Thursday, February 22, 2018

मिजोरम का समाज और चर्च का प्रभाव

मिजोरम राज्य के लोगों के दैनिक जीवन, सामाजिक कार्य और राजनीति में चर्च का काफी प्रभाव है। मिजोरम राज्य की आबादी 11 लाख है। राज्य की 91 फीसदी से ज्यादा आबादी साक्षर है। साक्षरता के प्रतिशत के लिहाज से यह देश के सबसे अग्रणी राज्यों  में है। आबादी के घनत्व के लिहाज से यह प्रति वर्ग किलोमीटर सबसे कम आबादी वाले राज्यों में है। राज्य का 91 फीसदी हिस्सा वनाच्छादित है। जाहिर है आबोहवा अच्छी होगी। राज्य की 95 फीसदी आबादी जनजातीय है। राज्य की कुल आबादी में ईसाई धर्म मानने वालों की संख्या 87 फीसदी है। मिजोरम की 722 किलोमीटर चौहद्दी अंतरराष्ट्रीय सीमा है जो म्यांमार और बांग्लादेश से लगती है।
राज्य के उत्तरी इलाके ईसाई प्रेसबिटिरियन संप्रदाय से जुड़े हैं तो दक्षिणी इलाके वाले बैपटिस्ट हैं। 1849 में पहली बार मिजो इलाके में ब्रिटिश अधिकारियों के पांव पड़े। 1895 में मिजो हिल्स पर ब्रिटेन के कब्जा हो चुका था। 1898 में ब्रिटिश भारत ने इस क्षेत्र को असम का हिस्सा बना लिया। इसका नाम लुसाई हिल्स जिला रखा गया और इसका मुख्यालय आईजोल में बना।
बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में यहां ईसाई मिशनरियों का आगमन शुरू हुआ और धीरे धीरे सारा जनजातीय समाज यहां ईसाई बनने लगा। राज्य की भाषा मिजो है। मिज़ो भाषा की अपनी कोई लिपि नहीं है। इसे अंग्रेजी स्क्रिप्ट में ही लिखा जाता है। चर्च ने ही यहां की भाषा के लिए रोमन स्क्रिप्ट को अपनाया।
मिजोरम के जनजातीय समाज में कुकी और लुसाई लोग प्रमुख हैं। कुकी लोग उत्तर पूर्वी मिजोरम में बसते हैं। मिजोरम में पाहते, पई और राल्ते मार या लाखेर इत्यादि उपशाखाओं वाला जनजातीय समाज भी है।
मणिपुर और मिजोरम में रहने वाले नेई मेनाशे समुदाय के लोगों का कहना है कि वे इजरायल से नाता रखते हैं। नेई मेनाशे लोगों में मिजो, कुकी और चिन समुदाय के लोग शामिल हैं जो तिब्बती-बर्मी भाषा बोलते हैं। समझा जाता है कि उनके पूर्वज करीब सैकड़ों साल पहले यहां आ बसे। 19वीं सदी में उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया।

सबसे ज्यादा अंतर्जातीय विवाह - भारत में सबसे ज़्यादा अंतर्जातीय विवाह मिजोरम में होते हैं। नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकॉनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) के एक सर्वे से ये बात पता चली है। मिजोरम में 55 प्रतिशत शादियां अंतर्जातीय होती है। एनसीएआईआर की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 95 फीसदी शादियां समान जाति में होती है, लेकिन मिजोरम इसका अपवाद है।
 क्रिसमस और नए साल की धूम
क्रिसमस का त्योहार आने के साथ ही मिजोरम में क्रिसमस कैरल्स (मंगलगीत) की धुन हर गांव में सुनाई देने लगती है। ईसाई बहुल राज्य में अभी भी त्योहार का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे पारंपरिक सामुदायिक भोज का आयोजन होता है। गांवों या आसपास के इलाकों से आए लोग जुट जाते हैं। ये लोग एकसाथ मिलकर इस तरह के भोज का आयोजन करते हैं जिसमें मुर्गे, मछली, हरी सब्जियों और सलाद के अलावा पोर्क (सूअर का मांस) और बीफ (गाय का मांस) का बना व्यंजन परोसा जाता है।

शाम को मैं इधर ऊधर की सैर के बाद जारकोट चर्च पहुंचता हूं। यह आईजोल शहर का प्रमुख चर्च है। यहां नए साल की पहली संध्या पर विशेष प्रार्थना सभा आयोजन हो रहा है। चर्च के मुख्य हॉल में मैं जाकर बेंच बैठ जाता हूं। तकरीबन एक घंटे संगीतमय प्रार्थना और प्रवचन सुनता हूं। हालांकि भाषा मेरे पल्ले नहीं पड़ रही है। पर देख रहा हूं कि आईजोल का सबसे पॉश समुदाय यहां जुटा हुआ है। बड़ी संख्या महिलाएं भी हैं। 24 दिसंबर से 3 जनवरी तक जिस तरह मिजोरम में छुट्टी और उत्सव मनाने का वातावरण बना रहता है उससे महसूस किया जा सकता है कि मिजो समाज में चर्च किस तरह समाया हुआ है। राज्य की राजनीति की दशा और दिशा तय करने में भी चर्च की प्रमुख भूमिका है। साल 2016 में यहां चर्च के कुछ प्रतिनिधियों ने योग दिवस का भी विरोध किया था।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  (MIZORAM, CHURCH ) 

Wednesday, February 21, 2018

आईजोल शहर में नीवा के घर

आईजोल की राजधानी ट्रेजरी स्क्वायर पर टहलते हुए याद आया कि नीवा ने मुझे अपने घर आने का आमंत्रण दिया था। कौन नीवा, वही जिसकी हमने आईजोल आते समय सूमो में मुलाकात की बात पीछे की थी। हमारे पास समय था तो सोचा चलते हैं नीवा के घर। फोन मिलाया। उसने घर आने का रास्ता बता दिया। वैसे तो आईजोल में सिटी बसें चलती हैं पर छुट्टी का दिन होने के कारण मामला ठंडा है। सड़कों पर सिटी बसें कम दिखाई दे रही हैं। सामने राजभवन वाले चौराहे पर कुछ हवा मिठाई और गोलगप्पे वाले बैठे हैं। यहां भी गोलगप्पा। तो गोलगप्पा को क्यों न राष्ट्रीय खाद्य भोज्य पदार्थ घोषित कर दिया। उत्तर-दक्षिण-पूरब पश्चिम सब जगह तो मिलता है। सिर्फ नाम बदल जाता है। बिहार में घुपचुप, झारखंड में फोकचा। दिल्ली में गोलगप्पा तो मुंबई में पानीपूरी। 
बस नहीं है तो मैं पैदल ही चल पड़ता हूं। लोगों से रास्ता पूछता हुआ। पहुंचना है खतला। अपर खतला पहुंचकर एक बार फिर पूछता हूं। आईजोल कालेज के आसपास पहुंचना है। बंधन बैंक के पास नीवा सड़क पर ही हमारा इंतजार करती मिल गई। नीवा के पिता मदन राय बिजली विभाग में हैं। पूरा परिवार अत्यंत सज्जन। थोड़ी देर बैठने के बाद चलने की बातकरता हूं। पर मां कहती हैं खाना खाकर जाएं। दाल भरी हुई पूडी और खीर। नए साल का पहला भोजन। दूर आईजोल में लेकिन अपने गृह राज्य बिहार के एक परिवार के बीच। अपने घर की तरह और पूड़ी लिजिए की जिद। ये सब कुछ याद रहेगा। यहां पर नीवा के कुछ रिश्तेदारों और उनके भाइयों से भी मुलाकात हुई।
कई और मजेदार बातें। यहां मजदूरों को मोटिया कहते हैं। बाहर से आए लोगों को बाइपा। पर बड़ी संख्या में बाहरी मजदूर आईजोल में हैं। अगर आप मिजोरम में बुजुर्ग लोगों को सम्मान देना चाहते हैं तो उनके नाम से पहले पू लगाएं। यहां श्रीमान जैसा कुछ होता है। नीवा ने मुझे शाम तक कुछ और स्थलों के भ्रमण के बारे में सलाह दी।
मिजोरम में जारकोट इलाके में मिरोजम स्टेट म्युजियम है। पर वह छुट्टी का दिन होने के कारण बंद है। तब खुला क्या होगा। कहां जाया जा सकता है। अभी मेरे पास शाम तक का समय है। शहर में दोपहर की गुनगुनी धूप में घूमते हुए मैं सोच रहा हूं। तभी मुझे एक बाइक टैक्सी वाले नजर आते हैं।
जी हां बाइक टैक्सी गुरुग्राम और नोएडा की तरह। साल 2017 में आईजोल शहर में बाइक टैक्सी परिचालन में आई है। एक्टिवा जैसी स्कूटी को बाइक टैक्सी में संचालित किया जा रहा है। दोपहिया का नंबर पीले रंग का है और बाइक टैक्सी ड्राईवर के पास हेलमेट भी पीले रंग का  है। आपको जहां भी जाना है ड्राईवर  से किराये का मोलभाव करें। पहाड़ी शहर है इसलिए किराया तय नहीं किया गया है। पर यह टैक्सी से काफी सस्ता है। आधे से भी कम है। मतलब सिटी बस और टैक्सी के बीच शहर में घूमने का एक और विकल्प है। शहर में ऐसी कई सौ बाइक टैक्सी संचालन में आ गई हैं। ये बाइक टैक्सी वाले लोग आसपास के 10-12 किलोमीटर दूर गांव में भी चले जाते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य

Tuesday, February 20, 2018

आईजोल का आईआईएमसी और एलआर साईलो

आईजोल शहर के राजधानी क्षेत्र में टहल रहा हूं। विधानसभा और राजभवन को देखते हुए आगे बढ रहा हूं। अचानक याद आता है कि आईजोल में भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) की शाखा है। जब मैं 1995-96 में आईआईएमसी का छात्र था तब इसकी ढेंकानाल (ओडिशा) और आईजोल (मिजोरम) शाखा के बारे में सुनता था। तो अब आईजोल आने पर आईआईएमसी की शाखा देखने की इच्छा हुई। मैंने मोबाइल में आईआईएमसी, आईजोल सर्च किया। इसके प्रभारी एलआर साइलो साहब का संपर्क नंबर मिल गया।उन्हें फोन लगाया। कोई पुरानी जान-पहचान नहीं, पर बड़ी उत्साहजनक बात हुई। उन्होंने कहा मैं अभी घर में हूं। आज छुट्टी है। घर पर आ जाएं। कहां पर हैं आप। मैंने बताया कि एसेंबली के पीछे वाली सड़क पर। वहां से ट्रेजरी स्कायर चौराहे पर आएं। मैं एक छात्र को भेजता हूं। वह आपको मेरे घर ले आएगा। मैं पांच मिनट में एक बार फिर ट्रेजरी स्कावयर पर था।वहीं जहां लालडेंगा मेमोरियल बना है। यहां आदित्य गौतम मिले।
साइलो साहब के ड्राईंग रुम में क्रिसमस ट्री। 
आदित्य आईआईएमसी आईजोल के सत्र 2017-18 में अंग्रेजी पत्रकारिता के छात्र हैं। वैसे इंजीनियरिंग करने के बाद पत्रकारिता पढ़ने आए हैं। आगे लेखक बनने की तमन्ना रखते हैं।

आईआईएमसी आईजोल में साल 2011 से अंग्रेजी पत्रकारिता का डिप्लोमा कोर्स संचालित किया जा रहा है। हांलाकि परिसर दूर होने के कारण दूसरे राज्यों से छात्र यहां कम आते हैं। पर इस बैच में नौ छात्र अध्ययन कर रहे हैं। यहां तीन शिक्षक पदस्थापित हैं। हां नौ छात्रों के लिए तीन शिक्षक। क्लासरूम का माहौल कितना आत्मीय होता होगा आप अंदाजा लगा सकते हैं। आईजोल परिसर 8 अगस्त 2011 से नियमित रूप से कार्य कर रहा है। फिलहाल इसकी कक्षाएं मिजोरम यूनीवर्सिटी के कैंपस में ही संचालित होती हैं। यह शहर से 6 किलोमीटर बाहर है। पर आईआईएमसी आईजोल का विशाल परिसर बनकर तैयार हो रहा है। आने वाले सालों इसका अपना परिसर होगा। आईआईएमसी में हमारे शिक्षक रहे केएम श्रीवास्तव कई बार आईजोल आ चुके थे।
हम एक अत्यंत सुरुचिपूर्ण ढंग से सजे घर में प्रवेश करते हैं। एलआर साइलो के घर का ड्राईंग रूम बडे ही करीने से सजाया गया है। इसमेंविशाल क्रिसमस ट्री है। साथ ही दीवारों पर फोटोग्राफी में आईजोल शहर की सुंदर तस्वीरे हैं। 71 वर्षीय साइलो साहब कुछ दिन से बीमार थे। नए साल के पहले दिन मैं पहला कोई व्यक्ति हूं जिससे वे मिल रहे हैं।
हमारी बातचीत शुरू होती है। पहले आईआईएमसी पर फिर बात निकलकर जाती है मिजोरम पर। वे 1971 से मिजोरम सरकार की सेवा में हैं। उन्होंने मिजोरम का उग्रवाद प्रभावित दौर भी काफी करीब से देखा है। वे मिजोरम पर एक चलती फिरती किताब ही हैं। पूर्वोत्तर के सारे बड़े पत्रकार उनके दोस्त हैं। एलआर साइलो लंबे समय तक मिजोरम सरकार के सूचना एवं प्रसारण विभाग के निदेशक रहे। 2007 में अवकाश प्राप्ति के बाद भी मिजोरम सरकार उनकी सेवाओं का विस्तार दे रही है।आजकल भी वे मिजोरम सरकार के मुख्यमंत्री पू ललथनहवला के मीडिया सलाहकार हैं।
कुछ घंटे की मुलाकात में पत्रकारिता, सरकारी मीडिया के तौर पर एक सूचना अधिकारी की जिम्मेवारियां और मिजोरम में उग्रवाद के दौर पर संक्षेप में उनसे चर्चा हुई। उनके ड्राईंग रुम में मिजोरम पर कुछ सुंदर कॉफी टेबल बुक देखने को मिलीं।
चाय नास्ते के बाद अब उनसे विदा लेना चाहता हूं। वे कहते हैं जब तक मिजोरम मे हैं आप किसी भी तरह की सहायता के लिए फोन कर सकते हैं। चलते समय वे एक कलम और मिजोरम पर कुछ पुस्तिकाएं उपहार में देते हैं। चलते हुए पता चलता है कि साइलो साहब अपने आवास में एक गेस्ट हाउस भी संचालित करते हैं। 70 के पार हैं पर कई मोर्चों पर उनकी सक्रियता प्रेरणा लेने योग्य है। 
आदित्य फिर ऊपर तक छोड़ने आए। आदित्य हरिद्वार के पास कनखल के रहने वाले हैं। पर पत्रकारिता पढ़ने के लिए उन्होंने आईजोल आना पसंद किया। उनसे थोड़ी चर्चा के बाद मैं विदा लेता हूं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य 
( IIMC, AIZAWL, LR SAILO ) 

Sunday, February 18, 2018

मिजोरम की राजनीति- मिजो नेशनल फ्रंट और कांग्रेस

आईजोल में एमएनएफ का मुख्यालय
साल 2018 मिजोरम के लिए चुनावी साल है। इससे पहले मिज़ोरम राज्य विधानसभा चुनाव, 2013 में हुए थे। मिज़ोरम में 25 नवम्बर 2013 को हुए विधान सभा चुनाव में राज्य की 40 विधानसभा सीटों पर कुल 6.90 लाख मतदाता थे  यहां मतगणना 9 दिसंबर 2013 को हुई। इनमें कांग्रेस पार्टी विजयी रही। 40 सीटों में 34 पर कांग्रेस 5 पर एमएनएफ ने जीत हासिल की। मिजोरम में सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री ललथनहावला ने एक बार फिर सरकार बनाई।

 साल 2008 के विधानसभा चुनाव में 40 में से 32 सीटें कांग्रेस ने जीतकर सरकार बनाईवहीं एमडीए (मिजोरम डेमोक्रेटिक एलायंस) 8 सीटें ही जीत पाया था। एमडीए में मिजो नेशनल फ्रंटमिजोरम पीपुल्स कॉन्फ्रेंस और मेरालैंड डेमोक्रेटिक एलायंस शामिल थे।

मिजोरम में 40 मे 39 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है। सिर्फ आईजोल इस्ट सीट ही समान्य है। कुल 11 विधानसभा क्षेत्र आईजोल में ही हैं। साल 2013 में चुनावी मैदान में लालनथन हवला (मुख्यमंत्री)जोरामथंगा (पूर्व मुख्यमंत्रीएमएनएफ),आर. रोमविया (विधानसभा अध्यक्ष)जोहाल्सो (विधानसभा उपाध्यक्ष) सहित कुछ दिग्गज भी चुनाव के मैदान में थे।

 राज्य बनने के बाद मिजोरम में पहली बार 1989 में चुनाव हुए। तब कांग्रेस ने चुनाव जीता और ललथनहावला राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने। दूसरी बार 1993 में हुए चुनाव में फिर से कांग्रेस ही जीती और ललथनहावला मुख्यमंत्री बने।
पर तीसरी बार 1998 में हुए विधानसभा चुनाव में मिजो नेशनल फ्रंट ने बाजी मारी और जोरामथांगा मुख्यमंत्री बने। साल 2003 में एक बार फिर जोरमाथांगा की अगुवाई में मिजो नेशनल फ्रंट ने सरकार बनाई। पर साल 2008 में पासा पलट गया। फिर कांग्रेस सत्ता में वापस आई और एक बार फिर लालथनहवला मुख्यमंत्री बने।

 मिजोरम के सबसे लंबे समय तक के सीएम - ललथनहवला
मिजोरम में कांग्रेस का चेहरा और सबसे लंबे समय तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे ललथनहवला राज्य की राजनीति के मंजे हुए खिलाडी हैं ।ललथनहवला ने अपना कैरियर एक रिकॉर्डर के तौर पर शुरू किया था। उसके बाद उन्होंने असम को-ऑपरेटिव अपेक्स बैंक में असिस्टेंट के रूप में काम किया। 1967 तक वे राजनीतिक पार्टी मिजो नेशनल फ्रंट के सचिव रहे।


एमएनएफ के जोरमथंगा।
ललथनहवला 1967 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए। 1973 में वे मिजोरम के पार्टी अध्यक्ष चुने गए। उनके नेतृत्व में 1989 में कांग्रेस पार्टी ने मिजोरम में बहुमत हासिल किया और वे राज्य के मुख्यमंत्री चुने गए। वह 1989 से लेकर 1998 तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे। साल 2008 में वह राज्य के एक बार फिर मुख्यमंत्री चुने गए। 2018 में वे मुख्यमंत्री के तौर पर चार कार्यकाल और 20 साल पूरे कर चुके हैं। इस तरह वे ज्योति बसु और पवन कुमार चामलिंग की सूची में शामिल हो गए हैं।

लालडेंगा के उत्तराधिकारी जोरमथंगा
मिजोरम के दो बार मुख्यमंत्री रहे जोरमथंगा की बात करें तो वे मिजो नेशनल फ्रंट पार्टी का नेतृत्व करते हैं। उन्हें  लालडेंगा के उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जाता है।
मिज़ो नेशनल फ्रण्ट के तत्कालीन अध्यक्ष लालडेंगा ने ज़ोरमथंगा को अपना सचिव बनाया था। जिस पद पर वे सात वर्षों तक बने रहे। 1979 में वे मिजो नेशनल फ्रण्ट के उपाध्यक्ष बन गए। विद्रोह के दौरान सेना ने जोरमथंगा को गिरफ्तार भी किया था। विद्रोह के दौर में वे म्यांमार के जंगलों में भी रहे। 1990 में हुई लालडेंगा की मृत्यु तक जोरमथंगा उनके सबसे भरोसेमंद सहयोगी थे। लालडेंगा के बाद वे मिजो नेशनल फ्रण्ट के अध्यक्ष बने। वे 1998 से 2008 तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे। उनका जन्म म्यांमार सीमा के पास मिजोरम के चंफई जिले के सामथांग गांव में 13 जुलाई 1944 को हुआ था।
फिलहाल मिजोरम की राजनीति में ललथनहवला और जोरामथांगा ये ही दो नाम हैं जिनके आसपास राजनीति घूमती है। दोनों 70 के पार हैं। पर राज्य में कोई युवा नेतृत्व फिलहाल उभरता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य



Friday, February 16, 2018

मिजोरम – लालडेंगा से ललथनहवला तक

आईजोल में लालडेंगा मेमोरियल। 
आईजोल शहर में असम राइफल्स से आगे चलने पर ट्रेजरी स्क्वायर के पास लालडेंगा मेमोरियल नजर आता है। लालडेंगा की गिनती मिजोरम के निर्माता के तौर होती है। मिजोरम के लोगों में उनके प्रति काफी सम्मान है। मिजो नेशनल फ्रंट की अगुवाई में लालडेंगा ने अलग मिजोरम राज्य के लिए लंबी लड़ाई लड़ी। लालडेंगा का जन्म 11 जून 1927 को हुआ था। उनकी मृत्यु 7 जुलाई 1990 को लंदन में हुई।
पूर्वोत्तर का सुंदर और शिक्षित राज्य मिजोरम कभी असम का जिला हुआ करता था। पर अलग भाषा संस्कृति होने के कारण यह ज्यादा समय तक असम के साथ नहीं रह सका। 1950 के बाद ही यहां अलग राज्य की मांग को लेकर आंदोलन जोर पकड़ने लगा।
यहां के लोगों के जन आकंक्षाओं के अनुरूप मिजोरम 1972 में पूर्वोत्तर क्षेत्र पुनर्गठन अधिनियम लागू होने पर केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया। पर इससे मिजो क्षेत्र में शांति स्थापित नहीं की जा सकी। यहां के लोगों की मांग पूर्ण राज्य की थी जो कई सालों बाद जाकर पूरी हो सकी।
जनता पार्टी के शासन काल में प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के आदेश पर लालडेंगा को जेल में बंद कर दिया गया था। पर राजीव गांधी ने मिजो समस्या को लेकर सकारात्मक रुख अपनाया। वास्तव में साल 1984 में राजीव गांधी का केंद्र में सत्ता में आना मिजोरम के लिए युगांतकारी साबित हुआ। मिजोरम के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालडेंगा 15 फरवरी 1985 को राजीव गांधी से मिले। इस मुलाकात में मिजोरम को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने पर सहमति बनाने पर चर्चा हुई। वास्तव में राजीव गांधी का मिजोरम से काफी लगाव था। उन्होंने यहां की कई यात्राएं भी की थीं।
साल 1986 में लुंगलेई के एक गांव में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी, मणिशंकर अय्यर एक मिजो घर में। 

पूर्व और दक्षिण में म्यांमार और पश्चिम में बांग्लादेश के बीच स्थित होने के कारण भारत के पूर्वोत्तर कोने में मिजोरम सामरिक दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण राज्य है। अब थोड़ा नजर डालते हैं मिजोरम के अतीत पर। 1891 में ब्रिटिश कब्जे में जाने के बाद कुछ वर्षों तक उत्तर का लुशाई पर्वतीय क्षेत्र असम के और आधा दक्षिणी भाग बंगाल के अधीन रहा। 1898 में दोनों को मिलाकर एक जिला बना दिया गया जिसका नाम पड़ालुशाई हिल्स जिला और यह असम के मुख्य आयुक्त के प्रशासन में आ गया। यह इलाका ही आगे चलकर मिजोरम कहलाया।

मिजोरम में अलगाववाद का दौर - वास्तव में 1950 के बाद भारत-सरकार के मिजोरम के प्रति गैर-संवेदनशील होने का आरोप लगाते हुए मिजोरम के संगठनों ने नाराज होकर एक अलगाववादी अभियान आरम्भ किया था।
मिजोरम में साल 1959 के अकाल में कम से कम 100 लोगों की मौत हो गई थी और मानव संपत्ति व फसल का भारी नुकसाना हुआ था। इसके बाद लालडेंगा की अगुवाई में मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) ने भारत सरकार के खिलाफ स्वतंत्रता के लिए लड़ाई शुरू कर दी। हालांकि उनके अभियान को सफलता नहीं मिल रही थी, लेकिन इसके कारण मिजो समाज हिंसा से पीड़ित था। 1986 के मिजो समझौते के बाद एमएनएफ ने हिंसा का रास्ता छोड़ भारतीय संविधान के तहत कार्य करने की घोषणा की।
ताकि हम भूल न जाएं उनको, जिनके बुनियाद पर खड़ा है हमारा आज...

1986 का मिज़ो समझौता (MIZO ACCORD ) - भारत सरकार और मिजो नेशनल फ्रंट के बीच 30 जून 1986  को एक समझौता हुआ जिसे मिजो समझौता कहा जाता है। भारत सरकार और मिजो नेशनल फ्रंट के बीच  हुए ऐतिहासिक समझौते के बाद मिजोरम को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला। राजीव गांधी और लालडेंगा के बीच हुए इस समझौते के तहत मिज़ोरम को 20 फरवरी, 1987 को भारत का 23वां राज्य बनाया गया।
राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने दिसंबर 2017 में मिजोरम विधानसभा के विशेष सत्र में कहा कि 1986 के मिजो समझौते दुनिया के लिए एक शानदार उदाहरण है। भारत के लंबे इतिहास में समझौता व इसकी विरासत सबसे बड़ी सफलताओं में से यह एक है।
- vidyutp@gmail.com - विद्युत प्रकाश मौर्य
(MIZO ACCORD, RAJEEV GANDHI, LALDENGA ) 

Wednesday, February 14, 2018

आईजोल में असम राइफल्स – समोसा और मिठाई

आईजोल की सुबह - होटल की खिड़की से 
एक जनवरी की सुबह। आईजोल में हल्की गुनगुनी सर्दी है। मैं सड़क पर सुबह सुबह टहलने निकल पड़ा हूं। मिलेनियम सेंटर पार करके गवर्नमेंट हास्पीटल वाली रोड पर आगे बढ़ता हूं। थोड़ा चलने पर असम राइफल्स का कैंप आ गया। असम राइफल्स मतलब देश की सबसे पुरानी पारा मिलिट्री फोर्स का शिविर। पूर्वोत्तर के हर राज्य में इनका शिविर है।  
आईजोल में यही एक जगह है जहां पर समोसा मिल सकता है। दरअसल आईजोल शहर के बीचों बीच यह असम राइफल्स का शिविर क्षेत्र है। यहां पर बटालियन का दफ्तर, स्टेडियम, मंदिर और कैंटीन आदि है। कैंटीन में एक बड़ी दुकान है, जहां दैनिक जरूरत की सारी चीजें मिल जाती है। दुकान सुबह सुबह खुल जाती है। इसी परिसर में एक एक चाय नास्ते की दुकान भी है। वैसे तो यह असम राइफल्स के अधीन है, पर यहां कोई आम नागरिक भी आकर खा पी सकता है। मैं सुबह-सुबह दो समोसे आर्डर करता हूं। एक समोसा 10 रुपये का। अगर सब्जी लेना चाहें तो 10 रुपये की अलग से है। कैंटीन में कुछ मिठाइयां भी हैं। रसगुल्ला और कलाकंद आदि। मैं एक गुलाब जामुन भी मांग लेता हूं। इस तरह 40 रुपये में नास्ता हो गया सुबह का।

असम राइफल्स की कैंटीन में समोसा 
आईजोल इस मामले में नगालैंड की राजधानी कोहिमा से बेहतर है जहां कुछ शाकाहारी खाने पीने को मिल जाता है। आगे बढ़ता हूं। सामने असम राइफल्स का मंदिर है। मंदिर के अंदर से ढोल मजीरे की आवाज आ रही है। मंदिर में कीर्तन चल रहा है। वह भी भोजपुरी में। मैं अंदर जाने की इच्छा जताता हूं पर मंदिर के प्रवेश द्वार पर तैनात असम राइफल्स के जवान कहते हैं एक घंटे बाद आइएगा। अभी पूजा चल रही है। कीर्तन की मधुर आवाज कानों में घुल रही है। पर मैं आगे बढ़ जाता हूं। असम राइफल्स का वार मेमोरियल नजर आता है। उसके आगे विशाल स्टेडियम भी है। असम राइफल्स के बटालियन मुख्यालय का दफ्तर आ जाता है। उसके सामने बापू की एक प्रतिमा भी नजर आती है। यहीं आईजोल के स्टेट बैंक की मुख्य शाखा भी नजर आती है।


कुछ बातें मिजोरम के बारे में - मिजो शब्द की उत्पत्ति के बारे में ठीक से मालूम नहीं है। पर 19वीं शताब्दी में इस क्षेत्र में ब्रिटिश मिशनरियों का प्रभाव फैल गया। इसका परिणाम हुआ कि इस समय तो अधिकांश मिजो लोग ईसाई धर्म को ही मानते हैं। पर मिजोरम के इसाई कैथोलिक बहुत कम हैं। यहां पर प्रेसबिटिरियन चर्च का बोलबाला है।

साक्षरता में आगे - मिजो भाषा की अपनी कोई लिपि नहीं है। इसाई मिशनरियों ने मिजो भाषा और औपचारिक शिक्षा के लिए रोमन लिपि को अपनाया। मिजोरम में शिक्षा की दर तेजी से बढ़ी है। वर्तमान में यह 88.8 प्रतिशत हैजो कि पूरे देश में दूसरे स्थान पर है।
वैसे मिजो लोग मूलतः किसान होते हैं। अतः उनकी तमाम गतिविधियां तथा त्योहार भी जंगल की कटाई करके की जाने वाली झूम खेती से ही जुड़े हैं। मिजो लोग बेहतरीन बुनकर होते हैं। इसलिए यहां की यात्रा के दौरान यहां की महिलाओं द्वारा हाथ के बुने कपड़े खरीद सकते हैं।

फुटबाल में भी मिजोरम आगे – आईजोल की सड़कों पर मुझे आईजोल फुटबाल क्लब का बड़ा बोर्ड नजर आता है। पता चला कि मिजोरम फुटबाल खेलने में आगे है। साल 2017 में मिजोरम की फुटबाल टीम ने कमाल किया। संतोष ट्राफी पर कब्जा जमाने के बाद 25 अप्रैल 2017 को मिजोरम के मुख्यमंत्री ललथन हवला ने कहाआज के दौर में फुटबाल मिजोरम के लड़कों के लिए प्राथमिकता है। मेरी टीम ने संतोष ट्रॉफी पर कब्जा जमाया।  मैं बेहद खुश हूं।  मुझे अपनी टीम पर गर्व है। मैं इसके लिए आइजोल फुटबाल क्लब के मालिस रोबर्ट रोमाविया रोयटे को भी श्रेय देता हूं।
- विद्युत प्रकाश मौर्य -vidyutp@gmail.com
(AIZAWL, ASSAM RIFLES, TEMPLE )  



Monday, February 12, 2018

जारकोट – आईजोल शहर का दिल

आईजोल शहर देश के राज्यों की उन राजधानियों में शुमार है जो हिल स्टेशन हैं। जैसे शिमला, शिलांग, गंगटोक और कोहिमा। इन सभी राजधानियों का तापमान सालों भर शीतल रहता है। आईजोल समुद्र तल से 1132 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। मिजोरम की राजधानी की आबादी 2011 की जनगणना में 2 लाख 93 हजार थी। यह मिजोरम का सबसे बड़ा शहर है। शहर का विस्तार 457 वर्ग किलोमीटर में है।
हमारी सूमो चलते हुए जारकोट टैक्सी स्टैंड में आकर रुक जाती है। जारकोट आईजोल शहर का मुख्य इलाका है। यहां से विधानसभा राजभवन पास ही हैं। संयोग से मैंने जो होटल बुक किया है वह जारकोट में ही है। मैं अपने सूमो वाले से पूछता हूं वह सामने मुझे होटल का बोर्ड दिखा देता है। मैं टहलता हुआ होटल चीफ पहुंच जाता हूं। जारकोट टैक्सी स्टैंड से चांदमारी रोड पर स्थित होटल चीफ की बिल्डिंग पांच मंजिलों वाली है। रिसेप्शन पर नाम बताना काफी था। वे मुझे मेरे कमरे तक ले गए। मेरा कमरा पांचवी मंजिल पर है। लिफ्ट नहीं है। पर सबसे ऊपर की मंजिल से आईजोल शहर का अच्छा नजारा दिखाई देता है।

मेरे कमरे में अटैच टायलेट नहीं है। पर सबसे ऊपर की मंजिल पर चार कमरे हैं। इनके लिए तीन शौचालय और तीन स्नानागार अलग अलग बने हैं। संयोग से इन चारों कमरों में सिर्फ मैं ही निवास कर रहा हूं इसलिए सभी टायलेट,बाथरूम मेरे लिए ही हैं। कमरे में टीवी है। बाथरुम में गीजर भी है। कमरे से लगी बालकोनी है जिससे बाहर का नजारा देख सकते हैं। होटल ने टावेल और साबुन भी दिया है। यानी सबकुछ संतोषजनक है। होटल के स्वागत कक्ष वाले फ्लोर पर रेस्टोरेंट भी है। रात को वेज राइस आर्डर करके खाया। और कुछ इससे बेहतर नहीं दिखा। होटल के रेस्टोरेंट मेंबाहर से भी लोग खाने आ रहे हैं। मतलब रेस्टोरेंट चलता हुआ है।
होटल में अपना सामान जमा लेने के बाद मेरे पास थोड़ा समय है। मैं आसपास में घूमने वाली जगहों के बारे में पूछता हूं। होटल के गेट पर मेरी मुलाकात अजय यादव से होती है। वे दिल्ली के रहने वाले हैं, पर आईजोल में आकर एक हार्डवेयर फर्म में मार्केटिंग की नौकरी कर रहे हैं। वे मुझे आईजोल के बारे में कई जानकारियां देते हैं। उनके साथ ही टहलता हुआ मैं चांदमारी चौराहा तक जाता हूं। वहां एक सुंदर चर्च है। चर्च के बाहर रौनक है। पास में केएफसी का रेस्त्रां भी है। क्रिसमस गुजर चुका है, पर जगह जगह आईजोल में क्रिसमस ट्री सजे हुए हैं। दरअसल क्रिसमस से लेकर 3 जनवरी तक आईजोल में उत्सव मनाने का समय होता है। इसलिए जब मैं आईजोल पहुंचा हूं, सारा शहर उत्सव मनाने के मूड में है। सब जगह छुट्टी सा माहौल बना हुआ है।
आईजोल शहर में चांदमारी चर्च। 
थोड़ा घूमघाम कर अपने होटल वापस आ जाता हूं। खाने के बाद अपने कमरे में। पर इससे पहले रात की रोशनी में आईजोल शहर का नजारा देखना बड़ा सुखकर लग रहा है। क्यों ने इस झिलमिल रोशनी में छत पर कुछ सेल्फी ली जाए। तो चलो अब सो जाते हैं। आईजोल के बारे में कुछ और बातें कल करेंगे।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य 
(AIZAWL, JARKAWT, MIZORAM) 

Saturday, February 10, 2018

नीवा और राजू ट्रक ड्राईवर के संग आईजोल की ओर

मिजोरम के बुअलपुई में सड़क के किनारे बना सुंदर मंदिर।
कोलासिब से आगे चलते हुए हम बुअलपुई पहुंच गए हैं। यहां एक सुंदर मंदिर और एक चर्च नजर आता है। नागालैंड में मंदिर कहीं दिखाई नहीं देते।हालांकि मिजोरम भी पूरा ईसाई राज्य बन चुका है। पर यहां हिंदू मंदिर भी दिखाई देते हैं। बुअलपुई में सूमो एक होटल के आगे खाने के लिए रुकती है।
भूख तो लग गई है। होटल में शाकाहारी विकल्प भी है। 70 रुपये में चावल, दाल, सब्जी, भूजिया, सलाद की थाली। मैं एक थाली आर्डर कर देता हूं। सोनम होटल का खाना अच्छा है। होटल को महिलाएं चला रही हैं। यहां पर पीने की भी सुविधा उपलब्ध है।
बुअलपुई में 70 रुपये की थाली।
मिजोरम में अब शराब बिक्री को आंशिक अनुमति मिल चुकी है। अच्छी बात है कि यहां होटलों में खाने-पीने की दरें प्रकाशित हैं। कोई दरों को लेकर ठगी नहीं है। नास्ते की प्लेट 20 रुपये में उपलब्ध है। मछली चावल की थाली 130 रुपये की है। वहीं पोर्क और चिकेन की थाली भी इतने में ही उपलब्ध है।
खाने के बाद फिर शुरू होता है आगे का सफर। सूमो एजल की ओर एनएच 306 पर दौड़ रही है। सूमो में मेरी आगे वाली सीट पर बैठी है नीवा। बीटेक अंतिम वर्ष की छात्रा हैं आईजोल के एक सरकारी इंजीनियरिंग कालेज में। गुवाहाटी आईआईटी से रिफ्रेशर कोर्स करके लौट रही हैं।
नीवा को पहाड़ों के चक्कर घिन्नी वाले रास्ते में उल्टी की परेशानी है। वह पड़ोस की महिला से खिड़की वाली सीट मांगती है, फिर ड्राईवर से पानी मांगती है। मैं उसे हाजमोला और इमली वाली टाफी देता हूं। वह बताती है कि पहाड़ी सफर में उसे हमेशा परेशानी होती है। मैं उसे वही कुछ पुराने टिप्स देता हूं। लौंग चबाने की सलाह। नींबू और संतरे के छिलके की गंध लेते रहने की सलाह।
बातों बातों में पता चलता है कि नीवा के मातापिता बिहार के हैं। वे वैशाली जिले से आते हैं। पर कई दशक से मिजोरम सरकार की नौकरी में हैं। नीवा का जन्म आईजोल में ही हुआ है। तो वह शक्ल सूरत से बिहारी है, बातचीत और व्यवहार में मिजो लड़की जैसी।


नीवा को हिंदी ज्यादा नहीं आती। पर उसे मिजो भाषा और अंग्रेजी अच्छी आती है। इंजीनयरिंग की पढ़ाई पूरी होने वाली है। अब उसे जल्द नौकरी मिल जाएगी। वह अपने सहपाठी मिजो छात्रों के बारे में बताती है। वे खूब नशाखोरी करते हैं। अपने मिजोरम के कई और अनुभव साझा करती है। कई बार मिजो युवा नशाखोरी के लिए लूटपाट भी कर लेते हैं। तो उनसे थोड़ा सावधान ही रहने की जरूरत है। उसे मिजोरम की वर्तमान ललथनहावला की सरकार के कामकाज से भी शिकायत है। सरकार सड़कों और इन्फ्रास्ट्रक्चर पर ध्यान नहीं देती और अपनी नाकामियों के लिए असम सरकार कोसती है।
सफर में नीवा ने आईजोल शहर और उसके आसपास के बारे में काफी जानकारियां दीं, जो मेरे लिए बाद में उपयोगी साबित हुईं। टैक्सी से उतरते हुए उसने मुझे अपने घर आने के लिए भी आमंत्रित किया।
मेरे बगल में राजू ट्रक वाले बैठे हैं। वे रहने वाले तो हजारीबाग के हैं पर पिछले दो साल से मिजोरम में ट्रक चला रहे हैं। जब उन्हें पता चलता है कि मैं सासाराम का हूं तो बड़ी आत्मीयता से पेश आते हैं। कहते हैं – भैया इ जो सड़क के किनारे ऊंचा ऊंचा पहाड़ देख रहे हो ना इसमें जान बिल्कल नहीं है। इहवां का पहाड़ एकदमे कमजोर है। कबो कहीं पहाड़ गिर जाता है अउर रास्ता बंद। कहते हैं – मिजोरम में खाने पीने में बड़ा दिक्कत होता है। पर का करें ट्रक के लाइन में मजबूरी है। और बातों बातों में हमलोग आईजोल शहर के करीब पहुंच चुके हैं।   -        विद्युत प्रकाश मौर्य
(MIZORAM, SUMO, RAJU TRUCK, TRAVEL ) 

Friday, February 9, 2018

मिजोरम में पहुंच चुकी है रेलगाड़ी की छुकछुक

बैरबी में 21 मार्च 2016 को पहुंची पहली ब्राडगेज मालगाड़ी। 
बैरबी ( या भैरबी ) मिजोरम के कोलासिब जिले का एक छोटा सा शहर है जहां तक रेलवे लाइन पहुंच चुकी है। बैरबी से आईजोल की दूरी 117 किलोमीटर है।  काटाखाल बैरबी के बीच पहले मीटरगेज लाइन बिछाई गई थी जिसे अब ब्राडगेज में बदल दिया गया है। 2016 के मार्च के बाद बैरबी तक पैसेंजर ट्रेनों का संचालन भी हो रहा है। इसका स्टेशन कोड BHRB है।
काटाखाल जंक्शन से बैरबी की दूरी 83 किलोमीटर है। रास्ते में असम का हेलाकांडी और लालबाजार जैसे स्टेशन आते हैं। फिलहाल बैरबी एक मात्र रेलवे स्टेशन है जो मिजोरम में पड़ता है। सिलचर से बैरबी के लिए एक पैसेंजर ट्रेन का संचालन आजकल किया जा रहा है। यह अरुणाचल जंक्शन, काटाखाल जंक्शन होते हुए बैरबी पहुंचती है। यह 103 किलोमीटर का सफर 4 घंटे में पूरा करती है। इस लाइन की सही उपयोगिता तब होगी जब यह आईजोल तक पहुंच जाएगी। अभी सुबह एक ट्रेन बैरबी से चलती है और शाम को यह सिलचर से वापस होती है बैरबी के लिए।
21 मार्च 2016 को जब पहली ब्राडगेज की मालगाड़ी बैरबी रेलवे स्टेशन पर पहुंची तो मिजोरम के लोगों ने उसका भाव भरा स्वागत किया। ट्रैक पर लोगों की भीड़ थी। लोकोमोटिव को फूलों से लाद दिया गया था। यह मिजोरम के लोगों के लिए ऐतिहासिक मौका था।
बैरबी से साइरंग (आईजोल) को रेल से जोड़ देने का  संशोधित लक्ष्य मार्च 2019 रखा गया है। बैरबी से आगे साइरंग तक रेलवे लाइन का विस्तार हो रहा है जो आईजोल जिले में है। यह राजधानी आईजोल का निकटतम रेलवे स्टेशन होगा। साइरंग से आईजोल शहर की दूरी 20 किलोमीटर होगी। 11 नवंबर 2016 को तत्कालीन रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने साइरंग रेलवे स्टेशन के निर्माण की आधारशिला रखी। बैरबी से साइरंग की रेलवे से दूरी 50.38 किलोमीटर होगी। रेलमार्ग से देखें तो सिलचर से आईजोल की दूरी 20 किलोमीटर कम हो जाएगी।
फिलहाल बैरबी कोलसिब से सड़क मार्ग से संपर्कित है। कोलसिब से बैरबी की दूरी 36 किलोमीटर है। अगर आप बैरबी तक ट्रेन से पहुंचते हैं तो बैरबी में भी जिला प्रशासन ने आईएलपी का बनाने का काउंटर शुरू कर दिया है। अभी सिलचर से मिजोरम की राजधानी आईजोल जाना हो तो बैरबी तक का सफर ट्रेन से करना व्यवहारिक नहीं है। इसलिए ज्यादातर लोग सीधे सूमो से सिलचर से आईजोल जाना पसंद करते हैं। काटाखाल जंक्शन से साइरंग की रेल मार्ग से कुल दूरी 135 किलोमीटर होगी।
2011 में यूपीए सरकार के दौरान काटाखाल से बैरबी मीटरगेज लाइन को ब्राडगेज में बदलने के लिए राष्ट्रीय महत्व के प्रोजेक्ट के तौर पर पास किया गया। वैसे काटाखाल से बैरबी तक मीटरगेज रेलवे लाइन का इतिहास बहुत पुराना है। 


बराक घाटी रेलवे निर्माण के बाद 1899 में ही बैरबी तक मीटरगेज लाइन का निर्माण हो चुका था। यह असम रेलवे द्वारा निर्मित था और बराक घाटी रेलवे के नेटवर्क का हिस्सा था। इस पर पैसेंजर गाड़ी और मालगाड़ी का संचालन किया जाता था। इस रेलमार्ग का बड़ा हिस्सा असम के हेलाकांडी जिले से होकर गुजरता है जो देश के सबसे गरीब इलाकों में शुमार है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य 

( BAIRABI, BHRB, MIZORAM RAIL ) 

Thursday, February 8, 2018

काली और दुर्गा का मेल हैं मां कांचा कांति

सिलचर शहर के पास उधारबंद में स्थित कांचा कांति मंदिर असम के कछार इलाके के अत्यंत सुंदर और प्रमुख पूजा स्थल में शामिल है। कछार के लोगों की कांचा कांति देवी में असीम आस्था है।
इस मंदिर का निर्माण कछार के शासकों ने 1806 में करवाया था। कहा जाता है कि राजा को सपने में माता ने दर्शन देकर मंदिर बनवाने की प्रेरणा दी। पर पुराना मंदिर जीर्णशीर्ण हो जाने पर मंदिर समिति ने नए भव्य मंदिर का निर्माण 1978 में करवाया। मंदिर का परिसर साफ सुथरा और मनोरम है। कांचाकांति देवी के बारे में कहा जाता है कि वह काली और दुर्गा दोनों का सम्मिलित स्वरूप हैं।

मंदिर में जो माता का स्वरूप है वह सुनहले रंग की है। चार भुजाओं वाली देवी की प्रतिमा का सौंदर्य देखते ही बनता है। रोज यहां हजारों की संख्या में श्रद्धालु माता का आशीर्वाद लेने पहुंचते हैं। लोग मंदिर की प्रदक्षिणा करके खुद को धन्य समझते हैं। मंदिर परिसर का  वातावरण है वह आपको सौंदर्य के साथ आध्यात्मिकता का एहसास कराता है।
कांचाकांति मंदिर के बगल में भगवान शिव का भी मंदिर है। परिसर में मंदिर समिति का दफ्तर है। यहां दर्शन के लिए सालों भर पहुंचा जा सकता है। किसी जमाने में इस मंदिर में भी बलि का रिवाज था। पर अब यह परंपरा बंद हो चुकी है। कछार के लोगों का मानना है कि कांचाकांति जागृत देवी हैं और वे लोगों की मुरादें पूरी करने वाली हैं। नवरात्र के समय यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। मंदिर में आपको ठगी करने वाले पंडा या पुजारी बिल्कुल नहीं मिलेंगे। आप अपनी श्रद्धा से यहां पूजा पाठ कर सकते हैं।

यहां हर रोज विवाह शादी, जन्मदिन व अन्य धार्मिक अनुष्ठान होते रहते हैं। बराक घाटी, त्रिपुरा, मणिपुर और उत्तरी कछार (डिमा हसाओ) के लोग सपरिवार यहां मनौती मांगने और पूरा होने पर अनुष्ठान करने आते हैं।इस क्षेत्र के लोगों में कांचाकांति मां का वही सम्मान है जो गुवाहाटी में मां कामाख्या का।
कांचाकांति मंदिर के आसपास छोटा सा बाजार है। यहां प्रसाद की दुकानों के अलावा खाने पीने की अच्छी और सस्ती दुकाने हैं। खासतौर पर पूरी सब्जी और जलेबी का स्वाद यहां लिया जा सकता है।

कैसे पहुंचे – कांचा कांति मंदिर की दूरी सिलचर शहर के कैपिटल प्वाइंट से 11 किलोमीटर है। सिलचर शहर के सदरघाट से उधारबंद के लिए शेयरिंग टैक्सी मिल जाती है। जिसका किराया 10 रुपये है। अगर सिलचर एयरपोर्ट से आना हो तो उधारबंद कस्बे की दूरी 15 किलोमीटर है। उधारबंद टैक्सी स्टैंड से मंदिर 300 मीटर की दूरी पर है। आप एयरपोर्ट जाने के क्रम में भी मंदिर का दर्शन करते हुए आगे का सफर कर सकते हैं।

शाम का माता के दरबार में - मैं शाम को कांचाकांति मंदिर पहुंचा हूं। सदर घाट से एक कार मिल गई उसमें 10 रुपये देकर मैं अकेला ही मंदिर तक पहुंचा हूं। सदर घाट में बराकनदी का पुल पार करने के बाद रंगपुर का इलाका आता है। आगे एक चौराहे से सीधा रास्ता तो जिरीबाम चला जाता है। बायीं तरफ मुडने पर गुवाहाटी जाने वाला एनएच 54 पर गाड़ी कुछ किलोमीटर दौड़ती है। उसके बाद दाहिनी तरफ वीआईपी रोड पर चल पड़ती है।यह सड़क एयरपोर्ट की ओर जा रही है।
मंदिर परिसर में कुछ स्कूली बच्चों से मुलाकात हुई जो किसी स्पोर्ट्स मीट में हिस्सा लेने यहां पहुंचे हैं। दर्शन के बाद वापस लौटते हुए उधारबंद के बाजार में जलेबी और समोसा खाता हूं। वापसी में मारूति वैन मिलती है। इसके ड्राईवर सियाराम यादव बिहार के दरभंगा के हैं। पर 70 के दशक से इधर ही रह रहे हैं। पहले एक चाय की फैक्ट्री में नौकरी की। तीन साल पहले 60 की उम्र में रिटायर हो गए। तब घर बैठना अच्छा नहीं लगा तो टैक्सी चला रहे हैं। 64 की उम्र में पूरे फीट हैं।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य 
( KANCHAKANTI TEMPLE, UDHARBAND, SILCHAR ) 
उधारबंद में पान सुपारी का बाजार...