Tuesday, December 12, 2017

गोवा का सबसे प्राचीन मंदिर – महादेव मंदिर तांबड़ी सुर्ल

गोवा में पुर्तगाली आक्रमण से पहले सैकड़ों प्रसिद्ध मंदिर हुआ करते थे। यह एक हिंदू बहुल इलाका हुआ करता था। पर पुर्तगाली शासन में ज्यादातर मंदिरों पर पुर्तगालियों का कहर बरपा। इनमें से ज्यादातर मंदिरों को नष्ट कर डाला गया। पर गोवा के कुछ मंदिर अभी भी मूल रूप में सुरक्षित हैं। अगर गोवा राज्य के सबसे पुराने मंदिर की बात करें तो यह 12वीं सदी का है। यह महादेव  शिव का यह मंदिर तांबड़ी सुर्ल गांव में स्थित है। यह मंदिर कदंबा और देवगिरी के यादव शासन काल के वास्तुकला का सुंदर नमूना है। तांबड़ी सुर्ल-शिव मंदिर अपने कलात्मक शिल्प एवं वैभव के कारण जाना जाता है। चौदहवीं शताब्दी में कदंब राजाओं के समय इसका निर्माण हुआ।

कैसे पहुंचे – तांबदी सुर्ल की दूरी गोवा की राजधानी पणजी से 65 किलोमीटर है। वहीं मोलेम से 12 किलोमीटर की दूरी पर है। यह मंदिर सघन वन क्षेत्र में है। सतारी तालुक के वालपोई से इसकी दूरी 22 किलोमीटर है।
जैन शैली में निर्माण -  इस मंदिर का निर्माण जैन शैली की छाप दिखाई देती है। मंदिर का निर्माण ऐसे जगह पर हुआ है जहां पहुंचना आसान नहीं था। वहीं यह मंदिर गोवा के बाकी मंदिरों की तुलना में आकार में भी छोटा है। मंदिर को देखकर यह प्रतीत होता है कि इसका गुंबद का निर्माण पूरा नहीं हो सका था। इस मंदिर के निर्माण की शैली कर्नाटक के बादामी के पास मंदिरों के गांव एहोल की निर्माण शैली से मिलती जुलती है।

यह गोवा का एक मात्र मंदिर है जो मुस्लिम आक्रमण और पुर्तगाली आक्रमण के बाद भी सुरक्षित रहा। यह गोवा में कदंबा और यादव काल के शासन की एकमात्र निशानी है। इसके निर्माण में बेहतरीन किस्म के बेसाल्ट चट्टानों का इस्तेमाल किया गया है। मंदिर में छोटा सा मंडप बना है। यहां ब्रह्मा, विष्णु और महेश की प्रतिमाएं निर्मित की गई हैं। मंदिर परिसर में शिव के सवारी नंदी की भी प्रतिमा बनाई गई है।
कदंबा राजतंत्र के प्रतीक चिन्ह हाथी का भी चित्रण मंदिर में किया गया है। मंदिर के पास ही सर्ल नदी बहती है। सालों भर मंदिर को देखने कम ही श्रद्धालु पहुंचते हैं पर महाशिवरात्रि के समय यहां लघु मेला लग जाता है। आइए अब एक और मंदिर की बात करते हैं...

चंदेश्वर भूतनाथ संस्थान – मडगांव से क्वेपे के मार्ग पर पर्वत परोडा में चंदेश्वर भूतनाथ संस्थान का सुंदर मंदिर नजर आता है। यह मंदिर एक पहाड़ी पर स्थित है। यह मंदिर मडगांव से 14 किलोमीटर की दूरी पर है। मंदिर में प्रवेश के लिए आपको कोई 350 मीटर की चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। यह शिव को समर्पित मंदिर है। इस मंदिर को भोज राज तंत्र से जोड़कर देखा जाता है। उनके शासनकाल में ही गोवा के चंद्रपुर को राजधानी बनाया गया था। इस मंदिर के पार्श्व से सूर्यास्त का नजारा बड़ा सुंदर दिखाई देता है।

शांता दुर्गा मंदिर – मंगेशी के रास्ते में थोड़ा आगे जाने पर शांता दुर्गा मंदिर स्थित है। यह गोवा के सुंदर मंदिरों में से एक है। शांता दुर्गा गोवा निवासियों की ख़ास देवी हैं। कहते हैं कि बंगाल की क्षुब्धा दुर्गा गोवा में आकर शांत हो गईं और शांता दुर्गा के नाम से पूजी जाने लगीं।

श्री मल्लिकार्जुन का मंदिर – गोवा में मडगांव से 40 किलोमीटर दूर कारवार के रास्ते में कोणकोण गांव में श्री मल्लिकार्जुन का सुंदर मंदिर है। सघन वन और हरीतिमा के बीच चतुर्दिक पहाड़ियों से घिरे इस मंदिर को देखने जो भी यात्री आता हैवह इसके प्राकृतिक सौंदर्य को देख मुग्ध होकर वहीं का हो जाता है। 
-vidyutp@gmail.com
( TEMPLE, GOA, CHANDRESHWAR BHOOTNATH, SHANTA DURGA ) 

Monday, December 11, 2017

दक्षिण गोवा का अदभुत दामोदर मंदिर

आज भले ही गोवा को चर्चों के लिए जाना जाता हो पर किसी जमाने में गोवा में सैकड़ों मंदिर हुआ करते थे। आज भी गोवा के ग्रामीण इलाकों में कई सुंदर मंदिरों के दर्शन किए जा सकते हैं। इनमें से प्रमुख है जांबावली स्थित दामोदर मंदिर। दामोदर मतलब महादेव शिव का मंदिर।

मंदिर परिसर बड़ा ही भव्य और खूबसूरत है। मंदिर में शिव के अलावा रामनाथ, महेश, चामुंडेश्वरी और महाकाली की प्रतिमाएं हैं। मंदिर के श्रद्धालु ज्यादातर गौड़ सारस्वत ब्राह्मण परिवार के लोग हैं। देस भर में फैले हुए गौड़ सारस्वत ब्राह्मण लोग दामोदर मंदिर के दर्शन के लिए आते हैं और मंदिर को सालों भर दान भी भेजते हैं। अपने बनावट और वास्तुकला के लिहाज से यह गोवा के सुंदरतम मंदिरों में गिना जाता है।

कभी मडगांव में था दामोदर मंदिर - यह वास्तव में गोवा के अति प्राचीन दामोदर मंदिर का पुनर्निर्माण है। कहा जाता है कि दामोदर मंदिर मूल रूप से मडगांव में वहां स्थित था जहां आजकल होली स्पिरिट चर्च है। गोवा में पुर्तगाली शासन आरंभ होने के बाद पुर्तगालियों द्वारा बड़ी संख्या में मंदिरों को नष्ट करने का उपक्रम चलाया गया। साथ ही हिंदू आबादी को उनके पर्व त्योहार मनाने और पूजा पाठ करने पर भी बंदिशें लगा दी गईं। 1565 ई में दामोदर मंदिर को भी ध्वस्त करके वहां चर्च का निर्माण करा दिया गया।

बाद में हिंदू श्रद्धालुओं ने दामोदर मंदिर का निर्माण जांबावली (जांबोलियम) गांव  में कराया। इस मंदिर का परिसर भी भव्य है। यह मंदिर कुशावती नदी के तट पर बना हुआ  है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु कुशावती नदी में स्नान करने के बाद दामोदर देव के दर्शन करते हैं। गोवा के हिंदुओं में कुशावती नदी को रोग दुख दूर करने वाला माना गया है।


जांबावली मंदिर परिसर के पास कुछ दुकानें और एक भोजनालय भी है। मंदिर की ओर से अतिथि आवास का भी निर्माण कराया गया है। महाशिवरात्रि और खास खास मौकों पर मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।

मंदिर खुलने का समय - दामोदर मंदिर सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक खुला रहता है। 

कैसे पहुंचे - दामोदर मंदिर मडगांव से 22 किलोमीटर दूर और उपनगर क्वेपे से 5 किलोमीटर आगे जांबावली गांव में स्थित है। मडगांव से निजी वाहन से यहां सुगमता पहुंचा जा सकता है। हालांकि क्वेपे से कुछ बसें भी चलती हैं। पर उनका समय काफी अंतराल पर है।
- vidyutp@gmail.com
(DAMODAR TEMPLE, SOUTH GOA, SHIVA ) 






Sunday, December 10, 2017

एक मंदिर जहां चांदी दान करते हैं भक्त – विमलेश्वर मंदिर गोवा

दक्षिण गोवा के रिवणा गांव में स्थित विमलेश्वर मंदिर शिव का भव्य और अति प्राचीन मंदिर है। गोवा के श्रद्धालुओं की मान्यता है कि इस मंदिर के शिवलिंगम स्वयंभू शिव हैं। विमल का मतलब पवित्र और ईश्वर का मतलब भगवान। मंदिर का वर्तमान भवन 1920 का बना हुआ है। पर इस मंदिर के जीर्णोद्धार का प्रमाण 11 वीं सदी में कदंबा सम्राज्य में और उससे पहले छठी सदी में चालुक्य सम्राज्य के दौरान का भी मिलता है। मंदिर परिसर में विमलेश्वर महादेव के अलावा, कमलेश्वर, महाकाली और मारुतिनंदन की भी मूर्तियां स्थापित की गई हैं।
विमलेश्वर के स्वंभू शिवलिंगम के बारे में माना जाता है कि यह सैकडों साल पहले इलाके के निवास कोल समुदाय के लोगों द्वारा स्थापित किया गया था। यह गोकर्ण के महाबलेश्वर के सदृश प्राचीन है। पर बाद में बाढ़ के दौरान शिवलिंगम कहीं खो गया था। कई सालों बाद इसे ढूंढ कर फिर से स्थापित किया गया।
खेती दौरान मिला विलुप्त हुआ शिवलिंगम
कहा जाता है कि रिवणा गांव में किसी जमाने में कई ऋषियों के आश्रम हुआ करते थे। सघन वन और साफ पानी के झरनों के कारण इस क्षेत्र को ऋषि लोग काफी पसंद करते थे। इसी कारण से रिवणा को ऋषिवन भी कहते थे। गोवा का नाम महाभारत काल में गोमंत मिलता है।

कालांतर में रिवणा गांव में कुनबी नाम से जानी जाने वाली जनजाति ने गाय पालना और खेती बाड़ी की शुरुआत की। यहां श्रम करके जंगलों को काट कर उन्होंने खेत तैयार किए। इसी खेती के दौरान लंबे समय से विलुप्त हुआ पुराना शिवलिंगम प्राप्त हो गया। यह गांव के लोगों के लिए अत्यंत प्रसन्नता का समय था।

एकादशी के दिन प्रकट हुए महादेव
वह एकादशी का दिन था जब एक कुनबी किसान को खेतों से शिवलिंगम प्राप्त हुआ। विमलेश्वर मंदिर के गर्भ गृह में स्थापित शिवलिंगम में कुनबी किसान द्वारा हल चलाने के दौरान शिवलिंगम हल के लगे निशान आज भी दिखाई देते हैं। गांव के लोगों ने शिवलिंगम प्राप्त होने पर पहले एक छोटा सा मंदिर बनाकर स्थापित किया। पर  अब मंदिर भव्य रूप ले चुका है। विमलेश्वर भगवान के सम्मान में आज रिवणा के किसान एकादशी के दिन खेतों में हल नहीं चलाते।  

एक और खास बात है कि महादेव शिव के इस मंदिर में भक्त गण चांदी दान करते हैं। मंदिर में लगे बोर्ड पर लिखा है किस भक्त ने कितने किलोग्राम चांदी दान की। किसी भक्त ने किलो में तो किसी भक्त ने कुछ ग्राम में चांदी दान की है। हर साल चांदी दान करने वालों की सूची लंबी होती जा रही है। बाद में इस चांदी से प्राप्त धन को मंदिर परिसर के विकास में लगाया जाता है।

इस मंदिर के श्रद्धालु रेवणेकर उपाधि लिखने वाले गौड़ सारस्वत ब्राह्मण लोग हैं जो विमलेश्वर महादेव को अपना कुल देवता मानते हैं। कदाचित रेवणेकर उपाधि रिवणा गांव के नाम से ही निकली है।

विमलेश्वर मंदिर परिसर को भव्य बनाने मे दावणगेरे (कर्नाटक), कारवार और बेलगाम  के भक्तों ने काफी राशि दान की है। दशहरा और शिवरात्रि के समय इस मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। साल के बाकी दिनों में यहां कम श्रद्धालु दिखाई देते हैं।

रिवणा जाते समय दाहिनी तरफ पड़ने वाले इस मंदिर का परिसर विशाल है। परिसर में एक सरोवर भी है। यहां वाहनों के लिए पार्किंग का इंतजाम है। मंदिर परिसर में एक छोटी सी कैंटीन भी है।
आप मडगांव से क्वेपे होते हुए रिवणा के विमलेश्वर मंदिर तक पहुंच सकते हैं। मडगांव से मंदिर की दूरी 25किलोमीटर है।

श्री संस्थान गोकर्ण पुर्तगाली जीवोत्तम मठ - रिवणा में हमें गुफा के पास श्री संस्थान गोकर्ण जीवोत्तम मठ नजर आता है। यह मठ मंदिर गुफा नंबर दो के पास है। इस सुंदर मठ में मारुति यानी हनुमान जी का मंदिर है। मंदिर में अतिथियों के रहने का इंतजाम भी है। मंदिर परिसर में एक श्री रामचंद्र तीर्थ सभागृह का भी निर्माण हुआ है। जीवोत्तम मठ की शांति और सुंदरता ऐसे ही किसी आश्रम की याद दिलाती है।

महालक्ष्मी का मंदिर  रिवणा यानी ऋषिवन में कई सुंदर मंदिर हैं। इन्ही मंदिरों में धन धान्य की देवी महालक्ष्मी का भी एक मंदिर है। हमें गांव में एक सुंदर महालक्ष्मी मंदिर के भी दर्शन करने का मौका मिलता है। मुख्य सड़क पर स्थित यह मंदिर भी अत्यंत सुंदर है। पीले रंग का मंदिर हरित परिसर में बना हुआ है। रिवणा जाते समय महालक्ष्मी मंदिर बायीं तरफ दिखाई देगा। 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
( VIMLESWAR TEMPLE, SOUTH GOA, RIVONA ) 

Friday, December 8, 2017

दक्षिण गोवा में रिवणा की बौद्ध गुफाएं

गोवा में बुद्धकालीन गुफाएं भी हैं। बेटे अनादि ने ये रिसर्च कर डाला था। तो अब हमारी मंजिल थी रिवणा पहुंचना और उन ऐतिहासिक गुफाओं को देखना। हालांकि गोवा आने वाले बहुत कम लोग वहां जाते हैं। पर इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए ये कौतूहल भरा अनुभव है।

हमलोग चांदोर (चंद्रपुर ) से रिवणा के लिए जाना चाहते हैं। चांदोर के ब्रिगेंजा हाउस के बाहर एक सज्जन ने रास्ता बता दिया। सीधे जाइए नदी का पुल पार करें तिलामोल से आगे रास्ता पूछते हुए जंबावली होते हुए जाएं। हमलोग चल पड़े। रास्ते मे कुशावती नदी का पुल आया। नदी इतनी प्यारी लगी की हमलोग रुक गए, कुछ तस्वीरों के लिए। नदी के दोनों पाट नारियल के पेड़ से आच्छादित थे। मानो वे नदी के मोहपाश में बंधकर झुक गए हों। ऐसा प्रेम भला कहां देखने को मिलता है।


हरियाली से लदी-फदी नदियां गोवा, कर्नाटक, केरल में ही देखने को मिल सकती हैं। नदी के उस पार सड़क के किनारे कुछ युवक मछलियां बेच रहे थे। ये मछलियां नदीं से निकाली गई थीं। हरा भरा सुंदर रास्ता है। असोलाडा से रास्ता बदलना पड़ा।

थोड़ी दूर चलने पर तिलामोल आ गया। तिलामोल एक छोटा सा बाजार है। यहां चौराहे पर रस्सी पर संतुलन बनाने वाला खेल देखने को मिला। हमने गांव में ऐसे खेल देखे थे, अनादि के लिए वह नया था। वहां से आगे बढ़े जांबोलिम नामक छोटा सा गांव आया। यहां प्रसिद्ध दामोदर मंदिर है। उनके दर्शन लौटते हुए करेंगे। यहां एक गन्ने के जूस वाला स्टाल नजर आया। गन्ना का जूस निकालने वाले इलाहाबाद के हैं। इस जूस स्टाल पर एक महिला मिली जो अपनी बिटिया को एक्टिवा से स्कूल से लेकर आ रही थीं। उन्होंने भी बताया कि हम सही रास्ते पर हैं। वहां हमलोग रुक कर जूस पीकर आगे बढ़े।
रिवणा की गुफा नंबर एक। चारों तरफ घास उग आई है....

तीन किलोमीटर आगे चलने पर हमलोग रिवणा गांव में हैं। यहां सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की शाखा नजर आती है। अब हम रिवणा की गुफाओं की तलाश में हैं। बाजार से थोड़ा आगे जाकर दाहिनी तरफ नीचे कच्चे रास्ते पर उतरने के बाद एक जगह जाकर रास्ता बंद हो गया। हमलोग स्कूटी वहीं पार्क कर पैदल चल पड़े। जंगलों के बीच। पर कहीं गुफाएं नहीं दिखीं। थोड़ी दूर जाने पर एक परिवार मिला। उसने बताया कि गुफाएं पीछे ही हैं। हमलोग उसके मार्गदर्शन में वापस आए।

हमें जंगल के बीच अति प्राचीन गुफा नजर आई। पक्की गुफा के चारों तरफ इतनी हरी हरी घास उग आई है कि आते जाते एकबारगी ये गुफा नजर नहीं आती। इन गुफाओं के बारे में कहा जाता है कि ये छठी सातवीं सदी की बनी हुई हैं। इनमें कभी बौद्ध भिक्षु तपस्या किया करते थे। इस तरह की गुफाएं देश के दूसरे स्थानों पर भी मिलती हैं। पर गोवा में इन्हें देखना सुखद है।
दक्षिण गोवा - रिवणा की गुफा नंबर 2 में ....

मौर्य सम्राज्य के दौरान गोवा में आया बौद्ध धर्म -  तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में गोवा मौर्य सम्राज्य का हिस्सा बन चुका था। इस दौरान गोवा में बौद्ध धर्म का काफी प्रचार प्रसार हुआ। गोवा के निवासी पूर्णमैत्रेयणी सारनाथ गए थे, जहां से लौटकर उन्होंने गोवा में बौद्ध धर्म का प्रचार किया। रिवणा की गुफाओं में पीठ नजर आता है। इससे प्रतीत होता है कि इन गुफाओं में गुरु बैठकर शिष्यों को धर्म की शिक्षा देते थे।
गोवा  वास्तव रिवणा में दो बौद्ध गुफाएं हैं। वापस लौटकर सड़क के बायीं तरफ 50 मीटर चलने के बाद बायीं तरफ दूसरी गुफा है। इस गुफा की बनावट बेहतर है। इसमें अंदर जाने की सीढ़ियां है। नीचे जाकर दूसरी तरफ से बाहर निकलने का रास्ता भी है। बाहर एक कूप भी बना हुआ है। यहां लोगों ने बाद में कुछ देवी प्रतिमाएं भी रख दी हैं। इस गुफा के पास हमें प्राकृतिक पानी का सोता भी नजर आया।

कुछ लोग रिवणा की गुफाओं को पांडव कालीन कहते हैं। कहा जाता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडव यहां रुके थे। पर इतिहासकार इन्हें बौद्ध गुफाएं मानते हैं। लेटेराइट की बनी इन गुफाओं के बारे में माना जाता है कि ये बौद्ध पीठ थे। यहां गुरु शिष्यों को शिक्षा दिया करते थे।

हमारे लिए लंबी और रास्ता पूछ-पूछ कर सफर के बाद रिवणा पहुंचना और गुफाएं देखना सार्थक रहा। यूं कहें कि गोवा भ्रमण की सबसे बेहतर अनुभूति रही।
रिवणा की गुफा नंबर 2 में - ये गुफा कौतूहल भरी है...

कैसे पहुंचे  – मडगांव से रिवणा की दूरी  25 किलोमीटर है। आप मडगांव से क्वेपे  होकर चलें। वहां तिलामोल – जंबावली होते हुए रिवणा पहुंच सकते हैं। अपना वाहन हो तो अच्छा है। बसें बहुत कम चलती हैं इस मार्ग  पर। आप हमारी तरह वाया चांदोर होकर भी रिवणा जा सकते हैं।
 - vidyutp@gmail.com
MADGAON- QUEPEM- TILAMOL- ZAMBAULIM- RIVONA CAVES, BUDDHA ) 
रिवणा की गुफा नंबर 2 के पास नीचे रखीं मूर्तियां...

Wednesday, December 6, 2017

ब्रिगैंजा हाउस – पुर्तगाली अतीत की स्मृतियां

चांदूर में ब्रिगेंजा हाउस की तलाश करते हुए हमलोग इसके रहस्यमय दरवाजे पर दस्तक देते हैं। यह एक पुर्तगाली परिवार का निजी संग्रहालय है। हमारे हिन्दुस्तान के खेल पत्रकार सौरभ अग्रवाल जो अक्सर गोवा जाते रहते हैं उन्होंने हमें ब्रिगैंजा हाउस जरूर देखने की सलाह दी थी। उनकी सलाह पर हम यहां पहुंच गए थे। पर ब्रिगैंजा हाउस का दरवाजा अंदर से बंद था। थोड़ी कोशिश करने पर एक सहायक आया। उसने जाकर मालकिन को सूचना दी। फिर मालकिन नेे आकर दरवाजा खुला। मिसेज परेरा ने हमारा स्वागत किया और हमलोग ब्रिगेंजा हाउस का मुआयना करने लगे।

हालांकि बाहर से ब्रिगेंजा हाउस देखने में कुछ खास प्रतीत नहीं हो रहा था। एक विशाल पुराना घर नजर आता है बाहर से। पर अंदर एक अलग दुनिया है। अंदर एक एक कमरे में संग्रह देखने के बाद उत्सुकता बढ़ती गई।
ब्रिगैंजा हाउस 17वीं सदी का बना हुआ एक पुर्तगाली परिवार का निजी घर था, जिसे अब निजी संग्रहालय में बदल दिया गया है। एक विशाल भवन में दो अलग अलग परिवारों के घर हैं, जिनका प्रवेश द्वार मध्य में एक ही है।

चैपल में संरक्षित हैं संत फ्रांसिस का नाखून - 

ब्रिगैंजा हाउस के पूर्वी भाग का स्वामित्व परेरा परिवार के पास है। इस विशाल घर में एक छोटा सा चैपल (प्रार्थना गृह) भी है। इस प्रार्थना गृह की कुछ खास बात है। इसमें संत फ्रांसिस जेवियर के नाखून को संभाल कर रखा गया है। यह नाखून ब्रिगैंजा परिवार के पास कैसे आया ये राज का विषय है। जैसा कि आपको पता ही है कि संत फ्रांसिस जेवियर की ममी 400 से ज्यादा सालों से ओल्ड गोवा के चर्च बॉम बेसेलिका में संरक्षित करके रखी गई है।

विशाल हॉल में लकड़ी के एंटिक फर्नीचर - 
इस घर में चार विशाल हॉल हैं जिसमें लकड़ी के फर्नीचर, झूमर समेत कई आकर्षक संग्रह आप यहां देख सकते हैं। हमें एक ऐसा सोफा सेट दिखाई दिया जिसमें दो लोग बातें करते हुए एक दूसरे से मुखातिब होकर बैठ सकते हैं।
किरासन तेल से चलने वाला फ्रिज -  आगे एक ऐसा फ्रिज दिखाया गया जो बिजली के बजाय किरासन तेल से चलाया जाता था। इसे देखना अपने आप में अनूठा अनुभव था। यहां संग्रह में प्रदर्शित वस्तुएं ब्रिगेंजा परिवार के ऐश्वर्य की कहानी सुनाती प्रतीत होती हैं। विशाल बॉल रुम देखते ही बनता है जिसके निर्माण में इटैलियन मार्बल का इस्तेमाल किया गया है।
अनूठा सोफा - इसमें दो लोग बैठकर एक दूसरे से बातें कर सकते हैं ...


यहां हाथी दांत से बनी कई तरह की सामग्री भी देख सकते हैं। लकड़ी की बनी राजा महाराजाओं जैसी कई पालकी का भी संग्रह यहां देखा जा सकता है।
एक कमरे में ब्रिगैंजा परिवार की लाइब्रेरी भी है। इसमें 5000 से ज्यादा किताबें हैं। काफी किताबें पुर्तगाली भाषा में भी हैं। इसके अलावा इसमें फ्रेंज और अंग्रेजी की भी पुस्तकें मौजूद हैं। यह गोवा की पहली निजी लाइब्रेरी हुआ करती थी।
यह संग्रह इस परिवार के लुइस डी मेनेजेज ब्रिगेंजा (1878-1938) का है। वे एक जाने माने पत्रकार रहे हैं, उनकी गोवा के मुक्ति संग्राम में भी सार्थक भूमिका रही थी। कुल मिलाकर यहां आप 17वीं और 18वीं सदी के किसी रईस परिवार के जीवन के ऐशोआराम की झलक बखूबी देख सकते हैं।

प्रवेश के लिए डोनेशन की मांग - हालांकि ब्रिगैंजा हाउस में प्रवेश के लिए कोई टिकट नहीं है। पर जब आप हाउस देखकर निकलने लगते हैं तो आपको डोनेशन बाक्स में दान राशि रखने को कहा जाता है। उनकी ये उम्मीद होती है कि प्रति व्यक्ति कम से कम सौ रुपये दान किया जाए। केयर टेकर का कहना है कि इसी राशि से हम इस घर का रखरखाव कर पाते हैं। हालांकि केयर टेकर आपको साथ साथ पूरा हाउस दिखाती हैं, और यहां प्रदर्शित संग्रह के बारे में बताती भी हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
(BARAGANZA HOUSE, CHANDOR, GOA ) 
  

Monday, December 4, 2017

चंद्रपुर हुआ करता था कदंबा सम्राज्य की राजधानी

दक्षिण गोवा का चांदूर शहर। इसका असली नाम तो चंद्रपुर था। नाम बिगड़ गया है। चंद्रपुर गोवा में सबसे लंबे समय तक शासन करने वाला कदंबा सम्राज्य में राजधानी हुआ करता था। सुबह के नास्ते के बाद स्कूटी से हमलोग चांदूर के लिए निकल पड़े। पहले कोलवा से मडगांव छह किलोमीटर का सफर। हमें स्कूटी में पेट्रोल डलवाना है। मडगांव शहर में पेट्रोल पंप पूछते हुए एक पंप पर पहुंच गए। वहां से चांदूर का रास्ता पूछा। रेलवे लाइन को फ्लाइओवर से पार किया, फिर मडगांव का कैंटोनमेंट इलाका शुरू हो गया। मडगांव से चांदूर की दूरी 10 किलोमीटर बताई जाती है। पर हमलोग स्कूटी से क्वेपे रोड पर चलते हुए थोड़ा आगे निकल गए। इसलिए हमें यह थोड़ा ज्यादा लगा। रास्ते में एक महिला ने बताया कि आपको कुछ किलोमीटर पीछे से ही बाएं मुडना था। अब हमलोग वापस आए। जहां मुड़ना था उस चौराहे पर कोई संकेतक नहीं था। खैर अब हमलोग सही रास्ते पर थे।

 रास्ते में एक बोर्ड नजर आया – विलेज पंचायत ऑफ चांदोर वेलकम्स यू। हम निश्चिंत हुए कि अब सही रास्ते पर हैं। थोड़ी देर में हमलोग चांदूर में है। कभी ये शहर कदंबा सम्राज्य की राजधानी हुआ करता था, पर अब किसी गांव जैसा लगता है। मडगांव शहर से कुछ बसें रोज चांदोर के लिए आती हैं।
कुशावती के तट पर समृद्ध शहर था चंद्रपुर
चांदोर कुशावती नदी के तट पर बसा हुआ समृद्ध शहर हुआ करता था। कभी इस शहर में विशाल किला और मंदिर हुआ करते थे। यह एक अंतरराष्ट्रीय महत्व का शहर हुआ करता था। यहां से कई देशों के लिए व्यापार हुआ करता था। कुशावाती और जुआरी नदियां व्यापार का मार्ग हुआ करती थीं। माना जाता है कि गोवा कभी मौर्य सम्राज्य का हिस्सा हुआ करता था। इसका चंद्रपुर नाम मौर्य सम्राज्य के प्रतापी राजा चंद्रगुप्त मौर्य के नाम से ही निकला है।

चांदोर में तीसरी सदी के राजा भोज के भी अभिलेख मिले हैं। माना जाता है गोवा पर तीसरी सदी में राजा भोज का शासन था। न सिर्फ गोवा बल्कि उत्तर कन्नडा और बेलगाम तक यहीं से शासन सत्ता संभाली जाती थी।

आज चांदोर में कोई रौनक नजर नहीं आती। बस स्टैंड के पास एक विशाल चर्च है। चर्च के पास कुछ पुरानी इमारते हैं जो बुरे हाल में नजर आती हैं। आसपास में छोटा सा बाजार है। किसी छोटे से गांव सा नजर आता है अतीत का ये शहर। लगता है इसे किसी का अभिशाप लग गया हो, जो अब इस हाल में है।
गांव के बीचों बीच सफेद रंग का एक सुंदर चर्च है। इसी चर्च के आसपास छोटा सा बाजार है। थोड़ा बाहर चलने पर कुशावती नदी आती है।


कैसे पहुंचे – मडगांव से चांदोर पहुंचना आसान है। चांदोर रेलवे स्टेशन (CNR ) भी है। मडगांव से चांदोर की रेल से दूरी सिर्फ 8.4 किलोमीटर है। कुछ पैसेंजर ट्रेनें यहां आती हैं। यह रेलवे स्टेशन मडगांव से हुबली जाने वाली लाइन पर आता है। इसी रेलवे लाइन पर आगे प्रसिद्ध दूधसागर झरना पड़ता है। पर चांदोर में एक्सप्रेस ट्रेनें नहीं रुकती हैं। सिर्फ वास्कोडिगामा कुलेम पैसेंजर ही यहां पर रुकती है। हुबली जाने वाली एक्सप्रेस ट्रेनें यहां बिना रुके आगे बढ़ जाती हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
(CHANDRAPUR, GOA OLD CAPITAL, KADAMBA KINGDOM ) 





Saturday, December 2, 2017

मडगांव नहीं मठग्राम नाम था कभी

नार्थ गोवा की तरह ही हमने साउथ गोवा में भी घूमने के लिए एक्टिवा किराये पर ले ली। वैसे यहां नार्थ की तुलना में एक्टिवा का किराया थोड़ा ज्यादा मांगा जा रहा था। यहां किराये पर एक्टिवा देने वाले लोग सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक का किराया 350 रुपये मांग रहे थे।पर मैंने दो दिन 24 घंटे एक्टिवा अपने साथ रखने की मांग की।
आखिर सौदा 600 रुपये में पट गया। स्कूटी दुकानदार का नाम है रंजय ( फोन नंबर - 9764503646  )  वैसे यहां हर स्कूटी वाले का मोबाइल नंबर स्कूटी या चाबी रिंग पर भी लिखा होता है। हमेशा अपने साथ स्कूटी रखने का फायदा है कि आप देर रात या सुबह सुबह भी कहीं भी स्कूटी उठाया और चलते बने। समय की कोई पाबंदी नहीं। कोलवा बीच पर ही एक दुकानदार मिले जिनकी गुमटी में छोटी सी दुकान है और कुछ स्कूटी भी किराये पर देते हैं। आधार कार्ड डीएल आदि की औपचारिकताओं के बाद एक्टिवा हमारी हुई।

हमने शाम को तय किया कि आज मडगांव बाजार घूमने चलते हैं। पर आधे रास्ते चलकर वापस मुड़ गए बेनालियम समुद्र तट की। स्कूटी का यही तो फायदा है जब मर्जी इरादा बदले तो रास्ता बदल लो। खाने पीने के लिए नए नए रेस्टोरेंट की तलाश में भी सुविधा रहती है।

अगले दिन सुबह नास्ते के बाद हमलोग घूमने निकल पड़े हैं। एक्टिवा मडगांव बाजार के अलग अलग रास्तों को नाप रही है। हमें तलाश है एक पेट्रोल पंप (गैसोलीन) की, जिससे कि एक्टिवा के लिए खुराक का इंतजाम हो सके। इसका निदान जल्द ही हो गया। वर्ना गोवा में बोतल जिंदाबाद।
 मडगांव गोवा का तीसरा बड़ा शहर है। इसे मरगाओ भी लिखते हैं। यह कोंकण रेल का रेलवे स्टेशन भी है। बाजार में भीड़भाड़ के कारण कई सड़के वनवे हो जाती हैं।

गोवा की व्यावसायिक और सांस्कृतिक राजधानी मडगांव 
मडगांव को गोवा का व्यावसायिक और सांस्कृतिक राजधानी माना जाता है। इसे पुर्तगाली में मरगाओ और कोंकणी में मडगांव नाम से पुकारते हैं। वैसे कहा जाता है कि संस्कृत में इसका नाम मठग्राम था। कहा जाता है कि कभी यहां नौ मठ और मंदिर हुआ करते थे। मंदिर के साथ लगे हुए मठ धार्मिक स्कूल की तरह कार्य करते थे। पर पुर्तगाली आक्रमण के बाद इन सभी मठों को नष्ट कर दिया गया। यहां चर्च का निर्माण होने लगा। 


साल 1675 में मडगांव का पहला चर्च बना। आज होली स्पिरिट चर्च शहर का मुख्य चर्च है और शहर की पहचान बन चुका है। मडगांव शहर में आप आज भी पुर्तगाली स्टाइल में बनी तमाम बिल्डिंग देख सकते हैं। इनमें ज्यादातर बिल्डिंग दो मंजिलों वाली हैं। पर अब यहां नई बहुमंजिली इमारतें भी बनने लगी हैं। चर्च स्ट्रीट के आसपास शहर का शापिंग इलाका है। हमेशा बारिश होने के कारण यहां रेनकोट और बारिश बचने वाले छाते जैकेट आदि खूब बिकते हैं।

अब दक्षिण गोवा जिले का मुख्यालय है मडगांव 
मडगांव शहर की आबादी 90 हजार के आसपास है। 1961 में गोवा की आजादी के बाद मडगांव को साउथ गोवा जिले का मुख्यालय बनाया गया। टाउन हाल, म्युनिसपल गार्डन शहर के बीचों बीच है। मडगांव से गुजरते हुए यहां हमें एक विशाल स्टेडियम भी नजर आता है।


आज आप मडगांव शहर में निकलें तो गांधी मार्केट मुख्य बाजार है जहां से आप शापिंग कर सकते हैं। इसके अलावा मडगांव से लगा इलाका फटोडा है जो स्थानीय लोगों का लोकप्रिय बाजार है।

एयरपोर्ट से मडगांव 27 किलोमीटर की दूरी पर है। पर मडगांव कोंकण रेलवे का लोकप्रिय रेलवे स्टेशन है। दक्षिण जाने वाली सभी ट्रेनें यहां रुकती हैं। इसलिए रेल कनेक्टविटी के लिहाज से यह गोवा का सबसे मुफीद शहर है। उत्तर दक्षिण कहीं से भी यहां पहुंचना आसान है।  
-        विद्युत प्रकाश मौर्य

(MADGAON, MARGAO, CHURCH ) 

  
गोवा का अति व्यस्त मडगांव रेलवे स्टेशन। 

Thursday, November 30, 2017

जलते हैं जिसके लिए तेरी आंखों के दीए...

सुमधुर संगीत हमारे कानों को सुनाई दे रही है और हमलोग खींचे हुए उधर चले जाते हैं...कोई संगीत नहीं है पार्श्व में...पर एक आवाज इतनी सुरीली है कि विशाल रेस्टोरेंट में बैठे सारे लोग पूरी शांति से उस गीत का मजा ले रहे हैं...गीत पुरानी फिल्म सुजाता (1959) का है....सचिन देव बर्मन ने संगीत दिया था... आवाज थी तलत महमूद की शब्द थे मजरूह सुल्तानपुरी के... जलते हैं जिसके लिए तेरी आंखों के दीए...मैं ढूंढ लाया हूं वही गीत तेरे लिए। पर ये सज्जन इतना बढ़िया गा रहे हैं कि हमलोग बेनालियम बीच पर बने इस रेस्टोरेंट में पहुंच जाते हैं। पूरा गीत सुनने के बाद सारे लोगों के साथ तालियां बजाते हैं। रात ढल चुकी है। रेस्टोरेंट की टेबल पर लोग कुछ खा रहे हैं और पी रहे हैं साथ में लाइव संगीत का आनंद ले रहे हैं। ये गोवा की शाम का असली आनंद है।
बेनालियम बीच कोलवा से दो किलोमीटर आगे है। यह कोलवा से भी ज्यादा शांत है। यहां पहुंचने का रास्ता गंवई परिवेश वाला है। वास्तव में इसका पुराना संस्कृत नाम बाणावाली था जो बिगड़ गया है। कहा जाता है परशुराम ने समंदर के देवता वरुण की ओर जो बाण मारा था वह यहीं आकर गिरा था। इसलिए इसका नाम बाणावली था।

नारियल के पेड़...हरे भरे खेत..कहीं कहीं रास्ते में घर। इन घरों में दुकानें। चलते चलते आप समुद्र के तट पर पहुंचते हैं। कहीं कहीं एक दो होटल दिखाई देते हैं। उन लोगों को ये बीच खास पसंद है जो गोवा मे शांत जगह में कुछ दिन गुजारने आते हैं। इस बीच पर समंदर से लगे हुए कुछ रिजार्ट बने हैं।

यहां ताज एग्जोटिका रिजार्ट एंड स्पा है जो मोटी जेब वालों की खास पसंद है। बेनालियम में डॉन बास्को एनिमेशन सेंटर बना हुआ है। यह ईसाई संत सेंट फ्रांसिस वाज की जन्म स्थली भी है। यहां दो लोकप्रिय चर्च भी हैं। होली ट्रिनिटी चर्च और न्यू चर्च आप यहां अगर समय हो तो देख सकते हैं।

शाम ढलने के बाद हमलोग एक्टिवा से बेनालियम समुद्र तट की ओर जाने के लिए निकले हैं। रास्ता पूछते पूछते आगे बढ़ रहे हैं। यूं लग रहा है किसी गांव से गुजर रहे हों। एक जगह घर में दुकान नजर आती है। हमलोग रास्ता पूछने रुक जाते हैं। फिर दुकान में कुछ देखने लगते हैं। दो दुकानों में कपड़ों, आर्टिफिशियल ज्वेलरी और एंटिंग चीजों का विशाल संग्रह है। 

पति पत्नी मिलकर दुकान चलाते हैं। मैं उनसे कलेक्शन के बारे में पूछता हूं। वे बताते हैं कि अलग अलग शहरों से जाकर खरीददारी करता हूं और यहां लाकर बेचता हूं। उनके पास लकड़ी के बने कुछ शानदार खिलौने हैं। कुछ लालबुझक्कड टाइप के बाक्स भी हैं। इन बाक्स में एक अंदर दूसरा फिर अंदर तीसरा बाक्स दिखाई देता है। अनादि वहां कुछ तलवार और कटारों पर जोर आजमाइश करते हैं। माधवी कई तरह की ज्वेलरी पसंद करने लगती हैं। मुझे भी एक आरेंज कलर का टी शर्ट पसंद आ जाता है। थोड़ी बहुत बार्गेनिंग के बाद हमलोग कई चीजें खरीद लेते हैं।
दुकानदार महोदय का व्यवहार इतना अच्छा लगता है कि हमलोग उनके साथ तस्वीरें खिंचवाते हैं। हम उनसे बेनालियम के बारे में थोड़ी जानकारी लेते हैं फिर आगे बढ़ जाते हैं। बेनालियम की दुनिया थोड़ी रहस्यमयी लगती है, थोड़ी सपनीली लगती है। कुल मिलाकर मजा आता है। बेनालियम इलाके का मुख्य बाजार मारिया हॉल में है।

( BENAULIM BEACH, SOUTH GOA, PEDRO’S BAR AND RESTAURANT, TAJ EXOTICA )    


Tuesday, November 28, 2017

कोलवा बीच पर मस्ती और फुटबॉल का मैच

कुछ लोगों को सारे समुद्र तट एक ही जैसे लगते हैं। पर हर समुद्र तट का अपना सौंदर्य होता है। कुछ लोग मुझसे ये सवाल पूछते हैं कि देश का सबसे खूबसूरत समुद्र तट कौन सा है। इस पर हर किसी का अपनी पसंद के हिसाब से अपना जवाब हो सकता है। पर गोवा के समुद्र तट में बात करें तो कोलवा काफी सुंदर लगा। इसलिए कि यहां कालांगुट जैसी भीड़भाड़ नहीं है। पर बिल्कुल सुनसान भी नहीं है। थोड़ा सा बाजार है, थोड़ी सी मस्ती का आलम है। सुबह हो या शाम थोड़ी-थोड़ी रौनक कोलवा में रहती है। अनादि को भी सारे बीच के बीच कोलवा काफी पसंद आया।
शाम को सूरज डूब रहा है और हमलोग कोलवा बीच पर पहुंच गए हैं। बीच के ठीक पहले पार्किंग और बस आटो स्टैंड है। समंदर में काफी लोग अटखेलियां करने में जुटे हैं। पर लोगों की सुरक्षा के लिए सी गार्ड के प्रशिक्षित जवान भी तैनात हैं लाइफ जैकेट के साथ। वे समंदर में लाल रंग की झंडियां लगा देते हैं। इससे आगे नहीं जाएं का निर्देश देते हुए। पर लोग हैं कि मानते नहीं। वे बार बार सिटी बजाकर आगाह करते हैं। मैं लाइफ गार्ड से बातचीत करता हूं। तैराकी के गहन परीक्षण के बाद उन्हें ये नौकरी मिली है। 12 से 15 हजार मासिक तनख्वाह मिलती है।

कोलवा बीच के साथ लगे हुए बेनालियम और दूसरे बीच हैं। तकरीबन 10 किलोमीटर तक आप समंदर के साथ चलते हुए जा सकते हैं। समुद्र का सौंदर्य निहारते हुए। यह आपको नार्थ गोवा से ज्यादा सुंदर प्रतीत होगा। कोलवा के होटल वाले भी अपने बीच को नार्थ से ज्यादा सुंदर बताते हैं।

सुबह सुबह जगने के बाद सूर्योदय देखने मैं एक बार फिर कोलवा बीच पर पहुंच जाता हूं। दो नजारे दिखाई देते हैं। बीच पर फुटबाल का मैच चल रहा है। गोल पोस्ट बना दिया गया है। वर्दी में दो टीमें बन गई हैं। पूरे नियम कायदे से फुटबाल मैच जारी है। बहुत दिनों बाद इस तरह मैच देखने का मौका मिला है। थोड़ी देर मैच का मजा लेने के बाद आगे बढ़ता हूं। मछुआरे नाव लेकर मछलियां पकड़ने में व्यस्त हैं। मछलियों के साथ देखता हूं कि कई जिंदा सांप भी पकड़ में आ गए हैं। कई ऐसे समुद्री जंतु आ गए हैं जिन्हें खाया नहीं जाता।

मछुआरे इन्हें फिर से जुटा कर समुद्र के अंदर फेंक आते हैं। एक जगह मछली पकड़ने वाली नाव को काम खत्म होने के बाद खींचकर समंदर के पानी से किनारे लगाया जा रहा है। ये प्रक्रिया बड़ी ही श्रम साध्य लग रही है। लकड़ी के फिसलन वाले प्लेटफार्म पर नाव को रखकर कई लोग मिलकर खींचकर किनारे ला रहे हैं। वे अपने गोवा की स्थानीय भाषा में जोश बढ़ाने के लिए कुछ गा भी रहे हैं। इन्ही गीतों से कभी रमैया वस्ता वैया लिखने की प्रेरणा मिली होगी।

कोलवा बीच पर समंदर के किनारे कुछ रिजार्ट दिखाई देते हैं जिसमें स्पा आदि का भी इंतजाम है। मुझे राह चलते एक एजेंट मिलता है पूछता है बॉडी मसाज कराना है क्या...मैं कोई उत्सुकता नहीं दिखाता। कुछ होटल बिल्कुल समंदर के किनारे भी बने हुए हैं। हर साल गोवा आने वाले हमारे कई साथी साउथ गोवा में ही रुकना चाहते हैं।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
  (COLVA BEACH, SOUTH GOA, FISH AND FOOTBALL) 


Sunday, November 26, 2017

कोलवा (साउथ गोवा) के लाबेन में दो दिन

आपको गोवा घूमने के दौरान नार्थ गोवा में रुकना चाहिए या साउथ गोवा में। कई लोग ये सवाल करते हैं। ये आपकी रूचि पर निर्भर करता है। अगर आप भीड़भाड़ वाले इलाके में रुकना चाहते हैं तो नार्थ गोवा में कालांगुट इलाके में रुक सकते हैं। पर अगर आप शांत समंदर के साथ संवाद करना चाहते हैं तो आपको साउथ गोवा में रुकना चाहिए। एयरपोर्ट से दूरी की बात करें तो कोलवा 28 किलोमीटर है। पर अगर आप रेल से आ रहे हैं मडगांव रेलवे स्टेशन महज 8 किलोमीटर है।

वैसे आपके पास चार दिन से ज्यादा का समय हो तो नार्थ या साउथ कहीं भी रुककर पूरे गोवा में रुक सकते हैं। हमने दो दिन नार्थ और दो दिन साउथ में रुकना तय किया था। साउथ गोवा में हमारे होटल का नाम है ला-बेन रिजार्ट। वैसे नाम में रिजार्ट लगा है पर यहां स्विमिंग पुल नहीं है। हां होटल के प्रांगण में छोटा सा उद्यान है। पार्किंग का इंतजाम है।

होटल परिसर में दो रेस्टोरेंट हैं। एक नीचे गार्डेन रेस्टोरेंट है तो दूसरा रूफ टॉप रेस्टोरेंट। पर थोड़ा शोध करने पर पता चला कि दोनों रेस्टोरेंट का किचेन एक ही है। रूफ टाप के लिए आर्डर का खाना नीचे के रेस्टोरेंट से ही जाता है। लाबेन का गार्डेन रेस्टोरेंट कोलवा इलाके का बहुत लोकप्रिय रेस्टोरेंट है। दरें थोड़ी ज्यादा है पर देशी विदेशी सैलानियों का यह पसंदीदा फूड ज्वाएंट है। सुबह से लेकर शाम तक यहां लोगों की भीड़ लगी रहती है। शाम को कुछ खास दिवसों पर यहां म्युजिकल परफारमेंस भी होता है। हमें शाम को क्लेरियोनेट पर पुरानी फिल्म की संगीत की धुन बजती सुनाई देती है।


रुफ टॉप रेस्टोरेंट के बारे में होटल के मैनेजर बताते हैं कि वहां आप पिज्जा खाने जा सकते हैं। वैसे गोवा के ज्यादातर होटलों में बार होता है। इसलिए यहां भी बार है। साथ ही मांसाहारी व्यंजन भी परोसा जाता है इसलिए हमलोग वहां खाने नहीं गए।

कमरे के लिहाज से लाबेन बहुत बड़ा होटल नहीं है। कुल तीन मंजिले हैं। आप सीजन में डबल बेड रुम नान एसी 700 रुपये का है वहीं एसी रुम 950 रुपये का है। पर अक्तूबर से जनवरी तक गोवा के सभी होटल महंगे हो जाते हैं। लाबेन की लोकप्रियता का आलाम है कि यह सितंबर महीने में ही नवंबर दिसंबर के लिए पूरी तरह बुक हो चुका है।

लाबेन से कोलवा बीच का समंदर सिर्फ 300 मीटर की दूरी पर है। इसलिए यहां से दिन रात कभी भी आप समुद्र के किनारे जा सकते हैं। रात में आने जाने की कोई बंदिश नहीं है। होटल के आसपास कई शाकाहारी भोजनालय भी हैं। इसलिए आप शाकाहारी हैं तो अपना विकल्प चुन सकते हैं। आसपास मे शापिंग के लिए बाजार भी है। यानी मन लगने वाली जगह है। लाबेन वाले गोवा घूमने का पैकेज भी उपलब्ध कराते हैं। आप यहां एक दिन नार्थ गोवा एक दिन साउथ गोवा का मिनी बस से घूमने का पैकेज खरीद सकते हैं। बसें सुबह सुबह 9 बजे आपको होटल से ही ले जाएंगी। ये गोवा घूमने का बहुत ही सहज तरीका है। हालांकि हमलोग एक्टिवा किराये पर लेकर घूम रहे हैं इसलिए इस पैकेज का लाभ नहीं उठाया पर यह बेहतर विकल्प है गोवा घूमने के लिए।

-        विद्युत प्रकाश मौर्य 
 (SOUTH GOVA, COLVA, LA BEN RESORT ) 

Friday, November 24, 2017

कालांगुट से कोलवा बीच - उत्तर से दक्षिण

नार्थ गोवा में कुछ दिन गुजारने के बाद हमलोग चल पड़े हैं अब साउथ गोवा की ओर। इस बार कालांगुट में डोसा प्लाजा में नास्ता करने के बाद हमने पणजी के लिए लोकल बस ली। बस में ज्यादा भीड़ नहीं है। बस में महिला कंडक्टर हैं। 15 किलोमीटर का किराया 20 रुपये सवारी। बस में आगे चालक के पास केबिन है जहां सामान रखने के लिए काफी जगह है। मतलब की गोवा की इन लोकल बसों में आप लगेज लेकर भी आराम से चल सकते हैं। बस कंडोलियम और उसके बाद गोवा के कई गांवों से होकर गुजरी। रास्ते में मालिम आया, जहां फिशरमैन मार्केट था।
पणजी बस स्टैंड से शटल बस-  मंडोवी नदी का पुल पार करने के बाद बस ने पणजी बस स्टैंड में उतार दिया। पणजी से हमें मडगांव के लिए शटल बस सेवा मिल गई। शटल की खास बात है कि यह रास्ते में कहीं नहीं रुकती। किराया है 40 रुपये प्रति सवारी। सारी सवारियां मडगांव की ही हैं। इसी तरह की शटल पणजी से वास्कोडिगामा के लिए भी चलती है। गोवा के सभी प्रमुख शहरों और गांव  के बीच बसों का अच्छा नेटवर्क है। आप बस से सफर करके टैक्सी का भारी भरकम खर्च बचा सकते हैं। कई जगह फेरी सेवाएं भी चलती हैं। पणजी बस स्टैंड से मुंबई और महाराष्ट्र के दूसरे शहरों के साथ ही कर्नाटक के भी बेलगाम समेत आसपास के शहरों के लिए बसें संचालित होती हैं। आपको याद होगा अमिताभ बच्चन की फिल्म बांबे टू गोवा में फिल्म की कहानी बस के सफर के साथ चलती है।


मडगांव की शटल बस भरने के बाद हरे भरे रास्तों से होकर चल पड़ी। दोपहर में भी मौसम सुहाना है। हरे भरे रास्ते अच्छे लग रहे हैं। 
रास्ते में बस कहीं रुकी नहीं। कोई उतरने चढ़ने वाला भी नहीं। एक घंटे में हमलोग मडगांव बस स्टैंड में पहुंच गए हैं। यहां से मडगांव रेलवे स्टेशन और कोलवा बीच के लिए स्थानीय बसें मिलती हैं और आटो रिक्शा भी। हम आटोरिक्शा पूछ रहे थे तभी हमें  कोलवा बीच के लिए लोकल बस का पता चल गया। यह प्राइवेट बस है। हमलोग इस बस में सवार हो गए। हमारा लगेज कंडक्टर महोदय ने पीछे लगेज बाक्स में डाल दिया। इसमें किराया लगा 20 रुपये प्रति सवारी। यानी 60 रुपये। हालांकि मडगांव बस स्टैंड से कोलवा बीच की दूरी 6 किलोमीटर है। इतनी दूरी का आटो रिक्शावाले 150 रुपये किराया मांगते हैं। मडगांव में आटोरिक्शा भी टैक्सी की तरह बने हैं। इनके दरवाजे बंद होते हैं। काश की ऐसे ही सुंदर आटोरिक्शा दिल्ली में भी चलाए जाते। हालांकि आटोरिक्शा का किराया कुछ ज्यादा है।
खैर हम बस में सवार हैं। बस मडगांव पूरे शहर का चक्कर काटने के बाद कोलवा बीच की ओर चल पड़ी। स्कूल से छुट्टी का समय है इसलिए बस में छात्र छात्राओं की भीड़ है। मैं एक छात्रा से पूछता हूं बस में किराया लगता है या फिर फ्री में सफर। उसने बताया, नहीं किराया तो लगता ही है। सभी लोग बस से उतरते समय कंडक्टर को इमानदारी से किराया दे रहे हैं।
गोवा में मडगांव से कोलवा की बस। 


बस के कंडक्टर महोदय ने हमें बता दिया था कि आप निश्चिंत रहें आपको आपके होटल के सामने उतार दिया जाएगा। और वाकई बस धीरे धीरे चल रही थी इसलिए थोड़ा समय तो लगा। पर बेनालियम के बाद हमलोग कोलवा पहुंच चुके हैं। कोलवा यानी अब हम उत्तर गोवा छोड़कर दक्षिण गोवा में आ चुके हैं। समुद्र तट से थोडा पहले ही हमें बस कंडक्टर ने उतरने को कहा। समाने हमें ला बेन रिजार्ट दिखाई दे रहा था। अब अगले कुछ दिन अपना ठिकाना यहीं पर होगा। कोलवा बीच के बस स्टैंड से हर 20 मिनट पर मडगांव बस स्टैंड के लिए एक बस चलती है। अगर आटोरिक्शा करेंगे तो किराया 150 रुपये है। 
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
 ( CALANGUTE, MALIM, PANJI, MADGAON )