Saturday, September 3, 2016

यह तीर्थ महातीर्थों का है, मत कहो इसे कालापानी ((26))

सेल्युलर जेल के मुख्य द्वार के बाहर एक सुंदर पार्क दिखाई देता है। यहां आजादी की लड़ाई के सात वीरों का प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं। इनमें से छह ऐसे लोग हैं जिन्होने जेल की अमानुषिक यातना के बीच यहीं पर अंतिम सांस ली।

 यहां आप इंदू भूषण रे, बाबा भान सिंह, मोहित मोइत्रा,  पंडित राम रक्खा बाली, महावीर सिंह, मोहन किशोर नामदास का प्रतिमाएं हमें ब्रिटिश अधिकारियों के खौफनाक जुल्म की कहानी सुनाती प्रतीत होती हैं साथ ही ये भी कहते प्रतीत होते हैं कि ये आजादी हमें कितनी मुश्किलों और बलिदानों के बाद मिली है।

शहीदों की याद में आओ आंखें नम कर लें
तो आइए उन शहीदों की चर्चा कर लें जो सेलुलर जेल की यातनाओं के दौरान अपने प्राण वतन के लिए न्योछावर कर गए। ऐसे छह शहीदों की प्रतिमा जेल के बाहर बने पार्क में लगाई गई है।

वीर बलिदानी इंदूभूषण रॉय - इंदू भूषण रॉय खुलना बंगाल के रहने वाले थे। अब यह शहर बांग्लादेश में आता है। उनका जन्म 1890 में हुआ था। उन्हें आजादी के आंदोलन की प्रमुख घटनाओं में से एक अलीपुर बम कांड के प्रमुख षडयंत्रकारी थे। 11 अप्रैल 1908 को चंदन के मेयर पर उन्होंने बम फेंका था। तब मेयर अपनी पत्नी के साथ भोजन कर रहा था। 2 मई 1908 को उन्हें मानिकतल्ला गार्डेन से गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें उनके चार साथियों समेत अलीपुर के मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। यहां उन्होंने अपना गर्व से अपना अपराध स्वीकार किया। इसके बाद उन्हें 10 साल की कठोर सजा सुनाई गई थी।
इस सजा के तहत उन्हें कालापानी भेजा गया।  दिसंबर 1909 में अंदमान पहुंचे। जेल में आते ही उन्हें इतनी कठोर शारीरिक और मानसिक यातना दी गई कि वे 29 अप्रैल 1912 को उन्होंने अपने प्राण खुद त्याग दिए। उन्होंने अपने शर्ट को फाड़कर रस्सी तैयार की और उसकी मदद से खंबे पर फांसी पर झूल गए। तब उनकी उम्र महज 22 साल थी। ( INDU BHUSHAN ROY ) 

पाबना के शहीद मोहित मोइत्रा

मोहित मोहन मोइत्रा पाबना ( अब बांगलादेश) के रहने वाले थे। उनका जन्म नतून भारेंगा में हेमचंद मोइत्रा के घर हुआ था। उनका संबंध जुगांतर पार्टी (रंगपुर समूह ) से था। 

मोहित की कोलकाता में 2 फरवरी 1932 को आर्म्स एक्ट में गिरफ्तारी हुई। पुलिस ने उनके घर से रिवाल्वर और विस्फोटक सामग्री बरामद की थी। अदालत में पेशी हुई। उनका अपराध कम आंका गया इसलिए उन्हें पांच साल की सजा का ऐलान हुआ। पर उन्हें भी कालेपानी के लिए रवाना कर दिया गया। 1932 में ही वे सेल्युलर जेल लाए गए। पर युवा मोहित मोहन ने 1933 में जेल में हो रहे जुल्म के खिलाफ महावीर सिंह के साथ ही भूख हड़ताल शुरू कर की। कई दिनों तक कुछ नहीं खाया तो 28 मई 1933 को उन्हे जेल अधिकारियों ने बर्बरतापूर्वक भोजन देने की कोशिश की। पर उन्होंने अन्न का निवाला नहीं लिया। इस जोर जबर के दौरान ही उनकी मौत हो गई। ( MOHIT MOHAN MOITRA ) 

शहीद मोहन किशोर नामदास - बंगाल के मेमन सिंह ( अब बांगला देश ) में जन्मे क्रांतिकारी मोहन किशोर नामदास, राज गोविंद नामदास के बेटे थे। वे कोलकाता की अनुशीलन पार्टी के सक्रिय सदस्य थे। अनुशीलन समिति कोलकाता के युवाओं का समूह था जो अखाड़े में दंड बैठक करके मजबूत शरीर बनाते थे। उनका लक्ष्य था हथियारों के बल पर क्रांति करके अंग्रेजों को देश से बाहर करना। इसी समिति के सदस्य मोहन किशोर को नेत्रकोना सोआरीकांडा एकरान राजनैतिक षडयंत्र कांड में वे अभियुक्त बनाया गया। उन्हें सात साल की कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी। इसके बाद उन्हें अंदमान के सेल्युलर जेल लाया गया था।

पर जेल की कठोर यातना के खिलाफ उन्होंने विद्रोह किया। वे भी 30 लोगों के साथ भूख हड़ताल में शामिल हुए। उन्हें भी 26 मई 1933 को भूख हड़ताल के दौरान जबरन भोजन खिलाने की कोशिश की गई। पर वे दबाव के आगे झुके नहीं। वे अन्य ग्रहण करने को तैयार नहीं हुए इसी  दौरान वे भूख से शहीद हो गए। (MOHAN KISHOR NAMDAS) 

यूपी के महान शहीद महावीर सिंह - अब बात एक महान शहीद की। महाीर सिंह शाहपुर जिला एटा, उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे। वे हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के सक्रिय सदस्य थे। शहीद महावीर सिंह का जन्म 16 सितंबर सन 1904 को एटा जिले के शाहपुर टहला ग्राम में क्षत्रिय परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम कुंवर देवी सिंह तथा माता का नाम शारदा देवी था। दोनों ही धार्मिक वृत्ति के व्यक्ति थे। 
पिता की देशभक्ति भावना तथा माता की भक्ति भाव प्रेरणा ने महावीर को भी देशप्रेम खून के साथ दिया था। महावीर सिंह 1925 में डीएवी कालेज कानपुर पढ़ने पहुंचे, जहां भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद आदि से उनकी मुलाकात हुई जो मित्रता में तब्दील हो गई। जिसके बाद वे मिशन कार्य से पंजाब, उत्तर प्रदेश तथा अन्य प्रदेशों में क्रांतिकारियों के साथ रहे। क्रांतिकारी मिशन को धन की आवश्यकता पर पंजाब नेशनल बैंक लूटने की योजना बनाई।

महावीर सिंह 1929 में लाहौर षडयंत्र कांड में गिरफ्तार किए जाने के बाद सजा के तौर पर पोर्ट ब्लेयर भेजा गया। उन्होंने जेल में जुल्म के खिलाफ भूख हड़ताल में हिस्सा लिया। बर्बरतापूर्वक भोजन खिलाने के दौरान 17 मई 1933 को शहीद हो गए। पर उनके मौत की खबर दूसरे कैदियों को कई दिनो के बाद लगी। जेल प्रशासन को डर था कि उनके शहादत की खबर से विद्रोह हो सकता है इसलिए उनके शव को चुपके से समुद्र में फेंक दिया गया था।  ( MAHAVIR SINGH, ETAH, UP) 

पंजाब के दो महान शहीदों की याद -  
लुधियाना के गदरी बाबा भान सिंह

बाबा भान सिंह जिला लुधियाना पंजाब के रहने वाले थे। युवा अवस्था में पहले वे शंघाई गए फिर वहां से अमेरिका चले गए। उन्होंने अमेरिका जाकर कारोबार करके खूब धन कमाया था। पर बाद में गदर पार्टी की प्रेरणा से वे आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। वे क्रांतिकारी हो गए।
लुधियाना जिले के सुनेत गांव के सरदार सावन सिंह का बहादुर सपूत 19 अक्तूबर 1914 को तोसामारू जहाज से कोलकाता पहुंचा। लक्ष्य था भारत में गदर पार्टी का प्रसार करना और देश को आजादी दिलाना। कोलकाता से ही उन्हे गिरफ्तार करके मिंटगुमरी जेल में भेजा गया। पर थोडे समय बाद ही छोड़ दिया गया। पर लाहौर षडयंत्र कांड में 1915 के फरवरी माह में उन्हें दुबारा गिरफ्तार किया गया। इस बार ब्रितानिया राज ने आजीवन कालेपानी की सजा सुनाई। भान सिंह के मन में अंग्रेजों के खिलाप काफी गुस्सा था। कहते हैं भान सिंह ने जेल में आते ही जेलर बैरी के मुंह पर जोरदार तमाचा जड़ दिया था। इसके बाद सेल्युलर जेल के वार्डरों ने उन्हें निर्दयतापूर्वक पीटा। परिणाम स्वरूप 1917 में वे शहीद हो गए। ( BABA BHAN SINGH, SUNET) 

होशियारपुर के शहीद पंडित रामरक्खा बाली

पंडित राम रक्खा बाली पंजाब के होशियारपुर जिले के रहने वाले थे। उनका जन्म ससौली गांव में हुआ था। वे पंजाब की मोहयाल बिरादरी से आते थे। मांडले षड्यंत्र कांड में उम्र कैद की सजा पाकर काला पानी पहुंचे थे।
सेल्युलर जेल अधिकारियों ने उनके जनेऊ धारण करने पर आपत्ति जताई तो उन्होंने जमकर प्रतिकार किया। यहां सवाल उनकी आस्था का था। इस पर वे चोट बर्दाश्त नहीं कर सकते थे।
ये मामला बढ़ता गया। बाद में उन्होंने जेल में भूख हड़ताल की। तीन महीने तक भूख हड़ताल पर रहे पर वे यातना के आगे झुके नहीं। अंततोगत्वा उन्होंने 1919 में प्राण त्याग दिए पर अपने जमीर से कोई समझौता नहीं किया। आज भी हर साल होशियारपुर के लोग उनकी शहादत को बड़ी शिद्दत और श्रद्धा के साथ याद करते हैं। ( RAM RAKHA BALI, HOSHIARPUR ) 


सेल्युलर जेल का निर्माण - लॉयल लेथब्रिज समिति की सिफारिशों के आधार पर सेल्युलर जेल के निर्माण की 13 सितंबर 1893 को जारी किया गया। जेल के निर्माण की प्रारंभिक योजना अभियंता डेविस ने तैयार की। कई बार योजना में बदलाव किया गया।
जेल के वास्तु की अंतिम योजना मैकक्यूलिन ने तैयार की थी। इसके निर्माण में कुल 5,17,329 रुपये का खर्च अनुमान था। पर निर्माण पूरा होने पर 7,83,994 रुपये खर्च आए। 31 दिसंबर 1881 में पोर्ट ब्लेयर में आए भूकंप को ध्यान में रखते हुए इसकी दीवारों को काफी मजबूत बनाया गया। बंदियों के लिए बने इस विशाल जेल का निर्माण बंदियों की सेना से ही करवाया गया।

गणेश दामोदर सावरकर सेलुलर जेल के बारे में लिखते हैं – यह तीर्थ महातीर्थों का है, मत कहो इसे काला पानी, तुम सुनो यहां की धरती के कण कण से गाथा बलिदानी जेल के प्रशासनिक ब्लाक में कभी जेलर और सहायक जेलर का दफ्तर हुआ करता था। अब यहां स्वतंत्रता सेनानियों की गैलरी और प्रथम तल पर नेताजी गैलरी है। यह सब कुछ देखने के बाद स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास को समझने में काफी मदद मिलती है। शाम होने वाला एक घंटे का ध्वनि प्रकाश शो अदभुत है। इसमें जेल में मौजूद प्राचीन पीपल का पेड़ सूत्रधार के तौर पर जेल बनने की कहानी सुनाता है। इसे अभिनेता ओमपुरी ने आवाज दी है। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य 

( ANDAMAN, PORTBLAIR, CELLULAR JAIL ) 

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शाम को लाइट एंड साउंड के दौरान सेल्युलर जेल। 

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