर रात बस से। पर कश्मीरी गेट पहुंचने पर पता चला कि जयपुर की बसें अब सरायकाले खां से जाती हैं। रात एक बजे एक टैक्सी वाले मिल गए, शेयरिंग में 50 रुपये में धौलाकुआं पहुंचाने को कहा। हालांकि दिल्ली में ऐसी टैक्सियां लेना कई बार सुरक्षित नहीं होता। पर मैं बैठ गया। धौलाकुआं मेट्रो स्टेशन के नीचे रात भर जयपुर जाने वाली बसें रुकती हैं। वहां रात को एक से दो बजे के बीच भी चहलपहल थी। मैं जयपुर की बस में बैठ गया। अपने तय कार्यक्रम के मुताबिक बस बहरोड़ के पास एक ढाबे में रुकी। सुबह सुबह मैं जयपुर के सिंधी कैंप बस स्टैंड में था। यहां से तुरंत दूसरी बस अजमेर की मिल गई। बाईपास पर बस कुछ मिनट रूकी।

इसके बाद किशनगढ़ बस स्टैंड में पांच मिनट का ठहराव। जयपुर अजमेर हाईवे बहुत शानदार बन चुका है। बस कुलांचे भरती है। मैं सुबह 9 बजे से पहले अजमेर के बस स्टैंड में पहुंच चुका हूं। बस स्टैंड में टूथब्रश-कुल्ला आदि करके एक चाय पी लेता हूं। चाय मैं सिर्फ सर्दियों में ही पीता हूं।
अजमेर शहर में कई साल बाद आया हूं, तीसरी बार। शहर कुछ नया सा लग रहा है। कई दीवारों में सुंदर म्युरल्स लगे हैं। शहर की सड़कें भी पहले की तुलना में काफी अच्छी नजर आ रही हैं। 

तभी मेरी नजर बाहर अन्नपूर्णा भोजन केंद्र के स्टाल पर पड़ती है। यह राजस्थान की वसंधरा सरकार का नया उपक्रम है। गरीबों और आम आदमी को सस्ते में भोजन और नास्ता उपलब्ध कराने का। एक चलते फिरते वैन को भोजनालय का रुप प्रदान किया गया है। यहां मिलता है 5 रुपये में नास्ता और आठ रुपये में भोजन। यह योजना फिलहाल राज्य के 12 शहरों में चलाई जा रही है।
इसके स्टाल रेलवे स्टेशन और बस स्टैंड के आसपास लोकप्रिय स्थलों पर हैं। मैंने ऐसी रसोई आगे भीलवाड़ा और कोटा में भी देखी। अभी ऐसे 500 भोजन वैन संचालित हो रहे हैं। मैंने यहां से सुबह का नास्ता लिया। पहले कंप्यूटराइज्ड टोकन खरीदें फिर काउंटर से नास्ता प्राप्त करें। नास्ते था पोहा और उसके साथ चटनी। पोहा काफी अच्छा बना था। वसुंधरा राजे ने यह योजना 15 दिसंबर 2016 को आरंभ की थी। हालांकि यह योजना श्रमिक वर्ग और असहाय लोगों के लिए है। पर खाने की गुणवत्ता अच्छी है इसलिए आते जाते लोग भी खाते नजर आते हैं। वे डिस्पोजेबल पेपर प्लेट में खाना परोसते हैं। पोहा वजन करके दिया जाता है ताकि किसी को कम मात्रा में नहीं मिले। वैन पर शिकायत करने के लिए फोन नंबर भी लिखा है। अगर आप खाने से संतुष्ट नहीं हैं तो शिकायत भी कर सकते हैं।

इस तरह की रियायती भोजन योजना सबसे पहले तमिलनाडु में जयललिता सरकार ने शुरू की थी।बाद में ऐसी ही योजना तेलंगाना सरकार ने हैदराबाद और कुछ अन्य शहरों में शुरू की। राजस्थान सरकार की यह योजना काफी लोकप्रिय हो रही है। अब दिल्ली सरकार भी रियायती कैंटीन शुरू करने की योजना बना रही है। हालांकि दिल्ली में पहले जन आहार योजना शुरू की गई थी। पर वहां 18 रुपये का खाना परोसा जाता था। पर राजस्थान सरकार आठ रुपये में लोगों का पेट भर रही है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  
( DELHI- AJMER, MA ANNPURNA KITCHEN ) 



Tuesday, June 19, 2018

पटियाला पेग और पटियाला का कुलचा

पटियाला पेग और सोनू के कुलचे
पटियाला पेग देश भर में प्रसिद्ध है। पर जैसे पंजाब का शहर अमृतसर अपने शहर नाम पर कई तरह के व्यंजनों के लिए प्रसिद्ध है उसी तरह पटियाला की भी अपनी पहचान है। खास तौर पर स्ट्रीट फूड के मामले में बड़ा समृद्ध शहर है।
कुलचे तो आपने खूब खाए होंगे पर पटियाला के कुलचे की बात अलग है। यहां पर किला मुबारक के आसपास स्ट्रीट फूड के तौर पर कुलचे का स्वाद लिया जा सकता है। इनके कुलचे बनाने का अंदाज अलग है। यहां कुलचे में छोले के मसाले को भर देते हैं। उसके बाद रोल बनाकर आपको खाने के लिए पेश करते हैं। इसमे भी कई तरह के कुलचे हैं। पनीर कुलचा, आलू कुलचा आपकी जो पसंद हो खाएं। पटियाला के बाजार में ऐसे कुलचे की प्रसिद्ध दुकाने हैं।

तो सोनू कुलचे की दुकान पर क्या लिखा है जरा गौर फरमाइए – मशहूर हैं कुलचे सोनू के जमाने को पता है... खाता वही है जिसकी किस्मत में लिखा है। अब बात किस्मत की है तो लोग खाने पहुंच ही जाते हैं। ये सोनू की मार्केटिंग स्किल है। वैसे सोनू के अलावा कई और कुलचे वाले हैं जो अच्छा कुलचा बनाते हैं। वैसे आप पटियाला में हैं तो पंजाब के पांरपरिक स्वाद दाल, रोटी का भी आनंद ले सकते हैं। खाने पीने के यहां सैकड़ो विकल्प मौजूद है। बस स्टैंड के आसपास अनगिनत ढाबे हैं जहां पंजाबी स्वाद का आनंद लिया जा सकता है।
अगर आप पटियाला में गर्मियों के दिन में हैं तो लस्सी पीने का आनंद भी ले सकते हैं। यहां की लस्सी का स्वाद भी लाजवाब होता है। पटियाला और आसपास का इलाका दूध दही के लिहाज से समृद्ध है। मदिरा पान करने वालों के बीच पटियाला पेग काफी लोकप्रिय है। आखिर ये पटियाला पेग क्या है... पंजाबी में तमाम गाने पटियाला पेग पर बने हैं।
भारत का पटियाला पैग विदेशों तक प्रसिद्ध है। शादी पार्टी में तो इसके बिना जैसे सब अधूरा सा लगता है। कहा जाता है कि पटियाला पैग हर कोई सहन नहीं कर सकता, क्योंकि पटियाला पैग में शराब की मात्रा स्मॉल और लार्ज पैग से ज्यादा होती है।  शराब पीने वालों के अनुसार पटियाला पैग में करीब 120 मिलीलीटर शराब होती है। इसका मतलब पटियाला पैग में आधा गिलास पानी और आधा गिलास शराब होती है।
कहते हैं इसका आविष्कार पटियाला राजघराने में हुआ था।  बताया जाता है कि पटियाला पैग का सीधा संबंध है महाराजा भूपिंदर सिंह से जो कि 1891 से लेकर 1938 तक पटियाला के राजा थे। महराजा बडा पैग बनाते थे, इसी नाम पर पटियाला पेग लोकप्रिय होता गया।


एनआईएस पटियाला और पंजाबी यूनीवर्सिटी – पंजाब का शहर पटियाला शिक्षा और खेलकूद गतिविधियों का बड़ा केंद्र है। यहां नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्टस की स्थापना की गई है जहां से निकले खिलाड़ी एशियाई खेल और कामनवेल्थ गेम्स में देश का ना रोशन करते हैं। यहां पर पंजबा के प्रमुख विश्वविद्यालय पंजाबी यूनीवर्सिटी की भी स्थापना की गई है। एक तरह से देखा जाए तो पटियाला पंजाब की मिनी राजधानी है। यहां पर पंजाब राज्य बिजली बोर्ड, पंजाब स्टेट एजुकेशन बोर्ड आदि का मुख्यालय है। पंजाब सरकार के कई महत्वपूर्ण दफ्तर पटियाला में ही स्थित हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य 
 ( PUNJAB, PATIALA FOOD, KULCHA, PATIALA PEG ) 


Sunday, June 17, 2018

फुलकारी और पट्टी वाले सलवार का शहर


पटियाला सलवार। महिलाओं के बीच अत्यंत लोकप्रिय। जी हां, शहर के नाम पर पट्टी वाले ढीले-ढाले सलवार की प्रसिद्धि देश भर में है। उसी पटियाला शहर की सड़कों पर हम घूम रहे हैं।  

थोड़ी बात पटियाला शहर की। तो पटियाला नाम बना है नाम पटियाला दो शब्दों पटि और आला जोड़कर।  पटि एक उर्दू शब्द है जो और आला शहर के संस्थापक बाबा आला सिंह के नाम से आता है। इसका मतलब एक 'भूमि की पट्टी' से है। पटियाला ने सन 1947 में देश विभाजन के समय पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थियों का दिल खोलकर स्वागत किया। पाकिस्तान से बड़ी संख्या में आए शरणार्थी यहां बसे थे। तत्कालीन शासक महाराजा यादविंदर सिंह ने पाकिस्तान से आए लोगों को यहां बसाया और सुविधाएं उपलब्ध करवाईं। 
एक बार फिर चलते हैं सलवार की ओर।

पटियाला सलवार (पट्टियों वाली सलवार) पंजाबी पोशाक का एक हिस्सा है। इसे उर्दू में शलवार भी कहा जाता है। यह आम तौर उत्तर भारत में पंजाब राज्य के शहर पटियाला में महिलाओं द्वारा पहनी जाने वाली पोशाक है। पर यह पटियाला से बाहर निकलकर कई राज्यों में लोकप्रिय हो चुकी है। पटियाला शहर के बाजारों में अभी भी ऐसे रेडिमेड सलवार और उन्हे बनाने वाले दर्जी मिल जाएंगे।
पंजाब की फुलकारी - पटियाला सलवार सूट और फुलकारी एम्ब्रॉएडरी नहीं होती तो शायद भारत का फैशन बेहद नीरस हो सकता था। यह एक तरह की कढ़ाई है जो चुनरी या दुपट्टे पर हाथ से की जाती है। वैसे तो इस कढ़ाई का जन्म प्राचीन भारत (अब पाकिस्तान) में हुआ था। पर अब फुलकारी का मतलब पंजाब से है। फुलकारी से तैयार बड़ी सी चादर शादी विवाह में इस्तेमाल की जाती है। वहीं फुलकारी को अब कपड़ों में भी इस्तेमाल किया जाने लगा ह। इसमें बेहद कुशल कारीगरी की जरूरत होती है। अब काफी काम मशीन से भी किया जाने लगा है। पर हाथों से की जाने वाली इस कढ़ाई की कला को पटियाला के लोगों ने बचाकर रखा है। जब भी पंजाब के हस्तशिल्प की चर्चा होती है तो सबसे पहले नाम फुलकारी का आता है।

आजकल फुलकारी किए हुए दुपट्टे का खूब चलन है।पर फुलकारी की शुरुआत कपड़ों पर फूलों की कढ़ाई से हुई। कहा जाता है कि पंद्रहवीं सदी में जब हीर रांझा की प्रेम कहानी बहुत ही ज्यादा लोकप्रिय हो गई थी उसी दौर में फुलकारी का आविष्कार हुआ।

पारंपरिक तौर पर फुलकारी को सूती कपड़े पर बनाया जाता था। पर इसे मोटे सूती कपड़े पर ही बनाया जाता है। इसे हम खद्दर जैसा कपड़ा भी समझ सकते हैं। खद्दर के कपड़े पर भारी कढ़ाई करना आसान होता है। ऐसी कढ़ाई को ही फुलकारी कहा जाता था। फुलकारी के भी कई प्रकार हैं। जिस फुलकारी जिसमें बहुत ज्यादा घनी पढ़ाई होती है उसे बाग फुलकारी कहते हैं। थिरमा फुलकारी सबसे शुद्ध मानी जाती है। वहीं दर्शन द्वार भी एक तरह की फुलकारी है। इस तरह की फुलकारी गुरुद्वारे में चढ़ाई जाती है। इस फुलकारी में सिर्फ फूलों का ही नमूना नहीं बल्की जानवर और इंसानों का भी नमूना शामिल किया जाता है।
अब कंटेंपरेरी फैशन में फुलकारी कई बदलाव आए हैं। नए जमाने के  डिजाइनरों समय समय पर फुलकारी के साथ कुछ नए एक्सपेरिमेंट भी किए हैं। तो आजकल फुलकारी कई तरह की देखने को मिलती है। फुलकारी जैसा प्रिंट वाला कपड़ा भी बनाया जाने लगा है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
( FULKARI, PATIALA, SALWAR , PUNJAB ) 





Friday, June 15, 2018

पटियाला - शाही मेहमान खाना और लस्सीखाना

किला मुबारक के मुख्य महल की बाहरी दीवारों को देखते हुए दाहिनी तरफ से हम आगे बढ़ रहे हैं। हमारे साथ देश के दूसरे शहरों से आए कुछ कालेज के शिक्षकों की एक टीम है। हमें खुले मैदान में दो पुरानी तोपे दिखाई देती हैं। कभी ये आग उगलती होगीं पर अभी तो शांत हैं।

शाही मेहमानखाना या रनबास  - किले की ऊंची दीवारों को देखते हुए हम किले के पृष्ठ भाग में पहुंच गए हैं। पर एक महल को देखकर हमलोग चौंक जाते हैं। इस इमारत को शायद अतिथि गृह के रूप में इस्‍तेमाल किया जाता था। इसका विशाल प्रवेश द्वार और दो आंगन खासे आकर्षण लिए हुए हैं। वहां बने फव्‍वारे और टैंक आंगन की शोभा बढ़ाते हैं। रनबास के आंगन में एक रंगी हुई दीवारें और सोन जड़ा सिंहासन बना है जो लोगों को काफी लुभाता है। रंगी हुई दीवारों के सामने ही ऊपरी खंड में कुछ मंडप भी हैं, जो एक-दूसरे के सामने बने हुए हैं।

इस मेहमान खाना में वातानुकूलन का अनूठा इंतजाम है। किले के बगल में एक गहरा कुआं बना है। इस कुएं से पानी किले के अंडरग्राउंड में बने तहखाने में लाने का इंतजाम है। इससे मेहमान खाना में गर्मियों में ठंडक बनी रहती होगी। पर यह सब कुछ अब बहुत बुरे हाल में है। मेहमान खाने की दीवारें भरभरा रही हैं।  कभी शाही मेहमान खाने में दूसरे राजघराने से आने वाले देशी-विदेशी मेहमान ठहरा करते थे।


लस्सीखाना  - इस छोटी दोमंजिली इमारत के आंगन में एक कुंआ बना हुआ है। इस इमारत का इस्तेमाल कभी रसोईघर के तौर पर इस्‍तेमाल किया जाता था। लस्‍सी खाना रनबास के सटा हुआ है और किला अंदरूनी हिस्से के लिए यहां से रास्‍ता भी जाता था। पटियाला के लोगों का कहना है कि एक जमाने में यहां 3500 लोगों को खाना बनाया जाता था।

पर नानकशाही ईट व सफेद पत्थर से बने इस किले के कई हिस्से खस्ताहाल होकर गिर चुके हैं। शीशे की कलाकारी के साथ बनाया गया शीशमहल बीते कई सालों से मरम्मत के नाम पर बंद पड़ा है। यहां आने वाले सैलानी इसे बाहर से ही देखकर लौट जाते हैं ।

किला मुबारक के कायाकल्प के प्रयास - शाही शहर के किला मुबारक के कायाकल्प के लिए प्रदेश सरकार को केंद्र सरकार की स्कीम के तहत 45 करोड़ रुपये की ग्रांट 2015 में मंजूर हुई।

हेरिटेज वेडिंग साइट बनेगा किला मुबारक - पंजाब के वर्तमान मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और टूरिज्म मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू द्वारा पटियाला के किला मुबारक को विवाह स्थल में तब्दील किया जा रहा है। इससे उम्मीद है कि पटियाला मेंटूरिज़्म को बढ़ावा मिल सकेगा। जिस तरह लोग जोधपुर और उदयपुर में जाकर शाही शादियों का आयोजन करते हैं वैसा ही कुछ पटियाला के किला मुबारक में कराए जाने की योजना है।  राज्य सरकार की योजना है कि किले के अंदर सेवन स्टार होटल जैसी सारी सुविधाएं टूरिस्ट्स को प्रदान कराई जाएं। इसके इलावा किले में इंडोर स्पोर्ट्स और स्विमिंग पूल की व्यवस्था भी किए जाने की योजना है।

प्रवेश शुल्क – फिलहाल किला मुबारक का प्रवेश शुल्क  10 रुपये प्रति व्यक्ति और 5 रुपये बच्चों के लिए है। किला मुबारक सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक खुला रहता है। बस स्टैंड या रेलवे स्टेशन से रिक्शा करके पहुंचा जा सकता है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
( QUILA MUBARAK, PATIALA, PUNJAB ) 

Wednesday, June 13, 2018

किला मुबारक – मुगल और राजस्थानी शिल्प का अनूठा मेल

पटियाला के बस स्टैंड से निकलकर मैं एक रिक्शे वाले को किला मुबारक छोड़ने को कहता हूं। हालांकि शेयरिंग आटो से जाने का विकल्प था, पर रिक्शा से शहर को देखने का आनंद ही कुछ और है। तो रिक्शा वाले हमें पटियाला के पुराने बाजार, सब्जी मंडी, तंग गलियों से घुमाते हुए दर्शनी गेट पर लाकर छोड़ देते हैं। बताते हैं कि सामने किला मुबारक का गेट है। मैं अठारहवीं सदी के विशाल इमारत के सामने खड़ा हूं जो आजकल बदहाल है।

वास्तव में पटियाला का किला मुबारक सिख इतिहास का दमकता हुआ पहलू है जो अब बिखर रहा है। यह किला वास्तुकला का एक आदर्श उदाहरण और शहर के प्रमुख पर्यटक आकर्षणों में से एक है। पूरे पटियाला शहर का विस्तार किला मुबारक परिसर के चारों तरफ हुआ है। साल 1764 में महाराजा आला सिंह ने इस किले के निर्माण कराया था। यह किला ओल्ड मोती बाग पैलेस के निर्माण से पहले तक, पटियाला राजपरिवार का निवास हुआ करता था।


लगभग 10 एकड़ क्षेत्रफल में फैले इस किले का निर्माण सबसे पहले एक मिट्टी के किले के रूप में किया गया था।  बाद में इसे एक पक्के किले के रूप में विशाल रूप प्रदान किया गया। इस महल की वास्तुकला उत्तर मुगल और राजस्थानी शैली का बेहतर मिश्रण है। सबसे पहले बाबा आला सह जी ने 1756 में यहां कच्ची पट्टी बनाई थी। यहीं पर 1764 में किला मुबारक की स्थापना की गई । 
इस किले में किला अंद्रू या मुख्‍य महल, गेस्‍ट हाउस और दरबार हॉल परिसर के प्रमुख हिस्से हैं। बाजार से जब आप दर्शनी गेट से प्रवेश करते हैं तो दाहिनी तरफ दरबार हॉल है। इसमें एक संग्रहालय का निर्माण कराया गया है। पर यह संग्रहालय किले के रखरखाव के कारण बंद किया हुआ है।

किला मुबारक का किला अंद्रूं सैलानियों को खास तौर पर आकर्षित करता है। इसके वास्‍तुशिल्‍प पर उत्‍तर मुगलकालीन और राजस्‍थानी शिल्‍प का प्रभाव स्‍पष्‍ट रूप से देखा जा सकता हे। किला परिसर में उत्‍तर और दक्षिण छोरों पर 10 बरामदे बनाए गए हैं जिनका आकार प्रकार अलग तरह का है।
जब मुख्‍य महल को आप देखते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे यह महलों का एक झुंड हो। इस किले में हर कमरे का अलग नाम और पहचान है। किला परिसर के महलों को बड़ी संख्‍या में भित्ति चित्रों से सजाया गया है। इन्‍हें महाराजा नरेन्‍द्र सिंह की देखरेख में बनवाया गया था। किला मुबारक के अंदर बने इन महलों में 16 रंगे हुए और कांच से सजाए गए चेंबर भी हैं।

महल के दरबार कक्ष में भगवान विष्‍णु के अवतारों और वीरता की कहानियों को दर्शाया गया है। तो महिला चेंबर में लोकप्रिय रोमांटिक कहानियों चित्रित की गईं हैं। महल के अन्‍य दो चेंबरों में अच्‍छे और बुरे राजाओं के गुण-दोषों पर भी प्रकाश डाला गया है। इन महलों में बने भित्ति चित्र 19 वीं शताब्‍दी में बने भारत के श्रेष्‍ण भित्ति चित्रों में गिने जाते हैं। ये भित्ति चित्र राजस्‍थानी, पहाड़ी और अवधि संस्‍कृति की छवि पेश करते हैं।

दरबार हॉल में देखे गुरु गोबिंद सिंह की तलवार – यह दो मंजिला हॉल एक ऊंचे चबूतरे पर बना हुआ है। हॉल में लकड़ी और कांच की शानदार कारीगरी की गई है। दरबार हॉल सार्वजनिक समारोहों में लोगों के एकत्रित होने के लिए बनवाया गया था। इस हॉल को ही अब एक संग्रहालय में तब्‍दील कर दिया गया है। इसमें आकर्षण झाड़ फानूस और विभिन्‍न अस्‍त्र-शस्‍त्रों को प्रदर्शित किया गया है। इस संग्रहालय में गुरु गोबिंद सिंह की तलवार और कटार के साथ-साथ नादिरशाह की तलवार भी देखी जा सकती है।
- vidyutp@gmail.com
( KILA MUBARAK, PATIALA, DARABR HALL ) 

Monday, June 11, 2018

पटियाला का काली माता मंदिर

पंजाब के प्रसिद्ध हिंदू मंदिरों में से एक है पटियाला श्री काली माता का मंदिर। श्री काली देवी जी का मंदिर करीब 100 साल पुराना है। यहां पर न केवल पटियाला शहर बल्कि पंजाब के हर जिले से और आसपास के राज्यों से भी श्रद्धालु  माथा टेकने आते हैं।

काली माता मंदिर का परिसर विशाल है। अक्सर यहां दर्शन के लिए लंबी लाइन लगी रहती है। प्रवेश द्वार के बाहर बड़ी संख्या में प्रसाद की दुकाने हैं। मुख्य मंदिर के पीछे विशाल आंगन यज्ञशाला और कुछ और मंदिर समूह हैं। मंदिर परिसर में राज राजेश्वरी देवी का मंदिर है। कहा जाता है कि यह काली माता मंदिर से भी पुराना है।

काली माता मंदिर का निर्माण भी पटियाला के राजघराने द्वारा करवाया गया था। पटियाला के महाराजा भूपिदंर सिंह ने मंदिर के निर्माण का नींव पत्थर 1936 में रखा था। मंदिर को महाराजा कर्म सिंह ने बनवाया था। मंदिर में स्थापित काली माता की मूर्ति छह फीट की है। मां का सौंदर्य अदभुत है। यहां स्थापित मां काली माता जी की मूर्ति कलकत्ता से खास तौर पर मंगवाई गई थी। उस समय देवी मां की मूर्ति का मुख शहर के बाहर की तरफ यानी बारादरी गार्डन की तरफ रखा गया था और तब उधर शहर का विस्तार नहीं था। जैसे-जैसे आबादी बढ़ी और लोग उस तरफ जाकर रहने लगे तो देवी मां की नजरों के तेज का प्रभाव वहां रहने वाले लोगों पर न पड़े इसलिए मंदिर में एक विशाल दीवार बना दी गई। श्रद्धालु ऐसा मानते हैं कि मां की आंखों में काफी तेज है।

नवरात्र में लगता है मेला- मंदिर में हर साल नवरात्र के दौरान लाखों की संख्या में भक्तों का आना जाना होता है। रोजाना सुबह देवी मां को स्नान कराया जाता है और श्रंगार किया जाता है। नौ देवियों की पूजा भी विधि विधान के साथ संपन्न होती है। नवरात्र में भक्त आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में आते हैं। हजारों की संख्या में आने वाले भक्त अष्टमी के दिन सुबह से लेकर दोपहर तक कतार में लगकर मां के दर्शन होते हैं। नवरात्र में जब मंदिर के आसपास विशाल मेला लग जाता है तब माल रोड से नौ दिन के लिए वाहनों का गुजरना रोक दिया जाता है।

शराब, बकरे और मुर्गे भी चढ़ाते हैं – काली माता मंदिर में कुछ रोचक परपंराएं हैं। मंदिर में नवरात्र में बकरे, मुर्गे के अलावा शराब का प्रसाद भी चढ़ाया जाता है। कई श्रद्धालु यहां सालों भर शराब की बोतलें लेकर माता को चढ़ाने आते हैं। इसके अलावा कड़ाह प्रसाद और मीठा पान का भी मां के चरणों में भोग लगाया जाता है।

माता का लंगर - मंदिर में आने वाले भक्तों के लिए यहां रोजाना मंदिर में लंगर का इंतजाम है। पर लंगर का समय निर्धारित है। लंगर हॉल में प्रेरक नीति वचन लिखे गए हैं।

कैसे पहुंचे -  काली माता मंदिर पटियाला शहर के मॉल रोड पर बारादरी उद्यान के पास स्थित है। श्री काली माता का मंदिर बस स्टैंड एवं रेलवे स्टेशन से मात्र एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। बस स्टैंड एवं रेलवे स्टेशन से पैदल 10 मिनट में या फिर रिक्शा अथवा तीन पहिया वाहन के जरिये मात्र पांच मिनट में ही पहुंचा जा सकता है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( KALI MATA MANDIR, PATIALA, PUNJAB )

Sunday, June 10, 2018

गुरुद्वारा दुखनिवारण साहिब पटियाला

तलवंडी साबो से पटियाला की वापसी की राह पर हूं। बस की खिड़की से कई जगह मेले लगे हुए दिखाई दे रहे हैं। पंजाब के गांव गांव में ऐसे मेले खूब लगते हैं। यहां तो राजनीतिक दलों के कार्यक्रम में भी गीत संगीत की महफिल खूब जमती है, वरना नेताओं के रसहीन भाषण सुनने के लिए जनता की भीड़ नहीं उमड़ती है।

कुछ घंटे के सफर में हम पटियाला शहर में पहुंच चुके हैं। पटियाला शहर का प्रमुख गुरु घर और सिख पंथ की आस्था स्थली है गुरुद्वारा दुखनिवारण साहिब। मैं शाम ढलने के बाद गुरुद्वारा परिसर में पहुंच गया हूं। यहां सालों भर हर रोज श्रद्धालुओं का जमावड़ा देखा जा सकता है। यह पंजाब के बड़े ही समृद्ध गुरुद्वारा में से एक है। कभी यह गुरुद्वारा लेहल गांव में हुआ करता था, पर शहर के विस्तार के बाद अब यह पटियाला मुख्य शहर का हिस्सा है। इस गुरुद्वारा का संबंध नवम गुरु तेगबहादुर जी से है।
नवम पातशाही गुरुतेगबहादुर आए थे यहां
सिख इतिहास के मुताबिक लेहल गांव का भागराम नामक एक झीवर हुआ करता था। उसने गुरुतेगबहादुर से मुलाकात कर अपने गांव में आने का आग्रह किया। उसे उम्मीद थी कि गुरु जी दर्शन देकर उसके गांव को पवित्र करेंगे तो गांव के लोगों को बीमारियों से निजात मिलेगी और उनके दुख दूर हो जाएंगे। गुरु जी ने उसका आग्रह स्वीकार किया। सन 1672 में 24 जनवरी को माघ सुदी शुक्ल पक्ष पंचमी के दिन गुरु जी यहां आए। यहां वे एक बरगद के पेड़ के नीचे ठहरे। बगल में एक विशाल तालाब था। गुरुजी जी स्थल पर बैठे उसका नाम दुख निवारण हो गया।

सिख श्रद्धालुओं को विश्वास है कि इस स्थल के तालाब के जल में दुख दूर करने की क्षमता है। तो यहां आने वाले श्रद्धालु इस तालाब का पवित्र जल का सेवन करते हैं। वर्तमान में गुरुद्वारा दुखनिवारण साहिब का जो विशाल भवन और सरोवर है उसका निर्माण 1930 से 1942 के बीच हुआ है। इसे पटियाला के महाराजा यादविंदर सिंह ने बनवाया था। अब यह गुरुद्वारा शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अधीन है।
कई एकड़ में फैले इस गुरुद्वारा का मुख्य भवन और उसके आसपास का परिवेश काफी सुंदर है। सुबह से लेकर देर रात तक यहां श्रद्धालुओं का आना जाना लगा रहता है। मुख्य हॉल के आसपास और कई छोटे छोटे प्रार्थना कक्ष बने हुए हैं। गुरुघर में श्रद्धालुओं को हलवा प्रसाद मिलता है। रात के समय विशाल सरोवर से गुरुद्वारे का सौंदर्य देखते ही बनता है। रात की रोशनी में यहां की छटा श्रद्धालुओं का मन मोह लेती है।
प्रवेश द्वार से बायीं तरफ पीछे जाने पर विशाल लंगर हॉल है। यहां श्रद्धालुओं के लिए अखंड लंगर चलता रहता है। वैसे तो गुरुद्वारा दुखनिवारण साहिब में सालों भर उत्सव सा माहौल रहता है।

पर खास तौर पर माघ शुक्ल पक्ष पंचमी यानी वसंत पंचमी के दिन यहां बडा उत्सव मनाया जाता है। यह नवम पातशाही गुरु तेगबहादुर के इस स्थल पर आने की तारीख है। इस दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां जुटते हैं और विशेष दीवान सजाया जाता है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
(GURUDWARA DUKH NIVARAN SAHIB, PATIALA ) 

Saturday, June 9, 2018

गुरुद्वारा लिखनसर साहिब – यहां लिखा गया गुरुग्रंथ साहिब

तलवंडी साबो के दमदमा साहिब गुरुद्वारा परिसर में गुरुद्वारा लिखनसर साहिब नजर आता है। यहां आने वाले श्रद्धालु गुरुद्वारा के बगल में बने स्थल पर पेंसिल से कुछ सदविचार लिखते नजर आते हैं। खास तौर पर यहां आने वाले बच्चों से जरूर यहां कुछ लिखवाया जाता है। यह बच्चों में ज्ञान की ज्योति डालने की परंपरा है।

लिखनसर साहिब गुरुद्वारा का अपना इतिहास है। साल 1705 में 10 वें सिख गुरु, गुरु गोबिंद सिंह ने सिख शास्त्र जिन्हे श्री गुरु ग्रन्थ साहिब कहा जाता है के पूर्ण संस्करण को यहीं पर तैयार कराया था। यहीं पर बैठकर शहीद बाबा दीप सिंह ने आदि श्री ग्रन्थ साहिब जी की चार अतिरिक्त प्रतियां लिखी और उन्हें अन्य चार तख्तों में भेज दिया। इसलिए सिख इतिहास में इस स्थल का महत्व बढ़ जाता है।

बाबा दीप सिंह बहादुर सेनानी के साथ ही उच्च कोटि के विद्वान भी थे। श्री आनंदपुर साहिब रह कर दीप सिंह ने शस्त्र व शास्त्र विद्या में बराबरी से महारत हासिल कर ली थी। 20-22 साल की उम्र तक दीप सिंह ने जहां भाई मनी सिंह जैसे उस्ताद से गुरबाणी का अच्छा-खासा ज्ञान हासिल कर लिया वहीं वह एक निपुण सिपाही भी बन गए थे।
दमदमा साहिब के जत्थेदार रहते हुए बाबा जी बाद में अमृतसर के युद्ध में बहादुरी से लड़ते हुए शहीद हुए। कहते हैं कि उनका खडग 18 सेर का था। अपने आखिरी पल में वे सिर कट जाने के बाद भी लड़ते रहे। ऐसे वीरों के लिए ही लिखा गया है – पुरजा पुरजा कट मरे तबहूं न छाड़े खेत।

सिखों में कोई अनपढ़ न रहे - तलवंडी साबो को को गुरु की काशी का नाम यहां कि साहित्यिक गतिविधियों के कारण ही दिया गया है। गुरु गोबिंद सिंह यहां अपने एक साल के प्रवास के दौरान काफी व्यस्त रहे। कहा जाता है की एक दिन गुरु गोबिंद सिंह जी ने संगत के दौरान दराज से मुठी भरकर कलम निकले और उनके सिर पर रखकर कहा की यहां हम साहित्य के एक कुंड का निर्माण करेंगे।
गुरु ने कहा, मेरे सिखों में कोई भी अनपढ़ नहीं रहना चाहिए। साक्षर होने के महत्व को गुरु जी ने बहुत सिद्दत से समझा था। यह भी कहा जाता है की गुरु ग्रन्थ साहिब का दमदमा वाली बीर को यहीं पर सम्पूर्ण किया गया था, जिसको गुरु जी के एक अनुयायी भाई मणि सिंह ने पूरा किया था। ये उस समय की बात है जब सिखों के नौवें गुरु और गुरु गोविन्द सिंह जी के पिता, गुरु तेग बहादुर साहिब के प्रवचनों को बीर में सम्मिलित किया गया था।

इस तरह से देखें तो गुरुद्वारा लिखनसर साहिब बहुत ही प्रेरक स्थली है। मैं गुरुद्वारा परिसर में भ्रमण और तमाम स्थलों पर नमन करने के बाद गुरु के लंगर की ओर बढ़ता हूं। लंगर में प्रसाद ग्रहण करने के बाद बाहर आ जाता हूं। बायीं तरफ एक अचार की मोबाइल दुकान लगी है। वे कई किस्म के अचार बेच रहे हैं। मैं अपना प्रिय डेला का अचार उनसे खरीदता हूं। इसके बाद तलवंडी साबो का बाजार देखते हुए वापस चल पड़ा हूं। बस स्टैंड में आकर पटियाला की तरफ जाने वाली बस में बैठ जाता हूं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
-        (SIKH HISTORY, TALWANDI SABO, BABA DEEP SINGH , FIFTH  TAKHAT )



Thursday, June 7, 2018

तख्त श्री दमदमा साहिब ... गुरु की काशी

तलवंडी साबो बस स्टैंड से निकलकर मैं श्री दमदमा साहिब का रास्ता पूछता हूं। बस स्टैंड से बाहर निकलते ही दाहिनी तरफ थोड़ी चलने के बाद गुरघर का विशाल प्रवेश द्वार नजर आता है।
सिख पंथ में पांच तख्त हैं।  अमृतसर का श्री हरिमंदिर साहिब, रुपनगर जिले में आनंदपुर साहिब, बिहार की  राजधानी पटना सिटी में श्री हरिमंदिर साहिब, महाराष्ट्र के नांदेड़ में श्री हुजुर साहिब सचखंड गुरुद्वारा और ये आखिरी पंजाब के बठिंडा जिले में श्री दमदमा साहिब।
पांचवें तख्त के तौर पर मान्यता - श्री दमदमा साहिब को 18 नवंबर 1966 में पांचवे तख्त के तौर पर मान्यता दी गई। शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी अमृतसर ने तलवंडी साबो के महत्व को देखते हुए इसे पांचवे तख्त के तौर पर मान्यता दी। इस तरह यह पांचों तख्त में सबसे नया है।

तलवंडी साबो को गुरु की काशी भी कहा जाता है। दमदमा साहिब गुरुद्वारा का परिसर अत्यंत विशाल है। परिसर में आप मुख्य गुरुद्वारा के अलावा शहीद बाबा दीप सिंह का कुआं और गुरुद्वारा लिखनसर साहिब के दर्शन कर सकते हैं। 
सिख श्रद्धालुओं के लिए यहां ठहरने के लिए गुरुद्वारा परिसर में ही सराय की सुविधा उपलब्ध है। श्रद्धालुओं के लिए यहां अखंड लंगर भी चलता रहता है। तलवंडी साबो बहुत छोटा सा शहर है। यह रेल लिंक पर नहीं है। पर बठिंडा और मानसा के लिए यहां से हमेशा बसों की सुविधा उपलब्ध है। गुरुद्वारा परिसर के मुख्य मार्ग पर उपहार सामग्री की दुकानें सजी नजर आती हैं। यहां पर आप बच्चों के खिलौने और सिख धर्म से जुड़े प्रतीक वस्तुओं की खरीददारी कर सकते हैं।

तलवंडी साबो का सिख इतिहास में पहुत महत्वपूर्ण स्थान है। यहां पर सिखों द्वारा बचाव के लिए किए गए कई युद्धों के बाद गुरु गोबिंद सिंह जी इस स्थान पर रुके थे।  गुरु गोबिंद सिंह यहां एक साल के लिए रुके थे। दमदमा का अर्थ है सांस लेने का स्थान। गुरु गोबिंद सिंह जी ने दक्कन की सिख संगत के लिए प्रस्थान करने से पूर्व तलवंडी साबो को गुरु की काशी के रूप में आशीर्वाद दिया था।इस स्थान पर गुरूद्वारा का निर्माण होने के बाद इसे सिख पंथ के चार तख्तों में जोड़ दिया गया। इसे अब दमदमा साहिब के नाम से जाना जाता है।
दमदमा साहिब का इतिहास सिखों के एक महान शहीद बाबा दीप सिंह जी से भी जुड़ा है। वे इस इस तख़्त के पहले जत्थेदार थे। सिख इतिहास शहीद बाबा दीप सिंह के बहादुरी के किस्से से भरा पड़ा है।


शहीद बाबा दीप सिंह का जन्म 26 जनवरी 1682 को तरन तारन की तहसील पट्टी के गांव पहुविन्ड में रहने वाले एक सधारण परिवार में भाई भगतु तथा माता जिऊणी के घर हुआ था। वे 18 साल की उम्र में आनंदपुर साहिब में अपने माता पिता के साथ गुरु गोबिंद सिंह जी के दर्शन करने आए तो गुरु की सेवा में ही लग गए। दक्षिण रवाना होने से पहले गुरु गोबिंद सिंह ने तलवंडी साबो की सारी जिम्मेवारी बाबा दीप सिंह को सौंप दी। जिसे उन्होंने बखूबी निभाया।

बैशाखी पर विशाल मेला – तलवंडी साबो में हर साल बैशाखी पर विशाल मेला लगता है। खालसा पंथ के सृजनहार और सरबंसदानी दशमेश पिता श्री गुरु गोबिंद सिंह जी की चरण स्पर्श सरजमीं तख्त श्री दमदमा साहिब तलवंडी साबो में वैशाखी मेला हर साल बड़े ही शान-ओ-शौकत से लगता है। तीन दिन तक चलने वाले मेले में लाखों सिख श्रद्धालु पहुंचते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
-        (SIKH HISTORY, TALWANDI SABO, BABA DEEP SINGH , FIFTH  TAKHAT )