Wednesday, March 14, 2018

नीरमहल की कहानी - नाविक संजीव की जुबानी

कुहरे को चीरती हुई हमारी नाव रुद्रसागर झील में आगे बढ़ती जा रही है। 37 साल के नाविक संजीव बर्मन पूछते हैं आपको नीरमहल के बारे में बताऊं। मैंने कहा बताओ। इसके बाद वे शुरू हो जाते हैं – त्रिपुरा राजघराने पर 184 राजाओं ने राज किया। इसके प्रतापी राजा हुए वीर विक्रम किशोर माणिक्य बहादुर। यूरोप में पढ़ाई की। वे पूरी दुनिया घूमे। वे अपने लिए एक अनूठा महल बनवाना चाहते थे। तो उन्हें उदयपुर के लेक पैलेस से प्रेरणा मिली। कविगुरु रविंद्र नाथ टैगोर से सलाह ली। 5 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा क्षेत्र में फैली इस झील का चयन हुआ। इस झील को रुद्रसागर नाम टैगोर ने ही दिया। उन्होंने ही इस झील के बीचोंबीच बनने वाले महल का नाम दिया नीरमहल।
राजघराने का समर पैलेस और ऐशगाह - नीरमहल त्रिपुरा के राजघराने का समर पैलेस है। इसे राजा ने अपने ऐशगाह के तौर पर बनवाया था। साल 1930 में नीरमहल के निर्माण का ठेका मार्टिन एंड बर्न कंपनी को दिया गया। इसी साल कंपनी ने काम शुरू कर दिया। मार्टिन एंड बर्न के बारे में आप जानते होंगे। देश में कई नैरोगेज रेलवे लाइनें बिछाने और उसके संचालन का काम कंपनी ने किया। वह बड़े शहरों में बिजली सप्लाई का काम भी करती थी। मार्टिन एंड बर्न के लगातार काम से आठ साल में पानी के बीच बना ये भवन बनकर तैयार हो गया। इसके निर्माण में हिंदू , मुस्लिम और यूरोपीय वास्तु शैली का मिश्रण देखा जा सकता है।
रुद्रसागर एक प्राकृतिक जलाशय है। इसमें गोमती नदी से पानी आने जाने का इंतजाम है। झील में पानी कम होने पर नदी से पानी लिया जाता है। 
नाव से ही प्रवेश -  नीरमहल में आप कहीं से भी आना चाहें आपको इसके लिए नाव में ही बैठ कर आना पड़ेगा। पर महल की संरचना ऐसी है की शाही नौका सीधे महल के अंदर प्रवेश कर जाएगी। शाही नौका के लिए अलग और मेहमानों के लिए अलग घाट बने हुए हैं।
तीन हिस्सों में बंटा है महल -  नीरमहल तीन हिस्सों में बना है। पहला संतरी सुरक्षा गार्ड और वाच टावर का इलाका है। दूसरे इलाके में मेहमान खाना बना है। तीसरे इलाके में राजा का शयन कक्ष यानी बेडरूम। रानी का बेडरूम। इस महल में विशाल स्नानघर और मेकअप रूम भी बनाया गया है।
नाचघर और ओपन एयर थियेटर भी - नीरमहल के अंदर एक नाचघर और ओपन एयर थियेटर का भी निर्माण कराया गया है। यहां राजा सुंदर महिलाओं के साथ ऐय्याशी करने गर्मियों के दिनों में पहुंचते थे। साथ में शाही मेहमान होते थे। इस दौरान दावतों का लंबा दौर चलता था।
बारिश में सौंदर्य शबाब पर -  नीरमहल में नीचे की इमारत लाल है और ऊपर की इमारत सफेद है। बारिश के दिनों में जब इस झील में लबालब पानी होता है तो लाल वाला पूरा हिस्सा डूब जाता है। तब नीरमहल का सौंदर्य देखने लायक होता है। पूरे महल का अक्श पानी के अंदर भी दिखाई देता है। जो अत्यंत मोहक नजारा होता है। 
नीरमहल में ऊपर जाने के लिए कई सीढ़ियां बनी हैं। ऊपर से पूरी झील का नजारा किया जा सकता है। आप कल्पना कर सकते हैं कि चांदनी रात में ये महल कितना सुंदर लगता होगा।

प्रवेश टिकट और समय -  नाव के किराया के अलावा नीरमहल में प्रवेश का टिकट महज 10 रुपये का है। यहां पहुंचने का आदर्श समय सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे के बीच का है। नाव के घाट पर खाने पीने की वस्तुएं मिल जाती हैं। पर नीरमहल के अंदर कोई कैंटीन नहीं है। यहां पहुंचने का बेहतरीन समय जुलाई से सितंबर का हो सकता है। वैसे आप सालों भर आ सकते हैं।
पूर्वोत्तर का ताज महल 
1938 में बनकर तैयार हुआ त्रिपुरा का ताजमहल नीरमहल 
1930 में मार्टिन एंड बर्न कंपनी ने निर्माण कार्य आरंभ किया था।
24 कमरे बने हैं कुल नीरमहल के अंदर,सभी कमरे बड़े आकार के हैं।
5.5 वर्ग किलोमीटर में फैला है रुद्रसागर जलाशय। 
53 किलोमीटर है अगरतला शहर से दूरी मेलाघर की।  
03 दिन चलने वाला नीरमहल वाटर फेस्टिवल हर साल होता है अगस्त में
1951 में आया था संजीव बर्मन का परिवार - नाविक संजीव बर्मन बताते हैं कि 1951 में बांग्लादेश में एक बड़ा दंगा हुआ था। तब 600 नाविक परिवार वहां से भागकर त्रिपुरा के इस इलाके में आ गए, उसमें उनका परिवार भी था। वैसे त्रिपुरा के 70 फीसदी बंगाली लोग बांग्लादेश से ही आए हैं। तो सरकार ने हम मछुआरों को कहा कि आप लोग रुद्रसागर झील की देखभाल करो। हर परिवार को एक-एक एकड़ जमीन देकर बसाया गया।

संजीव बताते हैं कि त्रिपुरा के लोगों का मूल पेशा खेती है। पर यहां के ट्राईबल यानी जनजातीय समाज के लोग भोले भाले (बुद्धू ) होते हैं। वे जब सिनेमा का टिकट खरीदते हैं तो पूछते सबसे ज्यादा दाम देकर टिकट खरीदा तो सबसे पीछे की लाइनों में क्यों बैठूं, आगे क्यों नहीं। जूते की दुकान पर गए तो पूछा 7, 8, 9 नंबर के जूते का एक ही रेट है तो सबसे बड़े साइज वाला जूता ही क्यों न खरीदें।
तो अब नीरमहल देखकर वापस लौटते हुए देख रहा हूं, वाकई अब बड़ी संख्या में सैलानी आने लगे हैं। काफी लोग अगरतला से चलकर सुबह माताबाड़ी उदयपुर दर्शन करने जाते हैं लौटते हुए नीरमहल पहुंचते हैं। दिनभर यहां पिकनिक जैसा माहौल होता है। वास्तव में त्रिपुरा की यात्रा नीरमहल को देखे बिन अधूरी है। मन में नीरमहल की मोहक छवि बस चुकी है। मैं संजीव बर्मन से विदा लेकर आगे के सफर पर निकल पड़ता हूं। (संजीव बर्मन, नाविक - 9856778987 ) 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य        
( NEERMAHAL, MELAGHAR, TRIPURA, RUDRASAGAR LAKE, TAGORE, MARTIN AND BURN ) 

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