Friday, March 30, 2018

मुखौटों की रंगबिरंगी दुनिया और कोलकाता से वापसी

कोलकाता की शाम को घूमते हुए प्रेस क्लब पहुंच गया हूं। कोलकाता प्रेस क्लब बिल्कुल शहर के हृदय स्थल में स्थित है। प्रेस क्लब में इन दिनो को मेला लगा हुआ। कला शिल्प की दुकानें सजी हैं। यहां हम पहुंच गए है मुखौटों की रंग बिरंगी दुनिया में।
नए साल पर यहां क्रिसमस कार्निवल मनाया जा रहा है। इसमें ग्राम कृषि उत्सव भी एक हिस्सा है। इस हिस्से में कोलकाता के अलग अलग जिलों से कुछ शिल्पी अपने उत्पाद और कौशल के साथ पहुंचे हैं।
तो मुखौटा बनाने वाले शिल्पी मुख्य रुप से मां दुर्गा और काली के मुखौटे लेकर आए हैं। ये मुखौटे छोटे मध्यम और बड़े आकार के हैं। इनकी कीमत भी उसी हिसाब से एक हजार से लेकर छह हजार तक है। मुखौटे पूरी तरह लकड़ी के बने हुए हैं। ये कई साल तक खराब नहीं होंगे।

यहां पर शिल्पी विनय कुमार सरकार महोदय लाइव मुखौटे बनाते हुए भी दिखे। लकड़ी पर उनकी छेनी बड़ी ही बारीकी से चल रही है और वे लकड़ी को अलग अलग आकार देने में व्यस्त हैं। इसी दौरान मेरी उनसे थोड़ी बात होती है। एक मध्यम आकार का मुखौटा तैयार करने में तीन दिन तक लग जाता है। सरकार के परिवार में कई पीढ़ियो से मुखौटा बनाने का काम चल रहा है। हालांकि अब उनके बेटे पढ़ाई करके दूसरे पेशे में जा रहे हैं। बताते हैं कि इस पेशे में अब ज्यादा लाभ नहीं रहा।

विनय सरकार दक्षिण दीनाजपुर जिले के अत्यंत पिछड़े गांव सारंगा के रहने वाले हैं। गांव में अभी तक सड़क नहीं पहुंच सकी है। पर उनकी कला फलफूल रही है।
वे रामायण के पात्र रावण और जटायू के मुखौटे भी बनाते हैं। आर्डर मिले तो उसके अनुरूप भी मुखौटे तैयार कर सकते हैं। पर अब बाजार में इन मुखौटों की मांग ज्यादा नहीं है।
बांबे मेल से वापसी - कोलकाता से वापसी का वक्त हो चला है। रात को 10 बजे मेरी ट्रेन है। हावड़ा जंक्शन से बांबे मेल।  बांबे मेल वही ट्रेन है जिसकी रफ्तार से मैं बचपन से बावस्ता हूं। कभी मैं इस ट्रेन से गया से सासाराम तक का छोटा सा सफर करता था पिताजी के साथ। तब इसमें सफर करना शान समझता था। कभी बांबे गया नहीं था पर इस पर चढकर यह रोमांच होता था कि यह ट्रेन बांबे जाती है। इस बार इसके स्लिपर कोच में सवार हुआ हूं सासाराम के लिए। ट्रेन हावड़ा से समय पर चल पड़ी। रात का भोजन ले चुका हूं तो ट्रेन में आकर बस सो जाना है। गया जंक्शन पहुंचने के बाद ट्रेन थोड़ी लेट होने लगी है। आगे यह हर छोटे स्टेशन पर भी रुक जा रही है। ठंड बढ़ती जा रही है। सुबह 8.15 पर सासाराम में उतर गया। बाहर कुहरा छाया हुआ है। पर रेलवे ट्रैक के सहारे गौरक्षिणी मुहल्ले में प्रवेश कर गया हूं।
माताजी-पिताजी के अलावा कुछ पुराने दोस्तों से मिलना हुआ। हमारी दिल्ली की ट्रेन गरीब रथ रात को 9 बजे है पर वह सर्दी के असर से लेट होते होते अगले दिन सुबह 9 बजे सासाराम से रवाना हुई। सारी रात घर में ट्रेन का स्टेट्स चेक करते गुजरी। मैंने माताजी को बताया सुबह साढ़े सात बजे घर से निकलूंगा। मां सुबह 4 बजे ही जग गईं। मेरे लिए नास्ता तैयार किया और ट्रेन में रास्ते में खाने के लिए टिफिन पैक कर दिया। वही मीठी रोटियां जो बचपन में बनाकर देती थीं। मैंने मना किया ट्रेन में खाना मिलता है ले लूंगा। आप बढ़ती उम्र में क्यों भला इतनी ठंड में सुबह सुबह उठकर परेशान हो रही हैं। पर मां नहीं मानी। सुबह का तापमान 3 डिग्री के आसपास है। सासाराम में हाड़ कंपा देने वाली ठंड पड़ रही है।
चला चली की बेल है। भोजपुरी में कहा जाता है ...अब नेह बिसरावल जाव...मैं मां से विदा लेता हूं। उनके चरण स्पर्श करता हूं। पर चलने से पहले रुक जाता हूं। मां से गले लग कर रोने लगता हूं। पर मां की आंखें में आंसू नहीं छलकते। वे बोलती हैं – अरे रोता है। मतलब मां का संदेश साफ है मजबूत बने रहो। जाने क्यों बार-बार इच्छा हो रही है। एक बार फिर अपने बचपन को जीना चाहता हूं। उस सोहवलिया गांव में। मां के आंचल की छांव में। पर क्या ऐसा हो सकता है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  Email - vidyutp@gmail.com 
 ( KOLKATA, MUKHAUTA, HOWRAH,  MUMBAI MAIL, SASARAM, GARIB RATH ) 

Thursday, March 29, 2018

रुपनारायण नदी के किनारे अमरकथा शिल्पी का घर

सामने एक छोटा सा ताल और सड़क के उस पर दो मंजिला सुंदर सुरूचिपूर्ण घर। ईंट सीमेंट के बना यह शानदार दो मंजिला घर अमरकथा शिल्पी शरतचंद्र चटोपाध्याय का आवास हुआ करता था। शरत बाबू यहां 1926 के बाद जीवनपर्यंत रहे।
मैं जब शरत बाड़ी के लिए आ रहा था तो सोच रहा था कि हमारी तरह कितने लोग आते होंगे। पर यहां आकर सुखद आश्चर्य हुआ कि एक साहित्यकार का घर देखने भी हर रोज कई सौ लोग आते हैं। खास तौर पर बांग्ला के शिक्षक और छात्र यहां पहुंचते हैं। एमए में पढ़ रही सुस्मिता बांग्ला में शरत को पढ़ चुकी हैं। वे अब उनका घर देखने आई हैं।
बाउंड्री वाल के अंदर हरा भरा परिसर है। परिसर में भी शरत बाबू की प्रतिमा लगी है। यहां काफी लोग उस प्रतिमा के साथ फोटो खिंचवा रहे हैं। कुछ लोग पारिवारिक चित्र लेना चाह रहे हैं।
मैं आगे बढ़ता हूं। बरामदे वाला सुंदर घर है।सबसे पहले बाईं तरफ एक कमरा है जिसमें शरत बाबू द्वारा इस्तेमाल की गई कुरसी और दूसरे फर्नीचर रखे हैं। वहां मौजूद केयरटेकर बताते हैं कि यहां शरत बाबू की टैगोर और नेताजी जैसे महान शख्शियतों से मुलाकात हुई थी। सामने शरत बाबू का शयन कक्ष दिखाई देता है। इसमें अंदर जाने की अनुमति नहीं है पर दरवाजे से आप अंदर का नजारा देख सकते हैं। इसके बाद दूसरा कमरा। फिर सीढ़ियों से चलते हैं ऊपर। पहली मंजिल पर कमरों के चारों तरफ गलियारा बना है। यहां से दूर तक खेत और नदी का किनारा नजर आता है। ऊपरी मंजिल पर भी कुछ शयन कक्ष बने हैं। घर के पीछे एक आंगन भी है जिसमें रसोई घर और भंडार घर बने हैं।
बताया जाता है कि शरत बाबू ने जब कहानी उपन्यास लेखन से रायल्टी में अच्छा खासा धन कमा लिया तब इस आलीशान घर का निर्माण कराया। वे समताबेर में 1926 से रहने लगे। यहीं रहकर उन्होने राम की सुमति जिसका बांग्ला नाम रामेर सुमति है जैसी लोकप्रिय लंबी कहानी लिखी । इस कहानी पर हिंदी फिल्म अनोखा बंधन बनी थी।
शरत बाड़ी से बाहर निकलने पर चाय की दुकान और नजर आती है। एक कप चाय पीकर आगे चलते हैं। तकरीबन एक किलोमीटर कच्चे रास्ते पर पैदल चलने पर रुपनारायण नदी का किनारा आ जाता है। यहां रुपनारायण नदी का अनंत विस्तार है। गांव की हरियाली मनमोह लेती है। वातावरण मनोरम है। यह सब कुछ महसूस करने के बाद यह समझ में आता है कि शरत बाबू ने क्यों समता बेर को रहने के लिए चुना होगा।
वैसे शरत बाबू का जन्म बांदेल के पास देवनंदनपुर गांव में हुआ था। 1916 में बर्मा से लौटने के बाद वे हावड़ा शिबपुर इलाके में दस साल तक रहे। इसके बाद उन्होने समताबेर गांव में अपना ये घर बनवाया। अब यह शरतचंद्र कुटी के नाम से जाना जाता है।
रुप नारायण नदी के किनारे पिकनिक सा माहौल है। लोग नए साल की छुट्टियां मनाने यहां पहुंच रहे हैं। नाच गा रहे हैं और भोजन बना रहे हैं।\

नदी के किनारे हरे भरे आलू के खेत हैं। मैं वहां नारियल पानी पीता हूं। इसके बाद वापस। फिर देउल्टी से लोकल ट्रेन पकड़ता हूं हावड़ा के लिए। शाम की ट्रेन में भीड़ और भी कम है। स्मृतियों में बार बार शरत बाबू गांव और उनका घर है। ऐसा लग रहा है मानो एक बड़ी तीर्थ यात्रा से वापस लौट रहा हूं। उस महान लेखक को नमन।
विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com 
( SMATABER, SHARAT CHANDRA HOME, DEULTI, HOWRAH) 

Wednesday, March 28, 2018

समताबेर - शरत बाड़ी की ओर

शरतचंद्र चट्टोपाध्याय। बचपन से ही मेरे प्रिय लेखक। सातवीं कक्षा से उन्हें पढ़ना शुरू किया था। दसवीं तक आते आते पूरा शरत साहित्य पढ़ चुका था। घुमक्कड़ी के प्रेरणा मिलती है शरत साहित्य से। वैसे कोलकाता कई बार आ चुका हूं। पर इस बार पता चला कि शरत बाबू का वह गांव जहां वे आखिरी दिनों में रहे हावड़ा जिले में है तो वहां जाने की इच्छा हुआ। 30 दिसंबर को हिस्ट्री कांग्रेस में मेरा शोध पत्र पढ़ने का कार्य संपन्न हो गया तो मैं निकल पड़ा शरत बाड़ी के लिए। सबसे पहले हावड़ा रेलवे स्टेशन पहुंचा, हुगली नदी को स्टीमर से पार करके। इसका भी अपना मजा है। हावड़ा स्टेशन पर लिट्टी चोखा की दुकान दीख गई तो थोड़ी सी पेटपूजा हो जाए।

स्टेशन में प्रवेश करता हूं। जाने और आने का टिकट देउल्टी रेलवे स्टेशन तक का ले लिया। प्लेटफार्म नंबर 13 से देउल्टी के लिए पैसेंजर ट्रेन खुलती है। जो लोकल ट्रेनें खड़गपुर तक जाती हैं वे देउल्टी रुकती हैं। यानी देउल्टी रेलवे स्टेशन हावड़ा से खडगपुर लाइन पर है। हावड़ा से 52 किलोमीटर पर 19वां रेलवे स्टेशन है देउल्टी। मैं दोपहर 2.10 बजे वाली लोकल ट्रेन में बैठा हूं। जगह आसानी से मिल गई है। ट्रेन में चना जोर गरम से लेकर तमाम खाने पीने की सामग्री बेचने वाले आ रहे हैं।
कुछ स्टेशन बाद संतरागाछी रेलवे स्टेशन आया। संतरागाछी को अब कोलकाता में एक टर्मिनल के तौर पर विकसित किया जा रहा है। कई ट्रेने  अब यहीं से खुलती हैं। मैं देख रहा हूं स्टेशन पर नए प्लेटफार्म बनाने और स्टेशन के सौंदर्यीकरण का काम जारी है। संतरागाछी में इंटरस्टेट बस टर्मिनल भी बनाया गया है। यानी खड़गपुर और ओडिशा की तरफ से आने वाली ज्यादातर ट्रेने यहीं खत्म हो जाएंगी। आबादी के बढ़ते बोझ के कारण हावड़ा, सियालदह के अलावा कोलकाता, शालीमार, संतरागाछी अब टर्मिनल बन चुके हैं।  
ट्रेन सरपट भाग रही है। हर स्टेशन पर एक मिनट से ज्यादा नहीं रुकती। घोराघाटा के बाद अगला स्टेशन है देउल्टी। सहयात्री बता देते हैं कि देउल्टी आने वाला है। मैं आराम से उतर जाता हूं। प्लेटफार्म पर एक रेलवे स्टाफ से शरत बाड़ी पूछता हूं। वे कहते हैं दाहिनी तरफ स्टेशन से बाहर निकलिए। बाहर हाईवे पर पहुंचने पर शरतबाड़ी के लिए आटो रिक्शा मिल जाएगा। मैं देखता हूं के रेलवे स्टेशन पर भी शरतचंद्र की प्रतिमा लगी है। यहां पर उनके संक्षिप्त परिचय के साथ उनके गांव के बारे में जानकारी दी गई है।
रेलवे स्टेशन से बाहर निकलकर कोई 500 मीटर चलने के बाद नेशनल हाईवे आता है। उसके अंडरपास से पार करने के बाद आटो टैक्सी का स्टैंड है। यहां से समताबेर ग्राम के लिए आटो रिक्शा मिलता है। टाटा की छोटी गाड़ी में मैं ड्राईवर के बगलवाली सीट पर बैठ जाता हूं। तीन किलोमीटर चलने के बाद वे उतरने के कहते हैं। समताबेर आ गया है। स्टाप से बायीं तरफ एक रास्ता जा रहा है। पूरे रास्ते में पश्चिम बंगाल टूरिज्म की ओर से पथ संकेतक लगे हैं जिसमें शरत बाड़ी जाने का रास्ता बताया गया है। मैं उस रास्ते पर चल पड़ता हूं, जो मेरे लिए किसी बड़े तीर्थ स्थल जैसा ही तो है। अमरकथा शिल्पी शरतचंद्र का घर। (जारी... )
-        विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com 
(SHARAT CHANDRA, SAMTABER, HOWRAH, LOCAL TRAIN ) 

Tuesday, March 27, 2018

इंडियन म्युजियम कोलकाता मतलब जादू घर

तो आइए चलते हैं देश के सबसे पुराने संग्रहालय की सैर पर। कोलकाता का इंडियन म्युजियम। कोलकाता वाले इसे जादू घर भी कहते हैं। क्यों भला। इतना विशाल संग्रह है कि जादुई लगता है। साल 1814 में स्थापित इंडियन म्युजियम ने 2014 में अपनी स्थापना के 200 साल पूरे किए। अगर आप कोलकाता पहुंचे हैं और इतिहास में थोड़ी भी रूचि है तो इंडियन म्युजियम जरूर पहुंचिए। नहीं -नहीं सिर्फ इतिहास ही क्यों विज्ञान खास कर जीव विज्ञान, मानव विकास, भू भौतिकी जैसे विषयों के छात्र हैं शोधकर्ता हैं तो भी ये संग्राहलय आपके लिए महत्व रखता है।

इंडियन म्यूजियम कोलकाता शहर के मुख्य इलाके चौरंगी में स्थित है। कोलकाता में कहीं से भी यहां पहुंचना आसान है। मेट्रो का निकटम स्टेशन एस्प्लानेड हो सकता है। प्रवेश के लिए 20 रुपये का टिकट है। यह हर रोज 10 से 5 बजे तक खुला रहता है। टिकट काउंटर के पास बैगेज लेफ्ट यानी क्लाक रुम की सुविधा उपलब्ध है। म्युजिम के अंदर पानी, टायलेट आदि की भी सुविधा है। यहां से आप संग्रहालय का प्रकाशन, चित्रों के कलेक्शन अलबम आदि चाहें तो खरीद भी सकते हैं।
जब 1991 में पहली बार कोलकाता आना हुआ था तो एक दिन पूरा समय इंडियन म्युजियम के नाम किया था। कई साल बाद कई कोलकाता यात्रा के बाद साल 2017 में एक बार इंडियन म्युजियम के लिए कुछ घंटे का वक्त निकाला।
संग्रहालय में प्रवेश करते ही बायीं तरफ मानव विकास, जीवाष्म आदि की गैलरी है। यहां आप अत्यंत पुराना पेड़ देख सकते हैं तो पत्थर में तब्दील हो गया। कई जानवरों की कंकाल देख सकते हैं।
दाहिनी तरफ अलग अलग कालखंड के मूर्तियों की गैलरी है। ये मूर्तियां बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश के अलग अलग स्थलों से लाकर यहां प्रदर्शित की गई हैं। संग्रहालय में मध्य प्रदेश के सतना के पास भरहूत से प्राप्त कलाकृतियों का विशाल संग्रह है।
इंडियन म्युजियम का भवन दो मंजिला है। पहली मंजिल पर दाहिनी तरफ जाने पर आप इजिप्ट गैलरी में पहुंचे। यहां आप सैकड़ो साल पुरानी ममी देख सकते है। ममी वाली गैलरी में फोटोग्राफी प्रतिबंधित है।
इंडियन म्युजियम में आधार तल पर  बायीं तरफ जियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया की गैलरी है। इस गैलरी में आप अलग अलग तरह के धातुओं का विशाल संग्रह देख सकते हैं। यहां पर आप धातुओं के बनने की कहानी को भी समझने की कोशिश कर सकते हैं। ऐसा एक पत्थर देख सकते हैं जो मुड़ जाता है। यहां आप अलग अलग तरह के क्रिस्टल का भी संग्रह देख सकते हैं।

एशिया का सबसे बड़ा संग्रहालय - इंडियन म्युजियम में प्राचीन वस्तुओं, युद्ध सामग्री, गहने, कंकाल, ममी, जीवाश्म और मुगल चित्रों का दुर्लभ संग्रह है। इसकी स्थापना डॉक्टर नथानियल वालिक नामक डेनमार्क के वनस्पतिशास्त्री ने 2 फरवरी सन 1814 में की थी। हालांकि इसकी स्थापना की योजना कई सालों से बन रही थी। 

संग्रहालय आम जनता के लिए 1840 में खोला गया। वर्तमान भवन जिसमें यह संग्रहालय है इसका निर्माण 1867 में आरंभ हुआ और 1875 में पूरा हुआ। अब यह एशिया का सबसे पुराना और भारत का सबसे बड़ा संग्रहालय है। इतना ही नहीं यह विश्व के प्राचीनतम संग्रहालयों में शुमार है।

अब इस संग्रहालय का भवन भी आइकोनिक भवनों की श्रेणी में आ गया है। दो मंजिला विशाल भवन के बीच में बड़ा सा आंगन है। अगर आप घूमते घूमते थक गए हैं तो यहां थोड़ी देर आराम भी फरमा सकते हैं। (https://indianmuseumkolkata.org/)
-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com


Monday, March 26, 2018

राधाकृष्ण की मोहक मूर्ति - बिरला मंदिर कोलकाता


बिरला परिवार द्वारा देश के कई शहरों में बिरला मंदिर का निर्माण कराया गया है। ये मंदिर अत्यंत सुंदर और सुरूचिपूर्ण हैं। कोलकाता का बिरला मंदिर बॉलीगंज में स्थित है। यह कोलकाता का संभ्रांत इलाका गिना जाता है। बॉलीगंज मुख्य सड़क पर क्विंस पार्क के पास ये मंदिर स्थित है।
अगर देश के शेष बिरला मंदिरों से तुलना करें तो यह एक नया मंदिर है। इसका निर्माण 1970 में आरंभ हुआ। 21 सालों तक निर्माण कार्य चलता रहा। मंदिर 21 फरवरी 1996 को पूरी तरह तैयार होने के बाद श्रद्धालुओं के लिए खोला गया। मंदिर के मुख्य गुंबज की ऊंचाई 166 फीट है। मंदिर 44 कट्ठा के विशाल परिसर में बना है।मंदिर में तीन विशाल गुंबद हैं जो दूर से भी देखने में काफी सुंदर प्रतीत होते हैं। रात रोशनी में तो मंदिर का सौंदर्य और भी निखर जाता है।
इस मंदिर में मुख्य गर्भ गृह में राधाकृष्ण की बड़ी ही मनोरम प्रतिमा है। इसके एक तरफ महिषासुर मर्दिनी की प्रतिमा स्थापित की गई है। वहीं दूसरी तरफ महादेव शिव का मंदिर है। मंदिर के निर्माण में परंपरागत भारतीय वास्तुकला का पूरा ख्याल रखा गया है। इसके शिखर विशाल हैं। मंदिर परिसर में दाहिनी तरफ गणेश जी का मंदिर है। इस मंदिर की प्रमुख विशेषता है परिसर में दशावतार मंदिर। यहां विष्णु के सभी दस अवतारों के दर्शन आप एक साथ कर सकते हैं। मंदिर का भव्य और साफ सुथरा परिसर मन मोह लेता है। पूरब रूख का होने के कारण सुबह के सूरत की किरणें मंदिर परिसर में पड़ती हैं। मंदिर की दीवारों पर गीता के श्लोक और उससे जुड़े चित्र उकेरे गए हैं।

इसके निर्माण के लिए आगरा, मिर्जापुर और मुजफ्फरपुर से शिल्पी बुलाए गए थे। मंदिर के निर्माण में मोतियों के रंग के सफेद संगमरमर का इस्तेमाल किया गया है। मंदिर की आंतरिक सज्जा में बेल्जियम के ग्लास का भी इस्तेमाल किया गया है। इसका डिजाइन वास्तुविद नोमी बोस ने तैयार किया था।
मंदिर परिसर में मंदिर के निर्माता बिरला परिवार के प्रमुख सदस्य कृष्ण कुमार बिरला और मनोरमा देवी बिरला की प्रतिमा भी लगी है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर जूता घर बना है। मंदिर परिसर के अंदर फोटोग्राफी निषेधित है।
खुलने का समय – मंदिर सुबह 5.30 बजे से 11 बजे तक खुलता है। फिर शाम को यह 4.30 बजे से रात्रि 9 बजे तक श्रद्धालुओं के लिए खुला रहता है। आमतौर पर मंदिर में ज्यादा भीड़ नहीं होती। जन्माष्टमी पर मंदिर में विशेष सजावट होती है।
कैसे पहुंचे – कोलकाता के किसी भी कोने से बॉलीगंज के लिए सिटी बसें मिल जाती हैं। यहां आप ट्राम से भी पहुंच सकते हैं। मंदिर के सामने सड़क से ट्राम गुजरती रहती है। मंदिर गरिया घाट और पार्क सर्कस के बीच आशुतोष चौधरी एवेन्यू पर स्थित है।
दिल्ली, भोपाल, हैदराबाद, पटना के मंदिर मैं देख चुका था। इस बार कोलकाता के बिरला मंदिर को  देखने का मौका मिला। सुबह का समय था मंदिर में जाकर कुछ वक्त गुजरना बड़ा आनंददायक रहा। अब बिरला मंदिर कोलकाता आने वाले सैलानी और श्रद्धालु बड़ी संख्या में बिरला मंदिर भी पहुंचते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  ईमेल - vidyutp@gmail.com
(BIRLA TEMPLE, KOLKATA) 

Sunday, March 25, 2018

द ग्रेट ईस्टर्न होटल और अतीत की यादें


कई मुलाकातें इतिहास बन जाती हैं। कई बैठकें इतिहास बन जाती हैं। तो कुछ भवन ऐसे होते हैं तो तमाम महान लोगों की बातों मुलाकातों के गवाह बनते हैं। ऐसा ही एक भवन है कोलकाता का द ग्रेट ईस्टर्न होटल।
कोलकाता का द ग्रेट ईस्टर्न होटेल अब एक हेरिटेज होटेल की सूची में शुमार हैं। यह होटल कोलोनियल समय मे स्थापित किया गया था। यह उस समय के महत्वपूर्ण होटलों में से शामिल था। इस होटेल की स्थापना 19 नवंबर 1840 को की गई थी। तब डेविड विल्सन ने इसकी स्थापना की थी और इसका नाम आकलैंड होटल रखा था। होटल खोलने से पहले डेविड विलसन इसी स्थान पर बेकरी चलाया करते थे। बाद में होटल का विस्तार हुआ तो इसमें 100 कमरे और एक डिपार्टमेंटल स्टोर खोला गया। 1865 में पूर्ण विस्तार होने पर इसका नाम द ग्रेट ईस्टर्न होटल रखा गया। इससे पहले लोक इसे विल्सन होटल के नाम से भी जानते थे। 1883 में इस होटल के कमरों में बिजली आई। बिजली की सुविधा वाला यह देश का पहला होटल था।

अंग्रेजी के जाने माने लेखक रुडयार्ड किपलिंग ने इस होटल का जिक्र अपनी कहानी सिटी ऑफ ड्रेडफुल नाइट्स में किया है। इस होटल को लेकर कई कहावतें प्रचलित थीं। जो इस होटल में एक तरफ से घुसता है तो वह खरीददारी करके, खानापीना करके और शादी का उपहार खरीदकर दूसरी तरफ से बाहर निकलता था। कोलकाता के भद्रलोक के बीच इस होटल की अपनी प्रतिष्ठा बनी, जो लंबे समय तक बरकरार रही।
यह वो दौर था जब कोलकाता ईस्ट इंडिया का एक महत्वपूर्ण केन्द्र हुआ करता था। अपने प्रसिद्धि के दिनों मे इस होटल को ज्वेल ऑफ द ईस्ट कहा जाता था।
यह होटल इतिहास के कई महत्वपूर्ण व्यक्तियों के आगमन और उनकी मुलाकातों का साक्षी रहा है। इस होटल में मार्क ट्वेन, एलिजाबेथ द्वितीय, महात्मा गांधी, होची मिन्ह जैसे लोगों का आगमन हो चुका है।
भारत के स्वतंत्र होने के बाद भी इस होटल की प्रतिष्ठा बरकरार रही। हालांकि एक समय में इसकी साख में थोड़ी गिरावट आई। बाद में इसका प्रबंधन सरकार ने अपने हाथों में ले लिया। पर 2005 में एक बार फिर इसका प्रबंधन निजी हाथों में चला गया है। 2005 में निजी हाथों में जाने के बाद इस होटल के कमरों का नवीनीकरण किया गया। ललित सूरी समूह ने 52 करोड़ में इस होटल की 90 फीसदी हिस्सेदारी खरीद ली। सात साल तक इसे रिस्टोर करने का काम चलता रहा।


इसके नवीकरण में तकरीबन 260 करोड़ खर्च किए गए। 2013 में 19 नवंबर को जब इसे दुबारा खोला गया तो यह होटल ललित ग्रेट ईस्टर्न होटल के नाम से जा जाने लगा। अब इसका स्वामित्व ललित समूह के पास है। अब इसमें तीन ब्लाक हैं। हेरिटेज1, हेरिटेज2 और न्यू ब्लॉक।
इस होटल में कुल 5 रेस्टोरेंट संचालित किए जा रहे हैं। इस होटल में आजकल 221 कमरे और 21 सूइट्स हैं। द ग्रेट ईस्टर्न होटल को ऐशिया का सबसे पुराना चलता हुआ होटल होने का श्रेय प्राप्त है। अपने इतिहास में कई बार इसका नाम बदला और कई बार मालिकाना हक बदला पर होटल हमेशा संचालन में रहा। आजकल यहां आपको 6500 से लेकर 14000 तक प्रतिदिन में कमरे मिल सकते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य

Saturday, March 24, 2018

कोलकाता की गलियां और जेम्स हिक्की

कोलकाता के दिल चौरंगी के उत्तर में है डेकर्स लेन। अब इसे कोलकाता में सस्ते खाना खाने वाली गली के तौर पर जाना जाता है। कई बार इस गली से गुजरा हूं। पर साल 2011 में डेकर्स लेन का नाम बदलकर जेम्स हिक्की सरनी किया गया। हालांकि अभी भी लोग इसे डेकर्स लेन के नाम से ही बुलाते हैं। कोलकाता म्युनिसिपल कारपोरेशन ने हिक्की के सम्मान में एक सड़क को उसके नाम पर किया। आखिर कौन था हिक्की।

भारत में प्रकाशित होने वाला एक अंग्रेजी भाषा का पहला समाचार पत्र बंगाल गजट या ओरिजिनल कलकत्ता जनरल एडवरटाइजर था। इसके प्रकाशक जेम्स आगस्टस हिक्की ( James Augustus Hickey ) थे। जेम्स ऑगस्टस हिक्की ईस्टक इंडिया कंपनी के मुलाजिम के रूप में भारत आए थे ।
हिक्की का अखबार एक साप्ताहिक पत्र था जो कोलकाता से सन् 1780 में 29 जनवरी को आरम्भ हुआ। इसका प्रकाशन हिक्की स्वयं किया करता था। 'हिकी गजट' के प्रवेशांक में हिक्की ने स्वयं को ऑनरेबल कंपनी का मुद्रक घोषित किया हुआ था।

हिक्की गजट के प्रकाशन का एक कारण बाजार के लिए सूचनाएं उपलब्ध कराना था। यह भी माना जाता है कि वह अंग्रेजी प्रशासन के विरोध के लिए निकाला गया समाचार पत्र था। इसमें अंग्रेजी प्रशासन में व्याप्त भ्रप्टाचार और रिश्वतखोरी के समाचार प्रमुखता से होते थे।

हिक्की ने अपनी निष्पसक्ष लेखनी से उन्हों  ने किसी को भी नहीं बख्शाम, यहां तक कि वायसराय जैसे ताकतवर औहदेदार वारेन हेस्टिंग्स के द्वारा किए गए स्वेमच्छा चार और कंपनी के धन का निजी हितों के इस्तेमाल पर लिखा। हिक्की को इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी। अंग्रेज होने के बाबजूद उन्हें कई बार कंपनी की जेल में भी जाना पड़ा। कंपनी की आलोचना करने पर हिक्की पर 80 हजार रुपये जुर्माना लगाया गया। जुर्माना नहीं देने पर वारेन हेस्टिंग्स ने हिक्की को जेल में डाल दिया। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि 'हिक्की गैजेट्स' पहला भारतीय अखबार सिर्फ अफवाहों से भरा हुआ करता था।
 कटाक्ष करने में बेहद दक्ष संपादक
जेम्स हिक्की सरकारी कर्मियों पर कटाक्ष करने में बेहद दक्ष संपादक माने जाते थे। जनता में जितने लोकप्रिय थे, सरकार के बीच उतने ही अलोकप्रिय। हिक्की का जन्म 1740 में आयरलैंड में हुआ था। उसका निधन 1802 में हुआ। वह 1772 में कोलकाता आए। वह पेशे से सर्जन और कारोबारी थे।
वास्तव में हिक्की भारत में आधुनिक पत्रकारिता की नींव डालने वाले पत्रकार थे। वे अपनी निष्पक्ष लेखनी के लिए जाने जाते हैं। हिकी ने 1779 में कलकत्ता (अब कोलकता) में प्रेस लगाया था। इससे 12 वर्ष पूर्व 1768 में में विलियम बोल्ट नामक कम्पनी से नौकरी छोड़ने के बाद कलकत्ता से ही पत्र प्रकाशित करना चाहा था लेकिन उसे बंगाल छोड़ने का आदेश दिया गया। उसके बाद यूरोप जाने को कहा गया जिसके कारण वह पत्र आरंभ न हो सका।

यह संयोग है कि जेम्स हिकी सरनी में ही कोलकाता से प्रकाशित हिंदी दैनिक प्रभात खबर का दफ्तर है। इसके साथ ही कई ऐसे रेस्टोरेंट हैं जहां लाइव म्युजिक बैंड का परफारमेंस रोज शाम को होता रहता है। पर दिन भर किसी भी समय चले जाइए जेम्स हिक्की लेन खाने पीने के शौकीनों से गुलजार रहता है। कुछ प्रसिद्ध चाय की दुकानें, चाउमीन से लेकर बंगाली मिठाईतक सब कुछ यहां मिलता है। कोलकाता में सस्ता खाने की बेहतरीन जगहों में शामिल है हिक्की लेन।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
 (James Augustus Hickey , First English News Paper of INDIA) 

जेम्स हिकी लेन में स्थित प्रभात खबर में कार्यरत पत्रकार अजय विद्यार्थी और मैं। 

Friday, March 23, 2018

देश में सबसे पुराना है- कोलकाता मेट्रो रेल

देश में सबसे पुराना मेट्रो रेल नेटवर्क कौन सा है तो जवाब होगा कोलकाता। भले ही आज दिल्ली के पास मेट्रो रेल का सबसे लंबा नेटवर्क है। पर देश में मेट्रो की सेवा सबसे पहले कोलकाता में ही आरंभ हुई। कोलकाता मेट्रो रेल का संचालन भारतीय रेलवे करती है। यह रेलवे का एक जोन है। जबकि दूसरे शहरों में चलने वाली मेट्रो रेलों के लिए अलग अलग कारपोरेशन का निर्माण किया गया है।
कोलकाता मेट्रो फिलहाल नेताजी सुभाष चंद्र बोस हवाई अड्डा के निकटस्थ नोआपाड़ा से लेकर पाटुली के निकटस्थ कवि सुभाष स्टेशन तक विस्तारित है। व्यस्त शहर के इलाके में यह भूमिगत है।  कोलकाता मेट्रो रेलवे का निर्माण 1972 में आरंभ हुआ। 12 सालों के बाद इसका एक हिस्सा 1984 में खोल दिया गया। इस तरह देखा जाए तो इसका निर्माण बहुत ही धीमी गति से हुआ। दमदम से टॉलीगंज (महानायक उत्तम कुमार) तक 16.450 किलोमीटर लंबा प्रथम चरण 1995 में जाकर पूरा हो सका। पर 1984 में जब कोलकाता में मेट्रो रेल चली तो यह देश के लिए गर्व का क्षण था क्योंकि यह देश की पहली मेट्रो रेल थी।
तब कोलकाता मेट्रो रेलवे को कोच भी दिल्ली की तरह वातानूकुलित नहीं थे। इनमें फोर्स हिटिंग और कूलिंग का इंतजाम किया गया है। हालांकि इसके दरवाजे आटोमेटिक खुलते और बंद होते थे। पर इसके टिकट की व्यवस्था टोकन वाली और स्मार्ट कार्ड वाली नहीं थी। हालांकि यहां भी दिल्ली मेट्रो की तरह टोकन और स्मार्ट कार्ड शुरू कर दिया गया है। पर साल 2017 में ही कोलकाता मेट्रो किराया के लिहाज से देश में सबसे सस्ती है। यहां अभी भी न्यूनतम किराया 5 रुपये से आरंभ होता है। अभी अधिकतम किराया 15 रुपये ही है।
कोलकाता में मेट्रो संचालन की बात आई तो इसके लिए ब्राडगेज का ( 1676 मिमी) ट्रैक का चयन किया गया। दिल्ली मेट्रो के भी शुरुआती ट्रैक ब्राडगेज के हैं। पर अब देश में सभी मेट्रो स्टैंडर्ड गेज यानी 1435 मिमी चौड़ाई वाले पटरियों वाले बनाए जा रहे हैं।
अब अतीत में चलते हैं। 1969 में पहली बार कोलकाता में मेट्रो रेल चलाने का विचार आया। बात कागजों पर दौड़ती रही। 1971 में इस पर अंतिम मुहर लगी। शहर में 97 किलोमीटर के तीन कारीडोर बनाने  पर विचार किया गया। साल 1972 में इंदिरा गांधी ने कोलकाता मेट्रो की आधारशिला रखी। 1984 में संचालन आरंभ होने के बाद भी कोलकाता मेट्रो के विस्तार की गति बहुत धीमी रही। दिल्ली, बेंगलुरू में अब मेट्रो का नेटवर्क दूरी के लिहाज से कोलकाता से आगे निकल चुका है।
दमदम जंक्शन पर भारतीय रेलवे से संपर्क - कोलकाता मेट्रो दमदम जंक्शन रेलवे स्टेशन पर भारतीय रेल के साथ मिलती है। कोलकाता मेट्रो को अभी तक कोलकाता के प्रमुख रेलवे स्टेशन जैसे हावड़ा, सियालदह या एयरपोर्ट से नहीं जोड़ा जा सका है। हालांकि एयरपोर्ट लिंक पर काम जारी है।


फिल्मों में कोलकाता मेट्रो - विद्या बालन की फिल्म कहानी में कोलकाता मेट्रो के रविंद्र सरोवर स्टेशन पर शूटिंग की गई है। सत्यजीत राय ने दूरदर्शन के एक धारावाहिक की शूटिंग इस मेट्रो रेल के अंदर की थी।


कोलकाता मेट्रो- एक नजर 
रैपिड ट्रांसपोर्ट लाइनों की संख्या -2
स्टेशनों की संख्या 24, भूमिगत – 15, भूमिपर 2 ऊपर- 07
प्रतिदिन की सवारियां – 5.5 लाख  से 6 लाख तक
संचालन आरंभ – 1984
मेट्रो प्रणाली की लंबाई – 27.39 किमी

पटरी गेज – 1676 मिमी ( 5 फीट 6 ईंच) – ब्रॉडगेज

---vidyutp@gmail.com


Thursday, March 22, 2018

कोलकाता की लोकल ट्रेन – प्लेटफार्म पर कब्जा है जी...


कोलकाता को आम आदमी का शहर कहा जाता है। यहां खाना पीना घूमना अन्य शहरों की तुलना में निश्चित तौर पर सस्ता है। पर जब आप कोलकाता और आसपास के शहरों को लोकल ट्रेन से घूमने निकलेंगे तो आपको कुछ अलग नजारा दिखाई देगा। यहां के तकरीबन सभी रेलवे स्टेशनों पर बाजार सजा हुआ दिखाई देगा। ये बाजार कुछ यूं है कि रेलवे की संपत्ति पर सालों से अवैध वेंडरों का कब्जा है।
आमतौर पर देश के किसी भी रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर कुछ चयनित स्थलों पर दुकानों या स्टाल की अलाटमेंट होती है। पर कोलकाता में आपको हर लोकल रेलवे स्टेशन पर प्लेटफार्म पर लंबा बाजार सजा हुआ दिखाई देगा। जब कुछ साल पहले 2014 में मैंने सियालदह से काकद्वीप की तरफ गंगा सागर जाने के लिए ट्रेन यात्रा की थी तो हर स्टेशन के प्लेटफार्म पर लंबा चौड़ा बाजार सजा देखा था।
प्लेटफार्म पर गन्ने का जूस भी सब्जी बाजार भी....
इस बार की यात्रा में भी इसी तरह का बाजार देखने को मिला। जादवपुर हो या बालीगंज, दमदम हो या फिर कोई और स्टेशन हर स्टेशन पर प्लेटफार्म पर कई सौ दुकानें सजी हुई दिखाई देती हैं। आमतौर आपने रेलवे स्टेशन पर टी स्टाल, फूड स्टाल, दवा , बुक स्टाल आदि देखा होगा। पर कोलकाता के रेलवे स्टेशन पर आप खानेपीने के निहायत ही स्थानीय स्टाल के अलावा सब्जियों की दुकानें, रेडिमेड कपड़ो की दुकानें, खिलौनों की दुकानें सब कुछ देख सकते हैं। यानी आपको खरीददारी के लिए बाजार जाने की कोई जरूरत नहीं है। सबकुछ यहीं से खरीद लें।
वैसे तो मुंबई में फुट ओवर ब्रिज पर भी दुकानें सजी दिखाई देती हैं। पर कोलकाता के रेलवे स्टेशनों पर कब्जा करके स्थायी दुकानें बना ली गई हैं। कई दशक से कोई भी सरकार आए जाए भारत सरकार की संपत्ति पर लोगों का इस कदर कब्जा है कि इसको हटाना मुश्किल हो गया है। कई रेलवे स्टेशनों पर तो इतनी बुरी तरह कब्जा हो गया है कि रेलवे स्टेशन के नाम पट्टिकाएं भी ढक गई हैं।
इन रेलवे स्टेशनों पर दुकाने चलाने वाले लोग कई दशकों से यहां जमे हुए हैं। कई इसमें लोकल दंतमंजन बेचने वाले, चना, चूड़ा, घुघनी बेचने वाले, अंडे का आमलेट बेचने वाले भी हो सकते हैं। ये दुकानें सुबह से लेकर देर रात तक गुलजार रहती हैं।
ऐसा नहीं  है कि चेकिंग नहीं होती।कभी कभी रेलवे की ओर चेकिंग की औपचारिकता निभाई जाती है। इस दौरान सारे दुकानदार दुकानें बंद करके थोड़ी देर के लिए फरार हो जाते हैं। देश के कई और हिस्सों में रेलवे के जमीन पर कब्जा हो सकता है पर कोलकाता में जिस तरह प्लेटफार्म पर दुकानें सजी हैं वह आपको कहीं और देखने को नहीं मिलेंगी।
हो सकता है इन दुकानों से कुछ लोगों को सुविधा होती हो, बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार मिला हो, पर सिटी ऑफ जॉय का यह एक बदरंग चेहरा ही तो है।

मैं जनवरी 2018 के अखबार में एक खबर पढ़ता हूं - हावड़ा स्टेशन को अतिक्रमण मुक्त कराने के लिए रेलवे की ओर से शनिवार को अभियान चलाया गया।रेल सुरक्षा बल समेत रेलवे के वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में नोटिस दी गई 19 दुकानों पर कार्रवाई की गई। स्टेशन के विभिन्न प्लेटफार्म पर अवैध तरीके से संचालित की जा रही दुकानों और ट्रालियों पर हथौड़ा चला। 10 दुकानों 9 ट्रालियोंपर कार्रवाई की गई। 

लेकिन क्या ऐसी ही कार्रवाई कोलकाता और आसपास के सभी स्टेशनों पर हो सकती है क्या।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य 
( KOLKATA, LOCAL RAIL, MARKET )

Wednesday, March 21, 2018

कोलकाता में फेंकू मियां का साइकिल रिक्शा

जब भी कोलकाता आता हूं साइकिल रिक्शा को बड़ी हशरत से देखता हूं। इन रिक्शा में अगला पहिया नहीं होता। दो पहियों के भारी भरकम रिक्शे पर दो सवारियां बिठाकर या फिर माल लादकर रिक्शा लेकर आदमी दौड़ जाता है। लार्ड विलियम बेंटिक स्ट्रीट पर रात को आठ बजे मेरी मुलाकात फेंकू मियां से होती है। वे अपने रिक्शा के साथ फुटपाथ पर बैठे हैं।
उमर 65 साल हो गई है, पर अब भी पूरे दमखम से रिक्शा को लेकर दौड़ पड़ते हैं। मिट्टी के करुए में चाय की चुस्की के साथ मैं फेंकू मियां से संवाद स्थापित करने की कोशिश करता हूं। फेंकू मियां 40 साल से कोलकाता में रिक्शा लेकर दौड़ रहे हैं। कोलकाता की हर गली हर सड़क से वे बाबस्ता है। 25 साल के थे जब इस भारी भरकम रिक्शे को थामा था। तब से यही जिंदगी बन गई। बताते हैं कि रिक्शा 30 रुपये किराये पर 24 घंटे के लिए मिल जाता है। नया खरीदो तो आजकल 30 हजार का आता है। इसलिए अपना रिक्शा नहीं खरीदा, किराये पर ही चला रहा हूं। पूरे देश में कोलकाता और महाराष्ट्र का एक हिल स्टेशन माथेरन है जहां इस तरह का रिक्शा चलन में है।
रिक्शे पर बातों के साथ फेंकू मियां पुरानी यादो में खो जाते हैं। मैं इस रिक्शे पर सवारी लेकर टीटागढ़ तक जा चुका हूं। मतलब तकरीबन 30 किलोमीटर। सवारी बिठाकर दौड़ते हुए। टीटागढ़ क्या एक बार तो नैहाटी भी चला गया था। कोई दाम देगा तो क्यों नहीं जाउंगा। रोजी रोटी का सवाल है।
फेकूं मियां बताते हैं कि एक बार एक लाश लेकर नैहाटी तक गया था, करीब 35 किलोमीटर। उस लाश को कोई ले जाने को तैयार नहीं था। बड़े शान से कहते हैं इस रिक्शे पर दो टन वजन लेकर दौड़ सकता हूं।
इस रिक्शे की कमाई से कोलकाता के बाहरी इलाके ठाकुर पुकुर में जमीन खरीदकर घर भी बनाया। आठ कमरे बना लिए हैं , उन्हें किराये पर भी लगा दिया है। दो बेटियों की शादी कर चुका हूं। हालांकि बेटे को परिवार से बेदखल कर दिया है। क्यों भला। उसने मेरी मर्जी के खिलाफ जाकर दूसरी जाति में प्रेम विवाह कर लिया है। उसे मुहब्बत हो गई थी, ये मुझे बर्दाश्त नहीं हुआ।
आखिर कोलकाता में तीन पहिये वाला रिक्शा या बैटरी रिक्शा इस दोपहिये वाले रिक्शे का विकल्प क्यों नहीं बन पा रहा..कैसे बनेगा..भीड़भाड़ वाले इलाके में यही रिक्शा सफल है। कई बार इसको कोलकाता से हटाने की बात चली पर ये हो नहीं पाया।
आजकल कितना कमा लेते हैं। यही कोई 200 से 400 रुपये रोज। ग्राहक मिलने पर है। क्या नए लोग भी रिक्शा खींचने आ रहे हैं।क्यों नहीं आएंगे। कोलकाता में रोजी रोजगार के साधन नहीं है। पुराने उद्योग धंधे बंद हो गए। नए लगे नहीं। कोई काम नहीं मिलेगा तो क्या करेंगे। रिक्शा खींचकर पेट भरने लायक तो कमा लेंगे, नहीं तो भूखे ही सोना पड़ेगा। किसी दिन ज्यादा ग्राहक मिल गए किसी दिन कम पर, फेंकू मियां जिंदगी से निराश नहीं है। मैं उन्हें सलाम करता हूं और आगे बढ़ जाता हूं।
-विद्युत प्रकाश मौर्य 
( KOLKATA , HAND  PULLED RICKSHAW )