Tuesday, September 13, 2016

वांडुर की दोपहरी में शाकाहारी बंगाली थाली ((34))

रेड स्किन से सफर कर लौटने के बाद दोपहरी ढल रही है। हमारे सात वन विभाग के स्टाफ और पुलिस वालों की आज ड्यूटी भी खत्म हो चुकी है। सभी अपने घर की राह ले रहे हैं। घूमते घूमते हमारा सुबह का नास्ता पच चुका है। भूख लग गई है। वांडुर में महात्मा गांधी मरीन कांप्लेक्स के दफ्तर के बगल में दो समान्य किस्म के रेस्टोरेंट हैं। एक में मैंने सुबह पराठे खाए थे। खाने की थाली पूछा 80 रुपये की है। चावल की थाली। नाम है जंगल बाइट रेस्टोरेंट। शहर की ओर जाने वाली बस आने में अभी देर है।

बारिश रूक गई है। पर मौसम खुशनुमा है। मैं थोड़ा टहलने लगता हूं। अगले रेस्टोरेंट में जाता हूं। नाम लिखा है जॉलीबॉय रेस्टोरेंट। यह एक बंगाली भोजनालय है। इसको चलाने वाले एक बंगाली बाबू हैं। यहां भी 80 रुपये की थाली है। हमारे साथ आए बारपेटा असम वाले लोग भी यहीं पर खा रहे हैं। मैं भी खाने का आर्डर दे देता हूं। यहां चावल की थाली उपलब्ध है। इसमें चावल जितनी मर्जी खाएं। साथ में हमारी प्लेट के बगल में दाल सब्जियां आदि के मर्तबान सजा दिए जाते हैं। जो चीज जितनी मर्जी खुद निकाल कर खाते जाएं। ये कुछ भोज में बुफे जैसा है। अदभुत अंदमान के इन होटलों की खातिरदारी । सलाद और पापड़ भी है। अगर मछली खानी है तो अलग से। बंगाली मोसाय बड़े प्रेम से परोसते हैं। कहते हैं आराम से खाएं अभी बस आने में देर है। 

वे पूछते हैं वांडुर का समुद्र तट देखा क्या। हमने वांडुर का समुद्र तट पहले ही देख लिया था। मरीन कांप्लेक्स के आगे कई किलोमीटर तक सड़क के किनारे समुद्र है। पर यहां का समुद्र अपेक्षाकृत शांत है। लहरें नहीं उठ रही हैं। पर हरे भरे पेड़ पौधों के बीच समंदर का संगीत महसूस किया जा सकता है।

थोड़ी देर में बस आती है। यह प्राइवेट ऑपरेटर की बस है। इसका मार्ग वांडुर से मेडिकल का है। मेडिकल यानी सेल्युलर जेल। यानी मोहनपुरा बस स्टैंड के अलावा मेडिकल से भी वांडुर की बसें चलती हैं। मैं बस में 20 रुपये का टिकट लेकर बैठ जाता हूं। हमारे साथ कई मरीन कांप्लेक्सके स्टाफ भी लौट रहे हैं, जो रास्ते में उतर जाते हैं। बस हंफ्रीगंज से गुजर रही है। मैं उन महान शहीदों को मन ही मन नमन करता हूं जिन्हे जापानी सेना ने गोलियों से उड़ा दिया था। ये कुल 44 स्थानीय लोग थे जिन्हें जापानियों ने जासूस होने के आरोप में गोलियों से उड़ा दिया था।


 जुल्म की ऐसी कहानी बहुत कम मिलती है। यह काफी कुछ जलियांवाला बाग कांड से मिलता जुलता था।  बस आगे बढ़ती है, फिर गारमाचाना, भातू बस्ती होती हुई एयरपोर्ट रोड से गुजरती है। अब रास्ते कुछ जाने पहचाने से लगने लगे हैं। बस अबरडीन बाजार से होती हुई मेडिकल के पास पहुंचती है। मैं यहीं उतर जाता हूं। आज मेरे पास समय है शाम को पोर्ट ब्लेयर के बाजार में थोड़ी तफरीह करने के लिए । तो निकल पड़ता हूं अबरडीन बाजार की सड़कों पर। अब सारे रास्ते जाने पहचाने से हो गए हैं।

-         विद्युत प्रकाश मौर्य

No comments:

Post a Comment