Wednesday, January 31, 2018

कोंकण रेल के हरे भरे रास्ते से वापसी ..

उडुपी से हमारी वापसी की ट्रेन दोपहर बाद चार बजे के करीब है। हमलोग दोपहर का खाना मथुरा वेज में खाने के बाद समय से पहले स्टेशन आ गए। हमने अपना अतिरिक्त लगेज क्लाक रुम में जमा कराया था उसे रिलीज करा लिया। रेलवे की सुविधा काफी अच्छी है। एक आर्टिकिल के लिए 15 रुपये किराया 24 घंटे का। जहां क्लाक रुम ना हो वहां, टिकट बुकिंग आफिस में जाएं या स्टेशन मैनेजर ऑन ड्यूटी के पास जाएं। अब मत्स्यगंधा एक्सप्रेस का इंतजार है। ट्रेन समय पर चल रही है। कोंकण रेल के नेटवर्क पर आमतौर पर रेलगाड़ियां लेट नहीं होतीं।

 हमलोग रेलवे स्टेशन पर पूरनपोली नामक मराठी व्यंजन खरीदते हैं। यह मीठी रोटी है। सफर के लिए काफी अच्छा है। एक सज्जन से बात होने लगी। बताते हैं कि कोंकण रेल के निर्माण से पहले कर्नाटक के तटीय इलाकों से मुंबई पहुंचना काफी मुश्किल कार्य था। लंबी बस यात्रा करनी पड़ती थी। दो दिन लग जाते थे। अब यह सफर एक दिन में संभव है।
पूरनपोली- सफर का साथी।
नाम है मत्स्यगंधा एक्सप्रेस तो इस ट्रेन में बड़ी मात्रा में मछलियां लादी भी जा रही हैं। मछलियां हैं तो उनका गंध भी नाकों तक पहुंचेगा ही। तो हमारा सफर एकबार फिर कोंकण रेल से शुरू होने वाला है। कुछ रास्ते जाने पहचाने से हैं, जहां से हम कई बार गुजर चुके हैं। उडुपी से गोकर्ण रोड तक का सफर ट्रेन से कुछ दिन पहले ही तो किया था। पर गोकर्ण से आगे गोवा के मडगांव तक का सफर दिन में नहीं किया था। सो इस बार माधवी भी खिड़की पर विराजमान हैं। बाहर के नजारे लेने के लिए। और नजारे इतने दिलकश हैं कि कोंकण रेल से बार बार सफर करने की इच्छा होती है सिर्फ प्रकृति कि हसीन चित्रकारी को देखने के लिए।

हमलोग कारवार टनेल से गुजर रहे हैं।यह कोंकण रेल की 5.5 किलोमीटर से ज्यादा लंबी सुरंग है। रास्ते में कई नदियां और उनपर बने पुल आते हैं। ये सभी नदियां अरब सागर में जाकर मिल जाती हैं।

अंकोला, कारवार जैसे स्टेशन आते हैं। हम कारवार में प्लेटफार्म पर उतर कर वापस डिब्बे में आकर बैठ जाते हैं। अब ट्रेन गोवा में प्रवेश कर गई है। काणकोण स्टेशन आता है। वहां छोटा सा ठहराव है। मडगांव आने से पहले अंधेरा हो गया है। ट्रेन का मडगांव में 10 मिनट का ठहराव है। हमलोग यानी मैं और अनादि मडगांव में प्लेटफार्म पर उतरते हैं। भोजनालय से अपने लिए खाने की थाली पैक कराकर वापस ट्रेन में आ जाते हैं। मडगांव स्टेशन पर अच्छा और काफी चलता हुआ भोजनालय है।


मडगांव के बाद ट्रेन आगे बढ़ जाती है। कुछ गोवा के स्टेशनों को पार करत है जहां इसका ठहराव नहीं है। करमाली, थिविम, प्रेने में नहीं रुकती मत्स्यगंधा। अब महाराष्ट्र में प्रवेश करने वाली है ट्रेन।

महाराष्ट्र का पहला स्टेशन सावंतवाडी रोड। हालांकि यहां भी ट्रेन का ठहराव नहीं है पर ट्रेन की गति थोड़ी धीमी होती है और एक मराठी लड़की पूरी बहादुरी के साथ अपना लगेज लिए हुए इस स्टेशन पर उतर जाती है। उतरने के दौरान एक बार मुझसे मराठी लहजे में ही पूछती है क्या यह सावंतवाडी रोड ही है ना। मैं नाम पढ़कर बताता हूं,  हां ऐसा ही प्रतीत होता है। रात गहरा गई है। हमलोग ट्रेन में अपनी बर्थ पर सो जाते हैं। सुबह में नींद खुलने पर ट्रेन पनवेल में प्रवेश कर रही है। पर ट्रेन का आखिरी पड़ाव लोकमान्य तिलक टर्मिनस है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य ( UDUPI RETURN, MATASYAGANDHA EXPRESS ) 

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Tuesday, January 30, 2018

दक्षिण भारतीय स्वाद के लिए जाना जाता है उडुपी

उडुपी दक्षिण भारतीय व्यंजनों के लिए जाना जाता है। इतना प्रसिद्ध की उडुपी साउथ इंडियन खाने का पर्याय ही बन गया है, तभी तो देश के तमाम दूसरे शहरों में उडुपी नाम से रेस्टोरेंट खुल गए हैं। तो आप उडुपी में आएं और डोसा और इडली का स्वाद न लें ऐसा कैसे हो सकता है।
उडुपी में श्रीकृष्णा मंदिर के प्रवेश द्वार से पहले हमें एक मनोरम परिसर वाला होटल व रेस्टोरेंट नजर आया। तो हम सबसे पहले सुबह के नास्ता के लिए वहां पहुंच गए। 
तो हमने मंदिर के मुख्य द्वार के सामने मथुरा वेज में सुबह सुबह डोसा और इडली का स्वाद लिया। दुबार हमलोग दोपहर में भी यहीं पहुंचे। दोपहर में शाकाहारी बिरयानी मंगाई। यहां पर उत्तर भारतीय शाकाहारी थाली भी उपलब्ध है। महज 110 रुपये की थाली में तमाम आइटम। तो एक थाली भी मंगा ली। हर व्यंजन का स्वाद लाजवाब। बेहतरीन उत्तर भारतीय खाना और वह भी वाजिब दरों पर, यह मथुरा वेज की खासियत है। खाने के बाद ऐसा मन  ख्याल आया कि दुबारा उडुपी इसी रेस्टोरेंट में खाने के लिए ही पहुंचा जाए।

मथुरा वेज रेस्टोरेंट का परिसर अत्यंत सुरूचिपूर्ण ढंग से सजा है। पूरे परिसर में कृष्ण लीला के सुंदर मूर्तियों से सजा है। परिसर में आकर लगता है मानो कान्हा की नगरी में ही आ गए हों। मथुरा वेज एक आवासीय होटल भी है। यहां एसी और नान एसी कमरे वाजिब दरों पर उपलब्ध हैं।
उडुपी में अगर डोसा इडली का स्वाद लेना है तो शहर के प्रसिद्ध डायना रेस्टोरेंट का रुख किया जा सकता है। वहीं मित्र समाज में भी मसाला डोसा का स्वाद ले सकते हैं।

उडुपी में ज्यादातर होटलों में खाने पीने की दरें अत्यंत वाजिब हैं। समय की कमी के कारण हमलोग कई और रेस्टोरेंट के खाने का स्वाद नहीं ले सके। पर अच्छे शहरों में अगली बार के लिए भी कुछ स्थलों को छोड़ देना चाहिए। तो अगली बार लेगें कुछ और स्वाद। 
मथुरा वेज की शाकाहारी थाली।

लकड़ी के सामान खरीदें - उडुपी श्रीकृष्ण मंदिर के चारों तरफ की वीथियों में सुंदर बाजार है। यहां खास तौर पर आप लकड़ी के बने हुए सामनों की खरीददारी कर सकते हैं।

लकड़ी के बने सुंदर नक्काशीदार मंदिरों की दर्जनों दुकानें यहां देखी जा सकती हैं। यहां खरीददारी में कोई मोलभाव नहीं है। आमतौर पर दुकानदार पहले से ही वाजिब कीमत बताते हैं।

उडुपी का सुंदर सुरम्य मलपे बीच
उडुपी का प्रमुख आकर्षण है मलपे बीच। यह अरब सागर के अत्यंत खूबसूरत समुद्र तटों में से एक है। शहर के मध्य में स्थित श्रीकृष्ण मंदिर से मलपे की दूरी 8 किलोमीटर है। वहां जाने के लिए आटोरिक्शा ले सकते हैं।
आप चाहें तो शाम को समंदर के साथ कुछ घंटे गुजारने के लिए वक्त मुकर्रर कर सकते हैं। पर बेहतर होगा कि आप अगर उडुपी में पहुंचे हैं तो यहां पर कम से कम दो दिन के लिए तो ठिकाना बनाएं। तभी आप उडुपी की खुशबू और अपनेपन को बेहतर ढंग से महसूस कर सकते हैं।

मलपे बीच पर समंदर की ओर रुख करते हुए कुछ सुंदर रिजार्ट और होटल बने हैं। यहां रहकर परिवार के संग समुद्र तट पर मौज मस्ती करने का अलग आनंद है।

यहां समंदर की लहरें, नारियल के हरे भरे पेड़ के साथ यहां पर रेत पर आप कई तरह के खेलों का भी मजा ले सकते हैं। मलपे बीच पर बापू की बैठी हुई मुद्रा में एक सुंदर प्रतिमा भी नजर आती है। उडुपी में समुद्र तट पर रहना गोवा, केरल या मुंबई में रहने से किफायती भी है।

रेलवे स्टेशन पर ट्रेन के इंतजार के दौरान हमारी मुलाकात एक रोहतास जिले के नौजवान से होती है। वे बताते हैं कि यहीं मनीपाल में इंजीनियरिंग की पढाई की, और बाद में नौकरी भी यहीं मिल गई। तो दिल लग गया है यहां, कहीं और जाने की इच्छा नहीं होती। उडुपी में रहकर आप बाइक किराये पर लेकर आसपास के स्थलों को गहराई से घूम सकते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  ( UDUPI, MATHURA VEG, THALI, MASALA DOSA ) 
आगे पढ़िए - उडुपी से कोंकण रेल के रास्ते से वापसी 


Monday, January 29, 2018

उडुपी का अदभुत कारपोरेशन बैंक संग्रहालय

उडुपी के मठ और मंदिरों को घूमते हुए एक अद्भुत म्युजियम से आप रुबरू हो सकते हैं जो ले जाता है आपको बैंकिंग के इतिहास के पन्नों में। जी हम बात कर रहे हैं कारपोरेशन बैंक संग्रहालय की। यह उडुपी में श्रीकृष्ण मठ के पास रथ विथी (कार स्ट्रीट) के पास ही स्थित है। यह बैंकिग जगत का एक हेरिटेज म्युजियम है। साथ ही बैंक कि ओर से यहां वित्तीय शोध केंद्र का संचालन किया जाता है। बैंकिंग में रुचि रखने वाले लोगों को इस संग्रहालय की ओर रुख जरूर करना चाहिए।

इस संग्रहालय में सिक्कों का विशाल संग्रह है। यहां आप 400 इश्वी पूर्व से लेकर वर्तमान समय तक सिक्के और बदलती हुई बैंकिग व्यवस्था को समझ सकते हैं। वास्तव में यह भवन कारपोरेशन बैंक के संस्थापक हाजी अब्दुल्ला साहेब का आवास हुआ करता था जिसे कारपोरेशन बैंक प्रशासन ने संग्रहालय में तब्दील कर दिया है। 12 मार्च 1096 को यहां पर महज 5000 रुपये की निधि से कारपोरेशन बैंक की शुरुआत हुई थी। यहां पर आप कारपोरेशन बैंक के इतिहास के अलावा दुनिया के अलग अलग देशों के 1360 से ज्यादा तरह के सिक्कों का संग्रह देख सकते हैं। फिलहाल इन सिक्कों का बाजार मूल्य 42 लाख से ज्यादा है।

इसके अलावा आप यहां बैंकिंग से जुड़े यंत्र, रिकार्ड और नोटों का भी संग्रह देख सकते हैं। पूरे भवन को आलोकित करने के लिए सोलर लाइटिंग का इस्तेमाल किया गया है। संग्रहालय को बेहतर बनाने के लिए बैंक प्रबंधन की ओर से लगातार प्रयास जारी है।
संग्रहालय में प्रवेश के लिए को प्रवेश टिकट नहीं है। यहां पर पूरे संग्रह को देखने में एक घंटे का वक्त गुजार सकते हैं। अंदर के हिस्से में फोटोग्राफी प्रतिबंधित है। स्कूल कालेज के छात्रों और बैंकिंग में रूचि रखने वालों के लिए यह बेहतरीन जगह है।
संग्रहालय देखने पहुंचे लोगों को जानकारी देने के लिए बैंक के कर्मचारी भी यहां मौजूद रहते हैं। यहां पर आप वस्तु विनिमय प्रणाली के बाद मुद्रा के चलन और वर्तमान स्थित तक लेनदेन के तरीकों के बारे में सहज भाषा में जान सकते हैं।


ज्ञान-विज्ञान और मुद्रा संबंधी बातें हो जाएं तो अब उडुपी के गलियों में घूमिए और थोड़ी खरीददारी करें। शहर के लोगों का व्यवहार काफी अच्छा है। कार स्ट्रीट पर मुझे एक ग्रंथागार नजर आता है। वहां से दो किताबें खरीद लेता हूं। ये किताबें उडुपी के बारे में जानकारी दे रही हैं। पर जी नहीं भरा उडुपी से फिर आने की इच्छा बनी हुई है।
- विद्युत प्रकाश मौर्य
( UDUPI, COPPORATION BANK, COIN, MUDRA HISTORY  ) 

Sunday, January 28, 2018

उडुपी में सबसे प्राचीन है अनंतेश्वर मंदिर

यहां एक साथ विराजते हैं शिव और विष्णु
उडुपी के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक अनंतेश्वर मंदिर। यह मंदिर श्रीकृष्ण मठ के बगल में ही स्थित है। यह मंदिर 1200 साल से अधिक पुराना है। वास्तव में यह उडुपी का सबसे प्राचीन मंदिर है। इसका निर्माण अलुपा वंश के राजाओं ने आठवीं सदी में कराया था।
यह रोचक है कि इस मंदिर के नाम से गांव शिवाली नाम निकला है। उडुपी के आसपास बड़ी संख्या में शिवाली ब्राह्मण हैं। कुछ विद्वान मानते हैं कि शिवाली का असली नाम शिवा हाली है। यह माना जाता है कि शिवा हाली शिवा बेली कहलाने लगा। इसी का आगे नाम रुप्या पीठ या रजत पीठ पड़ा।
अनंतेश्वर मंदिर में शिव की जो प्रतिमा स्थापित है वह शैव श्रद्धालुओं के मुताबिक शिव की प्रतिमा है। पर वैष्णव उसे शिव और विष्णु दोनों की प्रतिमा मानते हैं। प्रतिमा देखने पर शिवलिंग के आकार की है। पर लिंगम के सामने मानव आकृति बनी हुई है। इस आकृति की दिव्य आंखे और मूंछे दिखाई देती है।

वैष्णव लोग इसे विष्णु प्रतिमा मानते हैं। तो यह हरि (विष्णु) और हर (शिव) दोनों की प्रतिमा है। हर (महादेव) के शरीर में हरि का वास हो रहा है यहां। यह अदभुत संयोग है।

कहा जाता है कि आचार्य माधव के पिता इस मंदिर में पुजारी के तौर पर कार्य करते थे। आचार्य माधव इसी मंदिर परिसर में अपने शिष्यों को शिक्षा देते थे।
अनंतेश्वर मंदिर का वास्तु अद्भुत है। मंदिर का मुख्य भवन आपको हाथी के पीठ की तरह दिखाई देता है। आकार में यह इस क्षेत्र का सबसे बड़ा मंदिर है। 

हालांकि मंदिर परिसर के बाहर चारों तरफ बाजार होने के कारण मंदिर का मुख्य भवन दूर से नहीं दिखाई देता है। पर परिसर में प्रवेश करने पर आपको मंदिर की भव्यता नजर आती है। इसकी छत द्विस्तरीय है। इसके निर्माण में पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। मुख्य द्वार पर लकड़ी के विशाल स्तंभ भी हैं।
मंदिर के गर्भ गृह में अनंतेश्वर के अलावा गणपति की प्रतिमा है। मंदिर के प्रदक्षिणा पथ में तीर्थकुंड का निर्माण किया गया है, जहां से श्रद्धालु अभिषेक के लिए जल लेते हैं।

चंद्रमौलेश्वर मंदिर - (शिव मंदिर ) 

अनंतेश्वर मंदिर के बगल में शिव का चंद्रमौलेश्वर मंदिर स्थित है। यहां भी श्रद्धालु श्रद्धा से पूजा करने जाते हैं। इस मंदिर का आधार तल अनंतेश्वर मंदिर से नीचा है। यहां भी शिव की प्रतिमा मानव रूप में है। 

कैसे पहुंचे - रेलवे स्टेशन से मंदिर की दूरी 4 किलोमीटर है। अनंतेश्वर मंदिर सुबह 6 बजे से रात्रि 8 बजे तक खुला रहता है। मंदिर परिसर के आसपास लकड़ी के सामानों की सुंदर दुकाने हैं। पास में लगेज रूम और रहने के लिए मठ, अतिथिशाला और धर्मशाला भी उपलब्ध है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
(ANANTESHWARA TEMPLE UDUPI )  


Saturday, January 27, 2018

द्वैतवाद का संदेश देता है उडुपी श्रीकृष्णा मंदिर

कान्हा की नगरी उडुपी का प्रमुख आकर्षण है श्रीकृष्ण मठ मंदिर। यह मंदिर कई एकड़ में फैला है। इस मंदिर की स्थापना 13वीं सदी के महान वैष्णव संत माधवाचार्य द्वारा की गई थी।

वे द्वैतवेदांत संप्रदाय के संस्थापक थे। कहा जाता है कि माधवाचार्य ने अपना प्रसिद्ध ग्रंथ गीताभाष्य यहीं लिखा था। उडुपी श्रीकृष्ण मठ को अपनी धार्मिक क्रियाओं, परंपरा, द्वैतवाद के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है।

कान्हा की मोहक मूर्ति -  उडुपी के श्रीकृष्ण मंदिर के गर्भ गृह में भगवान कृष्ण की युवावस्था की एक सुंदर और मोहक मूर्ति है। मूर्ति के दाएं हाथ में मथानी और बाएं हाथ में रस्सी पकड़े हुए हैं। कहा जाता है कि श्रीकृष्ण के ये मूर्ति गुजरात के द्वारका के गोपी-चंदन वन से यहां लाई गई थी। श्रद्धालु यहां कान्हा के दर्शन करके खुद को धन्य समझते हैं। यहां कान्हा के प्रति लोगों का अदभुत आस्था है। पूरा उडुपी शहर की कान्हा के प्रेम में रमा नजर आता है। 

श्रीकृष्ण मंदिर के निर्माण में लकड़ी और पत्थरों का अदभुत प्रयोग दिखाई देता है। खासतौर पर मंदिर की आंतरिक सच्चा में लकड़ी के सुंदर मेहराब बने हैं। मंदिर का गोपुरम विशाल है जो दूर से नजर आता है। 

झरोखों से दर्शन - कहा जाता है कि एक बार भगवान कृष्ण के समर्पित भक्त कनकदास को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं मिली। तब उन्होंने तन्मयता से कृष्ण की प्रार्थना की। भगवान उनसे इतने प्रसन्न हुए कि भक्त को अपना दिव्य रूप दिखाने के लिए मठ (मंदिर) के पीछे एक छोटी सी खिड़की बना दी।

आज भी भक्त उसी खिड़की के नौ झरोखों से भगवान कृष्ण के दर्शन करते हैं। मंदिर में गरुड़ और हनुमान की प्रतिमा भी स्थापित की गई है।

मंदिर के पृष्ठ भाग में सुंदर सरोवर है। मंदिर की विशेष पूजा में हिस्सा लेने वाले श्रद्धालु इस सरोवर में स्नान करके पूजा करते हैं। उडुपी श्रीकृष्ण मंदिर के सामने शिव का अतिप्रचीन मंदिर चंद्रमौलेश्वर मंदिर स्थित है। वहीं इसके बगल में भगवान विष्णु का अति प्रचीन अनंतेश्वर मंदिर स्थित है। इसमें विष्णु भुजंगशयनम मुद्रा में विराजमान हैं।

मंदिर के त्योहार -  श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, हनुमान जयंती, मकर संक्रांति, रथ सप्तमी, माधव नवमी, नवरात्रि महोत्सव, विजयादशमी, नरक चतुर्दशी, दीपावली मंदिर के प्रमुख त्योहार हैं। त्योहारों के दौरान श्रद्धालुओं को श्रीकृष्ण के ब्रह्मरथ को खींचने का सौभाग्य मिलता है। मंदिर परिसर के चारों तरफ रथ वीथि है, जिसमें शोभायात्रा निकाली जाती है। आम दिनों में मंदिर सुबह 5 बजे से रात्रि 9.30 बजे तक खुला रहता है।
हमलोग श्रीकृष्ण मंदिर में दर्शन के लिए लाइन में लग गए हैं। पर विजयादशमी का दिन होने के कारण लाइन काफी लंबी है। पर ढाई घंटे में हमें कान्हा जी के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हो ही गया। यह भी सुंदर संयोग रहा कि विजयादशमी का दिन होने के कारण हमें प्रभु के रथ खींचने का भी मौका मिला। कृष्ण के रथ को खींचकर मंदिर प्रांगण के बाहर खुले मैदान में लाया गया। इस रथ की लंबी मोटी रस्सी को दर्जनों श्रद्धालु मिलकर खींच रहे थे तो मैं और अनादि भी इस पुण्य कार्य में योगदान करने लगे।

उडुपी के अष्टमठ
उडुपी में श्रीकृष्ण भक्ति से जुड़े कुल आठ मठ हैं। ये सभी मठ श्रीकृष्ण मंदिर के आसपास बने हैं। इनमें पेजावर मठ प्रमुख है जिसके प्रमुख स्वामी विश्वेश तीर्थ जी हैं। दूसरे मठ हैं पालिमारु, अडामारु, पुट्टिगे, सोढे, कनियरु, शिरुर और कृष्णपुरा। हर दो साल पर होने वाले पर्याया त्योहार के दौरान श्रीकृष्ण मंदिर का प्रबंधन अगले मठ को स्थानांतरित करने की पंरपरा चली आ रही है।
उडुपी में श्रीकृष्ण मंदिर के आसपास श्रद्धालुओं के रहने के लिए कई धर्मशालाएं बनी हुई हैं, जिनमें बिरला धर्मशाला प्रमुख है। कई मठों में भी श्रद्धालुओं के लिए अतिथि गृह बने हुए हैं।

उडुपी के आसपास -  कर्नाटक के इस तटीय शहर में रुककर आसपास के कई और धार्मिक और पर्यटक स्थलों तक घूमने की योजना बनाई जा सकती है। शिक्षा का प्रमुख केंद्र मनीपाल उडुपी से 8 किलोमीटर की दूरी पर है। शंकराचार्य के चार मठों में से एक श्रंगेरी मठ यहां से महज 90 किलोमीटर की दूरी पर है। यह चिकमंगलूर जिले में आता है। इसके अलावा आप चिकमंगलूर और शिवमोगा जिले के कई मनोरम स्थलों की यात्रा कर सकते हैं।

शिवमोगा जिले का प्रसिद्ध जोग फाल्स भी यहां से ज्यादा दूर नहीं है। वहीं आप मुरडेश्वर महादेव, मुकांबिका देवी और गोकर्ण के महाबलेश्वर महादेव के भी दर्शन के लिए जा सकते हैं। उडुपी से मंगलूरू भी 70 किलोमीटर के दायरे में हैं। मंगलुरू में शिव का प्रसिद्ध मंजूनाथ स्वामी मंदिर के दर्शन किए जा सकते हैं।
-        माधवी रंजना
(UDUPI SRI KRISHNA MATHA, MADHWACHARYA, ASTHA MATHA ) 
उडुपी में विजयादशमी के दिन भगवान जी का रथ खींचने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ। 


Friday, January 26, 2018

कर्नाटक में कान्हा की नगरी - उडुपी

केरल से लौटते हुए हमारा पड़ाव था उडुपी। वही उडुपी जिसका नाम सालों से हम उडुपी रेस्टोरेंट की श्रंखला के कारण सुनते आए थे, जो अपने दक्षिण भारतीय स्वाद के लिए प्रसिद्ध है। सुबह 6 बजे हमलोग उडुपी रेलवे स्टेशन पर उतरे। कोंकण रेलवे का साफ सुथरा चमचमता हुआ रेलवे स्टेशन हमारा स्वागत कर रहा था।
उडुपी कोंकण रेलवे का प्रमुख रेलवे स्टेशन है। हालांकि छोटा सा स्टेशन है पर यहां राजधानी एक्सप्रेस जैसी ट्रेनें भी रुकती हैं। स्टेशन भी कृष्ण के रंग में रंगा नजर आता है। रेलवे स्टेशन से बाहर निकलते ही आपको कान्हा जी के दर्शन होते हैं। रेलवे स्टेशन से श्रीकृष्ण मंदिर की दूरी 4 किलोमीटर है। उडुपी में आप कहीं भी जाएं आटोरिक्शा का किराया तय है। प्रीपेड से आटो लें, दिल्ली की तरह कोई ठगी का आलम नहीं है। हमलोग एक प्रीपेड आटो रिक्शा लेकर श्रीकृष्णा मंदिर पहुंच गए। हमें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि उडुपी रेलवे स्टेशन से हाईवे को जोडने वाली सड़क का नाम जार्ज फर्नाडिस रोड है। समाजवादी नेता जार्ज की उडुपी में बहुत इज्जत है इसलिए शहर में उनके नाम पर सड़क का नाम उनके जीवनकाल में ही रख दिया गया। ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है।
एक तरफ ऊंची आवाज में अनवरत गर्जना करता अरब सागर दूसरी तरफ सहयाद्रि की पर्वतमालाएं, बीच में बसा है मंदिरों का शहर उडुपी। कर्नाटक के इस छोटे से खूबसूरत शहर को श्रीकृष्ण जी के शहर के तौर पर जाना जाता है।

परशुराम की भूमि है उडुपी – कहा जाता है महर्षि परशुराम ने जब सारी धरती ब्राह्मणों को दान कर दी तब उनके रहने के लिए कोई स्थान नहीं बचा। तब उन्होंने तीर चलाया और समुद्र के देवता वरुण ने धरती का नया क्षेत्र प्रकट किया। यह क्षेत्र अरब सागर से निकला। इसलिए गोवा से आगे कर्नाटक के गोकर्ण, उडुपी, मंगलुरू से लेकर केरल के कासरगोड तक के इलाके को परशुराम का क्षेत्र कहते हैं।
उडुपी का प्राचीन नाम रुपी ( रजत ) पीठ था जो बाद में उडुपी कहलाने लगा। इस क्षेत्र में सात पवित्र पीठों की चर्चा आती है जिसमें से पांच उडुपी जिले में ही हैं। उडुपी क्षेत्र की स्थानीय भाषा तुलु है। तुलु में इसे ओडिपू उच्चारित करते हैं।
सालों भर सदाबहार मौसम वाले शहर उडुपी हर ओर कान्हा के रंग में रंगा नजर आता है। धार्मिक शहर होने के साथ साथ यहां सागर की लहरों के संग अटखेलियों का भी आनंद लिया जा सकता है।

कैसे पहुंचे – उडुपी मुंबई से मंगलुरू के बीच कोंकण रेल मार्ग का प्रमुख रेलवे स्टेशन है। प्रकृति से सुंदर नजारे देखते हुए उडुपी पहुंचना हो तो कोंकण रेल के किसी भी ट्रेन से यहां तक पहुंचे। उडुपी छोटा स्टेशन पर यहां पर राजधानी एक्सप्रेस जैसी सभी प्रमुख ट्रेनें भी रुकती हैं। 

अगर हवाई मार्ग से पहुंचना हो तो मंगलुरु एयरपोर्ट यहां से सिर्फ 60 किलोमीटर है। गोवा का डाबोलियम एयरपोर्ट या बेंगलुरु से भी उडुपी पहुंचा जा सकता है। 

वहीं कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु से उडुपी के लिए शानदार वातानुकूलित बसों की सेवाएं भी उपलब्ध है। पर कहीं से भी आएं पर आप उडुपी में कुछ दिन गुजारें तो आपको काफी आनंद आएगा। जय श्री कृष्णा।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य  ( UDUPI, LAND OF PARSHURAM ) 

Thursday, January 25, 2018

अलुवा में शाकाहारी भोजनालय की तलाश

केरल से हमारी वापसी का टिकट अलुवा रेलवे स्टेशन से है। वास्तव में मुन्नार का निकटतम रेलवे स्टेशन अलुवा ही है। यह मुंबई की तरफ से जाने पर कोच्चि से पहले ही पड़ता है। इसलिए अगर आपको मुन्नार जाना हो तो अलुवा में ही उतर सकते हैं। तो मुन्नार से लौट रही बस के कंडक्टर को हमने कह दिया था कि हमें अलुवा में ही उतार दें। उन्होंने रेलवे स्टेशन के पास हमें उतर जाने का संदेश दिया। हमलोग बस से उतर कर आसानी से रेलवे स्टेशन पहुंच गए। हमारी उडुपी जाने वाली ट्रेन 8.30 बजे है। हमारे पास दो घंटे का समय है। तो हमने सोचा पेट पूजा कर ली जाए।
स्टेशन के आसपास देखा तो कोई शाकाहारी भोजनालय नहीं था। जो समिष भोजनालय थे वहां मीनू में बीफ भी परोसा जा रहा था। पूछने पर लोगों ने बताया थोड़ी दूर चलकर एक शाकाहारी भोजनालय है। हमलोग सामान के साथ वहां के लिए चल पड़े। 
चलने का लाभ भी हुआ। हमें अच्छा शाकाहारी भोजनालय मिल गया। विशाल डायनिंग हॉल और दरें भी काफी वाजिब हैं। होटल आर्या अलुवा में स्टेशन के पास शाकाहारी  खाने के लिए बेहतर विकल्प है। यह एक पारिवारिक रेस्टोरेंट है जहां पर शहर के स्थानीय लोग भी खाने पीने आते हैं। 
हमने आर्डर किया लेमन राइस विद कर्ड एंड पापड़। तो यहां बिरयानी, मसाला डोसा, इडली, पूरी सब्जी आदि की दरें भी काफी वाजिब हैं। अनादि माधवी आदि सबने अपनी अपनी पसंद का खाने का आर्डर किया। मजे से खाया और फिर रेलवे स्टेशन के लिए वापस चल पड़े। 
हमारा यहां से उडुपी तक का वापसी का टिकट स्लिपर क्लास में है। मुन्नार के सर्द मौसम से हमलोग अब गर्म मौसम की तरफ आ चुके हैं। हालांकि केरल कर्नाटक का समुद्र तटीय इलाका रात में गर्म नहीं रह जाता है। 
अलुवा कोचीन से पहले कोचीन का एक उपनगर है। अब कोचीन  की मेट्रो रेल अलुवा तक आ रही है। जाते समय हमारी ट्रेन अलुवा में रात को ढाई बजे थी इसलिए हम यहां नहीं उतर कर एर्नाकुलम नार्थ पहुंच गए थे। पर अलुवा उतर कर मुन्नार पहुंच जाना सहज है। रेलवे स्टेशन के पास ही बस स्टैंड है जहां मुन्नार की बसें मिल जाती हैं।
हमारी ट्रेन 13668 ओखा एक्सप्रेस है। यह गुजरातके शहर ओखा तक जाती है। ट्रेन समय पर प्लेटफार्म पर आ गई। यह ट्रेन मंगलुर, उडुपी, मडगांव, पनवेल होकर अहमदाबाद होते गुजरात के द्वारका के पास ओखा तक जाती है। हमलोग ट्रेन में पहुंचने के साथ ही अपनी अपनी सीटों पर कब्जा जमाने के बाद सो गए।

 एक बार फिर उसी रेलमार्ग पर वापसी हो रही थी। मंगलुरु के बाद हमलोग एक बार फिर कोंकण रेल की यात्रा पर थे। सुबह 5 बजे के बाद उजाला हो गया है। सूरतखल के बाद एक रेलवे स्टेशन दिखाई देता है नंदीकूर। पास के मंदिर से मंगलधुन सुनाई दे रही है। संयोग से आज विजयादशमी का दिन है। हमलोग इस मौके पर कर्नाटक के धार्मिक शहर उडुपी में कुछ घंटे का ब्रेक लेने वाले हैं। उडुपी आने से पहले मैं अनादि और माधवी को उतरने के लिए जगाता हूं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य 
(ALUVA TO UDUPI, HOTEL ARAYAS )

Wednesday, January 24, 2018

मीठी यादों के संग मुन्नार से वापसी

चार दिन मुन्नार में गुजारने के बाद अब हमारी वापसी की बारी थी। सच पूछो तो वापस आने की तो इच्छा नहीं हो रही थी। सुबह जिस अनाई रेस्टोरेंट में नास्ता किया करते थे उनसे एक अपनेपन का रिश्ता बन गया था। हम चलते हुए उनके साथ फोटो खिंचवाना नहीं भूले। वे रोज हमें मुन्नार घूमने को लेकर टिप्स दिया करते थे जो हमारे काम आए। अक्तूबर महीने में भी हर रोज हल्की बूंदा बांदी ने मुन्नार में सर्दी का माहौल बनाए रखा।
हमने 12 बजे अपने होटल से चेकआउट कर दिया। दोपहर दो बजे हमारी वापसी की बस है। इस बार हमारा आरक्षण केरल रोड ट्रांसपोर्ट कारपोरेशन की बस में है। इसे हमने आनलाइन ही बुक करा रखा है। लोगों ने बताया कि बस स्टैंड पर बस नियत समय पर आएगी। बाजार के बस स्टैंड में बसे खड़ी होने की जगह नहीं है। बसें आती हैं और थोड़ी देर चल पड़ती हैं। एक यात्री शेड बना हुआ है। पास में टैक्सी और आटो स्टैंड भी है। आसपास में शापिंग करने के लिए कुछ अच्छी दुकानें है।

चलते चलते मुन्नार का हैंड मेड चाकलेट, नारियल तेल आदि खरीदा जा सकता है। तो हमलोग नीयत समय पर अपने बस के इंतजार में थे। बस समय पर ही आई। वास्तव में यह दिल्ली में चलने वाली डीटीसी की एसी बस की तरह ही है। बस इसे लांग रुट पर चला दिया गया है। लिहाजा लंबी यात्रा के नजरिए से देखें तो सीटें अरामदेह नहीं हैं। पर केरास की बस की तुलना में किराया कम है। लगेज रखने की खूब जगह है। केरास में किराया 370 रुपये है तो इस बस में 225 रुपये ही है। बस समय पर चल पड़ी। अब उतरने की बारी है मुन्नार धीरे धीरे पीछे छूटता जा रहा है।

बस में हमारे साथ अशोक दास का परिवार है। वे भुवनेश्वर एनआईसी में कार्यरत हैं। एलटीसी पर टूर करने आए हैं। रांची में भी लंबे समय रह चुके हैं। उन्होंने एसी बस के लिए पहले से टिकट नहीं करा रखा था। पर बस में जगह थी उन्हें आसानी से जगह मिल गई तो वे हमारे सहयात्री बन गए। बोलचाल से बिहारी जैसे ही लगते हैं। दुखी हैं कि मुन्नार में सिर्फ दो दिन ही समय दे पाया। इसलिए सब कुछ ठीक से घूम नहीं सके। वापसी की यात्रा में दास जीऔर उनके बच्चों से बातें करते हुए समय कट रहा है। समय काटना जरूरी भी है। जी मिचलाने और उल्टी होने का डर बना हुआ है। माधवी और अनादि को वापसी में एक –एक बार उल्टी हो गई। मेरा जी घबरा रहा था, पर खुद को मिस्टर दास के साथ बातों में उलझा कर हमने अपने को नियंत्रित रखा।

कोठामंगल पहुंचककर राहत मिली, जब घाट सेक्शन खत्म हो गया। बस कोठामंगलम के स्टैंड में थोड़ी देर रुकी। यात्रियों को चाय पीने के लिए ब्रेक दिया गया। इसके बाद चल पड़ी तो कहीं नहीं रुकी। शाम छह बजे के बाद अलुवा आ गया। हालांकि बस कोच्चि तक जाती है, पर हमें तो अलुवा में ही उतर जाना था। अलविदा मुन्नार। फिर मिलेंगे। ढेर सारी मीठी यादों के लिए शुक्रिया। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य
(MUNNAR RETURN, KRTC, AC BUS, KOTHAMANGLAM, ALUVA )  

Tuesday, January 23, 2018

भुट्टा के बारे में जानिए - सुपर फूड है ये

मुन्नार में दूसरे दिन एरावीकलुम नेशनल पार्क से बाहर निकलने पर दोपहर में हल्की हल्की बारिश हो रही थी।धूप का नामोनिशान नहीं था। ठंड बढ़ी हुई थी। ऐसे मौसम में आपको भुट्टा खाने को मिल जाए। आग पर सेंका हुआ तो क्या कहना। नेशनल पार्क के गेट पर कई भुट्टे वाले सर्द मौसम में भुट्टा भून कर पेश कर रहे थे। तो भला कौन न खाा चाहे। महाबलेश्वर से लेकर महाबलीपुरम तकमनाली से लेकर मैसूर तक आप देश में कहीं भी घूमते हुए भुट्टे का स्वाद ले सकते हैं।

 आते जाते रास्ते में आपके लकड़ी के कोयले पर भुट्टा बेचने वाले मिल जाते होंगे। कभी कभी कभी आपने खाया भी होगा। पर क्या आपको पता है पांच से 10 रुपये में बिकने वाला भुट्टा सुपर फूड है। बचपन से ही सड़क किनारे लकड़ी की धीमी आंच पर पकाकर बिकने वाला भुट्टा मुझे आकर्षित करता रहा है पर इसके फायदों के बारे में ज्यादा नहीं पता था। पर ये हल्का मीठा भुट्टा सुपर फूड है।

पूरे उत्तर भारत में  ही नहीं दक्षिण भारत में और हिल स्टेशनों पर भी भुट्टा खाने को मिल जाता है। हां महाबलेश्वर और शिलांग में थोड़ा महंगा मिलता है।
सिनेमा घर और मॉल मेंयह कार्न के रुप में मिलता है। तो दिल्ली में इसे उबाल कर छल्ली के तौर बिकते हुए देखा जा सकता है। रेत मे भूनी हुई छल्ली। दिल्ली की महिलाओं को उबली हुई छल्ली काफी पसंद आती है। पर अपने राम को तो भुट्टा ही काफी पसंद आता है। जब इसे खरीदता हूं तो लगता है कि एक निहायत गरीब और श्रम करने वालों को रोजगार दे रहा हूं।

मक्का को हम आम बोलचाल की भाषा में भुट्टा,  मकई और छल्ली भी कहते हैं। इसे तेलुगु में 'मोक्का जोनालु', तमिल में 'मक्काचोलम', मलयालम में 'चोलम', कन्नड़ में 'मुसुकिना जोला,  गुजराती में 'मक्कई', मराठी  में मकई तो बांग्ला में भुट्टा कहते हैं। 


भुट्टा खाने से फायदे - आयुर्वेद में भुट्टा खाने के कई फायदे गिनाए गए हैं। इससे प्यास शांत होती है।  जहां बहुत सी चीजें पकने के बाद अपना पोषक गुण खो देती हैं वहीं भुट्टे का पोषण और बढ़ जाता है। भुट्टे को पकाने के बाद उसके 50 प्रतिशत  एंटी-ऑक्सीअडेंट्स बढ़ जाते हैं। कई बार देखा होगा लोग पूरा भुट्टा खा लेने के बाद उसे बीच से तोड़कर सूंघते हैं। ऐसा करने से सर्दी-जुकाम में फायदा होता है।

भुट्टा कैरेटोनॉएड और विटामिन ए का अचछा स्त्रोत है। इसमें भरपूर मात्रा में एंटी-ऑक्सीडेंट पाया जाता है। बढ़ती उम्र के लक्षणों को रोकता है और कैंसर से लड़ने में मदद करता है। बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए भी ये बहुत फायदेमंद है। इसमें कोलेस्ट्रॉल न के बराबर होता है और इसलिए ये दिल की सेहत के लिए भी बहुत अच्छा है। इसमें मौजूद विटामिन सीबायोफ्लेविनॉयड और फीनोलिक कोलेस्ट्रोल और उच्च रक्त दबाव के स्तर को नियंत्रित रखता है। यह कैंसर की आशंका को भी कम करता है।

अल्सर से छुटकारा - भुट्टे में कार्बोहाइड्रेट यानी कि घुलनशील तथा अघुलनशील फाइबर की मात्र अधिक होती है। यह आंतों में बैक्टीरिया या बीमारी फैलाने वाले जीवाणुओं को खत्म कर देता है। इससे अल्सर के जोखिम को कम करने में मदद मिलती है। गेहूं के आटे के स्थान पर मक्के के आटे का प्रयोग करें तो यह लीवर के लिए अधिक लाभकारी है। यह प्रचूर मात्रा में रेशे से भरा हुआ है इसलिए इसे खाने से पेट अच्छा रहता है। कब्ज और बवासीर जैसी पाचन संबंधी समस्याओं से भी राहत मिलती है।

हड्डियां होती हैं मजबूत - भुट्टे के पीले दाने मिनरल्स से भरपूर होते हैं जिससे हड्डियां मजबूत होती हैं। भुट्टे में पाए जाने वाले मिनरल्स गुर्दे को सुचारू ढंग से काम करने में मदद करते हैं।

याददाश्त बढ़ाता है - भुट्टे में थायमिन और नायसिन जैसे विटामिन मौजूद होते हैं। थायमिन याददाश्त के लिए आवश्यक न्यूरोट्रांसमीटर का काम करता हैजिसके अभाव में उम्र बढ़ने के साथ-साथ अल्जाइमर रोग हो जाता है। नायसिन पैलेगरा होने से बचाता है जिसमें दस्त और आंत में सूजन जैसी स्थितियां होने की आशंका रहती है।

वजन घटाने में फायदेमंद - फाइबर से भरपूर भुट्टा वजन घटाने में सहायक होता है। कमजोरी होने पर भुट्टे का सेवन करने से तत्काल ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है। तो जनाब इतने फायदें हैं तो क्या सोचना जब भी कोई फुटपाथ पर भुट्टा बेचता हुआ नजर आए तो आप भी लिजिए स्वाद। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य

( CORN, BHUTTA, SUPER FOOD, MUNNAR)  आगे पढ़िए- मीठी यादों के संग मुन्नार से वापसी...

Monday, January 22, 2018

एरावीकुलम नेशनल पार्क – प्रकृति की गोद में कुछ घंटे

हमारे आटो वाले में हमें आखिरी पड़ाव के तौर पर एराविकुलम नेशनल पार्क लेकर गए। यह उद्यान मुन्नार से 15 किलोमीटर दूर है। यह स्थान देवीकुलम तालुक में पड़ता है। उद्यान के दक्षिणी क्षेत्र में अनामुडी चोटी है। अनामुडी दक्षिण भारत की सबसे ऊंची चोटी गिनी जाती है।

मूल रूप से इस पार्क का निर्माण नीलगिरी जंगली बकरों की रक्षा करने के लिए किया गया था। 1975 में इसे अभयारण्य घोषित किया गया था। वनस्पति और जंतु के पर्यावरण जगत में इसके महत्व को देखते हुए 1978 में इसे राष्ट्रीय उद्यान घोषित कर दिया गया। कुल 97 वर्ग किमी में फैला यह उद्यान प्राकृतिक सुंदरता के लिए मशहूर है। यहां दुर्लभ नीलगिरी बकरों को देखा जा सकता है। साथ ही यहां ट्रैकिंग की भी सुविधा उपलब्ध है।


अपनी अदभुत प्राकृतिक छटा और नीलगिरी बकरों जैसी खासियत के कारण इसे यूनेस्को विश्व धरोहर की सूची में शामिल करने के लिए प्रस्तावित किया गया है। एरावीकुलम नेशनल पार्क में कई किस्म के बटरफ्लाई और अन्य वन्य जीव जंतु देखे जा सकते हैं।
एरावीकुलम नेशनल पार्क इको टूरिज्म के लिए शानदार जगह है। मुन्नार से आप आटो से पहुंचे या टैक्सी से पार्क के राजामाला गेट के पास आपको प्रवेश के लिए टिकट लेकर इंतजार करना होगा। प्रवेश टिकट में पार्क सैर के लिए ले जाने वाली बस का किराया शामिल होता है।
पार्क का प्रवेश टिकट 90 रुपये का है। बच्चों के लिए टिकट 65 रुपये का है। पार्क का प्रवेश का समय सुबह 7.30 से शाम 4 बजे तक का है। विदेशी नागरिकों के लिए टिकट 360 रुपये का है। पार्क का टिकट आनलाइन भी खऱीदा जा सकता है। पार्क के प्रवेश द्वार पर एक रेस्टोरेंट और सोवनियर शॉप भी है।

नेशनल पार्क में ले जाने वाली बस के लिए हमलोग लाइन लग गए। हमारा नंबर आने पर एक बस में सवार हुए। हरे भरे चाय के बगानों से होती हुई बस चार किलोमीटर आगे ले जाकर एक एक प्वाइंट पर छोड देती है। पर इस दौरान कुदरत के शानदार नजारे दिखाई देते हैं। रास्ते में पहाड़ों से गिरता एक विशाल झरना भी नजर आता है। बस जहां हमें छोड़ देती है, वहां पर भी एक सोवनियर शॉप है जहां पर रंग बिरंगे मुखौटे और कई तरह की चीजें खरीद सकते हैं।

एरावीकुलम नेशनल पार्क में आगे क्या देखना है। बस पैदल चलते जाइए। और कुदरत के नजारे देखते रहिए। आगे कुछ व्यू प्वाइंट और फोटो प्वाइंट भी हैं। कुछ लोगों को यह सब कुछ बेकार सा भी लगता है। पर आप प्रकृति प्रेमी हैं तो सब कुछ काफी अच्छा लगेगा। दो किलोमीटर ऊपर तक जाने के बाद हमलोग वापस लौट आते हैं। वापसी में फिर बस के लिए लाइन में लगना पड़ता है।  
इस पार्क में खास नीलाकुरुंजी नामक फूल खिलता है। पर इस फूल को हर 12 साल बाद ही देखा जा सकता है। इसी पार्क से दक्षिण भारत की सबसे ऊंची चोटी अनामुडी के दर्शन किए जा सकते हैं। इसकी ऊंचाई 2695 मीटर है।

फरवरी और मार्च में हर साल बंद
एरावीकुलम नेशनल पार्क हर साल फरवरी और मार्च महीने में बंद रहता है। इस दौरान नीलगिरी के बकरों का प्रजनन काल होता है इसलिए तब के महीनों में पार्क को सैलानियों के लिए पूरी तरह बंद कर दिया जाता है। इसलिए इन महीनों में मुन्नार जाने पर आपको इस पार्क के नजारे देखने को नहीं मिलेंगे।

- vidyutp@gmail.com -
 ( ERAVIKULAM NATIONAL PARK, MUNNAR, RAJAMALA GATE  ) 

Sunday, January 21, 2018

जन्नत जैसा सुंदर - अथुकड वाटर फॉल्स

अगर कोई मुझसे पूछे की मुन्नार में सबसे सुंदर जगह कौन सी लगी तो मेरा जवाब होगा अथुकड वाटर फाल्स। चाय के बगानों के बीच इस झरने की खूबसूरती घंटो निहारते रहिए पर यहां से जाने की इच्छा नहीं होती। हरे भरे चाय के बगानों के बीच श्वेत दूध सरीखे पत्थरों से टकराकर आगे बढ़ती जलराशि ऐसा सुमधुर संगीत सुनाती है कि मन इन वादियों में गहरे में जाकर रम जाता है।
गहरी घाटी में स्थित यह झरना मुन्नार से 8 किलोमीटर दूर कोच्चि रोड पर स्थित है। अथुकड फॉल्य मुन्नार का एक प्रमुख पर्यटक स्थल है। मानसून के दिनों में (जुलाई-अगस्त) इसकी सुंदरता और भी बढ़ जाती है। इस झरने के अलावा भी इस रास्ते में दो और झरने भी हैं-चीयापरा फॉल्स और वलार फॉल्स।

अथुकड वाटर फाल मुन्नार से कोचीन के रास्ते पर स्थित है। मुन्नार से चलकर पालीवासल में कुछ किलोमीटर आगे बढ़ने पर बायीं तरफ चाय के बगानों के बीच एक रास्ता जाता है। इस रास्ते पर टाटा टी के पैकिंग सेंटर का विशाल दफ्तर दिखाई देता है। रास्ते में सारी संपत्ति टाटा टी एस्टेट की है। पतले ऊंचे नीचे पहाड़ी रास्तों पर चलते हुए दूर से ही हमें पहाड़ों के बीच बहते झरने की आवाज सुनाई देने लगती है। आटो वाले हमें एक पुल पर ले जाकर रोक देते हैं। वे हमें कहते हैं आप यहां जितना वक्त चाहे लगाएं मैं आटो पार्क करके खड़ा रहूंगा। इस पुल से झरने की विहंगम नजारा दिखाई देता है।

तो हमलोग काफी देर तक झरने का नजारा लेने के बाद आगे बढ़ते हैं। झरने के बगल में एक छोटा सा घर है। इस घर में एक कैंटीन चलती है। यहां आप आर्डर करके कुछ बनवा सकता है। मैगी खाने का आर्डर हमलोग कर देते हैं। बारिश ने ठंड और बढ़ा दी है तो मैगी चलेगी। तो हमलोग मैगी के इंतजार में अथुकड झरने के साथ कुछ और तस्वीरें लेते हैं। हमारे अलावा दो चार और लोग ही यहां पर आए हुए हैं। मैगी खाने और चाय पीने के बाद हमलोग अगली मंजिल के लिए प्रस्थान कर जाते हैं।

अथुकड आपको जंगलों में ट्रैकिंग का भी मौका उपलब्ध कराता है। अगर मौका हो तो ट्रैकिंग के लिए जाइए। पर अथुकड के वाटर फाल में नहाने के लिए अंदर घुसने की कोशिश हरगिज मत किजिए। यह झरना देखने में सुंदर है पर नहाने के लिए खतरनाक है। पानी की धारा इतनी तेज होती है कि तैरने वालों को बहा ले जाती है। इसलिए सिर्फ नजारे लेने भर के लिए ही यह अच्छा है। हालांकि अक्तूबर महीने में भी इस झरने में अथाह जलराशि विशाल पत्थरों के संग लगातार अठखेलियां करती हुई आगे बढ़ रही है। बारिश के दिनों में यहां जल धारा और तेज हो जाती है। वैसे यहां आप सर्दियों में भी आएं तो भी झरने में पानी मिलेगा।
अब अथुकड के कुछ किलोमीटर के दायरे में कुछ रिजार्ट भी बन गए हैं। जहां रहते हुए इन झरनों का नजारा किया जा सकता है और ट्रैक करते हुए यहां तक पहुंचा जा सकता है।
- vidyutp@gmail.com
(ATTUKAD WATER FALLS, MUNNAR, TATA TEA ESTATE  )