Tuesday, October 10, 2017

सोनपुर से इलाहाबाद और आनंद भवन की सैर

पहली बार इलाहाबाद जाना हुआ 1990 में। इंटर पास करने के बाद पढ़ने की इच्छा थी इलाहाबाद या वाराणसी में। तो बीएचयू और इलाहाबाद विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा के फार्म भरे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय का फार्म अपनी छोटी बहन की पत्र मित्र मालती प्रजापति से मंगवाया। वे तब वहां से हिंदी साहित्य में एमए कर रही थीं। साहित्यिक पत्रिका आजकल में उनकी एक कविता पढ़ने के बाद बहन ने उन्हें पत्र मित्र बनाया था। ये मित्रता काम आई। तो मई 1990 की एक दोपहर में इलाहाबाद पहुंचा मीटरगेज ट्रेन के सफर से। सोनपुर से इलाहाबाद सिटी (रामबाग) तक एक पैसेंजर ट्रेन चलती थी। सोनपुर से शाम को 5 बजे चली ट्रेन अगले दिन दोपहर इलाहाबाद पहुंची।

इस ट्रेन से पहले मैं वाराणसी तक तो आ चुका था। आगे का सफर नया था। वाराणसी के बाद ट्रेन में भीड़ कम हो गई थी। रास्ते में ज्ञानपुर रोड, माधो सिंह, हंडिया खास जैसे स्टेशन आए। अब ये लाइन ब्राडगेज में बदल चुका है। इलाहाबाद सिटी स्टेशन उतरने पर मुझे रहने के लिए मालती दीदी के घर ही जाना था। तेलियरगंज में लाला की सराय में उनका घर था। लोगों से रास्ता पूछता हुआ वहां पहुंच गया। मालती जी और उनके परिवार के लोगों ने बड़ी आत्मीयता से स्वागत किया। अगले दिन मैंने अपने केंद्र में जाकर प्रवेश परीक्षा दी। इस दौरान दो दिन उनके घर रुका। परीक्षा के बाद मालती जी के सहपाठी मुझे साइकिल से इलाहाबाद शहर घुमाने ले गए। हमारे लिए इलाहाबाद की यात्रा में सबसे बड़ा आकर्षण था आनंद भवन देखना। वह भवन जिसके बार में बचपन से किताबों में पढ़ रखा था।   

आनंद भवन भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का पूर्व आवास है। आनंद भवन दो मंजिला इमारत है जो अब यह संग्रहालय में तब्दील हो चुका है। 1899 में पंडित नेहरु के पिता मोतीलाल नेहरू ने इलाहाबाद के चर्च लेन नामक मोहल्ले में एक पुरानी इमारत को अपने रहने के लिए खरीदा। जब इस बंगले में नेहरू परिवार रहने के लिए आया तब इसका नाम आनन्द भवन रखा दिया गया। बाद में मोतीलाल नेहरू पुराने भवन के पास एक नए भवन का निर्माण करवाया। फिर पुराने आवास को कांग्रेस के कार्यों हेतु स्थानीय मुख्यालय बना दिया गया। फिर पुराने आनंद भवन का नाम स्वराज भवन रख दिया गया। इसके नए आवास को आनंद भवन कहा जाने लगा। अब आप एक परिसर में स्वराज भवन और आनंद भवन दोनों को देख सकते हैं।

1931 में मोतीलाल नेहरु के निधन के बाद जवाहर लाल नेहरु ने एक ट्रस्ट बना कर स्वराज भवन को देश की जनता के लिए समर्पित कर दिया। तो 1974 में तत्कालीन प्रधानमत्री इंदिरा गांधी ने जवाहर लाल मेमोरियल फण्ड बना कर आनंद भवन को संग्रहालय में तब्दील कर दिया। आनंद भवन भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दिनों दास्तां बयां करता प्रतीत होता है। यहीं पंडित जवाहरलाल नेहरु का बचपन बीता। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान तमाम नेताओं की गतिविधियों का केंद्र रहा आनंद भवन। 19 नवम्बर 1919 को इंदिरा गांधी का जन्म भी इसी भवन में हुआ। भारत का संविधान लिखने के लिए चुनी गई आल पार्टी का सम्मेलन भी इसी स्वाराज भवन में हुआ था। गांधी जी जब कभी इलाहाबाद आते थे तो यही रहते थे। यहां गांधीजी की इस्तेमाल की हुई कई वस्तुएं देखी जा सकती हैं। आनंद भवन में खान अब्दुल खां, जेबी कृपलानी, लाल बहादुर शास्त्रीराम मनोहर लोहिया, फिरोज गांधी का आना जाना लगा रहता था। 1942 इन्दिरा गांधी का विवाह यहीं पर हुआ तो 1938 मे जवाहरलाल नेहरु की मां स्वरुप रानी की मृत्यु भी यहीं हुई।

आनंद भवन को घूमते हुए आप नेहरु गांधी परिवार की इस्तेमाल की हुई तमाम वस्तुओं को देख सकते हैं साथ ही स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास से रूबरू हो सकते हैं। कई घंटे तक आनंद भवन में घूमने के बाद यहां से जवाहर लाल नेहरू की लिखी दो पुस्तकें खरीद लेता हूं। एक डिस्कवरी ऑफ इंडिया और दूसरी एन आटोबायोग्राफी।


अब आनंद भवन परिसर में एक ताराघर भी बन गया है। जवाहर प्लेनेटोरियम में दिन भर में कुल छह शो होते हैं। इसमें कुल बैठने के लिए 96 सीटें उपलब्ध हैं। देश के दूसरे कई शहरो से ये छोटा ताराघर है लेकिन शो अच्छा है। शो का टिकट 40 रुपये का है। हमारे सौर मंडल के बारे में जानने के लिए ये शो काफी उपयोगी है। खास तौर पर स्कूली बच्चों के लिए।

खुलने का समय – आनंद भवन सुबह 9.30 से सांय 5 बजे तक खुला रहता है। यह हर सोमवार और सरकारी छुट्टियों के दिन बंद रहता हैं। आजकल आनंद भवन संग्रहालय के लिए 10 रुपये प्रवेश शुल्क भारतीय नागरिकों से लिया जाता है।

विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com

( ANAND BHAWAN, ALLAHABAD, RAMBAG, JAWAHAR PLANETARIUM )


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