Sunday, April 22, 2018

फुंटशोलिंग से थिंपू – 172 किलोमीटर छह घंटे का सफर

अपना सामान लेकर हम जैसे ही जयगांव से भूटान के फुंटशोलिंग शहर में घुसे, एक शेयरिंग टैक्सी वाले हमारे पीछे पड़ गए, थिंपू चलना है क्या दो सवारी आगे की सीट खाली है। हम यही तो चाहते थे। बाकी सीटें भर चुकी हैं बस चलना है। फुंटशोलिंग से थिंपू 172 किलोमीटर है। शेयरिंग सूमो, बुलेरो का किराया 600 रुपये है। जबकि छोटी कार से शेयरिंग किराया 750 रुपये है। अगर बस से जाते हैं तो किराया 221 रुपये है। समय लगता है तकरीबन 6 घंटे। हमारी टैक्सी में हमारे अलावा पीछे की सीटों पर 8 बिहारी मजदूर हैं जो वर्क परमिट लेकर थिंपू जा रहे हैं।

हमारा थिंपू के लिए सफर दोपहर के 12 बजे शुरू हुआ। ड्राईवर महोदय द्रुक होटल से कुछ सरकारी सामान लेने गए। उसके बाद चल पड़े। फुंटशोलिंग शहर खत्म होते ही चढ़ाई शुरू हो गई। 5 किलोमीटर चलकर पहला चेकपोस्ट आया जहां हमारे परमिट की एंट्री हुई। पूरा सिस्टम कंप्यूटरीकृत है। हर सैलानी की जानकारी ऑनलाइन सिस्टम पर दर्ज होती है। थिंपू जाने वाली सड़क दो लेन की चौड़ी सड़क है। इसे भारत सरकार के बीआरओ ने बनवाया है। परियोजना का नाम है दंतक। सड़क का रखरखाव भी बीआरओ के हवाले है। ये सड़क 2008 के बाद बनी है।
रास्ते में कुछ भूटानी महिलाएं फल बेचती नजर आती हैं। हमारे ड्राईवर उबले हुए मीठे आलू खरीदते हैं और हमें भी खाने को देते हैं। यह 30 रुपये में एक किलो मिल रहा है। बाकी सभी फल भूटान में महंगे हैं।

अपने सफर पर 45 किलोमीटर के सफर के बाद हम गीदू पहुंच गए हैं। ऊंचाई बढ़ने के साथ ठंड बढ़ने लगी है तो हमने भी हल्के जैकेट निकाल लिए हैं। गीदू में भूटान सरकार का डिग्री कॉलेज है। इसके बाद हमलोग 95 किलोमीटर पर वोंखा में एक होटल में खाने के लिए रुके। होटल साफ सुथरा है। पर हमने वहां नूडल्स खाना पसंद किया। पूरा होटल महिलाएं चला रही हैं। वे भारत के नोट भी स्वीकार कर रही हैं। ब्लैक टी, ग्रीन टी 20 रुपये की है तो मिल्क टी 30 रुपये की। पेट पूजा के बाद हमलोग आगे चल पड़े। 

चूखा नामक एक छोटा सा कस्बा आया है। यहां पर भूटान सरकार का हाईड्रो पावर प्रोजेक्ट लगा है। यह परियोजना कभी भारत सरकार के सहयोग से बनी थी। अब हमारे साथ भूटान की प्रमुख वांगचू नदी की धारा साथ साथ चल रही है।

हमारी गाड़ी में हमारे अलावा जो आठ सवारियां हैं वे सभी मजदूर लोग हैं जो अपना परमिट बनवाकर थिंपू जा रहे हैं, अगले एक साल तक काम करने के लिए। पर इन मजदूरों में से कई ने पिछली रात और आज सुबह जमकर शराब पी है। इसके कारण वे पहाड़ी रास्ते में लगातार उल्टियां कर रहे हैं। हर थोड़ी देर पर उनमें से कोई एक बोल पड़ता है गाड़ी रोको रोको। इससे ड्राईवर महोदय को बार बार गाड़ी रोकनी पड़ रही है। पर हमलोगों को उल्टी नहीं आई। शायद हम पहाड़ों पर सफर के अब अभ्यस्त हो चुके हैं।

अगला कस्बा है चापचा। फुंटशोलिंग से 120 किलोमीटर दूर आ चुके हैं हमलोग। चापचा 8163 फीट की ऊंचाई पर थिंपू मार्ग का सबसे ऊंचा प्वाइंट है। इसलिए यहां ठंड सबसे ज्यादा लगती है। हल्की बारिश होने लगी है। ड्राईवर साहब ने गाड़ी रोककर छत पर रखे हमारे लगेज को ढका। फिर शुरू हुआ आगे का सफर। चापचा के पास आखिरी चेकपोस्ट आया जहां हमारे परिमट की एक बार फिर चेकिंग और एंट्री हुई। वत्सा से थिंपू 54 किलोमीटर रह गया है। शाम गहराने लगी है। हमलोग अब पहुंच गए दामाचू जहां से 36 किलोमीटर दूरी रह गई है थिंपू शहर की।

अगला पड़ाव चूजोम है। चूजोम में पारो चू और वांग चू नदियों का संगम है। यहां से एक रास्ता पारो और एक रास्ता हा के लिए अलग होता है। इसलिए चूजोम बड़ा जंक्शन है। यहां से थिंपू 28 किलोमीटर रह गया है। चौड़ी सड़क पर गाड़ी सरपट भाग रही है। शहर से 7 किलोमीटर पहले प्रवेश द्वार आया जिस पर लिखा है वेलकम टू थिंपू।

शाम के छह बजे हमलोग भूटान की राजधानी थिंपू के क्लॉक टावर स्कावायर पहुंच चुके हैं। हमारा होटल गासिल सामने ही है। अपना सामान लेकर टहलते हुए ही हमलोग होटल के रिसेप्शन पर पहुंच गए।
यहां होटल के प्रोपराइटर सोनम दोरजी ने हमारा स्वागत किया, वेलकम टी के साथ। उसके बाद जो हमें कमरा आवंटित किया वह तीसरी मंजिल पर है। होटल में काम करने वाली 20 साल की बाला कर्मा हमारा सामान लेकर कमरे तक छोड़ने आई। कर्मा कामकाज में गजब फुर्तीली है। वह हमें साबुन, तौलिया देने के लिए तीन बार दौड़ती हुई सीढ़ियां चढ़कर आई। पर कोई शिकायत नहीं। होटल के कमरे की खिड़कियां सड़क की ओर मुखातिब है। कमरे से शहर के घंटा घर स्क्वायर का सुंदर नजारा दिखाई दे रहा है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
-        ( PHUNTSHOLING, THIMPHU, GIDU, WONKHA, CHUKHA, CHAPCHA, WATSA, DAMACHU, CHUZOM )



Saturday, April 21, 2018

भूटान में प्रवेश के लिए पासपोर्ट नहीं पर परमिट जरूरी

भूटान हमारा ऐसा पड़ोसी देश हैजहां जाने के लिए भारतीय नागरिकों को पासपोर्ट/वीजा की जरूरत नहीं पड़ती। पर हमें वहां जाने के लिए परमिट बनवाना पडता है। भारतीय नागरिकता के सबूत के लिए हमारा मतदाता पहचान पत्र (वोटर आई कार्ड)  ही वहां मान्य है। इसके आधार पर ही भूटान सरकार का इमिग्रेशन डिपार्टमेंट परमिट जारी कर देता है। पर अगर 18 साल से कम उम्र के बच्चे हों तो उनका जन्म प्रमाण पत्र जरूरी है।

अकेले व्यक्ति का परमिट नहीं - दूसरी महत्वपूर्ण बात है कि भूटान का परमिट अगर आप टूरिस्ट के तौर पर जा रहे हैं तो अकेले व्यक्ति का नहीं बनता है। यानी की सैलानियों के लिए परिवार या समूह में होना जरूरी है। फुंटशोलिंग में भूटान के वीजा,परमिट का दफ्तर भूटान गेट के अंदर द्रुक होटल के पास है। वीजा-परमिट कोलकाता के भूटानी दूतावास से भी बनवाया जा सकता है। परमिट का दफ्तर सुबह 9 बजे खुल जाता है। शनिवार रविवार और भूटान सरकार के घोषित अवकाश के दिनों में दफ्तर बंद रहता है। 

आधार कार्ड मान्य नहीं - नेपाल और भूटान की यात्रा करने वाले भारतीयों के लिए ‘आधार’ वैध पहचान दस्तावेज नहीं है। यात्रा को सरल बनाने के लिए 65 साल से अधिक और 15 साल से कम आयु वाले अपनी आयु और पहचान की पुष्टि के लिए अपनी फोटो वाले दस्तावेज दिखा सकते हैं। इनमें पैन कार्डड्राइविंग लाइसेंसकेन्द्र सरकार स्वास्थ्य सेवा (सीजीएचएस) कार्ड और राशन कार्ड शामिल हैं लेकिन आधार कार्ड शामिल नहीं है।

जयगांव में सुबह सुबह नास्ते के बाद 9 बजे हमलोग भूटान में प्रवेश कर फुंटशोलिंग के परमिट दफ्तर में पहुंच गए हैं। यहां हमने दो लंबी लाइनें देखीं। पता चला कि ये लाइन भूटान में जाकर काम करने वाले भारतीय मजदूरों की है। राजमिस्त्री, बिजली, पलंबर जैसे मजदूर भूटान जाते हैं। वहां दैनिक मजदूरी भारत से ज्यादा मिलती है। ऐसे मजदूरों को छह माह या एक साल का परमिट जारी होता है। यह पीवीसी कार्ड पहचान पत्र जैसा होता है।पर भूटान में मजदूरी करने के लिए किसी एजेंट के द्वारा जाना पड़ता है। एजेंट भी काम दिलाने के नाम पर मोटा कमिशन बनाते हैं।
टूरिस्ट परमिट बनवाने के लिए ज्यादा भीड़ नहीं थी। पर वहां जाकर पता चला कि बच्चे का बर्थ सर्टिफिकेट होना जरूरी है। मैं 13 साल के अनादि का जन्म प्रमाण पत्र लेकर नहीं गया था। हमारी परेशानी बढ़ गई। तभी कुछ लोगों ने सलाह दी कि ह्वाटसएप पर बर्थ सर्टिफिकेट मंगा लिजिए। फिर हमने यही किया। दिल्ली माधवी को फोन कर ह्वाटसएप पर मोबाइल कैमरे से फोटो खिंचवाकर जन्म प्रमाण पत्र मंगाया। फुंटशोलिंग में सामने कैफे में जाकर उसका प्रिंट निकलवाया। फार्म पूरे कर एक बार फिर इमीग्रेशन अधिकारी के पास पहुंचा। पर आप जिस तारीख से आप भूटान की यात्रा शुरू कर रहे हैं उसी तारीख से होटल बुकिंग की रशीद भी आवश्यक है। यह रशीद हमारे पास ईमेल पर थी। हमें उसका भी प्रिंट निकलवाने के लिए एक बार फिर कैफे जाना पड़ा। इस कवायद में आधे घंटे गुजर गए। अब शुरू हुई हमारे सारे कागज की जांच।

भूटान के इमिग्रेशन अधिकारी अपने राजकीय परिधान में बैठे कागज जांच रहे थे। मेरे फार्म पर प्रोफेशन में जर्नलिस्ट लिखा देख वे चौंक गए। पूछा, आप वहां क्यों जा रहे हैं, मैंने कहा बतौर सैलानी घूमने जा रहा हूं।  उन्होंने कहा, ठीक है, पर वहां जाकर रिपोर्टिंग मत किजिएगा। हमने उन्हें आश्वस्त किया। उसके बाद फार्म के साथ हमें पहली मंजिल पर भेज दिया। वहां कई काउंटर बने थे। एक काउंटर लाइन में लग गया। वहां महिला अधिकारी ने हमारी डाटा एंट्री की, ऑनलाइन फोटो लिया, उंगलियों के निशान लिए। उसके 10 मिनट बाद दूसरे काउंटर से हमें परमिट मिल गया। हमने बाहर आकर उसका फोटो कॉपी करा लिया। यह जरूरी है क्योंकि पुनाखा जाने के लिए थिंपू में दुबारा परमिट लेना पड़ता है तब फोटो कापी की जरूरत पड़ती है। 

पर्याप्त नकदी लेकर जाएं - परमिट लेकर हमलोग वापस होटल आए। चेकआउट किया। आराम लॉज के मैनेजर नवीन जी जो सीतामढ़ी के रहने वाले हैं,  उन्होंने कहा जितनी भूटानी करेंसी चाहिए मुझसे बदलवा लिजिए बिना किसी कमिशन के। वापस आने पर बची हुई राशि देकर हमसे फिर भारतीय मुद्रा ले लिजिएगा। हालांकि भूटान में थिंपू, पारो में भारतीय करेंसी चल जाती है। पर अक्सर लोग 500 और 2000 के नोट नहीं लेते। भारतीय और भूटानी करेंसी का मूल्य बराबर ही है। पर अगर आपके पास भूटान में नकदी खत्म हो जाए तो वहां एटीएम से निकालने पर 200 रुपये प्रति ट्रांजेक्शन शुल्क लगता है। अगर कार्ड से किसी दुकानदार को पेमेंट करना चाहें तो वह 3.5 फीसदी कमीशन मांगते हैं। इसलिए पर्याप्त नकदी लेकर जाएं तो अच्छा है।
 परमिट चेकलिस्ट -
    -        मतदाता पहचान पत्र या जन्म प्रमाण पत्र
-        भूटान में होटल बुकिंग की रशीद
-        आपका टूर प्लान
-        परमिट के लिए भरा हुआ फार्म
-        एक फोटोग्राफ, ( परमिट के लिए कोई शुल्क नहीं है)   
- vidyutp@gmail.com
(BHUTAN PERMIT, JAIGOAN, BENGAL ) 

फुंटशोलिंग में भूटान परमिट के लिए लाइन मे लगे भारतीय मजदूर। 

Friday, April 20, 2018

जयगांव - भूटान का लोकप्रिय प्रवेश द्वार

बंगाल के अलीपुर दुआर जिले का जयगांव शहर। जयगांव हमारे पड़ोसी देश भूटान का सबसे लोकप्रिय प्रवेश द्वार है। रोज हजारों लोग सैकड़ो वाहन यहां से भूटान में प्रवेश करते हैं। 

भूटान के तीन प्रवेश द्वार : वैसे भारत से भूटान जाने के लिए तीन चेकपोस्ट वाले शहर हैं जहां से भूटान में प्रवेश किया जा सकता है।
जयगांव के अलावा असम के बंगाईगांव से गलपे बार्डर से और असम से रंगिया पास समद्रुप जोंगखार बार्डर से भी भूटान में प्रवेश किया जा सकता है। पर इनमें जयगांव-फुंटशोलिंग सबसे लोकप्रिय प्रवेश मार्ग है भूटान के लिए। ज्यादातर सैलानी यहीं से प्रवेश करते हैं भूटान में। भारत से भूटान जाने वाले रसद व अन्य सामान की सप्लाई भी यहीं से होती है। जयगांव में आकर्षक भूटान गेट बना है, जिसके उस पार घड़ी अपना समय बदल लेती है। भूटान की घड़ी हमसे 30 मिनट आगे है। यहां दोनों देशों के बीच कोई नो मेन्स लैंड नहीं है। एक दीवार के इस पार भारत उस पार भूटान। सीमा की रक्षा एसएसबी के हवाले है।
भूटान में पैदल प्रवेश करने के लिए भूटान गेट बगल से छोटा सा प्रवेश द्वार है जिससे आप सुबह 6 बजे से रात्रि 10 बजे तक बेधड़क आ जा सकते हैं। गेट पर मेटल डिटेक्टर लगे हैं। आप भारतीय हैं तो भूटान गेट के अंदर 5 किलोमीटर तक यानी फुंटशोलिंग शहर में बिना किसी परमिट के जा सकते हैं। तो दिन भर भारत भूटान के बीच आवाजाही लगी रहती है। पर इस पार और उस पार का अंतर दिखाई देता है। फुंटशोलिंग शहर की सड़के साफ सुथरी चमचमाती हुई हैं, तो भारतीय पक्ष जयगांव की टूटी फूटी। जयगांव का बाजार सस्ता है तो फुंटशोलिंग महंगा।

अगर आप भूटान जाना चाहते हैं तो देश के किसी भी कोने से जयगांव पहुंचे। विमान से आए तो बागडोगरा एयरपोर्ट से सिलिगुड़ी शहर। सिलिगुड़ी शहर से बस से जयगांव। दूरी 170 किलोमीटर के आसपास है और किराया 100 से 140 रुपये। बागडोगरा से सीधे जयगांव टैक्सी बुक करके भी पहुंच सकते हैं। जयगांव का निकटतम रेलवे स्टेशन हाशीमारा है। हाशीमारा से जयगांव की दूरी 18 किलोमीटर है। आटोरिक्शा और बसें मिल जाती हैं। न्यू जलपाईगुड़ी गुवाहाटी रेल मार्ग पर फालाकाटा उतर कर भी जयगांव पहुंच सकते हैं। फालाकाटा से जयगांव 52 किलोमीटर है। बसें दिन भर मिलती हैं। सिक्किम की राजधानी गंटटोक और दार्जिलिंग कलिंपोंग से भी जयगांव के लिए शेयरिंग टैक्सियां रोज चलती हैं। पर ये टैक्सियां रोज सुबह ही दोनो तरफ से मिलती हैं।
भूटान में प्रवेश से पहले परमिट बनवाना पड़ता है। इसलिए हर सैलानी को एक रात तो अक्सर जयगांव में गुजारना ही पड़ता है। तो जयगांव में भूटान गेट के आसपास एनएस रोड और लिंक रोड पर कई होटल उपलब्ध हैं। यहां हर बजट में कमरे हैं 300 से लेकर 1500 तक।
जयगांव मतलब एक्सटेंशन ऑफ बिहार – पूरे जयगांव शहर में  बिहार के कारोबारी और मजदूर भरे हुए हैं। बंगाल का शहर होकर भी हिंदी भोजपुरी बोलता नजर आता है। यहां आप सत्तू, लिट्टी चोखा, गोलगप्पा, मोमोज सब कुछ खा सकते हैं। ज्यादातर दुकानदार बिहार के हैं।
इतना ही नहीं जयगांव से रोज बिहार के पूर्णिया, सहरसा, मुजफ्फरपुर, छपरा, सीवान, गोपालगंज, बेतिया, मोतिहारी के लिए सीधी बसें खुलती हैं। मतलब साफ है जयगांव की आधी से ज्यादा आबादी बिहार से संबंध रखती है। जयगांव के सड़कों पर शाम-सुबह टहलते हुए यूं लगता है जैसे बिहार में ही हों।
एनएस रोड पर गोकुल स्वीट्स नामक मिठाइयों की दुकान है। दुकानदार महोदय अलवर राजस्थान के हैं। वे कलाकंद भी बनाते हैं। रसमलाई भी और रसमाधुरी भी। सुबह नास्ते में दो छोटे भठूरे 25 रुपये के। हमने रात को मिठाइयां खाई तो सुबह छोला भठूरा। सुबह सुबह मुझे तो छपरा के साव जी एनएस रोड पर सत्तू बेचते मिले, 10 रुपये का गिलास। साव  जी 40 साल से जयगांव में हैं। 10 रुपये का एक गिलास सत्तू बनाने से पहले 50 ग्राम सत्तू तराजू में तौलते हैं फिर बड़े प्रेम से सत्तू का ग्लास तैयार करते हैं। मैंने पिया तो देखा देखी अनादि भी सत्तू पीने लगे।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com 
( GOKUL SWEETS, JAIGAON , BENGAL) 

Thursday, April 19, 2018

बाघ पुल से भूटान गेट जयगांव, चाय के बगान के साथ सफर

गंगटोक से वापसी में हम सिलिगुड़ी जाने के बजाय बाघ पुल पर ही उतर गए हैं। हमें टैक्सी ड्राईवर मधुकर ने बताया था कि अगर आप भूटान के शहर फुंटशोलिंग, जयगांव बार्डर जाना जाहते हैं तो आपको गंगटोक से सिलिगुड़ी जाने की जरूरत नहीं है। सिलिगुड़ी से 30 किलोमीटर पहले बाघ पुल पर उतर जाएं। सिलिगुड़ी से जयगांव जाने वाली सभी बसें इस पुल से होकर गुजरती हैं। आपका समय और पैसा दोनो बचेगा। सचमुच हमारे दो घंटे की बचत हुई। साथ 200 से ज्यादा रुपये भी बचे। गंगोटक से बाघ पुल बस का किराया 140 रुपये। जबकि बाघ पुल से जयगांव का किराया 100 रुपये।
1941 में बना बाघ पुल - बाघपुल यानी कोरोनेशन ब्रिज। यह ब्रिटिश काल का ऐतिहासिक पुल है। तीस्ता नदी पर बने इस पुल के प्रवेश द्वार के दोनों तरफ दो बाघ की प्रतिमाएं लगी हैं इसलिए इसे बाघ पुल कहते हैं। एनएच 31 पर बना यह पुल दार्जिलिंग और जलपाई गुड़ी जिले को जोड़ता है। इस पुल का निर्माण 1937 में शुरू हुआ था। किंग जार्ज पंचम और महारानी एलिजाबेथ के राज्यारोहण की याद में इस पुल को नाम मिला था। पुल 1941 में बन कर तैयार हुआ। इस आकर्षक पुल के निर्माण में तब 4 लाख रुपये का खर्च आया था। तब 1937 में बंगाल के गवर्नर जॉन एंडरसन ने इस पुल की आधारशिला रखी थी। स्थानीय लोग इस बाघ पुल कहते हैं। बाघ पुल के सामने तीस्ता नदी पर रेलवे का भी पुल बना हुआ है।
हमारी बस आकर बाघ पुल के बीचों बीच रुकी। पर ये बस जयगांव तक नहीं बल्कि बीरपाड़ा तक ही जा रही है। बस में जगह भी नहीं है। पर कंडक्टर महोदय भरोसा दिलाते हैं कि आगे जगह मिल जाएगी तो हमलोग बस में बैठ जाते हैं।
सड़क रेलवे लाइन के साथ चल रही है। बागरकोट चाय बगान सड़क के दोनों तरफ नजरों में है। उदयबाड़ी के बाद दमदिम कैंटोनमेंट एरिया आया। इसके बाद माल बाजार। यह जलपाईगुड़ी जिले का बड़ा बाजार है। यहां मुझे और अनादि को बस में सीट मिल गई। एक बंगाली महिला और उनकी बेटी ने सीट खाली की तो हम वहां जा बैठे। माल बाजार के बाद बस चालसा में रुकी। इसके बाद नगरकाटा, लूकसान और बानरहाट जैसे छोटे छोटे कस्बे आए। यहां डायना नदी पर पुल और डायना टी एस्टेट का विशाल चाय बगान नजर आया। इसके बाद हम पहुंचे हैं बिनागुड़ी। बिनागुड़ी थल सेना का बड़ा कैंटोनमेंट है। बिनागुड़ी से कुछ किलोमीटर के सफर के बाद एथलबाड़ी से अलीपुर दुआर जिला शुरू हो जाता है। बंगाल के दुआर्स रीजन में चाय की कई प्रसिद्ध बगाने हैं।

बीरपाड़ा शहर में भारी जाम लगा है। हमारी बस यहीं तक है। यहां से उतरने के बाद हमें अगली बस मिली मदारीहाट तक की। लोगों ने बताया वहां से जयगांव की बस मिल जाएगी। बीरपाड़ा से मदारीहाट सिर्फ 12 किलोमीटर है। मदारीहाट में उतरकर हम बस का इंतजार करने लगे पर देर तक कोई बस नहीं आई। हमलोग चौराहे  पर खड़े हैं लोग बता रहे हैं बस फालकाटा से भी आ सकती है और सिलिगुड़ी की तरफ से भी। मदारीहाट से जयगांव 30 किलोमीटर है।

शाम के 7 बज गए हैं। मैं आश्वस्त हूं अगर बस नहीं आई तो सामने एक गेस्ट हाउस दिखाई दे रहा है। रात को यहीं रुक जाएंगे। पर थोड़ी देर में सिलिगुड़ी से आने वाली बस आ गई। हमलोग फटाफट इसमें जा बैठे। पहले हाशीमारा रेलवे स्टेशन आया, जो न्यू हाशीमारा कहलता है। इसके बाद ओल्ड हाशीमारा फिर जयगांव बाजार। सरपट भागती बस ने हमें जयगांव बस स्टैंड में उतार दिया। वहां से शेयरिंग आटो रिक्शा मिला जिसमें 7 रुपये प्रति सवारी की दर से हम भूटान गेट पहुंच गए। पूरे दुआर्स इलाके में हमें लोग बांग्ला के बजाय हिंदी बोलते नजर आए। 
जयगांव के भूटान के गेट के सामने लिंक रोड पर होटल आराम हमारा ठिकाना बना। जयगांव में रहने के लिए किफायती और बेहतरीन जगह है। हमें उन्होने तीसरी मंजिल पर डबलबेड रुम दिया 600 रुपये प्रतिदिन की दर पर. होटल में अच्छा भोजनालय भी है। 
जयगांव फुंटशोलिंग के बारे में हमारे हमारे फेसबुक मित्र बिबेक शाह ने भी काफी जानकारी दी थी। वे हाशिमारा में रहते हैं। पर उनसे इस यात्रा के दौरान मिलना नहीं हो सका। 
( यात्रा मार्ग-  बाघपुल - बागरकोट- उदयबाड़ी- दमदिम- माल बाजार- चालसा- नगरकाटा-लुकसान - बनारहाट- बिनागुड़ी –तेलीपाड़ा- एथलबाड़ी – बीरपाड़ा- मदारीहाट- न्यू हाशीमारा- ओल्ड हाशीमारा- जयगांव )
-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmal.com 
     ( BAGH PUL, TEA GARDEN, BIRPARA, MADARIHAT, HASIMARA, JAIGAON, ARAM LODGE ) 


    

Wednesday, April 18, 2018

बुद्धा इन गंगटोक – गोंजांग मोनेस्ट्री

गंगटोक शहर में कई बौद्ध मठ हैं। पिछली बार मैं छोरटेन मोनेस्ट्री देख चुका था। इस बार हमलोग पहुंचे हैं गोंजांग मोनेस्ट्री। इस बौद्ध मठ का परिसर विशाल है। आपको सड़क से सीढ़िया उतरकर मठ में आना पड़ता है। परिसर में बौद्ध भिक्षुओं के लिए विशाल आवास भी बना हुआ है। इस पांच मंजिला आवासीय परिसर में बौद्ध भिक्षु स्मार्ट फोन के साथ लैस और उसमें व्यस्त भी नजर आए।
मंदिर के परिसर में अत्यंत शांति का वातावरण है।
मुख्य मंदिर के अंदर आचार्य पद्मसंभव, गौतम बुद्ध की विशाल प्रतिमाएं हैं। अंतर दीवारों पर अत्यंत सुंदर चित्रकारी है। इन चित्रों में सिक्किम भूटान में बौद्ध धर्म के प्रसार की गाथा अंकित है। मंदिर परिसर में गुरु पद्म संभव की कुल 25 प्रतिमाएं बनी हैं जो उनके द्वारा सिक्किम, नेपाल, तिब्ब, भूटान में बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार की गाथा सुनाते हैं। गोंजांग मठ सैलानियों के लिए सुबह सात बजे से शाम 5 बजे तक खुला रहता है। अब हमलोग गोंजांग मठ से आगे चल पड़े हैं। 
मेडिसीन बुद्ध की मूर्ति -  गंगटोक शहर के रास्ते में हमें मेडिसीन बुद्धा की मूर्ति दिखाई देती है। मान्यता है कि बुद्ध की यह मूर्ति आपको स्वस्थ और निरोग होने का आशीर्वाद देती है। यहां बुद्ध की परिकल्पना एक फिजिशियन के तौर पर की गई है। एक ऐसा फिजिशयन जो आपको बाह्य और आंतरिक दोनों तरह के रोगों से मुक्ति दिलाता है। वह अंतर को शुद्ध करता है और आपको सत्य के मार्ग की ओर चलने की प्रेरणा देता है।
सड़क के किनारे पत्थरों पर बने मेडिसीन बुद्ध की मूर्ति के नीचे सिक्किम सैन्य पुलिस द्वारा उनकी विशेषताएं लिखवाई गई हैं। हम भी बुद्ध से स्वस्थ निरोग रहने की प्रार्थना करते हुए आगे की राह पर बढ़ चले हैं।
रास्ते में स्कूल में पढ़ने वाली दो भूटिया बालिकाएं कार में लिफ्ट मांगती हैं। ड्राईवर मुझसे अनुमति मांगते हैं। मैं कहता हूं बिठा लिजिए। पहाड़ों पर देर तक कोई वाहन नहीं मिलता कई बार।

गंगटोक में देवराली की ओर जाते हुए आगे एक और झरना आया। यहां पर सैलानियों की भीड़ लगी थी। कुछ मनोरंजन का भी इंतजाम था। थोड़ी देर यहां रुक कर हमलोग आगे बढ़ चले। हमें बुजुर्ग टैक्सी वाले मधुकर भाई ने कई और जानकारियां दी गंगटोक के बारे में।

गंगटोक से वापसी - अब सिक्किम से चला चली की वेला है। पर तीसरी बार भी सिक्किम आने की इच्छा बनी हुई है। गंगटोक के देवराली स्टैंड पर मधुकर भाई ने हमें टैक्सी के बजाय बस से जाने की सलाह दी। कहा, समय और पैसा दोनों बचेगा। बस में गंगटोक सिलिगुड़ी का किराया 160 रुपये है जबकि टैक्सी में 250 रुपये। सस्ता होने के बावजूद बस का सफर ज्यादा आरामदेह है। छोटी बस है जिसमें लेग स्पेस अच्छा है। सामान रखने की जगह भी है। हमें बाघ पुल उतरना है तो वहां तक का किराया 140 रुपये ही है। बस तुरंत चल पड़ी।

रंगपो में वापसी के समय...
सिक्किम के आखिरी पड़ाव रंगपो में बस पांच मिनट के लिए रुकी। हमने यहां जूस की बोतलें खरीदी। बाकी के छोटे छोटे स्थलों पर अगर कोई सवारी उतरने चढ़ने वाली हो तो रुक जाती है वरना अपनी गति से चलती जा रही है। बस में सीट से ज्यादा सवारियां नहीं है। तीस्ता के साथ वापसी का भी सफर सुहाना है। हमलोग 11.30 बजे गंगटोक में बस में बैठे थे। तकरीबन ढाई बजे बस ने हमें सेवक से पहले कोरोनेशन ब्रिज यानी बाघ पुल पर उतार दिया। अलविदा सिक्किम।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य   - vidyutp@gmail.com 
(GANGTOK, SIKKIM, BUDDHA, GONJANG MONASTERY ) 
आगे पढ़िए - भूटान की यात्रा.....




Monday, April 16, 2018

गंगटोक से गणेश टोक - गणपति विराज रहे हैं...

सुबह सुबह हमारी इच्छा गंगटोक के स्थानीय स्थलों के दर्शन की थी। बिसमिल्लाह भाई की पत्नी के हाथों बनाए पराठे खाने के बाद हमलोग निकल पड़े। अनादि को पराठा इतना पसंद आया कि उन्होने एक पैक भी करा लिया। टैक्सी वाले सोनम भूटिया (87689-40513) को फोन लगाया, पर वे नामची चले गए हैं। उन्होंने कहा आप नाराज न हों मैं दूसरे साथी को भेजता हूं। पर हमारे पास मधुकर टैक्सी वाले ( 97490-62299 ) का नंबर है। मधुकर भाई 9 बजे टैक्सी लेकर होटल के बाहर हाजिर हो गए। सात प्वाइंट 700 रुपये में देखना तय हुआ था। हमने होटल से चेकआउट करके अपना सामान भी टैक्सी में डाल लिया। तय हुआ कि गंगटोक दर्शन के बाद वे हमें देवराली टैक्सी स्टैंड छोड़ देंगे।
मधुकर भाई की उम्र 73 साल है। नेपाली हैं। 60 की उम्र में सिक्किम सरकार की नौकरी से रिटायर हो गए हैं। पर रिटायर होने के बाद घर में नहीं बैठे। कहते हैं काम नहीं करूंगा तो बीमार हो जाउंगा। तो 73 साल की उम्र में कुशलता से टैक्सी चला रहे हैं। लंबी उम्र के कारण उनके पास जानकारियों का खजाना है। उन्होंने कहा है कि सभी दर्शनीय स्थलों पर मैं पार्किंग में वाहन न लगाकर थोड़ा दूर सड़क पर पार्क करूंगा इस तरह आपका पार्किंग का खर्च बच जाएगा।
तो हमारा पहला पड़ाव है। फ्लावर गार्डन। एमजी से थोड़ा आगे यह एक छोटा सा निजी उद्यान है। 20 रुपये का प्रवेश टिकट है। मुन्नार के बोटानिकल गार्डन से काफी छोटा है। पर देखने में कोई बुराई नहीं है। इस गार्डन में तिब्बती बौद्ध धर्म गुरु दलाई लामा भी आ चुके हैं। इसके बाद हमलोग पहुंचे हैं गणेश टोक।  
गगंटोक शहर में दो ऊंचे मंदिर हैं। हनुमान टोक और गणेश टोक। गणेश टोक की दूरी सिक्किम एक एमजी रोड से 7 किलोमीटर है। मंदिर का परिसर बड़ा ही भव्य और सुंदर है। मंदिर के प्राचीर से गंगटोक शहर का सुंदर नजारा दिखाई देता है। गणेश टोक की ऊंचाई 6500 फीट है। यहां पहुंचने के लिए आपको टैक्सी बुक करनी पड़ेगी।
गणेश टोक मंदिर में जूते घर में पांव के जूते उतारने के बाद तीन मंजिले मकान के बराबर सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। मंदिर के अंदर नेपाली पुजारी तैनात दिखाई देते हैं। वे भक्तों को प्रसाद देते हैं और हाथों में कलावा बांध देते हैं। मंदिर के अंदर गणेश जी की विशाल और सुंदर प्रतिमा है। मंदिर के चारों तरफ परिक्रमा पथ बना है। इस परिक्रमा पथ से गंगटोक शहर का सुंदर नजारा दिखाई देता है। कुछ लोग यहां से देर तक जी भर के शहर का नजारा करते हैं। मंदिर परिसर में एक गिफ्ट शॉप भी है। परिसर में पार्किंग और शौचालय, पेयजल आदि का इंतजाम भी है।
गणेश टोक के ठीक सामने गंगटोक को जूलोजिकल गार्डन का प्रवेश द्वार है। आपके पास समय है तो अंदर घूमने जा सकते हैं। इसके बाद हमारा अगला पड़ाव है ताशी व्यू प्वाइंट। पर इससे पहले हमें ड्राईवर साहब गंगटोक शहर का वाटर रिजरवयार दिखाते हैं। पहाड़ो से झरनों से आने वाला पानी यहां स्टाक किया जाता है। फिर उसे प्यूरीफाई करके पूरे शहर को सप्लाई किया जाता है। पूरे गंगटोक शहर को यहीं से पानी मिलता है। कहीं कोई हैंडपंप या बोरिंग की जरूरत नहीं है।
ताशी व्यू प्वाइंट से पहाड़ों का नजारा करने के लिए लोग जुटते हैं। यहां हमारी मुलाकात बनारस के एक शिक्षक दंपति से हुई जो हमें एक दिन पहले युमथांग वैली में मिले थे। मधुकर भाई हमें गंगटोक का प्लांट कंजरवेशन सेंटर दिखाते हैं। वास्तव में यह विशाल सरकारी बोटानिकल गार्डन है। रास्ते में एक ल्हासा फाल्स नामक झरना भी आता है। पर फिलहाल वहां पानी कम आ रहा है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
(GANESH TOK, GANGTOK, TASHI VIEW POINT )          
   

ऐतिहासिक गुरुद्वारा – चुंगथांग, मतलब चंगा स्थान

अब लाचुंग से हमारा वापसी का सफर आरंभ हो चुका है। तीस्ता नदी के किनारे चुंगथांग एक छोटा खूबसूरत शहर है। यह शहर ऐतिहासिक गुरुद्वारा के लिए भी जाना जाता है। गंगटोक से चुंगथांग की दूरी 93 किलोमीटर से ज्यादा है। वहीं लांचुंग वैली से वापसी में यह 30 किलोमीटर के करीब है। चुंगथांग की ऊंचाई 5870 फीट ( 1790 मीटर) है। तीस्ता नदी के तट पर बसा चुंगथांग बड़ा ही मनोरम शहर है। चुंगथांग के पास लाचेन और लाचुंग नदियों का संगम भी है। दोनों नदियों के मिलन के बाद आगे इसे तीस्ता नाम मिलता है। यहां तीस्ता नदी पर बांध बनाकर विशाल जलाशय बनाया गया है। यहां पर हाईड्रो इलेक्ट्रिक प्लांट भी है। चुंगथांग में भारतीय सेना का भी बहुत बड़ा केंद्र है।  
कहा जाता है कि बौद्ध धर्म गुरु आचार्य पद्मसंभव तिब्बत जाते समय सातवीं सदी में चुंगथांग में रुके थे। वहां उनके पांव के निशान आज भी बताया जाता है। वैसे चुंगथांग शब्द स्थानीय लेपचा भाषा से आया है। कहा जाता है कि आचार्य पद्मसंभव ने यहां एक भूखंड पर धान के कुछ दाने फेंक दिए थे। वहां धान उग आए। अब भी वहां उस क्षेत्र में धान उगता है। हालांकि हाई एल्टीट्यूड वाले इस क्षेत्र में और कहीं धान नहीं होता।  
चुंगथांग में तीस्ता नदी के तट पर है ऐतिहासिक गुरुद्वारा नानकलामा साहिब। इस गुरुद्वारा का संबंध सिक्ख पंथ के पहले गुरु गुरुनानक देव जी से है। कहा जाता है कि गुरुनानक देव जी अपनी तिब्बत की उदासी (यात्रा) के क्रम में चुंगथांग में रुके थे। कहा जाता है कि चुंगथांग शब्द पंजाबी से आया है। यह पंजाबी में चंगा स्थान है। यह गुरु जी द्वारा दिया गया नाम है। गुरुनानक देव जी अपनी तीसरी उदासी के क्रम में यहां पहुंचे थे।
कहा जाता है कि गुरुनानक देव जी अपनी छड़ी यहां पर गड्ढा करके लगा दी थी जिसने बाद में यहां एक विशाल पेड़ का रुप ले लिया। गुरुनानक देव जी यहां 1516 ईस्वी में आए थे। बाद में इसी मार्ग से वे कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर गए। इस दौरान कई लामा समुदाय के लोग उनके अनुयायी बन गए थे। गुरुनानक देव जी से जुड़ी कुछ स्मृतियां यहां लाचेन गुंफा में रखी गई हैं। उनका इस्तेमाल किया हुआ जल पात्र (कमंडल) यहां रखा गया है।   
चुंगथांग गुरुद्वारा में गुरुजी की छड़ी से रोपा गया पौधा जो अब वृक्ष बन चुका है देखा जा सकता है। इसके अलावा गुरु जी द्वारा लगाया गया धान का छोटा सा खेत भी देख सकते हैं। यहां गुरुजी द्वारा स्थापित एक अमृतकुंड के भी दर्शन किए जा सकते हैं।
वर्तमान में जो यहां गुरुद्वारा है उसका निर्माण असम राइफल्स और भारतीय सेना ने स्थानीय लेपचा जन जाति के लोगों के सहयोग से बनवाया है। साल 2005 से पहले चीन और भूटान की सीमा से काफी करीब होने के कारण इस क्षेत्र में सैलानियों की आवाजाही निषिद्ध थी। 2005 में इस गुरुद्वारा को आम श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया गया। गुरुद्वारा के अंदर विशाल निशान साहिब ( ध्वज) की स्थापना की गई है।
चुंगथांग से आप 17800 फीट की ऊंचाई पर गुरुडंगमार लेक देखने भी जा सकते हैं। इसके लिए आपको एक दिन का समय और निकालना पड़ेगा। यह देश की सबसे ऊंची और दुनिया की सबसे ऊंची झीलों में से एक है। दुनिया भर में फैले सिक्ख पंथ के लोगों में चुंगथांग गुरुद्वारे के प्रति काफी सम्मान है। सिक्ख समाज के लोग यहां पहुंचकर खुद को धन्य समझते हैं।
तीस्ता नदी के पुल से चुंगथांग गुरुद्वारा का बड़ा सुंदर नजारा दिखाई देता है। वापसी में हमलोग एक बार फिर शाम को रंगरंग के चिराग ढाबा पर रुके। जाते समय यहीं दोपहर का भोजन किया था। गंगटोक पहुंचते हुए रात के आठ बज गए हैं। एक बार फिर हमलोग एमजी रोड पर हैं। अच्छी भूख लगी है तो हमलोग भरपेट खाने के लिए मारवाड़ी भोजनालय का रुख करते हैं।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

GANGTOK TO CHUNGTHANG, GURUDWARA, GURU NANAK DEV  )

Sunday, April 15, 2018

बर्फीली वादियों में मस्ती और जीरो प्वाइंट


युमथांग वैली से चाय नास्ता करने के बाद हमलोग जीरो प्वाइंट की ओर रवाना हुए। मौसम हमारा साथ दे रहा था। वरना एक दिन पहले आए सैलानी युमथांग वैली के पहले से ही लौटा दिए गए थे। खराब मौसम के कारण। सड़क पर बर्फ की मोटी चादर बिछी है। इसको काटते हुए हमारी बुलेरो आगे बढ़ रही है। रास्ते में फौजी भाई मिले जो हमे आगे जाने के इशारा करते हैं। तभी आगे हम देखते हैं कि एक जीप बर्फ में फंस गई है। हम सबने मिलकर धक्का देकर उसे बर्फ से निकाल दिया। हम धीरे धीरे ऊंचाई पर चढ़ रहे हैं। युमथांग घाटी 12,000 फीट की ऊंचाई पर है। आगे एक शिव मंदिर आया जो 12800 फीट की ऊंचाई पर है। मंदिर के आसपास सेना का अस्थायी शिविर बना हुआ है। शिविर के सारे कैंप भवन बर्फ से ढके हैं। हम जब ऊंचाई पर चढ़ते जा रहे हैं तो नीचे ये बर्फ से ढका शिविर अत्यंत सुंदर दिखाई दे रहा है। 

अब हम 13700 फीट की ऊंचाई पर आ गए हैं। तीखे मोड़ हैं। सेना ने इस स्थल का नाम दिया है जलेबी प्वाइंट। शायद जलेबी जैसे तीखे मोड़ के कारण ही ऐसा नाम दिया गया है। तो हम 14 हजार फीट से ज्यादा ऊंचाई पर पहुंच गए हैं। इस तरह बर्फ का वादियों में सैर करना हमारे और अनादि के लिए पहला अनुभव है। पर हमें यहां कुछ खास ठंड नहीं लग रही है।

थोड़ी और ऊंचाई जाने पर जीरो प्वाइंट से थोडा पहले हमारी गाड़ी भी बर्फ में फंसने लगी। सड़क पर बर्फ की परत काफी मोटी हो गई थी। काफी कोशिश के बाद ड्राईवर महोदय ने कहा कि अब इससे आगे गाड़ी नहीं जा सकती। हमलोग अब नीचे उतर गए। उसके बाद पैदल थोड़ी दूर चले। हमने घुटने तक लंबे प्लास्टिक के बूट किराए पर ले  लिए थे। अब इसकी अहमियत समझ में आने लगी। थोड़ी दूर जाने पर सड़क किनारे एक फ्लैट टेबल लैंड दिखा। हम यहां पर उतर कर बर्फ पर चहलकदमी करने लगे। बगली में गहरी नदी की पतली सी धारा नजर आ रही थी। कुछ और वाहनों से भी लोग आ गए थे। उसके बाद शुरू हुआ बर्फ के गोले उड़ाने का खेल।

कुछ लोग बर्फ पर लेट गए तो कुछ लोग बर्फ के गोलों को फुटबाल बनाकर एक दूसरे पर फेंकने लगे। सभी अनजान लोग दोस्त बन गए। और ये खेल कुछ घंटो तक चलता रहा। सबको खूब मजा आया। कुछ लोग स्लो मोशन में वीडियो बनाने में व्यस्त हो गए। सभी अपने अपने तरीके से इस यादगार पल को जी लेना चाहते थे। अपनी यादों में समेट लेना चाहते थे। बर्फ की इतनी हसीन वादियां कई लोग शायद पहली बार देख रहे थे।


कुछ चाय काफी वाले भी तब तक परिदृश्य का हिस्सा बन चुके थे। कुछ चना मसाला बेचने वाले भी। तो उनकी दुकानदारी भी चलने लगी। जब बर्फ से खेलकर जी भर गया तो वापसी की बात सोची गई। तकरीबन 14000 फीट से वापसी। वापस आने पर युमथांग वैली में एक बार फिर तस्वीरें। उसी भूटिया महिला की दुकान पर। महिला बोल पड़ी- समधी जी और दामाद जी वापस आ गए। हमने वहां एक बार फिर चाय पी, मोमोज खाए। अब वापसी। पर जीरो प्वाइंट और युमथांग वैली का ये सफर और यहां गुजारे कुछ घंटे अनमोल बन गए। स्मृतियों के आंगन का अमिट हिस्सा। तो अब चलें।


हम नहीं जा सके कटाव - युमथांग से दोपहर में वापस लाचुंग उसी हिडेन वैली गेस्ट हाउस में। हमने अभी कमरा खाली नहीं किया है। हमारा दोपहर का लंच यहीं पर है। वापसी में लंच तैयार है। दोपहर का खाना रात के खाने से बेहतर है। फिर वही चावल, दाल, सब्जी, भूजिया, सलाद और नॉन वेज खाने वालों के लिए अंडा। हमने फटाफट खाना खा लिया। क्योंकि हमें बुलेरो वाले ड्राईवर कटाव भी दिखाने का वादा कर रहे हैं।

खाने के बाद हमलोग कटाव की तरफ चल पड़े। यह युमथांग वैली के दूसरी तरफ है। लाचुंग से 28 किलोमीटर चीन (तिब्बत) बार्डर की तरफ। कोई 12 किलोमीटर से ज्यादा का सफर किया होगा कि सामने सिक्किम पुलिस की पूरी टीम मिली। वह रास्ते में बिजली की तार चोरी हो गई थी, उसकी जांच करने पहुंची थी। पर पुलिस अधिकारियों ने ड्राईवर से हमारे परमिट की जांच की। पुलिस वालों का कहना था कि आपके परमिट में सिर्फ लाचुंग वैली लिखा है, कटाव का जिक्र नहीं है इसलिए आपको यहीं से वापस जाना होगा। पुलिस ने हमसे पूछा किसी के पास ड्रोन कैमरा, सेटेलाइट फोन आदि तो नहीं है। हमने कहा नहीं। पुलिस का कनहा था कि कुछ सैलानी इस क्षेत्र में ड्रोन कैमरा और सेटेलाइट फोन के साथ पकड़े जा चुके हैं। इसके साथ ही उन्होने हमारे ड्राईवर महोदय का चालान भी कर दिया। अब हमारी कटाव के आधे रास्ते से वापसी हो गई। लाचुंग वैली के थाने में जाकर ड्राईवर महोदय को रिपोर्ट भी करनी पड़ी।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
(YUMTHNAG, ZIRO POINT, LACHUNG VALLY, KATAO, NORTH SIKKIM ) 

  

Saturday, April 14, 2018

युमथांग – बर्फ से ढकी फूलों की घाटी में

लाचुंग में सुबह 5 ही जग गया। नदी के किनारे टहलने निकल पड़ा। बर्फ से ढकी चोटियां चमक रही हैं। उनपर सूर्य की रोशनी पड़ने के साथ उनकी चमक और बढ़ जाती है। सुबह सुबह एक भूटिया महिला टैक्सी का इंतजार कर रही है। लाचुंग इलाके में भूटिया जनजाति के लोग सबसे ज्यादा हैं। वह मेरा फोन लेकर कुछ नंबर मिलाती है। थोड़ी कोशिश के बाद उसकी टैक्सी वाले बात हो गई। उसने कहा कि सुबह 4 बजे से ही आकर गंगटोक की तरफ जाने वाली टैक्सी का इंतजार कर रही है। पहाड़ों पर सीमित गाड़ियां होती हैं इसलिए यहां सफर करना भी कोई आसान काम नहीं होता। सुबह सुबह मुझे लाचुंग वैली का जूनियर हाई स्कूल नजर आता है। नदी के किनारे मुख्यमंत्री आवास योजना के तहत बना सुंदर सा घर नजर आता है। थोड़ा टहलने के बाद वापस अपने कमरे में आ जाता हूं। 
हमारे ड्राईवर साहब ने सुबह 6 बजे निकलने का समय दे रखा है। हमलोग ब्रश करके  तैयार हो गए। इतनी ठंड मेंस्नान का  तो कोई मतलब ही नहीं था। तो हमलोग चल पड़े हैं युमथांग वैली की ओर। युमथांग की दूरी लाचुंग से 24 किलोमीटर है। रास्ते में सेना का कैंप एरिया आया। कैंप एरिया को पार करने के बाद एक भूटिया महिला ने हमारे ड्राईवर से लिफ्ट मांगी हम तैयार नहीं हुए। बाद में पता चला कि उस महिला कि युमथांग में दुकान है, जहां हमारे नास्ते का प्रबंध था। हमने लिफ्ट नहीं दी पर वह महिला किसी और गाड़ी में लिफ्ट लेकर हमसे पहले पहुंच चुकी थी।
लाचुंग से युमथांग के रास्ते में ऊंची चढ़ाई है। थोड़ी देर में हमें सड़क के दोनों तरफ बर्फ के टुकड़े नजर आने लगे। पहले ये झाग के रुप में नजर आए। आगे बर्फ बढ़ती गई। युमथांग पहुंचने तक तो सारा रास्ता बर्फ से पटा पड़ा था। और अब हम हम श्वेत बर्फ की वादियों में पहुंच चुके हैं। युमथांग वैली 11700 फीट की ऊंचाई पर है। इसे वैली ऑफ फ्लावर्स भी कहते हैं। अप्रैल मई महीने में इस घाटी में लकदक फूल खिले रहते हैं।
हमलोग युमथांग घाटी में एक दुकान के आगे रुक गए हैं। यहीं पर हमें नास्ता में ब्रेड-जैम और चाय मिलती है। चिमनी में आग तापने का इंतजाम है। अगर आप और कुछ खाना चाहें तो चाउमीन, नूडल्स और मोमोज उपलब्ध हैं।

मजाक और शादी – मैं दुकान चलाने वाली महिला से उनकी जनजाति के बारे में जानना चाहता हूं। वे बताती हैं कि भूटिया हैं। मैं कहता हूं मुझे भूटिया लोग काफी अच्छे लगते हैं। वे बोलती हैं तो किसी भूटिया लड़की से शादी कर लो। पर मेरी तो शादी हो गई है। वे बोलती हैं मेरे भी तीन बच्चे हैं, पर मैं उन सबको छोड़कर तुमसे शादी करने को तैयार हूं। मैं कहता हूं नहीं ये ठीक नहीं होगा। पर मैं 13 साल के बेटे की ओर इशारा करता हूं, इनकी शादी किसी भूटिया लड़की से कर दूंगा। वे बताती हैं उनकी बेटी 15 साल की है। मैं कहता हूं ठीक है दो साल बड़ी चलेगी। तो अब वे मेरे बेटे को दामाद जी कहकर खातिर करने लगती हैं। मैं उन्हें बताता हूं कि हिंदी फिल्मों का हीरो डैनी भी भूटिया है। पर वे कहती हैं कि उन्हें डैनी पसंद नहीं। वह फिल्मों में ज्यादातर नकारात्मक भूमिकाएं ही करता है।
आगे के सफर के लिए हमने लांग बूट किराए पर ली। जैकेट तो हमारे पास पहले से ही थे। यहां चश्मा और दस्ताने भी किराये पर मिल रहे हैं। बूटों का किराया 50 रुपये प्रति जोड़ी है। अब हमलोग बढ़ चले हैं बर्फीली वादियों में।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
बर्फ में फंसी गाड़ी को निकालने के लिए धक्का लगाना पड़ा...
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