Friday, September 2, 2016

जुल्मो-सितम की हजारों दास्तां सुनाता- सेल्युलर जेल ((25))

कोई माता की उम्मीदों पर ना डाले पानी
उम्र भर के लिए हमें भेज के काले पानी।
गीत की इन पंक्तियोंके साथ शुरू होती है आजादी के लिए सालों तक हर पल जुल्मो सितम सह कर प्राण गंवा देने वाले रणबांकुरों की कहानी। दो सौ साल के ब्रितानिया जुल्म की कहानी सुननी हो तो देश में सेल्युलर जेल से मुफीद कोई जगह नहीं हो सकती। अंदमान निकोबार के पोर्ट ब्लेयर शहर में समंदर के किनारे स्थित यह जेल अब राष्ट्रीय स्मारक बन गया है। जहां हर रोज हजारों लोग ब्रिटिश जुल्म की कहानी को आकर देखते सुनते और महसूस करते हैं।

वापसी की उम्मीद नहीं इसलिए कालापानी -  कई लोगों का ये कौतुहल भरा सवाल हो सकता है कि आखिर अंदमान को कालापानी क्यों कहा जाता था। जबकि यहां समंदर का पानी तो नीला है। आबोहवा हमेशा से ही शानदार थी। तो जानिए इसका जवाब। वैसे तो अंदमान में ब्रिटिश सरकार ने कैदियों को भेजने का सिलसिला 1789 से ही शुरू कर दिया था। ब्रिटिश अपनी समझ से खतरनाक कैदियों को इस द्वीप पर भेजता था। एक बार जो यहां आ गया उसके वापस जाने की उम्मीद कम रहती थी, इसलिए देश में अंदमान कालापानी के नाम से मशहूर हो गया।

पहले वाईपर द्वीप के खुली जेल में रहते थे कैदी -  सेल्युलर जेल से पहले ज्यादातर कैदी वाईपर द्वीप पर खुली जेल में रखे जाते थे। पर यहां एक विशाल जेल बनाने का ख्याल बाद में आया।  25 अक्तूबर 1789 को सबसे पहले 820 कैदियों को इस द्वीप पर लाया गया। 22 जनवरी 1858 को अंदमान में यूनियन जैक लहराने के बाद 10 मार्च 1858 को 200 विद्रोही सिपाहियों को पिनल सेटलमेंट के तहत अंदमान लाया गया।

1896 में आरंभ हुआ सेल्युलर जेल का निर्माण -  सेल्युलर जेल जिसे इंडियन बैस्टिल भी कहा जाता है इसका निर्माण 1896 में आरंभ हुआ। 10 साल में 1906 में यह जेल बनकर तैयार हुई। यह जेल शहर के उत्तर पूर्व दिशा में अटलांटा प्वाइंट पर बनाई गई। आजकल इस जेल के बगल में मेडिकल कालेज और हास्पीटल है। यह जेल ब्रिटिश काल की राजधानी रॉस द्वीप के बिल्कुल सामने है। स्थान का चयन काफी सोच समझ कर किया गया था।

हर कैदी के लिए अलग सेल इसलिए सेल्युलर जेल -  इसका नाम सेल्युलर जेल इसलिए पड़ा क्योंकि इसमें हर कैदी के लिए अलग अलग सेल बनाए गए थे। इसका उद्देश्य था कि हर कैदी बिल्कुल एकांत में रहे और मनोवैज्ञानिक तौर पर बिल्कुल टूट जाए। हर सेल का आकार 13.5 फीट लंबा, 7 फीट चौड़ा और 10 फीट ऊंचा है। कोठरी में एक तरफ लोहे  के विशाल दरवाजे और दूसरी तरफ एक रोशनदान है जो तीन फीट चौड़ा और एक फीट ऊंचा है। जेल तीन मंजिला है।

साइकिल के पहिए जैसा आकार - इसका आकार साइकिल के पहिए जैसा है। अलग अलग सेक्सन साइकिल से स्पोक जैसे थे। इनमें से तीन हिस्से बचे हैं। अगर इसे आसमान से देखें तो साइकिल से चक्र की तरह दिखाई देता है।  जेल की बनावट ऐसी है कि कोई भी क्रांतिकारी अपने साथी कैदियों के संग मंत्रणा नहीं कर सकता था। कोठरियों बरामदा 4 फीट चौड़ा है। सभी बरामदे बीच में आकर एक टावर में मिलते हैं।

जेल में अंदर प्रवेश करने या बाहर निकलने के लिए एक ही रास्ता है। कैदियों को आम तौर पर सेल से बाहर 24 घंटे में तीन बार ही निकाला जाता था। साल 1906 से लेकर 1947 के बीच इस जेल में हजारों आजादी रणबांकुरे आए जिन्होंने सालों इन सलाखों के पीछे जुल्म सहे, इनमें से कई कठोर यातना का शिकार होकर यहीं शहीद हो गए।

मोरारजी देसाई ने राष्ट्र को समर्पित किया -  
11 फरवरी 1979 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने सेल्युलर जेल को राष्ट्रीय स्मारक के तौर पर राष्ट्र को समर्पित किया। शहीदों की याद में बलिदान वेदी स्तंभ की स्थापना की गई है। जेल परिसर में आप फांसी घर, नेताजी गैलरी और प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की दीर्घा देख सकते हैं। जेल के प्रशासनिक भवन वाले क्षेत्र में जेल पर आधारित संग्रहालय है।

693 सेल बनाए गए थे कुल सेल्युलर जेल में
03 करोड़ ईंटो का इस्तेमाल हुआ निर्माण में
10 साल का समयलगा निर्माण में
07 हिस्से थे कुल सेल्युलर जेल के
03 हिस्सों का ही अस्तित्व बचा है आजकल
291 कोठरियां फिलहाल देखी जा सकती हैं

सेल्युलर जेल सुबह 8.30 से शाम 5 बजे तक दर्शकों के लिए खुला रहता है। प्रवेश टिकट 30 रुपये है। हर सोमवार को जेल बंद रहता है। शाम को 6.00 बजे से हिंदी में और 7.00 बजे से अंग्रेजी में एक घंटे का लाइट एंड साउंड शो होता है।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य

(ANDAMAN, PORT BLAIR, CELLULAR JAIL ) 

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