Saturday, August 12, 2017

यहां है दुनिया का सबसे प्राचीनतम मंदिर

क्या आपको पता है दुनिया का सबसे प्राचीनतम मंदिर कहां है। जवाब है बिहार के कैमूर जिले में। माता मुंडेश्वरी देवी का मंदिर दुनिया का सबसे प्राचीनतम मंदिर है जिसके ऐतिहासिक साक्ष्य मिलते हैं। साथ ही यहां अनवरत पूजा भी हो रही है। श्रद्धालु इसे देवी के शक्तिपीठ में भी शामिल करते है। 
कैमूर पर्वत की पवरा पहाड़ी पर 608 फीट की उंचाई पर स्थित इस मंदिर से मिले एक शिलालेख से पता चलता है कि 635 ई. में यह निश्चित रूप से विद्यमान था। पर हाल के शोधों के आधार पर तो अब इसे पहली सदी का यानी देश और दुनिया का प्राचीनतम मंदिर माना जाने लगा है।


बिहार धार्मिक न्यास परिषद के अध्यरक्ष आचार्य किशोर कुणाल यहां मिले शिलालेख और अन्यं दस्ता वेज का हवाला देते हुए कहते हैं कि यह मंदिर 108 ईस्वी में मौजूद था और तभी से इसमें लगातार पूजा का कार्यक्रम चल रहा है। अपनी प्राचीनता के आधार पर यह मंदिर यूनेस्को द्वारा जारी की जाने वाली विश्व धरोहर की सूची में शामिल किए जाने का दावेदार है।

अष्टकोणीय वास्तु योजना का मंदिर
मंदिर अष्टकोणीय योजना में बना है जो अपने आप में दुर्लभ है। पूरी तरह से पत्थर से निर्मित इस मंदिर की दीवारों पर सुंदर ताखे, अर्ध स्तंभ और घट-पल्लतव के अलंकरण बने हैं। दरवाजे के चौखटों पर द्वारपाल और गंगा-यमुना आदि की मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। मंदिर के भीतर चतुर्मुख शिवलिंग और मुंडेश्वरी भवानी की प्रतिमा है। मंदिर का शिखर नष्ट हो चुका है। इसकी छत पुरातत्व विभाग द्वारा बाद में दुबारा निर्मित कराई गई है।

चली आ रही है अहिंसक बलि प्रथा

मुंडेश्वरी मंदिर की बलि प्रथा का अहिंसक स्वरूप इसकी विशेषता है। यहां परंपरागत तरीके से बकरे की बलि नहीं होती है। केवल बकरे को मुंडेश्वरी देवी के सामने लाया जाता है और उस पर पुजारी द्वारा अभिमंत्रित चावल का दाना जैसे ही छिड़का जाता है वह अपने आप अचेत हो जाता है। इतनी ही बलि की पूरी प्रक्रिया है। इसके बाद बकरे को छोड़ दिया जाता है और वह फिर चेतना में आ जाता है। मंदिर में रोज सैकड़ों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। पर नवरात्र के मौके पर वहां विशेष भीड़ रहती है।

मंदिर की प्राचीनता के साक्ष्य

मुंडेश्वरी मंदिर से संबंधित दो पुरातात्विक साक्ष्य अब तक मिले हैं, वहां से प्राप्त प्राचीन शिलालेख और श्रीलंका के महाराजा दुत्त गामनी की राजकीय मुद्रा। मुंडेश्वरी मंदिर के काल निर्धारण का मुख्य आधार वहां से प्राप्त शिलालेख ही है। अठारह पंक्तियों का यह शिलालेख किन्ही महाराज उदयसेन का है, जो दो टुकड़ों में खंडित है।  दोनों टुकड़ों को जोड़कर उन्हें  उसी साल इंडियन म्यूजियम कोलकाता भेज दिया गया। यह शिलालेख संस्कृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में है। शिला टूट जाने के कारण जोड़ के बीच के कुछ शब्द गुम हो गए हैं। हालांकि विद्वानों ने अपने शोध के आधार पर उनकी पुनर्रचना की है।

ब्राह्मी लिपि के उक्त  शिलालेख का चित्र और बिहार राज्य धार्मिक न्यास परिषद द्वारा किया गया उसका देवनागरी लिप्यांतरण प्रस्तुत किया गया है। इसका एक टुकड़ा 1892 और दूसरा 1902 में मिला। हाल में हुए कुछ शोधों के आधार पर शिलालेख में उल्लेखित संवत्सर को शक संवत मानते हुए इसे कुषाण युग में हुविष्कद के शासनकाल में 108 ईस्वी में उत्कीर्ण माना गया है। मुंडेश्वरी धाम में मिले पुरातात्विक साक्ष्य (शिलालेख और दुत्तणगामनी की मुद्रा) जब इतने प्राचीन हैं तो जाहिर है कि मंदिर उससे पहले ही बना होगा। इस तरह से मंदिर का निर्माण ईस्वी पूर्व का भी हो सकता है। ( साभार- अशोक पांडे, कुदरा )


कैसे पड़ा मुंडेश्वरी नाम - मां मुंडेश्वरी भैंसे पर सवार हैं और उनके दस हाथ हैं जिसमें शस्त्र धारण किया हुआ है। कहा जाता है मुंडा चेरो जनजाति का राजा था, जिसके नाम पर देवी मुंडेश्वरी का नाम पड़ा है। पर शक्ति का रुप मां मुंडेश्वरी ने चेरो राजा मुंडा का संहार किया था या फिर वह उसकी अराध्या देवी थीं इसको लेकर अलग अलग विचार हो सकते हैं। मुंडेश्वरी नाम से दोनों तरह के अर्थ निकाले जा सकते हैं। वैसे चेरो जनजाति उत्तर प्रदेश और बिहार में अब भी पाई जाती है। वे लोग खुद को क्षत्रिय होने का दावा करते हैं। आजकल वैसे वे अनुसूचित जनजाति में आते हैं। उनका उपाधि महतो और चौधरी आदि हुआ करती है। ऐसा प्रतीत होता है कि चेरा राजा मुंडा की अराध्या रही होंगी माता मुंडेश्वरी देवी। 

कैसे पहुंचे – मुंडेश्वरी मंदिर तक पहुंचने के लिए जीटी रोड पर स्थित मोहनिया (भभुआ रोड) से सुगम रास्ता है। मोहनिया से मंदिर की दूरी 22 किलोमीटर और भभुआ बाजार से तकरीबन 12 किलोमीटर है। मंदिर के पहुंचने के लिए पहाड़ को काटकर छायादार सीढियां और रेलिंगयुक्त सड़क बनाई गई हैं। आप सड़क मार्ग से कार, जीप या बाइक से पहाड़ के ऊपर मंदिर में पहुंच सकते हैं। यूपी के बड़े मुगलसराय रेलवे स्टेशन से भभुआ रोड रेलवे स्टेशन (मोहनिया) की दूरी 54 किलोमीटर है। बाहर से आने वाले लोग भभुआ में ठहरकर मंदिर दर्शन के लिए जा सकते हैं। यह मंदिर से निकटम शहर है जहां रहने के लिए होटल उपलब्ध हैं।   

- विद्युत प्रकाश मौर्य Email - vidyutp@gmail.com

(MUNDESHWARI TEMPLE, BHABUA, KAIMUR, BIHAR, THE OLDEST TEMPLE OF WOLRD )  

5 comments:

  1. रोचक जानकरी। वैसे शीर्षक में दुनिया लिखा है और लेख में देश का प्राचीनतम मंदिर लिखा है। इससे मन में थोड़ा शंका उपजती है।

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    1. दुनिया का ही है ठीक करता हूं

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  2. वाह आपकी हर पोस्ट से नई जानकारी मिलती है वो भी रोचक अंदाज़ में | रही सही कसर आपके चित्र पूरी कर देते हैं | आपके पोस्ट का मैं नियमति पाठक हूँ और मुझे इस बात का फख्र है | शुभकामनायें मित्र ..जारी रहिये

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