Friday, September 29, 2017

गौतम बुद्ध का अस्थि कलश देखिए यहां पर

पटना संग्रहालय के अलग अलग दीर्घाओं में आप गौतम बुद्ध से जुड़ी कई मूर्तियां, पेंटिंग आदि देख सकते हैं। बुद्ध पर बेहतरीन संग्रह के कारण दुनिया भर बुद्ध के अनुयायी खास तौर पर इस संग्रहालय में दर्शन के लिए आते हैं। हां दर्शन शब्द इसलिए कि यह आस्था का बड़ा केंद्र है। क्योंकि पूरी दुनिया में यह एकमात्र स्थल जहां गौतम बुद्ध के अस्थि कलश के दर्शन किए जा सकते हैं। पटना संग्रहालय  के प्रथम मंजिल पर एक विशेष गैलरी है जहां पर गौतम बुद्ध के अस्थि कलश के दर्शन किए जा सकते हैं।

गौतम बुद्ध के अस्थि कलश के दर्शन के लिए विशेष टिकट खरीदना पड़ता है। जिनके पास यह टिकट होता है उन्हें संग्रहालय के स्टाफ सम्मान से इस गैलरी में ले जाते हैं। वैसे दिन भर ये गैलरी कई तालों में बंद रहती है। जब टिकटधारी आते हैं तो गैलरी खोली जाती है।


आप पूरा समय देकर नन्हें से डिब्बे  में संजोकर रखे गए अस्थि कलश को देख सकते हैं। यह पूर्णतया वातानुकूलित कक्ष है। बुद्ध का अस्थि कलश बिहार के वैशाली से प्राप्त किया गया है।

पटना संग्रहालय में रखे भगवान बुद्ध के अवशेष इस संग्रहालय के सबसे बेशकीमती संपत्तियों में से एक है। जानकार बताते हैं कि ये अवशेष 1972 तक वैशाली में ही थे, मगर बाद में सुरक्षा कारणों से इसे पटना संग्रहालय में लाकर रखा गया।

बिहार के वैशाली जिले में वैशालीगढ़ स्थित रेलिका स्तूप साइट से इस अस्थि कलश को 1958 में खुदाई के दौरान प्राप्त किया गया था। ये अति दुर्लभ बुद्ध के अस्थि अवशेष वास्तव में वही अस्थि अवशेष हैं, जिन्हें बुद्ध के अंतिम संस्कार के बाद आठ जनपदों के बीच बांटा गया था। इनमें से वैशाली भी एक था। इनमें से कुछ ही जगहों पर ये अस्थि अवशेष सुरक्षित मिले हैं। ऐसे में इन अवशेष स्थलों का महत्व बढ़ जाता है।


काफी इतिहास प्रेमी चाहते हैं कि इसे इसकी मूल भूमि वैशाली में ही रखा जाए। इस मामले में वर्ष 2010 में पटना हाइकोर्ट ने बिहार सरकार को आदेश दिया था कि वह एक साल के अंदर वैशाली में एक संग्रहालय का निर्माण करवा कर वहां बुद्ध की उन अस्थि अवशेषों को वापस वैशाली में ही रखे। पर ऐसा आजतक हो नहीं पाया है।

पटना संग्रहालय में आधार तल की मूर्ति गैलरी को घूमते हुए आपको विलक्षण बुद्ध मूर्तियां नजर आती हैं। संग्रहालय में अफगानिस्तान के बहलोल से प्राप्त बुद्ध की कई मूर्तियां हैं। इनमें से पहली मूर्ति जो दिखाई देती है। वह बैठी हुई मुद्रा में है। यह शिष्ट पत्थर से निर्मित है। ये पहली शताब्दी की है। इसमें बुद्ध को साधनारत दिखाया गया है। उनकी मूंछे हैं। वे किसी राजा के सदृश लग रहे हैं।

आगे आप 11वीं सदी में ओडिशा से प्राप्त किरिटधारी बुद्ध की प्रतिमा देख सकते हैं। रत्नगिरी से मिली इस प्रतिमा का एक हाथ भंग हो गया है। इसमें भी बुद्ध बैठे हुए साधना की मुद्रा में हैं।  

आगे बहलोल से ही प्राप्त बोधिसत्व की एक प्रतिमा है। काले पत्थरों से बनी इस प्रतिमा का एक हाथ क्षतिग्रस्त हो गया है। इसमें वे एक गृहस्त की भूमिका में नजर आ रहे हैं। उन्होंने धोती पहन रखी है, गले में माला भी नजर आ रही है। उनकी लंबी केशराशि है और आंखों में एक खास किस्म का संतोष का भाव नजर आ रहा है।

इसके आगे भी बहलोल से मिली कई बुद्ध मूर्तियां एक साथ देखी जा सकती हैं। इनमें कुछ मूर्तियां बैठी हुई अवस्था में ध्यान मुद्रा में भी नजर आ रही हैं। आगे कुछ मूर्तियां ऐसी दिखाई देती हैं जिनमें सिर्फ बुद्ध का सिर नजर आता है।
प्रथम तल पर आप गौतम बुद्ध से जुड़ी कुछ विशिष्ट पेंटिंग भी देख सकते हैं। संग्रहालय के स्टाफ बताते हैं कि यहां खास तौर पर सर्दी कि दिनों में बौद्ध देशों के विदेशी सैलानी बड़ी संख्या में पहुंचते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
(BUDDHA, PATNA MUSEUM, ASTHI KALASH, BAHLOL, AFGANISTAN )  






Wednesday, September 27, 2017

अदभुत है दीदारगंज की यक्षिणी की मुस्कान

पटना का संग्रहालय इतिहास प्रेमियों के लिए शानदार संग्रह समेटे हुए है। पर यहां की सबसे अदभुत कृति है दीदारगंज की यक्षिणी की प्रतिमा। यह देश की सबसे प्रचीनतम प्रतिमाओं में से एक है।

पटना शहर का पूर्वी इलाका। यहां है मुहल्ला दीदारगंज। यहीं 1917 में एक विशाल प्रतिमा प्राप्त हुई। मूर्ति की लंबाई 5 फीट दो इंच है। यह 1 फीट 3.5 ईंच की चौकी पर विराज रही है। चुनार के बलुआ पत्थर से बनी इस मूर्ति पर आज भी अद्भुत चमक देखी जा सकती है। मूर्ति के एक हाथ में चंवर है।

ऐसे हुई प्रतिमा की खोज -  मूर्ति की खोज के बारे में पटना संग्रहालय का प्रकाशन का कहता है कि तत्कालीन पटना के कमिश्नर ईएचएस वाल्स इस मूर्ति की तलाश का श्रेय गुलाम रसूल नामक स्थानीय व्यक्ति को देते हैं। इसकी तलाश 18 अक्तूबर 1917 को हुई थी। यह प्रतिमा सैकड़ो साल तक मिट्टी में दबी हुई थी। वहीं एक अन्य कथा है कि इसे दीदारगंज के धोबी घाट पर कपड़ा धोते समय धोबियों ने ढूंढ निकाला था।

वास्तव में कपड़े धोने के दौरान एक सांप बिल में घुस गया। उस सांप की तलाश में जब खुदाई शुरू की गई तो यह अदभुत मूर्ति निकल आई। बहरहाल मूर्ति के प्राप्त होने पर पहले हिंदुओं ने इसे देवी प्रतिमा मानते हुए दीदारगंज गांव में रखा गया। बाद में 17 दिसंबर 1917 को इसे पटना संग्रहालय में लाकर रखा गया।

कला प्रेमी दीदारगंज की यक्षी को अपने अपने नजरिए से देखते हैं। पर यह प्रतिमा पूरे विश्व में चर्चा में रही है और दुनिया भर के मूर्तिकारों को चकित करती है।

दीदारगंज की यक्षी प्राचीन भारतीय स्त्री सौंदर्य का आदर्श मानक पेश करती है। यक्षी के गले में दो मालाएं हैं। इसका वस्त्र विन्यास और केश सज्जा भी आकर्षित करती है। पूर्ण वक्ष प्रतिमा, पतली कमर तथा व्यापक नितंब के साथ कामुक भाव में है। कमर पर मांसल उभार सुंदरता की निर्धारित मानदंड के अनुरूप है। यक्षी सीधे खड़े होने के बजाय आगे की ओर थोड़ी झुकी हुई है जो विनम्रता का प्रतीत है। उसके होंठों पर अदभुत मुस्कान है।

यह एक गोल आकृति वाली मूर्ति है जिसे किसी भी कोण से देखा-निहारा जा सकता है। प्रतिमा का बायां वक्ष दाएं वक्ष की तुलना में थोड़ा छोटा है। यह प्रतिमा का मातृत्व भाव प्रकट करती है। माना जाता है कि बाएं वक्ष में दूध की मात्रा कम होती है। शिल्पकार ने प्रतिमा के चेहरे पर जो मुस्कान चित्रित की है,उसकी तुलना लोग मोनालिसा की मुस्कान से करते हैं।

दीदारगंज की यक्षी मौर्यकालीन कला का उत्कृष्ट नमूना है। इसके काल निर्धारण पर लंबी बहस चली। इसे तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व का माना जाता है। इतिहासकार वासुदेव शरण अग्रवाल ने इस प्रतिमा को यक्षयक्षी सम्प्रदाय, जो बुद्ध एवं परवर्ती काल में काफी लोकप्रिय था, से सम्बन्ध करते हुए इसे यक्षी कहा। काशी प्रसाद जायसवाल और कई दूसरे इतिहासकार भी उनसे सहमत हैं।  
सालों धरती में दफन रहने के कारण प्रतिमा को नुकसान पहुंचा है। इसकी नाक थोड़ी सी टूट गई है। पर हल्के विध्वंस के बावजूद यह प्रतिमा अदभुत आकर्षण रखती है।
संग्रहालय में अक्सर पटना कला महाविद्यालय के कलाकार प्रतिमा के पास बैठककर उसकी अनुकृति बनाने में लगे रहते हैं। मैं जब इस प्रतिमा को निहार रहा हूं तो दो ऐसे ही छात्र छात्रा वहां बैठकर कला को रुप देने में व्यस्त दिखाई दे रहे हैं। बता रहे हैं तीन दिन में प्रतिमा की अनुकृति बना पाए हैं।

नए स्थान पर दीदारगंज की यक्षिणी – साल 2017 में यानी पटना संग्रहालय की स्थापना के सौ साल बाद दीदारगंज की यक्षिणी का स्थान बदला जा रहा है। अब यह प्रतिमा पटना संग्रहालय के बजाय बेली रोड पर पटना उच्चन्यायालय के पास नए बने बिहार  म्यूजियम की शोभा बढ़ाएगी।
- विद्युत प्रकाश मौर्य  
(PATNA MUSEUM, DIDARGANJ, YAKASHHINI, STATUE ) 


Monday, September 25, 2017

अतीत के स्वर्णिम अध्याय देखिए - पटना संग्रहालय में

देश के प्रमुख संग्रहालयों के बीच पटना संग्रहालय अपना प्रमुख स्थान रखता है। यहां आप खास तौर बिहार,झारखंड, बंगाल और अफगानिस्तान से प्राप्त प्राचीन वस्तुओं का अदभुत संग्रह देख सकते हैं। लाल रंग की पटना संग्रहालय की विशाल इमारत पटना शहर की शान है।
यहां पर तीसरी शताब्दी ईस्वी पूर्व की अदभुत दीदारगंज की यक्षिणी की प्रतिमा के दर्शन कर सकते हैं। साथ ही गौतम बुद्ध से जुड़ी सैकड़ो मूर्तियों का यहां संग्रह है। एक विशेष दीर्घा में गौतम बुद्ध के अस्थि कलश भी देखे जा सकते हैं। वहीं पटना कलम पेंटिंग की दीर्घा, राहुल सांकृत्यायन द्वारा लाई गई सामग्रियों की दीर्घा और देश के प्रथम राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद द्वारा प्रदान की गई सामग्रियां भी काफी महत्व रखती हैं। कला प्रेमियों के लिए यहां पूरे दिन देखने योग्य सामग्री है। पटना संग्रहालय की स्थापना 1917 में ब्रिटिश कालीन भारत में हुई।

संग्रहालय बिहार सरकार के कला संस्कृति एवं युवा विभाग के तहत आता है। पटना संग्रहालय में प्रवेश करते ही हरित परिसर आपका मन मोह लेता है। मुख्य इमारत के बाहर भी कई ऐतिहासिक वस्तुएं हैं। परिसर में आप लार्ड हार्डिंग की विशाल प्रतिमा देख सकते हैं। 1912 मे लार्ड हार्डिंग भारत के वायसराय और गवर्नर जनरल थे, जब बंगाल से अलग होकर बिहार और ओडिशा राज्य बनाए गए थे।  पटना में उनके नाम पर हार्डिंग पार्क हुआ करता था, जिसका नाम बदलकर अब वीर कुअंर सिंह पार्क रख दिया गया है।

संग्रहालय के मुख्य द्वार के बाहर पार्क में एक कलात्मक द्वार स्तंभ दिखाई देता है। ये द्वार स्तंभ ओडिशा से लाकर यहां स्थापित किया गया है। आठवीं सदी का निर्मित ये द्वार उदयगिरी  से प्राप्त किया गया था।

संग्रहालय में प्रवेश करते ही बायीं तरफ विशाल प्रस्तर प्रतिमा दीर्घा है। इसमें आप मौर्य काल की कलात्मक प्रस्तर प्रतिमाएं देख सकते हैं। यहां दूसरी सदी में पटना के राजेंद्र नगर से प्राप्त शालभंजिका की प्रतिमा देखी जा सकती है। यह भी दीदारगंज की यक्षी की तरह आकर्षक है।  प्रतिमा में खास चमक आज भी बरकरार है। इस खंड में आप तीसरी सदी ईस्वी पूर्व की जैन तीर्थंकर की खंडित प्रतिमा देख सकते हैं। यह पटना के लोहानीपुर इलाके से प्राप्त की गई थी। इस प्रतिमा में भी अद्भुत चमक है।

पटना कलम की चित्रकारी  – पटना चित्रकारों का बड़ा केंद्र रहा है। इन चित्रकारों के बनाए चित्रों को पटना कलम के नाम से जाना जाता है। संग्रहालय के प्रथम तल पर विशाल पेंटिंग गैलरी में पटना कलम से जुडी हुई कुछ सुंदर पेंटिंग का आनंद लिया जा सकता है। इसके अलावा एक गैलरी में यहां टेराकोटा ( मिट्टी की बनी मूर्तियों ) का भी विशाल संग्रह है।
और हां यहां एक 20 करोड़साल पुराना पेड़ भी देख सकते हैं। यह पेड़ धीरे धीरे पत्थरों में तब्दील हो रहा है। इसके बारे में बताया गया है कि चीड़ प्रजाति का यह पेड़ किसी बड़ी झील के किनारे रहा होगा।   

कैसे पहुंचे – पटना म्यूजियम की दूरी पटना जंक्शन रेलवे स्टेशन से एक किलोमीटर के करीब है। डाक बंगला चौक और मौर्यलोक कांप्लेक्स से आप टहलते हुए पटना म्युजियम पहुंच सकते हैं। कोलकाता म्युजियम की तरह लोग इसे जादू घर के नाम से भी बुलाते हैं। परिसर के अंदर पार्किंग की भी सुविधा उपलब्ध है।

प्रवेश टिकट- संग्रहालय में प्रवेश का टिकट भारतीय नागरिकों के लिए 15 रुपये का है। मोबाइल कैमरा के लिए 20 रुपये का शुल्क है। अगर आप गौतम बुद्ध के अस्थि कलश देखना चाहते हैं तो उसके लिए 100 रुपये का शुल्क है। अगर आपके पास बड़ा बैग है तो स्वागत कक्ष पर उसे रखने के लिए क्लाक रुम की सुविधा भी उपलब्ध है।
 - vidyutp@gmail.com
( PATNA MUSEUM, SHALBHANJIKA, OLDEST TREE DIDARGANJ, YAKASHHINI, STATUE ) 



Saturday, September 23, 2017

संकट में हैं महाराजा...कब बहुरेंगे दिन – एयर इंडिया से पटना

कुछ दिन पूर्व मिली सूचना पर दिल्ली से अचानक ही पटना जा रहा हूं। पर इस बार पटना की तरफ पहली बार महाराजा के साथ। महाराजा मतलब एयर इंडिया। यूं हुआ कि एयर इंडिया ने दिल्ली से पटना की टिकट जुलाई 2017 में मात्र 2060 रुपये में आफर कर दी है। इतना तो राजधानी एक एसी 3 में भी लग रहा था सो महाराजा के साथ हो लिए। दिल्ली के टर्मिनल 3 पर महाराजा के साथ पटना के लिए 30 नंबर एयरब्रिज से सवार हुआ तो सहज गर्व हुआ महाराजा के साथ। पर आजकल खूब ये खबर चल रही है कि महाराजा भारी घाटे में है और सरकार इस सरकारी एयरलाइन कंपनी को पूरी तरह निजी हाथों में बेचने की तैयारी कर रही है। कई खरीददार भी आ गए हैं। एक बड़े दावेदार तो टाटा समूह वाले भी हैं जो भारत सरकार से पहले एयर इंडिया के मालिक हुआ करते थे।


पर सरकारी एयरलाइनर महाराजा यानी एयर इंडिया आखिर इतने बड़े कर्ज के बोझ तले कैसे डूबे हैं। सुनता हूं कि 52 हजार करोड़ से ज्यादा कर्ज है। हर साल घाटा भी बढ रहा है। वहीं पिछले दो दशक में आई निजी क्षेत्र की विमानन कंपनियां तेजी से अपना विस्तार कर रही हैं। इंडिगो सबसे बड़ी कंपनी बन चुकी है। जेट एयरवेज, स्पाइस जेट, गो एयर, एयर एशिया, एयर विस्तारा सभी अपना विस्तार कर रही हैं। इनके मुकाबले एयर इंडिया क्यों नहीं ठहर पा रही है।


जब आप अपनी यात्रा की योजना बनाते हुए हवाई टिकट खरीदने के लिए किसी वेबसाइट पर जाएंगे तो हमेशा निजी एयरलाइनर महाराजा से कम राशि पर टिकट दे रहे होते हैं
, ऐसे में इकोनोमी क्लास में सफर करने वाला आदमी एयर इंडिया की ओर क्यों जाना चाहेगा। पिछले कुछ सालों में एक दर्जन से ज्यादा हवाई सफर में मुझे हमेशा निजी एयरलाइनर प्रतिस्पर्धी मिले हैं। किफायती टिकट वहां से मिल गया है। पहली बार ऐसा हुआ है जब एयर इंडिया से किफायती टिकट मिला है। इससे पहले दिल्ली से पोर्ट ब्लेयर जाने और वहां से वापसी में भी एयर इंडिया से सफर का मौका मिला था। आमतौर पर पोर्ट ब्लेयर का किराया एयर इंडिया में प्रतिस्पर्धी रहता है। पर ज्यादातर रूट पर ऐसा नहीं होता।


आजकल एयर इंडिया को अश्वनी लोहानी का नेतृत्व मिला है। लोहानी ने भारतीय रेल में अपने कुशल प्रबंधन का परिचय दिया था। आजकल एयर इंडिया में भी वे अपनी ओर से पूरा बेहतर करने की कोशिश कर रहे हैं। जुलाई में वाशिंगटन के लिए सीधी उड़ान तो अगस्त में काशी से कोलंबो की सीधी उड़ान शुरू करा चुके हैं। पर एयर इंडिया को निजी एयरलाइनर के मुकाबले हमेशा प्रतिस्पर्धात्मक बनाए रखने की जरूरत है।

घरेलू उडानों में निःशुल्क खाना परोसने की नीति को पूरी तरह से खत्म करके टिकट की दरें कम की जा सकती हैं। जिन्हे खाना लेना हो वह निजी एयरलाइनर की तरह अलग से बुक कर सकते है। एयर इंडिया को भी लगातार देखते रहना होगा कि निजी एयरलाइनर किस रुट पर कितनी राशि में टिकट ऑफर कर रहे हैं, जिससे उड़ान भरने वालों को अपनी ओर आकर्षित किया जा सके।

खैर दिल्ली से पटना के सफर में महाराजा की ओर से खाने की प्लैटर में हमें आलू चाप, सैंडविच, गुलाब जामुन आदि परोसा गया। साथ में कॉफी या चाय। हालांकि खाने का स्वाद कुछ खास नहीं था। ऐसे खाने को बंद ही कर दिया जाए तो अच्छ हो। हाल में एयरइंडिया ने घरेलू विमानों में मांसाहारी खाना बंद कर दिया है। यह अच्छा कदम रहा। इससे अन्न की बरबादी कम हुई है। अब खाने को पूरी तरह वैकल्पिक बना देना ही ठीक रहेगा।


तो पटना के तक उड़ान भरने वाले एयर इंडिया के ए 320 विमान की उड़ान संख्या एआई 415 के हमारे पायलट हैं कैप्टन विक्रम यादव। नाम सुनकर गर्व होता है। कैप्टन विक्रम यादव ने विमान बड़े ही संतुलन से उड़ाया। बात में पता चला कि कैप्टन विक्रम यादव बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राजद नेता लालू प्रसाद यादव के दामाद हैं। हम महज एक घंटे बाद पटना के आसमान पर थे। पटना का लोकनायक जय प्रकाश नारायण अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट। हालांकि रनवे भी छोटा है और लाउंज भी। मेरे बेटे अनादि कहते हैं पापा ये तो रेलवे स्टेशन से भी छोटा है। अब हैदराबाद बेंगुलुरु आदि के हवाई अड्डे भव्य बन चुके हैं। तो पटना के दिन कब बहुरेंगे।
-      ------ विद्युत प्रकाश मौर्य

(AIR INDIA, MAHARAJA, PATNA, CPT VIKRAM YADAV ) 

Thursday, September 21, 2017

नवाबों के शहर का ये दरवाजा कुछ कहता है

लखनऊ शहर में एक दरवाजा है। विशाल दरवाजा। रुमी दरवाजा। इस रूमी दरवाजा इमामबाड़े के बाहर पुराने लखनऊ का प्रवेश द्वार माना जाता है। वास्तव में लखनऊ को आजकल शहर के विस्तार के लिहाज से दो हिस्सों में बांटकर देखते हैं। पुराना लखनऊ और नया लखनऊ। अगर गोमती नदी के लिहाज से देखें तो एक हिस्सा गोमती के इस पार का है तो दूसरा हिस्सा गोमती के उस पार का। तो बाद रुमी दरवाजा की। यह दरवाजा लखनऊ के ऐतिहासिक बड़ा इमामबाड़ा के पास ही सड़क पर स्थित है। रुमी दरवाजा लखनऊ की पहचान है। यह लगभग 60 फीट उंचा है, जिसमें तीन मंजिल हैं। इस दरवाजे से आप नवाबों के शहर का भरपूर नजारा ले सकते हैं।

डिजाइन तुर्की के कांस्टेनटिनोपल के समान - 

रूमी दरवाजा को लखनऊ में तुर्कीश द्वार के नाम से भी जाना जाता है। इसका नाम 13 वीं शताब्‍दी के महान सूफी फकीरजलाल-अद-दीन मुहम्‍मद रूमी के नाम पर रखा गया था।  इसकी डिजाइन तुर्की के कांस्टेनटिनोपल के समान है। इसलिए यह कांस्टेनटिनोपल के दरवाजों के समान दिखाई देता है। इस विशालकाय संरचना के ऊपरी भाग में आठ बहुपक्षीय छतरी देखते ही बनती है। अवध वास्तुकला के प्रतीक इस दरवाजे को तुर्किश गेटवे कहा जाता है। यह इमारत 60 फीट ऊंची है। इसके निर्माण में लोहे या लकड़ी का बिल्कुल इस्तेमाल नहीं किया गया है। सबसे ऊपरी हिस्से पर आठ पहलू की छतरी बनी हुई है। दरवाजे का निर्माण त्रिपोलिया जैसा लगता है। दरवाजे के दोनों तरफ हवादार परकोटा बना हुआ है।

22  हजार लोगों को रोजगार मिला - रूमी दरवाजे का निर्माण भी अकाल राहत प्रोजेक्ट के अन्तर्गत किया गया था। नवाब आसफउद्दौला ने यह दरवाजा 1783 ई. में अकाल के दौरान बनवाया था ताकि लोगों को रोजगार मिल सके। यह 1786 में बनकर तैयार हुआ था। इस्लाम में बेकारी और मुसीबत मे भी भीख मांगकर खाना हराम समझा जाता है। इसलिए नवाब ने लोगों को रोजगार देने के लिए इस दरवाजे का निर्माण कराया। कहा जाता है कि इसके निर्माण में 22 हजार लोगों को काम मिला।

वास्तव में रुमी दरवाजा बड़े इमामबाड़े का ही हिस्सा है। इसके रखरखाव की जिम्मेवारी भी हुसैनाबाद ट्रस्ट के ही जिम्मे है। छोटे और बड़े इमामबाड़े के बीच स्थित रुमी दरवाजे में साल 2010 में दरार आने की खबरें आईं। तब इस दरवाजे को मरम्मत की जरूरत महसूस की गई। इस दरवाजे के आसपास कुछ ब्रिटिश अधिकारियों की कब्र भी बनी हुई हैं। वे 1857 की क्रांति के समय मारे गए थे।

आजकल रुमी दरवाजे के अंदर से वाहन गुजरते हैं। यानी आज भी यह प्रवेश द्वार की तरह ही है। दरवाजे के आसपास शाम को चहल पहल रहती है। न सिर्फ बाहरी सैलानी बल्कि स्थनीय लोग भी यहां शाम को परिवार के साथ घूमने आते हैं।
यहां पर आप पुराने लखनऊ की शान तांगे वालों के साथ आधुनिक बैटरी रिक्शा भी चलते हुए देख सकते हैं। यह विशाल द्वार गोमती नदी के पास स्थित है। पास में ही गोमती नदी पर पुराना खूबसूरत पुल भी है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
-         (RUMI DARWAJA, LUCKNOW ) 



Tuesday, September 19, 2017

लखनऊ का एक पार्क ... सौ अफसानें

लखनऊ का बेगम हजरत महल पार्क। लखनऊ शहर के केंद्र में स्थित यह पार्क शहर के अतीत के स्वर्णिम अध्याय की याद दिलाता है। बेगम हजरत महल पार्क लखनऊ के हृदय हजरत गंज में गोमती नदी के हनुमान-सेतु पुल के ठीक सामने परिवर्तन चौक के बाद बना हुआ एक उद्यान है। इसमें खुर्शीद जैदी और सआदत अली का मकबरा बना हुआ है, जिसके आस-पास उद्यान विकसित क्या हुआ है। यह पार्क शहर के केंद्र में होटल क्‍लॉर्क अवध के पास में स्थित है।

इस पार्क में रामलीला, दशहरा और लखनऊ महोत्सव जैसे समारोहों का आयोजन होता है। हर रोज सुबह पार्क में मार्निंग वाकर्स की चहल पहल भी देखी जा सकती है। पार्क में हरी हरी घास बिछी नजर आती है। बीच में सुंदर रास्ते भी बनाए गए हैं। शाम को पार्क  में फव्वारे चलते भी देखे जा सकते हैं। पार्क के आसपास कई राजनीतिक जलसों का आयोजन भी हुआ करता था।

किसी जमाने में यह पार्क ओल्ड विक्टोरिया पार्क के नाम से जाना जाता था। पर 15 अगस्त 1962 को बेगम हज़रत महल के सम्मान में लखनऊ स्थित हजरतगंज के 'ओल्ड विक्टोरिया पार्क' का नाम बदलकर 'बेगम हज़रत महल पार्क' कर दिया गया। नाम बदलने के साथ-साथ यहां एक संगमरमर का स्मारक भी बनाया गया है।

आखिर कौन थीं बेगम हजरत महल। बेगम हजरत महल अवध के नबाब वाजिद अली शाह की पत्नी थीं। लखनऊ में 1857 की क्रांति का नेतृत्व बेगम हज़रत महल ने किया था। अपने नाबालिग पुत्र बिरजिस कादर को गद्दी पर बिठाकर उन्होंने अंग्रेज़ी सेना का स्वयं मुक़ाबला किया। उनमें संगठन की अभूतपूर्व क्षमता थी। साल 1820 के आसपास फैजाबाद में जन्मी बेगम हजरत महल का जीवन बड़ा उतार चढ़ाव भरा रहा। उनका बचपन का नाम मोहम्मदी खातून था। गरीबी के कारण उनके मां बाप ने उन्हें बेच दिया था। पर वे नवाब वाजिद अली शाह की महारानी बनीं। हालात ने उन्हें तवायफ बना दिया । पर उनपर नवाब वाजिद अली शाह की नजर पड़ी और वे महारानी बन गईं।


जब ब्रिटिश अधिकारियों ने नवाब वाजिद अली शाह को गिरफ्तार कर कोलकाता भेज दिया तो बेगम हजरत महल ने 7 जुलाई 1857 को बगावत की बागडोर संभाल ली। पर 21 मार्च 1858 को लखनऊ ब्रिटेन के अधीन हो गया। बेगम की कोठी अंग्रेजी शासन के कब्जे में चली गईं। बेगम को भागना पड़ा। पर उन्होंने अंग्रेजों की सत्ता नहीं स्वीकारी। वे भागकर अपने बेटे के साथ नेपाल चली गईं। वहां के राणा जंगबहादुर ने उन्हें शरण दी। 7 अप्रैल 1879 को उनका काठमांडू में ही इंतकाल हो गया। बेगम हजरत महल के साथ इतिहास के पन्नों पर ज्यादा न्याय नहीं हुआ है। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की भूले बिसरे क्रांतिकारियों की सूची में शामिल हैं।

बेगम हजरत महल पार्क लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन से चार किलोमीटर की दूरी पर है। आप शेयरिंग आटो रिक्शा से लाटूस रोड होते हुए यहां पहुंच सकते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य 
( BEGAM HAJARAT MAHAL PARK, LUCKNOW )     



Sunday, September 17, 2017

इस विशाल इमारत को क्यों कहते हैं भूलभुलैया

बचपन से सुनता आया था कि लखनऊ शहर में एक भूलभुलैया है। जब पहली बार लखनऊ आया तो समय निकाल कर पहुंच गया देखने भूलभुलैया। वास्तव में लखनऊ शहर में स्थित बड़ा इमामबाड़ा को ही लोग भूलभुलैया कहते हैं। इसका नाम आसफी इमामबाड़ा भी है। इस बड़े इमामबाड़े में आने वाले लोग हमेशा ही भूलभुलैया में गुम हो जाते हैं। तो इसे अच्छी तरह घूमने के लिए लोगों को गाइड का सहारा लेना पड़ता है।

वास्तव में भूलभुलैया के अंदर प्रकोष्ठों ओर मार्गों का ऐसा जाल है जो घूमने वाले को भ्रम में डाल देता है। इसके बाद बाहर निकलने का मार्ग का ज्ञान होना कठिन होता है। आपको सारे दरवाजे और गलियारे एक ही जैसे नजर आते हैं। घूमते घूमते आप वहीं पहुंच जाते हैं जहां से चले थे।



बड़ा इमामबाड़ा का निर्माण – बड़ा इमामबाड़ा के निर्माण की कहानी दिलचस्प है। इसका निर्माण अकाल पीड़ितों को रोजगार देने के लिए किया गया था। तब इसके निर्माण में कुल 10 लाख की लागत आई थी। इसे नवाब आसिफुद्दौला ने 1784 में बनवाया था। इसके वास्तुकार किफायतउल्ला थे। तब लखनऊ में भारी सूखा पड़ा था। तो मजदूरों को रोटी देने के लिए इस विशाल इमारत का निर्माण शुरू कराया गया। बड़ा इमामबाड़ा के निर्माण में मुगल और राजपूत वास्तुकला का मेल दिखाई देता है। वास्तव में पूरी इमारत न कोई मस्जिद है न कोई मकबरा है। पर इसके परिसर में एक मसजिद और बावड़ी जरूर है।

इसका विशाल गुंबदनुमा हाल 50 मीटर लंबा और 15 मीटर ऊंचा है। इसकी चौड़ाई 16 मीटर है। इसकी छत को बिना किसी बीम या गार्डर के सिर्फ इंटे जोड़ कर बनाया गया है। जो अपने अपने आप में एक अजूबा है। भूलभुलैया में तीन बड़े कमरे हैं। इसकी दीवारों के छुपे हुए लम्बे गलियारे हैं। दीवारें लगभग 20 फीट मोटी हैं। इस भूल भुलैया में 1000 छोटे छोटे रास्तों का मकड़जाल है जिसमें से कुछ रास्ते बंद हैं। इन्ही रास्तों में लोग भूल जाते हैं।

अगर आप बड़ा इमामबाडा में पहुंचे हैं तो अधिकृत गाइड के साथ पूरी इमारत को घूमें। गाइड आपको भूलभुलैया में ले जाकर छोड़ देगा और आपको खुद से बाहर निकले को कहेगा। आप इसमें असफल होंगे, फिर कहीं से वही गाइड अवतरित हो जाएगा और आपको बाहर निकाल ले जाएगा।

बावड़ी और आसफी मसजिद - बड़ा इमामबाड़ा से जुड़ी हुई एक बावड़ी है जो पांच मंजिलों की है। इस बावड़ी में गोमती नदी से पानी आने का इंतजाम किया गया था। इमामबाड़ा के अंदर एक आसफी मसजिद भी है। इस मसजिद में गैर मुस्लिमों का प्रवेश प्रतिबंधित है। इमामबाड़ा के बाकी हिस्सों में सारे लोग घूम सकते हैं।

धीरे धीरे बोल को सुन न ले - भूलभुलैया की ओर खास बात है यहां की आंतरिक दीवारों में आप प्रतिध्वनि के माध्यम से आप सैकड़ों फीट दूर किसी के फुसफुसाने की ध्वनि सुन सकते हैं। यह अपने आप में अजूबा लगता है। पर यह वैज्ञानिक है। आपको गाइड ऐसा करके दिखा सकता है। वो जो गाना सुना होगा न धीरे धीरे बोल कोई सुन न ले, वह भूलभुलैया पर आकर चरितार्थ होता है। आप बड़ा इमामबाड़ा घूमते समय अपने गाइड से इसकी प्रस्तुति देख सकते हैं।


कैसे पहुंचे – लखनऊ के मुख्य रेलवे स्टेशन  चारबाग से बड़ा इमामबाड़ा की दूरी 5.5 किलोमीटर है। रेलवे स्टेशन से आपको शेयरिंग आटो रिक्शा बैटरी रिक्शा आदि मिल जाएंगे। यह कैसबाग बस डिपो से तकरीबन तीन किलोमीटर की दूरी पर है। आप साइकिल रिक्शा से भी लखनऊ शहर का नजारा लेते हुए इमामबाड़ा तक पहुंच सकते हैं। इमामबाड़ा के पास रुमी दरवाजा भी स्थित है। बड़ा इमामबाड़ा सूर्योदय से सूर्यास्त तक खुला रहता है। सामान रखने के लिए यहां क्लाक रुम उपलब्ध है। कैमरा के लिए 5 रुपये और वीडियो कैमरा के इस्तेमाल के लिए 25 रुपये का शुल्क है। बड़ा इमामबाड़ा का रखरखाव हुसैनाबाद ट्रस्ट के जिम्मे है।  
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( LUCKNOW, BARA IMAMBARA, BHULBHULAIYA ) 

Friday, September 15, 2017

ये लखनऊ की सरजमीं...ये लखनऊ की सरजमीं...

लखनऊ सांस्कृतिक रूप से अत्यंत समृद्ध शहर रहा है। तमीज और तहजीब का शहर। नवाबी शान का शहर। हिंदी में कई फिल्में लखनऊ की पृष्ठ भूमि पर बनी हैं। तो कई गाने भी लिखे गए हैं... ये लखनऊ की सरजमीं...ये लखनऊ की सरजमीं...कली कली है यहां नाजनीं। लखनऊ शहर में पहली बार जाने का मौका 1995 में मिला। इसके बाद कई बार गया। हर बार ये शहर कुछ नया लगता है। वह 1995 का मई महीना था जब आईआईएमसी में नामांकन के लिए प्रवेश परीक्षा देने मैं पहली बार लखनऊ पहुंचा था। तब अपने पुराने साथी मनोज कुमार बोस के साथ उनके हास्टल मे ठहरा था। वे तब लखनऊ विश्वविद्यालय के नरेंद्र देव छात्रावास में रहते थे। बोस और मैं बीएचयू में बीए की कक्षा में साथ साथ थे। पर बाद में वे एमएसडब्लू करने लखनऊ विश्ववद्यालय आ गए थे। मैं वाराणसी लखनऊ पैसेंजर से सारी रात यात्रा करके सुबह सुबह लखनऊ पहुंचा था। तब पहली यात्रा में लखनऊ की सुबह ने बड़ा आकर्षित किया। सड़कों के किनारे सुबह के नास्ते में अंकुरित चना मूंग मिलते हुए देखा। साथ ही लखनऊ में छाछ पीना अच्छा लगा। तब छाछ यहां दूध की तरह पाउच में मिलता था, 250 मिली का पाउच। अब वैसा नमकीन छाछ कई और शहरों में भी मिलने लगा है।

खैर लखनऊ में ही टेस्ट दिया था और मेरा चयन आईआईएमसी के लिए हो गया। उसके बाद भी लखनऊ कई बार आना हुआ। विकास नगर, इंदिरा नगर, गोमती नगर में कई दोस्तों से मुलाकात और कई बार रात्रि प्रवास। इस दौरान शहर को अलग अलग तरीके से घूमने का मौका मिला। साल 2009 के दिसंबर में जब एक शादी में लखनऊ आया तो हमारे ईटीवी के साथी अलाउद्दीन ने हमें अंबेडकर पार्क दिखाया। उसकी भव्यता देखकर आनंद आ जाता है। इस पार्क के निर्माण के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती की बड़ी आलोचना हुई पर अब यह लखनऊ का प्रमुख पर्यटक स्थल बन चुका है। 2013 में एक बार फिर लखनऊ आया था एक और शादी में। यह भव्य वैवाहिक समारोह बलरामपुर गार्डन में था।



2017 में एक बार फिर लखनऊ जंक्शन से बाहर निकला हूं। यूं तो लखनऊ से होकर हमारी आपकी ट्रेन अनगिनत बार गुजरी होगी। पर लखनऊ जंक्शन से बाहर निकलेंगे तो आपको स्टेशन की नवाबी शान वाली लाल रंग की इमारत देखने को मिलेगी। इस इमारत का निर्माण 1914 में आरंभ हुआ और 1926 में पूरा हुआ। इसमें मुगल वास्तुकला की छाप दिखाई देती है। ऊपर कई मीनारें बनाई गई हैं। वैसे लखनऊ में 23 अप्रैल 1867 को कानपुर से ट्रेन का संचालन शुरू हो चुका था। तब यह अवध रोहिलखंड रेलवे का हिस्सा था। 1925 में यह इस्ट इंडियन रेलवे का हिस्सा बना। चारबाग में वास्तव में दो रेलवे स्टेशन हैं। लखनऊ जंक्सन और लखनऊ सिटी। एक कोड है LKO  दूसरे स्टेशन का कोड है LJN कुछ साल पहले तक यहां मीटर गेज की लाइनें भी हुआ करती थीं। 

लखनऊ के अमीनाबाद का व्यस्त बाजार 
इस रेलवे स्टेशन पर भारतीय रेलवे के दो जोन लगते हैं। उत्तर रेलवे और पूर्वोत्तर रेलवे।
 वैसे इस इलाके को लखनऊ के लोग चार बाग कहते है। किसी जमाने में यहां चार बाग रहे होंगे। पर अब कोई बाग दिखाई नहीं देता। रेलवे स्टेशन की पुरानी ईमारत में अब नए रंग भरे जा रहे हैं। यहां एएच ह्वीलर के अलावा सर्वोदय बुक स्टाल, कमसम और आईआरसीटीसी के रेस्टोरेंट मौजूद हैं। पर वेटिंग हॉल और शौचालय आदि की स्थित अच्छी नहीं है। द्वितीय या स्लीपर श्रेणी के वेटिंग हाल से लगा हुआ शौचालय है ही नहीं।

रेलवे स्टेशन पर डारमेटरी की सुविधा उपलब्ध है। उसकी बुकिंग के लिए हमेशा यात्रियों की लाइन लगी रहती है। वैसे आपको स्टेशन के बाहर गौतमबुद्ध रोड पर तमाम सस्ते और मध्यमवर्गीय होटल रहने के लिए मिल जाएंगे। अब लखनऊ जंक्शन के ठीक सामने से मेट्रो रेल भी गुजर रही है। 5 सितंबर 2017 से लखनऊ में मेट्रो रेल का संचालन शुरू हो गया है। स्टेशन के ठीक सामने लखनऊ मेट्रो का स्टेशन है जिसका नाम चारबाग रखा गया है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य

( LUCKNOW, LKO, LJN, CHARBAG METRO STATION ) 

Wednesday, September 13, 2017

कानपुर शहर और गंगा नदी का प्रदूषण

कई साल बाद एक बार फिर कानपुर शहर में उतरा हूं। याद आता है 1993 में कानपुर आया था तो कई दिनों तक रुका था। तब कई इलाके भी घूमे थे शहर के। पर कई साल से हर बार कानपुर से होता हुआ रेल से गुजर जाता हूं। पर इस बार सुबह-सुबह कानपुर की धरती पर उतरना पड़ा है। दिल्ली से रात 12 बजे चलने वाली श्रमशक्ति एक्सप्रेस ने 40 मिनट देर से कानपुर में उतारा। 

हालांकि नई दिल्ली से खुलने के बाद श्रमशक्ति एक्सप्रेस का पड़ाव सीधे पनकी में है।पर ट्रेन फिर भी लेट हो गई है। पनकी कानपुर का बाहरी इलाका है। पर बिना किसी ठहराव के चलने वाली ट्रेन भी लेट हो गई है।श्रमशक्ति की इस देरी के कारण  मुझे लखनऊ के लिए मिलने वाली 6.30 वाली पैसेंजर ट्रेन को छोड़ना पड़ा। अब अगली ट्रेन का इंतजार है। इस बीच स्थानीय अखबार के पन्ने पलटने लगता हूं। 

कानपुर रेलवे स्टेशन वैसे तो बहुत बड़ा स्टेशन है। पर कानपुर में मुख्य शहर प्लेटफार्म नंबर एक की तरफ नहीं है। मुख्य शहर है प्लेटफार्म नंबर 8 के बाहर। मुझे अगली यात्रा का टिकट लेना है। तो प्लेटफार्म नंबर 8 के बाहर आया। इस तरफ रेलवे की ओर से यात्री सुविधाओं के नाम पर खानापूर्ति है। बाहर से देखकर लगता नहीं है कानपुर रेलवे स्टेशन है। स्टेशन के सौंदर्यीकरण और यात्री सुविधाओं के विस्तार पर रेलवे का कोई ध्यान नहीं है। टिकट काउंटर पर भीड़ है। आटोमेटिक टिकट वेंडिंग मशीने नहीं लगी हैं। छोटी दूरी लंबी दूरी के सभी यात्री दो काउंटरों पर टिकट के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हमारी तुरंत ट्रेन होती तो छूट ही जाती।

खैर टिकट लेकर वापस प्लेटफार्म नंबर एक पर आ गया हूं। पर 7.30 वाली लखनऊ पैसेंजर भी लेट हो गई है। इंतजार करते करते ट्रेन 8.20 में आई। दस मिनट बाद चल पड़ी। पहला स्टेशन आता है कानपुर गंगा तट। गंगा नदी पर पुल पार करते ही ये स्टेशन आता है। स्टेशन का नाम है कानपुर ब्रिज राइट बैंक। इस स्टेशन का नाम कुछ और होता तो बेहतर होता। बारिश के दिन है गंगा जी में पानी बढ़ रहा है। पर कानपुर में गंगा का पानी अत्यंत गंदला है। लोग गंगा जी के पुल से सिक्के फेंकना शुरू कर देते हैं। नीचे बच्चे जाल लिखे खड़े हैं। वे गंगा जी के पानी से सिक्के तलाश करते हैं। पता नहीं उनकी कितनी कमाई हो जाती होगी।

कानपुर में गंगा नदी पर पुल 
आज ही अखबार में कानपुर से चमड़े के कारोबार में लगी टेनरियों को हटाने की खबर छपी है। कानपुर के तकरीबन 450 उद्योंगो को जो गंगा के किनारे चमड़े का कारोबार करते हैं शिफ्ट होना होगा। गंगा जी में कचरा फैलाने में इन उद्योगों का बड़ा योगदान है।  उद्योगपतियों को चिंता है कि वे बरबाद हो जाएंगे। चमड़े के कारोबार से विदेशी मुद्रा आना बंद हो जाएगा। दो साल उद्योग बंद हुए तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में दूसरे देशों की कंपनियां हावी हो जाएंगी। अब भाई गंगा की सफाई और चमड़ा उद्योग दोनों की चिंता एक साथ दूर नहीं हो सकती। किसी एक को चुनना होगा।

कानपुर से 17 किलोमीटर आगे उन्नाव रेलवे स्टेशन आया। उन्नाव यूपी का जिला है पर स्टेशन छोटा सा है। इसके बाद सोनिक, अजगैन, कुसुम्भी, जैतीपुर, हरौनी, पीपरसंड रेलवे स्टेशन आए। उन्नाव जिले के दो छोटे स्टेशन लोगों के व्यवहार के मामले में खतरनाक माने जाते हैं। अमौसी  रेलवे स्टेशन के पास लखनऊ का हवाई अड्डा है। मानक नगर लखनऊ शहर का स्टेशन है। साढ़े दस बजे हमारी ट्रेन चार बाग यानी लखनऊ जंक्शन पहुंच चुकी थी।  

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( KANPUR, GANGA RIVER, UNNAO, RAIL ) 

Monday, September 11, 2017

आइए दिल्ली में मिजोरम को महसूस करें

SPICE GIRL OF MIZORAM
पूर्वोत्तर के आठ राज्यों में से सात के कुछ कुछ हिस्सों का दौरा कर चुका हूं। पर मिजोरम नहीं गया। वैसे दिल्ली में कई बार ऐसे आयोजन होते हैं जब आप यहां पूर्वोत्तर की खुशबू को महसूस कर सकते हैं। कभी व्यापार मेले में तो कभी फैशन शो में तो कभी बाबा खड़ग सिंह मार्ग क इंपोरियम में घूमते हुए। इसी तरह 9-10 सितंबर को भारत सरकार की ओर से इंडियागेट लान में नार्थ इस्ट फेस्ट का आयोजन किया गया।

दो दिन के इस फेस्ट में जाकर उन सभी राज्यों के स्टाल को देखना जहां आप घूम कर आ चुके हों तो एहसास कुछ अपना सा लगता है। इस दो दिनी उत्सव में असम, अरुणाचल, सिक्किम, मेघालय, नागालैंड, मणिपुर, त्रिपुरा के लोग अपने अपने स्टाल, खानपान, हैंडीक्राफ्ट के साथ मौजूद थे। कुछ बिजनेस मीटिंग, क्विज प्रतियोगिताओं के बीच खाने पीने का दौर। मेला ऐसा है जैसे के परिसर में पूर्वोत्तर के सभी राज्य समा गए हों। इन सबके बीच मिजोरम के भी कुछ स्टाल थे। खास तौर पर मिजो लोगों से मिलना और उनके राज्य की कुछ चीजें खरीदना हमारा इस मेले में जाने का मकसद था।

तो हमने मिजोरम के स्टाल से खरीदा करी पत्ता। सूखा करी पत्ता। वैसे वहां बैठी बाला अदरक पाउडर भी ले जाने की सलाह दे रही थी। ये सब कुछ आया था मिजोरम की राजधानी एजल के पास केफांग (KEIFANG) से। वहां सूखे अदरक की छड़ियां भी पैक होकर बिक रही थीं। वहीं सूखी बांस की जड़ें भी पैक होकर बिक रही थीं। किंग चीली, बर्ड आई चीली यानी मिर्च की कई किस्में भी उपलब्ध थीं।

मिजोरम की मिजो चीली (मिर्च) की अपनी अलग किस्म है। वहां कई इलाकों में ब्लैक ग्रेप का भी उत्पादन हो रहा है। आमतौर पर पूर्वोत्तर राज्यों के मसाले अगर आप खरीदते हैं तो वह काफी हद तक आर्गेनिक तरीके से उत्पादित होगा। वैसे सिक्किम तो पूर्णतः आर्गेनिक राज्य घोषित हो चुका है। हालांकि पूर्वोत्तर के ज्यादातर राज्यों के लोग भोले भाले होते हैं। इसलिए वे कारोबार करने मे चतुराई नहीं दिखाते। वस्तुओं के मूल्य को लेकर कोई मोलभाव नहीं करते।


और आगे चलिए तो मिजो डिनर का मजा लिजिए। 350 रुपये की थाली। इसमें क्या है स्मोक्ड पोर्क और चावल की थाली। खैर मैं पोर्क तो खाता नहीं। पर खाने पीने वाले इस स्टाल पर दरिआफ्त करते नजर आए। उनके स्टाल पर वेज आइटम यानी दाल राइस भी उपलब्ध था। मुझे पता चला कि दिल्ली के सफदरजंग इलाके में सालों भर मिजो फूड उपलब्ध होता है। मतलब आप दिल्ली में भी मिजोरम के व्यंजनों का आनंद सालों भर ले सकते हैं। मिजोरम सरकार के आगे दो और स्टाल दिखाई दिए जिसमें शॉल और दूसरे हस्तशिल्प में बने कपड़े के उत्पाद उपलब्ध थे। खास तौर पर जैकेट पर महिलाओं की नजर ज्यादा जा रही थी।


चलते चलते एक और मिजो स्टाल पर एरोमेटिक ग्रीन टी का स्वाद लेने का मौका मिला। इस हरी चाय की पत्तियों का पैकेट बिक्री के लिए भी उपलब्ध था। कुल 150 रुपये का पैकेट, हरी चाय। पूर्वोत्तर के आठ राज्यों के बीच मिजोरम काफी साक्षर और शांत राज्य है। पर मिजोरम की पर्यटन विभाग की सक्रियता कुछ ज्यादा नहीं दिखाई देती। पूरे मेले में हमें सभी राज्यों के टूरिज्म के स्टाल तो मिले पर मिजोरम का नहीं मिला।

आगे चलते हुए माईहोम इंडिया का स्टाल मिला। माईहोम इंडिया के एक अभिनव प्रयास है पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों को देश के दूसरे राज्यों के साथ जोड़ने का जो सालों से चलाया जा रहा है। इसके संस्थापक सुनील देवधर जी हैं। यह संस्था मुंबई -दिल्ली समेत देश के अलग अलग हिस्सों में पूर्वोत्तर के लोगों के साथ मिलकर आयोजन करती रहती है। 

-    - विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com 

( ( MIZORAM, DELHI, SPICE, PEOPLE ) 


Saturday, September 9, 2017

इस फल को खाइए और बने रहिए जवान

पूर्वोत्तर मेले के कई स्टाल पर हमें ड्रैगन फ्रूट नजर आया तो इसके बारे में जिज्ञासा बढ़ी। नाम है ड्रैगन फ्रूट । पर यह खतरनाक नहीं बल्कि बड़े काम का फल है। पूर्वोत्तर के कई राज्यों में इसकी खेती होने लगी है। खासकर मिजोरम में। ड्रैगन फ्रूट को पिताया या स्ट्रॉबेरी पीयर के नाम से भी जाना जाता है। ऊपर से काफी ऊबड-खाबड़ सा दिखने वाला ये फल अंदर से काफी मुलायम और सुस्वादु होता है। जब आप इसके फायदे जानेंगे तो खाना पसंद करेंगे।

भारत में ड्रैगन फ्रूट नया है। वैसे ड्रैगन फ्रूट की खेती थाइलैंड, वियतनाम, इज़रायल और श्रीलंका में पहले ही लोकप्रिय है। भारतीय बाजार  में इसकी कीमत 200  से 250 रुपये प्रति किलो तक है। इसलिए इसकी खेती में किसानों को लाभ हो रहा है। ठंडे प्रदेश में इसकी खेती अच्छी होती है। इसलिए पूर्वोत्तर राज्य मिजोरम में ड्रैगन फ्रूट की खेती हो रही है। ड्रेगन फ्रूट के पौधे का उपयोग सजावटी पौधे के तौर पर भी होता है। ड्रेगन फ्रूट को ताजे फल के तौर पर भी खाया जा सकता है। साथ ही इस फल से जैम, आइसक्रीम, जेली, जूस और शराब भी बनाया जा सकता है। सौंदर्य प्रसाधन के तौर पर भी इसे फेस पैक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।



आइए जानते हैं ड्रैगन फ्रूट के कुछ फायदे –

- खतरनाक कोलेस्ट्रॉल में कमी लाकर आपके दिल को मजबूत बनाए रखता है।

- शुगर से भी लड़ने में मददगार होता है। इसमें मौजूद फाइबर ब्लड शुगर के स्तर को संतुलित करता है।
- यह आपके पाचन तंत्र को भी दुरुस्त रखता है।

- अपने आहार में ड्रैगन फ्रूट को शामिल करके आप अर्थराइटिस (जोड़ों के दर्द ) आदि बीमारियों से भी बच सकते हैं।

- एंटीऑक्सीडेंट की अच्छी मात्रा होती है।  कैंसर पैदा करने वाले तत्वों से बचाव करता है।
असमय बुढ़ापा आने से रोकता है - 
ड्रैगन फ्रूट में एंटीऑक्सीडेंट होने के कारण ही यह असमय बुढ़ापा आने से रोकता है। ड्रैगन फ्रूट को शहद मिलाकर फेस मास्क बना सकते हैं। इसका नियमित रूप से चेहरे पर इस्तेमाल से चेहरे से झुर्रियों को हटाता है और त्वचा को जवां बनाए रखता है।


बाजार में भारी मांग - तमाम तरह के पौष्टिक गुणों को देखते हुए ड्रेगेन फ्रूट की स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारी मांग हो रही है। इसलिए ड्रेगेन फ्रूट की खेती व्यवसायिक तौर पर लाभप्रद मानी जाती है।
खेती से हो रही लाखों की कमाई - 
समान्य वर्षा और कम धूप वाले क्षेत्र इसकी खेती के लिए उपयुक्त माने जाते हैं। ड्रैगन फ्रूट के पौधे कम उपजाऊ मिट्टी और तापमान में होने वाले लगातार बदलाव के बीच भी जीवित रह सकते हैं। इसके पौधो को 50 सेमी औसत सालाना दर से बारिश की जरूरत होती है जबकि 20 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान इसके लिए उपयुक्त माना जाता है। तो पूर्वोत्तर के कई राज्य इसकी खेती के लिए मुफीद हैं। 

मिजोरम का हार्टिकल्चर विभाग ड्रैगन फ्रूट की खेती को बढ़ावा दे रहा है। इससे राज्य के किसानों की आमदनी बढ़ी है। इसके पौधों में मई से जून के महीने में फूल लगते हैं और अगस्त से दिसंबर तक फल आते हैं। इसके कच्चे फलों का रंग गहरे हरे रंग का होता जबकि पकने पर इसका रंग लाल हो जाता है। अभी तक इसके खेती में किसी तरह की बीमारी लगने का मामला सामने नहीं आया है।
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(DRAGON FRUIT, MIZORAM )