Saturday, January 9, 2016

मैंगो सिटी मालदा टाउन - ब्रह्मपुत्र मेल से

मुझे कई बार ब्रह्मपुत्र मेल ने मंजिल तक पहुंचाया है। इस बार हमारी मंजिल थी पश्चिम बंगाल का शहर मालदा टाउन। 76वीं इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस में शामिल होने बड़ी संख्या में इतिहासकार इसी ट्रेन से जा रहे थे। हम इसी ब्रह्मपुत्र मेल के स्लिपर क्लास के एक कोच में सवार थे।

पूर्वोत्तर जाने वाली ट्रेनों की घोर उपेक्षा -  रेलवे में यात्री सुविधाओं में सुधार और स्टेशनों को चमकाने की खूब बात की जाती है। पर इसका असर देश की राजधानी दिल्ली से पूर्वोत्तर की ओर जाने वाली ट्रेनों में बिल्कुल नहीं दिखाई देता। लालगढ़ से ढिब्रूगढ़ तक जाने वाली अवध आसाम एक्सप्रेस, आनंदविहार से गुवाहाटी जाने वाली नार्थ इस्ट एक्स, दिल्ली से ढिब्रूगढ़ जाने वाली  ब्रह्मपुत्र मेल, न्यू अलीपुर दुआर तक जाने वाली महानंदा एक्सप्रेस ये सभी दैनिक ट्रेनें उपेक्षा का शिकार हैं।
किसी में भी अब तक एलएचबी कोच नहीं लगे। मोबाइल चार्जर दिखाई नहीं देते। ब्रह्मपुत्र मेल के टायलेट में तो जाले लगे दिखाई दिए। मानो कोच की सफाई महीनों से नहीं हुई हो। हालांकि ये सारी ट्रेनें भारतीय रेल को राजस्व तो खूब देती हैं पर इनसे सौतेला व्यवहार क्यों। यह सवाल इन ट्रेनों में सफर करने वाले बार बार पूछते हैं।

आठ राज्य उपेक्षा के शिकार -  आठ राज्यों में अपनी सेवाएं देने वाले तमाम फौजी इन ट्रेनों से अपने गंतव्य को जाते हैं। यहां तक की ढिब्रूगढ़ राजधानी भी उपेक्षा की शिकार ट्रेनों में शामिल है।

कुछ साल पहले शुरू हुई पूर्वोत्तर संपर्क क्रांति की रैक भी बहुत पुरानी और घटिया किस्म की है। ये ट्रेन हफ्ते में तीन दिन चलती है। पर इसकी सफाई व्यस्था भी घोर उपेक्षा का शिकार है। पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर 16 से देर रात ब्रह्मपुत्र मेल चुपके से रवाना हो जाती है। इस प्लेटफार्म पर पहुंच कर भी आपको लगता है कि आप किसी छोटे शहर के बदरंग रेलवे स्टेशन पर पहुंच चुके हैं।

मैंगो सिटी मालदा तक ब्रह्मपुत्र मेल से
मालदा का रथबारी चौक। 
मालदा टाउन से पहले आता न्यू फरक्का रेलवे जंक्शन। यहां पर गंगा नदी पर पुल और बैराज (बांध) बना है। रेल पुल के ठीक बगल में सड़क पुल भी है। पुल की लंबाई दो किलोमीटर 200 मीटर है। यह पुल 1971 से अपनी सेवाएं दे रहा है।

रेल की पटरियां और सड़क साथ साथ कदम ताल करते दिखाई देते हैं। ऐसा पुल पहली बार देखा मैंने। यहां गंगा नदी पर बांध 1975 में बनकर तैयार हुआ। एक फीडर कैनाल से गंगा का पानी यहां से हुगली नदी में पहुंचाया जाता है। फरक्का के बाद आ जाती हमारी मंजिल मालदा टाउन। बंगाल का सीमांत शहर। रेलवे स्टेशन काफी बड़ा है। कुल 5 प्लेटफार्म हैं। यहां रेलवे का डीआरएम दफ्तर भी है।

यह दिसंबर की एक ठंडी सुबह है। हमारा ठिकाना बना मालदा टाउन शहर के रेलवे रोड पर होटल खोनिस रेसीडेंसी। होटल मध्यम दर्जे का है। मालदा शहर में रथबारी चौक प्रमुख जंक्शन है। यहां 1944 का स्थापित मालदा कालेज की इमारत दिखाई देती है। रथबारी में एनएच 34 क्रास करती है, जहां से बंगाल के तमाम बड़े शहरों के लिए बसें मिल जाती हैं। हमारे मालदा से लौटने के बाद शहर में तनाव और हिंसा की खबरें आई। यह सुनकर दुख हुआ। वास्तव में मालदा की पहचान मैंगो सिटी के तौर पर है। लोकप्रिय मालदह आम का रिश्ता मालदा है। वैसे शहर में आप कई किस्म की बंगाली मिठाइयों का स्वाद ले सकते हैं। भला रोज रात को खाने के बाद मिष्टी खाने वाले दंगाई कैसे हो सकते हैं।
-vidyutp@gmail.com
(BRAHMPUTRA MAIL,  MALDA TOWN,  OLD DELHI,  OLD COACHES) 

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