Thursday, April 5, 2018

कानपुर का फीलखाना और गणेश शंकर विद्यार्थी का प्रताप

न सिर्फ पत्रकारिता के छात्र बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास पढ़ने वाले लोग गणेशशंकर विद्यार्थी के नाम से परिचित होंगे। गणेश शंकर विद्यार्थी ने कानपुर शहर से प्रताप नामक अखबार निकाला था।
तो हमलोग कानपुर के गलियों में गणेश शंकर विद्यार्थी के प्रताप प्रेस का प्रकाशन स्थल देखने गए। कमला टावर से आगे सिरकी महाल का इलाके के पास फीलखाना का इलाका। वहां से कभी क्रांति का उदघोष करने वाले उस महान अखबार का प्रकाशन होता है। हालांकि उस गली में उस भवन में अब प्रताप की स्मृति में कुछ भी नहीं है। कोई ऐसा शिलापट्ट या संकेतक भी नहीं है जहां प्रताप समाचार पत्र के बारे में कोई जानकारी मिलती हुई। पर उन संकरी गलियों से रूबरू होना भी कुछ कम नहीं था जहांसे कभी प्रताप समाचार पत्र निकलता था।
गणेशशंकर 'विद्यार्थी' का जन्म 26 अक्तूबर 1890 को अपनी ननिहाल, इलाहाबाद के अतरसुइया मोहल्ले में श्रीवास्तव (कायस्थ) परिवार में हुआ था। उनके पिता मुंशी जयनारायण हथगांव, जिला फतेहपुर, उत्तर प्रदेश के निवासी थे। उनकी माता का नाम गोमती देवी था। पिता मध्य प्रदेश के ग्वालियर रियासत में मुंगावली के ऐंग्लो वर्नाक्युलर स्कूल के हेडमास्टर थे। तो विद्यार्थी जी का बचपन ग्वालियर में गुजरा और वहीं स्कूली शिक्षा-दीक्षा हुई। 
गणेशशंकर विद्यार्थी एक ऐसे पत्रकार थे, जिन्होंने अपनी लेखनी की ताकत से भारत में अंग्रेजी शासन की नींद उड़ा दी थी। उसकी कलम जब चलती थी तो अंग्रेजी हुकूमत की जड़ें तक हिल जाती थीं। भगत सिंह, बासकृष्ण शर्मा नवीन, सोहन लाल द्विवेदी, सनेही, प्रताप नारायण मिश्र जैसे तमाम देशभक्तों ने जिस 'प्रताप प्रेस' के माध्यम से राष्ट्रप्रेम को घर-घर तक पहुंचा दिया। 
वे निडर और निष्पक्ष पत्रकार तो थे ही, इसके साथ ही वे एक समाजसेवी, स्वतंत्रता सेनानी और कुशल राजनीतिज्ञ भी थे। कहने की जरूरत नहीं है कि भारत के 'स्वाधीनता संग्राम' में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा था। पर 25 मार्च सन 1931 को कानपुर के हिन्दू-मुस्लिम दंगे में निस्सहायों को बचाते हुए साम्प्रदायिकता की भेंट चढ़ गए थे। इसी दंगे में वे शहादत को प्राप्त हो गए। उनका शव अस्पताल में लाशों के ढेर के बीच पड़ा मिला।

जिस भवन में प्रताप प्रेस का संचालन होता था, उसके मालिक वैद्य शिव नारायण मिश्रा थे। शिव नारायण ने प्रेस चलाने के लिए पूरा भवन विद्यार्थी जी को दे दिया था। इस भवन में क्रांतिकारियों के साथ ही सक्रिय राजनीति से जुड़े राजनेताओं का आना जाना भी लगा रहता था। साथ ही यहां क्रांतिकारियों की कई महत्वपूर्ण बैठकें भी हुईं।
विद्यार्थी जी के निधन के बाद बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' प्रताप के संपादक बने। इसके बिहारी लाल ओमर को संपादक बने। बिहारी लाल ओमर के दौर में प्रेस में तालाबंदी हो गई। इसके बाद भवन के मालिक शिव नारायण मिश्रा के बेटे ने भवन को अपने कब्जे में ले लिया। बाद में इस बाद भवन के अलग- अलग हिस्सों को अलग- अलग लोगों को बेच दिया।
कानपुर में गणेश शंकर विद्यार्थी के नाम पर मेडिकल कालेज और इंटर कालेज है।  'गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार' पुरस्कार हिंदी पत्रकारिता और रचनात्मक साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य तथा विशिष्ट योगदान करने वालों को मिलता है। गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार को प्राप्त करने वाले विद्वानों को भारत के राष्ट्रपति द्वारा यह सम्मान प्रदान किया जाता है। 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
(PRATAP PRESS, FEELKHANA, KANPUR, GANESH SHANKAR VIDYARTHI) 

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