Saturday, July 30, 2016

पोर्ट ब्लेयर की सड़कों पर... ((03))

पोर्ट ब्लेयर के वीर सावरकर एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही मुख्य सड़क आ जाती है। एयरपोर्ट के बाहर टैक्सी वाले और आटो रिक्शा वाले खडे थे। पर मेरे पास एक पिट्ठू बैग था। मुझे पहले से जानकारी थी कि एयरपोर्ट के सामने लांबा लाइन पर बसें चलती रहती हैं। एयरपोर्ट से बाहर निकलने पर बांयी ओर मुड़े तो बाथू बस्ती का इलाका है। दाहिनी तरफ लामा लाइन और मुख्य बाजार की जाती हुई सड़क। मुख्य सड़क पर पोर्ट ब्लेयर नगर परिषद आपका स्वागत करता है का बोर्ड लगा हुआ दिखा देता है।

थोड़ी दूर पैदल चलने पर डेयरी फार्म तिराहा आता है। यहां पर के कामराज की विशाल प्रतिमा लगी है। तमिलनाडु के निर्माता के कामराज की यहां भी बहुत इज्जत है। तमिल आबादी उनका बहुत सम्मान करती है। संयोग से मेरी पोर्ट ब्लेयर यात्रा के दौरान कामराज का जन्मदिन ( 15 जुलाई ) भी आया। तब कामराज की प्रतिमा पर फूल चढ़े दिखाई दिए। पर आगे बढ़ने से पहले नारियल पानी पीने का ख्याल आया। डेयरी फार्म से मैं बस लेता हूं। पांच रुपये का टिकट लेकर गोलघर उतर जाता हूं। इससे पहले जंगली घाट का इलाका आता है। जंगली घाट एयरपोर्ट से निकट का सबसे मुफीद इलाका है जहां आप ठहर सकते हैं। महज एयरपोर्ट से आधे किलोमीटर की दूरी पर स्थित जंगली घाट में कई होटल हैं। मुझे होटल प्राइड नजर आता है जिसके नीचे एचडीएफसी बैंक की शाखा है। जंगली घाट इलाके में हीरो और होंडा मोटर्स के शो रुम हैं। अब अंडमान में बड़ी कारों और एसयूवी के भी शोरूम नजर आते हैं।

गोलघर चौराहा है जहां से अबरडीन बाजार और हैडो के लिए रास्ता बदलता है। मैं हैडो वाला रास्ता चुनता हूं। पैदल ही आगे बढ़ता हूं। पोर्ट की सड़के नापने का इरादा है। प्रेम नगर जंक्शन आता है। इसके बाद डिलानीपुर जंक्शन। [डिलानीपुर से एक रास्ता आकाशवाणी की ओर जाता है। आकाशवाणी द्वीप के लोगों के लिए संचार का बड़ा माध्यम है। आगे बढ़ने पर समुद्रिका मरीन म्यूजियम, अंडमान टील हाउस दिखाई देते हैं। ये टील हाउस डाक्टरों का आवास है। इसके आगे हैडो मिनी जू आता है। इसके बाद हनुमान जंक्शन, पानीपत रोड। अरे यहां भी पानीपत है। पानीपत ही नहीं कालीकट और रांची बस्ती भी है पोर्ट ब्लेयर में। 

एक तमिल माध्यम का सरकारी स्कूल आता है पर साईनबोर्ड हिंदी में है। और मैं पहुंच गया हूं हैडो जंक्शन । ठीक हैडो जंक्शन पर ही होटल ड्रीम पैलेस। इसे मैंने गोआईबीबो डाट काम पर अत्यंत रियायती दरों पर बुक किया था। हमारी मुलाकात होटल के प्रोपराइटर सरदार मनदीप सिंह जी से होती है। मैं अकेला हूं पर मुझे वो कमरा नंबर 102 आवंटित करते हैं जो ट्रिपल बेड का है। अगले छह दिन मैं इसी कमरे में ठहरूंगा। अटैच टायलेट के साथ कमरे की खिड़की से हरे भरे नारियल के पेड़ दिखाई देते हैं। होटल में एक बार और रेस्टोरेंट भी है। बार मेरे काम का नहीं और रेस्टोरेंट इन दिनों कम सैलानियों के कारण बंद है। 

दोपहरी में पैदल चलकर पसीना-पसीना हो गया हूं। सो होटल के कमरे में जमकर नहाने के बाद निकल पड़ता हूं घुमने के लिए। भूख नहीं लगी है अभी। पेट पूजा तो बार-बार एयर इंडिया के सौजन्य से आसमान में ही कर चुका हूं।

( ANDAMAN, PORT BLAIR, HOTEL DREAM PALACE, HADDO )
पोर्ट ब्लेयर में  जंगली घाट की सड़क और होटल प्राइड रेसीडेंसी। 
अंदमान की यात्रा को पहली कड़ी से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।  



Friday, July 29, 2016

दिल्ली से अंदमान निकोबार की ओर..((02 ))

अंदमान के वीर सावरकर  एयरपोर्ट के बाहर। 
सालों से अंडमान निकोबार जाने की इच्छा थी। पर समय दूरी और आर्थिक कारणों से ये इच्छा दबी रह जाती थी। पर देश के 32 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की यात्रा कर लेने के बाद 33 वें प्रदेश के तौर पर अंडमान जाने का मौका 2016 में मिल गया। ये मौका गोआईबीबो डाट काम के अत्यंत रियायती ऑफर के कारण मिल सका। वैसे तो सालों भर अगर आप अंडमान जाना चाहें तो एक तरफ का हवाई किराया दिल्ली से 10 हजार रुपये से कम नहीं होता। अगर आप पानी के जहाज से भी जाना चाहें तो कोलकाता, चेन्नई या फिर विशाखापत्तनम से जाने वाले जहाज का किराया फर्स्ट क्लास में 7500 रुपये प्रति व्यक्ति है। फिर 55 घंटे का सफर। लंबी समुद्री यात्रा में सी सी-सिकनेस का भी खतरा रहता है। हालांकि मेरी दिली इच्छा अंदमान पानी के जहाज से ही जाने की थी। पर ऐसा मौका शायद भविष्य में आए।

अंदमान के मोहनपुरा चौराहा पर गांधी जी की प्रतिमा 
 फिलहाल तो हवाई यात्रा का मौका मिला। 11 जुलाई की सुबह हमारी एयर इंडिया की फ्लाइट दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई  अड्डे के टी-3 से थी।  सुबह 6.55 की फ्लाइट का समय बदलकर 7.30 हो गया। इसकी सूचना एयर इंडिया की ओर से फोन करके दी गई। मैं सुबह सुबह टी-3 पहुंच चुका था। हमारा विमान 50 नंबर गेट से उडान भरने वाला था। थोड़ा समय था तो टी-3 पर बुक शॉप में कुछ किताबें देखने लगा। यहां कामसूत्र और बेहतरीन सेक्स कैसे करें जैसी किताबें डिस्प्ले में थी। बगल में हल्दीराम शोरूम था। वहां से कुछ सैनक्स खरीदा। पर एयर इंडिया में तो खाना पीना मिलने वाला था।

जहाज ने दिल्ली से नियत समय पर उड़ान भरी। मुझे मनचाही खिड़की वाली सीट 13 ए मिल गई थी। हमारे कैप्टन थे देवीदत्त मेंहदीरत्ता। तो क्रू की प्रभारी थीं सोनिया सोपोलिया। एयर इंडिया के ज्यादातर एयर होस्टेस उम्रदराज हैं। जबकि निजी विमान सेवाओं में नवयुवतियां दिखती हैं। हमें खाने में परोसा गया शाकाहारी व्यंजन जो मेरी मांग के अनुरूप ही था। उपमा और कुछ अन्य सामग्री के साथ चाय और ब्रेड बंद। जहाज आंध्र प्रदेश के तटीय शहर विशाखापत्तनम में ढाई घंटे बाद उतरा। यहां 40 मिनट का ठहराव था।

राजीव गांधी वाटर स्पोर्ट्स कांप्लेक्स में राजीव गांधी
हम खराब मौसम से गुजर रहे हैं....

विशाखापत्तनम में काफी लोग उतर गए तो काफी लोग चढ़े भी। हमें विमान में ही रहने को कहा गया। मैं एक बार पहले विशाखापत्तनम से दिल्ली की उडान भर चुका हूं। यहां का एयरपोर्ट काफी साफ सुथरा और सुंदर है।

यहां से आगे की उड़ान के पायलट थे सचिन गुप्ता। क्रू की प्रभारी भी बदल गई थीं। सोमा भूटिया के साथ कुछ नवयुवतियां होस्टेस के तौर पर दिखाई दे रही थीं। जहाज आसमान में था एक बार फिर से.. पर अब दिखाई दे रहा है नीचे सिर्फ समंदर और बादल।
 जब जहाज समंदर के उपर उड़ान भर रहा था तब उदघोषणा हुई कि हम खराब मौसम से गुजर रहे हैं। आप सभी सीट बेल्ट बांध कर अपनी जगह पर ही बैठे रहें। टायलेट का इस्तेमाल न करें. यह सुनकर मानसून के मौसम में मन में कुछ डर जैसा बैठने लगा। पर एक घंटे 50 मिनट के उड़ान के बाद घोषणा हुई की हम जल्द ही पोर्ट ब्लेयर उतरने वाले हैं। अब हमने राहत की सांस ली। पोर्ट ब्लेयर का वीर सावरकर एयरपोर्ट अपेक्षाकृत छोटा है। यहां विमान से उतरने के बाद पैदल ही लांउंज की ओर पहुंच गए। अंदर फोटोग्राफी प्रतिबंधित है। पांच घंटे में हम दिल्ली से 4000 किलोमीटर से ज्यादा दूर अपने देश के एक केंद्र शासित द्वीप प्रदेश में पहुंच चुके थे।

अंदमान निकोबार द्वीप समूह -  एक नजर 




पोर्ट ब्लेयर के हैडो बंदर पर महान तमिल कवि तिरुवललुर की प्रतिमा
कुल  द्वीपों की संख्या -  572 
कुल निवास वाले द्वीप -  37 
कुल लंबाई -     726 किलोमीटर 
कुल क्षेत्रफल   8249 वर्ग  किलोमीटर 
वन क्षेत्र -     7171 वर्ग  किलोमीटर 
दलदली वनक्षेत्र - 671 वर्ग किलोमीटर 
आबादी    3,80581 (2011 की जनगणना)
दूरी पोर्ट ब्लेयर से कोलकाता - 1255 किमी
पोर्ट ब्लेयर से चेन्नई -  1190 किमी
पोर्ट ब्लेयर से विशाखापत्तनम - 1200 किमी

अंदमान का राजकीय वृक्ष - अंदमान पादुक 

राजकीय पशु -    डुंगडुंग

राजकीय पक्षी -   अंदमान वुड पीजन


-         vidyutp@gmail.com



( ANDAMAN N NICOBAR ISLAND, UT, AIR INDIA, FLIGHT, SHIP, PORT BLAIR ) 
अंदमान की यात्रा को पहली कड़ी से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।  


  

Thursday, July 28, 2016

हनुमान बदलकर हो गया अंदमान ((01))

पोर्ट ब्लेयर का वीर सावरकर हवाई अड्डा.
अंदमान निकोबार भारत का एक केंद्र शासित राज्य है, पर यह बाकी सब राज्यों से काफी अलग है। यह कुल 572 द्वीपों का एक समूह है। यह सामरिक दृष्टि से भारत देश के लिए काफी महत्वपूर्ण है। भारत के किसी भी मुख्य स्थलीय शहर से अंदमान की अच्छी खासी दूरी है। यह दक्षिण के शहर चेन्नई से तकरीबन 1200 किलोमीटर दूर समुद्र में स्थित द्वीपों का समूह है। पर अंदमान के पोर्टब्लेटर से म्यांमार का यांगून शहर महज 600 किलोमीटर है तो इंडोनेशिया का बंदा एस 743 किलोमीटर है,  वहीं थाईलैंड का फुकेट 897 किलोमीटर है। इसलिए अंदमान निकोबार द्वीप समूह का भारत के लिए सामरिक महत्व है।यह भारत के कोलकाता से 1286 किलोमीटर तो विशाखापत्तनम से दूरी 1200 किलोमीटर है। 


एक मजेदार बात और .अंदमान के इंदिरा प्वाइंट जो भारत का आखिरी छोर है वहां से इंडोनेशिया का बंदा एस महज 150 किलोमीटर की दूरी पर है। इसलिए अंडमान जाना देश के किसी भी और हिस्से पर जाने की तुलना में ज्यादा समय लेने वाला है, साथ ही महंगी यात्रा भी है। पर अंदमान का सेल्युलर जेल जिसे कभी काला पानी कहा जाता था, वहां के सुंदर द्वीप जो सैकड़ों किस्म के जल जीवों की सुंदरता समेटे हुए हैं को देखना जीवन का अत्यंत मनोहारी अनुभव हो सकता है। अंदमान में कई द्वीपों पर आप सैकड़ों किस्म के प्रवाल ( CORAL )  देख सकते हैं। 

पोर्ट ब्लेयर के हैडो में हनुमान जी की प्रतिमा 
अंडमान की राजधानी पोर्ट ब्लेयर है जो इसका मुख्य शहर है। यह एक बंदरगाह शहर है और यहां हवाई अड्डा भी है। केंद्र शाशित प्रदेश अंडमान देश को एक लोकसभा सदस्य चुनकर भेजता है। एक ऐसा प्रदेश जहां की मातृभाषा हिंदी है। ऐसा प्रदेश जहां तमिलनाडु, केरल, बंगाल, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ से गए हुए लोग रहते हैं। ऐसा प्रदेश है जो जारवा आदिवासी और निकोबारी और शैंपेन आदिवासी समूहों के लिए जाना जाता है। अंडमान भारत का चमकता हुआ मणि हैं। अंडमान में कुल तीन जिले हैं, इसका दायरा 8249 वर्ग किलोमीटर में फैला है। आबाादी की बात करें तो 4 लाख के करीब है। 

कहा जाता है कि अंडमान नाम हनुमान जी के नाम पर पड़ा है। इंडोनेशिया के मलय भाषा में हनुमान को हंडमान कहते हैं जो थोड़ा बदलकर अँडमान हो गया। कहा जाता है कि राम की सेना पहले लंका पर चढ़ाई अंडमान से ही करना चाहती थी पर बाद में रणनीति बदलकर तमिलनाडु के धनुषकोडि से धावा बोला गया। 


पोर्ट ब्लेयर के लामा लाईन में स्वामी  विवेकानंद की प्रतिमा 
अपने देश से अंदमान जाने के लिए पानी के जहाज कोलकाता, विशाखापत्तनम और चेन्नई से चलते हैं। इनका हर माह का शेड्यूल अग्रिम तौर पर जारी किया जाता है। जहाज की यात्रा 50 से 60 घंटे की है। कोलकाता से कोई 60 घंटे, विशाखापत्तनम से 50 घंटे तो चेन्नई से 55 घंटे लगते हैं। मौसम के उतार चढ़ाव के साथ ये समय ज्यादा भी हो सकता है।इससे सुगम हवाई यात्रा हो सकती है। हवाई यात्रा के लिए भी कोलकाता, चेन्नई और विशाखापत्तनम से रोज कई विमान सेवाएं हैं। इनमे एयर इंडिया, गो एयर, जेट एयरवेज, इंडिगो, स्पाइसजेट आदि कंपनियों की विमान सेवा पोर्ट ब्लेयर के लिए हर रोज है। विमान का औसतन किराया दिल्ली से 10 हजार रुपये एक तरफ का रहता है। तुरंत का किराया इससे ज्यादा भी हो सकता है। वहीं कई महीने पहले बुकिंग कराएं तो इससे कम भी हो सकता है। अंडमान एक ऐसा राज्य है जहां सालों भर देश विदेश से सैलानी आते हैं।
तो चलिए चलते हैं अंडमान निकोबार के दौरे पर।  
-vidyutp@gmail.com

(ANDAMAN, PORT BLAIR, UT, SHIP, SEA, CORAL ) 

Tuesday, July 26, 2016

एक और कांवर यात्रा बोल बम ...तारक बम

हावड़ा तारकेश्वर लाइन पर सेवड़ाफुल्ली रेलवे स्टेशन पर लगा कांवर का बाजार। 

सावन का महीना मतलब बाबा भोले का महीना। देश के कई हिस्सों में इस महीने में लोग कांवर लेकर लंबी पदयात्रा करके शिव के मंदिर में जलार्पण करते हैं। देश के कुछ प्रसिद्ध मंदिरों ये परंपरा सैकड़ो साल से चली आ रही है। उत्तर भारत में बंगाल, झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश उत्तराखंड में  इस तरह की परंपरा कई शहरों में देखने को मिलती है। इस दौरान श्रद्धालु केसरिया रंग की निक्कर और बनियान पहनकर  बम बन जाते हैं। इस यात्रा को बोल बम कहते हैं। बिहार में सुल्तानगंज में गंगा नदी जल लेकर लोग 120 किलोमीटर की पदयात्रा करके देवघर पहुंचते हैं। यहां वैद्यनाथ मंदिर में जलार्पण करते हैं। वहीं बिहार में पहलेजाघाट से जल लेकर लोग 80 किलोमीटर की पदयात्रा करके मुजफ्फरपुर के गरीब नाथ मंदिर पहुंचते हैं। इसी तरह की एक यात्रा बंगाल में भी होती है।  


सावन महीने में कांवर यात्रा  बिहार के देवघर के मंदिर की तरह की बंगाल के इस तारकेश्वर मंदिर में भी सावन के महीने में लोग कांवर लेकर पहुंचते हैं। यह कांवर यात्रा तारकेश्वर से 36 किलोमीटर पहले सेवड़ाफुल्ली नामक स्थान से शुरू होती है। यहां लोग हुगली ( गंगा) नदी से जल लेकर पदयात्रा करते हुए तारकेश्वर मंदिर पहुंचते हैं। पूरे सावन सेवड़ाफुल्ली से लेकर तारकेश्वर तक मेला का माहौल रहता है। यह यात्रा पूरे महीने तक चलती रहती है। यह बंगाल की सबसे बड़ी धार्मिक यात्राओं में से एक है।


पूरे बंगाल से लाखों श्रद्धालु - इस यात्रा में पूरे बंगाल से महीने भर में लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। इसमें बड़ी संख्या में महिलाएं भी होती हैं। वे बोलबम तारक बम का नारा लगाते हुए अपना सफर आम तौर पर एक दिन में ही पूरा करते हैं। मैं सेवडा फुल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर मुलाहिजा फरमाता हूं। पूरा प्लेटफार्म कांवर यात्रा के बाजार के तौर पर सजा हुआ है। लोग खरीददारी में लगे हुए हैं। सावन का मेला अपने पूरे सबाब पर है। सेवड़ा फुल्ली से लेकर तारकेश्वर तक कांवर लेकर चलने वालों की अनवरत लाइन सावन के महीने में देखी जा सकती है।
कांवड़ा यात्रा नेपाल के पशुपति नाथ मंदिर में भी होती है। सावन में काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी में भी लोग बोलबम बनकर पहुंचते हैं। उत्तराखंड के हरिद्वार से भी सावन में कांवड़ की यात्रा शुरू होती है। इस यात्रा में लोग हरिद्वार में गंगा से जल लेकर अपने गांव के मंदिरों में जाकर जलार्पण करते हैं। हालांकि हरिद्वार से ये यात्रा सावन में एक हफ्ते ही चलती है, पर देवघर और तारकेश्वर में पूरे सावन यात्रा चलती रहती है। कुछ बिहार और बंगाल के श्रद्धालु देवघर और तारकेश्वर दोनों जगह जलार्पण करने जाते हैं।

- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

( BOLBAM, TARKESHWAR, KOLKATA, SHIVA ) 






Monday, July 25, 2016

बंगाल के हुगली जिले में हैं तारकेश्वर महादेव

महादेव शिव के देश के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है बंगाल का तारकेश्वर महादेव का मंदिर। कहा जाता है शिव तारक मंत्र देते हैं तभी मनुष्य का उद्धार होता है। न सिर्फ बंगाल में बल्कि दूर दूर तक इस मंदिर की मान्यता है। पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के तारकेश्वर शहर में स्थित है बाबा भोले नाथ का मंदिर तारकेश्वर धाम।

 इस प्रसिद्ध तारकेश्वर मंदिर में श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है। कहा जाता है कि यहां भक्तजन जो भी मन्नत मांगते हैं उनकी मन्नत पूरी होती है। इस मंदिर का निर्माण साल 1729 में हुआ था। यह बांगला वास्तुकला का सुंदर उदाहरण है। मंदिर के गर्भ गृह के आगे बरामदा बना हुआ है। मंदिर के बगल में एक विशाल सरोवर है। इस सरोवर को दूधपुकुर ( दूध का पोखर) कहते हैं। पूजा के लिए आने वाले श्रद्धआलुओं में से काफी लोग पहले मंदिर में स्नान करते हैं फिर पूजा करते हैं। इस मंदिर का पौराणिक महत्व है इस मंदिर को एक शक्तिपीठ के रूप में पूजा जाता है।

पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने तारकेश्‍वर के पश्चिम दिशा की ओर एक कुंड खोदा था और भगवान शिव का शिवलिंग की स्थापना करके उनकी आराधना की थी। ऐसी भी मान्यता है कि तारकेश्‍वर देवी लक्ष्मी का मूल निवास स्थल है। देवी लक्ष्मी यहां देवी सरस्वती के साथ वैष्णवी रूप में भी निवास करती हैं। महादेव तारकेश्वर का मंत्र -  ओम स्त्रों तारकेश्वर रुद्राय ममः दारिद्रय नाशय नाशय फट।। 
मंदिर के बारे में एक कहानी है कि शिव का एक भक्त विष्णु दास उत्तर प्रदेश के अयोध्या शहर से यहां पहुंचा था। हालांकि हुगली के स्थानीय लोगों ने किसी मुद्दे पर इस सीधे सच्चे इंसान के पूरे परिवार पर शक किया। अपने को निर्दोष साबित करने के लिए उसने अपने हाथ को गर्म लोहे के छड़ से जला लिया। 
तारकेश्वर महादेव के पास दूधपुुकुर में स्नान करते श्रद्धालु 

कुछ दिनों बाद उसके भाई ने पास के जंगल में एक ऐसा स्थल तलाशा जहां गाय अपने आप जाकर दूध देने लगती थी। भाई को यह पता चला कि जहां गाय दूध देती है वहां एक शिवलिंग स्थित है। यह एक स्वंभू शिवलिंग है। इसके बाद विष्णुदास को स्वप्न में आया कि यह स्थल तारकेश्वर (शिव) का स्थान है। विष्णुदास ने यहां शिव की पूजा की और उसे लोगों के कोप से मुक्ति मिली। बाद में गांव के लोगों ने वहां पर एक विशाल मंदिर का निर्माण कराया। वर्तमान मंदिर राजा भारमल्ल का 1729 का बनवाया हुआ है। 

महाशिवरात्रि और चैत्र संक्रांति के समय तारकेश्वर मंदिर में श्रद्धालुओं की अपार भीड़ उमड़ती है। इसके अलावा सावन के महीने में यहां पूरे माह कांवर लेकर आने वाले श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। 
कैसे पहुंचे -  तारकेश्वर कोलकाता शहर के पास हावडा रेलवे स्टेशन से 58 किलोमीटर की दूरी पर है। रोज सुबह 4.22 से लेकर रात्रि 11 बजे तक इस मार्ग पर लोकल ट्रेनें चलती रहती हैं। आमतौर पर हर घंटे तारकेश्वर मार्ग पर आपको लोकल  ट्रेन मिल जाएगी।



 लोकल ट्रेन से पहुंचने डेढ़ घंटे का वक्त लगता है। इसी तरह वापसी के लिए भी दिन भर लोकल ट्रेन मिलती हैं। तारकेश्वर हावड़ा से आरामबाग रेलवे लाइन पर पड़ता है। रेलवे स्टेशन से मंदिर की दूरी महज आधा किलोमीटर है। इस लिए मंदिर तक पहुंचना कोलकाता से काफी सहज है। 

मंदिर में पंडा के बिना दर्शन मुश्किल

 मैं जिस दिन तारकेश्वर महादेव के दर्शन करने पहुंचा हूं संयोग से बांग्ला कैलेंडर के हिसाब से सावन का पहला दिन है। सेवड़ाफुल्ली से श्रद्धालुओं की यात्रा शुरू हो गई है। रास्ते में केसरिया वस्त्र में बाबा के भक्त दिखाई दे रहे हैं। बड़ी संख्या में महिलाएं हैं। रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर भी मेले का माहौल हैं। कांवर और पूजा के सामन के दुकाने सजी हुई हैं। तारकेश्वर रेलवे स्टेशन को भोले बाबा के आस्था के रंग में रेलवे की ओर से सजाया गया है। रेलवे स्टेशन के दीवारों पर कांवर यात्रा के म्युरल लगे हैं। रेलवे स्टेशन से ही मंदिर में दर्शन कराने के लिए पंडो की भीड़ है। न चाहते हुए भी मार्ग में एक पंडा जी मेरे पीछे पीछे हो लेते हैं। उनका नाम बापी बनर्जी है। वे मुझे एक दुकान पर ले जाते हैं। वहां मैं चप्पल, बैग, कैमरा आदि जमा करने के बाद प्रसाद लेता हूं। मिट्टी की छोटी सी मटकी में 51 रुपये का प्रसाद। सरोवर के जल से प्रतीकात्मक स्नान के बाद मंदिर में जाकर पुजारी जी से परिवार के कल्याण के लिए संकल्प कराता हूं।
मंदिर के रास्ते में सजी प्रसाद की दुकानें
इसके बाद लग जाता हूं दर्शन के लिए लाइन में। ज्यादा भीड़ नहीं है इसलिए भोले बाबा के दर्शन आसानी से हो जाते हैं। मंदिर में स्वंयसेवकों की टीम लोगों की सहायता के लिए मुस्तैद है। 

मंदिर के आसपास छोटा सा बाजार है। यहां पूजन सामग्री की दुकानें, प्रसाद की दुकानें, शाकाहारी भोजनालय और रहने के लिए आवासीय धर्मशालाएं भी हैं। चलने लगता हूं तो पंडा बापी बनर्जी से एक बार फिर मुलाकात हो जाती है। वे किसी दूसरे श्रद्धालु की तलाश में हैं। वे मुझे चलते हुए अपना विजटिंग कार्ड भी सौंपते हैं। फोटोग्राफी प्रिंटिंग से छपे उनके कार्ड पर भी तारकेश्वर महादेव का फोटो अंकित है। 

पक्षी उडा़ने की मनौती मानते हैं लोग -

तारकेश्वर मंदिर में अलग अलग तरह के संस्कार करने के लिए दरें मंदिर के बोर्ड पर अंकित की गई हैं। लाउड स्पीकर से श्रद्धालुओं के लिए लगातार घोषणा भी की जा रही है। मंदिर के बोर्ड पर मुझे दिखाई देता है कबूतर उड़ाने की रस्म के बारे मेंती.। पंडा जी बताते हैं कि कई लोग किसी तरह की मनौती पूरी हो जाने के बाद मंदिर में आकर पक्षी उड़ाने की भी मनौती मानते हैं। इसके अलावा भी कई तरह की रोचक मनौतियां मानी जाती हैं। इनमें से  एक है ढोलक बजवाने की मनौती। यह भी किसी तरह की मन में मानी हुई बात पूरी होने पर संपन्न कराया जाता है। ये है देश में आस्था के अनूठे रंग। मंदिर परिसर में काफी बोर्ड हिंदी में लगे हुए दिखाई देते हैं, क्योंकि यहां हिंदी प्रदेशों से भी काफी श्रद्धालु आते हैं।


-विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
(TARKESHWAR MAHADEV TEMPLE, SHIVA, HOOGLY, WEST BENGAL, KOLKATA )
   




Sunday, July 24, 2016

लंगट सिंह कॉलेज के वे दिन

वह 1987 का साल था जब मुझे हाई स्कूल यानी दसवीं पास करने के बाद कॉलेज में नामांकन लेना था। तब बिहार में 11वीं यानी इंटर से कॉलेज में पढ़ाई होने लगती थी। नंबर के आधार पर हमारा नामांकन मुजफ्फरपुर के लंगट सिंह कॉलेज में हो गया। यह बिहार विश्वविद्यालय का सबसे अच्छा और बिहार के दूसरे नंबर के कॉलेज में गिना जाता था। अगर भवन की भव्यता की बात करें तो बिहार में शायद कोई दूसरा कॉलेज इसके मुकाबले नहीं ठहरता। लंगट सिंह कॉलेज की मुजफ्फरपुर शहर के छाता चौक और कलमबाग चौक के बीच स्थित है। उसके बगल में खबड़ा मुहल्ला है। लंगट सिंह कॉलेज के ठीक पीछे बिहार विश्वविद्यालय का परिसर है। लंगट सिंह कॉलेज की लाल रंग की इमारत अपने विरासत की दास्तां मूक रहकर भी बयां करती है। कॉलेज के प्रशासनिक भवन के एक तरफ ड्यूक हॉस्टल है तो दूसरी तरफ लंगट्स हॉस्टल। मुख्य भवन के बायीं तरफ कला संकाय का भवन है तो पीछे की तरफ विज्ञान संकाय  के विभाग। हमारा विषय था बॉटनी, जूलोजी, केमिस्ट्री और फिजिक्स। सभी विषयों की कक्षाएं अलग-अलग कमरों में लगती थी। हम गांव के स्कूल से निकल कर आए थे तो ये क्लास रूम हमलोगों को बड़े भव्य लगते थे। 
पुराने दिन पुराने दोस्त पीछे छूट गए... अमिय कुमार और आदर्श निर्मल
हमारी केमिस्ट्री की लैब इतनी बड़ी थी कि वहां सभी छात्रों को एक एक अलमारी अलॉट कर दी गई थी, जिसमें हम प्रयोग में काम आने वाले 20 किस्म के सामान ताला बंद करके रखते थे। पर केमिस्ट्री में साल्ट एनालिसिस मुश्किल काम था। इसकी प्रायोगिक परीक्षा में लैब का चपरासी हमें थोड़ी दक्षिणा लेकर क्ल दे देता था। फिर हम रिजल्ट में वही साल्ट बता देते थे। कमेस्ट्री में हमारे टीचर थे मोहम्मद मोउनुद्दीन, राम बालक चौधरी, नित्यानंद शर्मा, जीवछ चौधरी जैसे लोग। हमारे एक फिजिक्स के शिक्षक थे जो हमें पढ़ाने के साथ साथ साथ नैतिक शिक्षा देते थे। खास तौर पर गांव से आए छात्रों को आगाह करते थे देखना मजफ्फरपुर की हवा न लग जाए। सिनेमा कम देखो सिलेबस पर ध्यान ज्यादा दो।

विज्ञान संकाय के हर विभाग के बीच में विशाल आंगन हुआ करता है लंगट सिंह कॉलेज में। तो हिंदी और अंगरेजी की पढ़ाई के लिए हमें कला संकाय में जाना पड़ता था। हमारे हिंदी के शिक्षक थे नंद किशोर नंदन और कृष्ण जीवन भट्ट। भट्ट जी बड़ी लच्छेदार हिंदी और आलांकारिक हिंदी बोलते थे। उनका व्यक्तित्व भी यादगार था। एक बार नंदन जी अपनी क्लास में हमारी शैतानियों से परेशान होकर भारी नाराज हो गए। तब गुस्से में आकर बोले कि तुम लोग नंद किशोर नंदन से पढ़ने लायक नहीं हो। तब हमें काफी दुख हुआ। हमारी अंगरेजी के एक शिक्षक थीं पार्वती सिन्हा, उनका भी ज्ञान उच्च कोटि का था। हमें उनकी क्लास खूब पसंद आती थी। खैर ...विज्ञान संकाय में हमारे यहां कई योग्य शिक्षक थे। हमें भौतिकी पढ़ाने वाले में एक थे हजारी लाल साह जिनसे में उनके घर पर ट्यूशन पढ़ने भी जाता था।
एलएस कॉलेज  परिसर में लगी लंगट सिंह की प्रतिमा 

कुछ और बातें लंगट सिंह कॉलेज की। जब इस कालेज की स्थापना हुई तो इसका नाम गवर्नमेंट भूमिहार ब्राह्मण कॉलेज था। बाद में इसका नाम कॉलेज के सबसे बड़े दानकर्ता लंगट सिंह के नाम पर लंगट सिंह कॉलेज कर दिया गया। मुजफ्फरपुर शहर में भूमिहार बिरादरी के लोगों की बहुलता है। हमारे समय में कॉलेज में भी 50 फीसदी से ज्यादा शिक्षक भूमिहार ही थे। एक बार मैं विद्या विहार परिसर में आयोजित ब्रह्मर्षि सम्मेलन में चला गया। वहां मंच से वक्ताओं ने आवाज उठाई कि लंगट सिंह कॉलेज में लंगट बाबू की एक प्रतिमा लगाई जानी चाहिए। अब कॉलेज में संस्थापक लंगट सिंह की प्रतिमा लगाई जा चुकी है। 

हमारे समय में भूमिहार फैक्टर परिसर में हर जगह हावी दिखता था। हालांकि विज्ञान संकाय में पढ़ने लिखने का वातावरण था, हमारे समय में पर कला संकाय और बिहार यूनीवर्सिटी का माहौल अच्छा नहीं था। उस जमाने में हॉस्टल में सिर्फ दंबग छात्र ही रह सकते थे। सीधे-सादे लड़के हॉस्टल में जाने से बचते थे। हॉस्टल में मेस का तो कोई रिवाज ही नहीं था। हम अपने कॉलेज में किसी अच्छी कैंटीन को मिस करते थे। हमारी आईएससी बायोलाजी की क्लास में कुल 120 छात्र थे जिसमें कुल पांच छात्राएं थीं, जो सभी कालेज के शिक्षकों की पुत्रियां थीं। एलएस कॉलेज में पढ़ाई के दौरान कई अच्छे दोस्त बने। विष्णु वैभव, विभु वैभव दो भाई। मिथिलेश गुप्ता, आशुतोष गुप्ता। राजेश कुमार, मुरारी कुमार जैसे लोग अब भी संपर्क में हैं। हमारे एक सहपाठी प्रभात 1990 में बीएचयू मेडिकल क्वालिफाई कर गए थे, वे हमें दुबारा पांच साल बीएचयू में पढ़ाई के दौरान मिलते थे। कई नाम अब भी याद हैं जेहन में पर पता नहीं वे कहां हैं।
एलएस कॉलेज के दिन थे वो... 1988



लंगट सिंह कॉलेज की स्थापना 3 जुलाई 1899 को हुई थी। तब यह कॉलेज कलकत्ता विश्वविद्यालय से संबद्ध हुआ करता था। 1915 में इसे सरकारी कॉलेज के तौर पर स्वीकार किया गया। 1917 में बिहार में पहला विश्वविद्यालय बना पटना विश्वविद्यालय तब यह कॉलेज उसका हिस्सा बन गया। 1952 में मुजफ्फरपुर में बिहार विश्वविद्यालय बना, तब लंगट सिंह कॉलेज उसका हिस्सा बन गया।
कई नामचीन लोगों ने पढ़ाया 
देश के कई बड़े नाम लंगट सिंह कॉलेज से जुड़े हैं। देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद यहां शिक्षक रह चुके हैं। आचार्य जेबी कृपलानी, एचआर मलकानी, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर इस कालेज से संबद्ध रह चुके हैं।
जब बापू आए एलएस कालेज में 
 1917 में अपनी पहली चंपारण यात्रा के क्रम में महात्मा गांधी 11अप्रैल 1917 के कॉलेज कैंपस में जेबी कृपलानी और एचआर मलकानी के साथ रुके थे। डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद, जे बी कृपलानी, वाईजे तारपोरवाला, डब्लू ओ स्मिथ और एचआर घोषाल यहां इतिहास के शिक्षक थे। नई पीढ़ी में तमाम लोग इस कॉलेज से निकल कर ऊंचे मुकाम पर पहुंचे हैं। हमारे वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम ने भी एलएस कॉलेज में पढ़ाई की है।
 - विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com



( LANGAT SINGH COLLEGE, MUZAFFARPUR, BIHAR, DUKE HOSTEL  ) 

Saturday, July 23, 2016

बीएचयू के मेस का खाना और मेस के महाराज

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के आचार्य नरेंद्र देव छात्रावास में तीन साल। 1990 से 1993 तक। इस दौरान की तमाम यादें हैं लेकिन सबसे अलहदा है मेस का खाना और मेस के महाराज। 
देश भर के तमाम विश्वविद्यालयों के छात्रवास में मेस चलते हैं। पर बीएचयू यानी काशी हिंदू विश्वविद्यालय के मेस संचालन का तरीका थोड़ा अलग है।
हॉस्टल में कमरा आवंटित हो जाने के तुरंत बाद मेस शुरू नहीं हुआ। तब हमलोग फैकल्टी में मैत्री जलपान गृह तो रात में कहीं और पेट पूजा कर रहे थे। जुलाई 1990 का माह था कुछ दिनों बाद मेस शुरू होने की प्रक्रिया शुरू हुई। हमारे हास्टल में चार मेस थे। वैसे बड़े हास्टल जैसे बिड़ला और ब्रोचा में 18 से 20 मेस हैं। बीएचयू के मेस में छात्रों के बीच से ही कोई मेस मैनेजर तय होता था। वह एक नोटिस चिपका देता था नोटिस बोर्ड पर अमुक तारीख से मेस नंबर 2 शुरू होगी आप कमरा नंबर 22  में संपर्क करें। आपकी पसंद है आप चारों में से कोई भी मेस ज्वाएन करें। तो मुझे याद आता है हमारे पहले मेस मैनेजर थे हमारे सीनियर संजीव मिश्र। एएनडी हास्टल में फैकल्टी ऑफ सोशल साइंसेज के बीए प्रथम वर्ष, द्वितीय वर्ष और तृतीय वर्ष के छात्र रहते थे।   


एक मेस में अधिकतम 50 सदस्य

एक मेस में अधिकतम 50 सदस्य हो सकते थे। कम से कम 30 से भी मेस चलता था। मेस के लिए स्थान बरतन, फर्नीचर विश्वविद्यालय उपलब्ध कराता था। महाराज यानी मेस के रसोइया को थोड़ा सा मासिक वेतन भी विश्वविद्यालय के फंड से मिलता है। पर मेस को नो प्राफिट नो लास के सिद्धांत पर चलाना छात्रों की यानी मेस के मैनेजर की जिम्मेवारी है। यही बीएचयू के मेस की सबसे बड़ी विशेषता है। रविवार से लेकर शनिवार तक का मीनू आप खुद तय करो। कितनी बार मांसाहार अंडे आदि लेना है आप तय करो। रोटी घी चुपडी हो या सादी आप तय करो। पूरी छूट है। हमारे मेस का समान्य मीनू होता था दिन में रोटी, चावल, दाल, सब्जी और एक फल, रात में रोटी सब्जी, दाल चावल और एक मिठाई। हर रविवार की दोपहर ग्रैंड फीस्ट। इसमें एक साबुत मुर्गा का आधा हिस्सा। पूरियां, पुलाव, मिठाइयां आदि। जो शाकाहारी हैं उनके लिए कोफ्ता और पनीर के आईटम । रविवार को हम जमकर खाते थे उसके बाद दोपहर में लंबी नींद। रविवार शाम को मेस बंद रहता था। रात का खाना बाहर लंका पर सेवक होटल में। हां रविवार की दोपहर खाने के बाद मेस के महाराज का स्टाफ हर कमरे में बख्शीश मांगने आता था सिनेमा देखने के लिए।
मेस का खाना कैसा होता था। मेस में आमतौर पर हफ्ते में 4 या 5 शाम नॉन वेज आइटम जरूरत होते थे।  जो शाकाहारी हैं उनके लिए उसके समतुल्य डिश होती थी। आमतौर पर पनीर का आईटम या फिर कोफ्ता। बीएचयू में कुछ मेस सालों भर शाकाहारी भी होते थे। आईआईटी में कुछ शाकाहारी मेस ऐसे थे जहां रोज घी वाली रोटी पेश की जाती थी।

मेस का मैनेजर बनने की होड़ - हमारे मेस की विशेषता थी स्पेशल आइटम छोड़कर बाकी चीजें चाहे जितनी मर्जी खाओ। कई लोगों की तो हास्टल में आकर डाइट बढ़ जाती थी। पढ़ाई के साथ शरीर पर चर्बी छाने लगती थी। कुछ लोग तो मेस के खाने के कारण यूनीवर्सिटी छोड़ना नहीं चाहते थे। हां तो बात मेस मैनेजर की। कई छात्रों में मेस मैनेजर बनने की होड़ रहती थी। कहा जाता है कि मैनेजर बजट में थोड़ा हेरफेर करके अपने खाने का तो पैसा बचा ही लेता था। जब मैनेजर नई जींस खरीदता था तो हम कहते थे मेस की कमाई से खरीदा लगता है। सीधे सादे छात्र मैनेजर बनकर बदनामी मोल नहीं लेना चाहते थे।
हमारे अगले मैनेजर बने आशुतोष त्रिपाठी और शिवलखन सिंह। कई बार शक होने पर मेस की एक कमेटी बना दी जाती थी और मैनेजर का पद रोटेशन पर कर दिया जाता था। पर महाराज और मैनेजर के साठगांठ की बातें हवा में तैरती थीं। मेस के खाने क्वालिटी गिरने पर मैनेजर से शिकायत और बकझक के हालात भी कई बार बनते थे। आपके पास एक मेस को छोड़कर दूसरे मेस में ज्वाएन करने का विकल्प भी  हमेशा खुला रहता था। इसलिए आमतौर पर एक मेस से दूसरे मेस की स्वस्थ प्रतिस्पर्धा रहती थी।

और मेस के टेबल पर बौद्धिक चर्चाएं -  मेस की टेबल पर बैठकर हम एक घंटे तक खाते थे खासकर रात को। इस दौरान टेबल देश दुनिया की बौद्धिक चर्चा से लेकर वीमेंस कालेज की गर्ल फ्रेंड्स और सहपाठियों के नए अफेयर और ब्रेक अप पर भी चर्चा होती थी। जिनकी किस्मत में कोई लड़की नहीं वे फोसला के मेंबर होते थे। ( फ्रस्टेर्टेड वन साइडेट लवर्स एसोशिएशन ) कई टेबल पर बार खाते खाते बहस उग्र रूप भी ले लेती थी। तब कोई सीनियर मामले पर मिट्टी डालने की कोशिश करता। हम सीनियरों का काफी लिहाज करते थे। पर ज्यादातर ऐसी बहस ज्ञान बढ़ाने वाली हुआ करती थीं। क्योंकि इतिहास, राजनीति शास्त्र, मनोविज्ञान, अर्थशास्त्र और समाज शास्त्र में आनर्स की पढ़ाई करने वाले छात्र अपने अपने विषय का ज्ञान मेस की टेबल पर उड़ेलते थे। 
बीएचयू में -एएनडी हॉस्टल के वे दिन। 
बलिया वाले मेस के महाराज - हर साल नया सत्र शुरू होने पर  हर हास्टल में महाराज लोग चक्कर लगाना शुरू कर देते थे। महाराज मतलब रसोईया। यानी कुक। उनका आग्रह होता था कि हमें महाराज रखकर मेस चलाओ। कुछ महाराजों की अच्छी प्रतिष्ठा थी जो क्वालिटी का खाना बनाते थे, कुछ की खराब। बीएचयू के मेस में काम करने वाले महाराज ज्यादातर यूपी के देवरिया जिले के रहने वाले होते थे। वे और उनके सहायक भोजपुरी बोलते थे। हम लोग खराब खााना होने पर शिकायत करते तो महाराज शालीनता से पेश आते। आमतौर पर महाराज लोग बडे़ सहनशील थे।
 बीए तृतीय वर्ष  यानी साल 1992 से 1995 तक मैंने एएनडी और राजाराम छोड़कर अय्यर हास्टल का मेस ज्वाएन कर लिया था। अय्यर विज्ञान संकाय के शोध छात्रों का हास्टल था। इस मेस की खास बात थी कि यह गर्मी की छुट्टियों में में भी बंद नहीं होता था। इस मेस की सदस्यता मुझे अपने सहपाठी परमेश्वर प्रताप के बड़े भाई सिध्देश्वर सिंह मौर्य के कारण मिली थी। अगर मेस कमेटी चाहे तो दूसरे हास्टल के छात्रों को सदस्यता दे सकती है।

अब बात बजट की भी कर लें। साल 1990 में मेस का मासिक बजट 350 रुपये के आसपास आ रहा था। जब 1995 में बीएचयू छोड़कर दिल्ली आ रहा था तब मासिक बजट 550 तक आ रहा था। एक ही समय मे गुणवत्ता के हिसाब से अलग अलग मेस की डायट राशि अलग अलग हो सकती थी। यह तब के बाजार के हिसाब से किफायती खाना था। तमाम खट्टी मीठी यादें हैं मेस को लेकर। पर बस इतना ही कह सकता हूं अपने हास्टल की मेस को हम हमेशा मिस करते हैं।  
 - vidyutp@gmail.com

( BHU, AND HOSTEL, MESS, FOOD, VARANASI, FOSLA ) 


Thursday, July 21, 2016

दुनिया की सबसे विशाल घड़ी – वृहद सम्राट यंत्र - जंतर मंतर जयपुर

जयपुर जंतर मंतर -नाड़ी वलय यंत्र
वैसे तो देश में पांच जंतर मंतर हैं। पर इनमें जयपुर का जंतर मंतर सबसे विशाल है। अपनी विशालता और विशेषताओं के कारण ही इसे दुनिया के विश्व दाय स्मारकों की सूची मे स्थान मिल सका है। सवाई जय सिंह ने देश में कुल पांच शहरों में जंतर मंतर का निर्माण कराया। जयपुर के अलावा ये जंतर मंतर दिल्ली, वाराणसी, उज्जैन और मथुरा में बने हैं। वाराणसी की वेधशाला दशाश्वमेध घाट के पास मान मंदिर महल में है। सवाई जय सिंह से 1724 से 1734 के बीच दस सालों में ही देश में पांच वेधशालाओं का निर्माण कराया। इससे उनकी विज्ञान में गहरी रुचि का पता चलता है।  न सिर्फ सैलानियों बल्कि फिल्मकारों को भी जंतर मंतर अपनी ओर आकर्षित करता है। साल 2006 में आई हॉलीवुड की फिल्म द फाल की शूटिंग जयपुर जंतर मंतर के परिसर में हुई।
जयपुर के जंतरमंतर में कुल 20 स्थायी यंत्रों की श्रंखला है।  इन संरचनाओं का निर्माण कुछ इस तरह किया गया है कि इनकी मदद से नंगी आंखों से खगोल शास्त्र संबंधी गणनाएं की जा सकती हैं। जयपुर के जंतर मंतर का निर्माण 1734 में आरंभ होकर 1738 ईश्वी में पूरा हुआ। यहां विश्व की सबसे बड़ी सूर्य घड़ी है। इस जंतर मंतर के निर्माण में ज्यादातर लकड़ी, चूना- पत्थर और पीतल का इस्तेमाल किया गया है।
नाडी वलय यंत्र

पंडित जवाहर लाल नेहरू डिस्कवरी ऑफ इंडिया में लिखते हैं - सवाई जयसिंह ने इस वेधशाला के निर्माण से पहले विश्व के कई देशों में अपने सांस्कृतिक दूत भेज कर वहां से खगोल-विज्ञान के प्राचीन और महत्वपूर्ण ग्रंथों की पांडुलिपियाँ मंगवाईं थीं और उन्हें अपने पोथीखाने में संरक्षित कर अपने अध्ययन के लिए उनका अनुवाद भी करवाया था। इस वेधशाला के सभी प्राचीन यन्त्र आज भी ठीक अवस्था में हैं। इनके माध्यम से मौसम, स्थानीय समय, ग्रह नक्षत्रों और ग्रहण अदि खगोलीय परिघटनाओं की एकदम सटीक गणना आज भी की जा सकती है। कहा जाता है कि इस वेधशाला की गणना के आधार पर जयपुर के पंचांग का प्रकाशन होता है।

दुनिया की सबसे बड़ी घड़ी - वृहद सम्राट यंत्र को विश्व की सबसे बड़ी सूर्य घड़ी मानी जाती है। यह करीब 90 फीट ऊंचा है। इसके दीवार पर समय बताने के निशान हैं। इसे घंटे, मिनट और मिनट के चौथे भाग तक समझा जा सकता है। इसके अलावा इस जंतर मंतर परिसर में जय प्रकाश यंत्र और राम यंत्र प्रमुख यंत्र हैं।

साल 2010 में यूनेस्को ने इसे वर्ल्ड हैरिटेज सूची में शामिल किया। तब से ही यह देश का 32 विशाल सांस्कृतिक धरोहरों की सूची का हिस्सा बन गया। राजस्थान की राजधानी जयपुर में चांदपोल बाजार से आगे चलते हुए जैसे ही आप हवा महल को पार करते हैं जंतर मंतर दिखाई देने लगता है। यहां पहुंचिए और अतीत के साथ विज्ञान की दुनिया में कुछ घंटे के लिए खो जाइए।
-vidyutp@gmail.com




Tuesday, July 19, 2016

पंजाब के लुधियाना शहर में दो साल

किसका लुधियाना, हीरो साइकिल का लुधियाना, मांटे कार्ले का लुधियाना, या रंग बिरंगे स्वेटर पुलोवर का शहर लुधियाना। इस लुधियाना शहर में दो साल गुजराने का मौका मिला साल 2003 से 2005 के बीच। तब मैं दैनिक जागरण जालंधर में था। अचानक एक दिन संपादक कमलेश रघुवंशी ने बुलाया और कहा आपका तबादला लुधियाना किया जा रहा है। दरअसल जागरण का नया संस्करण लुधियाना से शुरू हो रहा था। प्रिंटिंग प्रेस लगा चंडीगढ़ रोड पर मुंडिका कलां गांव में फोकल प्वाइंट में। तब गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी आए थे अखबार के नए संस्करण का लोकार्पण करने। दो साल लुधियाना में दैनिक जागरण में काम करने का अनुभव अच्छा रहा। यहां हमारे संपादक विनोद शील थे, जिनके सानिध्य में काफी कुछ सीखने का मौका मिला।

हमने लुधियाना में रहने के लिए घर लेने की सोची तो शहर के बीचों बीच रहने की इच्छा हुई। दफ्तर तो शहर के बाहरी इलाके में था। तो हमने घर लिया किदवई नगर में। यह देवकी देवी जैन वीमेंस कॉलेज के बगल में था। प्रसिद्ध सीएमसी हास्पीटल और रेलवे स्टेशन भी नजदीक था।

आज लुधियाना पंजाब का बड़ा औद्योगिक शहर है, पर 1984 से पहले यह छोटा सा शहर था। कोई 500 साल पहले इस शहर की स्थापना सिंकदर लोदी ने की थी। सिंकदर लोदी ने बलूचों के आक्रमण से स्थानीय लोगों की रक्षा के लिए इस शहर में युसूफ खान और निहंग खान नामक दो जनरल बहाल किए थे। तो लोधी वंश के नाम पर इस शहर का नाम लुधियाना पड़ा।

निहंग खान के निधन के बाद लुधियाना पर जलाल खान लोधी का शासन रहा। उसने यहां एक किले का भी निर्माण कराया। जब 1803 में देश में ब्रिटिश शासन हुआ तो लुधियाना के बगल में बह रही सतलुज नदी ब्रिटिश सरकार और महाराजा रणजीत सिंह की सरकार की सीमा बन गई।

लुधियाना का रेलवे स्टेशन जंक्शन है। दिल्ली से जालंधर जाने वाली लाइन पर इस स्टेशन पर एक लाइन धुरी, संगरूर सुनाम, जाखल की ओर जाती है, तो एक नई लाइन चंडीगढ़ को जाती है। यह लाइन न्यू मोरिंडा में अंबाला ऊना लाइन से जाकर मिल जाती है।

1984 में के बाद लुधियाना में उद्योग व्यापार में तेजी से प्रगति हुई। आज लुधियाना शहर में वूलेन गारमेंट बनाने के कई हजार उद्योग धंधे हैं। इसके अलावा साइकिल और साइकिल पार्ट्स, बिस्कुट और ब्रेड की के उद्योग बड़े पैमाने पर हैं। हीरो साइकिल, एवन साइकिल, नीलम साइकिल के उद्योग यहां लगे हैं। वूलेन गारमेंट, मांटे कार्ले, प्रींगल, ओस्टर, ग्रेटवे जैसे दर्जनों बड़े ब्रांड हैं यहां जिनकी दुनिया भर में धूम है। उद्योग धंधों का आलम ये है कि शहर की आबादी 30 लाख को पार कर रही है। यहां से 10 लाख से ज्यादा आबादी तो दूसरे राज्यों से आए मजदूरों की है जो अब पूरी तरह लुधियानावासी हो हो गए हैं। शहर में कुछ ऐसे सिनेमाघर हैं जो सालों भर सिर्फ भोजपुरी सिनेमा ही चलाते हैं। शहर का मिजाज काफी हद तक गुजरात के वापी शहर से मिलता जुलता है।

वैसे लुधियाना में पंजाब एग्रीकल्चर यूनीवर्सिटी नामक प्रसिद्ध कृषि विश्वविद्यालय है जिसका हरित क्रांत में बडा योगदान रहा। आबादी के बोझ लुधियाना शहर पर बढ़ता जा रहा है, इसलिए अब शहर क नई टाउन प्लानिंग की जरूरत महसूस की जा रही है। दो साल के लुधियाना प्रवास में कई अच्छे दोस्त बने पर 2005 में अप्रैल का महीना था जब मैं एक नए शहर पानीपत के लिए प्रस्थान कर गया।  

-    विद्युत प्रकाश मौर्य      
(LUDHIANA, PUNJAB, HERO CYCLE, WOOLEN GARMENTS )

Sunday, July 17, 2016

विजय सुपर और लंब्रेटा सेंटो की जोड़ी

जिन लोगों का बचपन सत्तर और अस्सी के दशक के बीच गुजरा होगा उन्हें विजय सुपर स्कूटर की याद होगी। इसके साथ ही सी कंपनी का एक स्कूटर आता था लंब्रेटा सेंटो। देश आजाद होने के बाद तमाम सरकारी क्षेत्र की कंपनियां आईं जो आम लोगों की जरूरतों की चीजें बनाती थीं। जैसे एचएमटी की घड़ियां, इसी का टेलीविजन सेट आदि आदि। तो आम लोग जो कार नहीं खरीद सकते थे उन्हे परिवहन का सस्ता विकल्प देने के लिए भारत सरकार ने स्कूटर बनाने का फैसला किया।

इसके लिए स्कूटर इंडिया लिमिटेड की स्थापना 1972  में सार्वजनिक उपक्रम के रुप में की गई थी। तब भारत में स्कूटर बनाने के लिए  इटली की दिवालिया हो गई आटोमोबाइल कंपनी के पुराने संयंत्र की मशीनरी को आयात किया गया था। उपक्रम ने 1975 में विजय सुपर और लम्ब्रेटा नाम से दुपहिया स्कूटर का उत्पादन शुरू किया। विजय सुपर का निर्माण घरेलू बाजार और लम्ब्रेटा सेंटो का विदेशी बाजारों को ध्यान में रखते हुए किया गया था। आम जनता को इस कंपनी से बहुत उम्मीदें भी थीं।
 पर यह ब्रांड कभी बाजार नहीं पकड़ पाया। उसके मुकाबले बाजार में बजाज कंपनी थी। बाद में वेस्पा भी आ गई। कुछ वर्षों के बाद स्कूटर इंडिया ने अपना कारोबार बढ़ाते हुए तिपहिया का उत्पादन शुरू किया। 1983 में विश्व कप जीन वाली टीम इंडिया को एक विजय सुपर स्कूटर उपहार में दिया गया था। पर यह स्कूटर कभी बाजार में हिट नहीं हो सका।

सरकार ने  साल 2011 में खस्ताहाल सार्वजनिक उपक्रम स्कूटर इंडिया लिमिटेड के विनिवेश का फैसला किया। इसके तहत सरकार उपक्रम में अपनी 95 प्रतिशत पूरी हिस्सेदारी निजी कंपनी को बेच दी गई। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में कैबिनेट की बैठक में विनिवेश का फैसला लिया गया। अब स्कूटर इंडिया एक निजी कंपनी है विक्रम ब्रांड के नाम से तिपहिया बनाती है।

दिल्ली के कीर्ति नगर इलाके में स्कूटर इंडिया का वीरान सा सरकारी परिसर अब भी देखा जा सकता है। साइनबोड धुंधला हो चुका है। जो कंपनी के विस्मृत इतिहासका साक्षी बना हुआ है। पर देश में तमाम ऐसे परिवार हैं जिनकी स्मृतियां विजय सुपर स्कूटर के साथ जुड़ी हुई हैं। अभी भी देश के कई शहरों में पुराना विजय सुपर किसी के घर में शान से खड़ा देखा जा सकता है। खराब औसत और स्पेयर पार्ट्स नहीं मिलने के कारण कई घरों में ये स्कूटर कबाड़ में तब्दील हो गया। वहीं पूरी दुनिया में लंब्रेटा सेंटो के आज भी फैन क्लब बने हुए हैं। कई पुराने स्कूटर के शौकीन विजय सुपर को अभी चलाने की कोशिश करते हैं।
हालांकि निजी क्षेत्र कंपनी बन चुकी स्कूटर इंडिया लिमिटेड जिसका प्लांट उत्तर प्रदेश के लखनऊ में है,  ने एक बार फिर विजय सुपर ब्रांड को बाजार में उतारने के बारे में विचार बनाया था। अगर ऐसा हुआ तो इतिहास फिर से जीवित हो उठेगा।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य

(VIJAY SUPER, SCOOTER INDIA LIMITED, VIKRAM )