Friday, August 18, 2017

हरिद्वार से मसूरी की यात्रा- पैकेज टूर से

सुबह के तीन बजे हैं। टैक्सी हमें हरिद्वार रेलवे स्टेशन के पास छोड़ देती है। हम विचार कर रहे हैं क्या करें अभी हर की पौड़ी की तरफ प्रस्थान करें या फिर थोड़ी देर यहीं बैठकर कर इंतजार करें। हम देख रहे हैं कि हरिद्वार रेलवे स्टेशन परिसर में और बाहर हर तरफ हजारों लोग सो रहे हैं। ये सभी लोग गंगा स्नान करने के लिए दूर-दूर से पहुंचे हैं। जून का महीना और शनिवार रविवार का दिन। इसलिए गंगा स्नान करने वालों की भीड़ कुछ ज्यादा ही है। तो  हमलोग भी स्टेशन के प्रतीक्षालय में अपने बैठने के लिए जगह बना लेते हैं। एक घंटा यहां गुजारने के दौरान दांतो की सफाई से भी निवृत हो लेते हैं।

हरिद्वार रेलवे स्टेशन का परिसर बड़ा जरूर है। पर यात्री सुविधाओं का अभी भी टोटा है। सवा चार बजे स्टेशन से निकलने के बाद एक दुकान पर बैठकर एक कप चाय। पैदल ही हर की पौड़ी की तरफ आगे बढ़ते हुए बंशी ट्रैवल्स का बोर्ड नजर आता है। सुबह सुबह हमलोग मसूरी के लिए जाने वाली बस में दो सीटें बुक कर लेते हैं। 280 रुपये प्रति सवारी। बस आठ बजे जाएगी। हमारे पास तीन घंटे का वक्त है। तो चलें गंगा नहाने। 

हरिद्वार के पंडा कैलाश भट्ट जी के साथ। 
सुबह 5 बजे हर की पौड़ी श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ा हुआ है। हम अपने पुराने परिचित पंडा कैलाश भट्ट का ढूंढते हैं। वे सात नंबर बूथ में बैठते हैं। वे हमारे दैनिक जागरण लुधियाना के दिनों के साथी कमलेश भट्ट के चचेरे भाई हैं। उनके पास बैग रखकर हमलोग गंगा मइया में डूबकी लगाने चल पड़ते हैं। इससे पहले अनादि ने 2010 में हरकी पौड़ी में गंगा में संक्षिप्त डूबकी लगाई थी। पर इस बार विस्तार से। गंगा स्नान के बाद थोड़ी सी पूजा। फिर पेट पूजा के लिए हरिद्वार की गलियों में एक बार फिर पंडित जी पूरी वाले की दुकान पर।


मसूरी यानी क्वीन ऑफ हिल्स. पहाड़ों की रानी। देहरादून से 40 किलोमीटर आगे मसूरी में लोग कुछ दिन गुजारने जाते हैं। पर मसूरी सिर्फ घूमने पर जाना हो तो एक सस्ता तरीका है। हरिद्वार से मसूरी का एक दिन का टूर पैकेज। रोज सुबह कुछ बसें आठ बजे निकलती हैं और मसूरी घूमा कर देर रात हरिद्वार वापस लौट आती हैं। इस पैकेज में मसूरी और रास्ते के कुछ विंदू तय हैं जिन्हे घूमाने का दावा ये बस सेवाएं करती हैं। ऐसी ही एक बस में हम सवार होने वाले हैं। ये बसें लालतरौं पुल के उस पार गड्ढा पार्किंग से चलती हैं।

यात्रा से पहले थोड़ी पेट पूजा 
वहां पहुंचने पर बस एजेंट ने कहा, अगर 50 रुपये और दें तो 2 बाई 2 बस मिलेगी। हम अब 330 रुपये प्रति सीट देकर 2 बाई 2 वाली बस में सवार हो जाते हैं।

हमारी बस चल पड़ती है पर हरिद्वार बाईपास पर भारी जाम लगा है। बस रास्ते में भीमगोडा और शांतिकुंज से भी कुछ सवारियां उठाती है। हमारे बस में उन्नाव का एक परिवार जिसमें अनादि के उम्र की कई लड़कियां हैं तो कुछ खाते पीते घर की सुर्ख लिपिस्टिक से लैस पंजाबी महिलाएं भी विराजमान हो चुकी हैं। मोतीचूर और राईवाला के जंगल को पार कर बस देहरादून की ओर चढ़ने लगी है। हल्की बारिश शुरू हो चुकी है। 1993 के बाद 2017 में मैं मसूरी की दूसरी यात्रा पर हूं। देहरादून से पहले हमारा पहला पड़ाव आ चुका है। फन वैली रिजार्ट।    

       - vidyutp@gmail.com 

(HARIDWAR, UTTRAKHAND, BUS TRIP TO MUSSORIE ) 

Wednesday, August 16, 2017

दिल्ली से हरिद्वार मार्ग पर ढाबों की लूट से सावधान रहें

बरला ( मुजफ्फरनगर) में शिवा टूरिस्ट ढाबा पर रात को 2 बजे। 
दिल्ली से हरिद्वार। कई बार जा चुका हूं। एक बार फिर बेटे के अनादि के साथ निकल पड़ा। रात्रि भोजन के बाद हमलोग पहुंचे मोहन नगर चौराहे पर। हरिद्वार के लिए बस का इंतजार है। शनिवार है, लोगों की काफी भीड़ है। तभी एक एसयूवी मिली। वे हरिद्वार जा रहे हैं। दो सौ रुपये प्रति सवारी। हमने आगे की दो सीट ले ली। मेरठ बाइपास पार करने के बाद मुजफ्फरनगर शहर को पार किया। टैक्सी उत्तराखंड में प्रवेश करने से पहले बरला में एक ढाबे पर रुकी। बरला के ढाबे का नाम है शिवा टूरिस्ट ढाबा। दिल्ली से हरिद्वार मार्ग पर मैं किसी ऐसे ढाबे पर रात में रुका हूं जहां कोई ठगी नहीं है। मीनू कार्ड पर रेट लिखे हैं। वातानूकुलित हॉल भी उपलब्ध है। टायलेट बड़े और साफ सुथरे हैं। इस्तेमाल के लिए कोई शुल्क नहीं है।

हम घर से पेट पूजा करके चले थे इसलिए खाना तो नहीं लिया, रात के एक बजे काफी लोग खा-पी रहे थे। यहां पर दिल्ली से हरिद्वार जाने वाली एक तीर्थ यात्रा समूह की बस भी रुकी है।

खतौली के ढाबों में लूटपाट
मुझे कुछ दिन पहले की हरिद्वार से लौटने वाली यात्राएं याद आईं। ज्यादातर यूपी और उत्तराखंड रोडवेज की बसें खतौली बाईपास के पास ढाबे पर दिन रात में खाने के लिए रुकती हैं। ये ढाबे लूट के अड्डा हैं। यहां पर कोई मीनू कार्ड नहीं होता। आपसे बिना पूछे हुए आपकी थाली में कुछ भी रख दिया जाता है। फिर 60 रुपये की थाली के वसूले जाते हैं 225 रुपये। मजबूर ग्राहक अपनी जेब ढीली करता है और खुद को ठगा हुआ महसूस करता है। जो लोग बार बार जाते हुए इस लूट से वाकिफ हो गए हैं वे तो यहां कुछ खाते पीते ही नहीं। ऐसी लूट का मैं खुद शिकार हुआ हूं और अपने साथ लोगों को शिकार होते देखा है।
इसके बाद मैंने यूपी की योगी सरकार के परिवहन मंत्री स्वतंत्र देव सिंह को शिकायत की। मेरा मानना है कि जो ढाबे यूपी रोडवेज द्वारा अनुबंधित हैं। वहां पर खाने पीने की दरें प्रकाशित होनी चाहिए। मीनू कार्ड पर और साइनबोर्ड पर भी। हालांकि लगातार सक्रियता दिखानेवाले मंत्री जी ने शिकायत पर संज्ञान नहीं लिया और लूटपाट बदस्तूर जारी है।
हरियाणा पंजाब के हाईवे पर भी ठगी - खाने पीने में इस तरह की ठगी न सिर्फ दिल्ली हरिद्वार बल्कि आपको दिल्ली से अंबाला, लुधियाना, जालंधर, पठानकोट जम्मू के मार्ग पर भी मिल सकता है। जो यात्री इन ढाबों पर एक बार ठगे जाते हैं वे दुबारा की यात्रा में यहां कभी नहीं खाने का तय कर लेते हैं। पर ये ढाबे वाले सुधरने को तैयार नहीं है। अपनी दक्षिण भारत की यात्राओं के दौरान देखा है कि वहां जिन ढाबों पर बसें रुकती हैं वहां रेट लिस्ट लगी होती है। खाने पीने की दरें भी वाजिब रहती हैं। आप जब दिल्ली हरियाणा, यूपी में बस से सफर करें तो ऐसे ठग ढाबे वालों से सावधान रहें।


मुरादनगर के पास संगम यात्री प्लाजा में वाजिब दाम की थाली 
इन सबके बीच हरिद्वार से  दिल्ली लौटते हुए सुखद अनुभूति हुई। हम मेरठ से दिल्ली बिजनौर से आने वाली बस में बैठे। रात के 10 बजे बस मोदीनगर मुरादनगर के बीच एक ढाबे पर खाने के लिए रुकी। यह था संगम यात्री प्लाजा,  यहां पर खाने पीने की दरें बोर्ड पर चस्पा थीं। थाली महज 40 रुपये की। थाली में चार चपाती, चावल, दाल और दो सब्जियां भीं। खाने का स्वाद भी अच्छा है। ब्रेड पकौड़ा 10 रुपये का। ऐसे ढाबे वाले की तारीफ करने का कायदा बनता है। तमाम लूटेरे ढाबों के बीच कुछ ईमानदार और जेब के अनुकूल ढाबे भी हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
-        ( DHABA, FOOD, DELHI, UP, HARIDWAR, HARYANA , PUNJAB )

Monday, August 14, 2017

पटना संग्रहालय और कैमूर की मुंडेश्वरी देवी

अग्नि की प्रतिमा (कैमूर ) 
बिहार की राजधानी पटना में स्थित पटना संग्रहालय और बिहार के कैमूर जिले के मुंडेश्वरी का बड़ा गहरा संबंध है। संग्रहालय में प्रदर्शित कई विलक्षण मूर्तियां बिहार के कैमूर जिले से प्राप्त की गई हैं।

इससे साफ जाहिर होता है कि बिहार के कैमूर जिले में इतिहास के अलग अलग कालखंडों में मूर्तिकला, मंदिर और स्थापत्य को तत्कालीन राजाओं ने कितनी प्रमुखता दी थी। पटना संग्रहालय में 10 से ज्यादा प्रतिमाएं बिहार और उत्तर प्रदेश की सीमा पर स्थित कैमूर जिले के मुंडेश्वरी से प्राप्त की गई हैं। ये मूर्तियां कई मायने में विलक्षण हैं। इससे ये भी साबित होता है कि मुंडेश्वरी इतिहास में हिंदू सभ्यता संस्कृति का बड़ा केंद्र था, जो अब बिसार दिया गया है। 

हरिहर की प्रतिमा (कैमूर ) 
सातवीं सदी की अग्नि देवी की प्रतिमा 

हमें संग्रहालय मे सातवीं सदी की बनी अग्नि की प्रतिमा दिखाई देती है जो मुंडेश्वरी कैमूर से प्राप्त हुई। पत्थर की इस प्रतिमा में अग्नि को एक देवी के रूप में चित्रित किया गया है। 

देवी के मुख्य के चारों तरफ अग्नि प्रज्जवलित होते हुए चित्रित किया गया है, इससे यह परिलक्षित होता है कि यह अग्नि देवी की प्रतिमा है। देवी के गले में माला है और एक हाथों से वह आशीर्वाद देती हुई प्रतीत होती है।


हरिहर की विशाल प्रतिमा  - अगली प्रमुख प्रतिमा है हरिहर की। यह छठी शताब्दी में निर्मित है। यह प्रतिमा खड़ी अवस्था में है। इसका ऊपरी भाग खंडित हो गया है, पर संग्रहालय में उसे संरक्षित करके रखा गया है। हरिहर यानी शिव और विष्णु एक साथ। प्रतिमा के सिर पर विशाल मुकुट बना हुआ है। पांव के पास दो गण उनकी अराधना में लगे हुए दिखाई दे रहे हैं। भगवान आशीर्वाद देने की मुद्रा में हैं। उनके चेहरे पर एक खास किस्म के संतोष का भाव दिखाई देता है।


शिव पुत्र कार्किकेय (कैमूर ) 
शिव पुत्र कार्तिकेय की प्रतिमा - छठी शताब्दी की ही कार्तिकेय की प्रतिमा पटना संग्रहालय में देखी जा सकती है। यह भी मुंडेश्वरी कैमूर जिले से प्राप्त की गई है। कार्तिकेय शिव के पुत्र हैं गणेश जी के भ्राता।
कार्तिकेय की प्रतिमा का एक हाथ भंग हो गया है।

पर प्रतिमा की भाव भंगिमा देखते ही  बनती है। कार्तिकेय के साथ देवी भी खड़ी दिखाई देती हैं। प्रतिमा काले पत्थरों से बनाई गई है। देवता के कमर में नक्काशीदार कमरबंद देखा जा सकता है।


छठी शताब्दी के सूर्य  देव की प्रतिमा

सूर्य छठी शताब्दी (कैमूर ) 
और आइए अब देखते हैं छठी शताब्दी की सूर्य की प्रतिमा को। आम तौर पर सूर्य की प्रतिमाएं देश में कम ही देखने को मिलती हैं। पर कैमूर के मुडेश्वरी में सूर्य की प्रतिमा का भी निर्माण हुआ था। यह भी मुंडेश्वरी से प्राप्त की गई अदभुत प्रतिमा है। सूर्य देव के सिर पर विशाल मुकुट देखा जा सकता है। 

प्रतिमा के सिर के चारों तरफ गोलाकार आकृति उनके सूर्य होने का बोध कराती प्रतीत होती है। उनके दोनो हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में हैं। उनके पांव के दोनों तरफ एक पुरुष और स्त्री की कृति बनी हुई है। हालांकि स्त्री की कृति भंग हो गई है। पर सूर्य को दर्शन करना अदभुत अनुभूति है। इस मूर्ति से यह भी पता चलता है कि बिहार में सूर्य पूजा की पुरानी पंरपरा रही है। बिहार के देव (औरंगाबाद ) में शिव का अति प्राचीन मंदिर भी है। 

पार्वती की प्रतिमा  (कैमूर ) 

छठी शताब्दी की देवी पार्वती 

पटना संग्रहालय में छठी शताब्दी की पार्वती की प्रतिमा भी प्रदर्शित की गई है। यह भी मुंडेश्वरी कैमूर से प्राप्त की गई है। पार्वती के चार हाथ दिखाए गए हैं। उनके पांव के दोनों तरफ दो बालक बने हैं। देवी की प्रतिमा की सिर से लेकर पांव तक की बनावट विलक्षण है। चेहरे पर एक खास तरह की ममता दिखाई देती है।


ब्रह्मा और कार्तिकेय की अदभुत प्रतिमाएं – 

संग्रहालय के प्रांगण में मुंडेश्वरी से ही प्राप्त ब्रह्मा और कार्तिकेय की प्रतिमाएं देखी जा सकती हैं। ये दोनों प्रतिमाएं भी छठी शताब्दी की  निर्मित हैं। हालांकि की ब्रह्मा जी की प्रतिमा खंडित हो गई है। यह लाल बलुआ पत्थर से बनी हुई प्रतिमा है। इसका सिर खंडित हो चुका है। साथ में दो देवताओं की और भी प्रतिमा है जो खंडित हो चुकी है। ब्रह्मा जी बैठे हुए मुद्रा में हैं।


कार्तिकेय की जो प्रतिमा बाहर रखी गई है वह संग्रहालय के गैलरी में रखी प्रतिमा से अलग है। लाल बलुआ पत्थर से बनी यह प्रतिमा भी काफी विलक्षण है। इन तमाम प्रतिमाओं को देखकर लगता है कि छठी से आठवीं शताब्दी तक कैमूर जिले का मुंडेश्वरी क्षेत्र मूर्तिकला का बड़ा केंद्र रहा होगा। तभी यहां से देवताओं की इतनी सुंदर प्रतिमाएं प्राप्त हुई हैं।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य  (KAIMUR, MUNDESHWARI, ART, SCULPTURE, PATNA , BIHAR ) 
कैमूर जिले के मुंडेश्वरी से प्राप्त कार्तिकेय की प्रतिमा। 








Saturday, August 12, 2017

यहां है दुनिया का सबसे प्राचीनतम मंदिर

क्या आपको पता है दुनिया का सबसे प्राचीनतम मंदिर कहां है। जवाब है बिहार के कैमूर जिले में। माता मुंडेश्वरी देवी का मंदिर दुनिया का सबसे प्राचीनतम मंदिर है जिसके ऐतिहासिक साक्ष्य मिलते हैं। साथ ही यहां अनवरत पूजा भी हो रही है। श्रद्धालु इसे देवी के शक्तिपीठ में भी शामिल करते है। 
कैमूर पर्वत की पवरा पहाड़ी पर 608 फीट की उंचाई पर स्थित इस मंदिर से मिले एक शिलालेख से पता चलता है कि 635 ई. में यह निश्चित रूप से विद्यमान था। पर हाल के शोधों के आधार पर तो अब इसे पहली सदी का यानी देश और दुनिया का प्राचीनतम मंदिर माना जाने लगा है।


बिहार धार्मिक न्यास परिषद के अध्यरक्ष आचार्य किशोर कुणाल यहां मिले शिलालेख और अन्यं दस्ता वेज का हवाला देते हुए कहते हैं कि यह मंदिर 108 ईस्वी में मौजूद था और तभी से इसमें लगातार पूजा का कार्यक्रम चल रहा है। अपनी प्राचीनता के आधार पर यह मंदिर यूनेस्को द्वारा जारी की जाने वाली विश्व धरोहर की सूची में शामिल किए जाने का दावेदार है।

अष्टकोणीय वास्तु योजना का मंदिर
मंदिर अष्टकोणीय योजना में बना है जो अपने आप में दुर्लभ है। पूरी तरह से पत्थर से निर्मित इस मंदिर की दीवारों पर सुंदर ताखे, अर्ध स्तंभ और घट-पल्लतव के अलंकरण बने हैं। दरवाजे के चौखटों पर द्वारपाल और गंगा-यमुना आदि की मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। मंदिर के भीतर चतुर्मुख शिवलिंग और मुंडेश्वरी भवानी की प्रतिमा है। मंदिर का शिखर नष्ट हो चुका है। इसकी छत पुरातत्व विभाग द्वारा बाद में दुबारा निर्मित कराई गई है।

चली आ रही है अहिंसक बलि प्रथा

मुंडेश्वरी मंदिर की बलि प्रथा का अहिंसक स्वरूप इसकी विशेषता है। यहां परंपरागत तरीके से बकरे की बलि नहीं होती है। केवल बकरे को मुंडेश्वरी देवी के सामने लाया जाता है और उस पर पुजारी द्वारा अभिमंत्रित चावल का दाना जैसे ही छिड़का जाता है वह अपने आप अचेत हो जाता है। इतनी ही बलि की पूरी प्रक्रिया है। इसके बाद बकरे को छोड़ दिया जाता है और वह फिर चेतना में आ जाता है। मंदिर में रोज सैकड़ों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। पर नवरात्र के मौके पर वहां विशेष भीड़ रहती है।

मंदिर की प्राचीनता के साक्ष्य

मुंडेश्वरी मंदिर से संबंधित दो पुरातात्विक साक्ष्य अब तक मिले हैं, वहां से प्राप्त प्राचीन शिलालेख और श्रीलंका के महाराजा दुत्त गामनी की राजकीय मुद्रा। मुंडेश्वरी मंदिर के काल निर्धारण का मुख्य आधार वहां से प्राप्त शिलालेख ही है। अठारह पंक्तियों का यह शिलालेख किन्ही महाराज उदयसेन का है, जो दो टुकड़ों में खंडित है।  दोनों टुकड़ों को जोड़कर उन्हें  उसी साल इंडियन म्यूजियम कोलकाता भेज दिया गया। यह शिलालेख संस्कृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में है। शिला टूट जाने के कारण जोड़ के बीच के कुछ शब्द गुम हो गए हैं। हालांकि विद्वानों ने अपने शोध के आधार पर उनकी पुनर्रचना की है।

ब्राह्मी लिपि के उक्त  शिलालेख का चित्र और बिहार राज्य धार्मिक न्यास परिषद द्वारा किया गया उसका देवनागरी लिप्यांतरण प्रस्तुत किया गया है। इसका एक टुकड़ा 1892 और दूसरा 1902 में मिला। हाल में हुए कुछ शोधों के आधार पर शिलालेख में उल्लेखित संवत्सर को शक संवत मानते हुए इसे कुषाण युग में हुविष्कद के शासनकाल में 108 ईस्वी में उत्कीर्ण माना गया है। मुंडेश्वरी धाम में मिले पुरातात्विक साक्ष्य (शिलालेख और दुत्तणगामनी की मुद्रा) जब इतने प्राचीन हैं तो जाहिर है कि मंदिर उससे पहले ही बना होगा। इस तरह से मंदिर का निर्माण ईस्वी पूर्व का भी हो सकता है। ( साभार- अशोक पांडे, कुदरा )


कैसे पड़ा मुंडेश्वरी नाम - मां मुंडेश्वरी भैंसे पर सवार हैं और उनके दस हाथ हैं जिसमें शस्त्र धारण किया हुआ है। कहा जाता है मुंडा चेरो जनजाति का राजा था, जिसके नाम पर देवी मुंडेश्वरी का नाम पड़ा है। पर शक्ति का रुप मां मुंडेश्वरी ने चेरो राजा मुंडा का संहार किया था या फिर वह उसकी अराध्या देवी थीं इसको लेकर अलग अलग विचार हो सकते हैं। मुंडेश्वरी नाम से दोनों तरह के अर्थ निकाले जा सकते हैं। वैसे चेरो जनजाति उत्तर प्रदेश और बिहार में अब भी पाई जाती है। वे लोग खुद को क्षत्रिय होने का दावा करते हैं। आजकल वैसे वे अनुसूचित जनजाति में आते हैं। उनका उपाधि महतो और चौधरी आदि हुआ करती है। ऐसा प्रतीत होता है कि चेरा राजा मुंडा की अराध्या रही होंगी माता मुंडेश्वरी देवी। 

कैसे पहुंचे – मुंडेश्वरी मंदिर तक पहुंचने के लिए जीटी रोड पर स्थित मोहनिया (भभुआ रोड) से सुगम रास्ता है। मोहनिया से मंदिर की दूरी 22 किलोमीटर और भभुआ बाजार से तकरीबन 12 किलोमीटर है। मंदिर के पहुंचने के लिए पहाड़ को काटकर छायादार सीढियां और रेलिंगयुक्त सड़क बनाई गई हैं। आप सड़क मार्ग से कार, जीप या बाइक से पहाड़ के ऊपर मंदिर में पहुंच सकते हैं। यूपी के बड़े मुगलसराय रेलवे स्टेशन से भभुआ रोड रेलवे स्टेशन (मोहनिया) की दूरी 54 किलोमीटर है। बाहर से आने वाले लोग भभुआ में ठहरकर मंदिर दर्शन के लिए जा सकते हैं। यह मंदिर से निकटम शहर है जहां रहने के लिए होटल उपलब्ध हैं।   

- विद्युत प्रकाश मौर्य Email - vidyutp@gmail.com

(MUNDESHWARI TEMPLE, BHABUA, KAIMUR, BIHAR, THE OLDEST TEMPLE OF WOLRD )  

Thursday, August 10, 2017

योजना बनाकर सस्ते में करें सैर सपाटा

पुडडुचेरी में सी क्रूज का सफर
बहुत से लोग पूछते हैं 10 दिन की यात्रा करके लौटे हो, काफी रुपया खर्च हो गया होगा। पर आप अगर यात्राओं की योजना थोड़ी तैयारी और समझदारी से बनाएं तो कम खर्चे में बेहतर ढंग से घूमा जा सकता है। तो आइए अपने अनुभवों के आधार पर इन तैयारियों पर बात करें।

ऑफ सीजन में करें यात्रा - सबसे पहले आता है गंतव्य का चयन। कोशिश करें कि आप लोकप्रिय पर्यटक स्थलों पर भीड़भाड़ वाले सीजन यानी पीक सीजन में न जाकर ऑफ पीक सीजन में जाएं। ऐसे वक्त में होटल सस्ते मिलेंगे। टैक्सी का किराया कम होगा। खाने-पीने वाले स्थलों पर भी भीड़ कम मिलेगी। महाबलेश्वर, माथेरन, दीव जैसे स्थलों पर हर शनिवार रविवार को होटल महंगे रहते हैं बाकी दिन सस्ते। शिरडी साईं बाबा और तिरुपति बालाजी के दरबार में गुरुवार को सर्वाधिक भीड़ रहती है। तो भगवान के दरबार में भी उन दिनों में जाएं जब भीड़ कम रहती हो।
  
किराये की एक्टिवा से सैर 
आप जहां भी जाना चाहते हैं वहां कितने दिन ठहरना है तय करने के बाद जाने और आने की टिकटें पर्याप्त समय पहले बना लें। वापसी की टिकट भी कनफर्म रहने पर आप तनाव मुक्त होकर घूम सकेंगे। कई बार आप कुछ माह पूर्व की योजना बनाएंगे तो हवाई टिकट रेल टिकट से भी सस्ता मिल सकता है। मुझे दिल्ली से बेंगलुरु का हवाई टिकट एक बार चार माह पहले बुक करने पर 2100 रुपये प्रति व्यक्ति मिल गया जो रेलवे से के एसी3 के बराबर था। हमारा दो दिन का समय भी बचा सो अलग। 

एसी के बजाए स्लिपर में यात्रा करें - अगर मौसम अच्छा है तो एसी के बजाए स्लिपर क्लास में सफर करें। अगर आप मुंबई से गोवा कोंकण रेल से जा रहे हैं या कहीं पहाडी क्षेत्र की यात्रा पर हैं तो स्लिपर क्लास में रेल की खिड़की से बेहतरीन नजारे दिखाई देंगे।
कुछ शहरों की यात्रा की योजना आप रात में चलने वाली ट्रेन में बना सकते हैं। आप अपने शहर से रात भर 12 घंटे का सफर करके नए शहर में पहुंच जाते हैं। ऐसी हालात में सार्वजनिक स्थलों पर तैयार होकर दिन भर घूम सकते हैं। ज्यादा सामान हो तो रेलवे स्टेशन या बस स्टैंड के क्लाक रुम में जमा करा दें। दिन भर घूमने के बाद रात को अगले शहर की यात्रा पर निकल जाएं। इस तरह आप होटल में रुकने का खर्च बचा सकते हैं। अगर कई दिनों की यात्रा का प्लान है तो बीच कुछ शहरों में आप ऐसा भी कर सकते हैं।

होटल पहले बुक कर लें – जिन शहरों में ठहरना हो वहां होटल पहले बुक कर लें तो आप आवास की तलाश में जाया होने वाला वक्त बचा सकते हैं। अलग अलग वेबसाइट्स के माध्यम से आजकल ऑनलाइन होटल बुक किया जा सकता है। मेरी प्राथमिकता में www.goibibo.com रहता है। इसके अलावा आप मेकमाईट्रिप, क्लियरट्रिप, यात्राडाटकाम, ट्रेवल गुरु, एक्सिपिडिया, होटल्सडाट काम आदि साइट पर जाकर पहले से ही होटल बुक कर सकते हैं। होटल बुक करते समय ध्यान रखें कि वह रेलवे स्टेशन बस स्टैंड या फिर प्रमुख दर्शनीय स्थलों के पास ही हो। अगर आपके पास अपना वाहन न हो तो दूर के होटल में ठहरना महंगा सौदा साबित हो जाता है, भले वह होटल सस्ते में बुक हुआ हो।  

पदयात्रा ज्यादा करें -  किसी भी शहर में स्थानीय तौर पर दर्शनीय स्थलों को देखने के लिए पैदल, साइकिल, बाइक,  तांगा, रिक्शा, आटोरिक्शा जैसे साधनों को प्राथमिकता दें। लोकल बसों की जहां अच्छी सुविधा हो उसका भी लाभ उठाएं। बसों का पैकेज टूर ले सकते हैं। वह भी सस्ता पड़ता है। दिल्ली, मुंबई के अलावा जयपुर, बेंगलुरु, द्वारका, उज्जैन, मैसूर , जैसे शहरों में बसों से पैकेज टूर संचालित होते हैं। इसमें आपको अलग अलग जगहों से आए लोगों का साथ भी मिलता है, साथ ही यह किफायती भी पड़ता है।

साइकिल और आटोरिक्शा से सैर - आप जोधपुर, जैसलमेर, हंपी जैसे शहरों में आटो रिक्शा करके किफायती दरों पर घूम सकते हैं। हंपी में तो 100 रुपये प्रतिदिन पर गियर वाली साइकिल किराये पर लेकर सारा दिन घूम सकते हैं। विदेशी सैलानी साइकिल से सफर करना खूब पसंद करते हैं।

बाइक रेंटल किफायती विकल्प -  आप गोवा, दीव, पुड्डुचेरी, असम के माजुली, खजुराहो समेत देश के तमाम शहरों में बाइक और स्कूटी किराये पर लेकर दिन भर भ्रमण कर सकते हैं। 250 से 450 रुपये प्रतिदिन की दर से बाइक किराये पर ली जा सकती है। शौकीन लोगों के लिए बुलेट और हर्ली डेविसन जैसी बाइक भी किराये पर मिल जाती है। इसमें आप दिन भर का यात्रा मार्ग थोड़ा रिसर्च करके पहले से ही तैयार कर लें तो सुविधा होगी। 
हंपी में किराये की साइकिल से सैर करें - 100 रुपये प्रतिदिन । 

अगर अकेले हैं तो गोवा जैसे शहर में बाइक टैक्सी का भी विकल्प मौजूद है। गुरुग्राम में भी बाइक टैक्सी सेवा आरंभ हो गई है। देश में कई प्रमुख बाइक और कार किराये पर देने वाली वेबसाइटें और मोबाइल एप्प आ चुके हैं। इनका लाभ उठा सकते हैं। कई शहरों में तो आपको शहर के बाहर दूर की यात्रा करने के लिए भी बाइक किराये पर मिल जाती है।  

बाइक रेंटल वेबसाइट - www.wheelstreet.com/    Tel. 8088400500 कई शहरों में बाइक रेंटल की सेवा देती है। इन्हें भी आजमाएं - गोवा समेत कई शहरों में आप इस साइट से बाइक किराए पर ले सकते हैं - http://www.ziphop.in/
इसके अलावा आप इन्हें भी आजमाएं - www.rentrip.in/  और www.wickedride.com के अलावा आप http://www.driveonrent.com/ जैसी वेबसाइट से भी बाइक रेंटल का लाभ उठा सकते हैं।


हंपी में नारियल पानी...
शाकाहारी भोजन लें - अक्सर सैर सपाटे में लोग खाने पीने में भी काफी रुपया खर्च कर देते हैं। यह कोई अक्लमंदी नहीं है। आप अगर मांसाहारी हैं तो भी सफर में शाकाहारी भोजन लें। आपका पेट भी ठीक रहेगा, रुपये भी कम खर्च होंगे। पर जहां जाएं वहां का स्थानीय भोजन अवश्य ग्रहण करें। अगर आप दक्षिण में डोसा, इडली, उत्पम, बिरयानी राजस्थान में दाल बाटी,  महाराष्ट्र में बड़ा पाव और बंगाल में चावल खाएं तो आपके जेब के अनुकूल रहेगा। पर अगर आप दक्षिण में जाकर पंजाबी फूड तलाश करें तो हो सकता है मिल जाए पर जेब का भारी पड़ेगा, इसलिए जैसा देस वैसा वेश....

 - विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

( लेखक पत्रकार हैं, देश के कोने-कोने में घूमना उनका शौक है ) 
 ( BIKE ON RENT, CYCLE ON RENT, CHEAP TRAVEL, VEG FOOD ) 

Tuesday, August 8, 2017

बक्सर का रामरेखा घाट और उन वीरांगनाओं को सलाम

बक्सर महर्षि विश्वामित्र की धरती है... बक्सर रेलवे स्टेशन पर बना म्यूरल। 
मैं धनसोई की तरफ से बस से बक्सर पहुंच रहा था। मेरे पुराने दोस्त राजेश रंजन सहाय जो बक्सर में ही अधिवक्ता हैं, ने कहा था कि ज्योति प्रकाश चौक पर उतर जाना। वहां आकर मैं तुम्हे घर ले चलूंगा।  पर बक्सर शहर में सड़क पर बड़ा जाम लगा हुआ था। इसलिए बस ने मुझे थोड़ा पहले ही उतार दिया।

अब मैं पैदल चलता हुआ ज्योति प्रकाश चौक तक जा पहुंचा। चौराहे के बीच में कामरेड ज्योति प्रकाश की प्रतिमा लगी हुई है। कामरेड ज्योति प्रकाश एक शिक्षक और बिहार के प्रसिद्ध वामपंथी नेता थे। वे इटाढ़ी और धनसोई के बीच इंदौर गांव के रहने वाले थे। उनकी बेटी मंजू प्रकाश भी सीपीएम की नेता हैं। कामरेड ज्योति प्रकाश की दिनदहाड़े हत्या हो गई थी। अब उनकी प्रतिमा बक्सर के मुख्य बाजार में लगी है। 

मैं ज्योति प्रकाश चौक से आगे बढ़ता हूं, मुहल्ले का नाम है कोईरीपुरवा। पुराना मुहल्ला है इस मुहल्ले की 90 फीसदी कोईरी लोगों की हैं। पर आगे सुनिए बक्सर में तमाम मुहल्लों के नाम जातीय पहचान लिए हुए हैं। जरा बानगी देखिए- पांडेपट्टी, अहिरौली तो नई बनी भूमिहार कालोनी। एक बंगाली टोला भी है हालांकि अब इसमें ज्यादातर सुनार रहते हैं।

अब जाम की कहानी सुनिए,  एक दुकानदार से पूछता हूं इतनी भीड़ क्यों है। वे बताते हैं कि वैशाख शुक्ल पक्ष त्रियोदशी के दिन आज मुंडन संस्कार का मुहुर्त है। आसपास के गांव की महिलाएं ट्रैक्टर में सवार होकर बक्सर पहुंची हैं। इन ट्रैक्टरों के कारण चारों तरफ जाम है। ट्रैक्टर के ट्राले पर विराजमान महिलाएं ढोलक, झाल की थाप गीत गा रही हैं। कुछ वीरांगना किस्म की लड़कियां ट्राला के पतली दीवार पर पूरे संतुलन के साथ बैठी हुई माइक लेकर गीत के बोल ऊंची आवाज में गा रही है। ये सब ग्रामीण महिलाएं हैं। क्या गजब का महिला सशक्तिकरण है। शहरी महिलाओं से ये काफी आगे हैं, संघर्ष में मुश्किल हालात में जिंदगी को जीने में। इन महिलाओं के हमारा नमन।


बक्सर दक्षिण बिहार का प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है। गंगा के तट पर बसे इस शहर से कई पौराणिक आख्यान जुड़े हुए हैं। महर्षि विश्वामित्र का आश्रम यहीं पर था। यह भी कहा जाता है कि रामजी ने अयोध्या जाने के लिए यहीं से गंगा पार किया था। तो रामजी की याद में यहां पर गंगा तट पर रामरेखा घाट है। 

रामरेखा घाट पर गंदगी का आलम - शाम को हमलोग रामरेखा घाट पहुंचते है। घाट से पहले गलियों में विशाल बाजार है। मुंडन संस्कार का दिन होने कारण शाम तक घाट के आसपास काफी भीड़ है। बक्सर की ट्रैफिक पुलिस और प्रशासन के लिए भीड़ नियंत्रण करना आज के लिए काफी चुनौती भरा है। प्रशासन की ओर खोया पाया की घोषणा की जा रही है। कोई नन्हा बच्चा अपनी मां से बिछुड़ गया है तो किसी के पति मेला में हेरा ( खो) गए हैं।
पर रामरेखा घाट को देखकर निराशा होती है। यहां गंगा का अति सुंदर विस्तार दिखाई देता है घाट पर गंदगी का आलम है। बिहार सरकार के सौंदर्यीकरण किए जाने वाले धार्मिक और पर्यटक स्थलों की सूची में रामरेखा घाट का भी नाम है। रामरेखा घाट पर गंगा के तट पर लंबा पैदल चलने का पथ ( मरीन  ड्राईव जैसा)  बना है। पर इस पर चलना मुश्किल है क्योंकि यहां मानव मल की भयंकर दुर्गंध आ रही है। यानी खुले में शौच मुक्ति अभियान का रामरेखा घाट और बक्सर के गंगा तट पर कोई असर नहीं दिखाई दे रहा है।


रामरेखा घाट पर शिव का प्रसिद्ध रामेश्वरनाथ मंदिर है। इस मंदिर में दक्षिण भारत के हिंदू श्रद्धालु भी दर्शन के लिए आते हैं। यह बक्सर का सबसे प्राचीन और पौराणिक मंदिर माना जाता है। कहा जाता है  कि भगवान श्रीराम ने स्वयं इस मंदिर की स्थापना की थी। बक्सर ऋषि विश्वामित्र की भूमि मानी जाती है। और यह भी कहा जाता है कि राम ने जनकपुर जाने के लिए गंगा यहीं से पार किया था। यहीं पर ताड़का का वध हुआ था। इसलिए शहर में एक ताड़का नाला का भी अस्तित्व है।
वैसे बक्सर मेंआप कमलदह तालाब और नौलखा मंदिर भी देख सकते हैं। यहां से गंगा नदी के उस पार यूपी का बलिया जिला है। गंगा पर बने पुल से हजारों लोग यूपी बिहार आते जाते हैं।

मेरा दिल्ली जाने के लिए आरक्षण मगध एक्सप्रेस में था। मगध एक्सप्रेस शाम को 8 बजे बक्सर आने वाली थी। पर लेट होते होते सुबह 3 बजे यह बक्सर पहुंची। इस ट्रेन के इंतजार में मुझे और हमारे मित्र को सारी रात जागते रहना पड़ा। रात ढाई बजे राजेश रेलवे स्टेशन पर छोड़ने आए। ट्रेन में सवार होते ही अपनी बर्थ पर जाकर मैं सो गया। नींद खुली तो दोपहर एक बजे थे और ट्रेन कानपुर जंक्शन पर खड़ी थी।     
-        विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com

-        ( BUXAR, RAMREKHA GHAT, RAMESHWARNATH TEMPLE, JYOTI PRAKASH CHAWK, RAMESHWAR TEMPLE) 

Sunday, August 6, 2017

उनवास यानी देहाती दुनिया के कलमकार का गांव

बिहार के बक्सर जिले का उनवास गांव। गांव का नाम हर साहित्य प्रेमी ने सुन रखा होगा। यह हिंदी के महान साहित्यकार आचार्य शिवपूजन सहाय का गांव है। देहाती दुनिया के लेखक का गांव। मुंडमाल और कहानी का प्लाट जैसी कालजयी कृतियों के लेखकर का गांव। पर बक्सर रेलवे स्टेशन पर उतरने के बाद आपको यह याद दिलाने के लिए कोई सूचना या मूर्ति आदि नहीं लगाई गई है जो ये जानकारी देती हो कि आचार्य शिवपूजन सहाय का गांव यहां से 18 किलोमीटर दूर है। इस तरह का काम झांसी रेलवे स्टेशन पर किया गया है, जहां मैथिली शरण गुप्त, आचार्य महावीर प्रसाद दि्वेदी और वृंदावन लाल वर्मा की प्रतिमाएं लगाई हैं और उनका संक्षिप्त जीवन परिचय लिखा गया है। बक्सर के साहित्य प्रेमियों और प्रशासन को इस तरह की पहल करनी चाहिए।

उनवास गांव में आचार्य शिवपूजन सहाय का पुश्तैनी घर अब भी देखा जा सकता है। 9 अगस्त 1893 को आचार्य जी का यहीं जन्म हुआ था। 21 जनवरी 1963 को 70 साल की उम्र में पटना में मृत्यु होने तक वे गांव में आते जाते रहे। पर अब उनके बेटे इस गांव में नहीं रहते। शिवपूजन सहाय ने लखनऊ में मुंशी प्रेमचंद के साथ काम किया और उनकी कई कहानियों का संपादन भी किया। वे एक कथाकार, उपन्यासकार, संपादक होने के साथ महान मानवतावादी व्यक्तित्व के स्वामी थे। उन्होंने वाराणसी में जयशंकर प्रसाद के साथ कोलकाता में मुंशीनवजादिक लाल श्रीवास्तव समेत कई महान साहित्यकारों के साथ भी काम किया। पर चाहे जहां भी रहे गांव से उनका रिश्ता बना रहा। उनकी उपलब्धियों के लिए 1960 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। पर उनके गांव में उनकी स्मृतियों की बेकद्री हो रही है। अगर आप साहित्य प्रेमी हैं तो एक महान साहित्यकार की धरोहर के दर्शन करना आपके लिए किसी मंदिर में देव दर्शन सदृश्य ही प्रतीत होगा।
गांव में उन्होंने अपने घर में अपने माता पिता के नाम पर पुस्तकालय और वाचनालय का निर्माण कराया। वह भवन आज खंडहर हो रहा है। पर उसपर लगी संगमरर की पट्टिका अपना इतिहास बता रही है। वागेश्वरी पुस्तकालय, पिता वागेश्वरी सहाय के नाम पर, और राजकुमारी वाचनालय, माता राजकुमारी देवी के नाम पर। श्रीरामनवमी – विक्रम संवत 1978  मतलब साल हुआ 1921 ईश्वी। पर अब रखरखाव के अभाव में इस मजबूत इमारत की दीवारें अब गिरने लगी हैं। दरवाजे खिड़कियां भी टूट रहे हैं। अंदर शायद अब किताबें नहीं हों।
आचार्य जी की कुरसी
पर मुझे सहाय परिवार में आचार्य शिवपूजन सहाय की एक अनमोल विरासत नजर आती है। वागेश्वरी सहाय के तीन बेटे थे। आचार्य शिवपूजन सहाय के अलावा दो भाइयों का परिवार के कुछ लोग अभी भी गांव में रहते हैं। इनमें से एक राजेश रंजन सहाय का घर आचार्य शिवपूजन सहाय के पुश्तैनी घर से लगा हुआ है। उनके पास मुझे वह विशाल आराम कुर्सी दिखाई देती है जिसपर बैठकर आचार्य शिवपूजन सहाय साहित्य सृजन किया करते थे। मैं उस कुर्सी को नमन करता हूं। आचार्य जी के न जाने कितने ग्रंथों के सृजन की ये कुरसी गवाह होगी।

गांव में लगी मूर्ति की भी बेकद्री  
भले ही पूरे बिहार में और बाहर लोग उनवास को आचार्य शिवपूजन सहाय के गांव के रुप में जानते हों पर गांव में उनकी जयंती या पुण्यतिथि पर कोई आयोजन नहीं होता। गांव में उनकी एक मूर्ति लगी है पर वग शिवाला की जमीन पर है। वहां कोई फूल चढ़ाने नहीं जाता। मूर्ति चश्मा भी गायब हो चुका है। गांव के लोगों से पता चलता है आचार्य जी के परिवार के लोग पढ़े लिखे और उच्च पदों पर हैं, पर उनमें कोई गांव में उनकी स्मृतियों को संभाल कर रखने की सुध नहीं ले रहा। हलांकि उनवास गांव बक्सर से धनसोई जाने वाली मुख्य सड़क पर एक विकसित गांव है।  
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com
( ACHARYA SHIVPUJAN SAHAY, UNWAS, BUXAR ) 

उनवास में बुरे हाल में महान साहित्यकार का घर। कभी था ये विद्या का मंदिर। 


Friday, August 4, 2017

हीनवा बार्डर पर के फौजी भतार मांगेले....

कई साल बाद अपने जिले की शादी में शामिल होने का मौका मिला तो ये देखने में आया कि शादी में भोज की पुरानी परंपराएं खत्म होती जा रही हैं। गांव में अब शहरीकरण हावी होता जा रहा है। बचपन के भोज याद आते हैं जब हम पातं में बैठकर खाया करते थे। पर अब यह परंपरा गांवों में भी खत्म हो गई है। इस बार देख रहा हूं कि शहर के बुफे सिस्टम ने गांव में दस्तक दे दी है।

तो गांव में शादी की तैयारियां जोरों पर थीं। आज शाम तिलक आने वाला है। तिलकहरु लोगों के लिए बिस्तर गद्दे का इंतजाम शहर के टेंट हाउस से किया गया है। खाने के लिए अलग से टेंट लगाया गया है। शाम होते ही बुफे सिस्टम के टेबल सज गए। इतना ही नहीं खाना परोसने के लिए शहर से लड़कियां बुलाई गई हैं, जो यूनीफार्म में आकर काउंटरों पर खड़ी हो गईं। हालांकि गांव के काफी लोग अभी भी बुफे सिस्टम में खाने में संकोच करते हैं। पर हर गांव के सड़क से संपर्कित हो जाने के बाद शहर से तमाम आधुनिक सुविधाएं जुटाना अब आसान हो गया है।  

बारात निकलने की तैयारी हो रही है। इससे पहले काली पूजा और भड़सार की पूजा होती है। महिलाएं काली पूजा के लिए सजधज कर निकलती हैं। इनके साथ बैंड बाजा और लौंडा नाच भी होता है। लौंडा नाच तो भोजपुरी समाज का अभिन्न अंग है। एक पुरुष महिला बनकर नाचता है। कमाल है कि वह घंटो नाचता है पर थकता नहीं है। उसका अंग संचालन अदभुत होता है। मैं पक्का कह सकता हूं कि शकीरा भी इतनी देर तक नहीं नाच सकती। बैंड बाजा के साथ एक गायक भी होता है जो भोजपुरी गीत गाता है। 
मुझे याद आता है कि किसी जमाने में ऐसे मौके पर घोड़ा नाच भी होता था। एक आदमी घोड़े के मुखौटे के अंदर घुसकर नाचता था। अब उस तरह का नाच कम होता जा रहा है। पर इस बार लौंडा नाच के साथ बिंदास होकर हमारे घर की बेटियां भी नाच रही हैं। पहले उन्हें इस तरह उन्मुक्त होकर नाचते नहीं देखा था। यहां गांव में भी अब टीवी के सैकड़ों चैनल आ गए हैं उसका ये असर है।


बंद हो गई कानू की भड़सार - चरपुरवा गांव में किसी समय बगीचे में भड़सार हुआ करता था। यहां स्थायी चूल्हा बना था, जहां कानू आकर चना, जौ आदि भूनते थे। अलग अलग घर के लोग अपनी जरूरत के मुताबिक अनाज भुनवाते थे। पर अब लाभ कम होने के कारण कानू ने अपना काम बंद कर दिया है। दूसरे रोजगार में लग गया है। पर शादी में उसकी रस्म अदायगी होनी है, सो कानू अपने झोले में अनाज भून कर लाया है। भड़सार पूजा की रस्म निभाई गई। शाम को बारात निकल पड़ी। अलग अलग 15 बुलेरो गाड़ियों में। अब ज्यादातार बाराती बुलेरो में ही जाते हैं। पर किसी जमाने में मैंने ट्रैक्टर और बैलगाड़ी से भी बारात जाने का आनंद उठाया है। नजदीक की बारात हो तो लोग पैदल भी जाते थे।

भोजपुरी शादी में बारात के शामियाने में नाच या ड्रामा हो  तो उसका आकर्षण बढ़ जाता है। अमरपुर गांव में खेतों में डिजाइनर शामियाना लगा हुआ है। रात 10 बजने के साथ ही चौकी पर बने मंच पर नाच शुरू हो गया। पांच नर्तकियां हैं। एक चुटुकुलेदार एनाउंसर भी है। पहले सरस्वती वंदना उसके बाद भोजपुरी के हिट नंबरों पर डांस शुरू हुआ। एक साथ दो या तीन नर्तकियां नाच रही हैं। लोग फरमाइसी गाने भेज रहे हैं। पैसे लुटा रहे हैं। कई रसिया लोग तो मंच पर चढ़कर डांसर के साथ नाचने भी लग जा रहे हैं।

हमारे महुआ चैनल के गायक रहे अजीत आनंद के कई गीत आजकल इन नाच में हिट हो रहे हैं... जूलिया नाचेले....जूलिया का मांगे ले...जूलिया बार्डर पर फौजी भतार मांगेले...हीनवा नाचेले ....हीनवा का मांगेले ....हीनवा सिलवट पर लोढ़ा दमदार मांगेले... कई गाने द्विअर्थी तो कई थोड़े गरम टाइप के भी हैं। सुबह के पांच बजने तक नाच होता रहा। 
साल 2016 का सुपर डुपर हिट गीत है - पवन सिंह का- रात पिया बुता के दीया क्या क्या किया...यह गाना तो रात भर में कई बार बजा.. जनता की मांग पर। गांव में एंड्राएड फोन खूब पहुंच गया है, लोग वीडियो बनाने  में मस्त हैं। भोजपुरी इलाके में ऐसे नाच में कई बार लड़ाई होने और गोलियां चलने की नौबत भी आ जाती है। शादी में नाच देखने ऐसे लोग भी पहुंच जाते हैं जो आमंत्रित नहीं होते पर रसिया किस्म के होते हैं। कई बार वे भी लड़ाई का कारण बनते हैं। इस शादी में सब कुछ शांतिपूर्ण निपट गया। दुल्हा दुल्हन लेकर घर की ओर चला और मैं अपने ठिकाने की ओर।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य  ( BHOJPURI SHADI, DANCE, SONGS, AJEET ANAND ) 



Wednesday, August 2, 2017

22 साल बाद बुआ जी के गांव में

मेरी बुआजी के सबसे बड़े बेटे हैं संतोष भैया। मार्च में उनका फोन आया। बताया कि बेटे संजीत की शादी 7 मई को है और तिलक 5 मई को होगा। उनका आमंत्रण सुनकर मुझे याद आया कि आखिरी बार मैं बुआ जी के गांव में 1995 में गया था जब मैं काशी हिंदू विश्वविद्यालय से एमए कर चुका था और दिल्ली आने की तैयारी कर रहा था। तब एक भाई अभय का विवाह था। बारात गई थी संझौली से पश्चिम तिलईं गांव में। तो मैंने तय कि इस बार शादी में चरपुरवा चलना है। आखिरी 22 साल में परिवारों में और गांव में काफी कुछ बदल गया होगा न। अगर आप गांव और रिश्तेदारियों में लंबे अंतराल पर जाते हैं तो लोग आपको पहचानते तक नहीं। साथ आप अपनी मिट्टी, आचार व्यवहार संस्कृति से भी कटते जाते हैं। तो देश के अलग अलग हिस्सों के दौरा के बाद अब बुआ जी के उस गांव चरपुरवा टोला (शिवगंज) जाने की मौका था जो मेरे बचपन का प्रिय गंतव्य हुआ करता था। आम महुआ कटहल के हरे भरे पेड़, ताड़ के बगान। 

विशाल बगीचे और गर्मी में भी हरियाली का सानिध्य। ये सब कुछ चरपुरवा को खास बनाते हैं। काव नदी और सोन के बीच का इलाका है। बलुआही मिट्टी है। पानी का स्तर काफी ऊपर है। रोहतास जिले का बेहतरीन इलाका है। स्कूली जीवन में कई बार बुआ जी के गांव जाकर रहा था। उसकी स्मृतियां आज भी ताजा है। लाल रंग की छाली वाली शानदार घर की बनी दही के साथ पराठे खाने का वो आनंद और कहां था।

मैं गया जंक्शन से सुबह 10.10 पर खुलने वाली डेहरी ओनसोन पैसेंजर में सवार हुआ। ये ट्रेन पीछे धनबाद से आती है इसलिए भरी हुई है। कई डिब्बे चेक करने के बाद एक डिब्बे में जगह मिल गई। ट्रेन तय समय पर खुल गई। गया स्टेशन पर मैंने 10 रुपये का मीठा पपीता खाया। गया से सासाराम के बीच बचपन में अनगिनत बार ट्रेन का सफर किया है। वही स्टेशन के बार फिर आंखो के सामने थे। गुरारू, रफीगंज, फेसर। बचपन में मैं फेसर नाम सुनकर खूब हंसता था। अनुग्रह नारायण रोड बिहार के औरंगाबाद का निकटतम स्टेशन है। ये इलाका नक्सल प्रभावित रहा है। कई बार नक्सली ट्रेन के साथ भी वारदातें कर चुके हैं। पर मुझे पैसेंजर में चलते हुए सारे मेहनतकश चेहरे नजर आते हैं।

गया से डेहरी 85 किलोमीटर है। सोननगर जंक्शन से एक लाइन डाल्टेनगंज के लिए चली जाती है। ट्रेन सो नदी पर बने 3 किलोमीटर लंबे रेल पुल को पार कर डेहरी ओन सोन स्टेशन समय पर पहुंच जाती है। अब डेहरी जंक्शन नहीं है, पर कभी डेहरी रोहतास लाइट रेलवे के कारण यह जंक्शन हुआ करता था। डेहरी स्टेशन से बाहर निकलने पर गर्मी चरम पर है। एक बोतल कोला पीने के बाद राजपुर जाने वाली बस में बैठ जाता हूं। राजपुर यहां से 20 किलोमीटर है। रास्ते में बांक,अकोढी गोला जैसे गांव बाजार आते हैं। 40 मिनट बाद मैं राजपुर बाजार में हूं। यहां से चरपुरवा 5 किलोमीटर है, कभी हम ये दूरी पैदल तय करते थे। पर इस बार भैया ने अपने एक भाई को मोटरसाइकिल से भेज दिया। और हम पहुंच गए दोपहर में चरपुरवा।

गांव में काफी बदलाव आया है 22 साल में। दो तरफ से सड़के बन गई हैं। गांव मेंबिजली आ गई है।  नए नए घर बने हैं। लोगों ने शौचालय, स्नानागार आदि बनवा लिए हैं। छत पर  पानी टंकी लग गई है। बाथरुम में झरने भी हैं। पावर बैकअप के लिए इनवर्टर भी है। यानी गांव में शहरों जैसी सभी सुविधाएं। एक खुश करने वाली और बात दिखी कि गांव में हरियाली अब भी कायम है। बगीचे सलाम हैं। दोपहरी में बचपन याद आ गया। आम के पेड़ पर टिकोले लगे थे। अब पेड़ पर तो नहीं चढ़ सकता था सो डंडा मार कर टिकोले तोड़े और कच्चे आम का स्वाद लेने लगा।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य ( BIHAR, SHADI, CHARPURWA, ROHTAS) 
चरपुरवा ( रोहतास) में कच्चे आम का स्वाद।