Friday, December 25, 2015

सालों भर लुभाता है पश्चिमी घाट का सौंदर्य

Western Ghats - MATHERAN
पश्चिमी घाट यानी दिलकश नजारे। यह कोई एक जगह नहीं। इसका विस्तार कई राज्यों में हैं। सौंदर्य ऐसा है चप्पे चप्पे में कि इसे साल 2012 में में विश्व विरासत साइट का दर्जा मिला। इसके तहत कोई 1600 किलोमीटर लंबी पर्वत श्रंखला आती है।

 माना जाता है कि ये पर्वत हिमालय से भी ज्यादा पुराने हैं। अपने पारिस्थित विभिन्नता के कारण इसे अलग पहचान मिली है। इसका विस्तार गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु जैसे पांच राज्यों में है।

Western Ghats- MAHABALESWAR
इसकी सीमा में देश के कई बड़े हिल स्टेशन और नदियां और पहाड़ आते हैं। पश्चिम घाट में कुल 1 लाख 40 हजार वर्ग किलोमीटर के पहाड़ आते हैं। केरल में पालघाट के 30 किलोमीटर के दायरे को छोड़ दें तो ये पहाड़ कहीं न कहीं आपस में जुडे हुए हैं।

 इसलिए पश्चिमी घाट की एक वैश्विक पहचान है। इन घाटों का भारत के मानसून के गति से भी जुड़ाव है। बारिश के दिनों में इनका सौंदर्य और बढ़ जाता है। ये विश्व के सर्वाधिक हरे भरे इलाकों में गिने जाते हैं। इस क्षेत्र में पौधे के 650 के आसपास प्रजातियों की पहचान की गई है। वहीं 31 तरह के स्तनपायी जानवर इस क्षेत्र में हैं।

सबसे पहले महाराष्ट्र के सहयाद्रि रेंज की बात करें तो इसमें माथेरन, लोनावाला, खंडाला, महाबलेश्वर, पंचगनी जैसे इलाके आते हैं। बारिश के दिनों में माथेरन की यात्रा बंद करनी पड़ती है तो महाबलेश्वर में भी कुछ ऐसा ही होता है। पर महाबलेश्वर में तो बादलों का ऐसा डेरा होता है कि यहां बादलों पर शोध के लिए संस्थान खोला गया है। मुंबई से पुणे जाते समय आप लोनावाला और खंडाला का सौंदर्य देख सकते हैं। यह मुंबई के लोगों को खूब लुभाता है।
TABLE LAND OF PANCHGANI

कोंकण रेलवे से होकर गुजरते समय पश्चिमी घाट का सौंदर्य नजर आता है जो गोवा से गुजरते हुए भी दिखाई देता है। गोवा में दूध सागर के पास तो इसका अदभुत नजारा दिखाई देता है। 

इसके बाद आप कर्नाटक में प्रवेश कर जाते हैं। केरल का मुन्नार जैसा हिस्सा भी इसके तहत आता है। आप चलते जाइए इसका सौंदर्य खत्म होने का नाम नहीं लेता।

वहीं तमिलनाडु के नीलगिरी रेंज में ऊटी, कोटागिरी, कोडाइकनाल जैसे इलाके आते हैं। ऊटी सालों भर सैलानियों को मोहित करता है तो कोडइकनाल विदेशियों को भी हमेशा से लुभाता रहा है। पश्चिम भारत से लेकर दक्षिण भारत तक पश्चिमी घाट का विस्तार है।

NILGIRI HILLS- OOTY (TN) 
 हालांकि पांच राज्यों में विस्तारित क्षेत्र होने के कारण इनकी देखभाल दुष्कर कार्य है। केंद्र सरकार के पर्यावरण और वन मंत्रालय के तहत नेचुरल हेरिटेज मैनेजमेंट कमिटी का गठन किया गया  है। यह समिति सात अलग अलग कलस्टर में फैले इस क्षेत्र की देखभाल के लिए उत्तरदायी है।

बालीवुड के फिल्मकारों को भी इसका सौंदर्य खूब भाता है इसलिए तमाम फिल्मों में पश्चिमी घाट के पहाड़ों के नजारे आप देख सकते हैं। हिंदी फिल्मों में लोनावाला, खंडाला, वाई, पंचगनी, महाबलेश्वर, दूध सागर से लेकर ऊटी तक के नजारे खूब फिल्माए गए हैं। तो कभी वक्त मिले तो चलिए पश्चिमी घाट की ओर...
( WESTERN GHATS, NILGIRI, SAHYADRI, DOODH SAGAR) 


Thursday, December 24, 2015

अभय मुद्रा में 80 फीट के गौतम बुद्ध

साल 2011 में सारनाथ में एक और आकर्षण जुड़ गया है वह है विशाल बुद्ध प्रतिमा। वाराणसी के पास स्थित दर्शनीय स्थल सारनाथ में वैसे तो सैलानियों कई आकर्षण है। सारनाथ के इतिहास में अब एक नया अध्याय जुड गया है। अब जब आप सारनाथ जाएंगे तो वहां भगवान बुद्ध की चलायमान अभय मुद्रा में बनी देश की सबसे ऊंची लगभग 80 फीट प्रतिमा देखने को मिलेगी। हालांकि सारनाथ में पहले से ही बुद्ध की प्रतिमा है लेकिन बुद्ध की चलायमान प्रतिमा अनूठी है।

 ये प्रतिमा सारनाथ संग्रहालय के पास ही थाई बौद्ध विहार में स्थापित की गई है। इसके निर्माण में कुल 14 साल का वक्त लगा है। प्रतिमा के निर्माण का कार्य 1997 में आरंभ हुआ था। हालांकि इसके निर्माण की योजना 1970 में ही बनी थी। इसका निर्माण भारत और थाईलैंड के सहयोग से हुआ है। ये प्रतिमा थाई बौद्ध विहार के ढाई एकड़ के परिसर में स्थित है। इसके निर्माण में 2 करोड़ की राशि खर्च हुई है। इसके निर्माण में कई बौद्ध संस्थाओं ने दान दिया है। प्रतिमा के आसपास खूबसूरत पार्क है। इसे वाराणसी के पास चुनार से लाए गए पत्थरों से बनाया गया है। इसमें कुल 815 पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। इस प्रतिमा का अनावरण 16 मार्च 2011 को किया गया।


हैदराबाद के हुसैनसागर झील में भी गौतम बुद्ध की ग्रेनाइट से बनी प्रतिमा लगी है लेकिन ये प्रतिमा 60 फीट के आसपास की है। लेकिन सारनाथ में लगी गौतम बुद्ध की प्रतिमा 80 फीट की होने के कारण देश में सबसे ऊंची मानी जा रही है। बोधगया में ज्ञान प्राप्ति के बाद सारनाथ ही वह जगह जहां गौतम बुद्ध ने अपना पहला संदेश उन पांच शिष्यों को दिया था जो कभी गौतम बुद्ध का साथ छोड़कर चले गए थे। इस घटना को धर्म चक्र परिवर्तन की संज्ञा दी गई थी। गौतम बुद्ध के जीवन में और बौद्ध धर्म के इतिहास में सारनाथ का खास महत्व है।

कैसे पहुंचे-  वाराणसी जंक्शन से छह किलोमीटर दूर सारनाथ पहुंचना आसान है। यहां पर धमेक स्तूप, चौखंडी स्तूप, मूलगंध कुटी मंदिर, संग्रहालय, सारनाथ के खंडहर, सुरंग, चिड़ियाघर जैसी कई चीजें देखने लायक पहले से ही हैं। अब सारनाथ में बौद्ध प्रतिमा बड़ा आकर्षण बन गई है। इसलिए जब आप अगली बार वाराणसी जाएं तो सारनाथ में गौतम बुद्ध की प्रतिमा के दर्शन करना न भूलें।हां सारनाथ को घूमने का सबसे बेहतर तरीका है कि ज्यादा से ज्यादा पैदल चलें।

- विद्युत प्रकाश मौर्य
( BUDDHA, SARNATH, VARANASI,  BANARAS, UTTRAR PRADESH))


Sunday, December 20, 2015

रेलवे की विरासत- मुजफ्फरपुर पहुंचा डेहरी-रोहतास का लोकोमोटिव

कभी डेहरी रोहतास लाइट रेलवे की मातृ कंपनी रोहतास इंडस्ट्रीज लिमिटेड को अपनी सेवाएं देने वाला लोकोमोटिव अब मुजफ्फरपुर जंक्शन रेलवे स्टेशन के बाहर शान से विराजमान है। ये लोकोमोटिव आते जाते लोगों को स्टीम इंजन ( भाप से चलने वाले) दौर की याद दिलाता है। जो लोग सन 2000 के बाद पैदा हुए हैं उन्होंने भारतीय रेलवे में स्टीम इंजन नहीं देखा होगा। क्योंकि आजकल ट्रैक पर डीजल या बिजली से संचालित इंजन ही दौड़ते हैं। वे इसे देखकर स्टीम इंजन के दौर को जान सकते हैं। कभी सिटी बजाता धुआं उड़ाया ये लोकोमोटिव अब शांत खड़ा है। पर मौन रहकर आपको इतिहास में ले जाता है।

पांच दिसंबर 2015 को पूर्व मध्य रेलवे के महाप्रबंधक एके मित्तल ने इसका लोकार्पण किया, जिससे आमजन को रेलवे के बारे में जानकारी मिल सके। पर यह 2005 से 2009 के मध्य रेलमंत्री रहे लालू प्रसाद यादव की संकल्पना थी जिन्होंने बंद पड़े रोहतास इंडस्ट्रीज का डालमियानगर से सारा कबाड़ खरीदने का फैसला किया। इस कबाड़ में कई लोकोमोटिव शामिल थे जिनमें से एक आरआईएल 06 भी था। अब इसे रंग रोगन करके रेलवे स्टेशन के बाहर लगा दिया गया है, जिसे आते जाते लोग कौतूहल से देखते हैं। हालांकि ऐसे लोकोमोटिव आप देश के कई बड़े शहरों के रेलवे स्टेशनों के बाहर देख सकते हैं, जो अपने क्षेत्र के रेलवे इतिहास की कहानी सुनाते हैं।

वाल्कन फाउंड्री का लोकोमोटिव -  आरआईएल 06 नामक ये लोकोमोटिव ब्राडगेज ट्रैक ( 5 फीट 6 ईंच) का है जो रोहतास उद्योग समूह को 1967 से 1984 तक अपनी सेवाएं देता रहा। जब 1984 में रोहतास इंडस्ट्रीज पूरी तरह बंद हो गई तब से ये डालमियानगर के बीजी शेड में कबाड़ की तरह ही पड़ा था। लेकिन इसके पहले यह 1967 से 1983 तक रोहतास इंडस्ट्रीज को अपनी सेवाएं देता रहा। इस लोकोमोटिव का निर्माण ब्रिटेन के लंकाशायर की कंपनी वालकन फाउंड्री ने 1908 में किया था। वालकन से ईस्ट इंडियन रेलवे ने कुल 10 लोकोमोटिव एक साथ खरीदे थे। यह 0-6-4 टैंक मॉडल का स्टीम लोकोमोटिव है। इसने छह दशक तक ईस्ट इंडियन रेलवे को अपनी शानदार सेवाएं दीं।
(सभी फोटो - संतोष कुमार सारंग ) 

रोहतास इंडस्ट्रीज ने खरीदा -  कहते हैं लोहा कभी पुराना नहीं होता, अगर आप उसकी देखभाल करते रहें। इसलिए 60 साल पुराने लोकोमोटिव को रोहतास इंडस्ट्रीज ने अपने औद्योगिक इस्तेमाल के लिए खरीद लिया था। भले रोहतास इंडस्ट्रीज का कारोबार डालमियानगर में बंद हो गया पर ये लोकोमोटिव अभी चालू हालत में थे। पर कई दशक तक शेड में पड़े पड़े ये कबाड़ में तब्दील होने लगे थे। तो तकरीबन दो कंपनियों में आठ दशक तक धुआं उड़ाते हुए सफर करने वाला लोकोमोटिव अब लोगों के बीच कौतूहल बन कर खड़ा है।


( MUZAFFARPUR, VULCAN FOUNDRY LOCOMOTIVE, DEHRI ROHTAS LIGHT RAILWAY) 

Saturday, December 19, 2015

यादों में रचा बसा सोनपुर मेला

जब भी नवंबर महीना आता है देश के किसी भी कोने में रहूं, सोनपुर मेला जरूर याद आता है। कार्तिक गंगा स्नान के साथ ही सोनपुर मेले के तंबू गड़ जाते हैं। गंगा स्नान के लिए नारायणी (गंडक) और गंगा के संगम पर लाखों लोगों की भीड़ उमड़ती है। पश्चिम की तरफ सोनपुर और पूरब की तरफ हाजीपुर में नदी तट  पर कई किलोमीटर तक श्रद्धालुओं की स्नान का पुण्यलाभ पाने के लिए भीड़ उमड़ती है। इधर कई सालों से वैशाली और सारण जिला प्रशासन की ओर से स्नानार्थियों के लिए बेहतर इंतजाम भी किए जा रहे हैं। गंगा स्नान के साथ ही सोनपुर मेला शुरू हो जाता है जो अब एक महीने तक चलता है। पहले आधिकारिक तौर पर मेला सिर्फ 15 दिनों का होता था। लेकिन यह आगे भी 20 से 30 दिनों तक चलता रहता था। 

सोनपुर मेला उसी पौराणिक जगह पर लगता है जहां कभी गज और ग्राह में भयंकर युद्ध हुआ था। गज (हाथी) विष्णु का भक्त था, ऐसी मान्यता है कि उसे बचाने के लिए विष्णु स्वयं यहां आए थे। इसलिए ये हरिहर क्षेत्र है। इलाके में लोग उसे हरिहर क्षेत्र का मेला कहते हैं। तो वज्जिका के अपभ्रंश में गांव गांव के लोग छतर मेला कहते हैं।

वह साल 1978 था, जब मैं दूसरी कक्षा का छात्र था। पिता जी के साथ पहली बार सोनपुर मेले में गया था। वहां से मेरे लिए एक स्वेटर खरीदा गया था। 40 रुपये में। इसी मेले में पहली बार मैंने मसाला डोसा खाया था। पूर्वोत्तर रेलवे महिला समिति के स्टाल पर।

हाथी बाजार - तो जनाब सोनपुर मेले में जब हाजीपुर की ओर से पुराने लोहे पुल से गुजरते हैं तो सबसे पहले आता है हाथी बाजार। मेले में बिकने आए हाथियों को महावत गंडक नदी में नहलाने के बाद उन्हें रंग रोगन से सजाते हैं। उनकी पीठ पर रंगीन चंदोबे लगाए जाते हैं। हर साल ये खबर बनती है कि अमुक हाथी इतना महंगा बिका। हालांकि अब हाथी पालने शौक कम होता जा रहा है पर मेले में अभी हर साल सैकड़ो हाथी बिकने आते हैं। हाथी ही क्यों बैल, गाय भैंस, ऊंट सब कुछ बिकता है। चिड़ियों के लिए तो अलग से चिड़िया बाजार है यहां। भले मेला खत्म हो जाए चिड़िया बाजार सालों भर चिड़िया बाजार ही कहलाता है।

मीना बाजार - मेले का खास आकर्षण मीना बाजार होता है। इसमें कास्मेटिक के सामान बिकते हैं। लखनऊ का मीना बाजार, मुंबई का मीना बाजार तो दिल्ली का मीना बाजार घूमते जाइए। बिहार में एक शहर है लखीसराय। यह शहर सुहाग की निशानी सिंदूर बनाने के लिए जाना जाता है। 

सोनपुर मेले में कई सिंदूर कंपनियों को स्टाल आते हैं। इन स्टालों में पर अक्सर सिंदूर का पैकेट खरीदने पर कैलेंडर मुफ्त में मिलता था। ये सिंदूर कंपनियां ज्यादातर बिहार के लखीसराय की होती हैं। मेले में आने वाले लोग ठाकुर प्रसाद वाराणसी के स्टाल से भी पांचांग कैलेंडर ले जाना नहीं भूलते। मेले का प्रमुख आकर्षण होता है कश्मीर से आने वाली कश्मीरी शॉल की दुकानें। कश्मीरी शाल के कद्रदान यहां जरूर पहुंचते हैं। इसके साथ ही अलग अलग जिलों के खादी भंडार से स्टाल मेले में आते हैं।

थियेटर और कैबरे - एक समय तक सोनपुर मेले में थियेटर और कैबरे खास आकर्षण होते थे। कानपुर का गुलाब थियेटर, शोभा थियेटयर की खूब धूम रहती थी। पर बाद में अश्लीलता का आरोप लगने पर इनकी आवक बंद हो गई। बिहार सरकार का सूचना एवं जनसंपर्क विभाग और पर्यटन विभाग मेले के लिए खास इंतजाम करता है। सूचना जनसंपर्क विभाग के स्थायी पंडाल में रोज सांस्कृतिक आयोजन होते हैं। इसमें लोकगीतों की खूशबु महसूस की जा सकती है। अब मेला सरकारी तौर पर एक महीने का होता है। तो आप रोज मेले में संगीत का आनंद ले सकते हैं।

पर मेला इतना ही नहीं है। यहां लकड़ी के फर्नीचरों का भी बाजार होता है। मेला खत्म होने तक फर्नीचर सस्ते होने लगते हैं। कई लोग इंतजार करते हैं सस्ती खरीदारी का। पुरानी पीढ़ी के लोग बताते हैं कि कभी मेले में सब कुछ बिकता था। यहां तक की गुलाम भी बिकते थे। बदलते वक्त के साथ मेला बदल रहा है। मेले में आने वाले तमाम उत्पाद अब बाजार में भी मिलने लगे हैं। पर सोनपुर मेले का आकर्षण कम नहीं हुआ है। 

 साल 1978 के बाद अनगिनत साल मेले में लगातार जाने का मुझे मौका मिला और मेले की बदलती फिजां को महसूस भी किया। पर इन बदलाव के बीच मेले का का आकर्षण कम नहीं हुआ। सोनपुर से बहुत दूर रहता हूं। पर दिल के किसी कोने में तो सोनपुर मेले की खुशबू रची बसी रहती है।

 ( SONEPUR FAIR, HAJIPUR, BIHAR TOURISM, ELEPHANT, MEENA BAJAR, HARIHAR NATH TEMPLE, GANGA GANDAK RIVER) 

कुछ और खरीददारी हो जाए घर और परिवार के लिए....सोनपुर मेला आज भी गांव से आने वाले लोगों के लिए साथ ही शहरी लोगों के लिए बड़ा आकर्षण रखता है।
सिंदूर. चंदन और भी बहुत कुछ मिलता है मेले में...
चलो झूला झूलें....सोनपुर मेले में



Friday, December 18, 2015

चांदनी चौक की गलियों का स्वाद – जयतारा स्वीट्स

वैसे तो पुरानी दिल्ली की जिस गली से आप गुजरें उसकी कुछ खास बात जरूर है। पर हम जा पहुंचे सोने चांदी के गहने बेचने वाले पुराने दरीबा बाजार के पास गली पीपल में। मुहल्ले का नाम है धर्मपुरा। इस मुहल्ले में एक छोटी सी दुकान दिखाई देती है जयतारा स्वीट्स। वैसे तो दुकान देखने में छोटी है पर है कई दशकों पुरानी। महज कुछ चीजें रोज यहां बनती हैं। पर इसके स्वाद के दीवाने देश के बाहर तक हैं। विदेशी सैलानियों पुरानी दिल्ली की गलियां दिखाने वाले टूरिस्ट गाइड जब यहां पहुंचते हैं तो इस मिठाई और नमकीन की दुकान के स्वाद के बारे में बताते हैं। ये दुकान एक जैन परिवार द्वारा संचालित है। इसलिए खान पान की शुद्धता में जैन परंपराओं का काफी ख्याल रखा जाता है। इस दुकान को 1944 में ताराचंद जैन (सोनीपत वाले) ने अपने पिता बद्री प्रसाद जैन के साथ आरंभ किया था।


इस दुकान से जुड़े तीसरी पीढ़ी के सख्श सतीश भारती बताते हैं कि जैन धर्म के अनुसार छने हुए जल का अपना महत्व होता है तो जयतारा स्वीट्स में केवल छने हुए जल का ही इस्तेमाल किया जाता है। आपको दुकान के नल पर हमेशा जल को छानने के लिए छन्नी लगी दिखाई देगी। व्यवहार में शुद्धता का निर्वाह करना बहुत मुश्किल  काम है। पर ऊंचे धार्मिक मूल्यों के कारण जयतारा स्वीट्स में इन नियमों का पालन सात दशकों से करता आ रहा है।

मटर समोसा और घेवर - जयतारा स्वीट्स का मटर समोसा फेनी और घेवर काफी लोकप्रिय है। मौसम के बदलते मिजाज और त्योहारों की रंगत को ध्यान में रखते हुए यहां पर खास किस्मों की मिठाइयां बनाई जाती हैं। यहां की मसालेदार खस्ता कचौड़ी और मटर के समोसे मशहूर हैं, जिनके साथ आलू की सब्जी की बजाय खास तौर पर बनी मेथी की चटनी परोसी जाती है। इसके अलावा यहां आप लजीज कचौड़ी और नमकीन का भी स्वाद ले सकते हैं।

आलू जिमीकंद नहीं - जैन सिद्धांतों के मुताबिक जमीन के अंदर उगने वाले खाद्य पदार्थ जैसे आलू, गाजर मूली आदि खाने को वर्जित बताया गया है। इसलिए यहां समोसे में आलू नहीं डाला जाता। वे खास तौर पर मटर समोसा बनाते हैं। साल के उन दिनों भी जब मटर महंगा होता है यहां मटर समोसा ही बनता है। त्योहारों के मौसम में यहां घेवर की मांग खूब बढ़ जाती है। जो एक बार जयतारा की मिठाई खा लेता है उनके स्वाद का मुरीद हो जाता है। यहां बनी मिठाइयों में चांदी के वर्क का इस्तेमाल नहीं किया जाता। 2015 में ताराचंद जैन नहीं रहे पर उनके द्वारा खोली गई ये दुकान अपने स्वाद का जादू बिखेर रही है।

कैसे पहुंचे – पता है - 2283 धर्मपुरा, दरीबा, चांदनी चौक। जयतारा स्वीट्स तक पहुंचने के लिए आप लालकिला से फतेहपुरी मसजिद की तरफ चलते समय बायीं तरफ स्थित दरीबा कला बाजार में पहुंचकर गली पीपल पूछिए। संकरी गलियों से होते हुए आप यहां पहुंच जाएंगे। (फोन -9811008716,9811025210)

( CHANDNI CHAUK, JAITARA SWEETS, MATAR SAMOSA, GHEWAR, FENI, OLD DELHI, GALI PIPAL)

Wednesday, December 16, 2015

आगरा का लालकिला- कभी था बादलगढ़

दिल्ली का लालकिला तो देश भर में प्रसिद्ध है पर एक लाल किला आगरा में भी है। लाल किला क्यों.. क्योंकि यह लाल पत्थरों से बना है। अगर आकार की बात करें तो आगरा का लालकिला दिल्ली से भी विशाल है। यह 1983 से ही यूनेस्को की विश्वदाय स्मारकों की सूची में शामिल है। पर ताजमहल देखने आने वाले सैलानी कम ही आगरा के किले में पहुंचते हैं। इसे किला ए अकबरी के नाम से भी जानते हैं।

कहा जाता है कि यह किला मूल रूप से 11वीं सदी का है। कभी इसका नाम बादलगढ़ हुआ करता था। क्योंकि इसका पुनर्निर्माण सिकरवार राजपूत राजा बादल सिंह बनवाया था। इस किले में दिल्ली के शासक सिकंदर लोदी ( 1488-1517) के रहने का भी प्रमाण मिलता है। सिंदकर लोदी के काल में आगरा को देश की दूसरी राजधानी बनने का गौरव प्राप्त हुआ। पानीपत की लड़ाई में पराजित होने तक उसका बेटे इब्राहिम लोदी के कब्जे में ये किला रहा। इसके बाद ये किला बाबर के कब्जे में आ गया।1530 में इसी किले में हिमायूं का राज्याभिषेक हुआ। 

1540 में हुमायूं के शेरशाह से पराजित होने के बाद यह किला सूरी वंश के कब्जे में आ गया। 1555 में हुमायूं इस किले पर दुबारा कब्जा कर सका। 1556 के पानीपत की दूसरी लड़ाई में हेमचंद्र विक्रमादित्य को पराजित करने के बाद अकबर इस किले में 1558 में आया। अकबर का समकालीन इतिहासकार अबुल फजल भी इस किले को बादलगढ कहता है। हालांकि तब यह बदहाल था, अकबर ने राजस्थान से लाल पत्थर मंगाकर इस किले को भव्य रूप में बनवाया। तकरीबन 4000 शिल्पी ने लगातार काम करके 8 साल में इस किले को नया रूप प्रदान किया। 1573 से यह किला अब इस रूप में दिखाई दे रहा है। बाद में यह किला मराठों के अधिकार में भी लंबे समय तक रहा। पर 1803 में यह किला ब्रिटानिया हुकुमत के अधीन आ गया।

आगरा का यह किला 94 एकड़ में विस्तारित है। यह अर्धवृताकार संरचना में है। इसमें कुल चार प्रवेश द्वार हैं जो चार तरफ खुलते हैं। खिजरी गेट यमुना नदी की तरफ खुलता है। पर इसमें दिल्ली गेट और लाहौर गेट प्रमुख हैं। चार दरवाजों में दिल्ली गेट सबसे विशाल है। इसके निर्माण में संगमरमर का इस्तेमाल हुआ है। इस गेट के अंदर जाने पर आपको हाथी गेट दिखाई देता है। यहां दो विशाल हाथी स्वागत द्वार पर बनाए गए हैं। हालांकि आगरा का किला देखने आने वाले सैलानी इसमें लाहौर गेट ( या अमर सिंह गेट) से प्रवेश करते हैं। दिल्ली गेट का इलाका सेना के कब्जे में है। इसलिए आप किले का पूरा हिस्सा नहीं घूम सकते हैं।

किले के अंदर देखी जाने वाली इमारतों में दीवान-ए-आम प्रसिद्ध है। यहां से राजा आम जनता को दर्शन देते थे और उनकी समस्याएं सुनते थे। इसके अलावा किला में दीवाने खास है जो राजा का आवास हुआ करता था। किले के जहांगीर महल है जिसका निर्माण अकबर के बेटे जहांगीर ने करवाया था। किले के अंदर शीश महल, खास महल, अंगूरी बाग, मीना मस्जिद, नगीना मस्जिद और मीना बाजार भी है। किले के अंदर मुसम्मन बुर्ज है जहां से ताजमहल का नजारा दिखाई देता है। पर यह बुर्ज सैलानियों के लिए बंद है। कहा जाता है औरगंजेब ने अपने पिता शाहजहां को इसी बुर्ज में कैद रखा था।

कैसे पहुंचे – आगरा का किला ताजमहल से ढाई किलोमीटर उत्तर पश्चिम की तरफ स्थित है। आप बस स्टैंड और आगरा के प्रसिद्ध घी मंडी से भी आगरा का किला आसानी से पहुंच सकते हैं।
प्रवेश -  किले में प्रवेश लाहौर गेट की ओर से होता है। आगरा का किला भारतीय पुरात्तव सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित इमारत है। किले में प्रवेश के लिए 20 रुपये का टिकट लेना पड़ता है। यह किला सैलानियों के लिए सातों दिन खुला रहता है।
vidyutp@gmail.com  
( REMEMBER IT IS A WORLD HERTAGE SITE, AGRA, RED FORT, BADALGARH, TAJ MAHAL, HUMAUN) 


Monday, December 14, 2015

तेलंगाना के जंगलों से होकर दूरंतो से दिल्ली...

हैदराबाद से दिल्ली का सफर न जाने कितनी बार किया है। पर खास तौर पर हैदराबाद शहर से ट्रेन के बाहर निकलने के बाद महाराष्ट्र में प्रवेश करने तक के कुछ घंटे निहायत सुहाने लगते हैं। क्योंकि इस दौरान ट्रेन तेलंगाना राज्य के कई जिलों से होकर गुजरती है। आबादी कम नजर आती हैं। मस्ती में बातें करते जंगल ज्यादा नजर आते हैं।
हैदाराबाद से काजीपेट तक का रास्ता मैदान और पहाड़ का मिलाजुला रूप नजर आता है। पर इसके बाद वन क्षेत्र की शुरुआत हो जाती है। कभी ये सारा इलाका आंध्र प्रदेश का हिस्सा था पर अब सब कुछ वैसा ही है पर राज्य के एपी की जगह तेलंगाना हो गया है। काजीपेट वारंगल शहर का बाहरी हिस्सा है। यहां से हैदराबाद के लिए रेलवे लाइन अलग हो जाती है। अगर आप दिल्ली की तरफ से हैदराबाद के लिए जा रहे हैं तो रेल वारंगल शहर से पहले काजीपेट जंक्शन से मार्ग बदल कर आगे बढ़ जाती है।
रामागुंडम - एनटीपीसी का सुपर थर्मल पावर स्टेशन  ( सौ- एनटीपीसी) 

ट्रेन आगे बढ़ती है और आता है रामागुंडम रेलवे स्टेशन। यह तेलंगाना के करीमनगर जिले में आता है। रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म का उदघोषणा हो रही है, रामागुंडम रेलवे स्टेशन वेलकम्स यू... यह तेलंगाना राज्य आबादी में पांचवा बड़ा शहर है। गोदावरी नदी के तट पर बसे इस शहर में एनटीपीसी का थर्मल पावर स्टेशन भी है। इसकी उत्पादन क्षमता 2600 मेगावाट है। यह एक सुपर थर्मल पावर स्टेशन है, जहां कोयला, हाइड्रो, गैस और नवीकरणीय ऊर्जा यानी चार तरीके से बिजली बनाई जाती है।

रामागुंडम से 14 किलोमीटर आगे आता है मंचरियाल। यह आदिलाबाद जिले में पड़ता है। यह भी गोदावरी नदी के तट पर दूसरी तरफ है। मंचरियाल से कोई 20  किलोमीटर आगे आता है बेलामपल्ली। बेलामपल्ली में कोयले की खाने हैं। इसके बाद 40 किलोमीटर बाद आता है सिरपुर कागजनगर। सिरपुर आदिलाबाद जिला में पड़ता है। कागज नगर नाम इसलिए हैं क्योंकि यहां पेपर मिल है। सिरपुर पेपर मिल्स को 1942 हैदराबाद के निजाम ने शुरू किया था। इससे साबित होता है कि निजाम राजकाज के साथ व्यापार में हाथ आजमा रहे थे। सिरपुर के बाद ट्रेन तेलंगाना के घने जंगलों के बीच दौड़ती है।

वर्धा नदी के पुल से हैदराबाद में घुसी थी भारतीय सेना
छोटे से स्टेशन मकुदी से महाराष्ट्र राज्य आरंभ हो जाता है। इन्ही घने जंगलों के बीच विरूर रेलवे स्टेशन आता है। विरूर महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले में पड़ता है। इसके बाद आता है विहिरगांव। यहां भी दोनों तरफ घने जंगल दिखाई देते हैं। इसके बाद आता है मानिकगढ़। चंद्रपुर जिले में स्थित मानिकगढ़ में सीमेंट और कपड़े के उद्योग हैं।

मानिकगढ़ के पास वर्धा नदी पर पुल आता है और ट्रेन महाराष्ट्र में प्रवेश कर जाती है। इसी वर्धा नदी के पुल से होकर भारतीय सेना ने आंध्र प्रदेश में 13 और 14 सितंबर के मध्य 1948 में प्रवेश किया था और निजाम की फौज से लोहा लिया था। इस पुल को पार कर सेना आदिलाबाद जिले में पहुंची जो तब हैदराबाद का हिस्सा था। पुराना रेल पुल एकमात्र जरिया था हैदराबाद प्रांत में प्रवेश करने का। हालांकि तब निजाम की ओर से इस पुल के नीचे विस्फोटक लगाए गए थे, जैसे ही भारतीय सेना पुल पर पहुंचे पुल को उड़ा दिया जाए। पर जिस इंजीनियर की पुल उडाने के लिए ड्यूटी लगी थी उसे कोई आदेश नहीं मिला निजाम की ओर से। यह संचार में असफलता थी और सेना सफलतापूर्वक हैदराबाद प्रांत में घुस गई। एक तरह से हम मानें तो वर्धा नदी का यह पुल केंद्रीय भारत और दक्षिण भारत की सीमा रेखा है।
इसके बाद आता है बड़ा स्टेशन बल्लारशाह। बल्लारशाह महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले में पड़ता है। मिनी इंडिया कहलाता है। पेपर मिल है। बल्लारपुर इंडस्ट्रीज लिमिटेड। सबसे बडा राइटिंग और प्रिंटिंग पेपर बनाने वाला मिल। थापर समूह का मिल है ये । ये वर्धा नदी के किनारे है। पहले सिरपुर राजधानी थी बल्लारदेव की। बल्लार ने राजधानी परिवर्तन कर  बल्लारशाह नगर बसाया। वैसे बल्लारशाह में कुल 9 कोलफील्ड की ईकाइयां हैं।
-vidyutp@gmail.com
(KAZIPET, WARANGAL, WARDHA RIVER, BALLARSHAH, RAMAGUNDAM, CHANDRAPUR, ADILABAD, SIRPUR KAGAZ NAGAR, PAPER MILL) 


Sunday, December 13, 2015

कराची बेकरी – अंडा रहित बिस्कुट का स्वाद

हैदराबाद के एबिड्स चौराहे पर आते जाते कराची बेकरी का विशाल बोर्ड नजर आता है। यह शहर की बहुत ही पुरानी और प्रसिद्ध बेकरी है। पुरानी विरासत के साथ अब यह बेकरी अपना विस्तार कर रही है। अब कंपनी ने दिलसुख नगर रोड पर अपना ब्रांच खोला है। यही नहीं कराची बेकरी ने बनजारा हिल्स, चिकडपल्ली, नामपल्ली, हाईटेक सिटी, खारखाना (सिकंदराबाद) आदि में भी अपनी शाखाएं खोल ली हैं।

आमतौर पर आप जो भी बिस्कुट खाते हैं उसमें इस बात की गारंटी नहीं होती कि वह अंडा रहित है। पर कुछ कंपनियां हैंडमेड और एगलेस बिस्कुट बनाती हैं। दिल्ली में इस तरह की फ्रंटियर बिस्कुट कंपनी प्रसिद्ध है। हैदराबाद की कराची बेकरी भी इसी तरह की कंपनी है जो अंडा रहित बिस्कुट का निर्माण करती है। कराची बेकरी में अब दर्जनों तरह के स्वाद वाले बिस्कुट आपको विकल्प के तौर पर मिल सकते हैं। ये मिठाई की डिब्बों की तरह पैकिंग में होते हैं। इन्हे आप किसी के घर जाते वक्त उपहार में भी ले जाकर दे सकते हैं। मुझे सुखद आश्चर्य हुआ जब हमारी ट्रेन सिकंदराबाद रेलवे स्टेशन से खुलने वाली थी तो स्टेशन पर कराची बेकरी के बिस्कुट के पैकैट बेचते हुए वेंडर मिले। हमारे सहयात्रियों उनसे पैकेट खरीदे भी। अगर आप  कराची बेकरी के पास से गुजरें तो उनका चोको नट्स बिस्कुट का स्वाद जरूर लें।

कराची बेकरी की शुरुआत 1953 में हुई थी। इसका नाम कराची शहर पर क्यों रखा गया। दरअसल इसके संस्थापक कराची से आए थे। खानचंद रामनानी सिंध से आए थे। लिहाजा अपनी पुरानी यादों को इस नाम के साथ जोडा। अब कराची बेकरी न सिर्फ हैदराबाद का बल्कि उसके बाहर भी सम्मानित नाम बन चुका है। इनकी सिंधी नानखटाई और उस्मानिया बिस्कुट के दीवाने हैदराबाद में बड़ी संख्या में हैं। 

दिलखुश फ्रूट बिस्कुट- कराची बेकरी खास तौर पर अपने दिलखुश फ्रूट बेकरी और प्लम केक के लिए जाना जाता है। यही नहीं आप कराची बेकरी से अपनी पसंद का एगलेस बर्थडे केक भी बनवा सकते हैं। कंपनी बेकरी के अलावा स्नैक्स, पेस्ट्रीज और चाकलेट्स, मिठाई और रस्क भी भी बनाने लगी है। खासतौर पर उनका लहसुन के स्वाद वाला गारलिक रस्क लोगों में लोकप्रिय है। कंपनी का फलसफा का है कि गुणवत्ता के कारण कोई समझौता नहीं करना। इसलिए कराची बेकरी हैदराबाद के कई पीढ़ियों के बीच पसंदीदा नाम है।
( http://www.karachibakery.com/)
(KARACHI, BAKERY, BISCUIT, EGGLESS SINDHI, HYDRABAD )


Saturday, December 12, 2015

यदाद्रि के बाला जी – श्रीलक्ष्मी नरसिम्हा स्वामी

आंध्र प्रदेश के विभाजन के बाद 2014 में तेलंगाना नया राज्य बना। पर देश का सबसे बड़ा और प्रसिद्ध तिरूपति बाला जी का मंदिर अब आंध्र प्रदेश में रह गया। तब तेलंगाना सरकार ने हैदराबाद से 62 किलोमीटर दूरी पर स्थित यदाद्रि के विष्णु मंदिर को भव्य रूप प्रदान करने का संकल्प लिया है। मंदिर का नाम श्री लक्ष्मी नरसिम्हा स्वामी वारी देवस्थानम है। मंदिर का पुराना नाम यादगिरी गट्टा था पर अब इसे छोटे नाम यदाद्रि के नाम से जाना जाता है। यहां विष्णु का मंदिर पहाड़ियों पर स्थित है। खास तौर पर रात में मंदिर क्षेत्र की खूबसूरती देखते ही बनती है। 

पंच नरसिम्हा क्षेत्रम-  कहा जाता है कि यदाद्रि में विष्णु पांच रुपों में अवतरित हुए हैं। ज्वाला नरसिम्हा, योगानंदा नरसिम्हा, गंधर्वनंदा नरसिम्हा, उग्र नरसिम्हा और लक्ष्मीनरसिम्हा उनके रूप हैं। इसलिए यदाद्रि को पंच नरसिम्हा क्षेत्रम भी कहा जाता है। इस मंदिर की कथा स्कंद पुराण में आती है। । कहा जाता है कि यादगिरी की पहाड़ियां कभी ऋषियों की तपस्थली रही है। आज भी यहां जिस तरह की शांति और सौंदर्य दिखाई देता है उसे देखकर लगता है कि ये स्थल तपस्वियों के लिए पसंदीदा रहा होगा। यदाद्रि मंदिर का गोपुरम विशाल है। मुख्य मंदिर गुफा में है। मंदिर में विष्णु का सुदर्शन चक्र सोने का बना है।  


रोग दुख होते हैं दूर - कहा जाता है कि कभी विष्णु ने यहां वैद्य नरसिम्हा का रूप लिया और तमाम श्रद्धालुओं को रोग दुख को दूर किया। आज भी आस्था है कि इनके दर्शन मात्र से रोग-दुख दूर होते हैं। यहां सारा उपचार फूल, फल और तुलसी तीर्थम से होता है। आज भी श्रद्धालु अपने रोग दूर करने के लिए मंडल ( 40 दिनों की प्रदक्षिणा) करते हैं। मंदिर की भव्यता 6 किलोमीटर दूर से ही दिखाई देती है। साल 2015 में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी में यदाद्रि मंदिर में दर्शन के लिए आए थे।

मंदिर में हर साल 11 दिनों का ब्रह्मोत्सवम मनाया जाता है जो मंदिर का मुख्य त्योहार है। रविवार और छुट्टियों के दिन मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ जाती है। तेलंगाना  के मुख्य मंत्री के चंद्रशेखर राव ने मंदिर को भव्य रूप प्रदान करने के लिए इसके बाहरी ले आउट में बड़ा बदलाव लाने की योजना बनाई है जिसे कार्यरूप दिया जा रहा है। यदाद्रि मंदिर से दो किलोमीटर की दूरी पर पुराना नरसिंहमा स्वामी मंदिर भी स्थित है।

दर्शन समय - मंदिर में पूजा सुबह 4 बजे से ही आरंभ हो जाती है। आम श्रद्धालुओं के लिए दर्शन सुबह 7.15 बजे से आरंभ होता है। दोपहर में 3 से 4 बजे तक मंदिर के द्वार बंद रहते हैं। शाम 4 से 5 बजे विशिष्ट दर्शन का समय है। दोपहर के बाद शाम 5 बजे से आम लोगों के लिए दर्शन आरंभ होता है। यहां आप रात्रि 9.45 बजे तक दर्शन कर सकते हैं। अतिशीघ्र दर्शन के लिए 100 रुपये का टिकट है जिसमें आपको दो लड्डू प्रसादम भी प्राप्त होता है।

कैसे पहुंचे - यदाद्रि मंदिर हैदराबाद से काजीपेट रेल मार्ग पर हैदराबाद से 62 किलोमीटर की दूरी है। यह नलगोंडा जिले में पड़ता है। आप हैदराबाद से लोकल ट्रेन से आकर रायगीर ( RAG) या भुवनगिरी (BG)  रेलवे स्टेशन उतर सकते हैं। रायगीर से मंदिर की दूरी 6 किलोमीटर है। रेलवे स्टेशन से स्थानीय वाहन उपलब्ध रहते हैं। सिकंदराबाद जंक्शन से 10.05 पर चलने वाली वारंगल मेमू 11.15 बजे रायगीर पहुंचती है। वैसे हैदराबाद से सीधे बस से भी यदाद्रि मंदिर पहुंचा जा सकता है। अगर आप वारंगल काजीपेट की तरफ से जा रहे हैं तो मंदिर पहुंचने के लिए भुवनगिरी या रायगीर रेलवे स्टेशन पर उतरें।


Friday, December 11, 2015

हैदराबाद का बिरला मंदिर

हैदराबाद शहर के बीचों बीच स्थित है संगमरमर से बना विशाल वेंकटेश्वर मंदिर जिसे लोग बिरला मंदिर के नाम से भी जानते हैं। हैदराबाद के स्थानीय लोगों के बीच ये मंदिर आस्था का केंद्र है। देश भर में कई प्रमुख शहरों में बिरला परिवार द्वारा बनवाए गए मंदिर हैं जिन्हें लोग बिरला मंदिर के नाम से जानते हैं।

 हैदराबाद का ये बिरला मंदिर 1976 में बनकर तैयार हुआ। यह हैदराबाद शहर के बीच 280 फीट ऊंचे नौबत पहाड़ पर बना हुआ है। मंदिर 13 एकड़ में विस्तारित है। इसके निर्माण में दस साल लगे। रामकृष्ण मिशन के स्वामी रंगनाथ नंद की इस मंदिर के निर्माण में बड़ी भूमिका थी। पहाड़ पर बना ये मंदिर अपन सौंदर्य में अद्भुत नजर आता है। खास तौर पर रात में इसका सौंदर्य और भी बढ़ जाता है। एक बार मंदिर में पहुंच जाने के बाद तो यहां से यानी इसके परिसर से बाहर  निकलने की इच्छा ही नहीं होती। मंदिर के चारों तरफ बने गलियारे से हैदराबाद शहर का बड़ा ही सुंदर नजारा दिखाई देता है। ऐसा लगता है इसे घंटों निहारते रहें। 

मंदिर के निर्माण में द्रविड़, उत्कल और राजस्थानी शैली का मिल जुला रूप देखने को मिलता है। इसके निर्माण में तकरीबन 2000 टन सफेद संगमरमर का इस्तेमाल हुआ है। इसलिए मंदिर दूर से भी काफी भव्य दिखाई देता है।  मंदिर में भगवान वेंकटेश्वर की 11 फीट ऊंची प्रतिमा है। प्रतिमा के ऊपर एक सुंदर सी छतरी है। परंपरागत मंदिरों की तरह यहां घंटियां नहीं लगाई हैं।
इस  मंदिर के निर्माण में लगे स्वामी रंगनाथ आनंद चाहते थे कि यह जगह बिल्कुल शांत हो जहां बैठकर लोग ध्यान कर सकें। मंदिर परिसर में विष्णु की पत्नी पद्मावती का भी मंदिर है। इसके अलावा मंदिर परिसर में शिव, शक्ति, गणेश, सरस्वती, ब्रह्मा, लक्ष्मी आदि की भी प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं। मंदिर की दीवारों पर गुरबाणी का पाठ भी लिखा गया है। ये मंदिर जाति भेद से ऊपर सबके लिए खुला है।


बिरला मंदिर सुबह 7 बजे दर्शन के लिए खुलता है। यह दोपहर 12 बजे बंद हो जाता है। फिर यह दोपहर दो बजे खुलता है और रात्रि नौ बजे तक खुला रहता है। मंदिर में तिरूपति बालाजी की तर्ज पर प्रसाद में लड्डू मिलता है। इसे आप क्रय कर सकते हैं।

मंदिर परिसर से आप हैदराबाद शहर का नजारा कर सकते हैं। खास तौर पर यहां से हुसैन सागर झील का सुंदर नजारा दिखाई देता है। मंदिर के पास बीएम बिरला प्लेटेनोरियम, बीएम बिरला साइंस म्युजियम, जीपी बिरला आब्जरवेटरी और निर्मला बिरला गैलरी आफ मार्डन आर्ट भी स्थित है। इन सबके लिए अलग अलग टिकट है। 

परिसर को बडे ही सुंदरता से सजाया गया है। हैदराबाद शहर के छुट्टियों के दिन घूमने आते हैं। आध्यात्मिक सुख के साथ यहां ज्ञान वर्धन और मनोरंजन भी हो जाता है। 2003 में शुरू हुए मार्डन आर्ट गैलरी में देश के जाने माने कलाकारों जैसे जेमिनी राय और तैयब मेहता की कृतियां देखी जा सकती हैं।

कैसे पहुंचे – लोकल ट्रेन के रेलवे स्टेशन लकड़ी का पुल से मंदिर काफी नजदीक है। नेकलेस रोड की ओर जाने वाली सड़क पर रिजर्व बैंक के बगल वाली गली से आप बिरला मंदिर पहुंच सकतेहैं। मंदिर के पास निजी वाहनों की पार्किंग का इंतजाम है। 


Thursday, December 10, 2015

हैदराबाद का लकड़ी का पुल

लकड़ी का पुल हैदराबाद। नाम सुन कर कुछ रोमांच होता है। पर यहां कहीं लकड़ी का पुल दिखाई नहीं देता। रहा जरूर होगा।तभी तो नाम है। अब इस नाम का एक लोकल रेलवे स्टेशन भी है। लकड़ी का पुल ( स्टेशन कोड -LKPL)। हैदराबाद से सिकंदराबाद रेल मार्ग पर 1.30 किलोमीटर की दूरी पर लकड़ी का पुल रेलवे स्टेशन आता है।  तो इसके अंग्रेजी अनुवाद पर वुडब्रिज ग्रैंड नामक होटल भी है। पर जनाब लकडी का पुल हैदराबाद का दिल है। इसके आसपास हैदराबाद की प्रमुख बाजार हैं। हैदराबाद का मुख्य स्टेशन हैदराबाद जंक्शन यानी नामपल्ली भी इसके पास ही है।
 अब तेलंगाना राज्य का विधानसभा भवन भी लकड़ी के पुल के पास है। इस इलाके में कभी हैदराबाद का ब्रांड समझा जाने वाला कामत होटल भी है। किसी जमाने में लुधियाना रेलवे स्टेशन के पास भी एक लकड़ी का पुल हुआ करता था। वास्तव में यह रेलवे लाइन को पैदल पार करने के लिए फुट ओवर ब्रिज था जो लकड़ी का बना था। कुछ ऐसी ही कहानी हैदराबाद के लकड़ी के पुल के साथ भी हो सकती है। अब लकड़ी का पुल इलाके में कई प्रमुख होटल हैं। हैदराबाद जंक्शन और विधान सभा समेत तमाम सरकारी दफ्तरों से निकट होने के कारण लकड़ी का पुल बाहर से आने वालों के लिओ लोकप्रिय आवासीय स्थल है।

निजामी शान का नमूना है मोजम जाही मार्केट
मोजम जाही मार्केट हैदराबाद के नवाबों की याद दिलाता है।  बाजार की इमारत को देखकर राजसी ठाठ का एहसास होता है। एबिड्स के पास स्थित मोजमजाही मार्केट हैदराबाद के अति प्राचीन बाजारों में से है। इस बाजार का निर्माण आखिरी निजाम मीर उस्मान अली खान के समय हुआ था। 1935 में बने इस बाजार की दुकानें पत्थरों की हैं। दूर से देखने में ये बाजार किसी महल सा ही लगता है। बाजार का नाम निजाम के दूसरे बेटे मोजम जाह के नाम पर पड़ा। जाम बाग फूल बाजार इस बाजार का हिस्सा है। 
वैसे मोजमजाही मार्केट मूल रूप से फलों का बाजार है। किसी समय में यहां बड़ा फलों का बाजार हुआ करता था। बाद में 1980 में फ्रूट मार्केट को कोतापेट में शिफ्ट कर दिया गया लेकिन अभी भी मोजमजाही मार्केट में फलों की दुकानें हैं। मार्केट के बीचों बीच एक टावर बना है जिसमे घड़ियां लगी हैं। दूर से यह कुछ घंटाघर जैसा दिखाई देता है। नामपल्ली जाने वाली तमाम बसें मोजमजाही मार्केट से होकर गुजरती हैं। इसके पास ही हैदराबाद का मुख्य पोस्ट आफिस है जिसके बाहर देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की कबूतर उड़ाती हुई प्रतिमा लगी है।   


पांच रुपये में चावल दाल – तमिलनाडु सरकार से प्रेरणा लेकर तेलंगाना सरकार ने गरीबों के लिए पांच रुपये में चावल सांभर का स्टाल आरंभ किया है। इस स्टाल पर कागज की प्लेट में महज पांच रुपये में चावल सांभर और उसके साथ मिर्च दिया जाता है। पर खाना वितरण का समय तय है। दोपहर 12 बजे से 1 बजे के बीच। ऐसे खाने का स्टाल मुझे हैदराबाद में ग्रेटर हैदराबाद म्युनिसपल काउंसिल के दफ्तर के पास चौराहे पर दिखाई देता है। तो इसी तरह का स्टाल सिकंदराबाद में भी देखने को मिलता है। 
vidyutp@gmail.com 

(HYDRABAD, LAKDI KA PUL, MOJAMJAHI MARKET, NAMPALLI STN) 

Wednesday, December 9, 2015

द वुड्स आर लवली डार्क एंड डिप...

द वुड्स आर लवली डार्क एंड डीप..बट आई हैव प्रामिस टू कीप...आई हैव माइल्स टू गो बिफोर आई स्लीप...राबर्ट फ्रेस्ट की ये पंक्तिया याद आती हैं जब हम हैदराबाद से श्रीशैलम की ओर जाते समय घने जंगलों से होकर गुजरते हैं। घने जंगलों का ये इलाका नागार्जुन श्रीशैलम टाइगर रिजर्व का है। ये देश का सबसे बड़ा टाइगर रिजर्व है क्षेत्रफल के लिहाज है। इस अभ्यारण्य का विस्तार पांच जिलों में है। 

नालगोंडा, महबूब नगर, करनूल, प्रकाशम और गुंटुर जिले में इस वन क्षेत्र का विस्तार है। यह दो राज्यों में फैला हुआ है। करनूल, महबूब नगर, गुंटुर और प्रकाशम जिले आंध्र प्रदेश में आते हैं। तो नलगोंडा जिला तेलंगना का हिस्सा हैं। यानी राज्य विभाजन के बाद नागार्जुन श्रीशैलम टाइगर रिजर्व दो राज्यों में बंट गया है। यह कुल 3568 वर्ग किलोमीटर में फैला है। वन के मुख्य क्षेत्र की भी बात करें तो यह 1200 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। इन घने जंगलों के बीच श्रीशैलम का बांध और मल्लिकार्जुन स्वामी का मंदिर मुख्य आकर्षण है। पर बड़ी संख्या में लोग इस वन क्षेत्र को भी घूमने के लिए आते हैं।
वन क्षेत्र का ज्यादातर हिस्सा नल्लामल्ला की पहाड़ियों में आता है। इसका 80 फीसदी इलाका पहाड़ी है। आमराबाद, श्रीशैलम और मन्नानूर इस इलाके में कस्बाई क्षेत्र हैं जहां छोटा मोटा बाजार है। बाकी इलाका घने जंगलों का है। मन्नानुर इस वन क्षेत्र का जनजातीय इलाका है। मन्नानुर में घड़ियालो का सरोवर देख सकते हैं। बड़ी संख्या में जंगलों में घूमने का शौक रखने वाले सैलानी यहां आते हैं। तेलंगाना टूरिज्म उनके लिए कुछ सुविधाओं का इंतजाम करता है। इस वन क्षेत्र का बड़ा हिस्सा कृष्णा नदी के कैचमेंट एरिया (डूब क्षेत्र) में आता है। यहां जंगलों में आपको बाघ, लंगूर, चीता, जंगली कुत्ता, हिरण, स्लोथ बीयर, भालू, ब्लैक बक आदि के दर्शन हो सकते हैं।

बाघों की संख्या में कमी - हालांकि अब यहां बाघों की संख्या में कमी आई है। 2014 में यहां 68 बाघों के होने की जानकारी थी। पर साल 2015 में बाघों की संख्या बढ़ी है। कुछ नए शावकों को जन्म की खबर है। उम्मीद है साल 2018 तक यहां 100 से ज्यादा बाघ हो जाएंगे। हालांकि 2006 में यहां 95 बाघ थे। इस तरह एक दशक में संख्या में कमी आई है। इसका बड़ा कारण अवैध तौर पर शिकार है। जंगल का विस्तार काफी बड़ा होने के कारण यह बाघों के लिए आदर्श वन है।

श्रीशैलम के लौटते समय हमारी कैब सुंडीपेंथा में रूकती है। यह करनूल जिले का हिस्सा है। यहां पर आंध्र प्रदेश सरकार की ओर से एक वन्य जीव संग्रहालय बनवाया गया है। यहां पर आप वन्य जीवों के बारे में थोड़ी जानकारी ले सकते हैं। साथ ही यादगारी में टोपियों और अन्य सामग्री खरीद सकते हैं। यहां पर एक उद्यान भी है जहां हिरण विचरण करते हुए मिल जाते हैं।


रात्रि में जाने की इजाजत नहीं - वहीं हैदराबाद की ओर से चलने पर आमराबाद टाइगर रिजर्व चेकपोस्ट आता है। यहां पर आगे जाने वाले वाहनों को शुल्क जमा करना पड़ता है। टैक्सी के लिए यह शुल्क 10 रुपये है। इस चेकपोस्ट से आगे वन क्षेत्र में रात्रि नौ बजे से सुबह 6 बजे तक जाने की इजाजत नहीं है। अगर आप चेकपोस्ट तक पहुंच गए हैं तो आपको यहीं पर रात्रि विश्राम करना होगा।

 यहां पर रहने के लिए कमरे और डारमेटरी की सुविधा उपलब्ध है। कमरे के लिए आपको 600 रुपये देने पड़ सकते हैं तो डारमेटरी के लिए महज 20 रुपये और 100 रुपये में उपलब्ध है। वनमालिका कॉटेज में 1000 रुपये में वातानुकूलित कमरे भी उपलब्ध हैं। पर वन क्षेत्र में रात्रि में जाने की इजाजत नहीं है। तेलंगाना टूरिज्म ने यहां कम्युनिटी बेस्ड इको टूरिज्म प्रोजेक्ट का संचालन आरंभ किया है।
 आमराबाद टाइगर रिजर्व में भी देश के बाकी उद्यानों की तरह टाइगर सफारी और एडवेंचर टूरिज्म का इंतजाम किया गया है। इसके लिए आपको तेलंगाना टूरिज्म की वेबसाइट पर संपर्क करना चाहिए। 
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( TIGER, AMRABAD, MAHBOOB NAGAR, NALGONDA, SHRISAILAM, KARNOOL, PRAKASHAM) 

Tuesday, December 8, 2015

श्रीशैलम बांध - आंध्र और तेलंगाना को करता है आबाद


श्रीशैलम के बाद हमारी वापसी हो रही थी।  महादेव के दर्शन के बाद एक खास तरह का संतोष था मन में. कई साल पुरानी इच्छा पूरी जो हो गई थी. जाते वक्त चालक महोदय ने का था कि वापसी में डैम दिखाउंगा. सो अपने वादे के मुताबिक. वे रूक गए.  पातालगंगा के पास हमलोग श्रीशैलम बांध देखने के लिए रूके। यहां पर एक व्यू प्वांइट है जहां से आप जलाशय का नजारा कर सकते हैं। फोटो खिंचवा सकते हैं। सभी आने जाने वाली गाडियां यहां रूकती हैं. हालांकि आप बिना अनुमति के जलाशय के पास तक नहीं जा सकते। कृष्णा नदी पर इस बांध का निर्माण 1981 में पूरा हुआ। इसका निर्माण 1960 में आरंभ हुआ था। बांध के एक तरफ आंध्र प्रदेश का करनूल जिला है तो दूसरी तरफ तेलंगाना का महबूब नगर जिला।
 बांध की ऊंचाई 145 मीटर और लंबाई 512 मीटर है। जबकि कैचमेंट एरिया 206 वर्ग किलोमीटर है। बांध में कुल 12 रेडियल गेट बने हैं। यह देश का तीसरा बड़ा हाईड्रोलिक पावर प्रोजेक्ट है। यहां से 900 मेगावाट का बिजली उत्पादन के लिए 6 इकाईयां हैं। इस बांध का आंध्र और तेलंगाना के लिए काफी महत्व है। इसके पानी से करनूल और कडप्पा जिले सिंचित होते हैं। करनूल को आंध्र का राइस पाकेट ( धान का कटोरा) माना जाता है उसके खेतों को श्रीशैलम बांध से पानी मिलता है। दोनों तरफ ऊंचे प हाड़ के बीच पातालगंगा में कृष्णा नदी पर बांध बड़ा ही मनोरम नजारा पेश करता है। पर बारिश के दिनों में यहां पानी का स्तर काफी ऊपर आ जाता है।     

कहा जाता है कि इस बांध के निर्माण के दौरान कई मंदिर पानी में जलप्लावित हो गए। इनमें से भीमेश्वर मंदिर प्रमुख था। हमारे साथ चल रहे बाल गंगाधर बताते हैं कि बांध निर्माण के दौरान कुल जलाशय निर्माण में 10 से 15 मंदिर डूब गए। खैर हमलोग यहां अक्तूबर के महीने में पहुंचे हैं। तारीख है 23 अक्तूबर। बांध के नीचे पानी काफी कम है। हमलोग अपनी गाड़ी समेत नीचे उतरते हैं। यहां पर एक देवता की मूर्ति दिखाई देती है। बताया जाता है कि यह भी किसी डूबे हुए मंदिर की मूर्ति है। बांध के नीचे बने जलाशय का पानी ठहरा हुआ है। यहां पर टोकरी जैसी गोल गोल नावें हैं। इसमें बैठकर लोग जलविहार करते हैं।

 हमें भी यहां नाविकों ने न्योता दिया महज 30 रुपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से जल विहार करने का। लेकिन हमारे अनादि तैयार नहीं हुए। वहीं  हमारे साथ आए बाल गंगाधर को यहां नदी में एक धार्मिक सांगोपांग करना था। उन्हें एक किलो तुअर( अरहर) की दाल जल में प्रवाहित करनी थी। ये पूजा संपन्न कराई गई। तभी आसपास से कुछ गरीब महिलाएं आ गईं। अरहर की दाल इन दिनों 200 रुपये किलो से ज्यादा बिक रही है, सो उन महिलाओं ने कहा कि दाल को जल में प्रवाहित करने के बजाय हमें दे दो। हम उनकी अनुज्ञा सुन थोड़े भावुक हो गए। पर हमारी भी मजबूरियां थी। अनुष्ठान पूरा कर हमलोग आगे बढ़े। पर श्रीशैलम बांध का सुंदर नजारा तो दिल में रच बस गया सदा के लिए।