Monday, January 22, 2018

एरावीकुलम नेशनल पार्क – प्रकृति की गोद में कुछ घंटे

हमारे आटो वाले में हमें आखिरी पड़ाव के तौर पर एराविकुलम नेशनल पार्क लेकर गए। यह उद्यान मुन्नार से 15 किलोमीटर दूर है। यह स्थान देवीकुलम तालुक में पड़ता है। उद्यान के दक्षिणी क्षेत्र में अनामुडी चोटी है। अनामुडी दक्षिण भारत की सबसे ऊंची चोटी गिनी जाती है।

मूल रूप से इस पार्क का निर्माण नीलगिरी जंगली बकरों की रक्षा करने के लिए किया गया था। 1975 में इसे अभयारण्य घोषित किया गया था। वनस्पति और जंतु के पर्यावरण जगत में इसके महत्व को देखते हुए 1978 में इसे राष्ट्रीय उद्यान घोषित कर दिया गया। कुल 97 वर्ग किमी में फैला यह उद्यान प्राकृतिक सुंदरता के लिए मशहूर है। यहां दुर्लभ नीलगिरी बकरों को देखा जा सकता है। साथ ही यहां ट्रैकिंग की भी सुविधा उपलब्ध है।


अपनी अदभुत प्राकृतिक छटा और नीलगिरी बकरों जैसी खासियत के कारण इसे यूनेस्को विश्व धरोहर की सूची में शामिल करने के लिए प्रस्तावित किया गया है। एरावीकुलम नेशनल पार्क में कई किस्म के बटरफ्लाई और अन्य वन्य जीव जंतु देखे जा सकते हैं।
एरावीकुलम नेशनल पार्क इको टूरिज्म के लिए शानदार जगह है। मुन्नार से आप आटो से पहुंचे या टैक्सी से पार्क के राजामाला गेट के पास आपको प्रवेश के लिए टिकट लेकर इंतजार करना होगा। प्रवेश टिकट में पार्क सैर के लिए ले जाने वाली बस का किराया शामिल होता है।
पार्क का प्रवेश टिकट 90 रुपये का है। बच्चों के लिए टिकट 65 रुपये का है। पार्क का प्रवेश का समय सुबह 7.30 से शाम 4 बजे तक का है। विदेशी नागरिकों के लिए टिकट 360 रुपये का है। पार्क का टिकट आनलाइन भी खऱीदा जा सकता है। पार्क के प्रवेश द्वार पर एक रेस्टोरेंट और सोवनियर शॉप भी है।

नेशनल पार्क में ले जाने वाली बस के लिए हमलोग लाइन लग गए। हमारा नंबर आने पर एक बस में सवार हुए। हरे भरे चाय के बगानों से होती हुई बस चार किलोमीटर आगे ले जाकर एक एक प्वाइंट पर छोड देती है। पर इस दौरान कुदरत के शानदार नजारे दिखाई देते हैं। रास्ते में पहाड़ों से गिरता एक विशाल झरना भी नजर आता है। बस जहां हमें छोड़ देती है, वहां पर भी एक सोवनियर शॉप है जहां पर रंग बिरंगे मुखौटे और कई तरह की चीजें खरीद सकते हैं।

एरावीकुलम नेशनल पार्क में आगे क्या देखना है। बस पैदल चलते जाइए। और कुदरत के नजारे देखते रहिए। आगे कुछ व्यू प्वाइंट और फोटो प्वाइंट भी हैं। कुछ लोगों को यह सब कुछ बेकार सा भी लगता है। पर आप प्रकृति प्रेमी हैं तो सब कुछ काफी अच्छा लगेगा। दो किलोमीटर ऊपर तक जाने के बाद हमलोग वापस लौट आते हैं। वापसी में फिर बस के लिए लाइन में लगना पड़ता है।  
इस पार्क में खास नीलाकुरुंजी नामक फूल खिलता है। पर इस फूल को हर 12 साल बाद ही देखा जा सकता है। इसी पार्क से दक्षिण भारत की सबसे ऊंची चोटी अनामुडी के दर्शन किए जा सकते हैं। इसकी ऊंचाई 2695 मीटर है।

फरवरी और मार्च में हर साल बंद
एरावीकुलम नेशनल पार्क हर साल फरवरी और मार्च महीने में बंद रहता है। इस दौरान नीलगिरी के बकरों का प्रजनन काल होता है इसलिए तब के महीनों में पार्क को सैलानियों के लिए पूरी तरह बंद कर दिया जाता है। इसलिए इन महीनों में मुन्नार जाने पर आपको इस पार्क के नजारे देखने को नहीं मिलेंगे।

- vidyutp@gmail.com -
 ( ERAVIKULAM NATIONAL PARK, MUNNAR, RAJAMALA GATE  ) 

Sunday, January 21, 2018

जन्नत जैसा सुंदर - अथुकड वाटर फॉल्स

अगर कोई मुझसे पूछे की मुन्नार में सबसे सुंदर जगह कौन सी लगी तो मेरा जवाब होगा अथुकड वाटर फाल्स। चाय के बगानों के बीच इस झरने की खूबसूरती घंटो निहारते रहिए पर यहां से जाने की इच्छा नहीं होती। हरे भरे चाय के बगानों के बीच श्वेत दूध सरीखे पत्थरों से टकराकर आगे बढ़ती जलराशि ऐसा सुमधुर संगीत सुनाती है कि मन इन वादियों में गहरे में जाकर रम जाता है।
गहरी घाटी में स्थित यह झरना मुन्नार से 8 किलोमीटर दूर कोच्चि रोड पर स्थित है। अथुकड फॉल्य मुन्नार का एक प्रमुख पर्यटक स्थल है। मानसून के दिनों में (जुलाई-अगस्त) इसकी सुंदरता और भी बढ़ जाती है। इस झरने के अलावा भी इस रास्ते में दो और झरने भी हैं-चीयापरा फॉल्स और वलार फॉल्स।

अथुकड वाटर फाल मुन्नार से कोचीन के रास्ते पर स्थित है। मुन्नार से चलकर पालीवासल में कुछ किलोमीटर आगे बढ़ने पर बायीं तरफ चाय के बगानों के बीच एक रास्ता जाता है। इस रास्ते पर टाटा टी के पैकिंग सेंटर का विशाल दफ्तर दिखाई देता है। रास्ते में सारी संपत्ति टाटा टी एस्टेट की है। पतले ऊंचे नीचे पहाड़ी रास्तों पर चलते हुए दूर से ही हमें पहाड़ों के बीच बहते झरने की आवाज सुनाई देने लगती है। आटो वाले हमें एक पुल पर ले जाकर रोक देते हैं। वे हमें कहते हैं आप यहां जितना वक्त चाहे लगाएं मैं आटो पार्क करके खड़ा रहूंगा। इस पुल से झरने की विहंगम नजारा दिखाई देता है।

तो हमलोग काफी देर तक झरने का नजारा लेने के बाद आगे बढ़ते हैं। झरने के बगल में एक छोटा सा घर है। इस घर में एक कैंटीन चलती है। यहां आप आर्डर करके कुछ बनवा सकता है। मैगी खाने का आर्डर हमलोग कर देते हैं। बारिश ने ठंड और बढ़ा दी है तो मैगी चलेगी। तो हमलोग मैगी के इंतजार में अथुकड झरने के साथ कुछ और तस्वीरें लेते हैं। हमारे अलावा दो चार और लोग ही यहां पर आए हुए हैं। मैगी खाने और चाय पीने के बाद हमलोग अगली मंजिल के लिए प्रस्थान कर जाते हैं।

अथुकड आपको जंगलों में ट्रैकिंग का भी मौका उपलब्ध कराता है। अगर मौका हो तो ट्रैकिंग के लिए जाइए। पर अथुकड के वाटर फाल में नहाने के लिए अंदर घुसने की कोशिश हरगिज मत किजिए। यह झरना देखने में सुंदर है पर नहाने के लिए खतरनाक है। पानी की धारा इतनी तेज होती है कि तैरने वालों को बहा ले जाती है। इसलिए सिर्फ नजारे लेने भर के लिए ही यह अच्छा है। हालांकि अक्तूबर महीने में भी इस झरने में अथाह जलराशि विशाल पत्थरों के संग लगातार अठखेलियां करती हुई आगे बढ़ रही है। बारिश के दिनों में यहां जल धारा और तेज हो जाती है। वैसे यहां आप सर्दियों में भी आएं तो भी झरने में पानी मिलेगा।
अब अथुकड के कुछ किलोमीटर के दायरे में कुछ रिजार्ट भी बन गए हैं। जहां रहते हुए इन झरनों का नजारा किया जा सकता है और ट्रैक करते हुए यहां तक पहुंचा जा सकता है।
- vidyutp@gmail.com
(ATTUKAD WATER FALLS, MUNNAR, TATA TEA ESTATE  )



Saturday, January 20, 2018

मुन्नार के नजारे कुछ हिंदी फिल्मों में भी

चेन्नई एक्सप्रेस का मैच ग्राउंड। 
मुन्नार आम सैलानियों को ही नहीं बल्कि हिंदी के फिल्माकारों को भी लुभाता है। तो कुछ फिल्म निर्माता यहां शूटिंग करने पहुंच जाते हैं। हालांकि यहां ऊटी जितनी हिंदी फिल्मों की शूटिंग नहीं हुई है। पर कई लोकप्रिय हिंदी फिल्मों में मुन्नार के नजारे देखे जा सकते हैं।

शाहरुख की चेन्नई एक्सप्रेस -  याद किजिए फिल्म चेन्नई एक्सप्रेस में क्रिकेट का मैच। इस मैच को जिस ग्राउंड में खेला गया वह स्थल मुन्नार के बाजार में नए बस स्टैंड के पास ही स्थित है। चेन्नई एक्सप्रेस के एक गीत तू कश्मीर मैं कन्याकुमारी... में भी मुन्नार के चाय बगान के नजारे हैं। इसमें शाहरुख और दीपिका चाय बगानों के बीच सड़क पर नाचते गाते नजर आते हैं।
मुन्नार घुमाने वाले आटो और टैक्सी वाले आपको फिल्म शूटिंग के लोकेशन के बारे में जानकारी देते हैं।

 चेन्नई एक्सप्रेस के काफी हिस्सों की शूटिंग मुन्नार और देवीकुलम रेंज में की गई। ये फिल्म सुपर डुपर हिट रही थी। अप्रैल 2013 में चेन्नई एक्सप्रेस की शूटिंग के लिए शाहरुख फिल्म यूनिट के साथ मुन्नार पहुंचे थे। यहां 10 दिनों तक चेन्नई एक्सप्रेस की शूटिंग चली थी।
मु न्नार में फिल्म निःशब्द में जिया खान

अमिताभ बच्चन की निःशब्द - 

फिल्म राजा हिंदुस्तानी के काफी हिस्सों की शूटिंग मुन्नार में हुई है। अमिताभ बच्चन की फिल्म निःशब्द की तो लगभग पूरी शूटिंग ही मुन्नार में ही हुई है। इस फिल्म में अमिताभ बच्चन के एक प्रौढ़ की भूमिका में जिसका एक कम उम्र की लड़की के साथ इश्क परवान चढ़ता हुआ दिखाई देता है। साल 2007 में आई इस फिल्म के निर्माता रामगोपाल वर्मा थे। फिल्म में अमिताभ के साथ जिया खान थीं। यह दुखद रहा  कि जिया खान की असमय मौत हो गई। 

मुन्नार से मुट्टुपेडी डैम जाते समय डैम के आगे एक हरा भरा मैदान आता है। इसे हमारे आटो वाले फिल्म शूटिंग प्वाइंट बताते हैं। यहां कई मलयालम फिल्मों की शूटिंग भी हुई है। साल 2015 की मलयालम फिल्म चार्ली की शूटिंग इधर हुई। तो 2012 की मलयालम फिल्म फेस टू फेस की भी शूटिंग इधर हुई। 

2013 में फिल्म परदेशी (तमिल ) की भी इधर शूटिंग की गई। मोहनलाल की मलयालम फिल्म कर्मयोद्धा में मुन्नार के नजारे देखे जा सकते हैं। 2016 की सस्पेंस थ्रिलर मलयालम फिल्म मालगुडी डेज की भी इधर शूटिंग की गई। लाइफ ऑफ पाई की याद होगी आपको, उसके कुछ हिस्से मुन्नार में शूट किए गए। फिल्म हिंदी में भी आई थी। हालांकि उत्तर भारतीय निर्माता मुन्नार कम पहुंचते हैं। पर जिसे मुन्नार का सौंदर्य भा गया वह इसे फिल्मों का हिस्सा बनाना चाहता है।

फिल्म बाहुबली में आथिरापल्ली का झरना दिखाई देता है। यह कोच्चि से कोई 60 किलोमीटर की दूरी पर है। । अपनी मुन्नार यात्रा के दौरान आप आथिरापल्ली भी जा सकते हैं। केरल सरकार का पर्यटन विभाग केरल में फिल्म की शूटिंग के लिए सुविधाएं और रियायतें भी प्रदान करता है। 

-विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 
( MUNNAR AND HINDI FILMS ) 
मुन्नार देवीकुलम लेक- फिल्मकारों की पसंद

देवीकुलम लेक में चेन्नई एक्सप्रेस और शाहरुख खान



Friday, January 19, 2018

दुनिया भर के सैलानियों को बुलाता है केरल का आयुर्वेद

जब आप केरल के अलग अलग शहरों में घूमते हैं तो आपको केरला आयुर्वेद के साइन बोर्ड नजर आते हैं। मुन्नार में भी आप आयुर्वेदिक स्पा, मसाज थेरेपी आदि का लाभ उठा सकते हैं। खास तौर पर रिजार्ट और लग्जरी होटलों में ये सुविधा उपलब्ध है। आपको पता है कि केरल में आने वाले विदेशी सैलानियों में बड़ी संख्या में ऐसे लोग होते हैं जो केरल में आकर आयुर्वेदिक स्पा, पंचकर्म चिकित्सा, हिलिंग आदि कराते हैं। आयुर्वेद का केरल में पर्यटन कोई नई ऊंचाई तक पहुंचाने में बड़ा योगदान है। कोच्चि के आसपास और मुन्नार में कई बड़े होटल और रिजार्ट में आयुर्वेदिक चिकित्सा और पंचकर्म की सेवाएं प्राप्त की जा सकती हैं। आज केरल भारत का एकमात्र राज्य है जहां पूर्ण समर्पण के साथ आयुर्वेद की सेवाएं प्रदान की जाती हैं।

यहां आकर आप मसाज थेरेपी, कंबिनेसन थेरेपी, पंचकर्म, मौसमी पैकेज आदि से खुद को तरोताजा रख सकते हैं। कई रिसार्ट अपने यहां रहने के साथ थेरेपी का पैकेज प्रदान करते हैं। ये पैकेज पांच सितारा दरों पर उपलब्ध होती हैं। मुन्नार के क्षेत्र में तमाम रिजार्ट ऐसे पैकेज के बड़ी कमाई कर रहे हैं। आप मुन्नार के अलावा वायनाड, कोट्टायम, थ्रिशूर, थिरुवनंतपुरम, अलपुजा आदि जिलों में कई रिजार्ट में इस तरह के पैकेज का आनंद लेकर सेहत संवार सकते हैं। इन रिजार्ट का आर्गेनिक वातावरण मन मोह लेता है। ज्यादातर रिजार्ट आर्गेनिक उत्पादों से बना शाकाहारी आहार प्रवास के दौरान परोसते हैं।

चिकित्सा के लिए मानसून बेहतरीन समय – आयुर्वेद के पारंपरिक ग्रंथों से पता चलता है कि कायाकल्प कार्यक्रमों के लिए मानसून का मौसम सबसे अच्छा रहता है। इस दौरान वातावरण धूल रहित और शीतल रहता है। शरीर के रोम-छिद्र अधिकतम खुले होते हैं जो हर्बल तेल और उपचार के लिए शरीर को अनुकूल बनाते हैं।

आयुर्वेद की प्राचीन भूमि है केरल - वास्तव में केरल आयुर्वेद की अति प्राचीन भूमि है। राज्य की सम जलवायुजड़ी-बूटी और औषधीय पौधों से भरपूर जंगलों की प्राकृतिक प्रचुरता और ठंडा मौसम ( जून जुलाई और अक्तूबर नवम्बर) आयुर्वेद के आरोग्य प्रदान करने वाले और स्वास्थ्यकर औषधि पैकेज के लिए बेहतरीन है।

अगर भारत में आयुर्वेद के विकास की बात करें तो यह 600 ईस्वी पूर्व के आसपास माना जाता है। चिकित्सा की यह पद्धति शारीरिक विकारों की चिकित्सा के साथ-साथ उनसे बचने के उपायों पर बल देती है। देश में द्रविडों और आर्यों के समय से ही आयुर्वेद की चिकित्सा होती रही है। आजयह चिकित्सा की अनूठी शाखा है जो देश के बाहर भी लोकप्रिय हो रही है। आयुर्वेद केवल प्रभावित अंगों के उपचार में ही विश्वास नहीं करता बल्कि किसी व्यक्ति की संपूर्ण चिकित्सा करता है। यह आपको प्राकृतिक रूप से तरो-ताजा करता है। साथ ही शरीर के सारे विषैले असंतुलनों को दूर करता है और इससे व्यक्ति को शरीर में प्रतिरोधी क्षमता विकसित करने का मौका मिलता है।

फिल्म स्टार अक्षय कुमार हाल के दिनों में केरल में अपनी थकावट मिटा कर आए है। अक्षय ने थकान दूर करने के लिए कोई स्‍पा सेंटर नहीं बल्कि एक आयुर्वेदिक सेंटर चुनाजहां अक्षय हर तरह की नई तकनीक से दूर रहे। यहां तक की इस सेंटर में अक्षय कुमार के पास उनका फोन और सोशल मीडिया भी नहीं था।

फिल्म स्टार और राजनेता भी तरोताजा होने आते हैं - केरल के पूर्व मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन भी समय समय पर आयुर्वेदिक चिकित्सा का लाभ लेकर खुद को तरोताजा रखने में यकीन रखते हैं। यही कारण है कि 90 साल से ज्यादा के उम्र में भी वे 2016 के विधान सभा चुनाव में पूरी ऊर्जा से सक्रिय दिखाई दिए। कांग्रेस के नेता और पूर्व रक्षा मंत्री मंत्री ए. के. एंटनी जब केरल में 2001-2004 तक मुख्यमंत्री थेतब वह भी मानसून के मौसम में अपना आयुर्वेदिक उपचार कराया करते थे। आपको पता होगा कि आयुर्वेद अर्थराइटिस,  स्पांडिलाइटिस,  माइग्रेन,  लकवासिरदर्द,  गैस,  कब्ज,  सांस के रोग सहित अन्य बीमारियों में काफी लाभ पहुंचाता है।

केरल में कोट्टकल आर्य वैद्यशाला 

कोट्टकल आर्य वैद्यशाला - केरल आयुर्वेदिक चिकित्सा केंद्र सिर्फ राज्य में भी नहीं बल्कि राज्य से बाहर भी अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। केरल का प्रसिद्ध आयुर्वेदिक संस्थान 'कोट्टकल आर्य वैद्यशाला'  की शाखाएं केरल के बाहर कई राज्यों में फैल चुकी है। दिल्ली में पूर्वी दिल्ली के कड़कड़डूमा में इसका विशाल अस्पताल हमने देखा है, जहां बड़ी ईमानदारी के साथ मरीजों की चिकित्सा की जाती है। आर्य वैद्यशाला की स्थापना वैद्यराज पी एस वारियार ने 1902 में की थी। गांव में क्लिनिक के तौर पर शुरु हुआ ये केंद्र आज कई बड़े अस्पताल, डिस्पेंसरी चलाने के साथ अपनी दवाओं के निर्माण भी खुद ही करता है। अपनी तीन इकाइयों में यह 550 से ज्यादा दवाओं का निर्माण भी करता है।

 आयुर्वेद का मक्का

24 से 28 डिग्री रहता है केरल का तापमान जो सुरम्य है आयुर्वेद का मक्का

12,000 आयुर्वेदिक डाक्टर केरल में चिकित्सा में लगे हैं

900 से ज्यादा जड़ी बूटियां और औषधीय पौधे पाए जाते हैं केरल में

700 औषधीय पौधे पाए जाते है अगस्त्यकूदम पहाड़ी पर

100 सरकारी आयुर्वेदिक हास्पीटल हैं राज्य में जिसमें 2700 बिस्तर उपलब्ध हैं

800 पंजीकृत आयुर्वेदिक दवा बनाने वाली इकाइयां हैं राज्य में

1889 में देश का पहला आयुर्वेदिक कॉलेज केरल में आरंभ हुआ

38 से अधिक केरल टूरिज्म से मान्यता प्राप्त आयुर्वेदिक रिजार्ट हैं राज्य में


-         vidyutp@gmail.com

( KERALA AYURVEDA, WELLNESS, MONSOON,  KOTTAKKAL ARYA VAIDYA SALA )

Thursday, January 18, 2018

मुन्नार – चित्रापुरम के चाय के बगान

मुन्नार के लिए ऑनलाइन होटल की तलाश करते हुए मैंने ये देखा था कि चित्रापुरम इलाके में काफी होटल दिखाई दे रहे हैं। हालांकि मैंने वहां होटल बुक नहीं किया, पर मुन्नार में रहते हुए चित्रापुरम जाने की इच्छा हुई। दरअसल चित्रापुरम मुन्नार से इडुकी और अलेप्पी जाने वाली सड़क पर एक गांव है।

मुन्नार से 12 से 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस गांव में कुछ महंगे होटल और कुछ सस्ते गेस्ट हाउस उपलब्ध हैं। यह इलाका शहर के कोलाहल से दूर हरे भरे चाय के बगानों के बीच बसा है। खाने पीने के सीमित विकल्प हैं। पर उन लोगों के लिए अच्छा है तो अपनी कुछ दिनों की छुट्टियां प्रदूषण से दूर, शहर के चिल्लपों से दूर किसी गांव में गुजारना चाहते हैं। चित्रापुरम में रहते हुए आपको आसपास में घूमने के लिए होटल द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले टैक्सियों पर निर्भर रहना पड़ेगा।

मैं सुबह सुबह जगकर टहलने निकलता हूं। मुन्नार बाजार के बस स्टैंड से अलेप्पी जाने वली बस में बैठ जाता हूं। कंडक्टर से चित्रापुरम की टिकट ले लिया। बस में मेरे अगल बगल में बिहार के दो युवा इंजीनियर बैठे हैं जो मुन्नार घूमने के बाद अब अपने पिता के साथ अलेप्पी जा रहे हैं। मुन्नार को छोड़ते हुए वे बस में वीडियो बना रहे हैं। दोस्तों के संग वीडियो लाइव करने  जुटे हैं। बस हरे भरे चाय बगान  के बीचों बीच बनी सड़क पर आगे बढ़ रही है। अचानक कंडक्टर महोदय बताते हैं चित्रापुरम आ गया। मैं उतर जाता हूं,पर सुबह के कुहरे में कुछ दिखाई नहीं दे रहा। सामने एक बिल्डिंग जाता हूं। यह चर्च है। यहां पर रविवार की सर्विस में हिस्सा लेने लोग पहुंच रहे हैं। मैं गॉड को नमन कर आगे बढ़ जाता हूं। सड़क पर कुछ दूर चलने पर कुछ गेस्ट हाउस और होटल दिखाई देते हैं। आगे एक तिराहा आया। यहां पर चित्रापुरम पावर हाउस तीन किलोमीटर का बोर्ड लगा हुआ दिखाई देता है। मैं रास्ता बदलकर उसी तरफ चल पडता हूं। एक विशाल रिजार्ट दिखाई देता है। वहां से आगे बढ़ने पर चाय विशाल बगान।

चित्रापुरम के यह बगान भी टाटा टी की ही संपदा है। मैं चाय के बगानों में घुस जाता हूं। हल्की हल्की बारिश शुरू हो चुकी है। पर मैं बेपरवाह चाय के बगानों में टहल रहा हूं। यहां टी एस्टेट के अंदर भी एक लग्जरी होटल दिखाई देता है। कई सैलानी ऐसे हैं जो टी एस्टेट के अंदर बने होटल में निवास करना चाहते हैं।

अगर आप चाय की खेती में गहराई से जाएं तो पता चलता है कि इसमें भी कई तरह की उत्पाद निकलते हैं। पर चाय की फसल को बार बार नहीं लगाना पड़ता।एक बार बाग लगा दिया तो यह 100 से 150 साल तक चाय देता रहता है। बस करीने से इसकी पत्तियों को तोड़ना पड़ता है। मुन्नार में जगह जगह हमें महिलाएं चाय की पत्तियां तोड़ती हुई नजर आती हैं।

थोड़ी देर बाद वापस लौटने की सोचता हूं। मुख्य सड़क पर आकर एक रेस्टोरेंट में चाय की एक प्याली पीने की इच्छा जताता हूं।भला चाय के बगानों से लौटकर जो आया हूं तो एक प्याली चाय क्यों पी ली जाए। हल्की बारिश में भींग चुका हूं तो चाय और भी अच्छी लगती है। फिर मुन्नार बाजार वापस जाने के लिए बस मिल जाती है।


-        विद्युत प्रकाश मौर्य
(MUNNAR, CHITRAPURAM, TEA ESTATE, TATA TEA ) 

Wednesday, January 17, 2018

फ्लावर गार्डन, मुन्नार और मुट्टुपेट्टी डैम पर शूटिंग

मुन्नार में रहते हुए मुन्नार और उसके आसपास घूमने के कई तरीके हैं। आप टैक्सी बुक करके घूम सकते हैं। पर उससे भी सस्ता तारीका हो सकता है आटो रिक्शा बुक करके घूमना। आमतौर पर आटोरिक्शा वाले एक दिन के 800 रुपये लेते हैं। आटो दोनों तरफ से खुला रहता है इसलिए अच्छा नजारा दिखाई देता है। आमतौर पर मुन्नार में हर आटोरिक्शा वाला गाइड और घुमाने का काम करता है। (राजकुमार आटोवाला - 9447986627 ) 
तो हमने भी पहले दिन एक आटोवाले से बात कर ली थी कि कल आपके साथ घूमने चलेंगे। हमारे आटोवाले अच्छे गाइड भी हैं। साथी वे ट्रैकिंग गाइड के तौर पर भी अपनी सेवाएं देते हैं। अगले दिन वे हमें धोखा दे गए किसी ट्रैकिंग ग्रूप के साथ चले गए। वहां ज्यादा कमाई थी। पर वे हमें एक दूसरा आटोवाला सुपुर्द करके गए।

मुन्नार में तीन अलग-अलग दिन तीन अलग अलग रुट पर आप घूमने का कार्यक्रम बना सकते हैं। वैसे केरल टूरिज्म के मुन्नार स्थित दफ्तर में जाकर टूर बुक किया जा सकता है। इसमें छोटे आकार की बस आपको दिन भर घूमाती है।
पहले दिन हमारी दिन भर की भ्रमण यात्रा का पहला पड़ाव था मुन्नार का फ्लावर गार्डन। यह मुख्य बाजार के पास ही स्थित है। उद्यान विभाग द्वारा व्यस्थित इस गार्डन में कई हजार किस्म के फूल और औषधीय पौधे हैं। फ्लावर गार्डन के लिए 30 रुपये का प्रवेश टिकट है। बच्चों के लिए टिकट 15 रुपये का होता है।    

हमारा अगला पड़ाव ह मुट्टुपेट्टी डैम। मट्टुपेट्टी डैम समुद्र तल से 1700 मीटर ऊंचाई पर स्थित है। यहां पर बनी मट्टुपेट्टी झील और बांध पर पर्यटक पिकनिक मनाने आते हैं। यहां से चाय के बागानों का मनमोहक दृश्य नजर आता हैं। यहां पर पर्यटक बोटिंग का भी आनंद ले सकते हैं। मट्टुपेट्टी अपने उच्च विशिष्टीकृत डेयरी फार्म के लिए प्रसिद्ध है। मट्टुपेट्टी के अंदर व आसपास के शोला वन ट्रैकिंग करने की सुविधा उपलब्ध कराता हैं। ये जंगल विभिन्न प्रकार के पक्षियों का घर भी है। यहाँ एक छोटी सी नदी और पानी का सोता भी है जो यहां के आकर्षण को और भी बढ़ा देता है। इस डैम के पास आप शूटिंग, फोटोग्राफी आदि का आनंद ले सकते हैं। भुट्टा और कुछ और चीजें खाने पीने के लिए भी उपलब्ध हैं। मुट्टुपेट्टी डैम पर हमें फोटोग्राफर मिले जिनसे हमने फेमिली फोटो खिंचवाई। (रमेश - 8547955668 ) 

मुट्टूपाट्टी डैम के मार्ग पर आपको आटो वाले जंगल हनी बी प्वाइंट दिखाएंगे। वह कुछ खास नहीं है। मधुमक्खी के छत्ते तो बहुत लोगों ने देखा होगा। रास्ते में सड़क पर एक जगह है जहां जंगली हाथी आते हैं। संयोग से हमें कुछ दूरी पर जंगलों में हाथी विचरण करते हुए दिखाई दे गए।

इस मार्ग का आखिरी प्रमुख आकर्षण कुंडाला लेक और टॉप स्टेशन है। पूरे रास्ते में दोनों तरफ आपको चाय के विशाल बगान तो नजर आते ही रहते हैं। मुन्नार में सर्दियों में भी बारिश होती रहती है। यह बारिश मौसम को और भी सुहाना और आकर्षक बना देती है।

कुंडाला झील पर बना डैम केरल के प्रमुख डैम में से एक है। इसका नाम सेतुपार्वती डैम है। यह 850 फीट लंबा है। इस डैम का निर्माण त्रावणकोर के महाराजा चित्रथिरुनाल बालाराम वर्मा ने अपने शासन काल के 25 साल होने पर करवाया था। डैम के ऊपर सड़क है जिसे दर्शक आरपार कर जाते हैं। उस पार खाने पीने की छोटी दुकानें हैं। तो हल्की से पेटपूजा के बाद वापस चलते हैं।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य
(KUNDALA LAKE, MADUPATTY DAM, TOP STATION, MUNNAR ) 

Monday, January 15, 2018

मुन्नार में कभी चलती थी मोनो रेल

कानन देवन हिल प्लांटेशन का दफ्तर जो कभी लाइट रेलवे का स्टेशन हुआ करता था। 
मुन्नार प्रसिद्ध है अपने हरे भरे चाय के बगानों के लिए। यहां चाय की खेती सैकड़ो साल से हो रही है। अब मुन्नार में जितने भी चाय के बगान हैं वे टाटा समूह के अधीन आते हैं। पर एक मजेदार और बात ऐतिहासिक तथ्य है कि मुन्नार में देश की पहली मोनो रेल चली थी।

भले ही आज मुन्नार रेल से संपर्क में नहीं है पर किसी जमाने में यहां चाय के परिवहन के लिए रेल चलाई गई थी।  तो चलिए चलते उलटते हैं अतीत  के कुछ पन्ने। मुन्नार में 1902 से 1908 के बीच कुंडाला वैली मोनो रेल का संचालन किया गया। हम मुन्नार भ्रमण के दौरान मुन्नार बाजार से कुंडाला लेक और टॉप स्टेशन तक के नजारे देखने गए। पर इन्ही नजारों के बीच कभी मोनो रेल चलती थी। इसका संचालन कानन देवन चाय कंपनी द्वारा किया जाता था। इसका निर्माण 1902 में मुन्नार से टॉप स्टेशन के बीच किया गया। 

इसे रेलवे को खास तौर पर चाय के परिवहन के लिए संचालित किया जा रहा था। इसके ट्रैक को मुन्नार से टाप स्टेशन को जा रही सड़क पर ही किनारे किनारे बिछाया गया था। मुन्नार में अब उस रेल को देखने वाला कोई नहीं बचा। पर स्थानीय लोगों को मालूम है कि कभी यहां पर रेल चलती थी। यह मोनो रेल भी तकनीक के लिहाज से पटियाला स्टेट मोनो रेल की तरह इविंग सिस्टम पर भी आधारित थी।

क्यों जरूरत पड़ी मोनो रेल की। दरअसल 1902 तक टाटा टी कंपनी देश के प्रसिद्ध चाय उत्पादक कंपनियों में शुमार हो चुकी थी। पूरे देश में उसकी कुल 16 ताय फैक्ट्रियां थीं। मुन्नार मेंचाय के उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा हर साल ब्रिटेन भेजा जाता था। इसके लिए तमिलनाडु के तूतीकोरीन बंदरगाह तक ताय पहुंचाई जाती थी। पर तब चाय के परिवहन के लिए तेज गति वाले साधनों का अभाव था। तब कंपनी के जनरल मैनेजर एम माइम ने एक मोनोरेल  स्थापित करने की योजना बनाई। इसे मुन्नार वाया मुट्टुपेट्टी होते हुए टॉप स्टेशन तक चलाया गया। 
मुन्नार में एलुमिनियम ब्रिज - कभी इस पुल से होकर गुजरती थी लाइट रेल 

बैल खींचते थे मोनो रेल
इस मोनो रेल को संचालित करने के लिए 500 बैल बहाल किए गए। इन बैलों की देखभाल के लिए एक वेटनरी डाक्टर और दो सहायक भी इंग्लैंड से बुलाए गए। मतलब साफ है कि इस मोनो रेल को कोई लोकोमोटिव नहीं खींचता था।  इस मोनो रेल का एक छोटा पहिया लोहे की पटरी पर चलता था तो दूसरा बड़े आकार का पहिया सड़क पर।  टॉप स्टेशन से चाय को रोपवे से कोटागुड्डी तक पहले लाया जाता था। इसे बाटम स्टेशन भी कहा जाता था। बॉटम स्टेशन से चाय को मोनो रेल से मुन्नार लाया जाता था। फिर यहां से चाय पैक होकर तूतीकोरीन बंदरगाह तक जाती थी। चाय की पैकिंग के लिए जो कंटेनर इस्तेमाल किए जाते थे वे इंपेरियल चेस्ट कहलाते थे जो ब्रिटेन से लाए जाते थे।

1908 में मोनो रेल की जगह लाइट रेल
पर 1908 में मोनो रेल को लाइट रेलवे में बदल दिया गया। इसका उद्देश्य था चाय की ज्यादा तेज गति से ढुलाई। मोनो रेल की जगह मुन्नार बाजार से टाप स्टेशन तक 32 किलोमीटर के मार्ग में 2 फीट यानी 610 एमएम की पटरियां बिछाई गईं। रेलवे के संचालन के लिए स्टीम लोकोमोटिव मंगाए गए। तब रास्ते में इसके दो स्टेशन बनाए गए। पालार और मुट्टुपेडी में इसका स्टेशन हुआ करता था। फिलहाल मुन्नार बाजार में काननदेवन हिल टी प्लांटेशन का जो क्षेत्रीय कार्यालय है, वह कभी लाइट रेलवे का स्टेशन हुआ करता था। इसके साथ ही मुख्य दफ्तर भी यहीं था। चाय को उतारने के लिए जो प्लेटफार्म का इस्तेमाल किया जाता था वहां पर अब सड़क बन गई है। इसके बगल में छोटी बह रही नदी पर एक एलुमिनियम का पुल आज भी दिखाई देता है। इस पुल से होकर ही कभी लाइट रेलवे गुजरती थी। पर अब उस पुल के ऊपर सड़क बना दी गई है। हालांकि वह पुल अभी भी बेहतर हालत में है।  

और बाढ़ में सब कुछ बर्बाद हो गया

1924 में यह लाइट रेलवे भी बंद हो गई। कैसे बंद हुई इसकी दास्तां दुखद है। दरअसल 1924 में मुन्नार इलाके में बाढ़ के रुप में प्रकृति का कहर बरपा। इस बाढ़ ने मुन्नार से टाप स्टेशन तक कुंडाला वैली रेलवे के ट्रैक और रोलिंग स्टाक को बरबाद कर दिया। बरबादी इतनी भीषण थी, बाढ़ का असर खत्म होने के बाद इस रेलवे लाइन को फिर से नहीं बनाया जा सका। जुलाई 1924 में आए इस बाढ़ को केरल में ग्रेट फ्लड आफ 99 कहते हैं। मलयालम कैलेंडर में यह 1099 का साल था। खास तौर पर पेरियार नदी ने काफी कहर ढाया था। एर्नाकुलम, इडुकी, कोट्टायम, त्रिशूर, अलपुजा आदि जिलों में बाढ़ से काफी बरबादी हुई थी।  

इस तरह कुंडाला वैली लाइट रेलवे इतिहास के पन्नों में समा गई। अब मुन्नार में मोनो रेल या लाइट रेलवे की स्मृति में कुछ दिखाई नहीं देता। दिखती है तो बस चाय की बगानें। 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
( KUNDALA VALLY MONO RAIL, MUNNAR, TATA TEA ) 

 
पालार में कभी लाइट रेलवे का स्टेशन हुआ करता था। 



Sunday, January 14, 2018

मुन्नार - जम कर खाइए और घूम-घूम कर पचाइए

अगर आप शाकाहारी हैं तो मुन्नार में आपको परेशान होने की जरूरत नहीं है। मुन्नार में आपको हर तरह की शाकाहारी भोजन की थाली मिल जाएगी। यहां तक कि उत्तर भारतीय मारवाड़ी और जैन थाली भी मिल जाएगी। बस थोड़ी अधिक कीमत चुकानी पड़ेगी।
वैसे मुन्नार के सबसे लोकप्रिय फूड जंक्शन की बात करें तो वह है सरवन भवन। हालांकि ये सरवन भवन चेन्नई वाले सरवन भवन की शाखा नहीं है। पर यह मुन्नार का सबसे ज्यादा चलता हुआ और वाजिब दरों पर खाना परोसने वाला रेस्टोरेंट है। यह सुबह से शाम तक लगातार खाना परोसता है। केले के पत्ते पर डोसा, इडली, उत्तम के अलावा बिरयानी और कई तरह के व्यंजन। अनादि यहां पर कई बार चाउमीन खाते रहे। पर सबसे सस्ता है यहां पर पराठा खाना। पर ये पराठा दक्षिण भारतीय होता है।
मतलब मैदे का पराठा और साथ में चूरमा। यानी रसेदार सब्जी। पर आप मुन्नार में इससे भी सस्ता पराठा खा सकते हैं। मुख्य बाजार में स्ट्रीट फूड वाले स्टाल पर। यहां स्थानीय खाने वालों की भीड़ खूब उमड़ती है। बाकी मुन्नार में मांसाहारी भोजनालय खूब हैं।

पर हम कुछ और शाकाहारी पेटपूजा वाले स्थलों की बात करेंगे। मुख्य बाजार में बस स्टैंड के पास एक बेकरी है जहां पर आप पेस्ट्री, समेत कई तरह के नमकीन का स्वाद ले सकते हैं। राजस्थानी स्वाद वाले शाकाहारी भोजन के लिए पुरोहित भोजनालय पहुंचिए। यहां सुबह नास्ते में पराठा भी मिल जाएगा। थाली थोड़ी महंगी है। पर दक्षिण भारत के हिल स्टेशन में पहुंच कर उत्तर भारतीय खाने की तलाश करेंगे तो थोड़ी जेब तो ढीली करनी पडेगी।

दरअसल यहां उत्तर भारतीय रसोईया को लाकर काम लेना महंगा पड़ता है। पंजाबी थाली, राजस्थानी थाली, गुजराती थाली, बांबे थाली आदि सब मिल जाएगा। 190 रुपये से 300 रुपये के रेंज में जाकर। एक और विकल्प है श्री महावीर भोजनालय का।  हमलोगों ने कई बार महावीर भोजनालय का रुख किया। यह मुन्नार का एक औ चलता हुआ रेस्टोरेंट है। इससे थोड़ा आगे बढ़े तो संगीता रेस्टोरेंट भी शाकाहारी विकल्प के तौर पर आपका स्वागत करता है।

पर मुन्नार में रोज सुबह के नास्ते में मेरी पसंद बना रहा है पुट्टु.दक्षिण भारतीय चावल का बना यह डिश गरम खाने में काफी अच्छा लगता है। अनाई रेस्टोरेंट में हम रोज यही खाते रहे। माधवी मसाला डोसा पसंद करती हैं तो अनादि को अब दक्षिण के बड़ा खूब पसंद आने लगा है। पहले वह मैसूर भाजी पसंद करते थे।तो खाने पीने की बहुत बात हो गई चलिए अब घूमने चलते हैं।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य  ( SARAVANA BHAWAN, MUNNAR, PUROHIT VEG, MAHAVEER BHOJNALYA ) 

Saturday, January 13, 2018

केरल – द स्पाइस कोस्ट ऑफ इंडिया

जब आप मुन्नार में रहकर आसपास घूमने निकलते हैं तो टैक्सी और आटोरिक्शा वाले स्पाइस गार्डन जरूर लेकर जाते हैं। मुन्नार कोचीन मार्ग पर ऐसे कई स्पाइस गार्डन बने हैं। ये निजी गार्डन किसी म्युजियम जैसे हैं। यहां पर आप मसालों की दर्जनों किस्मों के पेड़ और औषधीय पौधे भी देख सकते हैं। इनके सेल्स आउटलेट यानी बिक्री केंद्र से खरीदारी भी कर सकते हैं। हमलोग भी एक ऐसे ही स्पाइस गार्डन में पहुंच हैं। यहा 100 रुपये का प्रवेश टिकट है। साथ में एक गाइड मिलती है मुबीना मसालों के बारे में हिंदी में वे रोचक ढंग से जानकारी देती हैं। इस उद्यान में एक मिनी जू भी बना है। इसमें परंपरागत चूल्हे भी देखे जा सकते हैं। 


आपके खाने की थाली भला बिना मसालों को हो सकती है क्या। भारतीय खाने का स्वाद मसालों के बिना अधूरा है। पर ये मसाले सिर्फ स्वाद नहीं सेहत के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। और इन मसालों की खेती के लिए हजारों साल से मशहूर का दक्षिण का राज्य केरल।

केरल के मसालों का जादू तीसरी शताब्दी ईस्वी पूर्व से पूरी दुनिया में बोल रहा है। कहा जाता है वास्कोडिगामा को इन मसालों की खुशबू ही यहां तक खींच लाई। रोम ने केरल के मसालों को खरीदने के लिए अपने खजाने की बोरी खोल दी थी। वहीं चीन अपने सिल्क के वस्त्रों के बदले यहां के मसालों की तिजारत करते थे। आजकल भी केरल तकरीबन 12 तरह के मसालों के साथ दुनिया भर में राज करता है। आज केरल मसालों का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है।

तो फोर्ट कोच्चि के गलियों में घूमते हुए आप किस्म किस्म के मसालों की सजी हुई दुकानें भी देख सकते हैं और खरीद भी सकते हैं। इतिहास में केरल की प्रसिद्धी दुनिया में दूर दूर तक इसके सुगंधित मसालों के कारण फैली थी। केरल के मसाले सुगंध देने के साथ साथ सेहत के लिए भी काफी लाभकारी होते हैं।


काली मिर्च (BLACK PEPPER ) तमाम मसालों के बीच काली मिर्च का अपना महत्व है। केरल में काली मिर्च की खेती मिश्रित फसल पद्धति के तौर पर की जाती है। केरल के वयनाड जिले में काली मिर्च के पौधे कॉफी के पौधे के साथ लगाए जाते हैं। इस तरह एक साथ दो फसल वहां उगाई जाती है। वहां इसकी खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। हांलाकि काली मिर्च की खेती कर्नाटक, तमिलनाडु और अंडमान निकोबार में भी की जाती है। काली मिर्च पाचन क्रिया में काफी लाभकारी है। काली मिर्च, नमक, जीरा और आजवाइन के साथ भून कर लेने पर पाचन तंत्र दुरुस्त रहता है। काली मिर्च वजन को कम करने में भी सहायक है।

छोटी इलायची (CARDAMOM )- अपने अनोखे सुगंध और स्वाद के कारण इसे 'मसालों की रानी' कहा जाता है। इलायची एक बारहमासी, शाकीय, प्रकन्दीय मूल का पौधा है। पश्चिमी घाट का मौसम इलायची की खेती के लिए अनुकूल है। केरल और और कर्नाटक में बड़े पैमाने पर इलायची की खेती होती है। इलायची का सेवन आमतौर पर लोग सांस और मुंह को साफ रखने के लिए करते हैं। पर यह वाजीकरण के नुस्खे के तौर पर भी काम करता है। यह सेक्स पावर बढ़ाने और इंसान को हमेशा युवा बनाए रखने में भी काफी कारगर है।

दालचीनी (CINNAMON)  – दालचीनी एक छोटा पर सदाबहार पेड़ है। मसाले में दालचीनी के पेड़ की छाल का इस्तेमाल होता है। यह 10–15 मीटर तक ऊंचा होता है। इसकी खेती श्रीलंका में अति प्राचीन काल से की जाती थी। केरल में भी दालचीनी की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। दालचीनी को वंडर स्पाइस भी कहते हैं। यह खाने का जायका बढ़ाने के साथ गठिया का दर्द दूर करने में लाभकारी है। दालचीनी पाउडर को शहद के साथ लेने पर दर्द में आराम मिलता है। एक चम्मच शहद और आधा चम्मच दालचीनी का पाउडर को मामूली गरम पानी के साथ नियमित तौर पर लेने से गठिया में आराम पड़ता है। दालचीनी पाउडर का पानी में पेस्ट बनाकर जोड़ो पर मालिश भी करने से गठिया दूर होता है।

लौंग – (CLOVE) -  अब बात लौंग की। केरल का एक सामान्य मसाला माना जाने वाला लौंग वास्तव में यूजीनिया कैरिओफिलीटा नामक वनस्पति की सूखी हुई कली होती है। केरल के लोग इसे ग्रम्बु या करयम्बु कहते हैं। लौंग गरम मसाला का प्रमुख सदस्य है। इसे गरम मसाला में विभिन्न अनुपातों में भूनकर और पीसकर तैयार किया जाता है। लौंग का औषधीय इस्तेमाल भी है। यह दांतो के दर्द उल्टी आदि में भी काफी काम आता है। अगर पहाड़ों की चक्करघिन्नी वाली यात्रा में आपको उल्टी होती हो तो लौंग चबाएं, आराम मिलेगा। 

हमलोगों ने स्पाइस गार्डन में सैर के दौरान काफी कुछ सीखा और समझने की कोशिश की। सुरम्य वातावरण में वहां एक हरी भरी दुनिया थी। हल्की बारिश ठंड बढ़ा रही थी।

केरल में मसालों की खेती का इतिहास तकरीबन पांच हजार साल पुराना है। पर अब यहां मसालों को लेकर अनुसंधान संस्थान भी खोले गए हैं। केंद्र सरकार के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय की संस्था स्पाइस बोर्ड ऑफ इंडिया का मुख्यालय केरल के कोच्चि शहर में है। केरल के इडुक्की जिले में मसालों की खेती बड़े पैमाने पर होती है।

अकेले इडुक्की जिले में ही स्पाइस बोर्ड के 20 क्षेत्रीय कार्यालय खुले हैं। स्पाइस बोर्ड की सूची में कुल 52 तरह के मसालों के नाम हैं। ये अलग अलग तरह के पौधों के जड़, तना, पत्ती या फलों से प्राप्त होते हैं।

जब कोई केरल का व्यक्ति अपने बाहर के राज्य को दोस्तों रिश्तेदारों को कुछ उपहार देने की सोचता है तो सबसे पहले उसे मसालों की पोटली का ख्याल आता है। भला इससे बेहतरीन उपहार क्या हो सकता है।
 
- vidyutp@gmail.com

( SPICE OF KERALA, BLACK PEPPER, CARDAMOM, CINNAMON, CLOVE, MUNNAR )