Friday, September 30, 2016

तारकेश्वर की वह शुद्ध शाकाहारी थाली

बाबा तारकेश्वर नाथ के दर्शन करके बाहर निकला हूं। सुबह के 10 बजे हैं। कोलकाता से चलते हुए नास्ता नहीं किया है। अब दर्शन के बाद खाने की सोच रहा हूं। तारकेश्वर मंदिर से रेलवे स्टेशन के रास्ते में कई शाकाहारी भोजनालय हैं। इनमें से कई सड़क पर खड़े होकर आते जाते श्रद्धालुओं को खाने के लिए बुला रहे हैं। शाकाहारी चावल की थाली खाइए। वे अपना मीनू भी गिना रहे हैं। इनमें से कई हिंदी में भी आवाज लगा रहे हैं। हमें रास्ते में एक गोस्वामी भोजनालय दिखाई देता है। वे भी राह चलते लोगों को खाने के लिए रोक रहे हैं। इससे पहले हमने देखा एक नास्ता घर में लोग चावल का दाना यानी फरही को सब्जी के साथ खा रहे हैं। ऐसी प्लेट 10 रुपये की है। मैं गोस्वामी भोजनालय में रुक जाता हूं। उनका मीनू पूछता हूं। 40 रुपये की थाली में चावल, दाल, एक कद्दू की सब्जी, एक भुजिया, अचार आदि। मैं 40 की थाली आर्डर कर देता हूं। फिर उनसे 50 वाली थाली और 70 वाली थाली का मीनू पूछता हूं। वे बताते हैं 50 वाली थाली एक आलू गोभी सब्जी और बढ़ जाएगी।अगर 70 वाली थाली करते हैं तो दो और सब्जियों के साथ पापड़ भी आएगा। मैं कहता हूं, ठीक मेरी थाली 70 वाली कर दो।

 अब वे फटाफट अपनी और सब्जियां लाते हैं। इसमे केले का कोफ्ता शामिल है। वे मुझे थाली में खट मीठी सब्जी भी पेश करते हैं जिसका स्वाद काफी अच्छा है। इनकी भूजिया तो अलग तरह की है। बारीक कटी सब्जी को तल दिया गया है। बंगाल में चावल यानी भात मुख्य भोजन होता है। सिर्फ बंगाल ही क्यों पूरे दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर में भी चावल मुख्य भोजन है। हम यूं कहें कि पूरे देश का 70 फीसदी आबादी चावल को मुख्य भोजन के तौर पर लेती है तो कुछ गलत नहीं होगा।
गोस्वामी निरामिष होटल का चावल का स्वाद भी अच्छा है। आम तौर पर मैं मोटे दाने वाले उसना चावल को खाना पसंद नहीं करता। पर इनका चावल महीन है। सो खाकर अच्छा लगा। सड़क के दोनों तरफ आमने सामने गोस्वामी भोजनालय है। चलते चलते मैं उनके मैनेजर को धन्यवाद देता हूं और खाने की तारीफ करता हूं। वे खुश होते हैं। गोस्वामी होटल का खाना हावड़ा रेलवे स्टेशन के आसपास के सस्ते होटलों से काफी अच्छा है। सबसे बड़ी बात कि वे खाना दक्षिण भारत के कुछ होटलों की तरह केले के पत्ते पर परोस रहे हैं। चावल केले के पत्ते पर दाल सब्जी अलग अलग कटोरियों में। खाने के दौरान वे बार बार और भी कुछ लेना हो तो पूछ रहे हैं। चावल दोबारा लेने पर अलग से चार्ज है पर दाल सब्जियां ले सकते हैं।

रेलवे स्टेशन के रास्ते में कुछ और निरामिष होटल वाले खाने के लिए बुला रहे हैं। पर मैं तो अब छककर खा चुका हूं सो उनकी ओर ध्यान नहीं देता। रेलवे स्टेशन के रास्ते में फिर वही पंडा बापी बनर्जी मिल जाते हैं किसी नए यजमान की तलाश में घूम रहे हैं। मैं उनसे भी विदाई का नमस्कार कहता हूं। वे अपना कार्ड देते हैं। जय तारकेश्वर नाथ।    
(BENGAL, TARKESHWAR NATH, RICE PLATE, FOOD ) 

Tuesday, September 27, 2016

कोलकाता में पानी ऐसी की बरबादी

कोलकाता के एमजी रोड पर यूं बरबाद होता है पानी....
सिटी ऑफ जॉय यानी आनंद नगर। पर इस आनंद नगर के कई बेतकल्लुफ चेहरे भी हैं। कोलकाता के एमजी रोड के नलों पर मेरी नजर जाती है। इनमें अनवरत पानी आता रहता है। कोई बंद करने वाली टोंटी नहीं लगी है। लोग भरें तो ठीक नहीं भरें तो लगातार पानी बरबाद होता रहता है। सुबह शाम जब इन नलों में पानी आने का समय होता है, आसपास के लोग बाल्टियां और बोतल लेकर पहुंच जाते हैं। जब वे अपनी बाल्टियां भर कर चले जाते हैं जब पानी सड़कों पर बिखरने लगता है। थोड़ी देर बाद देखता हूं एक टैक्सीवाला आता है। अपनी टैक्सी रोकता है। पानी पीने के बाद वह इस पानी से अपनी टैक्सी की धुलाई करने लगता है। 

टैक्सी धुलाई के बाद टैक्सी वाला चला जाता है, पर नल से पानी आने का सिलसिला अनवरत जारी रहता है। लोहे का शाही नल। उससे तेज गति से निकलता पानी। कुछ सड़क पर दिन गुजारने वाले लोग साबुन और बाल्टी लेकर आते हैं, यहीं नहाना शुरू कर देते हैं।
कोलकाता - एमजी रोड पर कुछ यूं बरबाद होता है पानी 
 कुछ लोगों ने मुझे बताया कि कोलकाता के इस इलाके में नल में पानी इतने फोर्स में आता है कि इसमें टोंटी लगाने में कामयाबी नहीं मिलती। या कि लोग टोंटी निकाल कर फेंक देते हैं। मुझे गांधी जी याद आते हैं जिन्होंने किसी भी शहर में टपकते नल को बंद करने का संदेश दिया था। पर ये संदेश यहां बेमानी लगते है।

कभी कभी ऐसा लगता कि दीदी के बंगाल और उसकी राजधानी कोलकाता में पानी को कोई कमी नहीं। पर ऐसा नहीं है। कोलकाता के कई इलाकों में लोगों को इसी उदारता से पानी नहीं मिलता।

सुबह में आता है गंगा का पानी - बड़ा बाजार, एमजी रोड समेत कोलकाता के कुछ इलाकों में हुगली नदी का पानी अलग से सप्लाई होता है। इसे लोग यहां गंगा जल कहते हैं। यह पानी सुबह आता है। इसके सप्लाई के पाइप में भी कोई नल (टोंटी) नहीं लगा होता। बंद करने का कोई इंतजाम नहीं। 

कोलकाता - एमजी रोड पर कुछ यूं बरबाद होता है पानी 

जब पानी आता है तो जमकर आता है। लोग इस पानी का इस्तेमाल स्नान करने और कपड़े धोने के लिए करते हैं। बच्चे तो इसमें कूद कूद कर नहाते हैं। 
ऐसा करें भी क्यों नहीं गंगा जी खुद चलकर उनके द्वार पर जो आई हैं। ऐसा और कहीं होता है क्या...ये सिटी ऑफ जॉय है भैया। सुना है कि कोलकाता के लोगों को पानी का बिल भी बहुत मामूली देना पड़ता है। तो ये कोलकाता है जमकर उड़ाओ मौज और पीओ पानी... कवि रहीम ने कहा था, रहिमन पानी राखिए...बिन पानी सब सून...पर यहां उनकी बातों का कोई मतलब नहीं। 

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

(BENGAL, KOLKATA, WATER, MG ROAD) 

Monday, September 26, 2016

पुरानी यादों को समेटे कोलकाता का एमजी रोड

कोलकाता का एमजी रोड मतलब महात्मा गांधी रोड। वैसे तो एमजी रोड देश के ज्यादातर शहरों में मिल सकता है। पर कोलकाता के एमजी रोड की खासियत है कि यह तमाम नवीनताओं को अपने में समाहित करते हुए तमाम प्रचीनताओं को अपने साथ लिए आगे बढ़ रहा है। 

इस सड़क पर चलते हुए आपको एक ओर आधुनिक स्टोर दिखाई दे जाएंगे, तो दूसरी ओर तमाम पुरानी दुकाने यहां मूल स्वरूप में दिखाई देती है। बड़े बड़े शो रूम के बीच लकड़ी से खराद कर कई तरह के फर्नीचर बनाने वाले बचे हुए हैं। वहीं कालेज स्ट्रीट से आगे कई बैंड  बाजा पार्टी वालों के दफ्तर एक साथ नजर आते हैं।
कभी था नाम हेरिसन रोड - ऐतिहासिक तौर पर एमजी रोड का नाम हैरिसन रोड हुआ करता था। पर आजादी के बाद इसका नामकर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के नाम पर किया गया। यह उत्तर कोलकाता पूरब और पश्चिम को जोड़ता है। यूं कह ले कि यह कोलकाता के दो प्रमुख रेलवे स्टेशन हावड़ा और सियालदह को भी जोडने काम करता है तो गलत नहीं होगा। 1889 में यह कोलकाता शहर की पहली सड़क थी जो बिजली की रोशनी से जगमग हुई थी। यहां आपको यह याद दिलाना भी जरूरी होगा कि देश में बिजली पहली बार कोलकाता शहर में ही आई थी। टैगोर ने अपनी एक कविता में भी हैरिसन रोड की चर्चा की थी।
एमजी रोड पर कई लोकप्रिय होटल के अलावा कालेज स्ट्रीट चौराहा पड़ता है। यहां पर पुरानी किताबों का बहुत की प्रसिद्ध बाजार है। सड़क के साथ साथ एमजी रोड पर बीचों बीच से ट्राम गुजरती है। एमजी रोड की शुरुआत हावड़ा ब्रिज के बाद से होती है। यह सड़क सियालदह स्टेशन होती हुई आगे बढ़ती है। कालेज स्ट्रीट से आगे इस रोड पर कोलकाता मेट्रो का एमजी रोड नामक मेट्रो स्टेशन भी है। यहीं से चितरंजन एवेन्यू नामक सड़क एमजी रोड को क्रास करती है। हावड़ा ब्रिज के बाद एमजी रोड पर बायीं तरफ बड़ा बाजार तो दाहिनी तरफ प्रसिद्ध बहु बाजार के इलाके आते हैं। बड़ा बाजार के पास इस रोड पर गुरुद्वारा बड़ा सिख संगत है जो कोलकाता का प्रमुख गुरुद्वारा है।

सियालदह रेलवे स्टेशन पर एमजी रोड फ्लाई ओवर से गुजरता है। नीचे आचार्य जगदीश चंद्र बोस रोड है। एमजी रोड पर पैदल घूमते हुए आप प्राचीन और नवीन कोलकाता के दर्शन कर सकते हैं। एक ओर सैकड़ो साल पुरानी दुकानें दिखाई देंगी तो दूसरी और नई नवेली फैशन की दुकाने। एमजी रोड पर कुछ पुरानी खादी की दुकाने हैं जहां आप सस्ते खादी के वस्त्र खरीद सकते हैं। कोलकाता में ठहरने के लिए एमजी रोड पर कई मध्यम वर्गीय होटल हैं। यहां रहने का फायदा है कि यहां से हावड़ा और सियालदह दोनों ही रेलवे स्टेशन काफी निकट हैं।

सियालदह स्टेशन से बाहर निकलने के बाद एमजी रोड पर चलते हुए आपको कई मध्यमवर्गीय होटल मिल जाएंगे। इस रोड पर हावड़ा और सियालदह के बीच लगातार बसें भी चलती रहती हैं। सुबह से लेकर देर रात तक। सड़क के दोनों तरफ फुटपाथ बना है। पर इन फुटपाथों पर भी दिन भर दुकानें लगी रहती हैं। इन दुकानों पर आप कपड़े किताबें और तमाम दूसरी चीजें खरीद सकते हैं। हालांकि ये फुटपाथ की दुकानें शहर में भीड़ बढ़ाती हैं और मुख्य दुकानों की बिक्री पर बुरा असर डालती हैं। पर साम्यवादी सरकार की अवशेष के तौर पर इन दुकानों को हटाना आने वाली किसी सरकार के लिए काफी मुश्किल होगा।
- विद्युत प्रकाश मौर्य
(MG ROAD, KOLKATA, BENGAL )
  




Saturday, September 24, 2016

बैरकपुर और 1857 के शहीद मंगल पांडे

सिपाही विद्रोह यानी 1857 की क्रांति। कुछ इतिहासकार इसे क्रांति नहीं मानते। पर भारत में ब्रिटिश हूकुमत के खिलाफ देश के कई हिस्सों से आवाजें उठी थीं, कई जगह बड़ा विद्रोह हुआ। इन विद्रोह के नायकों में से एक थे मंगल पांडे। कौन मंगल पांडे। भोजपुरिया माटी के सपूत, मंगल पांडे का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में हुआ था। उन्होंने विद्रोह का बिगुल फूंका बंगाल के बैरकपुर कैंटोनमेंट में। बचपन से मंगल पांडे का नाम सुनता आया था, इसलिए बंगाल में बैरकपुर को देखने की इच्छा थी जहां मंगल पांडे ने विद्रोह किया।

सियालदह रेलवे स्टेशन से लोकल ट्रेनें जाती हैं। मैं बैरकपुर का टिकट लेकर लोकल में बैठ जाता हूं। बैठ नहीं खड़ा ही रहता हूं। भीड़ है बैठने की जगह नहीं मिली। विधाननगर, दमदम जंक्शन, बेलगढ़िया, आगरपाड़ा, सोदेपुर, खड़दह, टीटागढ़ इसके बाद आ गया बैरकपुर। हालांकि ट्रेन रानाघाट तक जा रही है।
बैरकपुर रेलवे स्टेशन के बाहर लस्सी की दुकानें 
बैरकपुर रेलवे स्टेशन से बाहर आता हूं। ढेर सारी लस्सी की दुकाने हैं। लोगों से मंगल पांडे उद्यान पूछता हुआ आगे बढ़ता हूं। सड़क का नाम एसएन बनर्जी रोड है। आगे चिड़िया मोड़ आता है। यहां से लोकल बस  में बैठ जाता हूं। थोड़ी दूर आगे कैंटोनमेंट एरिया शुरू हो जाता है। बस कंडक्टर हमें मंगल पांडे पर उतार देता है। 

कैंटोनमेंट एरिया में यहां सड़क के किनारे मंगल पांडे की प्रतिमा लगी है। इस पर उनका परिचय लिखा है --  मंगल पांडे का जन्म 19 जुलाई 1827 को उपरी बलिया जिले के नगवा गांव में भूमिहार ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उन्होंने 1949 में 22 साल की उम्र में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में नौकरी शुरू की। वे 34 बंगाल नेटिव इन्फेंटरी के 6ठी कंपनी में सिपाही थे। उन्हें अपने रेजिमेंट के कई अफसरों पर हमला करने के लिए प्रमुखता से जाना जाता है। सन 1857 की यह घटना भारत का पहले स्वतंत्रता संग्राम के तौर पर जानी जाती है। विद्रोह के लिए मंगल पांडे का कोर्ट मार्शल हुआ। उन्हें 7 अप्रैल को फांसी की सजा सुनाई गई  और 8 अप्रैल 1857 को बैरकपुर के लाल बगान में फांसी पर लटका दिया गया।

इस चित्र के अलावा बैरकपुर छावनी में मंगल पांडे की स्मृति में और कुछ दिखाई नहीं देता। काले रंग के मंच पर लाल रंग की मूंछ और पगड़ी में मंगल पांडे की प्रतिमा लगी है। पास में एक सुंदर चर्च है जिसका नाम सेंट बार्थलेम्यू कैथेड्रल है। बैरकपुर छावनी आज भी आबाद है। अब यह भारतीय सेना की प्रमुख छावनी है।

विद्रोही मंगल पांडे,  1446 नंबर के सिपाही ने 29 मार्च 1857 को दो ब्रिटिश अधिकारियों सार्जेंट मिस्टर जेम्स ह्यूसन और मिस्टर बेंपडे हेनरी वाग को मौत के घाट उतार दिया। वे 1857 के प्रथम बलिदानी थे। वे पहले सिपाही थे जिन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों पर गोली चलाने का साहस किया। मंगल पांडे के पिता का नाम सुदिष्ट पांडे था। वे तीन भाइयों में बड़े और अविवाहित थे। 

मंगल पांडे को दमदम छावनी के एक खलासी से जानकारी मिली थी कि जो नया एनफील्ड पी 53 कारतूस उन्हें दिया जाता है कि उसमें गाय और सूअर की चर्बी होती है। उस कारतूस को मुंह से लगातर खोलना पड़ता था। वे समझ गए कि अंग्रेज हमारा धर्म भ्रष्ट करने पर आमदा हैं। उन्हें अंदर विद्रोह की ज्वाला धधकने लगी। कारतूस वाली खबर से हिंदू और मुस्लिम दोनों सिपाही नाराज थे। मंगल पांडे की शहादत की खबर पूरे देश में आगर की तरह फैली। मंगल पांडे को फांसी दिए जाने के एक महीने बाद 10 मई 1857 को मेरठ छावनी में भी विद्रोह हो गया। मंगल पांडे का फांसी का आदेश जबलपुर के सेना के आयुध कोर संग्रहालय में देखा जा सकता है।    

मैं बैरकपुर से वापसी के लिए मैं चिड़िया मोड से सीधे कोलकाता धर्मतल्ला वाली बस लेता हूं।
ये बस टीटागढ़, सोडेपुर, डनलप, नेताजी कालोनी, बीटी रोड, उलटाडांगा, गिरिश पार्क, चितरंजन एवेन्यू होती हुई एमजी रोड पहुंचती है। मैं अपने सहयात्री से पूछता हूं कि बड़ा बाजार कहां से नजदीक पड़ेगा।उनकी दी जानकारी के मुताबिक मैं एमजी रोड पर ही उतर जाता हूं। क्योंकि शाम को मैं एमजी रोड पर घूमना चाहता हूं। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य-vidyutp@gmail.com       


अगली कड़ी में पढ़िए - एमजी रोड की एक शाम 

(MANGAL PANDY, KOLKATA, 1857 , BALIA ) 

Thursday, September 22, 2016

सिटी ऑफ जॉय – यानी कोलकाता में

कोलकाता - नेताजी सुभाष इंटरनेशनल एयरपोर्ट तक रिक्शा भी बस भी। 
कोलकाता कई बार आया हूं। पर इस बार जुलाई 2016 में उड़कर पहुंचा हूं। वह भी पोर्ट ब्लेयर से। ऐसा लगा मानो चुपके से छठी बार इस शहर में घुस आया हूं। क्योंकि इससे पहले कोलकाता हमेशा हावड़ा रेलवे स्टेशन पर रेल से पहुंचा हूं। बंगाल की खाड़ी के ऊपर से उड़ान भरता हुआ जहाज कब बंगाल के खेतों के ऊपर कुलांचे भरने लगा पता ही नहीं चला। आसमान में बादल छाए थे। नीचे कुछ नजर नहीं आ रहा था। खराब मौसम की चेतावनी दी गई थी। अचानक कैप्टन ने ऐलान किया हम कुछ ही देर में कोलकाता उतरने वाले हैं। हरे भरे खेतों कि क्यारियां नजर आने लगी थीं। थोड़ी देर में शहर दिखाई देने लगा। इसी बीच हमारा विमान कोलकाता के नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतररराष्ट्रीय हवाई अड्डे के रनवे पर तेजी से दौड़ लगा रहा था। विमान रूकते ही लोग उतरने की तैयारी करने लगे। कोलकाता एयरपोर्ट काफी कुछ दिल्ली के टी 3 जैसा भव्य नजर आ रहा है। हमलोग एयरब्रिज से सीधे लांज में आ गए। चूंकि कोलकाता का यह एयरपोर्ट अंतरराष्ट्रीय है तो हमें यहां रायल भूटान एयरलाइन्स का विमान शान से खड़ा दिखाई देता है। भूटान, हमारा प्यारा पड़ोसी देश। उसका विमान भी बड़ा प्यारा सा है। हल्की बारिश में वह और भी निखरा दिखाई दे रहा है। आपको यहां से भूटान के पारो के लिए उड़ान मिल जाएगी, जो भूटान का एकमात्र एयरपोर्ट है। 
कोलकाता - बारिश की बूंदों के बीच भूटान एयरलाइंस का विमान। 

 तमाम उतरने वाले लोग घर जाने से पहले एयरपोर्ट पर अपनी सेल्फी लेने में व्यस्त हैं। लांज में लंबी पदयात्रा के बाद बाहरी द्वार तक पहुंचना हुआ। विमान में मांसाहारी खाना खाकर मेरा पेट खराब हो गया था। मुझे अंडे से भारी एलर्जी है। हालांकि परिचारिका ने कहा था, इसमें अंडा नहीं है, पर जो चिकन कोरमा था वह मुझे हजम नहीं हुआ। टायलेट में पहुंचा। आधे घंटे तक कई उल्टियां हुई। तब जाकर थोड़ी शांति मिली। कोलकाता एयरपोर्ट से बाहर एसी बसें चलती हुई दिखाई दीं हावड़ा रेलवे स्टेशन के लिए। किराया वाजिब है 45 रुपये। पर मुझे तो सियालदह जाना है। वहां के लिए एसी बस नहीं है। भद्रलोक के इस शहर में एयरपोर्ट के प्रवेश द्वार तक साइकिल रिक्शे वाले पहुंच जाते हैं।


पर कोलकाता के एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही भारतीय रेलवे का विमान बंदर नामक लोकल ट्रेन का रेलवे स्टेशन है।हालांकि यहां तक दिन भर में लोकल ट्रेनें बहुत कम आती हैं। पर चेन्नई एयरपोर्ट के ठीक सामने त्रिशूलम रेलवे स्टेशन से आप लोकल लेकर कहीं भी जा सकते हैं।
खैर कोलकाता एयरपोर्ट से थोड़ा पैदल चलने पर आप मुख्य मार्ग पर आ सकते हैं जहां से कहीं भी जाने के लिए लोकल बसें मिल जाती हैं। एयरपोर्ट परिसर में टैक्सी स्टैंड भी है। कोलकाता में टैक्सी किराया दिल्ली से भी कम है, साथ ही टैक्सी वाले कहीं भी जाने से मना नहीं कर सकते।

खैर मैं मुख्य सड़क पर पहुंचा, थोड़े इंतजार के बाद सियालदह रेलवे स्टेशन की तरफ जाने वाली बस मिल गई, किराया 12 रुपये। बस कोलकाता शहर के बागौती, कृष्णानगर, केष्टोपुर, उल्टाडांगा, मानिकतल्ला, नरकेलडंगा, सीआईटी रोड के बाद बेलाघटिया मेन रोड होती हुई आगे बढ़ रही है। इसके बाद सियालदह रेलवे स्टेशन आ जाता है। मैं बस से उतर जाता हूं। 
हालांकि कोलकाता में मेरे कई परिचित और रिश्तेदार रहते हैं, पर इस बार किसी के घर नहीं जाता हूं क्योंकि कम समय में कुछ काम निपटाने हैं। अगले दिन मेरी ट्रेन सियालदह रेलवे स्टेशन है इसलिए सियालह स्टेशन के सामने आचार्य जगदीश चंद्र बोस रोड पर अशोका होटल में अपना ठिकाना बनाता हूं। यहां मुझे छोटा सा वातानुकूलित कमरा 800 रुपये में मिल जाता है। होटल की बिल्डिंग में यूको बैंक की शाखा भी है। पोर्ट ब्लेयर से सुबह नहा कर चला था पर कोलकाता की उमस भरी गर्मी में एक बार फिर स्नान करने की इच्छा हो रही है।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य
(KOLKATA, AIRPORT, CITY OF JOY, LOCAL TRAIN, BUS )



       

Tuesday, September 20, 2016

छोड़ चले हम ये गलियां...जाने फिर कब होगा आना...((41))

पोर्ट ब्लेयर से हमारी वापसी की फ्लाइट कोलकाता तक के लिए है। एयर इंडिया की इस उड़ान का समय सुबह 8.35 बजे तय है। मैं सुबह 5 बजे ही जग कर स्नान करके तैयार हो जाता हूं। होटल ड्रिम पैलेस का प्रवास काफी सुखद रहा। हैडो से सुबह 5 बजे से ही मेडिकल वाली बसें चलने लगती है। वादे के मुताबिक मोउनुद्दीन भाई के पास चाय पीने जाता हूं। चाय पीने के बाद होटल ड्रिम पैलेस से चेकआउट कर लोकल बस में बैठ जाता हूं। पांच रुपये का टिकट लेकर गोलघर उतर जाता हूं। वहां से आगे पैदल चल पड़ता हूं, जंगलीघाट,  डेयरी फार्म उसके बाद लांबा लाइन। कोई डेढ़ किलोमीटर पदयात्रा या यूं कहें सुबह की सैर के बाद पौने सात बजे वीर सावरकर हवाई अड्डे के प्रवेश द्वार पर हूं।
छोटे से एयरपोर्ट पर आगमन और प्रस्थान टर्मिनल आसपास ही बने हैं। पोर्ट ब्लेयर का ये एयरपोर्ट जापान ने 1941 से 1943 के बीच अपने शासनकाल में बनवाया था।
पोर्ट ब्लेयर में आखिरी दिन की सुबह। 
भले एयरपोर्ट का भवन छोटा है पर एयर पोर्ट का रनवे पर्याप्त लंबा है। इसके आगे का हिस्सा सेना के हवाले है। सुरक्षा जांच के बाद अंदर पहुंचता हूं। एयर इंडिया के काउंटर पर बोर्डिंग पास के लिए पहुंचता हूं। मुझे मेरी इच्छित सीट मिल जाती है जो मैंने ऑनलाइन जाकर एयर इंडिया के वेबसाइट पर मार्क की थी। यह खिड़की के पास वाली 16ए है। सुबह यहां से चेन्नई के लिए जेट का विमान हमारे विमान से पहले उड़ान भरने वाला है। जेट के पैसेंजर के चेकइन के बाद हमारी बारी आती है। तब तक छोटे से हाल में बैठकर इंतजार। इस दौरान मैं अखबार पढ़ना शुरू करता हूं। इन्फो इंडिया एयरपोर्ट पर उपलब्ध है। यह हिंदी का आठ पन्नों का अखबार है।

एयरपोर्ट पर जितने टीवी लगे हैं उस पर जैन टीवी चैनल आ रहा है। इसमें सुबह के समय धार्मिक कार्यक्रम चल रहा है। इसके बाद रात का पुराना बुलेटिन दुबारा प्रसारित हो रहा है। प्रस्थान लांउज में अंडमान प्रशासन का सरकारी बिक्रय स्टाल सागरिका बना हुआ है। यहां अंदमान की तमाम वस्तुएं उपलब्ध है। कई लोग लकड़ी की वाल हैंगिंग खरीद रहे हैं। मैं यहां से काली मिर्च खरीदता हूं जो मैं नार्थ बे द्वीप पर नहीं खरीद पाया था। सागरिका का बड़ा शो रूम पोर्ट ब्लेयर के मिडल प्वाइंट पर है। आप वहां से जरूर कुछ यादगारी शापिंग करें।
इंतजार अपनी बारी का....पोर्ट ब्लेयर एयरपोर्ट पर। 
थोड़ी देर में कोलकाता की उड़ान के लिए घोषणा होती है। सभी लोग दौड़कर लाइन में लग जाते हैं। मानो उन्हे विमान छोड़ जाएगा। टिकट चेक करने के बाद बस में बैठने को कहा जाता है। हालांकि गेट से विमान की दूरी 200 मीटर से ज्यादा नहीं है। पैदल भी पहुंचा जा सकता है। पर हम बस से पहुंचते हैं। कोलकाता को उड़ान भरने वाला विमान ए 319 है। इसमें बैठने की क्षमता ए 320 से कम है। कुल 144 सीटें ही हैं। प्रवेश के लिए दो द्वार खुले हैं। मैं पिछले द्वार से प्रवेश करता हूं। उड़ान संख्या एआई 0788  सुबह 8.35 की जगह विमान 8.50 में उड़ान भरता है। मैं पोर्ट ब्लेयर की धरती को नमन करता हूं, इस उम्मीद के साथ की दोबारा आना होगा। जहाज के कैप्टन पी बोस हैं, क्रू इंचार्ज हैं अदिती।

 मैंने शाकाहारी खाने का पंसद भरा था। पर शाकाहारी थाली खत्म हो गई। मजबूरी में मांसाहारी प्लेट ले लेता हूं। पर यह खाना मुझे भारी पड़ गया। खाने की गुणवत्ता खराब थी। मेरा पेट कोलकाता उतरते ही खराब हो गया। मेरे बगल वाली सीट पर बंगाल के मिदनापुर शहर की दो महिलाएं हैं जो एलटीसी में पोर्ट ब्लेयर घूमने के बाद घर लौट रही हैं। थोड़ी देर उनसे बातें करता हूं। उनकी यात्रा के अनुभव सुनता हूं। फिर अखबार पढ़ता हूं। विमान में कोलकाता का टेलीग्राफ और दूसरे बिजनेस अखबार भी उपलब्ध हैं। 
  
कोलकाता की ओर उड़ान में ...

कोलकाता की इस उड़ान में भी खराब मौसम की उदघोषणा बार बार हुई। आसमान में समंदर के ऊपर यह सुनकर मन घबराता है। 10.05 में सीट बेल्ट बांध लेने का ऐलान हुआ। फिर सीट बेल्ट खोलने का ऐलान नहीं हुआ, पर 10.55 में ऐलान हुआ कि हम थोड़ी देर में कोलकाता उतरने वाले हैं। पहले हरे भरे खेत दिखाई दिए,  फिर सिटी ऑफ जॉय यानी कोलकाता शहर की इमारते दिखाई देने लगीं। अचानक हम आसमान से जमीन पर थे, अब विमान रनवे पर कुलांचे भर रहा था और यात्री अपना अपना मोबाइल  ऑन कर अपने घरवालों को पहुंचने की जानकारी दे रहे थे।

-         विद्युत प्रकाश मौर्य 
( ANDAMAN, PORT BLAIR, AIR INDIA, FOOD, KOLKATA, BENGAL ) 

अब अंदमान की चालीस कड़ियों में इस यात्रा वृतांत को यहीं विराम...फिर चलेंगे किसी यात्रा पर...जिंदगी यात्रा ही तो है...

अंदमान की यात्रा को पहली कड़ी से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।  

Monday, September 19, 2016

मोईनुद्दीन भाई की ईरानी चाय - अंदमान में आखिरी दिन ((40))

हालांकि मैं आमतौर पर चाय नहीं पीता। पर हैडो में सुबह सुबह घूमते हुए ईरानी चाय की दुकान दिखाई दे गई। सुबह हल्की बारिश हो रही है तो चाय अच्छी लगती है। कारबाइन कोव से लौटते हुए नया गांव में एक तमिल भाई की ईरानी चाय की दुकान दिखाई दे गई थी। हमने वहां चाय पी। इसके अगले दिन सुबह हैडो में अपने होटल से बंदरगाह की ओर जाते हुए एक और ईरानी चाय की दुकान दिखी। हल्की बारिश हो रही थी सो रूक कर चाय पीने लगा। चाय वाले दुकानदार का नाम मोइनुद्दीन है। वे तमिलनाडु के हैं। अक्सर आते जाते रहते हैं, जहाज के बंक क्लास में। उनसे खूब बात होती है। वे मुझे सलाह देते हैं कि अगली बार आप पानी वाले जहाज से आना। उसमें भी मजा आएगा। वे अपने जहाज यात्रा के अनुभव सुनाते हैं। साथ ही कहते हैं कल सुबह भी चाय पीने आ जाना। अगली सुबह मेरी अंदमान की आखिरी सुबह है। मैं एयरपोर्ट जाने से पहले एक बार फिर पहुंच जाता हूं मोइनुद्दीन भाई की चाय पीने।  


पोर्ट ब्लेयर के बाजार में वीकेसी ब्रांड के चप्पलों को शो रूम दिखाई दे जाते हैं। यह केरल का मशहूर ब्रांड है। इसके मालिक सीपीएम के एक नेता हैं। वीकेसी की खास बात है कि यह आम आदमी का ब्रांड है। पुरुषों के चप्पल, महिलाओं के चप्पल और बच्चों के जूते चप्पल बनाता है। इसकी कीमतें 180 से शुरू होकर 650 रुपये पर खत्म हो जाती हैं। मैं भी वीकेसी की दो चप्पल खरीदता हूं , अपने लिए। ये बारिश के दिनों के लिए काफी अच्छे हैं।

पोर्ट ब्लेयर में मीडिया - पोर्ट ब्लेयर के लोगों के पास खबरें पाने के लिए सबसे सुगम माध्यम आकाशवाणी और दूरदर्शन है। वैसे यहां केबल टीवी पहुंच चुका है। पर द्वीप की स्थानीय खबरों के लिए आकाशवाणी हिंदी समेत कई भाषाओं में अपने बुलेटिन प्रसारित करता है। आकाशवाणी का दफ्तर यहां डेलानीपुर में स्थित है। यहां आकाशवाणी केंद्र की स्थापना 2 जून 1963 में हुई। जबकि पोर्ट ब्लेयर में दूरदर्शन केंद्र की स्थापना 1999 में हुई। यहां आकाशवाणी पर हिंदी, अंग्रेजी, बंगाली, तमिल, मलयालम, निकोबारी आदि भाषाओं में बुलेटिन का प्रसारण किया जाता है।  

सरकारी दैनिक समाचार पत्र – अंदमान निकोबार संभवतः एकमात्र ऐसा देश का राज्य है जहां सरकार दो दैनिक समाचार पत्रों का प्रकाशन करती है। यहांअंग्रेजी का दैनिक समाचार पत्र टेलीग्राम है। इसका प्रकाशन राज्य का सूचना जनसंपर्क विभाग करता है। दो रुपये के इस समाचार पत्र में सरकारी खबरों के अलावा अपराध की खबरें और आम जनता से जुड़ी हुई अन्य खबरें भी रहती है। जाहिर है सरकारी अखबार है इसलिए इसमें सरकार की आलोचन नहीं छपती। 

सरकारी विभाग यहां हिंदी का अखबार भी प्रकाशित करता है जिसका नाम है अंडमान निकोबार द्वीप समाचार। द्वीप दर्पण के बारे में मान कर चलें कि यह टेलीग्राम का हिंदी संस्करण है। पर हिंदी के अखबार में एक पन्ने में रोचक फीचर सामग्री और लेख भी प्रकाशित किए जाते हैं। कुछ निजी प्रकाशकों द्वारा भी समाचार पत्र प्रकाशित किए जाते हैं पर उनकी उतनी लोकप्रियता नहीं है। मुझे यहां पर  इन्फो इंडिया नामक हिंदी समाचार एयरपोर्ट पर दिखाई दे जाता है। इसका अंग्रेजी संस्करण भी है। पर यह बाजार में ज्यादा नहीं दिखा।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य

( ANDAMAN, PORT BLAIR, NEWS PAPER, AIR, DOORDARSHAN ) 

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Sunday, September 18, 2016

पोर्ट ब्लेयर से दिगालीपुर वाया रंगत-मायाबंदर ((39))

अंदमान की सबसे लंबी सड़क 333 किलोमीटर की अंदमान ट्रंक रोड से चलते हुए अंदमान के कई खूबसूरत स्थानों का भ्रमण किया जा सकता है। पोर्ट ब्लेयर और आसपास घूम लेने के बाद आप इस यात्रा पर निकल सकते हैं। बेहतर होगा कि आप इसके लिए तीन दिनों का अतिरिक्त समय रखें। दिगालीपुर मार्ग पर जाने के तीन तरीके हैं। पहला अपनी टैक्सी आरक्षित करके सफर करना। दूसरा पब्लिक बसों से सफर करना और तीसरा हेलीकाप्टर सेवा का इस्तेमाल। इनमें सबसे बेहतर और किफायती हो सकता है बस से सफर करना। इस मार्ग के लिए बसें मोहनपुरा बस स्टैंड से मिलती हैं। पहली बस सुबह 4.30 बजे ही चल पड़ती है। इन बसों में अग्रिम आरक्षण भी होता है। आप अपनी यात्रा की योजना के हिसाब से टिकट ले सकते हैं।

बस का मार्ग कुछ इस प्रकार का होता है – बाराटांग-मिड्ल स्ट्रेट – नीलांबुर जेट्टी- गांधी जेट्टी- कदमतल्ला- कौशल्या नगर- बकुलतल्ला- रंगत। स्वदेश नगर बिल्ली ग्राउंड- मायाबंदर- दिगालीपुर। इस मार्ग पर आपको अंदमान के ग्रामीण परिवेश के दर्शन होंगे। यह यात्रा अविस्मरणीय हो सकती है। अंदमान प्रशासन की बसें बड़े अनुशासन में चलती हैं।  
इस मार्ग के चार प्रमुख शहर हैं, बाराटांग, रंगत, मायाबंदर और दिगालीपुर।


बाराटांग में बैरन ज्वालामुखी - बाराटांग इलाके में  बैरन द्वीप पड़ता है। यह अंदमान का और देश का एकमात्र ज्वालामुखी है। पहली बार 1795 में इस ज्वालामुखी को सक्रिय देखा गया। यह देश का एकमात्र ज्वालामुखी है। दूसरी बार 1803 में उसके बाद 1991, 1993, फिर 1995 में ये ज्वालामुखी सक्रिय देखा गया। साल 2004 से 2006 फिर साल 2007 के मार्च में ज्वालामुखी सक्रिय हुआ। इसकी सक्रियता के समय आसपास का तापमान काफी बढ़ जाता है। समुद्री जीव जंतु मरने लगते हैं। वैसे पोर्ट ब्लेयर से 240 किलोमीटर दूर नारकोंडम में भी एक ज्वालामुखी है पर यह लंबे समय से शांत है। यहां पर प्रसिद्ध चूना पत्थर वाली गुफा भी है। तमाम सैलानी इसकी काफी तारीफ करते हैं।

बाराटांग से रंगत के बीच कदमतला का इलाका पड़ता है। इस इलाके में जारवा जनजाति का निवास है। पर इधर से गुजरने वाले बसों और टैक्सियों को रुकने अथवा गति धीमी करने की इजाजत नहीं है। जारवा से संपर्क करने की कोशिश पर सजा का प्रावधान है।

रंगत में इको टूरिज्म – कुछ बसें रंगत तक ही जाती हैं। रंगत 1070 वर्ग किलोमीटर में फैला मध्य अंदमान का द्वीप है। यह खास तौर पर इको टूरिज्म के लिए प्रसिद्ध है। प्रशासनिक लिहाज से यह अंदमान की एक तहसील है। रंगत मे 75 गांव और 14 ग्राम पंचायते हैं। यहां कुछ सुंदर झरने और सुरम्य समुद्र तट है।  यहां मूल रूप से तमिलनाडु और केरल के लोगों को बसाया गया है। मछली पकड़ना और खेतीबाड़ी लोगों का मुख्य कारोबार है। रंगत में आमकुंज बीच, पंचवटी हिल्स के अलावा कई सुंदर समुद्र तट देख सकते हैं। रंगत में ठहरने के लिए हाक्सबिल नेस्ट ( कटबर्ट बीच), पीडब्लूडी का गेस्ट हाउस के अलावा कुछ प्राइवेट होटल भी उपलब्ध हैं।

माया बंदर में लखनऊ और जयपुर - रंगत के बाद 62 किलोमीटर आगे अगला बड़ा ठहराव आता है मायाबंदर। पोर्ट ब्लेयर से मायाबंदर की दूरी 230 किलोमीटर है। मायाबंदर अंदमान का प्रमुख शहर और तहसील है। इलाके की आबादी 30 हजार के आसपास है। यहां पर एक कालेज, महात्मा गांधी गवर्नमेंट कालेज भी है। माया बंदर में ज्यादातर म्यानमार और बांग्लादेश से आए हुए सेटलर्स रहते हैं। यहां लखनऊ और जयपुर नामक गांव भी हैं। यहां पर सैलानी करमाटांग बीच, एवीस आईलैंड देखने पहुंचते हैं।

अंदमान का आखिरी छोर है दिगालीपुर – उत्तरी अंदमान का आखिरी बड़ा शहर दिगालीपुर की पोर्टब्लेयर से दूरी 325 किलोमीटर है। अगर लगातार सफर करें तो 12 घंटे का रास्ता है। मायाबंदर से दिगालीपुर का 100 किलोमीटर का रास्ता आस्टीन क्रीक पर बने चेंगप्पा उड़ान पुल से जुड़ा हुआ है। यह पुल मध्य अंदमान और उत्तर अंदमान को जोड़ता है। दिगालीपुर चावल की खेती संतरों के बाग और अपने समुद्री जीवन के लिए जाना जाता है। यहां पर सेडल पीक है जो अंदमान की सबसे ऊंची चोटी है। अंदमान की एकमात्र नदी कालापोंग यहां बहती है। आप पोर्ट ब्लेयर से दिगालीपुर तक फेरी से समुद्र के रास्ते से भी पहुंच सकते हैं। फेरी सेवा पोर्ट ब्लेयर से हफ्ते में दो दिन चलती है। वहीं मायाबंदर से दिगालीपुर के लिए रोज दो फेरी सेवा चलती है।
दिगालीपुर में स्थित टर्टल रिजार्ट ( अंदमान टूरिज्म द्वारा संचालित ) 

क्या देखें – दिगालीपुर में लिमिया बे बीच, रॉस एंड स्मिथ ट्वीन आईलैंड, रामनगर, पाथी लेवेल बीच, अलफ्रेड गुफाएं जिसे चूना पत्थर गुफा कहा जाता है। 732 मीटर ऊंची सेडल पीक आदि देख सकते हैं। यानी आपको पूरा मजा लेने के लिए दिगालीपुर में एक पूरा दिन और एक रात रुकना चाहिए।


कहां ठहरें – अंदमान टूरिज्म दिगालीपुर में टर्टल रिजार्ट का संचालन करता है। यह कालीपुर में स्थित है। यहां कुछ निजी रिजार्ट भी हैं। बेहतर होगा कि आप इनमें ठहरने के लिए अग्रिम बुकिंग करा लें। 

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com


Saturday, September 17, 2016

पोर्ट ब्लेयर के मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारे... ((38))

अंदमान निकोबार द्वीप समूह आबादी के लिहाज से एक हिंदू बहुल प्रदेश है। पर यहां सिक्ख, मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध सभी मिल जुल कर रहते हैं। पर इस द्वीप प्रदेश की सबसे बड़ी खूबसूरती यहां जाति विहीन समाज का होना है। जो लोग कथित तौर पर यहां सेटलर यानी शरणार्थी हैं, उन्हें अपने पुरखों का राज्य तो याद है, पर यहां आकर अब वे अपनी जाति भूल गए हैं। बिहारी, यूपी वाले, झारखंड वाले, छत्तीसगढ़ वाले, बंगाली, मलयाली और तमिल सभी यहां मिल जुल कर रहते हैं।  
अबरडीन बाजार में मुझे पुलिस गुरुद्वारा दिखाई देता है। मैं सहज तौर पर मत्था टेकने चला जाता हूं। साफ सुथरे गुरुद्वारे में दूसरी मंजिल पर गुरुघर बना हुआ है। वहां शाम के समय कीर्तन हो रहा है। थोड़ी देर बैठकर कीर्तन सुनता हूं। इसके बाद मुझे कड़ाह प्रसाद यानी हलवा दिया जाता है। इस गुरुद्वारे में अतिथि गृह भी बना हुआ है। पोर्ट ब्लेयर के सिख परिवार के लोग इस गुरुद्वारे में नियमित पहुंचते हैं। शहर में दीवान सिंह गुरुद्वारा भी है। दीवान सिंह चिकित्सक थे। वे बड़े लोकप्रिय थे,  पर द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जापानियों ने उन्हें ब्रिटिश जासूस होने के शक में मार डाला। पोर्ट ब्लेयर शहर उनकी शहादत को याद करता है।
पुलिस दफ्तर के सामने वीर हनुमान मंदिर 

वीर हनुमान मंदिर -  अबरडीन बाजार में पुलिस दफ्तर के सामने स्थित है वीर हनुमान मंदिर। ये मंदिर स्थानीय श्रद्धालुओं में काफी लोकप्रिय है। हर मंगलवार और शनिवार को यहां काफी श्रद्धालु पहुंचते हैं। अक्सर यहां खिचड़ी का लंगर भी लगता है।  वैसे पोर्ट ब्लेयर में और भी कई हनुमान मंदिर हैं।
पुलिस बैकुंठधाम मंदिर वीर हनुमान मंदिर और गुरुद्वारा के बाद स्थित है पुलिस बैकुंठ धाम मंदिर। सीढ़ियां चढकर ऊपर जाने के बाद के बाद एक सुंदर मंदिर समूह है। मंदिर में राधाकृष्ण, शिव, विष्णु समेत कई देवी देवताओं की मूर्तियां स्थापित है। मंदिर के बाहर सुंदर चौबारा बना हुआ है।

पोर्ट ब्लेयर में अच्छी संख्या तमिलभाषी लोगों की है इसलिए यहां पर कई दक्षिण भारतीय शैली में बने मंदिर भी दिखाई देते हैं। डेलानीपुर, हैडो रोड पर कई मंदिर बने हैं। ये मंदिर बड़े सुंदर, सुरूचिपूर्ण और साफ सुथरे हैं। हैडो में हनुमान जी के मंदिर के नाम पर हनुमान जंक्शन है।

निरंकारी सत्संग आश्रम – मुझे एयरपोर्ट से पहले जंगली घाट मार्ग पर निरंकारी सत्संग भवन दिखाई देता है। इससे पता चलता है कि यहां पर निरंकारी समाज के लोग भी अच्छी संख्या में है। वहीं बाबा रामदेव के पंतजलि आश्रम से जुड़े बोर्ड भी दिखाई दे जाते हैं। 

अहमदिया मसजिद – पोर्ट ब्लेयर से लगे हुए बंबू  फ्लाट द्वीप पर मुस्लिम लोगों की अच्छी आबादी है। वहां पर मसजिदें भी हैं। पर लांबा लाइन में मुझे अहमदिया मसजिद दिखाई देती है। इससे पता चलता है कि यहां अहमदिया मुसलमान भी बसे हुए हैं।

पोर्ट ब्लेयर के अलग अलग इलाकों में कई चर्च भी हैं। इसमें कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट दोनों तरह के चर्च हैं। कुल मिलाकर एक छोटा सा हिंदुस्तान रहता है। किस्म किस्म के फूल खिले हैं यहां। पर जहां पर हर धर्म के लोग अपने अपने उपासना स्थलों के साथ मिल जुल कर रहते हैं। सभी लोग एक दूसरे के सुखदुख में शामिल होते हैं।  

-         विद्युत प्रकाश मौर्य


Friday, September 16, 2016

अबरडीन बाजार - यहां धड़कता है पोर्टब्लेयर का दिल ((37))

अबरडीन बाजार यानी पोर्ट ब्लेयर का मुख्य बाजार। पूरे पोर्ट ब्लेयर को लोग शापिंग के लिए यहां पहुंचते हैं। पोर्ट ब्लेयर के हर इलाके से अबरडीन बाजार के लिए लोकल बसें मिल जाती हैं। पोर्ट ब्लेयर शहर का मुख्य बस स्टैंड मोहनपुरा भी अबरडीन बाजार से बिल्कुल लगा हुआ है। यह शहर का व्यस्त बाजार है। यहां से गुजरते हुए भीड़भाड़ को देखकर बिल्कुल नहीं लगता कि आप किसी द्वीप राज्य में है। कपड़ो, बैग का व्यस्त बाजार,  गोलगप्पे खाती लड़कियां। फुटपाथ पर दुकानदारों से मोलभाव करती महिलाएं। चाय और समोसे पर गप्प लड़ाते बुजुर्ग, सब कुछ किसी व्यस्त शहर की तरह।

पूरा अबरडीन बाजार एक घंटाघर के आसपास सिमटा हुआ है। यहां से एक रास्ता मेडिकल कालेज की तरफ जाता है। दूसरा रास्ता गोलघर और मिडल बाजार की ओर जाता है। तीसरा रास्ता मोहनपुरा बस स्टैंड की तरफ जाता है। मुख्य बाजार मोहनपुरा बस स्टैंड वाले रोड पर है। इस रोड पर मिलन बेकरी समेत कुछ अच्छे खाने पीने के लिए होटल हैं। मोहनपुरा बस स्टैंड वाले चौराहे पर बापू की विशाल प्रतिमा लगी है। इसमें बापू चलायमान स्थित में नजर आते हैं। इसी चौराहे गलियों में सब्जी बाजार और राशन का बाजार भी है।

भले ही पोर्ट ब्लेयर एक द्वीप शहर है। भारत की मुख्य भूमि से 1200 किलोमीटर दूर है, लेकिन आपको यहां दैनिक उपयोग की सारी वस्तुएं मिल जाएंगी। यहां के दुकानदार ज्यादातर सामान चेन्नई से मंगाते हैं। लगातार चेन्नई से कार्गो जहाज आते हैं सामान लेकर। एक दुकानदार बताते हैं कि जब हमें कई चीजें तुरंत मंगानी होती है तो हमें उसे कार्गो विमान से मंगाना पड़ता है। तब उसके लिए कुछ ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती है। पर शहर में आपको ज्यादातर जरूरत की चीजें वाजिब दाम पर मिल जाती हैं। यहां बड़ी टीवी कंपनियों के शोरूम से लेकर बाइक, कार और एसयूवी के शोरूम भी दिखाई दे रहे हैं।

अबरडीन बाजार में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की याद में नेताजी हाल बना है। यहां पर प्रदर्शनियां लगती हैं। इसी हाल में पोर्ट ब्लेयर के स्थानीय निवासियों का दफ्तर भी है।   
  
पहले विश्वयुद्ध की याद में घंटा घर – अबरडीन बाजार का घंटाघर भी ऐतिहासिक है। घंटा घर का निर्माण ब्रिटिश सरकार ने पहले विश्वयुद्ध के दौरान 1914 से 1920 के बीच बहादुरी से लड़ने वाले फौजियों की याद में कराया। इस पर चार फौजियों का नाम भी अंकित है जिनकी बहादुरी को याद किया गया है।  कैप्टन केबी फास्ट, सुबेदार मुजामिल खां, नायक मंगलचंद,  सिपाही फिरोज का नाम इस घंटाघर पर अंकित है।

अबरडीन का युद्ध – 17 मई 1859 को आदिवासियों के सशस्त्र दल ने अबरडीन में ब्रिटिश सेना पर बड़ा हमला कर दिया। इस लड़ाई मेंआदिवासी भारी पड़े। उन्होंने तीन  घंटे तक अबरडीन थाने पर कब्जा भी रखा। आदिवासियों ने अंग्रेजों के हथियार भी लूट लिए। हालांकि इस लड़ाई में सजायाफ्ता सिपाही रहे दूधनाथ तिवारी जो जारवा लोगों के सानिध्य में भी रहे, ने आदिवासियों की मुखबिरी की। इसका इनाम दूधनाथ को मिला। उसे सजा माफी देकर उसके शहर भेज दिया गया। इस लड़ाई में अंग्रेजों ने अपने तीन सिपाहियों को उनकी बहादुरी के लिए विक्टोरिया क्रॉस प्रदान किया। इस अबरडीन युद्ध में वीरता से लड़ने वाले आदिवासियों की याद में अबरडीन युद्ध स्मारक राजीव गांधी वाटर स्पोर्ट्स कांप्लेक्स के परिसर में बना है।
अबरडीन बाजार के पास नगरपालिका फूड कोर्ट - शाम को होता है गुलजार। 


कहा जाता है अबरडीन इलाका कई बार बरबाद हुआ। कभी युद्ध से कभी भूकंप से लेकिन हर बरबादी के बाद यह गुलजार हो जाता है। आज यहां पोर्टब्लेयर का दिल धड़कता है। अपने पोर्ट ब्लेयर प्रवास के दौरान कई शामें मैंने इस बाजार में टहलते हुए गुजारीं।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य

Thursday, September 15, 2016

कारबाइन कोव – पोर्ट ब्लेयर का रुमानी समुद्र तट ((36))

कारबाइन कोव पोर्ट ब्लेयर शहर का रुमानी समुद्र तट है। यह देखा जा तो शहर का एकमात्र समुद्र तट है जहां शाम को रौनक-ए-बहार होती है। मैं राजीव गांधी वाटर स्पोर्ट्स कांप्लेक्स से एक आटोवाले को कारबाइन कोव  चलने के लिए कहता हूं। वह 80 मांगता है। मैं 50 बोलता हूं। वह चला जाता हू। दूसरा आटोवाला 100 मांगता है। फिर 90 में तैयार होता है। मैं उसके साथ चल पड़ता हूं। आगे का सड़क मार्ग अत्यंत मनोरम है। पूरा रास्ता समंदर के साथ साथ चलता है। रास्ते में रामकृष्ण मिशन का आश्रम और साइंस सेंटर आता है। साइंस सेंटर शाम को 4 बजे बंद हो जाता है। इसे सुबह 10 से 4 के बीच देखा जा सकता है।

नीले समंदर के साथ 6 किलोमीटर से ज्यादा चलने के बाद कारबाइन कोव समुद्र तट पहुंच जाता हूं। इस तट का नाम हेनरी फिशर कारबाइन के नाम पर पड़ा है। इन्हें ब्रिटिश सरकार ने पोर्ट ब्लेयर में पूर्णकालिक तौर पर चर्च शुरू करने के लिए भेजा था। वे 1863 से 1866 के बीच इधर द्वीप पर रहे। वे ईसाई विद्वान माने जाते हैं। उन्होंने कुछ पुस्तकें भी लिखी है।   

यह तट अर्धचंद्राकार है जो इसके सौंदर्य को और बढ़ाता है। शाम ढल रही है और तट पर रौनक शबाब पर है। मैं पहले नारियल पानी पीता हूं। कुछ चना जोर गरम बेचने वाले भी घूम रहे हैं। यहां समुद्र तट पर लेटने के लिए लकड़ी की बेंच लगी हैं जिनकी सेवा आप 10 रुपये प्रति घंटे देकर ले सकते हैं। कुछ घंटे बैठकर आती जाती समंदर की लहरों को देखता हूं। कुछ स्थानीय बच्चे समंदर में कूद कूद कर नहा रहे हैं। या यूं कहें पानी पर खेल रहे हैं।

समुद्र तट पर सुरक्षा गार्ड तैनात हैं जो आपको खतरनाक क्षेत्र या गहरे समुद्र में जाने से रोकते हैं। तट का नजारा अत्यंत मनोहारी है। कई परिवार वाले तो कई प्रेमी युगल समंदर के संग खेलने का आनंद उठा रहे हैं।

यहां पर अंदमान टूरिज्म की ओर से संचालित एक रेस्टोरेंट भी है। यहां लॉन में बैठकर कुछ लड़कियां ड्रिंक्स ले रही हैं।  इस सुहाने समुद्र तट पर एक घंटा गुजारने के बाद मैं वापस चलने की सोचता हूं। यहां से कोई आटोरिक्शा नहीं है। तब पैदल ही चल पड़ता हूं। काफी चढाई वाला रास्ता है। कुछ आवासीय कालोनियां पार करके ऊंचाई पर मुख्य सड़क आ जाती है पर यहां कोई बस आटो दिखाई नहीं देता। एक बारगी लगता है कि मैंने पैदल चलने की गलती कर दी क्या। पर कई बार कई शहरों को बाजारों को पैदल नापने का भी अपना ही मजा है। इसमें भी नए नए अनुभव होते हैं। मेरे पास समय था सो मैं पैदल ही चलता गया। 

पैदल अबरडीन बाजार की ओर - यह पोर्ट ब्लेयर का शादीपुर इलाका है। यहां से पैदल चलता हुआ नयागांव पहुंचता हूं। अबरडीन बाजार का रास्ता पूछता हुआ आगे बढ़ रहा हूं। चौराहा आता है नाम है दूध लाइन। इसके बाद आगे चलता हुआ गांधी पार्क पहुंचता हूं। यह पोर्ट ब्लेयर में बच्चों का एम्युजमेंट पार्क है। प्रवेश निःशुल्क है। अंदर कई तरह के खेलों के टिकट है। स्थानीय लोग परिवार के साथ शाम गुजराने आते हैं।एक प्रदर्शनी हाल भी है। यहां अंदमान पर चित्रों की प्रदर्शनी की तैयारी चल रही है। इससे आगे बढ़ता हूं तो राजभवन दिखाई देता है। यह अंदमान के प्रशासक का आवास है। इसके आगे मैं टूरिज्म दफ्तर वाले चौराहे पर पहुंच जाता हूं, जहां एक दिन पहले भी आया था। अब तो अबरडीन बाजार पास में है।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य