Sunday, December 31, 2017

मालाबार एक्सप्रेस से केरल की ओर...

मालाबार एक्सप्रेस सही समय पर मेंगलुरु सेंट्रल से प्लेटफार्म नंबर 2 से चल पड़ी। शाम 6.15 बजे खुली ट्रेन के एर्नाकुलम तक पहुंचने में कुल 36 स्टाप हैं। पर ट्रेन समय पर चल रही है। कासरगोड केरल में पडऩे वाला पहला रेलवे स्टेशन है। हमने रात नौ बजे के आसपास कन्नूर में ट्रेन से वेज बिरयानी ली। हालांकि यह बिरयानी अच्छी नहीं थी। पहली बार दक्षिण की किसी रेल में खराब खाना मिला। हालांकि इस रेल मार्ग पर दूसरी बार जा रहा हूं। साल 2012 में मंगला लक्षदीप से गुजरा था। पर कुछ स्टेशन जागते हुए गुजरे। कांजगाड के बार पन्नूर।
कन्नूर गुजरने के बाद एक स्टेशन का नाम देखते ही मैं चौंक पड़ा माहे। जी हां माहे जरूर कन्नूर के पास है, पर यह पुडुचेरी राज्य का हिस्सा है। कभी यह फ्रेंच कालोनी हुआ करता था। इसलिए इसे पुडुचेरी के साथ आजादी मिली और माहे आज भी पुडुचेरी का हिस्सा है। माहे एक समुद्र तटीय रेलवे स्टेशन और छोटा सा प्यारा सा शहर है। चारों तरप से केरल से घिरा हुआ माहे केरल में नहीं है, है ना कुछ अलग बात। आप चाहें तो माहे में उतरकर यहां के समुद्र तट देखने का आनंद उठा सकते हैं।

कालीकट आने पर नींद आ गई। पर जल्द ही नींद काफूर हो गई क्योंकि हमें 3.30 बजे ट्रेन से उतरना था। शोरानूर, त्रिशूर के बाद चालकुडी और अंगामाली आए। अंगामाली फार कालडी। कालडी यानी आदि शंकराचार्य का गांव। इसके बाद अलुवा। अलुवा अब तो कोचीन शहर का ही बाहरी इलाका हो गया है। और सुबह 3.30 बजे हमलोग एर्नाकुलम टाउन में उतर गए थे। एर्नाकुलम साउथ से तुलना करें तो छोटा रेलवे स्टेशन है एर्नाकुलम टाउन। यहां सिर्फ दो ही मुख्य प्लेटफार्म हैं। प्लेटफार्म नंबर दो काफी संकरा है। हमलोग चलकर एक नंबर पर आ गए हैं। यहां हाल में वातानूकुलित वेटिंग हाल बना है। इस्तेमाल के लिए शुल्क है 25 रुपये प्रति घंटा।


हमारी मुन्नार जाने वाली बस सुबह 10 बजे है तो हमारे पास अभी छह घंटे का वक्त है काटने के लिए। वह भी सुबह के 4 बजे का समय जब खूब अच्छी नींद आती है। तो हमने माधवी अनादि को प्लेटफार्म पर छोड़ दिया और आसपास में कोई होटल की तलाश में निकल गया। स्टेशन के बाहर दाहिनी तरफ गली में एक अच्छा होटल मिल गया। उन्होंने बताया कि 1200 रुपये का कमरा है लेकिन 5 घंटे के लिए 400 में दे दूंगा। सौदा बुरा नहीं था। मैं माधवी और वंश को बुला लाया और इस कमरे में हमलोग जाकर सो गए। होटल का नाम है सिल्वर स्पेस। एर्नाकुलम टाउन स्टेशन के पास रहने के लिए अच्छा होटल है।
सुबह नौ बजे हमलोग तैयार हुए। स्टेशन पर आकर प्रीपेड आटो रिक्शा बुक किया, वाइटिला मोबलिटी हब के लिए। सात किलोमीटर का किराया 100 रुपये।  
वाइटिला मोबलिटी हब यानी कोचीन शहर का प्राइवेट बस स्टैंड। पर यह बना काफी शानदार है। साफ सुथरा और विशाल। इसके प्लेटफार्म का नंबर हैं बे नंबर। हमारी बस बे नंबर 12 से आएगी। बस आपरेटर का मेरे मोबाइल पर फोन आ चुका है। वाइटिला मोबलिटी हब के अंदर बहुत ही साफ सुथरी कैंटीन बनी है। कई फूड स्टाल भी हैं। कैंटीन में ही हमलोग हल्का नास्ता लेते हैं। पहाड़ो की चढ़ाई है इसलिए ज्यादा खाना नहीं। पुराने अनुभव से सावधान हैं हमलोग। स्काटलैंड से आए 65 साल के पति पत्नी भी हमारी तरह केरॉस की बस का इंतजार कर रहे हैं, उन्हें भी मुन्नार ही जाना है। उनसे बातों में वक्त गुजर रहा था तभी सफेद रंग की सुंदर सी बस आ गई। हम अपनी पहले चुनी हुई खिड़की वाली तीन अलग अलग सीटों पर जाकर पसर गए।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
(MANGLURU, MALABAR EXPRESS, MAHE, COCHIN, ERNAKULAM TOWN ) 




Saturday, December 30, 2017

मंगलुरू की गड़बड़ आइसक्रीम – दूर दूर तक हैं दीवाने

मैंने सुबह ही अनादि को बता दिया था आज आपको आइसक्रीम खिलाउंगा। वे इसको लेकर पुलकित थे। मंजूनाथ स्वामी के दर्शन के बाद हमलोग मंगलुरु की प्रसिद्ध गड़बड़ आइसक्रीम खाना चाहते थे। मंदिर परिसर में एक सज्जन ने बताया कि आप आटो रिक्शा वाले को कहना कि वह आपको आइडियल क्रीम पार्लर छोड़ दे। हमने ऐसा ही किया। रेलवे स्टेशन से एक किलोमीटर पहले बाजार में आटोरिक्शा ने हमें आइडियल क्रीम पार्लर के बाहर छोड़ दिया। वैसे तो मंगलुरू में गड़बड़ आइसक्रीम बेचने वाले आईडियल क्रीम पार्लर के कई आउटलेट खुल गए हैं। पर रेलवे स्टेशन के पास जीएचएस रोड, हंपनकट्टा स्थित इस पार्लर में बैठने के लिए विशाल हाल बना है। यहां सिर्फ कई किस्म के आइसक्रीम और जूस पेश किए जाते हैं। पर दिन भर खाने पीने वालों की आवाजाही लगी रहती है।

आइडियल क्रीम पार्लर की स्थापना 1975 में हुई। इसके संस्थापक प्रभाकर कामत थे। मार्केट रोड पर जब उन्होंने अपना पहला आउटलेट खोला तो 14 फ्लेवर में आइसक्रीम पेश कर रहे थे। लेकिन उनका गड़बड़ आइसक्रीम ब्रांड बन गया। उनका नजरिया था कि वाजिब कीमत पर लोगों को बेहतर गुणवत्ता की आइसक्रीम खाने को मिले। अब अगली पीढ़ी में मुकुंद कामत इस कामकाज को आगे बढ़ा रहे हैं। मुकुंद नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीट्यट बेंगलुरु से ज्ञान लेकर आए और आइसक्रीम के पारिवारिक कारोबार को और आगे बढ़ाया। 2003 में उन्होंने श्रेष्ठ गुणवत्ता की आईसक्रीम बनाने का प्लांट लगाया। आज वे 1500 आउटलेट और सहयोगियों को आइडियल ब्रांड का आइसक्रीम सप्लाई भी कर रहे हैं। कर्नाटक के अलावा केरल और गोवा तक उनके उत्पाद पहुंच रहे हैं।

आइसक्रीम बनाने में उन्हें कई अवार्ड मिल चुके हैं। उनकी योजना आईडियल ब्रांड को दूसरे राज्यों तक भी ले जाने की है। बाद में वे ऐसे पार्लर की परिकल्पना लेकर आए जहां परिवार के साथ बैठकर आइसक्रीम का आनंद लिया जा सके। थोड़ी हंसी ठिठोली की जा सके। और इन लम्हों को यादगार बनाया जा सके। हालांकि वे कई तरह की आईसक्रीम पेश करते हैं, पर उनकी पहचान गड़बड़ आइसक्रीम से ही है। मंगलुरु शहर के लोग दुनिया के किसी भी कोने में पहुंच गए हों अगर वे अपने शहर में आते हैं तो आइडियल क्रीम पार्लर जरूर पहुंचते हैं। आइडियल क्रीम पार्लर अब 40 से ज्यादा प्रकार के आइसक्रीम पेश करता है। 2011 में इस समूह ने मंगलुरु में आइडियल कैफे भी खोला है।
गड़बड़ क्या है - ग्लास में पेश 80 रुपये की गड़बड़ आइसक्रीम में कई तरह के फलों का स्वाद है। यानी एक आइसक्रीम में कई तरह का मजा। हालांकि इसमें ड्राई फ्रूट नहीं होता। पर यह अपने स्वाद के कारण आइसक्रीम के दीवानों के जुंबा पर राज करता है। जाहिर है अनादि को भी खूब पसंद आया। दक्षिण भारत में गड़बड़ आइसक्रीम नाम इतना लोकप्रिय हो गया है कि आसपास के कई शहरों में भी इस नाम से आइसक्रीम मिलने लगा है।

कैसे पहुंचे – मंगलुरु सेंट्रल रेलवे स्टेशन से एक किलोमीटर की दूरी पर हंपनकट्टा मार्केट में जीएचएस रोड पर आईडियल क्रीम पार्लर का एसी रेस्टोरेंट स्थित है। यह सुबह 10 बजे से रात्रि तक खुला रहता है।

आगे पढ़िए... एक बार फिर केरल की ओर... मंगलुरू से कोचीन. 

-        विद्युत प्रकाश मौर्य  
( IDEAL CREAM PARLOR, GADBAD ICE CREAM, GHS ROAD, MANGLURU ) 

Thursday, December 28, 2017

शिव का लोककल्याणकारी रुप है मंजूनाथ

कर्नाटक के समुद्रतटीय शहर मंगलुरु का सबसे प्रसिद्ध और भव्य मंदिर है मंजूनाथ स्वामी मंदिर। यानी शिव जी का मंदिर। मंजूनाथ शिव का लोककल्याणकारी रुप है। कर्नाटक में शिव का लोकप्रिय नाम है मंजूनाथ। दक्षिण कन्नड़ जिले के इस शिव मंदिर की श्रद्धालुओं में काफी मान्यता है।
कादरी का मंजूनाथ स्वामी मंदिर 12वीं सदी का बना हुआ है। इस मंदिर की संरचना विजय नगर शैली में है। मंजूनाथ स्वामी की मूर्ति पंच लोहा धातु ( मिश्रित धातु) की बनी हुई है। 15वीं और 16वीं सदी में मंदिर को नया रुप प्रदान किया गया। कादरी पहाड़ी का सुंदर नजारा मंदिर के आसपास से दिखाई देता है। मंदिर में लगे 12वीं-13वीं सदी के एक अभिलेख के मुताबिक राजा ने यहां मंजूनाथस्वामी का मंदिर बनवाया। राजा का नाम स्पष्ट नहीं है। पर माना जाता है कि अलुपा सम्राज्य की रानी बाली महादेवी (1277-1288) मंजूनाथ स्वामी की बड़ी भक्त थीं।
हिंदू पौराणिक कथा के मुताबिक कादरी मंजूनाथ की कथा भारद्वाज संहिता में आती है। इसके मुताबिक भगवान परशुराम ने शिव को प्रसन्न कर यहां कादलीवन में मंजूनाथ के रुप में रहने के लिए मनाया।

कभी बौद्धमत का बड़ा केंद्र था -  यहां कुछ पूर्व ऐतिहासिक काल की गुफाएं भी देखी जा सकती हैं। कादरी पहाड़ी कभी बौद्ध मत का भी बड़ा केंद्र हुआ करती थी। बौद्ध मत के मुताबिक काद्रिका का मतलब पहाड़ के पास की उर्वर भूमि होती है। 968 ई के अभिलेख के मुताबिक यहां काद्रिका विहार हुआ करता था। दसवीं सदी तक यहां बौद्ध धर्म का काफी प्रभाव था।

इसी विहार क्षेत्र में सनातन धर्म का प्रभाव बढ़ा। अलुपा सम्राज्य के राजा कुंदावर्मा ने दसवीं सदी में यहां त्रिलोकेश्वर (विष्णु) की मूर्ति स्थापित की। यह मंजूनाथ स्वामी मंदिर परिसर की सबसे प्राचीन मूर्ति है। साथ ही यह देश के श्रेष्ठ कांस्य प्रतिमा मानी जाती है।
दसवीं सदी के बाद मंगलुरु में बौद्ध धर्म का प्रभाव कमजोर होने लगा और नाथ संप्रदाय का प्रभाव बढ़ने लगा। तब यहां शिव के उपासकों की संख्या बढ़ने लगी और नाथ पंथ के जोगीमठ का भी निर्माण हुआ।

अभी भी कादरी की पहाड़ी पर साधु संतों और जोगियों का बसेरा रहता है। जोगी मठ के आसपास की गुफाओं को लोग पांडव गुफाएं कहते हैं। इन गुफाओं का उपयोग योगी लोग तपस्या के लिए किया करते थे। जोगीमथ में नाथ संप्रदाय से जुड़े भूतनाथ, मत्स्येंद्रनाथ, गोरखनाथ के छोटे छोटे मंदिर देखे जा सकते हैं।

मंजूनाथ स्वामी का मंदिर परिसर अत्यंत मनोरम है। मंदिर का गुंबद सफेद रंग का है। मंदिर के गोपुरम के ऊपर गणेश जी स्थापित हैं। इसके पृष्ठ भाग में सुंदर सरोवर है, जहां श्रद्धालुगण स्नान करते हैं। यहां पहाड़ों से नियमित जल आता रहता है, जिसका नाम काशी भागीरथी तीर्थ दिया गया है।

मंदिर से ऊपर जाकर आप जोगीमठ, काशी काल भैरव और परशुराम धुनी सीता कुआं, पांडव गुफा आदि के दर्शन करने जा सकते हैं। मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं के लिए अन्नक्षेत्र की सुविधा भी उपलब्ध है। निःशुल्क कूपन लेकर मैं भोजनकक्ष में पहुंचा को खाने में खिचड़ी और सांबर का वितरण हो रहा था।

कैसे पहुंचे – मंगलुरु सेंट्रल रेलवे स्टेशन से मंजूनाथ स्वामी मंदिर की दूरी 4 किलोमीटर है। यह कादरी इलाके में स्थित है। शहर के किसी भी कोने से आटोरिक्शा से पहुंचा जा सकता है। मंदिर के लिए सिटी बसें भी चलती हैं। मंदिर के प्रवेश द्वार पर जूता स्टैंड और लगेज जमा करने की भी सुविधा है।
-vidyutp@gmail.com
(KADRI  MANJUNATH TEMPLE ) 



Tuesday, December 26, 2017

काजू और कॉफी का शहर मंगलुर

कर्नाटक का मंगलुरु शहर। एक सुंदर आबोहवा वाला समुद्र तटीय शहर। एक प्राचीन शहर है जो वाणिज्यिक गतिविधियों का केंद्र रहा है। मंगलुरु का रेलवे स्टेशन भी काफी व्यवस्थित है। मंगलुरु सेंट्रल स्टेशन का कोड है MAQ यहां से केरल, बेंगलुर, चेन्नई आदि शहरों के लिए सीधी ट्रेनें चलती हैं। मंगलुरु सेंट्रल रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर एक माइलस्टोन लगा है जिस पर लिखा है चेन्नई 550 मील। मंगलुरु सेंट्रल रेलवे स्टेशन का पुराना नाम कनकनाडी हुआ करता था।
हमलोग प्लेटफार्म नंबर दो से एक पर आ गए हैं। क्लाक रुम की तलाश कर अपने दो बैग वहां जमा करा देते हैं। आजकल दरें है 15 रुपये प्रति बैग। हमलोग तैयार हैं कुछ घंटे शहर में घूमने के लिए। पर पहले थोड़ी पेटपूजा। प्लेटफार्म नंबर एक पर आईआरसीटीसी द्वारा संचालित शाकाहारी और मांसाहारी रेस्टोरेंट है। यहां लगातार खाने पीने वालों की भीड़ नजर आ रही है। डोसा, इडली, बड़ा आदि हमलोग खाते हैं। दरें काफी वाजिब हैं। 

कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु से मंगलुरु की दूरी 350 किलोमीटर है। रेल के अलावा दोनों शहर शानदार सड़क मार्ग से भी जुड़े हैं। साल 2011 की जनगणना में मंगलुरु की आबादी 6.23 लाख थी।1947 से पहले तक मंगलुरु मद्रास प्रेसिडेंसी का हिस्सा था। पर 1956 में इसे मैसूर राज्य से जोड़ा गया जो बाद में कर्नाटक हो गया। आजकल यह दक्षिण कन्नडा जिले का मुख्यालय है। मंगलुरु का ये नाम शहर में स्थित मंगलादेवी के मंदिर के नाम से मिला है। आप मंगलुरु में सुंदर समुद्र तट के अलावा मंजूनाथ स्वामी यानी शिव का मंदिर देख सकते हैं। शहर में कई सुंदर चर्च भी हैं, जिनमें सेंट पॉल चर्च प्रमुख है। और हां मंगलुरु आए हैं तो गड़बड़ आइसक्रीम खाए बिना आगे न बढ़ें।

मंगलुरु काजू और कॉफी की तिजारत के लिए जाना जाता है। यह तटीय शहर काजू प्रोसेसिंग का बड़ा केंद्र है। देश से काजू और कॉफी के निर्यात में 75 फीसदी हिस्सेदारी मंगलुरु की रहती है। मंगलुरु बड़ा बंदरगाह शहर भी है। यहां से लक्षद्वीप के लिए भी जहाज चलते हैं। मंगलुरु हिंदी फिल्मों की अभिनेत्री ऐश्वर्या राय का भी शहर है। मौसम के लिहाज से मंगलुरु सालों भर सदाबहार रहता है। अधिकतम तापमान 38 तक जाता है तो न्यूनतम तापमान 16 डिग्री सेल्सियस से नीचे नहीं जाता।
प्रीपेड आटोरिक्शा का अनुशासन -
हमलोग रेलवे स्टेशन से बाहर निकल गए हैं। मंजूनाथ स्वामी मंदिर जाना है। लोगों ने बताया था प्रीपेड आटो ले लिजिए। लाइन में लगकर प्रीपेड आटो का टोकन लिया। किराया है 59 रुपये। काउंटर वाले भाई का शुल्क 2 रुपये। मंगलुरु स्टेशन से आपके कहीं भी जाना हो प्रीपेड आटो ही लेना होगा। कोई भी आटोवाला सीधे सवारी बिठा ही नहीं सकता। कहीं कोई अराजकता नहीं। कोई ठगी नहीं।
यात्री और आटोरिक्शा सब कुछ नंबर से और नियमबद्धता से। यह सब कुछ मंगलुरु में हो सकता है तो दिल्ली में क्यों नहीं। हो सकता है सरकार में इच्छाशक्ति चाहिए। जब मंजूनाथ स्वामी मंदिर पहुंचकर हमारी यात्रा खत्म हुई तो हमने आटो वाले को 60 रुपये दिए तो उसने एक रुपये वापस कर दिए। इतनी इमानदारी दिल्ली के आटोवालों में हो सकती है क्या। वापसी में भी मंदिर से हर जगह के लिए आटो मिल रहे थे। यहां कोई प्रीपेड काउंटर नहीं है। पर चार आटोवाले लाइन में लगे हैं। नंबर आने पर ही सवारी बिठा रहे हैं। सवारी ने जहां कहा वहां चलने को तैयार। इधर उधर जाने को लेकर कोई ना नुकुर नहीं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
(MANGLURU CENTRAL, RAIL, KARNATKA ) 


Sunday, December 24, 2017

गोकर्ण से मंगलुरु मत्स्यगंधा एक्सप्रेस से

हमलोगों को अल सुबह गोकर्ण रोड से मंगलुरु के लिए डीएमयू पैसेंजर ट्रेन पकड़नी थी। यह ट्रेन सुबह 6.20 बजे गोकर्ण रोड रेलवे स्टेशन से चलती है। गोकर्ण बाजार से इतनी सुबह 8 किलोमीटर दूर रेलवे स्टेशन के लिए सवारी मिलने की उम्मीद नहीं थी। इसलिए एक दिन पहले ही एक आटो रिक्शा वाले से बात कर ली थी। किराया भी तय हो गया 180 रुपये लेंगे। सुबह के 5 बजे हमलोग तैयार हो गए। आटोरिक्शा वाले भाई का फोन आ गया। वे समय पर हमारे होटल आ गए हमें ले जाने के लिए। अभी उजाला नहीं हुआ था और हमलोग चल पड़े रेलवे स्टेशन के लिए। आटोवाले षणमुख ( 7899149126) को समय पर स्टेशन पहुंचाने के लिए धन्यवाद।

स्टेशन पहुंचने पर टिकट काउंटर की ओर मैं दौड़ पड़ा। तीन टिकटें मंगलुरु के लिए। काउंटर वाले ने पूछा एक्सप्रेस या पैसेंजर। अभी तो कोई एक्सप्रेस ट्रेन नहीं है। उन्होंने बताया कि तुरंत मत्स्यगंधा एक्सप्रेस आ रही है। यह ढाई घंटे लेट है। हमने कहा एक्सप्रेस का ही दे दिजिए जल्दी पहुंचा देगी। एक शंका थी सीट तो मिल जाएगी। पर मुंबई से आने वाली मत्स्यगंधा में छह जनरल डिब्बे हैं, जगह मिल जाएगी। ट्रेन आकर लग चुकी है। दो मिनट का ठहराव है। टिकट लेकर हमें जनरल डिब्बे तक जाने के लिए तेज दौड़ लगानी पड़ी। क्योंकि जनरल डिब्बे पीछे थे। हमारे चढ़ते ही ट्रेन चल पड़ी। पर जगह आराम से मिल गई। मुझे और अनादि को विंडो सीट। तो माधवी तो ऊपर जाकर सो गईं।

ट्रेन चल पड़ी है। कोंकण रेल में कई साल बाद हमलोग सवार हुए हैं। अगला स्टेशन आया कुमटा। कुमटा से भी सीधे बस लेकर गोकर्ण पहुंचा जा सकता है। अगला स्टेशन है होन्नावर। उत्तर कन्नडा जिले के इस शहर  से आप सड़क मार्ग से कर्नाटक का प्रसिद्ध जोग फाल्स देखने जा सकते हैं। यहां से जोग फाल्स की दूरी 40 किलोमीटर है। शिवमोगा जिले में स्थित जोग फाल्स देश का दूसरा सबसे ऊंचा झरना है। होन्नावर के बाद हमें रेल से शरावथी नदी का विस्तार नजर आता है। इसी नदी में जोग फाल्स का पानी आता है। होन्नावर के पास ये नदी अरब सागर में मिल जाती है।

अगला स्टेशन है मुरडेश्वर। मुरडेश्वर में शिव का प्रसिद्ध मंदिर है। यहां का समुद्र तट भी अत्यंत मनोरम है। यहां समुद्र तट पर शिव की एक विशाल प्रतिमा भी स्थापित की गई है।

अगला स्टेशन है भटकल। भटकल भी उत्तर कन्नडा जिले का प्रमुख शहर है। यहां पर कुछ बुरके वाली कन्याएं हमारे कोच में चढ़ती हैं। बैठते ही टैब खोलकर फिल्में देखना शुरू कर देती हैं। तो अगला स्टेशन आता है मुकांबिका रोड जहां पर हमारी ट्रेन रुकती है। यहां मुकांबिका देवी के मंदिर के लिए जा सकते हैं। अनादि नजारे देखते देखते झपकी लेने लगते हैं। एक बार कॉफी भी पी थी। पर रात को ठीक से नींद नहीं ले सके थे। हरे भरे खेत और नदियां आती जा रही हैं। कोंकण रेल का सौंदर्य है जो मुझे सोने नहीं दे रहा। कुंडापुरा अगला स्टेशन है। उडुपी जिले का यह शहर कुंडेश्वर मंदिर के लिए प्रसिद्ध है।

अगला स्टेशन है उडुपी जिले का बरकुर। यह पंचलिंगेश्वर मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। इसके बाद ट्रेन उडुपी में रुकती है। अगला स्टेशन है मुल्की। दक्षिण कन्नडा जिला आरंभ हो गया है। फिर आया सूरतकल। सूरतकल में कर्नाटक का एनआईटी स्थित है। यहां से मंगलुरु शहर 28 किलोमीटर रह गया है। सूरतकल से सात किलोमीटर आगे ठोकुर आता है जो कोंकण रेलवे का आखिरी रेलवे स्टेशन है। इसके बाद मंगलुरु जंक्शन रेलवे स्टेशन आता है। पर यहां मत्स्यगंधा एक्सप्रेस का ठहराव नहीं है। हमारी ट्रेन सुबह के साढ़े 10 बजे मेंगलुरु सेंट्रल पहुंचा देती है। हल्की बारिश के कारण मौसम सुहाना है। हमलोग प्लेटफार्म नंबर दो पर उतरते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य 
(GOKARNA TO MANGLURU, RAIL TRAVEL ) 



Friday, December 22, 2017

सुंदर सुरम्य समुद्र तट से संवाद करने आइए- गोकर्ण

आप समदंर देखने के लिए देश के तमाम तटीय शहरों में गए होंगे पर यकीं मानिए कि गोकर्ण का समुद्र तट इन सबसे अलग है। इसका सौंदर्य कुछ ऐसा है कि शांति की तलाश में भारत आने वाले विदेशी सैलानियों को इसकी आभा मन मोह लेती है। महाबलेश्वर मंदिर के पीछे मुख्य तट पर सूर्यास्त देखने का सुख अदभुत है। इसके अलावा ओम बीच और कुदल बीच का सौंदर्य भी मोहक है। यहां बने रिजार्ट में कुछ दिन गुजारना आनंददायक हो सकता है।


गोकर्ण में हमने हरिप्रिया रेसिडेंसी को मेकमाईट्रिप से बुक किया था। पर नाम पर न जाएं यह कोई रेसिडेंसी नहीं बल्कि एक होम स्टे है। एक घर है जिसमें नीचे मकान मालकिन रहती है। पहली मंजिल के पांच कमरे गेस्ट हाउस के तौर पर तब्दील किए गए हैं।
यहां कमरा के अलावा खाना पीना चाय, काफी आदि की कोई सुविधा नहीं है। आपको  जूते चप्पल उतार कर कमरे में प्रवेश करना होता है। पर बेहतरीन बात है कि हरिप्रिया बस स्टैंड के काफी करीब है। हमें जो कमरा आंवटित हुआ उसमें बालकोनी भी थी। जहां से हरे भरे बागीचे दिखाई दे रहे हैं। हम यहां सिर्फ एक रात ही रुके। हरिप्रिया रेसिडेंसी के आसपास खाने के लिए कुछ सस्ते होटल और दैनिक जरूरतों की सामग्री खरीदने के लिए दुकानें भी हैं। आसपास में बैंक एटीएम के लिए भी दूर नहीं भटकना पड़ता है।

हमलोग महाबलेश्वर मंदिर में दर्शन के बाद मंदिर के पीछे सुरम्य समुद्र तट पर पहुंच गए हैं। यहां एक रेस्टोरेंट है जहां हमने पराठे आर्डर किए। उत्तर भारत की तरह पराठे 20 रुपये में। अगर दही अलग से मांगा तो 10 रुपये और। डोसा इडली और दूसरे व्यंजनों की दरें भी काफी वाजिब थीं। तो हल्की पेट पूजा के बाद हमलोग चल पड़े समंदर के साथ संवाद करने के लिए। तकरीबन दो घंटे हमने यहां समुद्र तट पर गुजारा। धीरे-धीरे सूरज अस्त होने की ओर था। यहां सूर्यास्त देखने का सुख अद्भुत है। आनंद आ गया। अनादि काफी देर बालू पर खेलते रहे। जब शाम होने लगी तो हमलोग तट पर बने पार्क में आकर बैठ गए।


तट पर आदि शंकराचार्य की एक प्रतिमा भी स्थापित की गई है। हमलोग गोकर्ण का बाजार देखते हुए अपने होटल की ओर वापस लौट रहे हैं। रास्ते में एक दुकान पर सिलाई मशीन से तेजी से अलग अलग किस्म के मोनोग्राम बनाते कारीगर दिखाई दिए। एक मोनोग्राम 50 रुपये का। कारीगरों की काम में तेजी देखने लायक थी।

मंदिर के आसपास अच्छा बाजार है। बाजार में महंगाई का कोई असर नहीं है। दरें वाजिब हैं। कई बरतनों की दुकानें दिखाई दे रही हैं। यहां पुष्कर जैसी कपड़ों की भी कई दुकाने हैं। कुछ दुकानें वाद्य यंत्रो की भी हैं। गोकर्ण का परिवेश कस्बाई है। यहां कोई मॉल या विशाल शोरुम नहीं है।

गोकर्ण पाई रेस्टोरेंट – अगर आप गोकर्ण में खाने के लिए वाजिब जगह ढूंढ रहे हैं तो इसका उत्तर है पाई रेस्टोरेंट। यह बस स्टैंड से मंदिर के रास्ते में है। यहां पर आप शाकाहारी थाली के अलावा दक्षिण भारतीय व्यंजनों का स्वाद ले सकते हैं। सुबह से लेकर रात 9 बजे तक हमेशा यहां खाना तैयार मिलता है। पर हमने यहां पर रात को सिर्फ वेज बिरयानी ही खाया। ज्यादा खाने के लिए पेट तैयार नहीं था। गोकर्ण में इससे भी सस्ते भोजनालय हैं। पर यहां कोई ज्यादा हाईफाई रेस्टोरेंट नहीं है।

यहां आप कर्नाटक के कई तरह के रेडिमेड खाने पीने की सामग्री भी खरीद सकते हैं। जैसे चावल के लड्डू पोरमपोली आदि। हमने भी अगले सफर में रास्ते के लिए कुछ खरीद लिया। कोई नाइट लाइफ नहीं है यहां। जल्दी खाइए और जल्दी सो जाइए।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य 
( GOKARAN MARKET, PAI RESTAURANT ) 


Wednesday, December 20, 2017

आसमान से गाय के कान जैसा दीखता है इसलिए नाम पड़ा – गोकर्ण

गोकर्ण कर्नाटक का एक अत्यंत सुंदर तटीय कस्बा है। भले ही अपने देश के सैलानी यहां कम पहुंचते हों पर इसका सौंदर्य विदेशी सैलानियों को सालों भर लुभाता है। अगर आसमान से देखें तो यह गाय के कान के जैसा नजर आता है। इसलिए इसे नाम मिला गोकर्ण।

उत्तर कन्नडा जिले में यह गंगावली और अघानशिनी नदियों के बीच स्थित है। सामने विशाल अरब सागर है। गोकर्ण में तीन प्रमुख समुद्र तट हैं। पहला महाबलेश्वर मंदिर का बीच, दूसरा कुदल बीच तीसरा ओम बीच। ये सब कुछ मिलकर गोकर्ण को एक सुंदर आयाम प्रदान करते हैं। गोकर्ण आने पर सबसे खास बात ये है कि आपको यहां पर ग्रामीण परिवेश का साक्षात्कार होता है। इसलिए यह देश के बाकी समुद्रतटीय पर्यटक स्थलों से काफी अलग है।
गंगावली नदी कर्नाटक के धारवाड़ जिले में मागोद फाल्स से निकलकर आती है और गोकर्ण के पास अरब सागर में मिल जाती है। गोकर्ण कस्बा इसी गंगावली नदी के किनारे है। इस नदी के प्रति स्थानीय लोगों में गंगा की तरह ही सम्मान है। अंकोला से गोकर्ण के बीच इस पर रेल पुल और सड़क पुल पड़ता है। दक्षिण भारत में महाबलीपुरम, हंपी, मैसूर आने वाले विदेशी सैलानियों में से बड़ी संख्या में लोग गोकर्ण आना पसंद करते हैं। हमने अपने पिछले हंपी प्रवास के दौरान देखा था कि हंपी से गोकर्ण के लिए रोज सीधी लग्जरी बस चलती है। एक बस दोपहर एक बजे गोवा से भी चलती है। बेंगलुरु और मैसूर से भी गोकर्ण के लिए सीधी बसें हैं।

गोकर्ण एक पौराणिक शहर है। कहा जाता है कि पाताल में तपस्या करते हुए भगवान रुद्र गोरूप धारिणी पृथ्वी के कर्णरन्ध्र से यहां प्रकट हुए, इसी से इस क्षेत्र का नाम गोकर्ण पड़ा। वहीं यह भी कहा जाता है कि रावण ने इस स्थल को खींचकर गाय के कान जैसे आकार का बना दिया, इसलिए शहर का नाम गोकर्ण पड़ा। कहानी जो भी हो पर दो तरफ नदी और सामने समंदर के बीच बसा यह इलाका अत्यंत मनोरम है।

मौसम की बात करें तो ये ठंडा प्रदेश नहीं है,पर यहां सालों भर सदाबहार मौसम रहता है। गरमी के दिनों में भी यहां सैलानी घूमने आते हैं। रात का मौसम खुशनुमा हो जाता है। प्रदूषण का स्तर काफी कम है। इसलिए विदेशी सैलानियों को ये काफी पसंद आता है। पर देशी सैलानियों की बात करें तो यहां धार्मिक यात्रा पर आने वाले लोग ज्यादा पहुंचते हैं। पर आप चाहें तो गोकर्ण में अवकाश लेकर कुछ दिन गुजराने का कार्यक्रम बना सकते हैं। स्थानीय स्तर पर तफरीह करने के लिए यहां बाइक रेंटल की सुविधा भी उपलब्ध है।

गोकर्ण में रहने के लिए बस स्टैंड के आसपास कई सस्ते होटल हैं। आप बस स्टैंड के आसपास कई सस्ते गेस्ट हाउस देख सकते हैं, जहां 500 रुपये प्रतिदिन या इससे अधिक में यहां ठहरा जा सकता है। ओम बीच और कुदल बीच के आसपास कई होमस्टे और रिजार्ट बने हुए हैं। इन्हें भी आनलाइन बुक किया जा सकता है। कुछ रिजार्ट समुद्र तट के काफी करीब हैं। काफी विदेशी सैलानी यहां रुकना पसंद करते हैं। यहां जाने के लिए अलग से आटोरिक्शा बुक करना पड़ सकता है। पर आप कम बजट में रुकना चाहते हैं तो बस स्टैंड के आसपास ही ठहरें।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य 
 (GOKARNA, KARNATAKA, SEA BEACH, HOME STAY ) 

Monday, December 18, 2017

आत्मतत्व लिंगम हैं गोकर्ण के महाबलेश्वर

गोकर्ण का महाबलेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। अरब सागर के किनारे पश्चिमी घाट पर बने इस मंदिर को चौथी सदी माना जाता है। इस लिहाज से यह देश के प्राचीनतम शिव मंदिरों में से एक है। इसे कर्नाटक के सात मुक्तिस्थलों में से एक माना जाता है। कर्नाटक में इस मंदिर में स्थित शिवलिंग को उतना ही पवित्र माना जाता है जितना काशी के बाबा विश्‍वनाथ को। मंदिर का निर्माण शास्त्रीय द्रविड़ शैली में हुआ है। निर्माण में ग्रेनाइट पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। गर्भगृह का आकार वर्गाकार है। मंदिर का मुख्य द्वार अरब सागर की ओर है। मंदिर के उत्तर में गंगावली नदी बहती है। इसलिए गोकर्ण को दक्षिण की काशी भी कहते है।
गोकर्ण में भगवान शंकर का आत्मतत्व लिंग है। शास्त्रों में गोकर्ण तीर्थ की बड़ी महिमा है। यहां के विग्रह को महाबलेश्वर महादेव कहते हैं। मंदिर के अंदर पीठ स्थान पर अरघे के अंदर आत्मतत्व लिंग के मस्तक का अग्रभाग श्रद्धालुओं के दृष्टि में आता है। उसी की यहां पूजा होती है। यह मूर्ति मृग श्रृंग के समान है।
महाबलेश्वर मंदिर से थोड़ा पहले सिद्ध गणपति का मंदिर है। कहा जाता है इन गणपति के मस्तक पर रावण द्वारा प्रहार किए जाने का चिन्ह है। इन गणपति के दर्शन करने के बाद ही आत्म तत्व लिंग के दर्शन पूजन की विधान है। गोकर्ण का यह मंदिर श्री रामचंद्रपुर मठ के अधीन आता है। मठ इस मंदिर का प्रबंधन देखता है। जगदगुरु शंकराचार्य श्री राघवेश्वर भारती इसके वर्तमान पीठाधीश हैं। यह अद्वैत पथ का मठ शिवमोगा जिले के होसांगरा में सरस्वती नदी के तट पर स्थित है। दक्षिण के तमाम मंदिरों की तरह यहां भी अलग अलग पूजन का सेवा शुल्क तय है।


गोकर्ण महाबलेश्वर मंदिर के परिसर में ही मंदिर के पीछे ताम्र गौरी यानी मां पार्वती का मंदिर है। मंदिर प्रबंधन की ओर से रोज सुबह 11.30 बजे से 1.30 बजे तक निःशुल्क प्रसाद भोजन की सेवा भी श्रद्धालुओं के लिए संचालित की जाती है। मंदिर के आंतरिक भाग में फोटोग्राफी निषिद्ध है।
खुलने का समय - मंदिर सुबह 6 बजे से दोपहर 12 बजे तक खुलता है। शाम को मंदिर 5 बजे से 8 बजे तक खुला रहता है। मंदिर में आने वाले श्रद्धालु पहले अरब सागर में स्नान करते हैं, फिर गणपति की पूजा करने के बाद महाबलेश्वर मंदिर में प्रवेश करते हैं। कार्तिक के महीने में और शिवरात्रि के दिनों में इस म‍ंदिर में भारी संख्‍या में श्रद्धालु दर्शन करने आते है। कहा जाता है कार्तिक मास में शिव स्वयं यहां आकर वास करते हैं।

कैसे पहुंचे – गोकर्ण बस स्टैंड से मंदिर तकरीबन एक किलोमीटर है। पैदल चलते हुए पहुंच सकते हैं। गोकर्ण रोड रेलवे स्टेशन से मंदिर की दूरी 9 किलोमीटर है। वहीं कोंकण रेलवे के कुमटा रेलवे स्टेशन से गोकर्ण की दूरी 32 किलोमीटर तो अंकोला से दूरी 26 किलोमीटर है।

गोकर्ण महाबलेश्वर की कथा – कहा जाता है कि भगवान शिव एक बार मृग स्वरूप बनकर कैलास से प्रस्थान कर गए। देवगण उन्हें ढूंढते हुए उस मृग के पास पहुंचे। भगवान विष्णु, ब्रम्हाजी तथा इन्द्र ने मृग के सींग पकड़ लिए। मृग तो अदृश्य हो गया, किंतु देवताओं के हाथ में सींग के तीन टुकड़े रह गए। विष्णु और ब्रम्हाजी के हाथ में आए टुकड़े में सींग का मूल भाग और मध्य भाग गोकर्णनाथ और श्रृंगेश्वर में स्थापित हुए। इन्द्र के हाथ में सींग का अग्रभाग था। इसे इन्द्र ने स्वर्ग में स्थापित किया।

वहीं कुछ विद्वानों कहते हैं कि रावण की माता कैकसी बालू का पार्थिव लिंग बनाकर पूजन करती थी। समुद्र किनारे पूजन करते समय उसका बालू का लिंग समुद्र की लहरों से बह गया। इससे वह दुखी हुईं। माता को संतुष्ट करने के लिए रावण कैलास गए। वहां तपस्या करके उसने भगवान शंकर से आत्मतत्व लिंग प्राप्त किया। रावण जब गोकर्ण क्षेत्र में पहुंचा, तब संध्या होने को आ गई।
उधर, देवताओं में रावण के पास आत्मतत्व लिंग चले जाने के कारण चिंता थी। देव माया से रावण को शौच की तीव्र इच्छा हुई। देवताओं की प्रार्थना से गणेश वहां रावण के पास ब्रम्हचारी के रूप में पहुंचे। रावण ने उनके हाथ में वह लिंग विग्रह दे दिया और नित्य कर्म में लग गया। इधर मूर्ति भारी होने लगी। ब्रम्हचारी बने गणेशजी ने तीन बार नाम लेकर रावण को पुकारा और उसके न आने पर मूर्ति पृथ्वी पर रख दी।
रावण जब शुद्ध होकर पहुंचा बहुत परिश्रम के बाद भी मूर्ति को उठा नहीं सका। खीझकर रावण ने गणेशजी के मस्तक पर प्रहार किया और लंका चला गया। उसके बाद से यह शिवलिंग गोकर्ण में स्थापित है। वहीं रावण के प्रहार से व्यथित गणेशजी वहां से चालीस कदम दूर जाकर खड़े हो गए। इसके बाद भगवान शंकर ने प्रकट होकर उन्हें आश्वासन दिया और वरदान दिया कि तुम्हारा दर्शन किए बिना जो मेरा दर्शन पूजन करेगा, उसे उसका पुण्यफल प्राप्त नहीं होगा। ( मंदिर की वेबसाइट - http://www.srigokarna.org/en )
-        विद्युत प्रकाश मौर्य


Saturday, December 16, 2017

कारवार से गोकर्ण वाया अंकोला बस से

कर्नाटक के शहर कारवार बस स्टैंड से हमने अगली बस ली है अंकोला के लिए। यह कर्नाटक रोडवेज की बस है। गोकर्ण पहुंचने का एक तरीका है कोंकण रेल से गोकर्ण रोड रेलवे स्टेशन उतरें, वहां से गोकर्ण के लिए आटो रिक्शा लें। रेलवे स्टेशन से गोकर्ण बाजार 8 किलोमीटर है।

अगर सड़क मार्ग से जा रहे हैं तो कुमटा से गोकर्ण के लिए सीधी बसें हैं, या फिर अंकोला से। कुमटा से गोकर्ण के लिए हर आधे घंटे पर बस है। इसलिए सुगम यह है रेल से भी जाना हो तो कुमटा उतर कर बस ली जाए।

कारवार से अंकोला की दूरी 35 किलोमीटर है। बस सह्याद्रि की पर्वतमाला को काटकर बनाई गई सड़क से गुजर रही है। एक तरफ समंदर है तो दूसरे तरफ पहाड़। कारवार शहर के बाहर कई किलोमीटर तक नौ सेना का इलाका साथ चलता रहा। हरे भरे धान के खेत, नारियल के पेड़, केले के पेड़ दिखाई दे रहे हैं। एक घंटे बाद हमलोग अंकोला शहर में पहुंच गए हैं। अंकोला उत्तर कन्नडा जिले का एक तालुका है। यह आम और काजू के लिए प्रसिद्ध है। 13 अप्रैल 1930 को एमपी नादकर्णी की अगुवाई में 40 हजार लोगों ने अंकोला मे गांधी जी के आह्वान पर नमक कानून तोड़ा था।
कारवार में ट्रक पर जा रहा रेलवे का लोकोमोटिव (इंजन ) 


संयोग से हम कारवार से अंकोला के लिए जिस बस में सवार हुए हैं वह कुमटा तक जाने वाली है। सहयात्रियों की सलाह पर हमने इसमें मदनगिरी तक का टिकट ले लिया है। लोगों ने बताया आप मदनगिरी पेट्रोल पंप के स्टाप पर उतर जाएं। वहां से कुमटा से गोकर्ण आने वाली बस मिल जाएगी। इससे आप जल्दी गोकर्ण पहुंच जाएंगे. वहीं आपको अंकोला से गोकर्ण वाली बस का इंतजार देर तक करना पड़ सकता है। अगर कोई बस अंकोला से चलेगी तो वह भी मदनगिरी पेट्रोल पंप के मोड़ से ही गोकर्ण के लिए मुड़ेगी।

अंकोला के बाद एनएच 66 पर पहाड़ों  काटते हुए सुंदर रास्ते पर हम चल रहे हैं। गंगावली नदी के पुल के बाद अचानक मदनगिरी में भारत पेट्रोलियम का पेट्रोल पंप आ जाता है। हमलोग चौकन्ने थे, उतर गए बस से। यहां तो बायीं तरफ एक पेट्रोल पंप है। दाहिनी तरफ एक ग्रामीण सड़क दिखाई दे रही है। तिराहे पर एक छोटी सी दुकान है। कोई पथ संकेतक बोर्ड नहीं लगा है गोकर्ण के लिए। पर दुकानदार ने बताया कि यहीं पर बस आएगी। तो हमलोग भी उनकी बात मानकर बस का इंतजार करने लगे। इसी इंतजार के दौरान हमलोग दुकानदार भाई से थोडी बातें करते हैं।
मदनगिरी मोड पर गोकर्ण के लिे बस का इंतजार। 
हमलोग दुकान से केले खरीदकर भी खा लेते हैं। थोड़े इंतजार के बाद कर्नाटक रोडवेज की कुमटा से चली बस आती है। हमलोग फटाफट बस में बैठ जाते हैं। बस में महिला कंडक्टर हैं। हम उनसे तीन टिकट खरीदते हैं। बस आधी खाली है, सो आराम से सीट मिल गई। मदनगिरी मोड़ से गोकर्ण 9 किलोमीटर है। 15 मिनट बाद हमलोग गोकर्ण के बस स्टैंड में हैं।

मांजागुनी से फेरी का रास्ता - हमें रास्ते में एक सज्जन ने बताया था कि आप अंकोला से मांजागुनी की बस लें। वहां से फेरी से गंगावाली नदी पार करके गोकर्ण पहुंच सकते हैं। इस मार्ग से दूरी 15 किलोमीटर है। जबकि मदनगिरी मार्ग से 26 किलोमीटर। पर हमें मांजागुनी मार्ग अनजाना लगा और बसों का बारंबारता का भी पता नहीं था इसलिए इस मार्ग को नहीं चुना। पर बाद में गूगल मैप देखकर लगा कि मांजागुनी मार्ग भी रोमांचक हो सकता था।

ऐसा रहा सफर – कोलवा से मडगांव – 6 किमी, मडगांव से कारवार – 72 किमी, कारवार से अंकोला 35 किमी, कारवार से मदनगिरी 17 किमी, मदनगिरी से गोकर्ण 9 किमी – कुल – 139 किमी।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य

( KARWAR, ANKOLA, MADANGIRI, GOKARNA, GANGAVALI RIVER ) 
गोकर्ण से पहले गंगावली नदी का विस्तार। 

Thursday, December 14, 2017

कर्नाटक का कश्मीर है कारवार

हमलोग गोवा को अलविदा कहने वाले हैं। हमारी अगली मंजिल होगी कर्नाटक का गोकर्ण। सुबह नास्ते के बाद हमलोग लोकल बस से मडगांव बस स्टैंड पहुंचते हैं। 
कोलवा बीच से हर 20 मिनट पर एक बस चलती है मडगांव के लिए। मडगांव बस स्टैंड में जाने पर पता चला कि कारवार के लिए हर आधे घंटे पर बस मिलती है। ये बसें गोवा की कदंबा ट्रांसपोर्ट कारपोरेशन भी होती हैं और कर्नाटक रोडवेज की भी। हमें गोवा वाली बस मिल गई, कारवार के लिए। हालांकि हम मडगांव से गोकर्ण रोड ट्रेन से भी जा सकते थे, पर ट्रेन का समय काफी सुबह में था। बस मडगांव शहर से निकलकर हरे भरे सड़क पर दौड़ रही है। रास्ते में कुछ सुंदर चर्च दिखाई देते हैं।  

मडगांव से कारवार की दूरी 72 किलोमीटर है। बस करीब ढाई घंटे लगाएगी। मडगांव शहर से बाहर निकलने पर बस नावेली से होकर गुजरी। नावेली मडगांव के बाहर नवविकसित कस्बा है।पर यहां कुछ पुराने चर्च हैं। हमें सड़क के किनारे एक सुंदर चर्च नजर आता है। आवर लेडी रोजरी चर्च यहां के लोगों का लोकप्रिय प्रार्थना स्थल है। 
इसके बाद कोनकोलिम में कस्बे में रुकी। यहां बस बस स्टैंड के अंदर गई, पर तुरंत वहां से बाहर निकल कर आगे चल पड़ी।

यहां छोटे कस्बे के बस स्टैंड भी कर्नाटक की तरह शानदार बने हुए हैं। वहां से अगला स्टाप आया पाडी। पाडी के बाद आया काणकोण। काणकोण रेलवे स्टेशन भी है। इसके बाद सघन वन क्षेत्र आरंभ हो गया।
हम गोवा के ही काठीगांव वाइल्ड लाइफ सेंचुरी से होकर गुजर रहे हैं। जहां तक नजर जा रही है, हरे भरे पेड़ नजर आ रहे हैं। रास्ता पहाड़ी है पर ज्यादा घुमावदार नहीं है। दोनों तरफ खुशबूओं के जंगल साथ साथ चल रहे हैं। दोपहर में भी मौसम सुहाना है। ये हरियाली की खुशबू है ना वह भी साथ साथ चल रही है। माधवी और अनादि दोनों सफर का आनंद ले रहे हैं। 

रास्ते में पोलियम ( POLLEM )  बीच के लिए ठहराव आया। यह दक्षिण गोवा का आखिरी समुद्र तट है। यहां भी कुछ बेहतरीन रिजार्ट बने हुए हैं। गोवा आने वाले सैलानी यहां तक आते हैं। पोलियम विदेशी सैलानियों की भी खास पसंद है। वे यहां आकर लंबा वक्त गुजारना पसंद करते हैं। ऐसे लोग जो खास तौर पर भीड़ भाड़ से दूर समंदर के किनारे रहना चाहते हैं उनके लिए पोलियम खास पसंद है। यह प्रदूषण से भी काफी दूर है।

आगे कसार नामक छोटा सा गांव आता है जो गोवा का आखिरी गांव है। इसके बाद बस कर्नाटक में प्रवेश कर जाती है। सीमा पर चेक पोस्ट आता है। पुलिस तैनात है। हम एक बार फिर कर्नाटक में हैं। इसी साल मार्च तो कर्नाटक आना हुआ था। कर्नाटक में पहला गांव आता है माजाली। इसके बाद हमलोग कारवार की सीमा में पहुंच चुके हैं। कारवार शहर से ठीक पहले काली नदी पर पुल आता है। इसके बाद शहर आरंभ हो जाता है। हमारी बस कारवार बस स्टैंड में जाकर रुकती है।

कारवार ( कर्नाटक)  का समुद्र तट 
लेकिन इसके पहले हमें कारवार का सुंदर समुद्र तट दिखाई देता है। यहां सुंदर मरीन ड्राईव बना है। समंदर के किनारे बेंच पर बैठे हुए लोग धूप सेंकते दिखाई देते हैं। अब कुछ बातें कारवार के बारे में। कारवार उत्तर कन्नडा जिले का प्रमुख शहर है। यह समुद्र तटीय शहर नौ सेना का प्रमुख केंद्र है। शहर का कई किलोमीटर समुद्र तटीय इलाका नौ सेना के हवाले है। यह कोंकण रेलवे का प्रमुख रेलवे स्टेशन भी है।

कारवार कर्नाटक के उत्तर कनारा जिले का मुख्यालय भी है। शहर के एक तरफ सह्याद्रि पर्वत माला है तो दूसरी तरफ उछाल मारता अरब सागर। शहर के उत्तर में सुंदर काली नदी है। इस नदी में बोटिंग करने के इंतजाम दिखाई देते हैं। यह देश के ग्रीन सिटी में शुमार है जहां इको टूरिज्म की पर्याप्त संभावनाएं हैं।



कारवार में है रविंद्र नाथ टैगोर बीच
गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर ने इसे कर्नाटक का कश्मीर कहा था। गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर ने कारवार के समुद्र  तट पर अपने पहले नाटक की रचना यहीं पर की थी। गुरुदेव 1822 में यहां आए थे। उनके भाई सत्येंद्रनाथ टैगोर यहां जिला जज के तौर पर पदस्थापित थे।कारवार के मुख्य समुद्र तट नाम टैगोर के सम्मान में रविंद्र नाथ टैगोर बीच रखा गया है। 
कारवार शहर की आबादी 1.5 लाख के पास है। 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश शासन ने कारवार शहर का निर्माण एक सैन्य शहर के तौर पर किया था। हालांकि यह कर्नाटक का शहर है, पर यहां मराठी और कोंकणी भाषा का काफी प्रभाव है। 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
कारवार शहर का चौराहे पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा।