Thursday, June 29, 2017

एक पत्थर से बनी दुनिया की विशालतम मूर्ति – बाहुबली

कर्नाटक के श्रवणबेलगोला में स्थित बाहुबली की विशाल प्रतिमा भारत के अदभुत स्मारकों में शुमार है। श्रवणबेलगोला में मुख्य आकर्षण का केंद्र बाहुबली की विशाल प्रतिमा है। धार्मिक रूप से यह अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि जैनियों का मानना है कि मोक्ष  (जीवन-मरण के चक्र से छुटकारा) की प्राप्ति सर्वप्रथम बाहुबली को हुई थी। आदिपुराण के अनुसार बाहुबली इस युग के प्रथम कामदेव थे।
गोमतेश्वर की यह बाहुबली की प्रतिमा दसवीं शताब्दी की है। पर यह आज भी जिस शान से पर्वत शिखर पर विराजमान है, वह दुनिया भर से आने वाले श्रद्धालुओं और सैलानियों को चकित करती है। श्रवणबेलगोला में स्थापित गोमतेश्वर की प्रतिमा के लिए यह मान्यता है कि इस मूर्ति में शक्ति,  साधुत्व, बल तथा उदारवादी भावनाओं का अद्भुत प्रदर्शन होता है। यह मूर्ति मध्यकालीन कर्नाटक की शिल्पकला की सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। यह पूरे विश्व में एक पत्थर से निर्मित (एकाश्म) सबसे विशालकाय मूर्ति है।

कौन थे बाहुबली - आखिर कौन थे बाहुबली। बाहुबली जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर  ऋषभदेव के पुत्र थे  अपने बड़े भाई  भरत  चक्रवर्ती से युद्ध के बाद वह जैन मुनि बन गए। उन्होंने एक साल तक कायोत्सर्ग मुद्रा में ध्यान किया। जिसके पश्चात् उन्हें केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई इसके बाद वे केवली कहलाए।


जैन ग्रंथों के अनुसार जब ऋषभदेव ने संन्यास लेने का निश्चय किया तब उन्होंने अपना राज्य अपने सौ पुत्रों में बांट दिया। भरत अयोध्या में और बाहुबली पौदनपुर में शासन करने लगे। बाद में भरत चक्रवर्ती जब छह खंड जीत कर अयोध्या लौटे तब उनका चक्र-रत्न नगरी के द्वार पर रुक गया। इसका कारण उन्होंने पुरोहित से पूछा। पुरोहित ने बताया की अभी आपके भाइयों ने आपकी आधीनता नहीं स्वीकारी है। भरत चक्रवर्ती ने अपने सभी 99 भाइयों के यहां दूत भेजे। 98 भाइयों ने जिन दीक्षा ले ली और जैन मुनि  बन गए। पर बाहुबली के यहां जब दूत ने भरत चक्रवर्ती का अधीनता स्वीकारने का सन्देश सुनाया तब बाहुबली को क्रोध आ गया। उन्होंने भरत चक्रवर्ती के दूत को कहा की भरत का भाई रुप में आदर करता हूं पर राजा के तौर पर अधीनता नहीं स्वीकार करूंगा, उनसे कहो युद्ध के लिए तैयार हो जाएं।
और वैरागी बने बाहुबली- दोनों के मध्य सैन्य-युद्ध नहीं हो इसके लिए मंत्रियों ने तीन प्रकार के युद्ध सुझाए जो शस्त्र रहित अहिंसक युद्ध हो। वह युद्ध थे- दृष्टि युद्ध, जल-युद्ध और मल-युद्ध। बाहुबली ने तीनों युद्धों में भरत को पराजित कर डाला। पर हारे हुए चक्रवर्ती भाई को देखकर बाहुबली के मन में वैराग्य का भाव उत्पन्न हो गया। बाहुबली राजकाज से विरक्त होकर मुनि की दीक्षा लेकर तप करने लगे।


दसवीं सदी में बनी प्रतिमा -  श्रवणबेलगोला में बाहुबली की प्रतिमा का निर्माण 983 ईश्वी में गंग सम्राज्य के राजा राजमल के एक सेनापति चामुण्डाराय द्वारा करवाया गया। उन्होंने अपनी मां कल्लाला देवी की इच्छा से मूर्ति का निर्माण कराया। इस मूर्ति को सफेद ग्रेनाइट के एक ही पत्थर से काटकर बनाया गया है। मूर्ति एक कमल पर खड़ी हुई है। यह जांघों तक बिना किसी समर्थन के खड़ी है। मूर्ति की लंबाई 60 फीट (18 मीटर) है। इसके चेहरे का माप 6.5 फीट (2.0 मी.) है। जैन परंपरा के अनुरूप यह मूर्ति पूर्णतया दिगंबर अवस्था में है। विंध्यगिरी पर्वत पर स्थित यह मूर्ति 30 किलोमीटर दूर से भी दिखाई देती है।


चामुंडराय ने महाशिल्पी को बुलाकर इस मूर्ति का निर्माण कराया। इसके अभिषेक के दौरान 1008 कलश दूध, गन्ने का रस, दूध चंदन आदि से अभिषेक किया गया। फिर भी अभिषेक पूर्ण नहीं हुआ। जब गुल्लिका अज्जी (दादी) ने अपनी छोटी से लुटिया से दुग्धाभिषेक किया तो अभिषेक पूर्ण हुआ।

गोमतेश्वर भी एक नाम - बाहुबली की मूर्ति के चेहरे के निर्मल भाव दिखाई देता है। उनकी घुंघराली आकर्षक जटाएं, आनुपातिक शारीरिक रचना, विशालकाय आकार और कलात्मकता शिल्पकला के बेहतरीन उदाहरण पेश करती है। बाहुबली का एक नाम गोमतेश्वर भी है। दरअसल चामुंडराय को उनकी मां बचमन में गोम्मद कहकर बुलाती थीं। तो गोम्मद के ईश्वर गोमतेश्वर हुए।


हर 12 साल पर महामस्तकाभिषेक - श्रवणबेलगोला में हर 12 साल पर श्रद्धालु यहां महामस्तकाभिषेक के लिए जुटते हैं. इस मूर्ति को केसर, घी, दूध, दही, सोने के सिक्कों तथा कई अन्य वस्तुओं से नहलाया जाता है।  उस समय शहर में बहुत बड़ा मेला लगता है। इस मौके पर देश दुनिया से लाखों जैन श्रद्धालु यहां जुटते हैं। श्रवणबेलगोला प्राचीनकाल में यह स्थान जैन धर्म का महान केन्द्र था। जैन अनुश्रुतियों के मुताबिक मौर्य सम्राट चन्द्रगुप्त ने अपने राज्य का परित्याग कर अंतिम दिन मैसूर के श्रवणबेलगोला में व्यतीत किया था।  

- -      विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com
(BAHUBALI, SHARVANBELGOLA, GOMATESHWARA, JAIN TIRTH ) 


2 comments:

  1. कुछ वर्ष पहले इस महाविशाल प्रतिमा के बारे में जानकारी मिली थी। यह भी मेरी सूची में शामिल है।
    यह नहीं पता था कि एक पहाड़ से ही बनी है।

    ReplyDelete
  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’सांख्यिकी दिवस और पीसी महालनोबिस - ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

    ReplyDelete