Tuesday, May 8, 2018

पुनाखा की ओर – दोचुला में 108 बौद्ध स्तूप

आज हम पुनाखा जाएंगे। पुनाखा यानी भूटान की पुरानी राजधानी। थिंपू से पुनाखा की दूरी 72 किलोमीटर है। वैसे पुनाखा जाकर एक दिन वहां भी रुककर घूमा जा सकता है। पर पुनाखा जाने वाले ज्यादातर लोग टैक्सी बुक करके थिंपू से पुनाखा जाते हैं और दिन भर में घूम कर रात तक थिंपू वापस लौट आते हैं। थिंपू से आप पुनाखा शेयरिंग टैक्सी से जा सकते हैं जिसका किराया 300 रुपये प्रति व्यक्ति है। दूरी के हिसाब से यह कुछ महंगा है। वैसे बसें भी जाती हैं पर उनका समय तय है और उसमें एडवांस बुकिंग करानी पड़ती है। इसलिए बेहतर है कि कोई टैक्सी ही बुक कर ली जाए। एक टैक्सी में चार लोग यात्रा कर सकते हैं।

पुनाखा के लिए छोटी टैक्सी वाले 3000 रुपये मांगते हैं। वैसे एक टैक्सी वाले 2500 में भी घूमाने के तैयार थे, पर केजांग दोरजी जिन्होंने हमें पारो घुमाया था उनका स्वभाव अच्छा लगा इसलिए उनके साथ ही घूमना तय किया। वे हिंदी अच्छी बोल लेते हैं साथ ही भूटान के पर्यटक स्थलों के बारे में उनकी जानकारी ठीक ठाक है। आराम से टैक्सी चलाने के साथ वे रास्ते में हमें कुछ कुछ जानकारियां बड़े ही रोचक अंदाज में परोसते जाते हैं। यही तो हम चाहते भी थे। वे ठीक सुबह आठ बजे हमारे होटल पहुंच चुके हैं। हमारे पास यहां भारत के मोबाइल फोन काम नहीं कर रहे हैं इसलिए हम यहां पहले से तय करके काम चला रहे हैं। कुछ लोगों ने भूटान का स्थानीय सिम कार्ड लेने की सलाह दी थी। पर हमने नहीं लिया।

थिंपू से पुनाखा की ओर चलते हुए 25 किलोमीटर बाद दोचुला पास आता है। यह हमारा पहला पड़ाव है। थिंपू से पुनाखा तक जाने वाली सड़क भी काफी अच्छी है। पहाड़ी रास्ता है पर इतने तीखे मोड़ नहीं है।

दोचुला पास थिंपू और पुनाखा के बीच सबसे ऊंची जगह है। इसकी ऊंचाई 3150 मीटर है। दोचुला पहुंचते ही मौसम सर्द हो गया है। यहां सड़कों पर बादल तैर रहे हैं। मौसम साफ होने पर यहां से माउंट मासांगांग की चोटी नजर आता है। पर हम मौसम के कारण भूटान की सबसे ऊंची चोटी ( 7158 मीटर )  का नजारा करने से वंचित रह गए।
पुनाखा जाने वाले सारे सैलानी दोचुला रुकते हैं। यहां पर एक अच्छा रेस्टोरेंट भी है। हालांकि खाने पीने की दरें थोड़ी महंगी हैं। मतलब तीन सितारा दरें हैं। पर अनादि ने यहां एक्लेयर्स खाना पसंद किया। रेस्टोरेंट में विदेशी सैलानियों की जमघट है। गोल डायनिंग हाल के बीच में गर्माहट के लिए चिमनी लगी है। चिमनी के पास कुछ पत्थर रखे हैं जो गर्म हो जाते हैं तो उन्हें छूना अच्छा लगता है।

दोचूला के 108 स्तूप – दो चूला में सड़क के किनारे 108 स्तूपों का निर्माण कराया गया है। यह श्रद्धालुओं और सैलानियों का प्रमुख आकर्षण है। इन स्तूपों को निर्माण भूटान की बड़ी महारानी आसी दोरजी वांगमो वांगचुक द्वारा करवा गया। यहां हर साल दोचुला द्रुक वांगयाल फेस्टिवल का भी आयोजन होता है। इन स्तूपों को निर्माण 2004 में भूटान के बहादुर सैनिको की याद में कराया गया। भूटान में भारत के असम के उग्रवादी समूहों के 30 कैंप स्थापित हो गए थे। 


भूटान शासन ने इन उग्रवादियों का धीरे धीरे सफाया किया। भूटान सरकार ने इन उग्रवादियों के सफाया के लिए ऑपरेशन ऑल क्लियर अभियान चलाया था। इस दौरान सभी पकड़े गए उग्रवादी भारत सरकार को सौंप दिए गए थे। इस अभियान में जिन सैनिकों अपनी जान गंवा दी उनकी याद में ये स्तूप निर्मित किए गए हैं। असम और पश्चिम बंगाल के भूमिगत संगठन उल्फा, एनडीएफबी और कामतापुर लिबरेशन आर्गनाइजेशन (केएलओ) ने 1990 के दशक के मध्य में भूटान में आधार शिविर स्थापित कर लिए थे ताकि भारतीय सैनिकों पर गुरिल्ला हमले किए जा सकें।
दोचुला में चौथे राजा जिग्मे सिंगे वांगचुक के नाम पर एक बौद्ध मंदिर का भी निर्माण कराया गया है। दोचुला में मौसम हमेशा ठंडा और कुहरे से आच्छादित ही रहता है। पर पुनाखा जाने वाले सैलानी यहां रुक कर मौसम का आनंद लेकर ही आगे बढ़ते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य ( DOCHULA PASS, PUNAKHA ) 
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दोचुला पास में कैंटीन में एक्लेयर्स का आनंद लेते हुए...

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