Wednesday, February 28, 2018

सिलचर शहर में एक बार फिर- कछार की राजधानी

सिलचर के सोनाई रोड पर आईजोल से आई सूमो छोड़ने के बाद पैदल आगे निकल पड़ा। मुझे एक रात इस शहर में रुकने के बाद सुबह अगरतला की ट्रेन पकड़नी है। सामने सड़क पर एक भवन के ऊपर किंगफिशर का विमान नजर आता है। नजदीक से देखा तो वह विमान नहीं बल्कि उसकी प्रतिकृति है। 
नेताजी सुभाष चौराहा से आगे रंगीरखारी चौराहा, एनएस रोड पर चलता हुआ नाजिर पटट्टी पहुंचा हूं। यह सिलचर शहर का मुख्य बाजार है। सिलचर गुवाहाटी के बाद असम का दूसरा प्रमुख शहर है। यों समझिए कि यह कछार प्रदेश की राजधानी है। असम विश्वविद्यालय, एनआईटी सिलचर की मौजूदगी इसे शिक्षा का बड़ा केंद्र बनाते हैं। पूरे कछार के अलावा मणिपुर, मिजोरम का प्रवेश द्वार होने के कारण यह इस इलाके का बड़ा शॉपिंग हब भी बन चुका है। रेलवे का बड़ा स्टेशन होने के साथ ही सिलचर वायु मार्ग से भी कोलकाता, गुवाहाटी जैसे शहरों से जुड़ा हुआ है।
पैदल चलते हुए मुझे सामने बिग बाजार नजर आ रहा है। जिस शहर में बिग बाजार पहुंच गया तो समझो वह बड़ा शहर तो हो ही गया। मुझे एक सस्ते होटल की तलाश है। बिग बाजार के सामने होटल अंजलि में एक कमरा मिला डबल बेड 350 रुपये में। कमरा संतोषजनक है। टीवी लगा हुआ है। कमरे का आकार भी बड़ा है। शाम को होटल के मैनेजर बापी से परिचय हुआ और खूब बातें हुईं। वे घूमने का शौक रखते हैं तो मुझसे कई सलाह ली। मैंने भी उनसे सिलचर के बारे में थोड़ी जानकारी ली।
इसके बाद घूमने निकल पड़ा। सिलचर में  बाजार कोलकाता का शोरुम दिखाई दिया। वहां वाजिब डिस्काउंट मिलता हुआ दिखा तो एक ट्रैक सूट और एक डफल बैग खरीद डाला।
सिलचर के बाजार में मिठाई की दुकान पर एक बार फिर पाटी सपटा का आनंद लिया। इससे पहले पाटी सपटा मालदा टाउन में खाया था। तो आपको पता ही होगा कि बाहर से देखने में मिनी मसाला डोसा की तरह होता है पर इसमें खीर भरी रहती है। दोपहर का खाना मां होटल में खाया। 60 रुपये मे शाकाहारी थाली। भरपेट खाइए। होटल काफी साफ सुथरा है। नाम भी बड़ा भावों से भरा है मां होटल। आगे बढ़ने पर खुदीराम बोस की प्रतिमा नजर आती है। उसके बाद सिलचर  का ऐतिहासिक कछार क्लब की इमारत। मैं पैदल चलते चलते कैपिटल प्वाइंट पहुंच गया हूं।

यह वही कैपिटल प्वाइंट है जहां से इंफाल और आईजोल के लिए टैक्सियां बुक होती हैं। शाम को यहां स्ट्रीट फूड की बहार है। पिछली बार की सिलचर यात्रा में मैं कैपिटल प्वाइंट पर ही नटराज होटल में ठहरा था। ये ईंटखोला बाजार का इलाका है। शाम को वापसी में सिलचर के कुछ और बाजार का मुआयना करता हूं। यहां आपको दुकानों में मणिपुरी परिधान और मिजोरम के परिधान मिल जाएंगे।
रात का खाने के लिए निकलता हूं तो हमारे होटल के स्टाफ राना घर में खाने की सलाह देते हैं। यह एक नया होटल खुला है। इसका डेकोर काफी अच्छा है। खाने का स्वाद भी काफी बेहतर है। 60 रुपये की थाली में उन्होंने खीर भी परोसी।  
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
(SILCHAR, MAA HOTEL, ANJALI HOTEL, RANA GHAR ) 
सिलचर के बाजार में पाटी सपटा। 

Tuesday, February 27, 2018

चंफाई न जा पाने का अफसोस और वापसी

मिजोरम यात्रा में मेरी पूरी कोशिश चंफाई जाने की थी। इसके लिए हमने दो दिन सुरक्षित कर रखा था। पर ऐसा हो न सका। वास्तव में 25 दिसंबर से लेकर 3 जनवरी तक हर साल मिजोरम उत्सव मनाता है। इस दौरान पूरी तरह छुट्टियां होती हैं। छुट्टियां मतलब की छुट्टियां। दुकान बाजार बंद। टैक्सी सूमो भी बंद। तो भाई साहब आईजोल से चंफाई की शेयरिंग टैक्सी सेवाएं भी बंद थीं। एक जनवरी को बंद, दो जनवरी को बंद। तो हमने आईजोल और आसपास घूमने के बाद वापस लौटना तय किया। गनीमत है कि आईजोल से सिलचर और करीमगंज के लिए टैक्सी सेवाएं चल रही हैं।
दो जनवरी की सुबह। आईजोल शहर में हल्की बारिश ने और ठंड बढ़ा दी है। मैं जारकोट मिलेनियम सेंटर के आसपास टैक्सी स्टैंड पर जाकर सुबह 5 से 6 बजे के बीच अच्छी तरह पड़ताल कर लेता हूं। कोई टैक्सी चंफाई नहीं जा रही है। राजू ने कहा था कि वह अपनी गाड़ी लेकर चंफाई जाएगा। पर राजू का फोन नहीं लग रहा।

अब मैं सिलचर वापस जाने का तय करता हूं। जारकोट से वापसी के लिए सूमो में सीट बुक करा लेता हूं। खिड़की वाली सीट मिल गई है। अब सूमो के भरने का इंतजार है। टैक्सी स्टैंड में एक मिजो दंपत्ति चाय बना रहे हैं। सर्दी की सुबह में हल्की बारिश के बीच चाय पीने का मजा ही कुछ अलग है। चाय पीते हुए देखता हूं वे पूरियां भी तल रहे हैं। तो 20 रुपये में चार पूरियां और सब्जी के 10 रुपये अलग से। सुबह का हल्का नास्ता हो गया। लो अब सूमो भी भर गई। सुबह सात बजे वापसी का सफर शुरू हो गया।

रास्ता जाना पहचाना है। वही रास्ता जिससे आना हुआ था। पर सुबह की बारिश में बादल पेड़ो से अटखेलियां करते नजर आ रहे हैं। कुछ किलोमीटर चलने के बाद लेंगपुई एयरपोर्ट की ओर जाने का संकेतक नजर आता है। अब आईजोल तक  रेल नेटवर्क का काम चल रहा है। इसके बाद रेल साइरांग तक आ जाएगा। यह आईजोल से 20 किलोमीटर रह जाएगा। वापसी में भी सूमो वाले  सुबह नास्ते के लिए एक ढाबे में रुकते हैं। पर मैं नास्ता कर चुका हूं आईजोल में ही। टैक्सी आगे चल पड़ती है। कोलासिब में कुछ सवारियां उतर गईं। एक मिजो महिला जो अपने तीन बच्चों के साथ थी, उसकी मंजिल यहीं तक थी। सूमो वाले कुछ देर यहां रुकते हैं। नई सवारियों के इंतजार में। पर कोई नहीं आता। हमलोग आगे बढ चले। बादलों के संग संग सफर जारी है। धूप शरमा कर कहीं छिप गई है।
सूमो के ड्राईवर को डीजल चाहिए। पंप पर खत्म है। वे घर के आगे रुकते हैं। वह बड़े गैलन में डीजल लेकर आता है। एक पाईप के सहारे सूमो में डीजल भरा गया। खुराक मिलने पर गाड़ी आगे बढ़ी। सड़क पर कुछ मिजो महिलाएं और बच्चे टहलते नजर आ रहे हैं। मैं उन्हें अलविदा कहता हूं। हम एक बार फिर असम के कछार में प्रवेश कर गए हैं।अब धूप निकल आई है। दोपहर हो गई है और हमारी सूमो सोनाई रोड पर दौड़ रही है। सिलचर के मिजोरम हाउस पहुंचने पर सूमो का सफर शेष हो गया। पर मेरा सफर...सफर तो अभी जारी है। फिलहाल अलविदा मिजोरम।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य
(MIZORAM, RETURN, AIZAWL) 

Monday, February 26, 2018

मिजोरम शाकाहारियों को ज्यादा परेशानी नहीं...

आईजोल में हमारा ठिकाना था होटल चीफ। जारकोट में स्थित पांच मंजिला इस होटल में 40 से ज्यादा कमरे हैं। वैसे जारकोट में और भी कई होटल हैं। कई होटल महंगे भी हैं तो कई सस्ते भी।
चांदमारी रोड पर मिलेनियम होटल है, जिसमें 400 रुपये प्रतिदिन के कमरे भी उपलब्ध है। (अरुण कुमार मैनेजर – 9089525223 ) इसके मैनेजर बिहार में वैशाली जिले के हैं। मिलेनियम होटल में रेस्टोरेंट भी है। यहां 80 रुपये की उत्तर भारतीय शाकाहारी थाली उपलब्ध है। इसमें तवे की रोटी मिल जाती है। आईजोल में जारकोट के अलावा कुछ और इलाके में इससे भी सस्ते होटल हैं। यहां एक गुरुद्वारा भी है। इससे पता चलता है कि शहर में थोड़ी सिख आबादी भी है।
हमें आदित्य गौतम ने चांदमारी रोड पर एक और होटल के बारे में बताया जहां पर उत्तर भारतीय खाना वाजिब दाम पर उपलब्ध हो जाता है। उसका नाम है जोजो कैफे एंड रेस्टोरेंट। चांदमारी चर्च के पास ही केएफसी का आउटलेट है। यहां पर आपको वेज बर्गर मिल सकता है।
बाकी आईजोल में अगर आप विशुद्ध शाकाहारी थाली या भोजनालय की तलाश करेंगे तो आपको निराशा हाथ लग सकती है। पर शाकाहारी लोग बिरयानी, बर्गर आदि खाकर काम चला सकते हैं। असम राइफल्स की कैंटनी में समोसा और पूरी मिल सकता है।
सुबह सुबह जारकोट टैक्सी स्टैंड के पास चाय के साथ पूरी सब्जी की दुकान फुटपाथ पर दिखाई दी। पति पत्नी मिलकर ये दुकान चला रहे थे। 20 रुपये में 4 पूरी। कोई बुरा सौदा नहीं है। बाकी आपको गोलगप्पा और हवा मिठाई भी यहां खाने को मिल सकता है।
बेकरी और बिस्कुट आदि तो खरीद ही सकते हैं। यहां आपको मुरमुरे (भेलपुरी) का रेडिमेड पैकेट मिल जाता है। कोलकाता की कंपनियों के बने ये पैकेट 5 और 10 रुपये के हैं। मैं इन्हें खरीदकर बैग में रख लेता हूं।इमरजेंसी में ये नास्ते के रुप में सहायक सिद्ध होते हैं।

मिजोरम में हिंदी - मिजोरम के एक चर्च में हिंदी सर्विस का बोर्ड दिखाई देता है। द्वारपुई चर्च में हर रविवार को दोपहर 3 बजे हिंदी सर्विस होती है।यानी यहां ऐसे लोगों को ख्याल रखा गया है जो सिर्फ हिंदी समझ सकते हों। बाकी ज्यादातर चर्च में प्रार्थना मिजो भाषा में होती है।
मैं शाम को जारकोट के चर्च में पहुंचा हूं। वहां सारी प्रार्थना और संगीतमय कार्यक्रम मिजो भाषा में हो रहे हैं।  पर एक जगह मुझे ज्ञानदीप हिंदी प्रशिक्षण संस्थान का बोर्ड नजर आता है। यहां पर लिखा है कि चौथी कक्षा से ऊपर के लिए हिंदी और स्पोकेन इंग्लिश की कोचिंग उपलब्ध है। मतलब कि यहां कुछ लोग हिंदी जरूर सीखना चाहते हैं।
महंगी बाइक का टशन – पूरे आईजोल शहर में मुझे कहीं सस्ती बाइक या स्कूटर के दर्शन नहीं हुए। यहां लोग महंगी बाइक शौकीन हैं। बजाज या हीरो के बेसिक माडल यहां दिखाई नहीं देते। 70 हजार से लेकर 2 लाख तक के बीच के स्टाइलिश बाइक और स्कूटर रखने का चलन है यहां लोगों के बीच। स्कूटी में भी लोग यहां स्टाइलिश गाड़ी रखना चाहते हैं। एक्टिवा  की तुलना में यामहा की गाड़ियां ज्यादा दिखाई दे रही हैं। कई विदेशी माडल के बाइक भी आईजोल की सड़कों पर दिखाई दे रहे हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य

Sunday, February 25, 2018

हरे भरे जंगलों का राज्य है मिजोरम

जब हमने आईजोल में साईलो साहब को बताया कि मैं सिलचर का विमान से और उसके बाद सड़क मार्ग से चलकर मिजोरम पहुंचा हूं तो उन्होंने कहा ये अच्छा रहा क्योंकि इससे आप मिजोरम की हरीतिमा का नजारा करते हुए पहुंचे हैं। वैसे आप मिजोरम के एकमात्र एयरपोर्ट लेंगपुई पहुंचते हैं तो वहां से भी तकरीबन 35 किलोमीटर सड़क मार्ग से चलकर राजधानी आईजोल पहुंचना पड़ेगा।
तो बात हरियाली की करें तो मिजोरम का कुल 84 फीसदी हिस्सा वन क्षेत्र है. ये आंकड़ा 2017 का है। इससे पूर्व 91 फीसदी हिस्सा वन क्षेत्र था. तो भला हरियाली का सम्राज्य क्यों न होगा। और जाहिर यहां प्रदूषण अभी समस्या नहीं हो सकती। प्रकृति खूब खुश होकर राज्य को अपनी नेमतें बख्शी हैं।
मिज़ोरम में प्राकृतिक सौंदर्य बिखरा पड़ा है। यह क्षेत्र विभिन्न प्रजातियों के प्राणियों और वनस्पतियों से संपन्न है। मिजो लोग मूलतः किसान होते हैं। इसलिए उनका मूल कामकाज और त्योहार भी जंगल की कटाई करके की जाने वाली झूम खेती से ही जुड़े हैं। मिजो लोग बेहतरीन बुनकर भी होते हैं।
मिजोरम की कुल आबादी के 80 प्रतिशत लोग कृषि कार्यों में लगे हैं। कृषि की मुख्य प्रणाली झूम या स्थानांतरित कृषि है। अनुमानित 21 लाख हेक्टेयर भूमि में से 6.30 लाख हेक्टेयर भूमि बागवानी के लिए उपलब्ध है। वर्तमान में 4127.6 हेक्टेयर क्षेत्र पर ही विभिन्न फसलों की बागवानी की जा रही हैजो कि अनुमानित संभावित क्षेत्र का मात्र 6.55 प्रतिशत है। इससे पता चलता है कि मिज़ोरम में अभी बागवानी फसलों के फलने-फूलने की विस्तृत संभावनाएं हैं। बागवानी की मुख्य फसलो में यहां मैडिरियन संतराकेलासादे फलअंगूरहटकोडाअनन्नास और पपीता आदि शामिल हैं। राज्य में एंथुरियमबर्ड आफ पेराडाइजआर्किडक्रायसेंथेममगुलाब तथा अन्य कई मौसमी फूलों की खेती होती है।
अगर मसालों की बात करें तो इनमें अदरकहल्दीकाली मिर्चमिर्चें (चिड़ा की आंख वाली मिर्चें भी उगाई जाती हैं। यहां के लोक पाम आयलजड़ी-बूटियों तथा सुगंध वाले पौधों की खेती भी आजकल बड़े पैमाने पर करने लगे हैं।

राज्य के पर्यटन स्‍थल  - समुद्र तल से लगभग 4,000 फुट की ऊंचाई पर स्थित पर्वतीय नगर आइजोलमिजोरम का एक धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र है। राज्य में म्यामांर की सीमा के निकट चमफाई एक सुंदर पर्यटन स्थल है। यहां तामदिल एक प्राकृतिक झील है जहां मनोहारी वन है।

यह आइज़ोल से 80 किलोमीटर और पर्यटक स्थल सैतुअल है। वानतांग जलप्रपात मिज़ोरम में सबसे ऊंचा और अति सुंदर जलप्रपात है। यह थेनेज़ोल कस्बे से पांच किलोमीटर दूर है। जोबाक के निकट जिला पार्क में अल्पाइन पिकनिक हट तथा बेरो त्लांग में मनोरंजन केंद्र भी बनाए गए हैं।
एजल के आसपास की खूबसूरती का लुत्फ उठाना हो तो 16 किलोमीटर दूर स्थित बुंग नामक पिकनिक स्पॉट को देखने जा सकते हैं। आईजोल से करीब 85 किलोमीटर दूर स्थित तामदिल झील पर्यटकों को सुखद अहसास कराती है। यहां रंग-बिरंगी मछलियों को जलक्रीड़ा करते देखा जा सकता है। राजधानी से करीब 142 किलोमीटर दूर हिल स्टेशन थेंजावल हैयहां राज्य का सबसे ऊंचा जलप्रपात वंतावांग है। इसकी ऊंचाई 750 फीट है। यहां रहने के लिए कॉटेज उपलब्ध हैं।

आईजोल से करीब 192 किलोमीटर की दूरी पर स्थित चंफाई कारोबारी शहर होने के साथ ही प्राकृतिक खूबसूरती से भरा है। यहां के हरे-भरे चावल के खेत और पड़ोसी देश म्यामां की पहाड़ियां देखी जा सकती हैं। चंफाई से पांच किलोमीटर दूर रूएंतलैंग गांव हैजहां मिजो लोगों के पुराने रहन-सहन को अब तक देखा जा सकता है। 

-        विद्युत प्रकाश मौर्य

Friday, February 23, 2018

मिजोरम का ताजमहल - आईजोल का सालमन टेंपल

एक जनवरी शाम आईजोल के सालमन टेंपल के नाम रही। यह आईजोल शहर का प्रमुख आकर्षण का केंद्र है। वास्तव में यह एक चर्च ही है पर इसे काफी सुंदरता के सजाया संवारा गया है। इसलिए यह आईजोल शहर का प्रमुख केंद्र बन गया है जहां पर लोग शाम को बड़ी संख्या में पहुंचते हैं।
एक बाइक टैक्सी वाले से बात की। सालमन टेंपल चलना है। उन्होंने 200 रुपये कहा। मैंने कहा वापस भी लेकर आना है। वे 500 बोले। फिर 400 में सौदा हुआ। यह भी कि जितनी देर मैं वहां मंदिर देखूंगा वे मेरा इंतजार करेंगे। पर मंदिर पहुंचकर वे बोले मैं भी अंदर चलूंगा। तो वे पूरे समय हमारे साथ रहे। वे हमारी फोटो खिंचते रहे और मैं उनकी।  दरअसल वे भी पहली बार सालमन टेंपल देखने पहुंचे थे। मंदिर के परिसर में घूमते हुए उनकी कुछ महिला मित्र भी मिल गईं। बोले उनके साथ भी हमारी फोटो खींच दो। बाइक टैक्सी वाले भाई का नाम है रौता ( फोन नंबर 0 84158 55077 )

सालमन टेंपल आईजोल शहर से पश्चिम की तरफ 10 किलोमीटर दूर किडरौन घाटी में बना हुआ है। कई एकड़ में बने इस धार्मिक स्थल का परिसर बड़ा ही मनोरम है। इसका मिजो में नाम कोहरान थिंगलिम चर्च भी है। इसके निर्माण को लेकर इसके संस्थापक एलबी साइलो को 1991 में एक स्वप्न आया। उसके बाद उन्होंने एक आकर्षक चर्च का निर्माण कराना तय किया। साइलो राज्य के पशुपालन विभाग में अधिकारी थे। 23 दिसंबर 1996 को इस चर्च की आधारशिला रखी गई।

चर्च के मुख्य हॉल में एक साथ 2000 लोग बैठकर प्रार्थना कर सकते हैं। जबकि इसके परिसर में एक साथ 10 हजार लोग का जमावड़ा हो सकता है। मुख्य प्रार्थना कक्ष हर तरफ से 180 फीट का है। मुख्य प्रार्थना कक्ष के चारों तरफ गलियारा है जिसमें काफी लोग एकत्र हो सकते हैं। मुख्य भवन में कुल 12 द्वार हैं। इनमें से हर तरफ तीन द्वार बनाए गए हैं। इसके निर्माण में मंदिर समिति के सदस्यों के अलावा दुनिया भर से चंदा एकत्र किया गया है।
संगमरमर की सुरम्य संरचना- सालमन टेंपल का निर्माण सफेद संगमरर पत्थरों से हुआ है। इन पत्थरों को राजस्थान से यहां लाया गया है। सूर्य की रोशनी में और बादलों के बीच में इसकी सुंदरता देखने लायक होती है। इसके निर्माण में 30 लाख अमेरिका डॉलर यानी 21 करोड़ रुपये से ज्यादा की अनुमानित लागत आई है। इसका नाम पवित्र बाइबिल के ओल्ड टेस्टामेंट के किंग डेविड के बेटे किंग सालमन के नाम पर रखा गया है। किंग सालमन ने पहला स्थायी हाउस ऑफ गॉड का निर्माण कराया था।

सालमन टेंपल परिसर में प्राकृतिक वन भी है, जिसमें अलग अलग तरह के फूल और पौधे लगाए गए हैं। चर्च में हर रविवार को  आफिशियल सर्विस होती है। बाकी श्रद्धालुओं के लिए मंदिर हर रोज खुला रहता है। मंदिर का औपचारिक उदघाटन 25 दिसंबर 2017 को हुआ। यानी करीब 23 साल में मंदिर बनकर तैयार हुआ है।
सालमन टेंपल में प्रवेश के लिए 20 रुपये की टिकट है। परिसर के बाहर पार्किग का इंतजाम है। प्रवेश टिकट काउंटर से आप स्मृति चिन्ह के तौर पर चाबी रिंग जैसी कुछ चीजें खरीद सकते हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार के पास एक कैंटीन भी है।
सालमन टेंपल को घूमने के लिए दो घंटे का वक्त चाहिए। मंदिर का परिसर इतना सुंदर है कि यहां से जल्दी जाने की इच्छा नहीं होती। रंगबिरंगे फूलों और झांकियों के बीच आपको तस्वीरें खिंचवाने के लिए यहां अनगिनत मौके मिलते हैं। इसलिए हर उम्र के लोगों को इसका परिसर खूब पसंद आता है। मंदिर परिसर की झांकिया जीसस क्राइस्ट और ईसाई मान्यताओं और प्रतीकों से जुड़ी हुई हैं। पर परिसर में चारों तरफ सैर करना आपको काफी आनंदित करता है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
(SOLOMONS TEMPLE, KIDRON VALLY, AIZAWL )




Thursday, February 22, 2018

मिजोरम का समाज और चर्च का प्रभाव

मिजोरम राज्य के लोगों के दैनिक जीवन, सामाजिक कार्य और राजनीति में चर्च का काफी प्रभाव है। मिजोरम राज्य की आबादी 11 लाख है। राज्य की 91 फीसदी से ज्यादा आबादी साक्षर है। साक्षरता के प्रतिशत के लिहाज से यह देश के सबसे अग्रणी राज्यों  में है। आबादी के घनत्व के लिहाज से यह प्रति वर्ग किलोमीटर सबसे कम आबादी वाले राज्यों में है। राज्य का 91 फीसदी हिस्सा वनाच्छादित है। जाहिर है आबोहवा अच्छी होगी। राज्य की 95 फीसदी आबादी जनजातीय है। राज्य की कुल आबादी में ईसाई धर्म मानने वालों की संख्या 87 फीसदी है। मिजोरम की 722 किलोमीटर चौहद्दी अंतरराष्ट्रीय सीमा है जो म्यांमार और बांग्लादेश से लगती है।
राज्य के उत्तरी इलाके ईसाई प्रेसबिटिरियन संप्रदाय से जुड़े हैं तो दक्षिणी इलाके वाले बैपटिस्ट हैं। 1849 में पहली बार मिजो इलाके में ब्रिटिश अधिकारियों के पांव पड़े। 1895 में मिजो हिल्स पर ब्रिटेन के कब्जा हो चुका था। 1898 में ब्रिटिश भारत ने इस क्षेत्र को असम का हिस्सा बना लिया। इसका नाम लुसाई हिल्स जिला रखा गया और इसका मुख्यालय आईजोल में बना।
बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में यहां ईसाई मिशनरियों का आगमन शुरू हुआ और धीरे धीरे सारा जनजातीय समाज यहां ईसाई बनने लगा। राज्य की भाषा मिजो है। मिज़ो भाषा की अपनी कोई लिपि नहीं है। इसे अंग्रेजी स्क्रिप्ट में ही लिखा जाता है। चर्च ने ही यहां की भाषा के लिए रोमन स्क्रिप्ट को अपनाया।
मिजोरम के जनजातीय समाज में कुकी और लुसाई लोग प्रमुख हैं। कुकी लोग उत्तर पूर्वी मिजोरम में बसते हैं। मिजोरम में पाहते, पई और राल्ते मार या लाखेर इत्यादि उपशाखाओं वाला जनजातीय समाज भी है।
मणिपुर और मिजोरम में रहने वाले नेई मेनाशे समुदाय के लोगों का कहना है कि वे इजरायल से नाता रखते हैं। नेई मेनाशे लोगों में मिजो, कुकी और चिन समुदाय के लोग शामिल हैं जो तिब्बती-बर्मी भाषा बोलते हैं। समझा जाता है कि उनके पूर्वज करीब सैकड़ों साल पहले यहां आ बसे। 19वीं सदी में उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया।

सबसे ज्यादा अंतर्जातीय विवाह - भारत में सबसे ज़्यादा अंतर्जातीय विवाह मिजोरम में होते हैं। नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकॉनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) के एक सर्वे से ये बात पता चली है। मिजोरम में 55 प्रतिशत शादियां अंतर्जातीय होती है। एनसीएआईआर की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 95 फीसदी शादियां समान जाति में होती है, लेकिन मिजोरम इसका अपवाद है।
 क्रिसमस और नए साल की धूम
क्रिसमस का त्योहार आने के साथ ही मिजोरम में क्रिसमस कैरल्स (मंगलगीत) की धुन हर गांव में सुनाई देने लगती है। ईसाई बहुल राज्य में अभी भी त्योहार का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे पारंपरिक सामुदायिक भोज का आयोजन होता है। गांवों या आसपास के इलाकों से आए लोग जुट जाते हैं। ये लोग एकसाथ मिलकर इस तरह के भोज का आयोजन करते हैं जिसमें मुर्गे, मछली, हरी सब्जियों और सलाद के अलावा पोर्क (सूअर का मांस) और बीफ (गाय का मांस) का बना व्यंजन परोसा जाता है।

शाम को मैं इधर ऊधर की सैर के बाद जारकोट चर्च पहुंचता हूं। यह आईजोल शहर का प्रमुख चर्च है। यहां नए साल की पहली संध्या पर विशेष प्रार्थना सभा आयोजन हो रहा है। चर्च के मुख्य हॉल में मैं जाकर बेंच बैठ जाता हूं। तकरीबन एक घंटे संगीतमय प्रार्थना और प्रवचन सुनता हूं। हालांकि भाषा मेरे पल्ले नहीं पड़ रही है। पर देख रहा हूं कि आईजोल का सबसे पॉश समुदाय यहां जुटा हुआ है। बड़ी संख्या महिलाएं भी हैं। 24 दिसंबर से 3 जनवरी तक जिस तरह मिजोरम में छुट्टी और उत्सव मनाने का वातावरण बना रहता है उससे महसूस किया जा सकता है कि मिजो समाज में चर्च किस तरह समाया हुआ है। राज्य की राजनीति की दशा और दिशा तय करने में भी चर्च की प्रमुख भूमिका है। साल 2016 में यहां चर्च के कुछ प्रतिनिधियों ने योग दिवस का भी विरोध किया था।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  (MIZORAM, CHURCH ) 

Wednesday, February 21, 2018

आईजोल शहर में नीवा के घर

आईजोल की राजधानी ट्रेजरी स्क्वायर पर टहलते हुए याद आया कि नीवा ने मुझे अपने घर आने का आमंत्रण दिया था। कौन नीवा, वही जिसकी हमने आईजोल आते समय सूमो में मुलाकात की बात पीछे की थी। हमारे पास समय था तो सोचा चलते हैं नीवा के घर। फोन मिलाया। उसने घर आने का रास्ता बता दिया। वैसे तो आईजोल में सिटी बसें चलती हैं पर छुट्टी का दिन होने के कारण मामला ठंडा है। सड़कों पर सिटी बसें कम दिखाई दे रही हैं। सामने राजभवन वाले चौराहे पर कुछ हवा मिठाई और गोलगप्पे वाले बैठे हैं। यहां भी गोलगप्पा। तो गोलगप्पा को क्यों न राष्ट्रीय खाद्य भोज्य पदार्थ घोषित कर दिया। उत्तर-दक्षिण-पूरब पश्चिम सब जगह तो मिलता है। सिर्फ नाम बदल जाता है। बिहार में घुपचुप, झारखंड में फोकचा। दिल्ली में गोलगप्पा तो मुंबई में पानीपूरी। 
बस नहीं है तो मैं पैदल ही चल पड़ता हूं। लोगों से रास्ता पूछता हुआ। पहुंचना है खतला। अपर खतला पहुंचकर एक बार फिर पूछता हूं। आईजोल कालेज के आसपास पहुंचना है। बंधन बैंक के पास नीवा सड़क पर ही हमारा इंतजार करती मिल गई। नीवा के पिता मदन राय बिजली विभाग में हैं। पूरा परिवार अत्यंत सज्जन। थोड़ी देर बैठने के बाद चलने की बातकरता हूं। पर मां कहती हैं खाना खाकर जाएं। दाल भरी हुई पूडी और खीर। नए साल का पहला भोजन। दूर आईजोल में लेकिन अपने गृह राज्य बिहार के एक परिवार के बीच। अपने घर की तरह और पूड़ी लिजिए की जिद। ये सब कुछ याद रहेगा। यहां पर नीवा के कुछ रिश्तेदारों और उनके भाइयों से भी मुलाकात हुई।
कई और मजेदार बातें। यहां मजदूरों को मोटिया कहते हैं। बाहर से आए लोगों को बाइपा। पर बड़ी संख्या में बाहरी मजदूर आईजोल में हैं। अगर आप मिजोरम में बुजुर्ग लोगों को सम्मान देना चाहते हैं तो उनके नाम से पहले पू लगाएं। यहां श्रीमान जैसा कुछ होता है। नीवा ने मुझे शाम तक कुछ और स्थलों के भ्रमण के बारे में सलाह दी।
मिजोरम में जारकोट इलाके में मिरोजम स्टेट म्युजियम है। पर वह छुट्टी का दिन होने के कारण बंद है। तब खुला क्या होगा। कहां जाया जा सकता है। अभी मेरे पास शाम तक का समय है। शहर में दोपहर की गुनगुनी धूप में घूमते हुए मैं सोच रहा हूं। तभी मुझे एक बाइक टैक्सी वाले नजर आते हैं।
जी हां बाइक टैक्सी गुरुग्राम और नोएडा की तरह। साल 2017 में आईजोल शहर में बाइक टैक्सी परिचालन में आई है। एक्टिवा जैसी स्कूटी को बाइक टैक्सी में संचालित किया जा रहा है। दोपहिया का नंबर पीले रंग का है और बाइक टैक्सी ड्राईवर के पास हेलमेट भी पीले रंग का  है। आपको जहां भी जाना है ड्राईवर  से किराये का मोलभाव करें। पहाड़ी शहर है इसलिए किराया तय नहीं किया गया है। पर यह टैक्सी से काफी सस्ता है। आधे से भी कम है। मतलब सिटी बस और टैक्सी के बीच शहर में घूमने का एक और विकल्प है। शहर में ऐसी कई सौ बाइक टैक्सी संचालन में आ गई हैं। ये बाइक टैक्सी वाले लोग आसपास के 10-12 किलोमीटर दूर गांव में भी चले जाते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य

Tuesday, February 20, 2018

आईजोल का आईआईएमसी और एलआर साईलो

आईजोल शहर के राजधानी क्षेत्र में टहल रहा हूं। विधानसभा और राजभवन को देखते हुए आगे बढ रहा हूं। अचानक याद आता है कि आईजोल में भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) की शाखा है। जब मैं 1995-96 में आईआईएमसी का छात्र था तब इसकी ढेंकानाल (ओडिशा) और आईजोल (मिजोरम) शाखा के बारे में सुनता था। तो अब आईजोल आने पर आईआईएमसी की शाखा देखने की इच्छा हुई। मैंने मोबाइल में आईआईएमसी, आईजोल सर्च किया। इसके प्रभारी एलआर साइलो साहब का संपर्क नंबर मिल गया।उन्हें फोन लगाया। कोई पुरानी जान-पहचान नहीं, पर बड़ी उत्साहजनक बात हुई। उन्होंने कहा मैं अभी घर में हूं। आज छुट्टी है। घर पर आ जाएं। कहां पर हैं आप। मैंने बताया कि एसेंबली के पीछे वाली सड़क पर। वहां से ट्रेजरी स्कायर चौराहे पर आएं। मैं एक छात्र को भेजता हूं। वह आपको मेरे घर ले आएगा। मैं पांच मिनट में एक बार फिर ट्रेजरी स्कावयर पर था।वहीं जहां लालडेंगा मेमोरियल बना है। यहां आदित्य गौतम मिले।
साइलो साहब के ड्राईंग रुम में क्रिसमस ट्री। 
आदित्य आईआईएमसी आईजोल के सत्र 2017-18 में अंग्रेजी पत्रकारिता के छात्र हैं। वैसे इंजीनियरिंग करने के बाद पत्रकारिता पढ़ने आए हैं। आगे लेखक बनने की तमन्ना रखते हैं।

आईआईएमसी आईजोल में साल 2011 से अंग्रेजी पत्रकारिता का डिप्लोमा कोर्स संचालित किया जा रहा है। हांलाकि परिसर दूर होने के कारण दूसरे राज्यों से छात्र यहां कम आते हैं। पर इस बैच में नौ छात्र अध्ययन कर रहे हैं। यहां तीन शिक्षक पदस्थापित हैं। हां नौ छात्रों के लिए तीन शिक्षक। क्लासरूम का माहौल कितना आत्मीय होता होगा आप अंदाजा लगा सकते हैं। आईजोल परिसर 8 अगस्त 2011 से नियमित रूप से कार्य कर रहा है। फिलहाल इसकी कक्षाएं मिजोरम यूनीवर्सिटी के कैंपस में ही संचालित होती हैं। यह शहर से 6 किलोमीटर बाहर है। पर आईआईएमसी आईजोल का विशाल परिसर बनकर तैयार हो रहा है। आने वाले सालों इसका अपना परिसर होगा। आईआईएमसी में हमारे शिक्षक रहे केएम श्रीवास्तव कई बार आईजोल आ चुके थे।
हम एक अत्यंत सुरुचिपूर्ण ढंग से सजे घर में प्रवेश करते हैं। एलआर साइलो के घर का ड्राईंग रूम बडे ही करीने से सजाया गया है। इसमेंविशाल क्रिसमस ट्री है। साथ ही दीवारों पर फोटोग्राफी में आईजोल शहर की सुंदर तस्वीरे हैं। 71 वर्षीय साइलो साहब कुछ दिन से बीमार थे। नए साल के पहले दिन मैं पहला कोई व्यक्ति हूं जिससे वे मिल रहे हैं।
हमारी बातचीत शुरू होती है। पहले आईआईएमसी पर फिर बात निकलकर जाती है मिजोरम पर। वे 1971 से मिजोरम सरकार की सेवा में हैं। उन्होंने मिजोरम का उग्रवाद प्रभावित दौर भी काफी करीब से देखा है। वे मिजोरम पर एक चलती फिरती किताब ही हैं। पूर्वोत्तर के सारे बड़े पत्रकार उनके दोस्त हैं। एलआर साइलो लंबे समय तक मिजोरम सरकार के सूचना एवं प्रसारण विभाग के निदेशक रहे। 2007 में अवकाश प्राप्ति के बाद भी मिजोरम सरकार उनकी सेवाओं का विस्तार दे रही है।आजकल भी वे मिजोरम सरकार के मुख्यमंत्री पू ललथनहवला के मीडिया सलाहकार हैं।
कुछ घंटे की मुलाकात में पत्रकारिता, सरकारी मीडिया के तौर पर एक सूचना अधिकारी की जिम्मेवारियां और मिजोरम में उग्रवाद के दौर पर संक्षेप में उनसे चर्चा हुई। उनके ड्राईंग रुम में मिजोरम पर कुछ सुंदर कॉफी टेबल बुक देखने को मिलीं।
चाय नास्ते के बाद अब उनसे विदा लेना चाहता हूं। वे कहते हैं जब तक मिजोरम मे हैं आप किसी भी तरह की सहायता के लिए फोन कर सकते हैं। चलते समय वे एक कलम और मिजोरम पर कुछ पुस्तिकाएं उपहार में देते हैं। चलते हुए पता चलता है कि साइलो साहब अपने आवास में एक गेस्ट हाउस भी संचालित करते हैं। 70 के पार हैं पर कई मोर्चों पर उनकी सक्रियता प्रेरणा लेने योग्य है। 
आदित्य फिर ऊपर तक छोड़ने आए। आदित्य हरिद्वार के पास कनखल के रहने वाले हैं। पर पत्रकारिता पढ़ने के लिए उन्होंने आईजोल आना पसंद किया। उनसे थोड़ी चर्चा के बाद मैं विदा लेता हूं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य 
( IIMC, AIZAWL, LR SAILO ) 

Sunday, February 18, 2018

मिजोरम की राजनीति- मिजो नेशनल फ्रंट और कांग्रेस

आईजोल में एमएनएफ का मुख्यालय
साल 2018 मिजोरम के लिए चुनावी साल है। इससे पहले मिज़ोरम राज्य विधानसभा चुनाव, 2013 में हुए थे। मिज़ोरम में 25 नवम्बर 2013 को हुए विधान सभा चुनाव में राज्य की 40 विधानसभा सीटों पर कुल 6.90 लाख मतदाता थे  यहां मतगणना 9 दिसंबर 2013 को हुई। इनमें कांग्रेस पार्टी विजयी रही। 40 सीटों में 34 पर कांग्रेस 5 पर एमएनएफ ने जीत हासिल की। मिजोरम में सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री ललथनहावला ने एक बार फिर सरकार बनाई।

 साल 2008 के विधानसभा चुनाव में 40 में से 32 सीटें कांग्रेस ने जीतकर सरकार बनाईवहीं एमडीए (मिजोरम डेमोक्रेटिक एलायंस) 8 सीटें ही जीत पाया था। एमडीए में मिजो नेशनल फ्रंटमिजोरम पीपुल्स कॉन्फ्रेंस और मेरालैंड डेमोक्रेटिक एलायंस शामिल थे।

मिजोरम में 40 मे 39 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है। सिर्फ आईजोल इस्ट सीट ही समान्य है। कुल 11 विधानसभा क्षेत्र आईजोल में ही हैं। साल 2013 में चुनावी मैदान में लालनथन हवला (मुख्यमंत्री)जोरामथंगा (पूर्व मुख्यमंत्रीएमएनएफ),आर. रोमविया (विधानसभा अध्यक्ष)जोहाल्सो (विधानसभा उपाध्यक्ष) सहित कुछ दिग्गज भी चुनाव के मैदान में थे।

 राज्य बनने के बाद मिजोरम में पहली बार 1989 में चुनाव हुए। तब कांग्रेस ने चुनाव जीता और ललथनहावला राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने। दूसरी बार 1993 में हुए चुनाव में फिर से कांग्रेस ही जीती और ललथनहावला मुख्यमंत्री बने।
पर तीसरी बार 1998 में हुए विधानसभा चुनाव में मिजो नेशनल फ्रंट ने बाजी मारी और जोरामथांगा मुख्यमंत्री बने। साल 2003 में एक बार फिर जोरमाथांगा की अगुवाई में मिजो नेशनल फ्रंट ने सरकार बनाई। पर साल 2008 में पासा पलट गया। फिर कांग्रेस सत्ता में वापस आई और एक बार फिर लालथनहवला मुख्यमंत्री बने।

 मिजोरम के सबसे लंबे समय तक के सीएम - ललथनहवला
मिजोरम में कांग्रेस का चेहरा और सबसे लंबे समय तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे ललथनहवला राज्य की राजनीति के मंजे हुए खिलाडी हैं ।ललथनहवला ने अपना कैरियर एक रिकॉर्डर के तौर पर शुरू किया था। उसके बाद उन्होंने असम को-ऑपरेटिव अपेक्स बैंक में असिस्टेंट के रूप में काम किया। 1967 तक वे राजनीतिक पार्टी मिजो नेशनल फ्रंट के सचिव रहे।


एमएनएफ के जोरमथंगा।
ललथनहवला 1967 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए। 1973 में वे मिजोरम के पार्टी अध्यक्ष चुने गए। उनके नेतृत्व में 1989 में कांग्रेस पार्टी ने मिजोरम में बहुमत हासिल किया और वे राज्य के मुख्यमंत्री चुने गए। वह 1989 से लेकर 1998 तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे। साल 2008 में वह राज्य के एक बार फिर मुख्यमंत्री चुने गए। 2018 में वे मुख्यमंत्री के तौर पर चार कार्यकाल और 20 साल पूरे कर चुके हैं। इस तरह वे ज्योति बसु और पवन कुमार चामलिंग की सूची में शामिल हो गए हैं।

लालडेंगा के उत्तराधिकारी जोरमथंगा
मिजोरम के दो बार मुख्यमंत्री रहे जोरमथंगा की बात करें तो वे मिजो नेशनल फ्रंट पार्टी का नेतृत्व करते हैं। उन्हें  लालडेंगा के उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जाता है।
मिज़ो नेशनल फ्रण्ट के तत्कालीन अध्यक्ष लालडेंगा ने ज़ोरमथंगा को अपना सचिव बनाया था। जिस पद पर वे सात वर्षों तक बने रहे। 1979 में वे मिजो नेशनल फ्रण्ट के उपाध्यक्ष बन गए। विद्रोह के दौरान सेना ने जोरमथंगा को गिरफ्तार भी किया था। विद्रोह के दौर में वे म्यांमार के जंगलों में भी रहे। 1990 में हुई लालडेंगा की मृत्यु तक जोरमथंगा उनके सबसे भरोसेमंद सहयोगी थे। लालडेंगा के बाद वे मिजो नेशनल फ्रण्ट के अध्यक्ष बने। वे 1998 से 2008 तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे। उनका जन्म म्यांमार सीमा के पास मिजोरम के चंफई जिले के सामथांग गांव में 13 जुलाई 1944 को हुआ था।
फिलहाल मिजोरम की राजनीति में ललथनहवला और जोरामथांगा ये ही दो नाम हैं जिनके आसपास राजनीति घूमती है। दोनों 70 के पार हैं। पर राज्य में कोई युवा नेतृत्व फिलहाल उभरता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य



Friday, February 16, 2018

मिजोरम – लालडेंगा से ललथनहवला तक

आईजोल में लालडेंगा मेमोरियल। 
आईजोल शहर में असम राइफल्स से आगे चलने पर ट्रेजरी स्क्वायर के पास लालडेंगा मेमोरियल नजर आता है। लालडेंगा की गिनती मिजोरम के निर्माता के तौर होती है। मिजोरम के लोगों में उनके प्रति काफी सम्मान है। मिजो नेशनल फ्रंट की अगुवाई में लालडेंगा ने अलग मिजोरम राज्य के लिए लंबी लड़ाई लड़ी। लालडेंगा का जन्म 11 जून 1927 को हुआ था। उनकी मृत्यु 7 जुलाई 1990 को लंदन में हुई।
पूर्वोत्तर का सुंदर और शिक्षित राज्य मिजोरम कभी असम का जिला हुआ करता था। पर अलग भाषा संस्कृति होने के कारण यह ज्यादा समय तक असम के साथ नहीं रह सका। 1950 के बाद ही यहां अलग राज्य की मांग को लेकर आंदोलन जोर पकड़ने लगा।
यहां के लोगों के जन आकंक्षाओं के अनुरूप मिजोरम 1972 में पूर्वोत्तर क्षेत्र पुनर्गठन अधिनियम लागू होने पर केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया। पर इससे मिजो क्षेत्र में शांति स्थापित नहीं की जा सकी। यहां के लोगों की मांग पूर्ण राज्य की थी जो कई सालों बाद जाकर पूरी हो सकी।
जनता पार्टी के शासन काल में प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के आदेश पर लालडेंगा को जेल में बंद कर दिया गया था। पर राजीव गांधी ने मिजो समस्या को लेकर सकारात्मक रुख अपनाया। वास्तव में साल 1984 में राजीव गांधी का केंद्र में सत्ता में आना मिजोरम के लिए युगांतकारी साबित हुआ। मिजोरम के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालडेंगा 15 फरवरी 1985 को राजीव गांधी से मिले। इस मुलाकात में मिजोरम को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने पर सहमति बनाने पर चर्चा हुई। वास्तव में राजीव गांधी का मिजोरम से काफी लगाव था। उन्होंने यहां की कई यात्राएं भी की थीं।
साल 1986 में लुंगलेई के एक गांव में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी, मणिशंकर अय्यर एक मिजो घर में। 

पूर्व और दक्षिण में म्यांमार और पश्चिम में बांग्लादेश के बीच स्थित होने के कारण भारत के पूर्वोत्तर कोने में मिजोरम सामरिक दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण राज्य है। अब थोड़ा नजर डालते हैं मिजोरम के अतीत पर। 1891 में ब्रिटिश कब्जे में जाने के बाद कुछ वर्षों तक उत्तर का लुशाई पर्वतीय क्षेत्र असम के और आधा दक्षिणी भाग बंगाल के अधीन रहा। 1898 में दोनों को मिलाकर एक जिला बना दिया गया जिसका नाम पड़ालुशाई हिल्स जिला और यह असम के मुख्य आयुक्त के प्रशासन में आ गया। यह इलाका ही आगे चलकर मिजोरम कहलाया।

मिजोरम में अलगाववाद का दौर - वास्तव में 1950 के बाद भारत-सरकार के मिजोरम के प्रति गैर-संवेदनशील होने का आरोप लगाते हुए मिजोरम के संगठनों ने नाराज होकर एक अलगाववादी अभियान आरम्भ किया था।
मिजोरम में साल 1959 के अकाल में कम से कम 100 लोगों की मौत हो गई थी और मानव संपत्ति व फसल का भारी नुकसाना हुआ था। इसके बाद लालडेंगा की अगुवाई में मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) ने भारत सरकार के खिलाफ स्वतंत्रता के लिए लड़ाई शुरू कर दी। हालांकि उनके अभियान को सफलता नहीं मिल रही थी, लेकिन इसके कारण मिजो समाज हिंसा से पीड़ित था। 1986 के मिजो समझौते के बाद एमएनएफ ने हिंसा का रास्ता छोड़ भारतीय संविधान के तहत कार्य करने की घोषणा की।
ताकि हम भूल न जाएं उनको, जिनके बुनियाद पर खड़ा है हमारा आज...

1986 का मिज़ो समझौता (MIZO ACCORD ) - भारत सरकार और मिजो नेशनल फ्रंट के बीच 30 जून 1986  को एक समझौता हुआ जिसे मिजो समझौता कहा जाता है। भारत सरकार और मिजो नेशनल फ्रंट के बीच  हुए ऐतिहासिक समझौते के बाद मिजोरम को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला। राजीव गांधी और लालडेंगा के बीच हुए इस समझौते के तहत मिज़ोरम को 20 फरवरी, 1987 को भारत का 23वां राज्य बनाया गया।
राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने दिसंबर 2017 में मिजोरम विधानसभा के विशेष सत्र में कहा कि 1986 के मिजो समझौते दुनिया के लिए एक शानदार उदाहरण है। भारत के लंबे इतिहास में समझौता व इसकी विरासत सबसे बड़ी सफलताओं में से यह एक है।
- vidyutp@gmail.com - विद्युत प्रकाश मौर्य
(MIZO ACCORD, RAJEEV GANDHI, LALDENGA )