Tuesday, May 22, 2018

चिमी लाखांग - लिंग पूजन की अनूठी परंपरा

थिंपू से पुनाखा आते समय पुनाखा से पहले लोबासा में सड़क से लगभग 1 किलोमीटर दूर पहाड़ी पर यह लहखांग बौद्ध मंदिर एवं मठ स्थित है। पर हम यहां जा रहे हैं पुनाखा से वापसी के समय। शाम के 4 बज गए हैं। पर आज पुनाखा के दर्शनीय स्थलों को देखने की ललक में हम दोपहर का लंच भूल चुके हैं। लोबासा में एक होटल में रुकते हैं हमलोग पर वे बताते हैं कि खाने में कुछ नहीं है। अब हमारे ड्राईवर साहब गाड़ी को बायीं तरह मोड देते हैं। खेतों से होकर घाटियों के बीच सड़क चली जा रही है।


लोबासा गांव में जो भी घर बने हैं उनकी दीवारों में आकर्षक पेंटिंग बनी हैं। पर हम इन पेंटिंग में बड़े बड़े पुरुष जननांग देखते हैं। आखिर ऐसा क्यों। भूटान के इस क्षेत्र में पुरुष जननांग को सृजन का प्रतीक माना जाता है। इसलिए उसकी पेंटिंग बनी जाती है। इसमें यहां शरमाने जैसी कोई बात नहीं है। चिमी लाखांग से पहले गांव में दोनों तरफ कुछ आर्ट गैलरी हैं। यहां पर थंगक पेंटिंग खरीदी जा सकती है। इसके साथ ही यहां पर लकड़ी के बने हुए मानव लिंग बिक रहे हैं। ये मानव लिंग छोटे बड़े अलग अलग आकार के हैं। कुछ मानव लिंग चाबी के गुच्छे के साथ लगे हैं। फुटपाथ पर सामान बेच रही लड़कियां हमें कुछ खरीदने के लिए कहती हैं। पर हम नहीं खरीद पाते। हल्की बारिश शुरू हो गई है। तेज हवाएं भी चल रही हैं। पर इस सुहाने मौसम में हम चल पड़े हैं चिमी लाखांग की ओर। 


पार्किंग से आधा किलोमीटर पैदल चलकर मंदिर तक जाना पड़ता है।  
चिमी लाखांग तक मुख्य सड़क से यहां तक आने के लिए पर्यटकों को पगडंडीनुमा रास्ते से हो कर गुजरना पड़ता है जो धान के खेतों के बीच से हो कर जाता है। ये रास्ता बड़ा ही मनोरम है। हल्की बारिश ने सफर का मजा और बढ़ा दिया है। यह बौद्ध मंदिर 15वीं सदी की बौद्ध भिक्षु लामा द्रुकपा कुअनले को समर्पित है। मंदिर में प्रार्थना चक्र घूमाने के बाद हमलोग आगे बढ़ते हैं।
मंदिर परिसर में पूजा हो रही है। हम भी जाकर प्रार्थना में बैठ जाते हैं। पांच मिनट बाद हम उठने वाले हैं। पर बौद्ध भिक्षु हमें मना करते हैं। तो हम बैठे रह जाते हैं। और पांच मिनट बाद भिक्षु एक बाल लामा की ओर इशारा करते हैं। वह हमें आशीर्वाद देने आता है। विशाल हथियार का स्पर्श और विशाल आकार के मानव लिंग का स्पर्श। दरअसल चिमी लाखांग की ये परंपरा है। यहां के आशीर्वाद से लोग मानते हैं कि पौरूष कायम रहता है।

चिमी लाखांग बौद्ध मंदिर का निर्माण 1499 में हुआ था। द्रुपका कुअनले तिब्बती परंपरा के बौद्ध संत थे। वे पश्चिमी तिब्बत से इधर आए थे। उनके बारे में कहा जाता है कि वे शराब और महिलाओं की निकटता पसंद करते थे। संत कुअनले ने कविताएं भी लिखी थीं। वे अपने को मुक्त विचारों का योगी कहते थे। उन्होंने माना कि उन्होंने सैकड़ो महिलाओं से संबंध बनाए थे। उनका मानना था कि इस तरह से वे उनकी मदद करते हैं। और यह सब आधात्याम की ओर प्रवृत होने का मार्ग है। वे कहते हैं मैं  शराब, औरत और गीतों के साथ आनंद मनाता हूं। कुअनले कहते हैं – एक युवा महिला प्रेम में आनंद पाती है। एक युवा पुरुष सेक्स में आनंद पाता है। एक बुजुर्ग आदमी अपनी स्मृतियों से आनंदित होता है।
चिमी लाखांग के दर्शन से लौटने के बाद शाम होने लगी है। आगे चलकर लोबासा बाजार में हमलोग एक रेस्टोरेंट में रुकते हैं। वहां पर कुछ वेज मोमोज और काफी का आर्डर करके बैठ जाते हैं। मोमोज थोड़े महंगे जरूर हैं पर उनका स्वाद काफी अच्छा है। थिंपू वापसी से पहले परमिट चेकपोस्ट पर हमारा पुनाखा वाला परमिट जमा करा लिया जाता है।  

-     ---   विद्युत प्रकाश मौर्य
  Email- vidyutp@gmail.com
(CHIMI LHAKHANG, LOBASA, PUNAKHA , LAMA DRUKPA KUNLEY  ) 

Sunday, May 20, 2018

गालिम और सिंगी की प्रेम कहानी - भूटान के रोमियो जूलियट

पुनाखा में घूमते हुए हम अनायास ही एक प्रेम कहानी में प्रवेश कर गए। गालिम और सिंगी की प्रेम कहानी वास्तव में भूटान के रोमियो जूलियट की कहानी है।


पुनाखा में हमारी नजर 700 साल पुराने एक मिट्टी के घर पर पड़ी। पुनाखा जोंग से गासा रोड पर एक किलोमीटर आगे नदी के किनारे ती मंजिला मिट्टी का घर दिखाई देता है। तो ये कहानी है गासी लामा सिंगी और चांगुल बूम गालिम की।

हमारे टैक्सी ड्राईवर हमें उस प्रेम कहानी में ले जाते हैं। गालिम पुनाखा के एक अमीर किसान की बेटी थी। नदी के किनारे मिट्टी का एक तीन मंजिला घर जीर्ण अवस्था में दिखाई देता है। अब भूटान सरकार द्वारा इस घर को हेरिटेज साइट का दर्जा दे दिया  गया है।  

यह भूटान की अमर प्रेम कहानी है,जो ज्यादातर भूटानी लोगों की जुबान पर रहती है। गालिम का जो तीन मंजिला घर है यह अपने समय के बड़े अमीर किसान का घर हुआ करता था। सिंगी कौन था। वह तिब्बत सीमा पर बसे गांव गासा के एक साधारण परिवार का युवक था।
पुनाखा में गालिम का पुस्तैनी घर 
तो गालिम और सिंगी में प्यार हो गया। यह एक अमीर और गरीब की प्रेम कहानी थी।कहते हैं गालिम बला की खूबसूरत थी। तो गालिम पर इस इलाके के जमींदार देब का दिल आ गया। उसने गालिम से विवाह करने की इच्छा अपने एक सहायक के समक्ष जताई। उस सहायक को गालिम और सिंगी के प्रेम के बारे में जानकारी थी। इसलिए उसने सिंगी को गालिम से दूर करने की साजिश रची। सिंगी को किसी काम से गासा भेज दिया गया। इसके बाद देब से गालिम से विवाह का प्रस्ताव उनके पिता को भेजा। एक बड़े जमींदार से विवाह का प्रस्ताव पाकर पिता खुश हुए क्योंकि उन्हें गालिम के प्रेम के बारे में पता नहीं था।


पर गालिम ने अपने पिता को सिंगी के प्रति अपने प्रेम की बात बताई। साथ ही इस राज का भी खुलासा किया कि वह गर्भवती है। यह सब कुछ पिता के लिए झकझोर देने वाला था। नाराज पिता ने गालिम को अपने घर से निकाल दिया। इसके बाद गालिम मोचू नदी के तट पर असहाय घूमती रही। इस दौरान वह सिंगी के प्रेम में विरह के गीत गा रही थी। साथ ही वह हर आते जाते लोगों को अपना संदेश गासा में सिंगी तक पहुंचाने के लिए आग्रह करती थी। पर अपने खराब सेहत और गर्भवती शरीर के कारण गालिम जल्द ही बीमार पड़ गई। कहते हैं कि गालिम के साथ संवेदना जताने के लिए मोचू नदी की धारा भी धीमी पड़ गई।
एक राहगीर ने गालिम की हालत देखने के बाद गासा जाकर सिंगी को उसका संदेश सुनाया। गालिम का यह हाल जानकर सिंगी दौडा दौड़ा पुनाखा की ओर चल पडा। पर उस रात गालिम ने एक बुरा सपना देखा। सिंगी के पुनाखा पहुंचने तक गालिम रोते रोते दम तोड़ चुकी थी। गालिम के पास पहुंचने के बाद सिंगी ने भी अपने आखिरी सांस ली। इस तरह दो प्रेमी इस दुनिया में नहीं मिल सके पर दूसरी दुनिया में मिलन के लिए कूच कर गए। 
पर गालिम और सिंगी की प्रेम की दास्तां सुनाता गालिम का घर आज भी अपनी जगह पर मौजूद है। वैसे कई सालों से यह घर खाली है। गालिम के परिवार से जुड़े अगली पीढ़ी के लोग अभी भी इस घर के आसपास के घरों में रहते हैं।  अब भूटान सरकार की योजना गालिम के इस घर को संग्रहालय में तब्दील करने की है। 

भूटान के प्रेमी युगल गालिम के घर को देखने आते हैं और यहां पर साथ जीने-मरने की कसमें खाते हैं।  गालिम और सिंगी की प्रेम कहानी पर भूटान में दो बार फिल्में भी बन चुकी हैं। साल 2011 में बनी सिंग लेम नामक भूटानी फिल्म  सुपर हिट रही थी।

n विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

( PUNAKHA, GALIM AND SINGI LOVE STORY, SING-LEM MOVIE 2011 ) 

Friday, May 18, 2018

मीठे पानी और बलखाती नदियों का देश- भूटान

पुनाखा में पो चू और मो चू नदियों का संगम 
पुनाखा में हमलोग सस्पेंसन ब्रिज देखने जा रहे हैं। वैसे तो भूटान में नदियों पर कई जगह झूला पुल बने हैं पर यह झूला पुल कुछ खास है इसलिए पुनाखा आने वाले सैलानी इस पुल को देखने जाते हैं। यह भूटान का सबसे लंबा सस्पेंस ब्रिज है। पोचू नदी पर बने इस पुल की लंबाई 180 मीटर है। इस पुल का इस्तेमाल स्थानीय लोग अपने गांव जाने के लिए शार्टकट के तौर पर करते हैं। पुल पर सिर्फ पैदल पार किया जा सकता है। पर पुल से नदी का बड़ा ही दिलकश नजारा दिखाई देता है। तो न सिर्फ विदेशी सैलानी बल्कि स्थानीय लोग भी इस पुल को देखने के लिए पहुंचते हैं।

सस्पेंसन ब्रिज के बिल्कुल पास तक टैक्सियां नहीं जाती। पुल से एक फर्लांग पहले पार्किंग में टैक्सी रुक जाती है। हमलोग पैदल चलकर पुल तक जाते हैं। झूलते पुल पर इस पार से उस पार जाना बड़ा रोमांचक है। पुल के उस पार पर्वत की चोटियां दिखाई देती हैं। यह पुल पो चू नदी पर है। हमारे अलावे भी कई लोग इस झूलते पुल का आनंद लेने आए हैं। दोपहर में पिकनिक सा वातावरण है।

मो चू और पो चू नदियां आगे बन जाती हैं संकोश - पुनाखा जोंग के पास ही पोचू और मोचू नदियों का संगम है। दरअसल भूटान की भाषा जोंखा में चू का मतलब नदी या पानी होता है। मो चू नदी भूटान और तिब्बत की सीमा पर गासा से निकलती है। भूटान में इसे मदर रिवर यानी स्त्रीलिंग मानते हैं। जबकि पो चू को पुरुष नदी माना जाता है। पुनाखा तक आने के बाद मो चू और पो चू नदियों का संगम हो जाता है। आगे इसमें दांग चू नदी का भी मिलन हो जाता है। इसके बाद इसका नाम पूना त्सांग चू हो जाता है। पूना त्सांग चू नदी कालिखोला में भारत के असम में प्रवेश कर जाती है। भारत में इसका नाम संकोश हो जाता है। संकोश नदी आगे ब्रह्मपुत्र में मिल जाती है। पुनाखा आने वाले सैलानी पो चू और मो चू नदियों में रिवर राफ्टिंग का खूब मजा लेते हैं।

आमो चू बन जाती है तोरसा -  भूटान की एक ओर प्रमुख नदी आमो चू है जो भारत में आकर तोरसा नाम से जानी जाती है। फुंटशोलिंग, जयगांव जैसे शहर तोरसा नदी के किनारे हैं। आमो चू नदी तिब्बत के चुंबी घाटी से निकलती है। यह 113 किलोमीटर चीन में, 145 किलोमीटर भूटान में बहने के बाद भारत में प्रवेश करती है। बाद तोरसा नदी बांग्लादेश में प्रवेश कर जाती है जहां यह कालजानी नाम से जानी जाती है। वहीं इसका मिलन ब्रह्मपुत्र में हो जाता है। फुंटशोलिंग में आमो चू नदी में क्रोकोडाईल ब्रिडिंग सेंटर का निर्माण किया गया है।

थिंपू शहर और वांग चू (रैदक और दूधकुमार ) नदी – भूटान की राजधानी थिंपू वांग चू नदी के किनारे बसा है। हिमालय से निकलने वाले वांग चू नदी राजधानी थिंपू होती हुई आगे बढ़ती है। चूजोंग में इसमें पारो की ओर से आने वाली पारो चू नदी मिलती है। संगम के बाद यह नदी थिंपू –फुंटशोलिंग राजमार्ग के साथ साथ आगे चलती है। भूटान में चुखा में इस पर 336 मेगावाट का हाईड्रो पावर प्रोजेक्ट का निर्माण किया गया है। भारत में जलपाईगुड़ी जिले में प्रवेश के बाद इसका नाम रैदक हो जाता है। भारत में प्रवेश के समय इसकी चौड़ाई महज 90 मीटर है। बांग्लादेश में प्रवेश करने पर यह दूध कुमार के नाम से जानी जाती है। वांग चू (रैदक) का मिलन भी आगे ब्रह्मपुत्र में हो जाता है।

भूटान में इन सभी नदियों का जल जहां भी नजर डालते हैं सीसे की तरह साफ नजर आता है। पर थिंपू शहर में बस स्टैंड के पास शहर का कचरा इस नदी में मिलता है तो पानी मटमैले पीले रंग का हो जाता है। पर भूटान के ज्यादातर इलाकों में नदियों में प्रदूषण का असर नगण्य है। इसलिए पानी की स्वच्छता उत्तम श्रेणी की है।
चूजोंग में पारो और वांगचू नदी का संगम 
सचमुच हम कितने गरीब हैं... पारो जाते हुए हमारे टैक्सी ड्राईवर मुझसे सवाल पूछते हैं। सुना है तुम्हारे भारत में पानी जमीन के नीचे हैंडपंप से निकालते हैं। मैं कहता हूं, हां पर इसमें क्या अचरज की बात है। वे कहते हैं- हमारे यहां तो कहीं भी ऐसे हैंड पंप नहीं है। सभी जगह पहाड़ों से बहता हुआ स्प्रिंग वाटर (झरने का पानी) हमें सुलभ है। उनकी बात सुनकर मैं चौंक जाता हूं। तब ये एहसास होता है कि पानी के मोर्चे पर हम कितने गरीब हैं। हां वाकई गरीब ही तो हैं। 200 फीट की बोरिंग कराने के बाद भी तो वैसा पानी नहीं आता जो पीने लायक भी हो।

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( PO CHU, MO CHU RIVER, WANG CHU, PARO CHU, SANKOSH , TORSA RIVER ) 

Wednesday, May 16, 2018

खुमसुम स्तूप मतलब भूटान का गोल्डेन टेंपल

पुनाखा जोंग के दर्शन के बाद हमलोग आगे निकल पड़े हैं गासा रोड पर। कोई 7 किलोमीटर जाने के बाद पोचू नदी पर रिवर राफ्टिंग प्वाइंट आता है। एक दल राफ्टिंग के लिए तैयार है। उन्हें ट्रेनिंग दी जा रही है। यहां राफ्टिंग का शुल्क 8 लोगों के लिए 8 हजार है। पर इन दिनों कम सैलानी होने के कारण 5 हजार में भी हो जा रहा है। पर हमें तो राफ्टिंग नहीं करना। हम चल रहे हैं खुमसुम यूली नामाग्लाय छोटेन जोंग की ओर। इसे स्थानीय लोग गोल्डेन टेंपल के नाम से भी जानते हैं क्योंकि इसके कलश में सोना मढ़ा गया है। ऊंची पहाड़ी पर स्थित इस जोंग तक जाने के लिए 2 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है।


टैक्सी ड्राईवर ने गाड़ी पार्किंग में लगाई। हमलोगों ने एक सुंदर सस्पेंसन ब्रिज से मोचू नदी पार किया और चल पड़े मंदिर की ओर। पहले 500 मीटर का रास्ता हरे भरे खेतों से होकर गुजरा। इसके बाद शुरू हुई चढ़ाई। आधी चढ़ाई के बाद क साईन बोर्ड नजर आया जिससे पता चला कि हम सही दिशा में जा रहे हैं। करीब 45 मिनट की चढ़ाई के बाद हम मंदिर पहुंच गए हैं। यहां से मोचू नदी का नजारा बड़ा भव्य दिखाई दे रहा है।


खुमसुम छोटेन का निर्माण 2004 में कराया गया। यह येपाइसा गांव में स्थित है। यह एक नया बौद्ध स्तूप है। रानी मां आशी शेरिंग योंगदान वांगचुक द्वारा इस भव्य स्तूप का निर्माण कराया गया है। हरित परिसर में बना यह स्तूप तीन मंजिला है। जब हमलोग परिसर में पहुंचे हैं तो स्तूप बंद है, पर 10 मिनट के इंतजार के बाद खुल गया। परिसर में एक बोधि वृक्ष भी लगाया गया है। वृक्ष के नीचे ध्यानरत बुद्ध की प्रतिमा भी है।  

स्तूप की आंतरिक सज्जा शानदार है। इसे भूटान को बुरी आत्माओं के कहर से बचाने के निमित्त बनवाया गया है। स्तूप के अंदर तीनों मंजिलों पर अति सुंदर मूर्तियां बनी हैं।
स्तूप के परिसर में अलग अलग स्थलों से आए लामा दिखाई दे रहे हैं। कुछ विदेशी नागरिक भी स्तूप देखने आए हैं। वैसे पुनाखा आने वाले कम ही लोग इस स्तूप तक आते हैं। पर अगर आप ट्रैकिंग के शौकीन हैं तो यहां जरूर पहुंचे। पारो के टाइगर नेस्ट की तुलना में यहां की चढ़ाई काफी कम है। पर स्तूप की तीसरी मंजिल के चौबारे से चारों तरफ का नजारा बड़ा शानदार दिखाई देता है। इस स्तूप तक एक रोपवे का भी निर्माण कराया गया है। पर वह सिर्फ सामान ढुलाई के लिए है। 
वैसे  तो ऐसे स्थलों पर पदयात्रा करके आने का अपना अलग आनंद है। आप प्रदूषण मुक्त वातावरण में प्रकृति संग संवाद करते हुए बढ़ते है।
स्तूप तक चढाई की तुलना में उतरने में हमें काफी कम समय लगा। हमलोग लगभग दौड़ते हुए उतर गए। सड़क पर आने पर पता चला कि इस बीच ड्राईवर महोदय दोपहर का लंच कर चुके हैं। पर हम सुबह के नास्ते के बाद लगातार घूम रहे हैं, सिर्फ जूस पीकर और गाजर खाकर। राफ्टिंग वाला दल नदी में उतर चुका है। हम चल चुके हैं अगली मंजिल की ओर।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - लिखें - vidyutp@gmail.com 
(KHUMSUM YULLEY NAMAGYAL CHOTEN, YEPAISA PUNAKHA )



Monday, May 14, 2018

भूटान का शाही बौद्ध मठ – पुनाखा जोंग


दोचुला पास से चलने के बाद पुनाखा से पहले गुरुथांग नामक कस्बा आता है। यह मोचू नदी के किनारे है। भले पुनाखा भूटान की प्राचीन राजधानी थी, पर यहां शहर बाजार के नाम पर कुछ दिखाई नहीं देता। गुरुथांग बाजार से 5 किलोमीटर आगे जाने पर पोचू और मोचू नदियों के संगम पर पुनाखा जोंग दिखाई देता है। यह भूटान का शाही बौद्ध मठ है। जोंग नदी के उस पार है। जाने के लिए नदी पर पुराना लकड़ी का पुल बना हुआ है। यह पुल बड़ा ही सुंदर है। पुल से पानी में मछलियों को देखा जा सकता है।

जोंग में प्रवेश के लिए भारतीय नागरिकों को 300 रुपये का टिकट लेना अनिवार्य है। अनादि को स्टूडेंट होने के नाम पर 150 रुपये का डिस्काउंट वाला टिकट मिल गया। छात्र डिस्काउंट के लिए आईडी कार्ड होना जरूरी है।
टिकट लेकर लकड़ी के सुंदर पुल को पार कर हम पुनाखा जोंग के परिसर में पहुंच गए हैं। कोई 20 सीढ़ियां चढ़ने के बाद मठ का विशाल प्रवेश द्वार है। दोनों तरफ दो विशाल धर्म चक्र और दीवारों पर बुद्ध के जीवन कथा से जुडी विशाल पेंटिंग।

इसके बाद हम विशाल आंगन में पहुंच गए हैं। टिकट चेक करने वाले हमें बताते हैं कि इस जोंग के आंतरिक हिस्से में तीन भाग हैं इसमें आप पूजा स्थल और बौद्ध भिक्षु निवास क्षेत्र में नहीं जा सकते। मुख्य मंदिर और उसके आंगन क्षेत्र में घूम सकते हैं।
पुनाखा जोंग का निर्माण 1637-38 में प्रथम रिनपोछे नागवांग नामग्याल द्वारा करवाया गया। यह भूटान का तीसरा सबसे पुराना और दूसरा सबसे बड़ा जोंग माना जाता है।
वास्तव में पुनाखा जोंग भूटान के राजघराने का प्रशासनिक केंद्र 1955 तक हुआ करता था। इसके बगल में ही भूटान का पुराना राजमहल स्थित है। 1955 में राजधानी थिंपू में जाने के बाद भी इस जोंग का महत्व बना हुआ है।
मुख्य मंदिर के अंदर गौतम बुद्ध आचार्य पद्म संभव और नागवांग नामग्याल की प्रतिमाएं हैं। बड़ी संख्या में थंगक पेंटिंग हैं। आंतरिक फोटोग्राफी निषेध है। पर मंदिर की सजावट भव्य है।
नागवांग नामाग्याल को बोरार्ड लामा के रूप में जाना जाता है। वह एक एक तिब्बती बौद्ध लामा थे। उन्हें एक राष्ट्र राज्य के रूप में भूटान के एकीकरण के लिए जाना जाता है। साल 1651 में पुनाखा में ही उनकी मृत्यु हो गई। इस जोंग में उनकी कुछ स्मृतियां संरक्षित हैं।

पुनाखा जोंग में 400 बौद्ध भिक्षु रहते हैं। इनमें बड़ी संख्या में  बाल लामा है। एक मंदिर के प्रभारी के तौर पर तैनात 13 साल के लामा से मेरी बात हुई। बताया कि उनके पिता पुलिस में हैं। कभी कभी मिलने आते हैं। उन्होंने मेरे बेटे अनादि से मिलने की इच्छा जताई। बाद में प्रसाद के तौर पर कई सामग्री दी। चाउमिन, केले, चिप्स और बिस्कुट। हमने उन्हे बुद्धा का आशीर्वाद समझकर ग्रहण कर लिया।
जिस समय हमलोग पुनाखा जोंग में पहुंचे है, भूटान के राजा की दादी यानी तीसरे राजा की पत्नी भी विशेष पूजा के लिए आई हैं। हमें उन्हें उनके दर्शन का सौभाग्य मिला। उनकी उम्र 100 साल के आसपास होगी। उनकी सुरक्षा में तैनात भूटान पुलिस के युवा वरिष्ठ अधिकारी से हमारी बात हुई। वे भारत के हैदराबाद में सरदार बल्लभभाई पटेल पुलिस अकादमी में प्रशिक्षण ले चुके हैं। वहीं जहां भारत के सभी आईपीएस भी एक साल का प्रशिक्षण पाते हैं।


भूटान के हर राजा की शादी पुनाखा के जोंग में होती है। साल 2013 में भी जिग्मे खेशर की शाही शादी के लिए राजधानी थिंपू से 71 किलोमीटर दूर पुनाखा में 17वीं शताब्दी के एक किले को पहले दुल्हन की तरह सजाया गया। शाही शादी में करीब1500 लोग इक्ट्ठा हुए। शाही शादी में 100 बौद्ध भिक्षुओं की विशेष प्रार्थना के साथ आरंभ हुई। शादी सुबह चार बजे से शुरू होकर करीब दो घटे तक चली। शादी के बाद नरेश और महारानी ने किले के बाहर एक मैदान में जमा हजारों लोगों के साथ मिलकर नृत्य किया। शादी के जश्न में आए लोगों को भूटान की 20 घाटियों से आए 60 बेहतरीन रसोईयों के हाथों का बना हुआ पारंपरिक भूटानी भोजन परोसा गया।
--- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( PUNAKHA DZONG, BHUTAN ) 


Saturday, May 12, 2018

भूटान में 1998 में लोकतंत्र की बयार शुरू हुई

खूबसूरत देश भूटान में इंग्लैंड की तरह गणतंत्र और पारंपरिक राजतांत्रिक शासन पद्धति है। लंबे समय से राजा के शासन के बाद इस देश में 1998 में लोकतंत्र की बयार शुरू हुई। भूटान के चौथे राजा जिग्मे सिंगे वांगचुक ने देश में जनता का शासन लाने का फैसला किया। इसके लिए क्रमबद्ध तरीके से लोकतांत्रिक शासन की स्थापना की गई। अब भूटान में डुअल सिस्टम ऑफ गवर्नमेंट चलता है। यहां लोगों द्वारा चुनी हुई सरकार और प्रधानमंत्री भी हैं लेकिन साथ ही देश का राजा भी होता है। 

जिग्मे सिंगे शासनकाल में ही भूटान में इंटरनेट और टेलीविजन को 1999 में ही इजाजत दी गई थी। 1970 में पहली बार किसी विदेशी पर्यटक को यहां आने की इजाजत दी गई थी। भूटान शासन के लिहाज से 20 जिलों में विभाजित है।
2001 में तत्कालीन नरेश जिग्मे सिंग्ये वांगचुक ने दैनिक कामकाज का दायित्व निर्वाचित मंत्रिपरिषद को सौंपा था। साल 2006 में अपने बेटे के पक्ष में गद्दी त्याग दी। चौथे भूटान नरेश ने ही देश को लोकतंत्र बनाने का फैसला किया। उन्हीं की पहल पर 2008 में चुनाव कराए गए।

भूटान की संसद यानी शोगडू में कुल 154 सीटे होती हैं। इसमे स्थानीय रूप से चुने गए प्रतिनिधि (105), धार्मिक प्रतिनिधि (12) और राजा द्वारा नामांकित प्रतिनिधि (37) होते हैं।

अब राजा भी हटाया जा सकता है - हालांकि भूटान में राजा का पद वंशानुगत चला आ रहा है लेकिन नए संविधान के मुताबिक भूटान के संसद शोगडू के दो तिहाई बहुमत द्वारा राजा को हटाया भी जा सकता है। भूटान का संविधान काफी प्रगतिशील है। इसमें देश में हमेशा 60 फीसदी हिस्सा वन क्षेत्र रखने का संकल्प लिया गया है। भूटान दुनिया का पहला कार्बन नेगेटिव देश भी है। मतलब ये जितना कार्बन डाईऑक्साइड बनाता है, उससे ज्यादा अवशोषित करता है।
2008 में पहला चुनाव - भूटान में पहले आम चुनाव 2008 में कराए गए थे। इसमें सिर्फ दो पार्टियों ने ही हिस्सा लिया था और राजशाही से संबंधित भूटान पीस एंड प्रॉसपैरिटी पार्टी (डीपीटी) चुनाव जीत गई थी। तब जिग्मे थिनले प्रधानमंत्री बनाए गए थे। वे 2013 तक देश के प्रधानमंत्री रहे।

2013 में दूसरा चुनाव - पर 2013 में दूसरा चुनाव विपक्षी पार्टी पीपुल्स डेमोक्रिटिक पार्टी ने जीता। इसके बाद भूटान के प्रधानमंत्री शेरिंग तोबगे बनाए गए। वे कई बार भारत की यात्रा पर आ चुके हैं।

2018 में तीसरा चुनाव - 2018 भूटान का चुनावी साल है। देश में तीसरी बार चुनाव प्रक्रिया शुरू की गई। नेशनल काउंसिल के लिए 20 अप्रैल को वोट डाले गए। मार्च 2018 में जब हम भूटान की सड़कों पर घूम रहे थे, तो कई जगह लगे बोर्ड पर भूटान के चुनाव की जानकारी चस्पा की गई थी। साथ ही लोगों से वोट डालने की अपील की गई थी।

20 अप्रैल 2018 को भूटान नेशनल काउंसिल के लिए मतदान हुए।
4.32 लाख मतदाता थे कुल देश में। इसमें महिला मतदाता  51 फीसदी हैं (2,20,881) 
127 कुल उम्मीदवारों में महिला उम्मीदवार सिर्फ 6 चुनाव लड़ी। 19 मार्च पर्चा दाखिल करने की आखिरी तारीख थी।

88,915 मतदाता ऐसे हैं जो डाक से वोट डालने वाले रहे, इनमें  1,964 भूटान के मतदाता विदेश में थे।
2008 में 3.12 लाख, 2013 में 3.79 लाख मतदाता थे।
2,000 मतदाताओं के साथ गासा सबसे छोटा चुनाव क्षेत्र है।
05 पंजीकृत दल मैदान में – बीकेपी , डीसीटी , डीएनटी , पीडीपी, डीजीटी आदि। 2018 में भूटान हैपीनेस पार्टी मतलब डीजीटी भी मैदान में उतरी ।
 --- vidyutp@gmail.com
( BHUTAN, ELECTION , 2008, 2013, 2018 ) 

Thursday, May 10, 2018

भूटान – अनूठे राजतंत्र से लोकतंत्र की दहलीज तक

भूटान में दोचुला से पुनाखा की ओर आगे बढ़ने पर अचानक हमें एक गाड़ियों का जत्था (कॉनवाय) जाता दिखा। दरअसल भूटान के वर्तमान राजा का काफिला पुनाखा से थिंपू की ओर आ रहा था। हमारे ड्राईवर साहब चिंतित हो गए कि मैं राजा के सम्मान में गाड़ी रोक नहीं पाया। कहीं उनके सुरक्षा दस्ते ने मेरी गाड़ी का नंबर तो नहीं नोट कर लिया होगा। मैंने उन्हें सांत्वना दी। ऐसा नहीं हुआ होगा, आप निश्चिंत होकर चलते रहिए।

भूटान में अगर राजपरिवार की गाड़ी हो तो उसके आगे नंबर प्लेट पर भूटान -1 से लेकर 20 तक नंबर हो सकता है। प्राइवेट टैक्सी का नंबर बीपी, किराये की टैक्सी का नंबर बीटी होता है। इसी तरह बीजी मतलब भूटान सरकार, बीएसटी मतलब भूटान रायल फेमिली, आरबीजी मतलब रायल भूटान गार्ड, आरबीपी मतलब रायल भूटान पुलिस, आरबीए मतलब रायल भूटान आर्मी होता है।

पांचवे राजा हैं जिग्मे खेशर नामग्याल वांगचुक - भूटान के वर्तमान राजा जिग्मे खेशर नामग्याल वांगचुक हैं। उनकी ताजपोशी 2006 में हुई थी।  भूटान नरेश जिग्मे खेशर नामग्याल वांगचुक ने मार्च 2013 में जेटसन पेमा से विवाह रचाया। भारत और लंदन के रीजेंट्स कॉलेज में शिक्षा प्राप्त करने वाली जेटसन पेमा ने बौद्ध रीति रिवाज से एक दूसरे के साथ जीने मरने की कसमें खाईं। पेमा पायलट की बेटी हैं। ऑक्सफोर्ड से पढ़ाई कर चुके शादी के समय 31वर्षीय नरेश से पेमा 10 साल छोटी हैं।

भूटान (भोटान्त) हिमालय पर बसा दक्षिण एशिया का एक छोटा देश है जो  चीन (तिब्बत) और भारत के बीच स्थित है। इस देश का स्थानीय नाम द्रुक यू है, जिसका मतलब होता है अझदहा का देश । भूटान देश मुख्यतः पहाड़ी है केवल दक्षिणी भाग में थोड़ी सी समतल भूमि है। कहा जाता है भूटान मतलब हुआ भू उत्थान यानी ऊंची जमीन। सांस्कृतिक और धार्मिक तौर से तिब्बत से जुड़ा है, लेकिन भौगोलिक और राजनीतिक तौर पर यह भारत के करीब है। भूटान का राजप्रमुख राजा अर्थात द्रुक ग्यालपो होता है।


पहले राजा गौंगसार उग्येन वांगचुक  (1907 – 1926) - भूटान में राजतंत्र की शुरुआत 1907 में हुई। राजतंत्र की स्थापना के साथ ही 17 दिसंबर 1907 को गौंगसार उग्येन वांगचुक भूटान के पहले राजा बने। 1865 में ब्रिटेन और भूटान के बीच सिनचुलु संधि पर हस्ताक्षर हुआ, जिसके तहत भूटान को सीमावर्ती कुछ भूभाग के बदले कुछ वार्षिक अनुदान पर करार हुआ। ब्रिटिश प्रभाव के तहत 1907 में वहाँ राजशाही की स्थापना हुई। 1910 में एक और समझौता हुआ, जिसके तहत ब्रिटेन इस बात पर राजी हुआ कि वह भूटान के आंतरिक मामलों में हस्त्क्षेप नहीं करेगा, लेकिन भूटान की विदेश नीति इंग्लैंड द्वारा तय की जाएगी। बाद में 1947 के पश्चात यही भूमिका भारत को मिली।

जिग्मे वांगचुक ( 1926 -1952 ) – दूसरे राजा जिग्मे वांगचुक ने 26 साल तक शासन किया। भूटान के सभी संस्थान, होटल, दुकान में आपको पांच राजाओं की तस्वीरें क्रम से लगी हुई दिखाई दे जाएंगी।


Father of Bhutan - जिग्मे दोरजी वांगचुक – (1952-1972) – तीसरे राजा ने 20 साल तक शासन किया। उन्हें फादर ऑफ भूटान कहा जाता है। उन्होंने भूटान में आधुनिकीकरण की नींव रखी। उनके शासन काल में परंपरागत देश भूटान ने कई बेहतर बदलाव देखे। लोगों के जीवन में खुशहाली आई। कई बौद्ध मठ और मंदिरों का निर्माण हुआ। उनके शासन काल में ही भूटान जैसे देश का संपर्क आसपास के देशों से बढ़ने लगा। जिग्मे दोरजी वांगचुक ने देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु से मुलाकात की थी। ये मुलाकात साल 1954 में हुई थी। इससे भारत और भूटान के रिश्तों में और मजबूती बढ़ी और आपसी सहयोग का दायरा भी बढ़ा। 

सबसे लंबा शासन काल - जिग्मे सिंगे वांगचुक ( 1972 – 2005 ) – भूटान के राजाओं में सबसे लंबा कार्यकाल चौथे राजा जिग्मे सिंगे वांगचुक का रहा। करीब 33 साल शासन करने के बाद 17 दिसंबर 2005 को उन्होंने अपने बेटे के लिए राज गद्दी छोड़ने का खुद ही ऐलान किया। वे भूटान की जनता में काफी लोकप्रिय रहे। जिग्मे सिंगे ने चार शादियां की हैं। वैसे उनकी चारों रानियां आपस में बहने हैं। वे पांचवी सबसे छोटी बहन से भी शादी करना चाहते थे, पर उसने राज परिवार से बाहर किसी कारोबारी से शादी करना पसंद किया। लंबे समय तक शासन के बाद उन्होंने 2005 में अपने बेटे के लिए राजसत्ता खुद ही छोड़ने का ऐलान कर दिया। इसके बाद वे अवकाश प्राप्ति का जीवन जीने लगे।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य 
 ( KINGS OF BHUTAN, THIMPU, PUNAKHA  ) 




Tuesday, May 8, 2018

पुनाखा की ओर – दोचुला में 108 बौद्ध स्तूप

आज हम पुनाखा जाएंगे। पुनाखा यानी भूटान की पुरानी राजधानी। थिंपू से पुनाखा की दूरी 72 किलोमीटर है। वैसे पुनाखा जाकर एक दिन वहां भी रुककर घूमा जा सकता है। पर पुनाखा जाने वाले ज्यादातर लोग टैक्सी बुक करके थिंपू से पुनाखा जाते हैं और दिन भर में घूम कर रात तक थिंपू वापस लौट आते हैं। थिंपू से आप पुनाखा शेयरिंग टैक्सी से जा सकते हैं जिसका किराया 300 रुपये प्रति व्यक्ति है। दूरी के हिसाब से यह कुछ महंगा है। वैसे बसें भी जाती हैं पर उनका समय तय है और उसमें एडवांस बुकिंग करानी पड़ती है। इसलिए बेहतर है कि कोई टैक्सी ही बुक कर ली जाए। एक टैक्सी में चार लोग यात्रा कर सकते हैं।

पुनाखा के लिए छोटी टैक्सी वाले 3000 रुपये मांगते हैं। वैसे एक टैक्सी वाले 2500 में भी घूमाने के तैयार थे, पर केजांग दोरजी जिन्होंने हमें पारो घुमाया था उनका स्वभाव अच्छा लगा इसलिए उनके साथ ही घूमना तय किया। वे हिंदी अच्छी बोल लेते हैं साथ ही भूटान के पर्यटक स्थलों के बारे में उनकी जानकारी ठीक ठाक है। आराम से टैक्सी चलाने के साथ वे रास्ते में हमें कुछ कुछ जानकारियां बड़े ही रोचक अंदाज में परोसते जाते हैं। यही तो हम चाहते भी थे। वे ठीक सुबह आठ बजे हमारे होटल पहुंच चुके हैं। हमारे पास यहां भारत के मोबाइल फोन काम नहीं कर रहे हैं इसलिए हम यहां पहले से तय करके काम चला रहे हैं। कुछ लोगों ने भूटान का स्थानीय सिम कार्ड लेने की सलाह दी थी। पर हमने नहीं लिया।

थिंपू से पुनाखा की ओर चलते हुए 25 किलोमीटर बाद दोचुला पास आता है। यह हमारा पहला पड़ाव है। थिंपू से पुनाखा तक जाने वाली सड़क भी काफी अच्छी है। पहाड़ी रास्ता है पर इतने तीखे मोड़ नहीं है।

दोचुला पास थिंपू और पुनाखा के बीच सबसे ऊंची जगह है। इसकी ऊंचाई 3150 मीटर है। दोचुला पहुंचते ही मौसम सर्द हो गया है। यहां सड़कों पर बादल तैर रहे हैं। मौसम साफ होने पर यहां से माउंट मासांगांग की चोटी नजर आता है। पर हम मौसम के कारण भूटान की सबसे ऊंची चोटी ( 7158 मीटर )  का नजारा करने से वंचित रह गए।
पुनाखा जाने वाले सारे सैलानी दोचुला रुकते हैं। यहां पर एक अच्छा रेस्टोरेंट भी है। हालांकि खाने पीने की दरें थोड़ी महंगी हैं। मतलब तीन सितारा दरें हैं। पर अनादि ने यहां एक्लेयर्स खाना पसंद किया। रेस्टोरेंट में विदेशी सैलानियों की जमघट है। गोल डायनिंग हाल के बीच में गर्माहट के लिए चिमनी लगी है। चिमनी के पास कुछ पत्थर रखे हैं जो गर्म हो जाते हैं तो उन्हें छूना अच्छा लगता है।

दोचूला के 108 स्तूप – दो चूला में सड़क के किनारे 108 स्तूपों का निर्माण कराया गया है। यह श्रद्धालुओं और सैलानियों का प्रमुख आकर्षण है। इन स्तूपों को निर्माण भूटान की बड़ी महारानी आसी दोरजी वांगमो वांगचुक द्वारा करवा गया। यहां हर साल दोचुला द्रुक वांगयाल फेस्टिवल का भी आयोजन होता है। इन स्तूपों को निर्माण 2004 में भूटान के बहादुर सैनिको की याद में कराया गया। भूटान में भारत के असम के उग्रवादी समूहों के 30 कैंप स्थापित हो गए थे। 


भूटान शासन ने इन उग्रवादियों का धीरे धीरे सफाया किया। भूटान सरकार ने इन उग्रवादियों के सफाया के लिए ऑपरेशन ऑल क्लियर अभियान चलाया था। इस दौरान सभी पकड़े गए उग्रवादी भारत सरकार को सौंप दिए गए थे। इस अभियान में जिन सैनिकों अपनी जान गंवा दी उनकी याद में ये स्तूप निर्मित किए गए हैं। असम और पश्चिम बंगाल के भूमिगत संगठन उल्फा, एनडीएफबी और कामतापुर लिबरेशन आर्गनाइजेशन (केएलओ) ने 1990 के दशक के मध्य में भूटान में आधार शिविर स्थापित कर लिए थे ताकि भारतीय सैनिकों पर गुरिल्ला हमले किए जा सकें।
दोचुला में चौथे राजा जिग्मे सिंगे वांगचुक के नाम पर एक बौद्ध मंदिर का भी निर्माण कराया गया है। दोचुला में मौसम हमेशा ठंडा और कुहरे से आच्छादित ही रहता है। पर पुनाखा जाने वाले सैलानी यहां रुक कर मौसम का आनंद लेकर ही आगे बढ़ते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य ( DOCHULA PASS, PUNAKHA ) 
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दोचुला पास में कैंटीन में एक्लेयर्स का आनंद लेते हुए...

Sunday, May 6, 2018

थिंपू शहर का शानदार सब्जी बाजार

थिंपू के होटल भूटान में हमारा कमरा तीसरी मंजिल पर है। कमरे से बाहर का सुंदर नजारा दिखाई देता है। मैं शाम को शहर में टहलने निकल पड़ता हूं पर अनादि कमरे में ही रहना चाहते हैं। तो मैं पैदल चलकर भूटान के वेजिटेबल मार्केट पहुंच गया हूं। ये बाजार वांगचू नदी के किनारे स्टेडियम और ताज ताशी होटल के पास ही है। वेजिटेबल मार्केट का भवन दो मंजिला है। विशाल बाजार में सब्जियों की दुकानों और मसालों और चावल दाल की दुकानें हैं। बिक्रेताओं को स्थायी फड़ अलाट किए गए हैं। बाजार बड़ा साफ सुथरा है। पर बाजार में सब्जियां महंगी हैं। भूटान में सब्जियां होती हैं। पर आलू प्याज और काफी चीजें भारत से भी आती हैं। बेबी कैरेट (गाजर) 60 रुपये किलो है। मैं आधा किलो खरीद लेता हूं। नास्ते के लिए।


अचानक सब्जी बाजार में एक ग्राहक से टकराता हूं। चेहरे से बिहारी लग रहे थे। बातचीत शुरू हुई। चंपारण के रहने वाले हैं। थिंपू के भारतीय दूतावास में हाल में पोस्टिंग हुई है। उन्होंने दो झोले सब्जी के खरीदें हैं। बता रहे हैं कि यहां सब्जियां बहुत महंगी हैं। ये देखिए इतनी सी सब्जी खरीदी है। ये डेढ़ हजार की हो गई है। यहां सब्जियां खाने में बिहार की तरह बहार नहीं है। सब्जी बाजार में ज्यादातर दुकानदार महिलाएं हैं। कम ही दुकान में तराजू नजर आ रहा है। आधा किलो और एक किलो के पैकेट बनाकर रखे हैं। लिजिए और जाइए। कोई मोल भाव का माहौल नहीं है। बिहार वाले भाई साहब मुझे पूरे सब्जी बाजार का मुआयना करने की सलाह देते हैं।

सब्जी बाजार से निकल कर मैं अब सड़क पर आ गया हूं। वांगचू नदी पर पुराना लकड़ी का बना पुल दिखाई देता है। पैदल यात्रियों के लिए बने इस पुल के दोनों तरफ बड़े बड़े कक्ष बने हुए हैं। यहां आप बारिश में खड़े भी हो सकते हैं। पुल पर रात में रोशनी का इंतजाम भी है। मुझे बताया गया कि इस पुल के निर्माण में कहीं लोहे की कांटी का इस्तेमाल नहीं किया गया है।


भूटान में इस तरह के कई लकड़ी के पुल बनाए हैं। पारो और पुनाखा में भी ऐसे पुल हैं। थिंपू के बाजार का मुआयना करता हुआ अपने होटल की ओर वापस लौट रहा हूं। सनडे मार्केट में एक मिनी मॉल जैसा स्टोर मिला। इसके प्रोपराइटर जिग्मे मिले जो दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कालेज में तीन साल पढाई कर चुके हैं। वे मुझसे मिलकर बड़े खुश होते हैं। उनकी माता जी भी स्टोर में हैं। इस स्टोर से मैं चावल की लाई ( मुरुंडा) कुछ जूस की बोतलें खरीद लेता हूं। ये चावल के मीठे लड्डू बहुत काम आते हैं। ये इमरजेंसी फूड है तो सुबह का अच्छा नास्ता भी है। जहां कुछ पसंद का न मिले वहां खा लिजिए। 

होटल वापस आने पर रात को मैं और अनादि एक बार फिर बाहर निकले खाने के लिए। खाना तो फिर उसी होटल गासिल में खाएंगे। तो हम पहुंच क्लॉक टावर स्क्वाएयर। होटल गासिल की थाली पसंद आ गई है अनादि को। आज पंजाबी थाली आर्डर किया छककर खाया। इसके बाद सोनम दोरजी के संग अपने पारो के अनुभवों को साझा किया। उनकी सलाह पर ही हमलोग पारो में एक दिन जाकर रुके थे। थिंपू  के मुख्य बाजार की दुकानें रात के 9.30 बजे के बाद बंद होने लगती हैं। खाने का बाद टहलते हुए हमलोग अपने होटल लौट आते हैं।

थिंपू में क्या देखें –
छोरटेन मेमोरियल – बौद्ध मठ और संग्रहालय।
क्लाक टावर स्क्वायर –
कोरोनेशनल पार्क बुद्ध मूर्ति – (वॉकिंग बुद्ध)
वेजिटेबल मार्केट, सनडे मार्केट
लकड़ी पुल (वांगचू नदी पर )
ताशी जोंग और राजा का महल
क्राफ्ट बाजार –
बुद्ध प्वाइंट  ( शहर का सबसे ऊंचा प्वाइंट जहां बुद्ध मूर्ति स्थापित है )
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  
( THIMPU, CAPITAL OF BHUTAN )