Monday, April 30, 2018

अनूठा पारो जोंग और ऐतिहासिक किचू लाखांग मठ

भूटान के हर शहर में प्रसिद्ध जोंग (बौद्ध मठ) हैं। ये जोंग न सिर्फ भूटान की के इतिहास और संस्कृति से रूबरू कराते हैं, बल्कि इनकी निर्माण शैली आपको कौतूहल में डालती है। सैलानियों के लिए इन जोंग को देखना भूटान के सबसे बड़े अजूबे से रूबरू होना है।

रिपुंग जोंग या पारो जोंग - तो नेशनल म्यूजियम के बाद हमलोग पहुंचे हैं पारो जोंग में। इसका मूल नाम रिंपुंग जोंग है।  इसमें प्रवेश के ले 300 रुपये का टिकट है। इसका निर्माण 15वीं सदी में हुआ था जो 17वीं सदी तक चलता रहा। इस विशाल जोंग के अंदर 14 अलग अलग देखने योग्य प्वाइंट है। इनमें चंदन का स्तूप, बौद्ध भिक्षुओं का प्रार्थना कक्ष आदि प्रमुख है। यहां 11 चेहरे वाले अवलोकितेश्वर बुद्ध की प्रतिमा भी देखी जा सकती है। 

रिंपुंग जोंग मं 1907 में भीषण आग लग गई थी। तब इसकी ज्यादातर धरोहर स्वाहा हो गईं। सिर्फ एक थंगक पेंटिंग को ही बचाया जा सका। इसके बाद इस मठ का पुनर्ऩिर्माण कराया गया।
पारो चू नदी के किनारे बने इस विशाल जोंग तक पहुंचने के लिए नदी के उस पार से एक लकड़ी का पुल भी बना हुआ है। हर साल मार्च महीने मे पारो जोंग के परिसर में पांच दिनों तक चलने वाला मास्क फेस्टिवल का आयोजन भी होता है।

डुंगची लाखांग मठ - हमलोग शहर की ओर लौट रहे हैं रास्ते में एक और बौद्ध मठ मिला डुंगची लाखांग। हमने इसके अंदर जाकर देखा। धर्म चक्र चलाया और मठ के अंदर लकड़ी के बारीक काम को देखा। यह 1433 का बना हुआ मठ है।  कहा जाता है यह मठ एक राक्षसी के सिर पर बना है जो पहले लोगों को बीमार बना रही थी। 1841 में इस मठ के भवन का पुनर्निमाण कराया गया।

कीचू लाखांग की अनूठी दुनिया - हमारी अगली मंजिल थी कीचू लाखांग जो पारो की सबसे अनूठा और शानदार बौद्ध मठ है। यह पूरे भूटान में सबसे प्राचीनतम बौद्ध मठों में शुमार है। इसका निर्माण 659 ईस्वी का बताया जाता है। पारो शहर से उत्तर 3 किलोमीटर बाहर स्थित इस बौद्ध मठ में प्रवेश के लिए 300 रुपये का टिकट निर्धारित है। कहा जाता है कि इस मठ का निर्माण तिब्बत के राजा सोंगटेन गांपो ने सातवीं सदी में कराया था। इस राजा ने कुल 108 बौद्ध मंदिरों का निर्माण कराया था। यह भी कहा जाता है कि बौद्ध धर्म गुरु आचार्य पद्मसंभव आठवीं सदी में अपनी पारो यात्रा में यहां रुके थे। इस दौरान उन्होंने अपने खजाने की कई महत्वपूर्ण वस्तुएं यहां पर छोड़ी थीं।  

इस मठ में प्रार्थनागृह के अलावा सुंदर संग्रहालय है जो दर्शनार्थियों को विस्मृत कर देता है। मठ के अंदर हजार हाथों वाले बुद्ध की दो प्रतिमाएं हैं। इन प्रतिमाओं के दर्शन करके बौद्ध मतावलंबी खुद को काफी धन्य समझते हैं। मठ की दीवारों पर अति सुंदर थंगक पेंटिंग भी देखी जा सकती है। यहां आप कई प्राचीन शस्त्र भी देख सकते हैं। मंदिर के निर्माण में लकड़ी का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ है। इसके अंदर कई बेशकीमती रत्नों का भी निर्माण में इस्तेमाल किया गया है। वास्तव में किचू लाखांग मठ के अंदर आना और उसके अलग अलग कक्षों को घूमना किसी तिलिस्म से कम नहीं लगता है।
मठ का परिसर काफी बड़ा है। परिसर में चारों तरफ धर्मचक्र लगे हैं। जिसे श्रद्धालु लोग नचाते रहते हैं। मंदिर परिसर में चेरी ब्लास्म के शानदार फूल खिले रहते हैं। पूरे मठ को देखने के लिए आपके पास एक घंटे से ज्यादा का वक्तहोना चाहिए।  
- Vidyut P Maurya - vidyutp@gmail.com 

(RINPUNG DZONG, PARO, DUNGTSE LAKHANG, KUCHU LAKHNAG )  

Saturday, April 28, 2018

नेशनल म्युजियम पारो और भूटान का कहानी

पारो पहुंचने के बाद हमारे पास आधा दिन का समय है। हमने तय किया कि आज पारो के मुख्य दर्शनीय स्थलों को देख लेते हैं और कल सुबह का समय टाइगर नेस्ट के लिए रखेंगे। क्योंकि टाइगर नेस्ट में आधा दिन लग जाना है। पारो के अलग अलग स्थलों को घूमने के लिए टैक्सी बुक करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। क्योंकि नेशनल म्युजियम, पारो जोंग, किचू लाखांग जोंग, टाइगर नेस्ट का स्टार्ट प्वाइंट सभी अलग अलग जगहों पर दूरी पर हैं।
टैक्सी वाले आधे दिन में पारो घूमाने के लिए 1000 रुपये मांगे। यह वाजिब था। तो हमारा पहला पड़ाव है नेशनल म्यूजियम पारो। इसका प्रवेश टिकट 25 रुपये है। भारतीय नागरिकों के लिए भी 25 रुपये ही है। भूटान के नागरिकों के लिए 10 भूटानी रुपये। तो बौद्ध भिक्षुओं के लिए निःशुल्क है।

नेशनल म्युजिम पारो का पुराना भवन 1649 का बना हुआ है। वास्तव में यह एक गोल वाच टावर था। इसे ता जोंग भी कहते हैं। इसका निर्माण ला नेगोनपा तेनजिन द्रुकद्रा द्वारा कराया गया जो पारो के गवर्नर थे। इसमें वृताकार सीढ़ियां हैं और हथियार रखने की जगह भी है। ऊंचाई पर होने के कारण यहां से पारो की वादियां बड़ी सुंदर दिखाई देती हैं। इसके कई भवन अब नेस्तनाबूद हो चुके हैं। पर 1965 में यहां नया निर्माण शुरू हुआ और भूटान की ऐतिहासिक स्मृतियों को सहेजने का काम शुरू हुआ।
संग्रहालय के अंदर मोबाइल बैग आदि लेकर नहीं जा सकते हैं। बाहर निःशुल्क लॉकर की सुविधा है।
मास्क गैलरी -  संग्रहालय के अंदर सबसे पहले मास्क गैलरी है। इसमें भूटान के अलग अलग इलाकों में होने वाले मास्क उत्सव की झलक देखी जा सकती है। मुखौटा निर्माण कला भूटान के वज्रयान बौद्ध मत से संबंध रखती है।आज भी भूटान में अलग अलग स्थलों पर मास्क फेस्टिवल होते हैं। 
थंगक गैलरी - 
दूसरी गैलरी थंगक चित्रकला है। इसमें कपड़े पर गौतम बुद्ध के जीवन से जुड़ी चित्र देखे जा सकते हैं। यहां 16वीं सदी से लेकर 18वीं सदी तक की थंगक पेंटिंग देखी जा सकती है।

तीसरी गैलरी में नामग्याल (विजय की देवी) के क्ले से बनी मूर्तियां देखी जा सकती हैं। चौथी गैलरी भूटान के प्राकृतिक इतिहास से आपका परिचय कराती है। यहां भूटान की वन संपदा, भूगोल और वन्य जीवों के बारे में विस्तार से जाना जा सकता है। 

जाति और धर्म - भूटान में आधिकारिक धर्म बौद्ध धर्म की महायान शाखा हैजिसका अनुपालन देश की लगभग तीन चौथाई जनता करती है। भूटान की 25 प्रतिशत जनसंख्या हिंदू धर्म की अनुयायियों की भी है। भूटान के हिंदू धर्मी नेपाली मूल के लोग हैजिन्हे ल्होछमपा भी कहा जाता है। भूटान  में ज्यादातर लोग यही के मूल निवासी हैंजिन को गांलोप कहा जाता है और इनका निकट का संबंध तिब्बत की कुछ प्रजातियों से है। इसके अलावा यह पर  प्रजातियों में नेपाली है और इनका सम्बन्ध नेपाल राज्य से है। उसके बाद शरछोगपा और ल्होछमपा हैं।
भूटान की भाषाएं - यहां की आधिकारिक भाषा जोङखा हैइसके साथ ही यहां कई अन्य भाषाएं बोली जाती हैंजिनमें कुछ तो विलुप्त होने के कगार पर हैं।पूरे भूटान में लोग 23 तरह की भाषाएं बोलते हैं।

72 फीसदी हिस्सा भूटान का वन क्षेत्र है।
35 फीसदी इलाका संरक्षित क्षेत्र में आता है।
04 वन्य जीव क्षेत्र और 4 नेशनल पार्क हैं भूटान में
60 फीसदी हिस्सा हमेशा वन क्षेत्र रखने का संकल्प लिया गया है।
38394 वर्ग किलोमीटर है राज्य का क्षेत्रफल। 
6.50 लाख है भूटान की आबादी।
300 किलोमीटर सीमा तिब्बत (चीन) से लगतीहै।
150 किलोमीटर से अधिक सीमा भारत से लगती है।
07 जनजातीय समूह हैं भूटान में
23 भाषाएं बोली जाती हैं देश में
46 प्रजातियां बुरांश की पाई जाती हैं भूटान में
770 तक की चिड़ियां इस देश में पायी  गई हैं।

पूरे संग्रहालय को घूमने के बाद भूटान के इतिहास और देश के विकास की गाथा से रूबरू हो सकते हैं। नेशनल म्यूजियम के अंदर एक सोवनियर शॉप भी है। यहां से आप हस्त निर्मित वस्तुएं, पुस्तकें आदि खरीद सकते हैं। 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
-         ( PARO, BHUTAN ) 

Thursday, April 26, 2018

राजधानी थिंपू से प्यारे शहर पारो की ओर

थिंपू में 23 तारीख की सुबह होटल गासिल में नास्ते में पराठा  लिया। पुनाखा के लिए परमिट लेने के बाद हमलोग पारो के लिए निकल पड़े। वैसे पुनाखा बाद में जाना है, पर परमिट सोमवार से शुक्रवार तक ही बनता है, इसलिए ये कार्य निपटा लिया। तकरीबन 60 किलोमीटर दूरी है थिंपू और पारो के बीच। शेयरिंग कार वाले 200 रुपये प्रति यात्री लेते हैं। बस में किराया कम है, पर बस दिन भर में सिर्फ दो बार ही चलती हैं। उनमें भी एडवांस बुकिंग होती है। न सिर्फ सैलानियों बल्कि स्थानीय यात्रियों को भी अचानक पारो जाना पड़े तो शेयर टैक्सी का सहारा लेना पड़ता है। 

हालांकि पारो के लिए सुबह से लेकर शाम तक, रात्रि 8 बजे तक भी टैक्सियां खूब मिलती हैं। हमें टैक्सी स्टैंड से पहले ही एक टैक्सी वाले मिल गए। हम दो सवारी तो थे, पर उन्हें और दो सवारी नहीं मिली। लिहाजा वे हमें लेकर पारो चल पड़े।

पारो चू और वांगचू का संगम
हमलोग चोजुम में पारो चू और वांगचू के संगम पर रुके। संगम पर सामने एक मंदिर बना हुआ। तमाम लोग इंडोभूटान फ्रेंडशिप ब्रिज पर खड़े होकर तस्वीरें खिंचवा रहे थे। इस संगम से एक रास्ता हा के लिए जाता है। चीन सीमा पर स्थित हा शहर की दूरी यहां से 80 किलोमीटर है।


रास्ते में होली वाटर मतलब पवित्र जल – थिंपू से पारो की  सड़क बेहतरीन बनी है। अचानक ड्राईवर साहब सड़क के किनारे गाड़ी रोकते हैं और होली वाटर की ओर इंगित करते हैं। पहाड़ों से आता एक पानी का सोता है जिसे लोग होलीवाटर कहते हैं और यहां से पानी भरकर ले जाते हैं। तो हमने भी दो बोतल होली वाटर भर लिया। इसे दिल्ली ले जाएंगे।

पारो एयरपोर्ट और होटल – पारो शहर आने से पहले हमें ली मीरिडयन होटल दिखाई देता है। पारो शहर से 5 किलोमीटर पहले पारो का एयरपोर्ट है। यह भूटान का एकमात्र अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है। यहां से भारत के शहर कोलकाता, बागडोगरा के लिए नियमित फ्लाइट है।

काठमांडू समेत कुछ और शहरों के लिए भी उड़ाने हैं। पारो शहर दो तरह पहाडों के बीच घाटी में है। इसलिए एयरपोर्ट के ठीक बगल में ऊंची पहाड़ी है। इसलिए पारो एयरपोर्ट को दुनिया के सबसे खतरनाक एयरपोर्ट में गिना जाता है। यहां विमान की लैंडिंग और टेकऑफ दोनों ही मुश्किल कार्य है। पर यहां आजतक कोई बड़ा विमान हादसा भी नहीं हुआ।
सिटी होटल पारो – पारो में हमारे रहने का इंतजाम सिटी होटल में है। यह होटल मुख्य बाजार में स्थित है। इसके मालिक एक नेपाली गुरंग हैं। होटल की दूसरी मंजिल पर रिसेप्शन और भोजनालय है। 1500 रुपये प्रतिदिन के इस होटल का कमरा काफी सुसज्जित है। रेस्टोरेंट भी काफी साफ सुथरा है। हांलाकि रेस्टोरेंट निरामिष नहीं है। पर हमें यहां पसंद का शाकाहारी खाना मिल गया। खाने के बाद हमलोग पारो दर्शन के लिए निकल गए।

आल सीजन्स होटल, पारो – वैसे तो पारो में सस्ते होटल कम दिखाई देते हैं। पर मुख्य बाजार में स्थित होटल ऑल सीजन्स का किराया 850 रुपये प्रतिदिन से आरंभ होता है। इस होटल में रेस्टोरेंट है। अब पारो में ऑल सीजन्स वेज होटल खुल गया है। इसके कमरे 1200 से 1800 के मध्य के हैं। इसमें शाकाहारी भोजनालय उपलब्ध है। ये रही पारो में ठहरने खाने पीने की बात तो अब घूमने चलते हैं। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( CITY HOTEL PARO, BHUTAN, ALL SEASONS ) 


Tuesday, April 24, 2018

थिंपू का शाकाहारी होटल गासिल और सोनम दोरजी

अगर आप शाकाहारी हैं और आप भूटान दौरे पर हैं तो किसी शाकाहारी होटल में ही रुके तों अच्छा होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि भूटान में मांसाहार के नाम पर सब कुछ खाया जाता है। यहां की ज्यादातर आबादी बीफ (गौमांस) भी खाती है। थिंपू शहर में होटल गासिल के अलावा शांति देवा और होटल भूटान भी शाकाहारी होटल हैं। गासिल और शांतिदेवा बजट होटल हैं, जबकि होटल भूटान तीन सितारा है।


दोस्त और बेहतरीन गाइड सोनम दोरजी -  होटल गासिल हमने दो दिनों के लिए बुकिंग डाटकाम से बुक किया था। इसके कमरे 1450 रुपये प्रतिदिन के हैं। वैसे यहां अकेले व्यक्ति के लिए 800 रुपये का भी कमरा है। नोरजिन लाम मुख्य सड़क पर स्थित होटल के आधारतल पर रेस्टोरेंट और रिसेप्शन है। ऊपर के तीन मंजिलों पर 24 कमरे हैं। होटल का वेज रेस्टोरेंट इतना लोकप्रिय है कि आसपास के लोग भी खाने आते हैं। रेस्टोरेंट वेज है पर यहां वे ड्रिंक्स पेश करते हैं। वैसे भूटान के हर छोटे बड़े रेस्टोरेंट के पास ड्रिंक्स का परमिट है, ऐसा देखकर प्रतीत होता है।
होटल गासिल के प्रबंधक सोनम दोरजी का व्यवहार काफी अच्छा है। वे बहुत अच्छे गाइड भी हैं। साथ ही भूटान आने वाले सैलानियों के बहुत अच्छे दोस्त। उन्होंने हमें भूटान घूमने का लिए बड़े ही विस्तार से और धैर्य से गाइड किया। साथ ही कम खर्चे में कैसे घूमा जाए उसकी भी टिप्स दी। स्वभाव से सोनम दोरजी बड़े विनोदी हैं। उनके एक भाई दिल्ली के मजनू का टीला इलाके में भूटानी रेस्टोरेंट चलाते हैं। 
सोनम दोरजी की सलाह पर हमने एक दिन पारो में रुकने की योजना बनाई। उन्होंने अपने होटल से दो दिनों की बुकिंग में एक दिन की बुकिंग रद्द करके हमें पारो में सिटी होटल की अगले दिन की बुकिंग उपलब्ध कराई। परदेश में इतनी मदद भला कौन करता है। तो सोनम भाई ने अपने व्यवहार से हमारा दिल जीत लिया। वैसे अगर आप भूटान घूमने जा रहे हैं तो पहले या तो पारो में एक रात्रि विश्राम कर दो दिन वहां घूमें या फिर लौटते हुए पारो में एक या दो रातें ठहरने की योजना बनाएं।


भूटान में सैलानियों घूमने के लिए तीन प्रमुख शहर हैं। पारो,थिंपू और पुनाखा। अगर आप भूटान पांच रातों का कार्यक्रम बना रहे हैं तो दो रातें पारो दो थिंपू और एक पुनाखा में गुजारें। या थिंपू में ही रुककर पुनाखा दिन भर घूम कर वापस लौट सकते हैं। पुनाखा के लिए सैलानियों को अलग से परमिट लेना पड़ता है। आपके भूटान परमिट की छाया प्रति के साथ एक आवेदन करना पडता है। पास जारी करने वाला इमिग्रेशन आफिस शनिवार और रविवार को बंद रहता है। हमें 25 तारीख यानी रविवार को पुनाखा जाना है तो हमने 23 तारीख की सुबह में ही पुनाखा का परमिट निकलवा लिया। 22 तारीख की शाम को हल्की बारिश के बीच हमने क्लाक टावर के आसपास थिंपू शहर का दौरा किया। बाजार में सामान महंगे हैं।


23 की सुबह सबसे पहले हमलोग छोरटेन मेमोरियल गए। यह थिंपू शहर का प्रमुख जोंग यानी मठ-मंदिर है। सैलानियों के लिए यह सुबह 9 बजे से 5 बजे तक खुलता है। विदेशी सैलानियों के लिए 300 रुपये का प्रवेश टिकट है। छोरटेन मेमोरियल में भूटान सरकार के हाईड्रो इलेक्ट्रिक विभाग के इंजीनियर मिल गए। उन्होंने हमें भूटानके इमिग्रेन आफिस तक छोड़ दिया।यह दफ्तर क्राफ्स बाजार के पास ही है।  
- vidyutp@gmail.com - विद्युत प्रकाश मौर्य

( BHUTAN, THIMPU, HOTEL GHASEL, SONAM DORJEE  ) 

Sunday, April 22, 2018

फुंटशोलिंग से थिंपू – 172 किलोमीटर छह घंटे का सफर

अपना सामान लेकर हम जैसे ही जयगांव से भूटान के फुंटशोलिंग शहर में घुसे, एक शेयरिंग टैक्सी वाले हमारे पीछे पड़ गए, थिंपू चलना है क्या दो सवारी आगे की सीट खाली है। हम यही तो चाहते थे। बाकी सीटें भर चुकी हैं बस चलना है। फुंटशोलिंग से थिंपू 172 किलोमीटर है। शेयरिंग सूमो, बुलेरो का किराया 600 रुपये है। जबकि छोटी कार से शेयरिंग किराया 750 रुपये है। अगर बस से जाते हैं तो किराया 221 रुपये है। समय लगता है तकरीबन 6 घंटे। हमारी टैक्सी में हमारे अलावा पीछे की सीटों पर 8 बिहारी मजदूर हैं जो वर्क परमिट लेकर थिंपू जा रहे हैं।

हमारा थिंपू के लिए सफर दोपहर के 12 बजे शुरू हुआ। ड्राईवर महोदय द्रुक होटल से कुछ सरकारी सामान लेने गए। उसके बाद चल पड़े। फुंटशोलिंग शहर खत्म होते ही चढ़ाई शुरू हो गई। 5 किलोमीटर चलकर पहला चेकपोस्ट आया जहां हमारे परमिट की एंट्री हुई। पूरा सिस्टम कंप्यूटरीकृत है। हर सैलानी की जानकारी ऑनलाइन सिस्टम पर दर्ज होती है। थिंपू जाने वाली सड़क दो लेन की चौड़ी सड़क है। इसे भारत सरकार के बीआरओ ने बनवाया है। परियोजना का नाम है दंतक। सड़क का रखरखाव भी बीआरओ के हवाले है। ये सड़क 2008 के बाद बनी है।
रास्ते में कुछ भूटानी महिलाएं फल बेचती नजर आती हैं। हमारे ड्राईवर उबले हुए मीठे आलू खरीदते हैं और हमें भी खाने को देते हैं। यह 30 रुपये में एक किलो मिल रहा है। बाकी सभी फल भूटान में महंगे हैं।

अपने सफर पर 45 किलोमीटर के सफर के बाद हम गीदू पहुंच गए हैं। ऊंचाई बढ़ने के साथ ठंड बढ़ने लगी है तो हमने भी हल्के जैकेट निकाल लिए हैं। गीदू में भूटान सरकार का डिग्री कॉलेज है। इसके बाद हमलोग 95 किलोमीटर पर वोंखा में एक होटल में खाने के लिए रुके। होटल साफ सुथरा है। पर हमने वहां नूडल्स खाना पसंद किया। पूरा होटल महिलाएं चला रही हैं। वे भारत के नोट भी स्वीकार कर रही हैं। ब्लैक टी, ग्रीन टी 20 रुपये की है तो मिल्क टी 30 रुपये की। पेट पूजा के बाद हमलोग आगे चल पड़े। 

चूखा नामक एक छोटा सा कस्बा आया है। यहां पर भूटान सरकार का हाईड्रो पावर प्रोजेक्ट लगा है। यह परियोजना कभी भारत सरकार के सहयोग से बनी थी। अब हमारे साथ भूटान की प्रमुख वांगचू नदी की धारा साथ साथ चल रही है।

हमारी गाड़ी में हमारे अलावा जो आठ सवारियां हैं वे सभी मजदूर लोग हैं जो अपना परमिट बनवाकर थिंपू जा रहे हैं, अगले एक साल तक काम करने के लिए। पर इन मजदूरों में से कई ने पिछली रात और आज सुबह जमकर शराब पी है। इसके कारण वे पहाड़ी रास्ते में लगातार उल्टियां कर रहे हैं। हर थोड़ी देर पर उनमें से कोई एक बोल पड़ता है गाड़ी रोको रोको। इससे ड्राईवर महोदय को बार बार गाड़ी रोकनी पड़ रही है। पर हमलोगों को उल्टी नहीं आई। शायद हम पहाड़ों पर सफर के अब अभ्यस्त हो चुके हैं।

अगला कस्बा है चापचा। फुंटशोलिंग से 120 किलोमीटर दूर आ चुके हैं हमलोग। चापचा 8163 फीट की ऊंचाई पर थिंपू मार्ग का सबसे ऊंचा प्वाइंट है। इसलिए यहां ठंड सबसे ज्यादा लगती है। हल्की बारिश होने लगी है। ड्राईवर साहब ने गाड़ी रोककर छत पर रखे हमारे लगेज को ढका। फिर शुरू हुआ आगे का सफर। चापचा के पास आखिरी चेकपोस्ट आया जहां हमारे परिमट की एक बार फिर चेकिंग और एंट्री हुई। वत्सा से थिंपू 54 किलोमीटर रह गया है। शाम गहराने लगी है। हमलोग अब पहुंच गए दामाचू जहां से 36 किलोमीटर दूरी रह गई है थिंपू शहर की।

अगला पड़ाव चूजोम है। चूजोम में पारो चू और वांग चू नदियों का संगम है। यहां से एक रास्ता पारो और एक रास्ता हा के लिए अलग होता है। इसलिए चूजोम बड़ा जंक्शन है। यहां से थिंपू 28 किलोमीटर रह गया है। चौड़ी सड़क पर गाड़ी सरपट भाग रही है। शहर से 7 किलोमीटर पहले प्रवेश द्वार आया जिस पर लिखा है वेलकम टू थिंपू।

शाम के छह बजे हमलोग भूटान की राजधानी थिंपू के क्लॉक टावर स्कावायर पहुंच चुके हैं। हमारा होटल गासिल सामने ही है। अपना सामान लेकर टहलते हुए ही हमलोग होटल के रिसेप्शन पर पहुंच गए।
यहां होटल के प्रोपराइटर सोनम दोरजी ने हमारा स्वागत किया, वेलकम टी के साथ। उसके बाद जो हमें कमरा आवंटित किया वह तीसरी मंजिल पर है। होटल में काम करने वाली 20 साल की बाला कर्मा हमारा सामान लेकर कमरे तक छोड़ने आई। कर्मा कामकाज में गजब फुर्तीली है। वह हमें साबुन, तौलिया देने के लिए तीन बार दौड़ती हुई सीढ़ियां चढ़कर आई। पर कोई शिकायत नहीं। होटल के कमरे की खिड़कियां सड़क की ओर मुखातिब है। कमरे से शहर के घंटा घर स्क्वायर का सुंदर नजारा दिखाई दे रहा है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
-        ( PHUNTSHOLING, THIMPHU, GIDU, WONKHA, CHUKHA, CHAPCHA, WATSA, DAMACHU, CHUZOM )



Saturday, April 21, 2018

भूटान में प्रवेश के लिए पासपोर्ट नहीं पर परमिट जरूरी

भूटान हमारा ऐसा पड़ोसी देश हैजहां जाने के लिए भारतीय नागरिकों को पासपोर्ट/वीजा की जरूरत नहीं पड़ती। पर हमें वहां जाने के लिए परमिट बनवाना पडता है। भारतीय नागरिकता के सबूत के लिए हमारा मतदाता पहचान पत्र (वोटर आई कार्ड)  ही वहां मान्य है। इसके आधार पर ही भूटान सरकार का इमिग्रेशन डिपार्टमेंट परमिट जारी कर देता है। पर अगर 18 साल से कम उम्र के बच्चे हों तो उनका जन्म प्रमाण पत्र जरूरी है।

अकेले व्यक्ति का परमिट नहीं - दूसरी महत्वपूर्ण बात है कि भूटान का परमिट अगर आप टूरिस्ट के तौर पर जा रहे हैं तो अकेले व्यक्ति का नहीं बनता है। यानी की सैलानियों के लिए परिवार या समूह में होना जरूरी है। फुंटशोलिंग में भूटान के वीजा,परमिट का दफ्तर भूटान गेट के अंदर द्रुक होटल के पास है। वीजा-परमिट कोलकाता के भूटानी दूतावास से भी बनवाया जा सकता है। परमिट का दफ्तर सुबह 9 बजे खुल जाता है। शनिवार रविवार और भूटान सरकार के घोषित अवकाश के दिनों में दफ्तर बंद रहता है। 

आधार कार्ड मान्य नहीं - नेपाल और भूटान की यात्रा करने वाले भारतीयों के लिए ‘आधार’ वैध पहचान दस्तावेज नहीं है। यात्रा को सरल बनाने के लिए 65 साल से अधिक और 15 साल से कम आयु वाले अपनी आयु और पहचान की पुष्टि के लिए अपनी फोटो वाले दस्तावेज दिखा सकते हैं। इनमें पैन कार्डड्राइविंग लाइसेंसकेन्द्र सरकार स्वास्थ्य सेवा (सीजीएचएस) कार्ड और राशन कार्ड शामिल हैं लेकिन आधार कार्ड शामिल नहीं है।

जयगांव में सुबह सुबह नास्ते के बाद 9 बजे हमलोग भूटान में प्रवेश कर फुंटशोलिंग के परमिट दफ्तर में पहुंच गए हैं। यहां हमने दो लंबी लाइनें देखीं। पता चला कि ये लाइन भूटान में जाकर काम करने वाले भारतीय मजदूरों की है। राजमिस्त्री, बिजली, पलंबर जैसे मजदूर भूटान जाते हैं। वहां दैनिक मजदूरी भारत से ज्यादा मिलती है। ऐसे मजदूरों को छह माह या एक साल का परमिट जारी होता है। यह पीवीसी कार्ड पहचान पत्र जैसा होता है।पर भूटान में मजदूरी करने के लिए किसी एजेंट के द्वारा जाना पड़ता है। एजेंट भी काम दिलाने के नाम पर मोटा कमिशन बनाते हैं।
टूरिस्ट परमिट बनवाने के लिए ज्यादा भीड़ नहीं थी। पर वहां जाकर पता चला कि बच्चे का बर्थ सर्टिफिकेट होना जरूरी है। मैं 13 साल के अनादि का जन्म प्रमाण पत्र लेकर नहीं गया था। हमारी परेशानी बढ़ गई। तभी कुछ लोगों ने सलाह दी कि ह्वाटसएप पर बर्थ सर्टिफिकेट मंगा लिजिए। फिर हमने यही किया। दिल्ली माधवी को फोन कर ह्वाटसएप पर मोबाइल कैमरे से फोटो खिंचवाकर जन्म प्रमाण पत्र मंगाया। फुंटशोलिंग में सामने कैफे में जाकर उसका प्रिंट निकलवाया। फार्म पूरे कर एक बार फिर इमीग्रेशन अधिकारी के पास पहुंचा। पर आप जिस तारीख से आप भूटान की यात्रा शुरू कर रहे हैं उसी तारीख से होटल बुकिंग की रशीद भी आवश्यक है। यह रशीद हमारे पास ईमेल पर थी। हमें उसका भी प्रिंट निकलवाने के लिए एक बार फिर कैफे जाना पड़ा। इस कवायद में आधे घंटे गुजर गए। अब शुरू हुई हमारे सारे कागज की जांच।

भूटान के इमिग्रेशन अधिकारी अपने राजकीय परिधान में बैठे कागज जांच रहे थे। मेरे फार्म पर प्रोफेशन में जर्नलिस्ट लिखा देख वे चौंक गए। पूछा, आप वहां क्यों जा रहे हैं, मैंने कहा बतौर सैलानी घूमने जा रहा हूं।  उन्होंने कहा, ठीक है, पर वहां जाकर रिपोर्टिंग मत किजिएगा। हमने उन्हें आश्वस्त किया। उसके बाद फार्म के साथ हमें पहली मंजिल पर भेज दिया। वहां कई काउंटर बने थे। एक काउंटर लाइन में लग गया। वहां महिला अधिकारी ने हमारी डाटा एंट्री की, ऑनलाइन फोटो लिया, उंगलियों के निशान लिए। उसके 10 मिनट बाद दूसरे काउंटर से हमें परमिट मिल गया। हमने बाहर आकर उसका फोटो कॉपी करा लिया। यह जरूरी है क्योंकि पुनाखा जाने के लिए थिंपू में दुबारा परमिट लेना पड़ता है तब फोटो कापी की जरूरत पड़ती है। 

पर्याप्त नकदी लेकर जाएं - परमिट लेकर हमलोग वापस होटल आए। चेकआउट किया। आराम लॉज के मैनेजर नवीन जी जो सीतामढ़ी के रहने वाले हैं,  उन्होंने कहा जितनी भूटानी करेंसी चाहिए मुझसे बदलवा लिजिए बिना किसी कमिशन के। वापस आने पर बची हुई राशि देकर हमसे फिर भारतीय मुद्रा ले लिजिएगा। हालांकि भूटान में थिंपू, पारो में भारतीय करेंसी चल जाती है। पर अक्सर लोग 500 और 2000 के नोट नहीं लेते। भारतीय और भूटानी करेंसी का मूल्य बराबर ही है। पर अगर आपके पास भूटान में नकदी खत्म हो जाए तो वहां एटीएम से निकालने पर 200 रुपये प्रति ट्रांजेक्शन शुल्क लगता है। अगर कार्ड से किसी दुकानदार को पेमेंट करना चाहें तो वह 3.5 फीसदी कमीशन मांगते हैं। इसलिए पर्याप्त नकदी लेकर जाएं तो अच्छा है।
 परमिट चेकलिस्ट -
    -        मतदाता पहचान पत्र या जन्म प्रमाण पत्र
-        भूटान में होटल बुकिंग की रशीद
-        आपका टूर प्लान
-        परमिट के लिए भरा हुआ फार्म
-        एक फोटोग्राफ, ( परमिट के लिए कोई शुल्क नहीं है)   
- vidyutp@gmail.com
(BHUTAN PERMIT, JAIGOAN, BENGAL ) 

फुंटशोलिंग में भूटान परमिट के लिए लाइन मे लगे भारतीय मजदूर। 

Friday, April 20, 2018

जयगांव - भूटान का लोकप्रिय प्रवेश द्वार

बंगाल के अलीपुर दुआर जिले का जयगांव शहर। जयगांव हमारे पड़ोसी देश भूटान का सबसे लोकप्रिय प्रवेश द्वार है। रोज हजारों लोग सैकड़ो वाहन यहां से भूटान में प्रवेश करते हैं। 

भूटान के तीन प्रवेश द्वार : वैसे भारत से भूटान जाने के लिए तीन चेकपोस्ट वाले शहर हैं जहां से भूटान में प्रवेश किया जा सकता है।
जयगांव के अलावा असम के बंगाईगांव से गलपे बार्डर से और असम से रंगिया पास समद्रुप जोंगखार बार्डर से भी भूटान में प्रवेश किया जा सकता है। पर इनमें जयगांव-फुंटशोलिंग सबसे लोकप्रिय प्रवेश मार्ग है भूटान के लिए। ज्यादातर सैलानी यहीं से प्रवेश करते हैं भूटान में। भारत से भूटान जाने वाले रसद व अन्य सामान की सप्लाई भी यहीं से होती है। जयगांव में आकर्षक भूटान गेट बना है, जिसके उस पार घड़ी अपना समय बदल लेती है। भूटान की घड़ी हमसे 30 मिनट आगे है। यहां दोनों देशों के बीच कोई नो मेन्स लैंड नहीं है। एक दीवार के इस पार भारत उस पार भूटान। सीमा की रक्षा एसएसबी के हवाले है।
भूटान में पैदल प्रवेश करने के लिए भूटान गेट बगल से छोटा सा प्रवेश द्वार है जिससे आप सुबह 6 बजे से रात्रि 10 बजे तक बेधड़क आ जा सकते हैं। गेट पर मेटल डिटेक्टर लगे हैं। आप भारतीय हैं तो भूटान गेट के अंदर 5 किलोमीटर तक यानी फुंटशोलिंग शहर में बिना किसी परमिट के जा सकते हैं। तो दिन भर भारत भूटान के बीच आवाजाही लगी रहती है। पर इस पार और उस पार का अंतर दिखाई देता है। फुंटशोलिंग शहर की सड़के साफ सुथरी चमचमाती हुई हैं, तो भारतीय पक्ष जयगांव की टूटी फूटी। जयगांव का बाजार सस्ता है तो फुंटशोलिंग महंगा।

अगर आप भूटान जाना चाहते हैं तो देश के किसी भी कोने से जयगांव पहुंचे। विमान से आए तो बागडोगरा एयरपोर्ट से सिलिगुड़ी शहर। सिलिगुड़ी शहर से बस से जयगांव। दूरी 170 किलोमीटर के आसपास है और किराया 100 से 140 रुपये। बागडोगरा से सीधे जयगांव टैक्सी बुक करके भी पहुंच सकते हैं। जयगांव का निकटतम रेलवे स्टेशन हाशीमारा है। हाशीमारा से जयगांव की दूरी 18 किलोमीटर है। आटोरिक्शा और बसें मिल जाती हैं। न्यू जलपाईगुड़ी गुवाहाटी रेल मार्ग पर फालाकाटा उतर कर भी जयगांव पहुंच सकते हैं। फालाकाटा से जयगांव 52 किलोमीटर है। बसें दिन भर मिलती हैं। सिक्किम की राजधानी गंटटोक और दार्जिलिंग कलिंपोंग से भी जयगांव के लिए शेयरिंग टैक्सियां रोज चलती हैं। पर ये टैक्सियां रोज सुबह ही दोनो तरफ से मिलती हैं।
भूटान में प्रवेश से पहले परमिट बनवाना पड़ता है। इसलिए हर सैलानी को एक रात तो अक्सर जयगांव में गुजारना ही पड़ता है। तो जयगांव में भूटान गेट के आसपास एनएस रोड और लिंक रोड पर कई होटल उपलब्ध हैं। यहां हर बजट में कमरे हैं 300 से लेकर 1500 तक।
जयगांव मतलब एक्सटेंशन ऑफ बिहार – पूरे जयगांव शहर में  बिहार के कारोबारी और मजदूर भरे हुए हैं। बंगाल का शहर होकर भी हिंदी भोजपुरी बोलता नजर आता है। यहां आप सत्तू, लिट्टी चोखा, गोलगप्पा, मोमोज सब कुछ खा सकते हैं। ज्यादातर दुकानदार बिहार के हैं।
इतना ही नहीं जयगांव से रोज बिहार के पूर्णिया, सहरसा, मुजफ्फरपुर, छपरा, सीवान, गोपालगंज, बेतिया, मोतिहारी के लिए सीधी बसें खुलती हैं। मतलब साफ है जयगांव की आधी से ज्यादा आबादी बिहार से संबंध रखती है। जयगांव के सड़कों पर शाम-सुबह टहलते हुए यूं लगता है जैसे बिहार में ही हों।
एनएस रोड पर गोकुल स्वीट्स नामक मिठाइयों की दुकान है। दुकानदार महोदय अलवर राजस्थान के हैं। वे कलाकंद भी बनाते हैं। रसमलाई भी और रसमाधुरी भी। सुबह नास्ते में दो छोटे भठूरे 25 रुपये के। हमने रात को मिठाइयां खाई तो सुबह छोला भठूरा। सुबह सुबह मुझे तो छपरा के साव जी एनएस रोड पर सत्तू बेचते मिले, 10 रुपये का गिलास। साव  जी 40 साल से जयगांव में हैं। 10 रुपये का एक गिलास सत्तू बनाने से पहले 50 ग्राम सत्तू तराजू में तौलते हैं फिर बड़े प्रेम से सत्तू का ग्लास तैयार करते हैं। मैंने पिया तो देखा देखी अनादि भी सत्तू पीने लगे।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com 
( GOKUL SWEETS, JAIGAON , BENGAL) 

Thursday, April 19, 2018

बाघ पुल से भूटान गेट जयगांव, चाय के बगान के साथ सफर

गंगटोक से वापसी में हम सिलिगुड़ी जाने के बजाय बाघ पुल पर ही उतर गए हैं। हमें टैक्सी ड्राईवर मधुकर ने बताया था कि अगर आप भूटान के शहर फुंटशोलिंग, जयगांव बार्डर जाना जाहते हैं तो आपको गंगटोक से सिलिगुड़ी जाने की जरूरत नहीं है। सिलिगुड़ी से 30 किलोमीटर पहले बाघ पुल पर उतर जाएं। सिलिगुड़ी से जयगांव जाने वाली सभी बसें इस पुल से होकर गुजरती हैं। आपका समय और पैसा दोनो बचेगा। सचमुच हमारे दो घंटे की बचत हुई। साथ 200 से ज्यादा रुपये भी बचे। गंगोटक से बाघ पुल बस का किराया 140 रुपये। जबकि बाघ पुल से जयगांव का किराया 100 रुपये।
1941 में बना बाघ पुल - बाघपुल यानी कोरोनेशन ब्रिज। यह ब्रिटिश काल का ऐतिहासिक पुल है। तीस्ता नदी पर बने इस पुल के प्रवेश द्वार के दोनों तरफ दो बाघ की प्रतिमाएं लगी हैं इसलिए इसे बाघ पुल कहते हैं। एनएच 31 पर बना यह पुल दार्जिलिंग और जलपाई गुड़ी जिले को जोड़ता है। इस पुल का निर्माण 1937 में शुरू हुआ था। किंग जार्ज पंचम और महारानी एलिजाबेथ के राज्यारोहण की याद में इस पुल को नाम मिला था। पुल 1941 में बन कर तैयार हुआ। इस आकर्षक पुल के निर्माण में तब 4 लाख रुपये का खर्च आया था। तब 1937 में बंगाल के गवर्नर जॉन एंडरसन ने इस पुल की आधारशिला रखी थी। स्थानीय लोग इस बाघ पुल कहते हैं। बाघ पुल के सामने तीस्ता नदी पर रेलवे का भी पुल बना हुआ है।
हमारी बस आकर बाघ पुल के बीचों बीच रुकी। पर ये बस जयगांव तक नहीं बल्कि बीरपाड़ा तक ही जा रही है। बस में जगह भी नहीं है। पर कंडक्टर महोदय भरोसा दिलाते हैं कि आगे जगह मिल जाएगी तो हमलोग बस में बैठ जाते हैं।
सड़क रेलवे लाइन के साथ चल रही है। बागरकोट चाय बगान सड़क के दोनों तरफ नजरों में है। उदयबाड़ी के बाद दमदिम कैंटोनमेंट एरिया आया। इसके बाद माल बाजार। यह जलपाईगुड़ी जिले का बड़ा बाजार है। यहां मुझे और अनादि को बस में सीट मिल गई। एक बंगाली महिला और उनकी बेटी ने सीट खाली की तो हम वहां जा बैठे। माल बाजार के बाद बस चालसा में रुकी। इसके बाद नगरकाटा, लूकसान और बानरहाट जैसे छोटे छोटे कस्बे आए। यहां डायना नदी पर पुल और डायना टी एस्टेट का विशाल चाय बगान नजर आया। इसके बाद हम पहुंचे हैं बिनागुड़ी। बिनागुड़ी थल सेना का बड़ा कैंटोनमेंट है। बिनागुड़ी से कुछ किलोमीटर के सफर के बाद एथलबाड़ी से अलीपुर दुआर जिला शुरू हो जाता है। बंगाल के दुआर्स रीजन में चाय की कई प्रसिद्ध बगाने हैं।

बीरपाड़ा शहर में भारी जाम लगा है। हमारी बस यहीं तक है। यहां से उतरने के बाद हमें अगली बस मिली मदारीहाट तक की। लोगों ने बताया वहां से जयगांव की बस मिल जाएगी। बीरपाड़ा से मदारीहाट सिर्फ 12 किलोमीटर है। मदारीहाट में उतरकर हम बस का इंतजार करने लगे पर देर तक कोई बस नहीं आई। हमलोग चौराहे  पर खड़े हैं लोग बता रहे हैं बस फालकाटा से भी आ सकती है और सिलिगुड़ी की तरफ से भी। मदारीहाट से जयगांव 30 किलोमीटर है।

शाम के 7 बज गए हैं। मैं आश्वस्त हूं अगर बस नहीं आई तो सामने एक गेस्ट हाउस दिखाई दे रहा है। रात को यहीं रुक जाएंगे। पर थोड़ी देर में सिलिगुड़ी से आने वाली बस आ गई। हमलोग फटाफट इसमें जा बैठे। पहले हाशीमारा रेलवे स्टेशन आया, जो न्यू हाशीमारा कहलता है। इसके बाद ओल्ड हाशीमारा फिर जयगांव बाजार। सरपट भागती बस ने हमें जयगांव बस स्टैंड में उतार दिया। वहां से शेयरिंग आटो रिक्शा मिला जिसमें 7 रुपये प्रति सवारी की दर से हम भूटान गेट पहुंच गए। पूरे दुआर्स इलाके में हमें लोग बांग्ला के बजाय हिंदी बोलते नजर आए। 
जयगांव के भूटान के गेट के सामने लिंक रोड पर होटल आराम हमारा ठिकाना बना। जयगांव में रहने के लिए किफायती और बेहतरीन जगह है। हमें उन्होने तीसरी मंजिल पर डबलबेड रुम दिया 600 रुपये प्रतिदिन की दर पर. होटल में अच्छा भोजनालय भी है। 
जयगांव फुंटशोलिंग के बारे में हमारे हमारे फेसबुक मित्र बिबेक शाह ने भी काफी जानकारी दी थी। वे हाशिमारा में रहते हैं। पर उनसे इस यात्रा के दौरान मिलना नहीं हो सका। 
( यात्रा मार्ग-  बाघपुल - बागरकोट- उदयबाड़ी- दमदिम- माल बाजार- चालसा- नगरकाटा-लुकसान - बनारहाट- बिनागुड़ी –तेलीपाड़ा- एथलबाड़ी – बीरपाड़ा- मदारीहाट- न्यू हाशीमारा- ओल्ड हाशीमारा- जयगांव )
-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmal.com 
     ( BAGH PUL, TEA GARDEN, BIRPARA, MADARIHAT, HASIMARA, JAIGAON, ARAM LODGE ) 


    

Wednesday, April 18, 2018

बुद्धा इन गंगटोक – गोंजांग मोनेस्ट्री

गंगटोक शहर में कई बौद्ध मठ हैं। पिछली बार मैं छोरटेन मोनेस्ट्री देख चुका था। इस बार हमलोग पहुंचे हैं गोंजांग मोनेस्ट्री। इस बौद्ध मठ का परिसर विशाल है। आपको सड़क से सीढ़िया उतरकर मठ में आना पड़ता है। परिसर में बौद्ध भिक्षुओं के लिए विशाल आवास भी बना हुआ है। इस पांच मंजिला आवासीय परिसर में बौद्ध भिक्षु स्मार्ट फोन के साथ लैस और उसमें व्यस्त भी नजर आए।
मंदिर के परिसर में अत्यंत शांति का वातावरण है।
मुख्य मंदिर के अंदर आचार्य पद्मसंभव, गौतम बुद्ध की विशाल प्रतिमाएं हैं। अंतर दीवारों पर अत्यंत सुंदर चित्रकारी है। इन चित्रों में सिक्किम भूटान में बौद्ध धर्म के प्रसार की गाथा अंकित है। मंदिर परिसर में गुरु पद्म संभव की कुल 25 प्रतिमाएं बनी हैं जो उनके द्वारा सिक्किम, नेपाल, तिब्ब, भूटान में बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार की गाथा सुनाते हैं। गोंजांग मठ सैलानियों के लिए सुबह सात बजे से शाम 5 बजे तक खुला रहता है। अब हमलोग गोंजांग मठ से आगे चल पड़े हैं। 
मेडिसीन बुद्ध की मूर्ति -  गंगटोक शहर के रास्ते में हमें मेडिसीन बुद्धा की मूर्ति दिखाई देती है। मान्यता है कि बुद्ध की यह मूर्ति आपको स्वस्थ और निरोग होने का आशीर्वाद देती है। यहां बुद्ध की परिकल्पना एक फिजिशियन के तौर पर की गई है। एक ऐसा फिजिशयन जो आपको बाह्य और आंतरिक दोनों तरह के रोगों से मुक्ति दिलाता है। वह अंतर को शुद्ध करता है और आपको सत्य के मार्ग की ओर चलने की प्रेरणा देता है।
सड़क के किनारे पत्थरों पर बने मेडिसीन बुद्ध की मूर्ति के नीचे सिक्किम सैन्य पुलिस द्वारा उनकी विशेषताएं लिखवाई गई हैं। हम भी बुद्ध से स्वस्थ निरोग रहने की प्रार्थना करते हुए आगे की राह पर बढ़ चले हैं।
रास्ते में स्कूल में पढ़ने वाली दो भूटिया बालिकाएं कार में लिफ्ट मांगती हैं। ड्राईवर मुझसे अनुमति मांगते हैं। मैं कहता हूं बिठा लिजिए। पहाड़ों पर देर तक कोई वाहन नहीं मिलता कई बार।

गंगटोक में देवराली की ओर जाते हुए आगे एक और झरना आया। यहां पर सैलानियों की भीड़ लगी थी। कुछ मनोरंजन का भी इंतजाम था। थोड़ी देर यहां रुक कर हमलोग आगे बढ़ चले। हमें बुजुर्ग टैक्सी वाले मधुकर भाई ने कई और जानकारियां दी गंगटोक के बारे में।

गंगटोक से वापसी - अब सिक्किम से चला चली की वेला है। पर तीसरी बार भी सिक्किम आने की इच्छा बनी हुई है। गंगटोक के देवराली स्टैंड पर मधुकर भाई ने हमें टैक्सी के बजाय बस से जाने की सलाह दी। कहा, समय और पैसा दोनों बचेगा। बस में गंगटोक सिलिगुड़ी का किराया 160 रुपये है जबकि टैक्सी में 250 रुपये। सस्ता होने के बावजूद बस का सफर ज्यादा आरामदेह है। छोटी बस है जिसमें लेग स्पेस अच्छा है। सामान रखने की जगह भी है। हमें बाघ पुल उतरना है तो वहां तक का किराया 140 रुपये ही है। बस तुरंत चल पड़ी।

रंगपो में वापसी के समय...
सिक्किम के आखिरी पड़ाव रंगपो में बस पांच मिनट के लिए रुकी। हमने यहां जूस की बोतलें खरीदी। बाकी के छोटे छोटे स्थलों पर अगर कोई सवारी उतरने चढ़ने वाली हो तो रुक जाती है वरना अपनी गति से चलती जा रही है। बस में सीट से ज्यादा सवारियां नहीं है। तीस्ता के साथ वापसी का भी सफर सुहाना है। हमलोग 11.30 बजे गंगटोक में बस में बैठे थे। तकरीबन ढाई बजे बस ने हमें सेवक से पहले कोरोनेशन ब्रिज यानी बाघ पुल पर उतार दिया। अलविदा सिक्किम।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य   - vidyutp@gmail.com 
(GANGTOK, SIKKIM, BUDDHA, GONJANG MONASTERY ) 
आगे पढ़िए - भूटान की यात्रा.....