Thursday, November 30, 2017

जलते हैं जिसके लिए तेरी आंखों के दीए...

सुमधुर संगीत हमारे कानों को सुनाई दे रही है और हमलोग खींचे हुए उधर चले जाते हैं...कोई संगीत नहीं है पार्श्व में...पर एक आवाज इतनी सुरीली है कि विशाल रेस्टोरेंट में बैठे सारे लोग पूरी शांति से उस गीत का मजा ले रहे हैं...गीत पुरानी फिल्म सुजाता (1959) का है....सचिन देव बर्मन ने संगीत दिया था... आवाज थी तलत महमूद की शब्द थे मजरूह सुल्तानपुरी के... जलते हैं जिसके लिए तेरी आंखों के दीए...मैं ढूंढ लाया हूं वही गीत तेरे लिए। पर ये सज्जन इतना बढ़िया गा रहे हैं कि हमलोग बेनालियम बीच पर बने इस रेस्टोरेंट में पहुंच जाते हैं। पूरा गीत सुनने के बाद सारे लोगों के साथ तालियां बजाते हैं। रात ढल चुकी है। रेस्टोरेंट की टेबल पर लोग कुछ खा रहे हैं और पी रहे हैं साथ में लाइव संगीत का आनंद ले रहे हैं। ये गोवा की शाम का असली आनंद है।
बेनालियम बीच कोलवा से दो किलोमीटर आगे है। यह कोलवा से भी ज्यादा शांत है। यहां पहुंचने का रास्ता गंवई परिवेश वाला है। वास्तव में इसका पुराना संस्कृत नाम बाणावाली था जो बिगड़ गया है। कहा जाता है परशुराम ने समंदर के देवता वरुण की ओर जो बाण मारा था वह यहीं आकर गिरा था। इसलिए इसका नाम बाणावली था।

नारियल के पेड़...हरे भरे खेत..कहीं कहीं रास्ते में घर। इन घरों में दुकानें। चलते चलते आप समुद्र के तट पर पहुंचते हैं। कहीं कहीं एक दो होटल दिखाई देते हैं। उन लोगों को ये बीच खास पसंद है जो गोवा मे शांत जगह में कुछ दिन गुजारने आते हैं। इस बीच पर समंदर से लगे हुए कुछ रिजार्ट बने हैं।

यहां ताज एग्जोटिका रिजार्ट एंड स्पा है जो मोटी जेब वालों की खास पसंद है। बेनालियम में डॉन बास्को एनिमेशन सेंटर बना हुआ है। यह ईसाई संत सेंट फ्रांसिस वाज की जन्म स्थली भी है। यहां दो लोकप्रिय चर्च भी हैं। होली ट्रिनिटी चर्च और न्यू चर्च आप यहां अगर समय हो तो देख सकते हैं।

शाम ढलने के बाद हमलोग एक्टिवा से बेनालियम समुद्र तट की ओर जाने के लिए निकले हैं। रास्ता पूछते पूछते आगे बढ़ रहे हैं। यूं लग रहा है किसी गांव से गुजर रहे हों। एक जगह घर में दुकान नजर आती है। हमलोग रास्ता पूछने रुक जाते हैं। फिर दुकान में कुछ देखने लगते हैं। दो दुकानों में कपड़ों, आर्टिफिशियल ज्वेलरी और एंटिंग चीजों का विशाल संग्रह है। 

पति पत्नी मिलकर दुकान चलाते हैं। मैं उनसे कलेक्शन के बारे में पूछता हूं। वे बताते हैं कि अलग अलग शहरों से जाकर खरीददारी करता हूं और यहां लाकर बेचता हूं। उनके पास लकड़ी के बने कुछ शानदार खिलौने हैं। कुछ लालबुझक्कड टाइप के बाक्स भी हैं। इन बाक्स में एक अंदर दूसरा फिर अंदर तीसरा बाक्स दिखाई देता है। अनादि वहां कुछ तलवार और कटारों पर जोर आजमाइश करते हैं। माधवी कई तरह की ज्वेलरी पसंद करने लगती हैं। मुझे भी एक आरेंज कलर का टी शर्ट पसंद आ जाता है। थोड़ी बहुत बार्गेनिंग के बाद हमलोग कई चीजें खरीद लेते हैं।
दुकानदार महोदय का व्यवहार इतना अच्छा लगता है कि हमलोग उनके साथ तस्वीरें खिंचवाते हैं। हम उनसे बेनालियम के बारे में थोड़ी जानकारी लेते हैं फिर आगे बढ़ जाते हैं। बेनालियम की दुनिया थोड़ी रहस्यमयी लगती है, थोड़ी सपनीली लगती है। कुल मिलाकर मजा आता है। बेनालियम इलाके का मुख्य बाजार मारिया हॉल में है।

( BENAULIM BEACH, SOUTH GOA, PEDRO’S BAR AND RESTAURANT, TAJ EXOTICA )    


Tuesday, November 28, 2017

कोलवा बीच पर मस्ती और फुटबॉल का मैच

कुछ लोगों को सारे समुद्र तट एक ही जैसे लगते हैं। पर हर समुद्र तट का अपना सौंदर्य होता है। कुछ लोग मुझसे ये सवाल पूछते हैं कि देश का सबसे खूबसूरत समुद्र तट कौन सा है। इस पर हर किसी का अपनी पसंद के हिसाब से अपना जवाब हो सकता है। पर गोवा के समुद्र तट में बात करें तो कोलवा काफी सुंदर लगा। इसलिए कि यहां कालांगुट जैसी भीड़भाड़ नहीं है। पर बिल्कुल सुनसान भी नहीं है। थोड़ा सा बाजार है, थोड़ी सी मस्ती का आलम है। सुबह हो या शाम थोड़ी-थोड़ी रौनक कोलवा में रहती है। अनादि को भी सारे बीच के बीच कोलवा काफी पसंद आया।
शाम को सूरज डूब रहा है और हमलोग कोलवा बीच पर पहुंच गए हैं। बीच के ठीक पहले पार्किंग और बस आटो स्टैंड है। समंदर में काफी लोग अटखेलियां करने में जुटे हैं। पर लोगों की सुरक्षा के लिए सी गार्ड के प्रशिक्षित जवान भी तैनात हैं लाइफ जैकेट के साथ। वे समंदर में लाल रंग की झंडियां लगा देते हैं। इससे आगे नहीं जाएं का निर्देश देते हुए। पर लोग हैं कि मानते नहीं। वे बार बार सिटी बजाकर आगाह करते हैं। मैं लाइफ गार्ड से बातचीत करता हूं। तैराकी के गहन परीक्षण के बाद उन्हें ये नौकरी मिली है। 12 से 15 हजार मासिक तनख्वाह मिलती है।

कोलवा बीच के साथ लगे हुए बेनालियम और दूसरे बीच हैं। तकरीबन 10 किलोमीटर तक आप समंदर के साथ चलते हुए जा सकते हैं। समुद्र का सौंदर्य निहारते हुए। यह आपको नार्थ गोवा से ज्यादा सुंदर प्रतीत होगा। कोलवा के होटल वाले भी अपने बीच को नार्थ से ज्यादा सुंदर बताते हैं।

सुबह सुबह जगने के बाद सूर्योदय देखने मैं एक बार फिर कोलवा बीच पर पहुंच जाता हूं। दो नजारे दिखाई देते हैं। बीच पर फुटबाल का मैच चल रहा है। गोल पोस्ट बना दिया गया है। वर्दी में दो टीमें बन गई हैं। पूरे नियम कायदे से फुटबाल मैच जारी है। बहुत दिनों बाद इस तरह मैच देखने का मौका मिला है। थोड़ी देर मैच का मजा लेने के बाद आगे बढ़ता हूं। मछुआरे नाव लेकर मछलियां पकड़ने में व्यस्त हैं। मछलियों के साथ देखता हूं कि कई जिंदा सांप भी पकड़ में आ गए हैं। कई ऐसे समुद्री जंतु आ गए हैं जिन्हें खाया नहीं जाता।

मछुआरे इन्हें फिर से जुटा कर समुद्र के अंदर फेंक आते हैं। एक जगह मछली पकड़ने वाली नाव को काम खत्म होने के बाद खींचकर समंदर के पानी से किनारे लगाया जा रहा है। ये प्रक्रिया बड़ी ही श्रम साध्य लग रही है। लकड़ी के फिसलन वाले प्लेटफार्म पर नाव को रखकर कई लोग मिलकर खींचकर किनारे ला रहे हैं। वे अपने गोवा की स्थानीय भाषा में जोश बढ़ाने के लिए कुछ गा भी रहे हैं। इन्ही गीतों से कभी रमैया वस्ता वैया लिखने की प्रेरणा मिली होगी।

कोलवा बीच पर समंदर के किनारे कुछ रिजार्ट दिखाई देते हैं जिसमें स्पा आदि का भी इंतजाम है। मुझे राह चलते एक एजेंट मिलता है पूछता है बॉडी मसाज कराना है क्या...मैं कोई उत्सुकता नहीं दिखाता। कुछ होटल बिल्कुल समंदर के किनारे भी बने हुए हैं। हर साल गोवा आने वाले हमारे कई साथी साउथ गोवा में ही रुकना चाहते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
  (COLVA BEACH, SOUTH GOA, FISH AND FOOTBALL) 


Sunday, November 26, 2017

कोलवा (साउथ गोवा) के लाबेन में दो दिन

आपको गोवा घूमने के दौरान नार्थ गोवा में रुकना चाहिए या साउथ गोवा में। कई लोग ये सवाल करते हैं। ये आपकी रूचि पर निर्भर करता है। अगर आप भीड़भाड़ वाले इलाके में रुकना चाहते हैं तो नार्थ गोवा में कालांगुट इलाके में रुक सकते हैं। पर अगर आप शांत समंदर के साथ संवाद करना चाहते हैं तो आपको साउथ गोवा में रुकना चाहिए। एयरपोर्ट से दूरी की बात करें तो कोलवा 28 किलोमीटर है। पर अगर आप रेल से आ रहे हैं मडगांव रेलवे स्टेशन महज 8 किलोमीटर है।

वैसे आपके पास चार दिन से ज्यादा का समय हो तो नार्थ या साउथ कहीं भी रुककर पूरे गोवा में रुक सकते हैं। हमने दो दिन नार्थ और दो दिन साउथ में रुकना तय किया था। साउथ गोवा में हमारे होटल का नाम है ला-बेन रिजार्ट। वैसे नाम में रिजार्ट लगा है पर यहां स्विमिंग पुल नहीं है। हां होटल के प्रांगण में छोटा सा उद्यान है। पार्किंग का इंतजाम है।

होटल परिसर में दो रेस्टोरेंट हैं। एक नीचे गार्डेन रेस्टोरेंट है तो दूसरा रूफ टॉप रेस्टोरेंट। पर थोड़ा शोध करने पर पता चला कि दोनों रेस्टोरेंट का किचेन एक ही है। रूफ टाप के लिए आर्डर का खाना नीचे के रेस्टोरेंट से ही जाता है। लाबेन का गार्डेन रेस्टोरेंट कोलवा इलाके का बहुत लोकप्रिय रेस्टोरेंट है। दरें थोड़ी ज्यादा है पर देशी विदेशी सैलानियों का यह पसंदीदा फूड ज्वाएंट है। सुबह से लेकर शाम तक यहां लोगों की भीड़ लगी रहती है। शाम को कुछ खास दिवसों पर यहां म्युजिकल परफारमेंस भी होता है। हमें शाम को क्लेरियोनेट पर पुरानी फिल्म की संगीत की धुन बजती सुनाई देती है।


रुफ टॉप रेस्टोरेंट के बारे में होटल के मैनेजर बताते हैं कि वहां आप पिज्जा खाने जा सकते हैं। वैसे गोवा के ज्यादातर होटलों में बार होता है। इसलिए यहां भी बार है। साथ ही मांसाहारी व्यंजन भी परोसा जाता है इसलिए हमलोग वहां खाने नहीं गए।

कमरे के लिहाज से लाबेन बहुत बड़ा होटल नहीं है। कुल तीन मंजिले हैं। आप सीजन में डबल बेड रुम नान एसी 700 रुपये का है वहीं एसी रुम 950 रुपये का है। पर अक्तूबर से जनवरी तक गोवा के सभी होटल महंगे हो जाते हैं। लाबेन की लोकप्रियता का आलाम है कि यह सितंबर महीने में ही नवंबर दिसंबर के लिए पूरी तरह बुक हो चुका है।

लाबेन से कोलवा बीच का समंदर सिर्फ 300 मीटर की दूरी पर है। इसलिए यहां से दिन रात कभी भी आप समुद्र के किनारे जा सकते हैं। रात में आने जाने की कोई बंदिश नहीं है। होटल के आसपास कई शाकाहारी भोजनालय भी हैं। इसलिए आप शाकाहारी हैं तो अपना विकल्प चुन सकते हैं। आसपास मे शापिंग के लिए बाजार भी है। यानी मन लगने वाली जगह है। लाबेन वाले गोवा घूमने का पैकेज भी उपलब्ध कराते हैं। आप यहां एक दिन नार्थ गोवा एक दिन साउथ गोवा का मिनी बस से घूमने का पैकेज खरीद सकते हैं। बसें सुबह सुबह 9 बजे आपको होटल से ही ले जाएंगी। ये गोवा घूमने का बहुत ही सहज तरीका है। हालांकि हमलोग एक्टिवा किराये पर लेकर घूम रहे हैं इसलिए इस पैकेज का लाभ नहीं उठाया पर यह बेहतर विकल्प है गोवा घूमने के लिए।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य 
 (SOUTH GOVA, COLVA, LA BEN RESORT ) 

Friday, November 24, 2017

कालांगुट से कोलवा बीच - उत्तर से दक्षिण

नार्थ गोवा में कुछ दिन गुजारने के बाद हमलोग चल पड़े हैं अब साउथ गोवा की ओर। इस बार कालांगुट में डोसा प्लाजा में नास्ता करने के बाद हमने पणजी के लिए लोकल बस ली। बस में ज्यादा भीड़ नहीं है। बस में महिला कंडक्टर हैं। 15 किलोमीटर का किराया 20 रुपये सवारी। बस में आगे चालक के पास केबिन है जहां सामान रखने के लिए काफी जगह है। मतलब की गोवा की इन लोकल बसों में आप लगेज लेकर भी आराम से चल सकते हैं। बस कंडोलियम और उसके बाद गोवा के कई गांवों से होकर गुजरी। रास्ते में मालिम आया, जहां फिशरमैन मार्केट था।
पणजी बस स्टैंड से शटल बस-  मंडोवी नदी का पुल पार करने के बाद बस ने पणजी बस स्टैंड में उतार दिया। पणजी से हमें मडगांव के लिए शटल बस सेवा मिल गई। शटल की खास बात है कि यह रास्ते में कहीं नहीं रुकती। किराया है 40 रुपये प्रति सवारी। सारी सवारियां मडगांव की ही हैं। इसी तरह की शटल पणजी से वास्कोडिगामा के लिए भी चलती है। गोवा के सभी प्रमुख शहरों और गांव  के बीच बसों का अच्छा नेटवर्क है। आप बस से सफर करके टैक्सी का भारी भरकम खर्च बचा सकते हैं। कई जगह फेरी सेवाएं भी चलती हैं। पणजी बस स्टैंड से मुंबई और महाराष्ट्र के दूसरे शहरों के साथ ही कर्नाटक के भी बेलगाम समेत आसपास के शहरों के लिए बसें संचालित होती हैं। आपको याद होगा अमिताभ बच्चन की फिल्म बांबे टू गोवा में फिल्म की कहानी बस के सफर के साथ चलती है।


मडगांव की शटल बस भरने के बाद हरे भरे रास्तों से होकर चल पड़ी। दोपहर में भी मौसम सुहाना है। हरे भरे रास्ते अच्छे लग रहे हैं। 
रास्ते में बस कहीं रुकी नहीं। कोई उतरने चढ़ने वाला भी नहीं। एक घंटे में हमलोग मडगांव बस स्टैंड में पहुंच गए हैं। यहां से मडगांव रेलवे स्टेशन और कोलवा बीच के लिए स्थानीय बसें मिलती हैं और आटो रिक्शा भी। हम आटोरिक्शा पूछ रहे थे तभी हमें  कोलवा बीच के लिए लोकल बस का पता चल गया। यह प्राइवेट बस है। हमलोग इस बस में सवार हो गए। हमारा लगेज कंडक्टर महोदय ने पीछे लगेज बाक्स में डाल दिया। इसमें किराया लगा 20 रुपये प्रति सवारी। यानी 60 रुपये। हालांकि मडगांव बस स्टैंड से कोलवा बीच की दूरी 6 किलोमीटर है। इतनी दूरी का आटो रिक्शावाले 150 रुपये किराया मांगते हैं। मडगांव में आटोरिक्शा भी टैक्सी की तरह बने हैं। इनके दरवाजे बंद होते हैं। काश की ऐसे ही सुंदर आटोरिक्शा दिल्ली में भी चलाए जाते। हालांकि आटोरिक्शा का किराया कुछ ज्यादा है।
खैर हम बस में सवार हैं। बस मडगांव पूरे शहर का चक्कर काटने के बाद कोलवा बीच की ओर चल पड़ी। स्कूल से छुट्टी का समय है इसलिए बस में छात्र छात्राओं की भीड़ है। मैं एक छात्रा से पूछता हूं बस में किराया लगता है या फिर फ्री में सफर। उसने बताया, नहीं किराया तो लगता ही है। सभी लोग बस से उतरते समय कंडक्टर को इमानदारी से किराया दे रहे हैं।
गोवा में मडगांव से कोलवा की बस। 


बस के कंडक्टर महोदय ने हमें बता दिया था कि आप निश्चिंत रहें आपको आपके होटल के सामने उतार दिया जाएगा। और वाकई बस धीरे धीरे चल रही थी इसलिए थोड़ा समय तो लगा। पर बेनालियम के बाद हमलोग कोलवा पहुंच चुके हैं। कोलवा यानी अब हम उत्तर गोवा छोड़कर दक्षिण गोवा में आ चुके हैं। समुद्र तट से थोडा पहले ही हमें बस कंडक्टर ने उतरने को कहा। समाने हमें ला बेन रिजार्ट दिखाई दे रहा था। अब अगले कुछ दिन अपना ठिकाना यहीं पर होगा। कोलवा बीच के बस स्टैंड से हर 20 मिनट पर मडगांव बस स्टैंड के लिए एक बस चलती है। अगर आटोरिक्शा करेंगे तो किराया 150 रुपये है। 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
 ( CALANGUTE, MALIM, PANJI, MADGAON ) 


Thursday, November 23, 2017

मंगेश महादेव - लता मंगेशकर के कुल देवता का मंदिर

हमलोग ओल्ड गोवा से मंगेश के मार्ग पर हैं। आम के बाग, कटहल के पेड़ और हरियाली के बीच रास्ता चल रहा है। बारिश का मौसम आ गया है। पर खैर मनाएं कि बारिश नहीं हुई। वरना हमारे पास आज स्कूटी पर बारिश से बचने का कोई इंतजाम नहीं है। आधे घंटे के सफर के बाद हमलोग मंगेश महादेव के पास पहुंच गए हैं।   
गोवा की राजधानी पणजी से 23 किलोमीटर दूरी पर प्रियोल गांव में श्री मंगेश महादेव का प्रसिद्ध मन्दिर है। इसका वास्तविक नाम मांगोश है। ये महाराष्ट्र के पंच गौड़ीय ब्राह्मणों में से वत्स ब्राह्मणों के कुल देवता हैं।

मंगेश महादेव मतलब महादेव शिव। यहां शिव की प्रतिमा मानव रुप में है। उनके चेहरे पर मूंछे भी देखी जा सकती हैं। मंगेश को गोवा का भगवान माना जाता है। मंगेश महादेव को गोवा के सारस्वत ब्राहम्ण अपना कुल देवता मानते हैं। लोककथाओं के मुताबिक मंगेश लिंगम को भागीरथी नदी के किनारे ब्रह्मा से प्राप्त किया गया था। इसे सारस्वत ब्राह्मण लोग तिरोहितपुरी बिहार से अपने साथ लेकर आए थे। वे इसे अपने साथ गोमांतक (गोवा) लेकर आए।


मंगेश महादेव श्रंगार अदभुत है। मंदिर का गर्भ गृह कई दरवाजों के बाद स्थित है। मंदिर का इंतजाम मंगेश देवस्थानम ट्रस्ट देखता है। परिसर अत्यंत साफ सुथरा और मनोरम है। मंदिर का सात मंजिला दीप स्तंभ शिखर दूर से ही काफी भव्य नजर आता है।


मूल रूप से श्री मंगेश महादेव कुशस्थल ग्राम में प्रतिष्ठित थे। इस गांव का नाम बिगड़कर बाद में कुडथाल या कुट्ठाल हो गया। पर इसका प्राचीन नाम कुशस्थल ही है। इस गांव में मंगेश महादेव का विशाल मन्दिर थापरन्तु पुर्तगालियों के शासनकाल में मन्दिर को नष्ट कर दिया गया था। 1543 में पुर्तगालियों के आक्रमण के बाद वत्स ब्राह्मण लोग ये गांव छोड़कर मंगेशी गांव में जाकर रहने लगे। 1739 में पेशवाओं ने मंगेशी गांव की जमीन मंदिर को दान में दी थी। यहां पहली बार 1744 में मंदिर का निर्माण किया गया। एक बार फिर मंगेश गांव में 1890 में पुनः शिव मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया। वर्तमान मंदिर का भवन 1973 का बना हुआ है। तब इसके कलश को सोने का निर्मित कराया गया।

मुख्य सड़क से मंगेश मंदिर तक जाने वाली सड़क का नाम दीनानाथ मंगेशकर मार्ग रखा गया है। इस मार्ग की लंबाई लगभग एक किलोमीटर है। बड़ी गाडियों के लिए पार्किंग मुख्य सड़क के पास उपलब्ध है। छोटी गाड़ियों से आप मंदिर तक जा सकते हैं। साल 2011 में मंदिर में प्रवेश के लिए शालीन ड्रेस कोड का प्रावधान किया गया। मंदिर परिसर में स्थानीय महिलाएं बिल्व पत्र और कमल के फूल बेचती नजर आती हैं।

लता मंगेशकर से है रिश्ता - मंगेशी गांव का संबध प्रख्यात गायिका लता मंगेशकर से है। प्रख्यात गायिका लता मंगेशकर के पिता दीनानाथ मंगेशकर का जन्म 29 दिसम्बर 1900 को गोवा के मंगेशी गांव में ही हुआ था।  उनके पितागणेश भट्ट नवाथे एक कर्हाडे ब्राह्मण थे। वे प्रसिद्ध मंगेशी मंदिर में पुजारी की भूमिका में थे। वैसे इनके परिवार का मूल उपनाम हार्डिकर था। उनके परिवार को मंगेशी मंदिर के शिवलिंग के लिए अभिषेक का सौभाग्य प्राप्त हुआ था इसलिए उन्हें अभिषेकी उपनाम से भी जाना जाता था। हालांकिदीनानाथ ने अपने पिता के परिवार के दोनो उपनामों को नहीं अपनाया। चूंकि वे परिवार सहित गोवा के मंगेशी गांव में रहते थे। इसलिए उन्होंने अपना उपनाम मंगेशकर अपनाया। इसका अर्थ है मंगेश द्वारा अपनाया गया। संयोग से यह मंगेश देवता (शिवका नाम भी है।


कैसे पहुंचे - मंगेश महादेव का मंदिर पिरोल गांव में पोंडा तालुक में मनोरम वादियों के बीच स्थित है। यह राजधानी पणजी से 23 किलोमीटर और मडगांव से 26 किलोमीटर की दूरी पर है। दोनों शहरों से नियमित बस सेवाएं उपलब्ध हैं। आप करमाली रेलवे स्टेशन से भी मंगेशी सुगमतापूर्वक पहुंच सकते हैं। मंदिर सुबह 5.30 बजे से रात्रि 10.30 तक खुला रहता है। मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं के लिए अतिथि गृह का भी निर्माण कराया गया है। ओल्ड गोवा से मंगेशी के रास्ते में कोरलिम और भोमा आते हैं। भोमा में सड़क के किनारे हमें एक सुंदर मंदिर दिखाई देता है। श्री सातेरी प्रसन्न मंदिर भोमा। रास्ते में तिरुपति बालाजी मंदिर का बोर्ड भी नजर आया। पर हम समय की कमी से नहीं जा सके।( संदर्भ - पुस्तक पुण्यभूमि भारत- पंडित जुगलकिशोर शर्मा ) 
-    - माधवी रंजना 
(  ( MANGESH MAHADEV, GOA, LATA MANGESHKAR ) 

Tuesday, November 21, 2017

पूरे देश की खुशबू महसूस करें प्रगति मैदान में

सीआरपीएफ के पैवेलियन में...
भले ही देश के कोने कोने से घूम कर आ जाता हूं पर दिल्ली में हर साल नवंबर में लगने वाला व्यापार मेला कई कारणों से लुभाता है. सबसे खास बात है कि यहां एक ही जगह देश के सभी राज्यों की खुशबू को महसूस किया जा सकता है। जिन लोगों ने देश के तमाम हिस्सों को नहीं देखा हो वे भी यहां आकर कई राज्यों के खानपान और वहां की वस्तुओं की तिजारत कर सकते हैं।  हालांकि 2017 का व्यापार मेला थोड़ा उदास-उदास सा है। क्यों भला न हो ऐसा। आधा प्रगति मैदान टूट चुका है। देश के महान वास्तुविद राज रेवाल की डिजाइन किए गए शानदार हाल नेस्तनाबूद किए जा रहे हैं। इसकी जगह नया कन्वेंशन हाल बनेगा। इसलिए इस बार मेला आधे क्षेत्र में ही लगा है।
इस बार सिकुड़ गया मेला -
इस बार कई राज्यों के स्थायी पवेलियन टूट चुके हैं। उन राज्यों को अस्थायी हैंगरों में जगह दी गई है। इसलिए इस बार बड़े राज्यों के भी पैवेलियन भव्य नहीं दिखाई दे रहे हैं। सरकार ने मेले में आने वाले लोगों की संख्या भी सीमित कर रखी है। प्रगति मैदान के टिकट काउंटर बंद है। सिर्फ आनलाइन या दूर के मेट्रो स्टेशनों से ही प्रवेश टिकट खरीदा जा सकता है।

पर कपार्ट के सरस मेले में वही पुराना उत्साह और उमंग दिखाई दे रहा है। सरस मेला हर साल की तरह अपने पुराने स्थल पर ही लगा है। कपार्ट द्वारा लगाए जाने वाले इस मेले में  देश के 20 से ज्यादा राज्यों के शिल्पी अपने उत्पादों के साथ प्रस्तुत होते हैं। कपार्ट उन्हें निःशुल्क स्टाल मुहैया कराता है, इसलिए सरस मेले में आपको उत्पाद वाजिब दाम पर मिलते हैं। कई बार तो आप थोड़ा मोल भाव भी कर सकते हैं।
मुजफ्फरपुर (बिहार) की किसान चाची। 

किसान चाची और ओल का अचार -  मैं हर साल सरस मेले से बांस का अचार खरीदता हूं। बांस का अचार झारखंड, छत्तीसगढ़ या असम में मिल जाता है। बिहार के मुजफ्फरपुर से हर साल किसान चाची सरस मेले में अपने अचार के साथ आती हैं। पर इस बार वे हरी लीची का अचार लेकर नहीं आईं। पिछले साल उनसे लिया लीची का अचार काफी स्वाद भरा था। लीची नहीं तो क्या हुआ मैंने उनसे इस बार ओल (जीमीकंद) का अचार खरीदा।
किसान चाची बिहार में नारी सशक्तिकरण का चेहरा बनकर उभरी हैं। अपने अचार के बदलौत वे कौन बनेगा करोड़पति में अमिताभ बच्चन के साथ हॉटसीट पर भी जा चुकी हैं। तो वे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मुलाकात कर चुकी हैं।

किसान चाची मतलब राजकुमारी देवी अब हाईटेक हो गई हैं। अपने अचार को ऑनलाइन भी बेच रही हैं। अपना वेबसाइट भी बना लिया है - www.kisanchachi.com  वे कहती हैं हमको गूगल पर किसानचाची टाईप करके ढूंढ लिजिएगा न। अमिताभ बच्चन के साथ वाला भी फोटो वीडियो सब मिल जाएगा। 


सरस मेले में बड़े भाई चिरंजीलाल कटारिया जी से मुलाकात हुई। 
हिमाचल के हमीरपुर से दीपा शर्मा इस बार नहीं आईं। वे कुरुक्षेत्र में चल रहे सरस मेले में पहुंच गई हैं। इस बार एक ही तारीख में दो जगह सरस मेला चल रहा है। चंबा हिमाचल से आई ममता शर्मा के स्टाल से अखरोट, मक्की का आर्गेनिक आटा खरीदा हमने। केरल और तमिलनाडु के स्टाल से आप कई किस्म के मसाले खरीद सकते हैं। केरल के विशुद्ध मसाले बिल्कुल वाजिब दाम पर इन स्टाल से खरीदा जा सकता है। कपार्ट में सीनियर अधिकारी और हमारे पुराने दिनों के अग्रज भाई चिरंजीलाल कटारिया के निर्देशन में प्रगति मैदान में कई सालों से सरस पैवेलियन का सफल संचालन किया जा रहा है।

बिहार का लिट्टी चोखा और राजस्थान का दाल बाटी चूरमा 
और मेले में चलते चलते भूख लग जाए तो फूड कोर्ट का रुख करें। एक ही परिसर में कई राज्यों के स्वाद का आनंद उठाइए। राजस्थान के दाल बाटी के मुकाबले में बिहार का लिट्टी चोखा भी मेले में खूब धूम मचा रहा है। मिस्टर लिट्टीवाला के स्टाल पर लिट्टी चोखा और अनरसा मिठाई का स्वाद भी लेना न भूलें।

 हालांकि प्रगति मैदान में अलग अलग राज्यों के व्यंजन थोड़े महंगे होते हैं, पर इसके पीछे कई कारण होते है। खास तौर पर स्टालों का महंगा आवंटन। पर इस बार फूड कोर्ट में दक्षिण भारतीय राज्यों के स्टाल पर भी उनके परंपरागत स्वाद का आनंद लिया जा सकता है। टहलते हुए आपको महाराष्ट्र के व्यंजनों का स्टाल और झारखंड के खास तरह के खानपान का मजा भी यहां मिल जाएगा। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य 
( DELHI, IITF, PRAGATI MAIDAN, SARAS MELA, CAPART, KISAN CHACHI ) 

Monday, November 20, 2017

सावधान रहें हॉलीडे क्लब के फर्जीवाड़ा से

गोवा में घूमते हुए अचानक हमें दो एक्टिवा सवार रोकते है। वे हमें एक कूपन देकर कहते हैं इसे स्क्रैच करें इनाम निकलेगा। हमलोग इस तरह के कूपन के चक्कर में एक अनुभव अपनी केरल यात्रा में तिरुवनंतपुरम के कोवलम बीच पर ले चुके थे। पर एक बार फिर हमलोग इनके चक्कर में आ गए। उस बार भी दो घंटे बरबाद हुए थे। इस बार भी दो घंटे बरबाद हुए। 

कोवलम बीच पर स्क्रैच करने पर इनाम निकल आया। तीन विकल्पों में से कुछ मिलेगा। हमलोगों को पास के एक रिजार्ट में ले जाया गया। वहां एक सुंदर मार्केटिंग एग्जक्यूटिव ने हमें अपने रिसार्ट को दिखाया। फिर उसकी मेंबरशिप स्कीम बताई। अब सदस्य बनने का मानसिक दबाव बनाया गया पर इसकी सदस्य शुल्क आखिर तक छिपा कर रखी गई। हम किसी तरह वहां से बचकर निकले थे। इस बार गोवा में एक बार फिर वही कहानी दुहराई गई।

हमलोग कूपन वालों के चक्कर में पड़कर  कालांगुट में ही पालमोरिना रिजार्ट पहुंचे। यहां पर भी हमारा एक ऐसे रिजार्ट मेंबरशिप प्लान से पाला पड़ा। हमें एक घंटे में रिजार्ट दिखाया गया। उसकी सदस्यता के बारे में बताया गया। पर अंत अंत तक इसकी सदस्यता शुल्क कितनी है इस पर परदा रखा गया। वास्तव में वे आपको मनोवैज्ञानिक तौर पर इस बात के लिए तैयार करते हैं कि सदस्यता आप आज ही खरीद लें। इसके लिए वे ये जानकारी पहले ही ले लेते हैं कि आपके पास कोई क्रेडिट कार्ड है। हमने तय कर लिया था कि खरीदना नहीं है। तो हमें शुल्क भी नहीं बताया गया। यह एक बड़ी धोखाधडी है। समय की बरबादी भी है। कुछ लोग इस फरेब में रोज आ भी जाते होंगे। अगर आप कुछ बेच रहे हैं तो पारदर्शिता होनी चाहिए।


हमें यहां लेकर आए एग्जक्यूटिव ने जब जाना कि मैं पत्रकार हूं तो कहा साहब थोड़ी देर के लिए मत बताना कि आप पत्रकार हो। ये पत्रकारों, वकीलों को लाने पर हमें कमीशन नहीं देते।

अपने रिजार्ट के अलावा उन्होंने गोवा के दूसरे रिजार्ट और देश के कुछ अन्य शहरों में रिजार्ट और होटल और विदेशों में होटलों में सदस्य बनकर सस्ते में ठहरने के सब्जबाग दिखाए। ये सब कुछ सुनने में सुहाना लगता है। पर वे अंत तक अपने पैकेज के बारे में नहीं बताते हैं। कहते हैं पहले हां कहिए कि आज सदस्य बन जाएंगे तब पैकेज के बारे में बताएंगे। जब आप आखिरी बार ना कहते हैं तो उनका चेहरा उतर जाता है।
वास्तव में देखा जाए तो ये एक तरह की ठगी है। मार्केटिंग का एक गंदा तरीका है। तो आप किसी इस तरह के स्क्रैच कूपन वालों से गोवा में टकराएं तो बचकर रहिएगा। हो सके तो उनके चक्कर में न पड़ें। ये अंत में इनाम के तौर पर आपको स्क्रैच कूपन में 3 तीन का मुफ्त होलीडे स्टे अपने रिजार्ट का देते हैं। ये एक साल तक के लिए वैलिड होता है पर कई शर्तों के साथ। इसमें टैक्स आदि अलग से चुकाना पड़ता है। इसी तरह का कूपन हमने तिरुवनंतपुरम में भी जीता था जो बाद में किसी काम में नहीं आया। गोवा में एक बार फिर ऐसा ही एक कूपन लेकर हमलोग आगे बढ़ चले।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य  (GOA, HOLIDAY CLUB, FRAUD ) 
गोवा टूरिज्म की होप इन होप आफ बस....

Saturday, November 18, 2017

एशिया की विशालतम चर्च है सी-कैथेड्रल

बॉम बेसेलिका चर्च के दर्शन के बाद हमारी अगली मंजिल है सी कैथेड्रल। पर थोड़ा रुकिए भूख लग गई है अनादि को और हमें भी। तो दोपहर में पेट पूजा के लिए ओल्ड गोवा में बॉम बेसेलिका के सामने एक ही विकल्प नजर आता है। विशाल रेस्टोरेंट है रत्न सागर। वेज एंड नॉन वेज, बार एंड रेस्टोरेंट। तो वहीं हमलोग दक्षिण भारतीय शाकाहारी व्यंजन का आनंद लेेते हैं। इसके बाद चल पड़ते हैं सी कैथेड्रल की ओर।
ओल्ड गोवा में बॉम बेसेलिका के ठीक सामने सड़क के उस पर सफेद रंग का विशाल चर्च है। इसका नाम सी कैथड्रल है। सी कैथड्रल मतलब प्रधान गिरिजिघर। इसे एशिया का सबसे बड़ा चर्च माना जाता है। ओल्ड गोवा में स्थित सी कैथड्रल नामक यह चर्च कैथरीन ऑफ एलेक्जेन्ड्रिया को समर्पित है। इस चर्च की लंबाई है 250 फीट और चौड़ाई 181 फीट है। वहीं सामने के हिस्से की उंचार्इ है 115 फीट है।

सी कैथड्रल की वास्तु शैली पुर्तगाली और मैनुइलार्इन है। बाहरी हिस्सा टस्कन का है और भीतरी हिस्सा कोरिनथियन शैली में बना है। इस चर्च को पुर्तगालियों ने मुसलमानों की सेना पर अपनी विजय के बाद बनवाया था। इस चर्च का निर्माण कार्य साल 1562 में डोम सीबेसिटआयो के शासन काल में शुरू हुआ। पर यह बनकर साल 1619 में तैयार हुआ। साल 1640 में इसे धर्मार्थ समर्पित किया गया। देखा जाए तो इसका निर्माण तकरीबन 80 साल तक चलता रहा।

पर इस चर्च का एक टावर वर्ष 1776 में गिर गया, लेकिन इसका दोबारा निर्माण नहीं कराया जा सका।
सी कैथेड्रल में कई पुरानी पेंटिंग्स हैं, जो निहारने लायक हैं। यहां कुल छह मुख्य पैनल है, जिस पर सेंट कैथरीन के जीवन की घटनाओं का चित्र देखे जा सकते हैं। इसमें बनी सोने के परतयुक्त सूची संत के आत्मबलिदान को दिखाती है। चर्च के मध्य भाग में संत पाल और संत पीटर की लकड़ी की बनीं मूर्तियां भी हैं। चर्च का बाहरी परिसर विशाल और हरा भरा है।

सेंट फ्रांसिस असीसी चर्च गोवा। 
सेंट आगस्टीन चर्च - ओल्ड गोवा में बना 46 मीटर ऊंचा यह सेंट आगस्टीन चर्च अपने आप में अनोखा है।  इस चर्च का निर्माण सन 1602 में किया गया था। 1842 में उपेक्षा के कारण चर्च का बड़ा हिस्सा ढह गया। 1931 में इसका एक और हिस्सा गिर गया।

सेंट फ्रांसिस असीसी चर्च - 

सेंट फ्रांसिस असीसी चर्च का निर्माण 1517 में हुआ। इसके बाद इसका दो बार पुनर्निर्माण भी हुआ। पहली बार 1521 में तो दूसरी बार 1661 में। यह चर्च सी केथेड्रल के ठीक पीछे उसी परिसर में स्थित है। इसका निर्माण लेटेराइट पत्थरों से किया गया है। इसमें चूने के पत्थरों का भी इस्तेमाल किया गया है।

इस गिरिजाघर का मुख्य द्वार पश्चिम दिशा की ओर है। अंदर मुख्य वेदी के साथ पूजा सामग्री घर और गायन कक्ष बने हैं। मुख्य वेदी में सेंट फ्रांसिस की आवक्ष प्रतिमा और बड़ा क्रॉस हैं। तीन प्रमुख वेदियां बरोक्यू और कोरिंथियन शैली को प्रदर्शित करती हैं। 

यहां लकड़ी के बने आधार चित्र भी हैं जो सेंट फ्रांसिस के जीवन काल को दर्शाते हैं। इसके साथ एक विशाल मठ भी बनाया गया था, जिसे अब भारत सरकार के पुरातत्व संग्रहालय का रुप दे दिया गया है।


गोवा का सबसे प्राचीन संत कैथरीन चैपल ( 1510 ) 
सबसे प्राचीन - संत कैथरीन चैपल (प्रार्थनालय )
संत कैथरीन प्रार्थनालाय गोवा का सबसे पुराना चैपल है। इसे साल 1510 में अफांसो डी अलबाबुर्क ने संत कैथरीन दिवस के मौके पर बनवाया। यह गोवा में पुर्तगालियों के प्रवेश के स्मृति में निर्मित कराया गया था। बाद में इसका विस्तार राज्यपाल जार्ज केब्रल ने 1550 में कराया। हालांकि बाद में इसका हालात दयनीय हो गई थी, फिर 1952 में इसका पुनर्निर्माण कराया गया।

इसके अग्रभाग में दो बुर्ज बने हैं। जबकि भीतरी भाग में एक समान्य वेदी निर्मित है। यह पुरातत्व संग्रहालय के ठीक बगल में स्थित है। इसके आसपास पुर्तगाली इतिहास से जुड़ी तमाम सामग्री खुले आसमान में रखी दिखाई देती है।

इतिहास की दास्तां सुनाता - ओल्ड गोवा का संग्रहालय
जब आप ओल्ड गोवा में हैं तो पुरातत्व संग्रहालय देखने का वक्त जरूर निकालें। यह संग्रहालय सी केथेड्रल परिसर में ही सेंट फ्रांसिस आसिसी चर्च के बगल में है। यहां आप गोवा के अलग अलग कालखंड का इतिहास देख सकते हैं। साथ ही इसके सामुद्रिक दीर्घा में मैरीटाइम इतिहास से भी रुबरू हो सकते हैं। संग्रहालय में प्रवेश का टिकट 15 रुपये का है। बच्चों के लिए निःशुल्क प्रवेश है। अंदर पेयजल और शौचालय का भी बेहतर इंतजाम है। यहां पुस्तक और चित्र बिक्री काउंटर भी है। मैं यहां ओल्ड गोवा पर एक पुस्तक खरीद लेता हूं। अनादि घूमते घूमते थक गए थे, पर मैं उन्हें जबरदस्ती संग्रहालय देखने के लिए अंदर भेजता हूं। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य
गोवा - ओल्ड गोवा में पुर्तगालियों द्वारा लगाई गई बारुद बनाने की फैक्ट्री के अवशेष। आप देख सकते हैं कि बारुद बनाने में इस्तेमाल होने वाली चक्की के पत्थर यहां खुले आसमान में प्रदर्शित किए गए हैं। 
(OLD GOA, SE CATHEDRAL, CHURCH OF ST FRANCIS ASSISI, CHAPEL OF ST CATHERINE )
गोवा के संत कैथरीन चेपल का सामने से नजारा। 




Thursday, November 16, 2017

463 साल से सेंट फ्रांसिस की ममी संरक्षित है यहां

बॉम बेसेलिका गोवा का सबसे प्राचीनतम चर्च में से है। पर इसकी ख्याति इसलिए भी है कि यहां 1554 से ही महान संत फ्रांसिस जेवियर्स की ममी (रैलिक्स) या यों कहें कि शरीर को संरक्षित करके रखा गया है। साथ बॉम बेसेलिका यूनेस्को के विश्व विरासत के स्थलों की सूची में भी शुमार है।
बॉम जीसस यानी नेक या शिशू जीसस है। इस गिरजाघर का निर्माण 1594 में शुरू हुआ। इसका निर्माण 1605 में संपन्न हुआ जिसका जिक्र गिरिजाघर में लगे अभिलेख में भी है। 11 साल में इस लाल रंग के अदभुत गिरिजाघर का निर्माण पूरा हुआ। इसका अगला भाग तीन मंजिला है। दो छोटे और एक विशाल प्रवेश द्वार इसमें बनाया गया है।  पूरे गिरिजाघर के निर्माण में बेसाल्ट पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। शेष भाग में लेटराइट का इस्तेमाल हुआ है। चर्च के ऊपरी भाग में रोमन चिन्ह आईएचएस ग्रीक भाषा में लिखा गया है।

बॉम बेसेलिका चर्च का प्रार्थना कक्ष अत्यंत विशाल है। यहां प्रवेश करने पर आपको यहां कई गाइड मिलेंगे जो शुल्क लेकर चर्च के बारे में और गोवा में क्रिश्चियनिटी के आगमन के बारे में विस्तार से जानकारी देते हैं। वे बड़ी खूबसूरती से चर्च के बारे में जानकारी देते हैं। अगर आप गाइड न भी करें तो उनके कुछ वाक्य आपके कान में पड़ ही जाते हैं।

प्रार्थना कक्ष में अंदर बढ़ने पर दायीं तरफ सेंट एंथोनी की वेदी है। यहीं बाईं तरफ सेंट फ्रांसिस जेवियर की काष्ठ की विशाल मूर्ति है। वहीं मध्य भाग के उत्तरी दीवार पर गिरिजाघर के संरक्षक डोम जोरोनिमो मस्कार्नहास का समाधि लेख है। दक्षिणी दीवार पर लकड़ी का चंदोवा युक्त मंच बना है। मुख्य वेदी के पार्श्व में आवर लेडी ऑफ होप और संत माइकेल की वेदियां हैं।

आकर्षक ढंग से सजाई गई वेदियों में शिशु यीशु, संत इग्नेश लोयला की मूर्तियां देखी जा सकती हैं। वहीं गोलाकार फलक के ऊपर परमेश्वर फादर, पुत्र और पवित्र आत्मा चित्रित है। बॉम बेसेलिका के गलियारों में घूमते समय लोगों से पूरी तरह शांति बनाए रखने की उम्मीद की जाती है।

संत फ्रांसिस जेवियर की ममी यहां
बॉम बेसेलिका का संबंध महान संत फ्रांसिस जेवियर से भी है। यहां पर संत फ्रांसिस जेवियर के पवित्र शारीरिक अवेशेषों को संरक्षित करके रखा गया है। इसके पास ही संत के जीवन के दृश्यों को देखा जा सकता है। यहां पर लकड़ी का बना वो ताबूत भी देखा जा सकता है जिसमें संत फ्रांसिस जेवियर के शरीर को लंबे समय तक रखा गया था। यह सुंदर नक्काशीदार ताबूत है।
इस ताबूत का निर्माण 1744 में किया गया था। यह पाइनवुड का बना हुआ है। इसके बाहरी हिस्से में चांदी का काम किया गया है। इसमें 1952-1953 तक संत फ्रांसिस की अस्थियां रखी गई थीं। पर बाद में इसे क्रिस्टल के बने दूसरे कैफीन में स्थानांतरित कर दिया गया। यहां पर आप दोनों कैफीन के दर्शन कर सकते हैं।

1698 में यहां संत फ्रांसिस जेवियर की अस्थियों के लिए संगमरर का चबूतरा तस्कनी के ड्यूक कासमास 3 के आदेश पर बनवाया गया। चर्च के बाहर एक छोटा सा स्मृति स्थल है जहां लोग संत फ्रांसिस जेवियर की याद में मोमबत्तियां जलाते और प्रार्थना करते हुए दिखाई दे जाते हैं। 


बिना किसी लेप के शव सुरक्षित है -  ओल्ड गोवा के बेसिलिका ऑव बोम चर्च में रखे संत फ्रांसिस जेवियर के मृत शारीर की बात करें तो यह जानकर आप आश्चर्यचकित रह जाएंगे कि यह शव पिछले 463 वर्षों से बिना किसी लेप या मसाले के आज भी एकदम तरोताजा है। फ्रांसिस ज़ेवियर का जन्म 1505 में नवारे (पुर्तगाल) में हुआ था। 

पुर्तगाल के सम्राट जोमामो (त्रितीय) की प्रेरणा और पोप की सहमति से जेवियर 6 मई, 1542 को को लिस्बन से गोवा आ गए। इस यात्रा के दौरान वे  मोजांबिक, मालिंदी (केन्या), सोक्रेता होते हुए गोवा पहुंचे थे। ओल्ड गोवा को अपना स्थायी निवास स्थान बनाकर काफी समय तक आसपास के क्षेत्रों में धर्म प्रचार किया। 

सेंट फ्रांसिस ने यहीं से जापान और चीन की भी यात्राएं की। चीन के क्वान्तुंग तट के पास एक दुर्घटना में उसकी मृत्यु  3 दिसंबर 1552 को हो गई।

फरवरी 1553 में पुर्तगालियों ने उसके शव को कब्र से निकाल कर 14 मई 1554 को गोवा लेकर आए। इसके बाद शव को ममी बनाकर लोगों के दर्शनार्थ रखा गया है। फ्रांसिस जेवियर को मृत्यु  के 108 साल बाद रोम ने उसे उसकी 'सेवाओं' के लिए 'संत' कि उपाधि प्रदान की।

बॉम बेसेलिका का परिसर काफी विशाल और हराभरा है। चर्च के बगल में एक ऊपर सीढ़ियां चढ़कर एक सुंदर संग्रहालय भी है। इसके साथ ही यहां एक ध्वनि और प्रकाश का शो भी होता है। चर्च के अंदर पुस्तकें और स्मृति चिन्ह बिक्रय का काउंटर भी बना हुआ है।    

गोवा के चर्च में ड्रेस कोड -  गोवा के सभी चर्च में प्रवेश के लिए ड्रेस कोड देखने को मिलता है। खास तौर पर महिलाएं कम कपड़ो में प्रवेश नहीं कर सकतीं। उनसे उम्मीद की जाती है कि वे मिनी स्कर्ट या स्लिवलेस कपड़ों में इन चर्चों के अंदर प्रवेश ना करें। हमने कई जगह सही तरीके से दुपट्टा नहीं रखने पर भी सुरक्षाकर्मियों को महिलाओं को हिदायत देते हुए देखा।  
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
-        (ST FRANCIS XAVIER , OLD GOA, BASILICA OF  BOM JESUS)


Tuesday, November 14, 2017

ओल्ड गोवा के ऐतिहासिक चर्चों की ओर

ओल्ड गोवा, पोंडा, बेलगावी की ओर जाता हाईवे...
हमलोग ओल्ड गोवा की ओर चल पड़े हैं। यहां गोवा की पुरानी ऐतिहासिक विरासत के दर्शन होंगे। राजधानी पणजी से ओल्ड गोवा की दूरी 12 किलोमीटर है। यह पोंडा, बेलगाम , हुबली (कर्नाटक) की ओर जा रहे नेशनल हाईवे नंबर 4 ए पर है। यह सड़क बहुत अच्छी बनी है। इस पर कई जगह सर्विस रोड भी है। हमारी एक्टिवा तेज गति से रास्ता नाप रही है। हम ओल्ड गोवा पहुंच चुके हैं। चौराहे पर गांधी जी की प्रतिमा नजर आती है। बापू एक बच्चे को दुलार करते हुए नजर आ रहे हैं। गांधी सर्किल से बायीं तरफ मुड़ने पर हम ओल्ड गोवा के पुराने चर्चों को देखेंगे। वैसे आप ओल्ड गोवा पणजी से चलने वाली नियमित बसों से भी पहुंच सकते हैं।
ओल्ड गोवा का गांधी सर्किल। यहां भी हैं बापू...
ओल्ड गोवा का नाम वेल्हा भी है। ओल्ड गोवा भी काफी समय तक गोवा की राजधानी रह चुका है। कदंबा राजतंत्र के शासन में 1050 से 1080 के बीच जयकेशी से शासन काल में राजधानी चंद्रपुर से स्थानांतरित होकर वेल्हा (ओल्ड गोवा ) में आ गई। इसका नाम गोवापुरी रखा गया। यह तब बड़े व्यापारिक शहर के तौर पर विकसित हुआ। कदंबा शासन काल में समुद्री व्यापार ने भी नई ऊंचाइयों को छुआ। कदंबा शासन काल के लोप होने के बाद गोवा देवगिरी के यादवों के शासन में आ गया। देवगिरी के यादव राजा रामचंद्र (1271) के शासन काल में गोवा में कई मंदिरों का भी निर्माण हुआ। इनमें तंबदी सुरला का महादेव मंदिर प्रमुख है। गोवा ने चंदोर पर मुहम्मद बिन तुगलक का आक्रमण भी देखा।


चौदहवीं सदी में गोवा विजय नगर सम्राज्य का हिस्सा बन गया। विजय नगर राजा यहां से अरबी घोड़ों की तिजारत करते थे। 1469 में गोवा गुलबर्ग के बहमनी सल्तनत का हिस्सा बना। 1488 में गोवा बीजापुर के अदिलशाही सल्तनत का हिस्सा बन गया। इस दौरान ओल्ड गोवा का वेल्हा बहुत ही प्रमुख शहर बन गया था। यह बीजापुर के बाद दूसरी राजधानी के तौर पर जाना जाता था।  1498 में वास्कोडिगामा के कालीकट आने के बाद पुर्तगालियों ने कोचीन में अपना व्यापारिक केंद्र बनाया।

1510 में पुर्तगाली अफांसो डे अलबुबर्क ने ओल्ड गोवा को आदिलशाही सल्तनत से अपने कब्जे में लिया। इस तरह से ओल्ड गोवा में पुर्तगाली कब्जे की शुरुआत हुई। हालांकि शिवाजी और संभाजी की पुर्तगालियों से लड़ाई हुई, पर आगे गोवा, दमन, दीव और दादरा नगर हवेली जैसे समुद्र तटीय इलाकों पर पुर्तगालियों का कब्जा बढ़ता गया।

451 साल पुर्तगाल का शासन -  451 साल से ज्यादा गोवा दमन और दीव पर पुर्तगाली शासन रहा। ये क्षेत्र ब्रिटेन से भारत की आजादी के बाद जाकर स्वतंत्र भारत का हिस्सा बन सके। गोवा 19 दिसंबर 1961 को पुर्तगाली शासन से आजाद हुआ। इसके बाद यह केंद्र शासित राज्य रहा। 30 मई 1987 को राजीव गांधी के शासनकाल में गोवा को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला। 

हम अब ओल्ड गोवा के एक विश्व विरासत स्मारक के दर्शन के लिए आगे बढ़ रहे हैं। बॉम जीसस महागिरजाघर या बॉम जीसस बेसेलिका को यूनेस्को ने विश्व विरासत की सूची में शामिल किया है। साल 1986 में चर्चेज एंड कानवेंट्स ऑफ गोवा को विश्व विरासत की सूची में शामिल किया गया। इन चर्च में बॉम बेसेलिका प्रमुख है।

गोवा के ज्यादातर चर्च पुर्तगालियों द्वारा निर्मित हैं। आज पूरे गोवा की आबादी में 35 फीसदी क्रिस्चियन लोग हैं। पुर्तगालियों के आगमन के बाद गोवा में बड़ी संख्या में चर्चों का निर्माण हुआ। अब ये चर्च भारत की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा बन चुके हैं। ओल्ड गोवा के ये चर्च लोगों के दर्शन के लिए सुबह 8.30 बजे से शाम 5.30 बजे तक खुले रहते हैं। इनमें प्रवेश का कोई टिकट नहीं है।
हालांकि संग्रहालय सुबह 10 से 5 बजे तक खुला रहता है। इसमें प्रवेश के लिए 15 रुपये का टिकट है। संग्रहालय के अंदर फोटोग्राफी वर्जित है। 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
(OLD GOA, GANDHI CIRCLE, CHURCH ) 



आगे पढ़िए- ओल्ड गोवा की विश्व विरासत बॉम बेसेलिका के बारे में..