Wednesday, September 30, 2015

कभी मंदिरों का समूह था कुतुबमीनार कांप्लेक्स

कुतुबमीनार के आसपास मंडराते परिंदे। 
एक दिन बेटे अनादि ने कहा पापा कुतुबमीनार देखने चलते हैं। वह जो तीन साल के थे तब सरदियों की एक मीठी धूप में कुतुबमीनार गए थे। पर उसकी उन्हें याद नहीं। लिहाजा एक बार फिर कुतुबमीनार की सैर पर निकले अगस्त 2015 में श्रीकृष्णजन्माष्टमी के दिन। पहले इस्कान टेंपल फिर लोटस टेंपल फिर कुतुब कांप्लेक्स। तो आईए चलते हैं कुतुबमीनार की सैर पर....

 दिल्ली का कुतुबमीनार दिल्ली की पहचान है। पर इसके परिसर में सिर्फ कुतुबमीनार ही नहीं बल्कि कई ऐतिहासिक स्मारक हैं। पर वास्तव में यह कभी मंदिरों का समूह था।यहां मौजूद महरौली का लौह स्तंभ तो लोगों में काफी लोकप्रिय है। इसे कई फिल्मों में भी देखा जा चुका है। आपने इसे अमिताभ बच्चन तब्बू की फिल्म चीनी कम में देखा होगा।

कुतुबमीनार ईंट से बनी दुनिया की सबसे ऊंची मीनार है। इसे 1193 में कुतुबदीन एबक ने बनवाया था।  कहा जाता है कि इस परिसर में बने 27 मंदिरों को गिरा कर उनके मलबे से मीनार बनवाई । हालांकि एबक कुतुबमीनार को पूरा नहीं करवा सका था। इसकी तीन मंजिलें उसके दामाद इल्तुतमीश ने पूरी करवाईं। मीनार के बीच बीच में कुराने की आयतें लिखी गई हैं। निर्माण में लाल बलुआ पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। इसकी ऊंचाई 72.5 मीटर (237.86 फीट) और व्यास 14.3 मीटर है, जो ऊपर जाकर शिखर पर 2.75 मीटर (9.02 फीट) हो जाता है।

सीढ़ियां चढ़ने की इजाजत नहीं - कुतुबमीनार के अंदर 379 सीढियां हैं। पर अब सीढियों से किसी को चढ़ने की इजाजत नहीं है। 1981 से पहले मीनार के ऊपर आम लोगों को जाने दिया जाता था लेकिन 4 दिसंबर 1981 में हुए एक हादसे के कारण मीनार के अंदर की सीढ़ियों पर चढ़ना बंद करा दिया गया। इस हादसे में 45 लोगों की मौत हो गई थी। इसमें बड़ी संख्या में स्कूली छात्र थे। यह कुतुबमीनार के इतिहास में सबसे बड़ा हादसा था। इससे पूर्व 1955 के बाद से दर्शकों को 29 मीटर तक चढ़ाई करने की इजाजत थी।

पूरी नहीं हो सकी अलई मीनार - पर कुतुबमीनार से भी बड़ा मीनार इसके बगल में बनाने की कोशिश हुई थी जो कभी पूरी नहीं हो सकी। अलई मीनार अधूरी रह गई। इसका निर्माण अलाउद्दीन खिलजी ने शुरू कराया था। इसे बडा भव्य रूप देने की योजना थी। इसे कुतुब मीनार से दुगुनी ऊंची बनाने का निश्चय किया गया था, परंतु इसका निर्माण 24.5 मीटर पर प्रथम मंजिल पर ही  आकर रूक गया। इसका निर्माण 1311 में आरंभ हुआ था। पर 1316 में  अलाउद्दीन अल्लाह को प्यारे हो गए। अगर अलाउद्दीन खिलजी की मौत न हुई होती तो कुतुबमीनार आज अलई मीनार कांप्लेक्स के नाम से जाना जाता। और कुतुबमीनार की ऊंचाई फीकी पड़ गई होती। एक समय तक अलाउद्दीन खिलजी की ये कोशिश अनजान थी। 1912 में खुदाई के दौरान अलई मीनार का खुलासा हो पाया।

 कुव्‍वत-ए-इस्‍लाम मस्जिद  - कुतुब परिसर के खंड़हरों में भी कुव्‍वत-ए-इस्‍लाम (इस्‍लाम का नूर) मस्जिद विश्‍व का एक भव्‍य मस्जिद मानी जाती है। कुतुबुद्दीन-ऐबक ने 1193 में इसका निर्माण शुरू कराया और 1197 में मस्जिद पूरी हो गई। आजकल यह मस्जिद खंडहर के रूप में हैं।  मस्जिद के निर्माण हेतु मंदिरों में लूटपाट की गई थी। वास्तव में यह मस्जिद पारंपरिक रूप से हिन्‍दू स्थापत्‍यअवशेषों का ही रूप है।


अजूबा लौह स्तंभ जिसमें जंग नहीं लगता  – कुतुब मीनार के पास मस्जिद के प्रांगण में एक 7 मीटर ऊंचा लौह-स्‍तंभ है। यह कहा जाता है कि यदि आप इसके पीछे पीठ लगाकर इसे घेराबंद करते हो जो आपकी इच्‍छा होगी पूरी हो जाएगी। राजा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य (375 – 413 ) से निर्माण कराया गया। ऐसा माना जाता है कि तोमर साम्राज्य के राजा विग्रह ने यह स्तंभ कुतुब परिसर में लगवाया।

 लौह स्तंभ पर लिखी हुई एक पंक्ति में सन् 1052 के तोमर राजा अनंगपाल द्वितीय का जिक्र है। सैकडों वर्षों से अपने स्थान पर बुलंदी से खडा यह स्तम्भ अपनी जंग प्रतिरोधक क्षमता की वजह से समस्त विश्व के धातुविज्ञानियों के बीच अचरज का विषय है। इतिहासकारों का मानना है कि 'लौह स्तंभ' को बनाने के लिए 'वूज स्टील' का इस्तेमाल किया गया होगा, जो शुद्ध लोहा नहीं है। सन् 1997 में पर्यटकों के द्वारा इस स्तंभ को नुकसान पहुंचाने के पश्चात इसके चारों ओर लोहे का गेट लगा दिया गया है।

कैसे पहुंचे - कुतुबमीनार कांप्लेक्स सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक खुला रहता है। यह सातों दिन खुला रहता है। प्रवेश टिकट 10 रुपये है। यहां क्लाक रूम, पार्किंग और शौचालय आदि की सुविधाएं उपलब्ध है। वैसे नजदीक का मेट्रो स्टेशन कुतुबमीनार है। यहां घूमने के लिए दो घंटे का समय जरूर निकालें।
vidyutp@gmail.com

( WORLD HERITAGE SITE  LISTED IN 1993 ) 



Monday, September 28, 2015

कमल मंदिर यानी लोटस टेंपल

अगर आप दिल्ली में कोई हरा भरा और सुंदर आध्यात्मिक स्थल तलाशकर वहां कुछ वक्त गुजारना चाहते हैं तो लोटस टेंपल यानी कमल मंदिर से बेहतर कोई जगह नहीं हो सकती। 27 एकड़ के दायरे में फैली हरियाली यहां आपका मनमोह लेगी। इस हरियाली की सिंचाई के लिए रिसाइकिल किए गए जल का इस्तेमाल किया जाता है जो प्रेरक कार्य है। ये मंदिर वास्तुकला, पर्यावरण संरक्षण का अदभुत उदाहरण है।

लोटस टैंपल वैसे तो बहाई धर्म का मंदिर है। बहाई धर्म बहाउल्ला द्वारा स्थापित एक ऐसा धर्म है जिसमें दुनिया के अलग अलग धर्मों की अच्छी बातों का संग्रह किया गया है। इस धर्म में कोई लंबा चौड़ा कर्मकांड नहीं है। लिहाजा काफी लोगों को ये प्रभावित करता है। दिल्ली के दर्शनीय स्थलों की सूची में लोटस टेंपल नया नाम है क्योंकि ये दिसंबर 1986 में तैयार हुआ था। वहीं दुनिया भर में जो बहाई धर्म के मंदिर हैं उनमें भी लोटस टेंपल सबसे नया है। इसका निर्माण छह साल में पूरा हुआ था। तब इसके निर्माण में 10 करोड़ रुपये की लागात आई थी।

27 पंखुडियों वाला कमल – मुख्य मंदिर में कमल की 27 पंखुडिया बनी हुई हैं। मंदिर का वास्तु इस तरह का है इसमें सूर्य के प्रकाश आने का सुंदर इंतजाम है। मंदिर में अंदर के विशाल प्रार्थना हॉल है। अंदर कोई मूर्ति नहीं है। प्रार्थना हाल में प्राकृतिक तौर पर रोशनी आती रहती है। अंदर आने वाले दर्शकों से पूरी तरह शांति बनाए रखने की अपील की जाती है।

जल संरक्षण की मिसाल – लोटस टेंपल के अंदर की हरियाली को बनाए रखने के लिए मंदिर प्रबंधन तीन लाख लीटर रिसाइकिल किए हुए पानी का प्रतिदिन इस्तेमाल करता है। इसके लिए मंदिर परिसर में रिसाइक्लिंग प्लांट लगाए गए हैं। मुख्यमंदिर के परिसर में  कुल 9 सरोवर बनाए गए हैं जिनमें हमेशा पानी भरा रहता है।

मंदिर  में संग्रहालय – मंदिर में एक भव्य संग्रहालय और सूचना केंद्र का निर्माण किया गया है। इस भवन के ऊपर हरा भरा घास का मैदान है। अंदर बने संग्रहालय में शीतल वातावरण में आप बहाई धर्म के बारे में जानकारी, दुनिया के दूसरे मंदिरों को बारे में जानकारी साथ ही बहाई धर्म के साहित्य के बारे में जानकारी ले सकते हैं। इस खंड में लोटस टेंपल के निर्माण की भी जानकारी विस्तार से उपलब्ध है। लोटस टेंपल के अलावा दुनिया में पांच और बहाई मंदिर बनाए गए हैं।
कमल मंदिर के प्रांगण में अनादि। 

खुलने का समय – लोटस टेंपल आमतौर पर सुबह 9.30 बजे से शाम 7 बजे तक खुला रहता है। हर सोमवार को ये मंदिर बंद रहता है। सुबह 10 बजे, दोपहर 12 बजे और शाम 3 और 5 बजे मंदिर  में प्रार्थना होती है। ये प्रार्थना 5 मिनट की होती है। मुख्य कक्ष में 1300 लोगों के बैठने का इंतजाम है। मंदिर के मुख्य द्वार के पास वाहनों के लिए फ्री में पार्किंग की सुविधा उपलब्ध है।

कैसे पहुंचे - यहां मेट्रो के नेहरु प्लेस या कालकाजी स्टेशन से पैदल चलकर पहुंचा जा सकता है। मंदिर में जाने के लिए कोई प्रवेश शुल्क नहीं है। मंदिर में श्रद्धालुओं के लिए निःशुल्क जूता घर और पेयजल का भी इंतजाम है। हर रोज 8 से 10 हजार लोग लोटस टेंपल देखने के लिए पहुंचते हैं।

( LOTUS TEMPLE, DELHI, BAHAI WORSHIP HOUSE ) 


Saturday, September 26, 2015

सम्राट अशोक ने बनवाया था सांची का स्तूप

दिसंबर 1994 की सरदियों का समय था जब किसी काम से भोपाल जाना हुआ। पहले दिन को साउथ तांत्या टोपे नगर ( टीटी नगर) में यूथ होस्टल में ठहरा। अगले दिन एनवाईपी के भाई प्रिय अभिषेक अज्ञानी आकर अपने घर ले गए। उनके घर हफ्ते भर रहा। 

इस दौरान वे रोज मुझे मार्ग समझा देते और मैं अपनी मर्जी से अकेले भोपाल और आसपास घूमता रहता। एक दिन सांची जाने को तय किया। सो सुबह सुबह ट्रेन पकड़ी पहुंच गया सांची। सांची में विशाल बौद्ध स्तूप तो है ही। सांची मध्य प्रदेश के दूध का ब्रांड भी है। ठीक वैसे ही जैसे बिहार का सुधा, यूपी का पराग, हरियाणा का वीटा, पंजाब का वेरका, कर्नानटक का नंदिनी। तो चलते हैं सांची का स्तूप

वास्तव में स्तूप पाली भाषा का शब्द है। स्तूप का मतलब कोई टीला या ढेर होता है। यहां माना जाता है कि बौद्ध अवशेष रखे जाते हैं। यहां बौद्ध प्रार्थना स्थल भी होता है। सन 1818 में जॉन टायलर के पता लगाने से पहले सांची का स्तूप अनजाना ही था। सन 1912 में पुरातत्‍व विभाग के महानिदेशक सर जॉन मार्शल की अगुवाई में इस स्‍थल पर खुदाई का कार्य हुआ।
सांची का ये स्तूप 300 फीट ऊंची पहाड़ी पर स्थित है। कहा जाता है कि बड़े स्तूप में स्वंय भगवान बुद्ध और छोटे स्तूपों में बुद्ध के शिष्यों की उपयोग की हुई वस्तुएं रखी हैं। सबसे बड़े स्तूप को महास्तूप कहते हैं। इसे तीसरी शताब्दी ईस्वी पूर्व में सम्राट अशोक ने बनवाया था। 

बाद में शुंग वंश के शासकों ने इसे विस्तारित किया था। इस स्तूप का व्यास लगभग 40 मीटर और ऊंचाई 16.5 मीटर है। इसके निर्माण में पक्की ईंटों का इस्तेमाल हुआ है जो शुंग कालीन है। आकार में यह सारनाथ में अशोक द्वारा बनवाए गए धमेक स्तूप से बड़ा है। कहा जाता है कि सांची में पहले कई बौद्ध विहार भी थे। यहां एक सरोवर भी है जिसकी सीढ़ियां बौद्ध कालीन मानी जाती हैं। सांची के पास सोनारी और भोजपुर में भी कई बौद्ध स्तूप हैं। सांची के सभी तीन स्तूप विश्व विरासत स्थल (वर्ल्ड हेरिटेज साईट) के तहत यूनेस्को द्वारा संरक्षित स्मारकों की सूची में आते हैं। सांची को अतीत में काकानाया, काकानावा, काकानाडाबोटा तथा बोटा श्री पर्वत के नाम से भी जाना जाता था।


चार सुंदर तोरण द्वार - सांची के स्‍तूप अपने चार नक्काशीदार प्रवेश द्वार के लिए जाना जाता है। प्रत्येक द्वार में बुद्ध के जीवन से ली गई घटनाओं और उनके पिछले जन्‍म की बातों का चित्रण है। इन द्वारों पर पत्थर बौद्ध कथाएं सुनाते हैं। 
माना जाता है कि ये प्रवेश द्वार 11वीं सदी के बने हैं। इस स्तूप के पूर्वी तथा पश्चिमी द्वारों पर युवा गौतम बुद्ध की आध्यात्मिक यात्रा की कई कहानियां देखी जा सकती हैं।


कैसे पहुंचे - भोपाल से सांची की दूरी 45 किलोमीटर है ट्रेन से। अमूमन ट्रेन से 45 मिनट में पहुंचा जा सकता है। सांची भोपाल से विदिशा-दमोह-कटनी वाले रेल मार्ग पर है। सांची का स्तूप रेलवे स्टेशन से पैदल चलकर पहुंचा जा सकता है। भोपाल से सांची के बीच दिन भर में सात ट्रेनें उपलब्ध हैं। 

भोपाल से सांची के लिए नियमित बस सेवा भी है। वैसे सांची रायसेन जिले में पड़ता है। पर यह ऐतिहासिक नगरी विदिशा से 10 किलोमीटर की दूरी पर है। सुबह आठ बजे से लेकर शाम पांच बजे तक सांची का स्तूप खुला रहता है। प्रवेश के लिए टिकट लेना पड़ता है। 
रेलगाड़ी की खिड़की से दिखाई दे रहा सांची का स्तूप। 

- vidyutp@gmail.com 

( WORLD HERITAGE SITE, SANCHI, RAISEN DISTRCT, BHOPAL )  

Monday, September 21, 2015

पुण्य सलिला मां गंगा का मंदिर - गंगा महारानी मंदिर

गंगा महारानी का मंदिर  राजस्थान के भरतपुर शहर का बहुत ही सुंदर मंदिर है जिसके बारे में कहा जाता है कि इसके बनने में 90 साल का समय लगा था। ये मंदिर भरतपुर किले के मुख्य द्वार के सामने स्थित है। मंदिर की वास्तुकला देखते ही बनती है। मंदिर के अंदर मगरमच्छ पर सवार मां गंगा की प्रतिमा है।

इस मंदिर का निर्माण 1845 में भरतपुर के जाट राजा महाराजा बलवंत सिंह ने प्रारंभ करवाया। पांच राजाओं के शासन काल तक इस मंदिर का निर्माण चलता रहा। महाराजा ब्रजेंद्र सिंह के शासन काल में इसका निर्माण पूरा हुआ। मंदिर में पुण्य सलिला गंगा नदी की विशाल प्रतिमा है। यहां गंगा मगरमच्छ पर सवार दिखाई गई हैं। गंगा मां की प्रतिमा संगमरमर की बनी है। उनके बगल में चार फीट ऊंची राजा भगीरथ की प्रतिमा है जो मां गंगा को प्रणाम कर रहे हैं। गंगा मां की मूर्ति का निर्माण एक मुस्लिम मूर्तिकार ने किया था। गंगा मां मंदिर का भवन दो मंजिला है। दीवारों पर शानदार नक्काशी की गई है। बादामी रंग के इस मंदिर के निर्माण के लिए भरतपुर जिले के बंशी पहाड़पुर से पत्थर लाए गए थे। वास्तु के लिहाज से मुगल, राजपूत और दक्षिण भारतीय शैली का मेल दिखाई देता है। मंदिर करीब डेढ़ एकड़ क्षेत्र में फैला है।


प्रसाद में गंगा जल - यहां दर्शन के लिए आने वाले भक्तों को प्रसाद में गंगाजल वितरित किया जाता है। मंदिर के दो प्रवेश द्वार है। एक प्रवेश द्वार पर भगवान कृष्ण खड़े हैं जबकि दूसरे प्रवेश द्वार में शिव पार्वती और लक्ष्मी नारायण की प्रतिमा है। मंदिर में दूर दूर से श्रद्धालु मां गंगा का आशीर्वाद लेने आते हैं। कहा जाता है कि भरतपुर के महाराजा बलवंत सिंह को लंबे समय तक कोई संतान नहीं हुई। जब उन्हें संतान रत्न की प्राप्ति हुई तो उन्होंने अपने पुरोहित की सलाह पर गंगा महारानी का मंदिर बनवाने का निश्चय किया। इस मंदिर के निर्माण में कोई चंदा नहीं लिया गया, पर राज घराने से जुड़े कर्मचारियों के वेतन से मामूली राशि की कटौती की गई। मंदिर की खास बात ये है कि राजमहल के एक झरोखे से हमेशा सीधे गंगा महारानी मंदिर के दर्शन होते हैं। 

खुलने का समय – मंदिर सुबह 5 बजे खुल जाता है।  दोपहर 12 बजे बंद हो जाता है। फिर शाम 5 बजे से रात्रि 10.00 बजे तक खुला रहता है। गंगा सप्तमी और गंगा दशहरा मंदिर के प्रसिद्ध त्योहार हैं, जब यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।

कैसे पहुंचे – भरतपुर के मुख्य बस स्टैंड या फिर रेलवे स्टेशन से साइकिल रिक्शा या फिर आटो रिक्शा से पहुंचा जा सकता है। बस स्टैंड से मंदिर की दूरी 4 किलोमीटर के करीब है। रेलवे स्टेशन से भी इसकी दूरी 5 किलोमीटर के आसपास है। मंदिर के आसपास घना बाजार है।
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( GANGA MAHARANI TEMPLE, BHARATPUR, RAJSTHAN ) 

Sunday, September 20, 2015

भरतपुर का लोहगढ़ किला जिसे कोई भेद नहीं पाया

भरतपुर जिले में स्थित लोहागढ़ किला आयरन फोर्ट के नाम से भी लोकप्रिय है और इसका निर्माण 18वीं सदी में हुआ था।  भरतपुर में लौहगढ़ का किला भारत में एकमात्र ऐसा गढ़ है जिसे कभी कोई दूसरा कब्जा नहीं कर पाया।
भरतपुर के राजाओं ने मातृभूमि की सेवा के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया। राजस्थान प्रदेश की ऐसी ही एक रियासत थी भरतपुर। किला भरतपुर के जाट शासकों की हिम्मत और शौर्य का प्रतीक है. मिट्टी के इस किले की यह एक विशेषता रही है कि उसे आजतक कोई भी हरा नहीं सका है। इसलिए यह किला आज भी अजेय दुर्ग लोहागढ़ के नाम से विख्यात है। भरतपुर का पुराना नाम भी लोहागढ़ रहा है। 
महाराजा सूरजमल ने एक अभेध्य किले की परिकल्पना की थी, जिसके अन्तर्गत शर्त यह थी कि पैसा भी कम लगे और मजबूती मे बेमिशाल हो। अपने क्षेत्र की सुरक्षा के लिए ऐसे किले का निर्माण करते थे जिसे दुश्मन के तोप के गोले भी न भेद पाए। इस किले को कभी कोई नहीं जीत पाया यहां तक की अंग्रेज भी नहीं जिन्होंने इस किले पर 13 बार अपनी तोपों के साथ हमला किया पर हर बार नाकामी हाथ लगी। 1805 ई. में जनवरी से अप्रैल तक लॉर्ड लेक ने भरतपुर के किले का घेरा डाला था। मिट्टी से बने इस किले की दीवारों को अंगरेजों की तोपें भेद नहीं पाईं।

भरतपुर का किला बांसी और पहाड़पुर के गुलाबी पत्थरों से बना है। इसका काव्यमय वर्णन सूरजमल के राजकवि सोमनाथ द्वारा रचित सुजान-विलास में मिलता है। बांसी पहाड़पुर से संगमरमर और बरेठा से लाल पत्थरभरतपुर, कुम्हेर और वैर तक पहुचाया जाना तब बड़ा दुष्कर कार्य था। के नटवर सिंह अपनी पुस्तक – महाराजा सूरजमल में लिखते हैं-  डीग से बीस मील दक्षिण-पश्चिम में स्थित सोघर के जंगल काट दिए गए और दलदतें पाट ही गई और वहाँ विशाल एवं भव्य  भरतपुर का किला बना । एक ओर से भरतपुर दलदली जमीन से घिरा था तो दो तरफ से वाणगंगा और रुपारेल नदियां इसकी रक्षा करती थीं। इस किले को बनाने का काम 1732 में आरंभ हुआ। जो कई राजाओं के कार्यकाल तक चलता रहा।
अनाह गेट भरतपुर। 
 मुख्य किले के चारों तरफ विशाल खाई बनवाई गई। इसमें पानी लाने का इंतजाम किया गया। ये खाई 40 फीट गहरी और 175 फीट चौड़ी है। किले में प्रवेश के लिए दो पुल बनाए गए थे। पूर्वी द्वार को अष्टधातु द्वार कहते थे। मुख्य किले की दीवारें 100 फीट ऊंची और 30 फीच चौड़ी थी। किले में सुरक्षा के लिए कुल 8 बुर्ज बनाए गए थे। सबसे ऊंचे बुर्ज से फतेहपुर सीकरी तक दिखाई देता था।

भरतपुर शहर के दस दरवाजे

भरतपुर शहर के बाहरी इलाके में भी सुरक्षा के लिए एक बाहरी खाई बनवाई गई जो 250 फीट चौड़ी और 20 फीट गहरी है। खाई बनाने से जो मलबा निकला उससे मोटी मिट्टी की दीवार बनाई गई। किले में कुल 10 बड़े दरवाजे थे। मथुरा पोल, वीर नारायण पोल, अटलबंद पोल, नीम पोल, अनाह पोल, कुम्हेर पोल, चांद पोल, गोवर्धन पोल, जघीना पोल, सूरज पोल जैसे नाम थे दरवाजों के। अब मिट्टी की दीवारें नजर नहीं आतीं पर शहर के दरवाजे आज भी दिखाई देतें हैं। 

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( BHARATPUR FORT, LOHAGARH, 10 GATES , ANAH GATE  ) 

Saturday, September 19, 2015

भरतपुर का संग्रहालय – 56 खंभे लाल दीवारें

भरतपुर किले के अंदर भरतपुर स्टेट म्यूजियम स्थित है जिसको देखे बिना आपकी भरतपुर यात्रा अधूरी है। आटो रिक्शा वाला मुझे भरतपुर किले के मुख्य द्वार पर छोड़ देता है। पुल पारकर अष्टधातु गेट से  मैं अंदर प्रवेश करता हूं। कई घोड़ा गाड़ी दिखाई देते हैं। यानी भरतपुर शहर में अभी भी घोड़ा गाड़ी चलते हैं। मैं देखता हूं कि किले के मुख्य द्वार के अंदर भी आबादी बसी है। दुकाने हैं लोगों के घर हैं। थोड़ी दूर आगे चलने पर टाउन हाल आता है। यहां से बाईं तरफ चलने पर स्टेट म्यूजियम का पता पा लेता हूं। गरमी है इसलिए रूक कर जूस पीता हूं। संग्राहलय के प्रवेशद्वार पर टिकट घर है। प्रवेश टिकट 10 रुपये का है।

लोहागढ़ किले के अंदर स्थित भरतपुर संग्रहालय में अद्वितीय और पुरातन कलाकृतियाँ और पुरातात्विक संसाधन हैं। यहां आने वाले सैलानी इसके पुरातन सौंदर्य को देख कर चकाचैंध हो जाते हैं। यहां खास तौर पर अस्त्र शस्त्र और मूर्तियों का विशाल संग्रह है।

पहले राजा की कचहरी था - इस तीन मंजिला इमारत का निर्माण महाराजा बलवंत सिंह ने 19 वीं शताब्दी के दौरान किया था। यह संग्रहालय पहले भरतपुर के शासकों का प्रशासनिक कार्यालय था और इसे कचहरी कलां के नाम से जाना जाता था। भरतपुर के शासकों का प्रशासनिक खंड हुआ करता था। बाद में  1 नवंबर 1944 में इसे संग्रहालय का रुप दिया गया।  यह संग्रहालय भरतपुर की ऐतिहासिक संपत्ति के शानदार संचयन का प्रदर्शन करता है। यहां रियासतकालीन 500 से अधिक कलाकृतियां हैं।
भरतपुर के राजाओं का कमरा, खास या व्यक्तिगत ब्लॉक संग्रहालय का बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा है। 

इस संग्रहालय को देखकर दर्शक भरतपुर के राजाओं के वैभव और भव्यता का अंदाज लगा सकते हैं। यहां की कलाकृतियां और स्मृति चिन्ह भरतपुर के स्थानीय निकाय ने बहुत ही सावधानी से सहेजे हैं। भरतपुर राजकीय संग्रहालय में बेहद बेशकीमती मूर्तियां भी रखी हैं। ये कीमती सामान मैलाह, नोह, बयाना और बारेह नाम के पुराने गांवों की पुरातात्विक खुदाई के दौरान मिले थे। यह संग्रहालय प्राचीन मूर्तियों, चित्रों, सिक्कों, शिलालेखों, सिक्कों, प्राणी नमूनों, सजावटी कला वस्तुओं और जाट शासकों द्वारा उपयोग में लाए जाने वाले हथियारों का दुर्लभ संचयन प्रस्तुत करता है। इस संग्रहालय की आर्ट गैलरी में लिथो पेपर, अबरख और पीपल के पत्तों पर बने लघु चित्र दिखाए गए हैं।
इसमें बनता था पूरे गांव का भोजन। 

अदभुत् स्नानागार (हमाम)  मुख्य द्वार से दाहिनी तरफ जाने पर इस भवन में महाराजा का बनवाया हुआ स्नानागार है। इस तरह का विशाल स्नानागार देश में आपको शायद ही कहीं और देखने को मिले। इस स्नानागार में कई हाल बने हुए हैं। इनमें प्राकृतिक तौर पर रोशनी आने का इंतजाम है। इनमें पानी लाने के लिए पाइप से अंडरग्राउंड इंतजाम किया गया था। स्नानागर के अंदर कुछ हाल ऐसे हैं जिसमें पानी गरम करने का भी इंतजाम किया गया था। हौद के नीचे भट्टियां लगाई गई थीं जिससे पानी गरम हो जाता है। स्नानागार की दीवारों पर शानदार नक्कासी की गई है। कपड़े बदलने के लिए भी कमरे बनाए गए हैं। इन्हें देखकर राजा रानियों के शाही अंदाज और शौक का एहासास होता है।
संग्रहालय की पहली मंजिल पर बने हाल में कई तरह के अस्त्र शस्त्र का संग्रह देखा जा सकता है। इसमें बहुत ही छोटे का आकार की पिस्तौल भी देखी जा सकती है तो बड़े हथियार भी देखे जा सकते हैं। घड़ियां, राजाओ द्वारा इस्तेमाल की गई कटलरी का विशाल संग्रह भी यहां है। संग्रहालय के द्वार के पास एक विशाल कड़ाही रखी गई है जिसमें एक साथ कई हजार लोगों के भोजन तैयार किया जाता था। गरमी से बचने के लिए विशाल चंवर देखा जा सकता है। यहां बंदर समेत कई जानवरों को केमिकल ट्रिटमेंट से बचाकर शोकेस मे रखा गया है।

तीसरी मंजिल पर 56 खंभे। 
56 खंभे से देखें नजारा - पर जब आप तीसरी मंजिल पर पहुंचते हैं तो नजारा देख चौंक जाते हैं। 56 खंभो वाली बारादरी का नजारा अदभुत है। इस चौबारे में बैठकर  आप आसपास के नजारे देख सकते हैं। चांदनी रात में इस छत पर आना और भी बेहतर लगता होगा। यहां से शहर का नजारा भी शानदार दिखाई देता है। बताया जाता है कि इस किले में ऐतिहासिक फिल्म नूरजहां की शूटिंग भी हुई थी।

कैसे पहुंचे –  संग्रहालय सुबह 9.30 बजे से शाम 5.30 बजे तक खुला रहता है। टिकट 10 रुपये का है। भरतपुर का स्टेट संग्रहालय भरतपुर के मुख्य बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन से केवल 4 किलोमीटर की दूरी पर है। आप साइकिल रिक्शा या आटो रिक्शा लेकर जा सकते हैं। अब राजस्थान सरकार इस संग्रहालय कायाकल्प कराकर और भी बेहतर बनवा रही है।
- Vidyut Prakash Maurya

( BHARTPUR FORT, BARADARI,  RAJSTHAN ) 



Thursday, September 17, 2015

झूमते बाजरे के साथ चलता सफर

श्रीमहाबीर जी से करौली जाना चाहता हूं। छोटे से बस स्टैंड पर बसें कम आती है। लोग बताते हैं कि आप जीप से खेड़ा तक चले जाओ वहां से बसें मिल जाएंगी। खेड़ी की जीप में बैठता हूं। रेलवे स्टेशन श्री महाबीर जी के पास जाकर जीप थोड़ी देर के लिए रूक जाती है। मैं सुबह के नास्ते में कचौड़ियां खाता हूं। जीप खेड़ा गांव में पहुंजा देती है। पर वहां पता चलता है चौक से गली होकर मुख्य सड़क पर जाइए वहां से साधन मिल सकेगा। पैदल चलकर हिंडौन करौली हाईवे पर पहुंचता हूं। एक जीप वाले मिलते हैं वे करौली ले जाने को तैयार हैं। जीप में बैठ जाता हूं। सड़क के दोनों तरफ खेतों में बाजरे की फसल झूम रही है। 
सहयात्री बताते हैं राजस्थान के भरतपुर करौली आदि जिलों में बाजरे की खेती बड़े पैमाने पर होती है। यह गेहूं से सस्ता बिकता है पर कम पानी में तैयार हो जाता है। इसलिए इसकी खेती इधर मुफीद है। बाजरा (पर्ल मिलेट) मोटा अनाज माना जाता है। सूखे में उग जाता है। भीषण गरमी झेल लेता है। ज्वार की तरह इसकी बुआई गर्मियों में होती है। सर्दियों में बाजरा खाना काफी पौष्टिक और लाभकारी माना जाता है।


कहते हैं बाजरा का जन्म स्थान अफ्रीका है। बाजरे की रोटी सरदियों में बल वर्धक और पुष्टिकारक मानी जाती है। सहयात्री बताते हैं कि मंडी में बाजरा का भाव गेहूं से हमेशा 200 से 300 रुपये क्विंटल कम रहता है। बाजरे की तासीर गरम होती है। आयुर्वेद में बाजरा को स्त्रियों में काम शक्ति बढ़ाने वाला माना गया है। बाजरे से बीयर भी बनता है। बाजरा को सरदी आने से पहले काट लिया जाता है। जहां मक्का और गेहूं नहीं होता वहां भी बाजरा शान से उपज देता है। 

जीप आगे बढ़ रही है। सुंदर पहाड़ी रास्ता है। पंचना नदी आती है। उसपर बना बांध आता है। बांध के बाद करौली शहर दिखाई देने लगता है। अगले दिन करौली से वापसी के लिए पता करता हूं। होटल जगदंबा के मैनेजर ने बताया कि भरतपुर की सीधी बस आपको यहां से देर से मिलेगी पर सुबह 4.30 बजे ही अलवर की बस मिलेगी। उससे आप महवा उतर जाएं। वहां से भरतपुर की बस ले लें। मैं सुबह 4. 30 से पहले बस स्टैंड पहुंज जाता हूं। अलवर वाली बस में महवा का टिकट लेता हूं। बस रात अंधेरे चलकर उजाला होने पर हिंडौन सिटी में रूकती है।
हिंडौन से एक घंटे चलकर महवा पहुंचा देती है। कुछ लोग इसे महुआ भी कहते हैं। यह दौसा जिले की तहसील है। ये राजस्थान का विधानसभा क्षेत्र भी है। वैसे हमारे देश में दो और महुआ नाम के शहर हैं। 

एक महुआ तो बिहार के वैशाली जिले में दूसरा महुआ गुजरात के भावनगर जिले में है। पर राजस्थान के दौसा जिले का यह कस्बा महवा है। यहां से मेहंदीपुर बाला जी की दूरी 17 किलोमीटर है। मुझे थोडी देर बाद भरतपुर के लिए एक शेयरिंग टैक्सी मिल जाती है।

सरपट दौड़ती हुई यह टैक्सी एक घंटे में भरतपुर बस स्टैंड पहुंचा देती है। दूरी 55 किलोमीटर है। सुबह के नौ बजे हैं। नास्ते का समय हो गया है। पर मुझे तो केवलादेव पक्षी उद्यान जाने की जल्दी है। इसलिए रास्ता पूछता हूं। लोगों ने बताया यहां से 4 किलोमीटर है केवलादेव। आटो से काली बगीची तक जाएं वहां से आगे पैदल। चल पड़ता हूं पक्षियों का कलरव सुनने के लिए।

Monday, September 14, 2015

अति सुंदर नक्काशियों वाला महल - सिटी पैलेस करौली

करौली बस स्टैंड की तरफ से पैदल चलते हुए बाजार की ओर बढ़ रहा हूं। थोडी देर में एक गेट आता है। इसका नाम है हिंडौन गेट। गेट के आसपास घना बाजार है। आसपास में पतंगों की दुकानें लगी हैं। पर पुराना गेट अभी भी अच्छी हालत में है। किसी समय में करौली शहर में ऐसे छह दरवाजे थे। इसके अलावा दुश्मन का मुकाबला करने के लिए 11 परकोटे भी थे। करौली शहर पंचना नदी के तट पर बसा है। नदी पर बने डैम से शहर को पानी मिलता है। नदी पर बना बांध मिट्टी का है।

करौली सिटी पैलेस राजस्थान के बेहतरीन ऐतिहासिक महलों में से है। पर यहां कम ही सैलानी पहुंचते हैं। इसका निर्माण 14 वीं सदी में हुआ है। ये महल अपने क्लासिक चित्रों, पत्थरों पर सुंदर नक्काशी, वास्तुकला और जाली के सुंदर काम के कारण बहुत प्रसिद्ध है। यहां के दरबार हॉल  में कई पुरानी तस्वीरें हैं जो यहां के 600 साल पहले के कला के इतिहास को दिखाती हैं। ये महल 1938 तक यहां के शाही परिवार का निवास स्थल था। पर शाही परिवार दूसरे महल भंवर विलास पैलेस  के निर्माण के बाद वहां चला गया। भंवर विलास पैलेस को भी अब हेरिटेज होटल में परिवर्तित कर दिया गया है। ( http://bhanwarvilaspalace.com/)

करौली के पुराने महल का निर्माण राजा अर्जुन पाल ने 1348 में करवाया था। कहा जाता है कि कभी ये नगर कल्याणपुरी के नाम से जाना जाता था। यहां यदुवंशी राजाओं का शासन रहा। वे खुद को भगवान कृष्ण का वंशज मानते हैं। पुरा करौली शहर लाल पत्थर की दीवारों से सुरक्षित किया गया था जिससे दुश्मनों के हमले से बचाव हो सके। सिटी पैलेस की छत और झरोखों से आसपास का सुंदर नजारा दिखाई देता है। भंवर विलास पैलेस में ठहरने वाले सैलानियों को सिटी पैलेस की सैर ऊंट गाड़ी से कराई जाती है।

बड़ी संख्या में विदेशी सैलानी करौली किले में मध्यकालीन भारत के संग्रह को देखने आते हैं। यह किला अभी भी राजपरिवार के संरक्षण में है। सिटी पैलेस के दरबार हाल का सौंदर्य देखते ही बनता है। यहां राजस्थान की कई लड़ाइयों और उसके इतिहास से रुबरू हुआ जा सकता है। 


ब्रिटिश राज में करौली 17 तोपों की सलामी वाली राजघराना हुआ करता था। देश आजाद होने के बाद करौली राजघराने से जुड़े कुंअर ब्रिजेंद्र पाल लगातार पांच बार करौली से विधायक चुने जाते रहे। 2008 में एक बार फिर राजघराने के महाराजा कृष्ण चंद्र पाल देव बहादुर की पत्नी रोहिणी कुमारी भाजपा से विधायक चुनी गईं। पर 2013 में रोहिणी कुमारी को जनता ने वसुंधरा की लहर में भी नकार दिया।


प्रवेश टिकट महंगा -  करौली के किले को देखने का प्रवेश टिकट 110 रुपये का है। अगर आप अपने कैमरे से फोटोग्राफी करना चाहते हैं तो उसके लिए 225 रुपये अलग से चुकाने होंगे। हालांकि किले के बाहरी दीवारों का नजारा आप बिना किसी शुल्क के कर सकते हैं। 
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(CITY PALACE, KARAULI, RAJSTHAN, FORT ) 

Friday, September 11, 2015

करौली का अदभुत मदन मोहन मंदिर

कान्हा जी यानी मदन मोहनजी का मंदिर करौली किले में मुख्य शहर में स्थित है। इस मंदिर का निर्माण महाराजा गोपाल सिंह ने करवाया था। इस मंदिर में भगवान कृष्ण और देवी राधा की प्रतिमाएं हैं। करौली के निवासियों में मदन मोहन के प्रति अपार श्रद्धा और आस्था है। श्रीकृष्ण  भगवान के अनेक नामों में से एक प्रिय नाम मदन मोहन भी है।

करौली के राजा गोपाल सिंह ने 1725 ये मंदिर बनवाया गया। कहा जाता है कि दौलताबाद पर विजय के बाद महाराजा गोपाल सिंह जी को सपना आया जिसमें उन्हें मदनमोहन जी ने कहा कि मुझे करौली ले चलो। तब मदनमोहन की प्रतिमा को जयपुर के आमेर से करौली ले जाकर स्थापित किया गया। इस मंदिर के निर्माण मे दो से तीन साल का समय लगा था।



मदन मोहन मंदिर में स्थापित कृष्ण जी की ऊंचाई तीन फीट है जबकि राधा जी दो फीट की हैं। दोनों मूर्तियां अष्टधातु की बनी हैं। दोंनो मूर्तियों की सुंदरता अदभुत है।
मंदिर मध्यकालीन वास्तुकला का सुंदर नमूना है। मंदिर के प्रवेश द्वार से गर्भ गृह के बीच लंबा चौबारा है। गर्भ गृह में सुंदर नक्कासियां भी हैं। मंदिर के निर्माण में करौली के पत्थर का इस्तेमाल किया गया है। मुख्य मंदिर के अलावा मंदिर परिसर में कई और मूर्तियां स्थापित की गई हैं। चांदनी रात में मंदिर का सौंदर्य और बढ़ जाता है।

महाराजा गोपाल सिंह ने जिस गुसाईं को सबसे पहले मंदिर का प्रभार सौंपा था, वह मुर्शिदाबाद के रामकिशोर थे। इसके बाद मदनकिशोर यहां गुसाईं रहे। करौली के मंदिर को राजघराने की ओर से अचल संपत्ति प्रदान की गई थी जिससे  18वीं सदी में 27 हजार  रुपये की सालाना आय होती थी।

दिन में सात बार भोग - भगवान मदन मोहन को दिन में सात बार भोग लगाया जाता है। उन्हें मिष्टान्न काफी प्रिय है। उनके भोग में मुख्य है दोपहर को राजभोग और रात को शयनभोग। शेष पांच भोगों में से मिष्ठान आदि रहता है। इसमें मालपुआ, रसगुल्ले जैसी मिठाइयां होती हैं। खास मौकों पर मदन मोहन जी को 56 भोग लगाया जाता है। इसमे नाना प्रकार के पकवान होते हैं। इसके लिए बड़ी तैयारी की जाती है।

मदनमोहन जी के सेवाकाल में सुबह पांच बजे मंगल आरती  होती है। इसके बाद सुबह नौ  बजे धूप, 11 बजे शृंगार, तीन बजे दुबारा धूप और शाम को सात बजे सांध्य आरती होती है। मंदिर सुबह 5 बजे खुलता है और रात्रि 10 बजे बंद हो जाता है। दोपहर में भी दो घंटे के लिए भी मंदिर बंद होता है। गोपाष्टमी , श्रीकृष्ण जन्माष्टमी और राधाअष्टमी मंदिर के प्रमुख त्योहार हैं। मंदिर के पूजा में समय के अनुशासन का पूरा पालन होता है। 

ताज खां की भक्ति - कहा जाता है कि ताज खां नाम का एक मुसलमान मदन मोहन मंदिर के कृष्ण की प्रतिमा की एक झलक पाते ही उनका अनन्य भक्त बन बैठा। ताज खां यहां की कचहरी में एक चपरासी था। भक्त ताज खां को आज भी करौली के मदनमोहन मंदिर में संध्या आरती के समय 'ताज भक्त मुसलिम पै प्रभु तुम दया करी। भोजन लै घर पहुंचे दीनदयाल हरी।।' इस दोहे के साथ याद किया जाता है।

कैसे पहुंचे – करौली बस स्टैंड से मंदिर की दूरी दो किलोमीटर है। करौली के मुख्य बस स्टैंड से रिक्शा या आटो से या फिर पैदल चलते हुए भी मंदिर तक जा सकते हैं। मंदिर करौली किले के पीछे चौधरीपाडा में स्थित है। मंदिर के साथ श्रद्धालुओं के लिए एक धर्मशाला भी है।
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(MADAN MOHAN MANDIR, KARAULI, RAJSTHAN ) 

Wednesday, September 9, 2015

जय मां कैला देवी – जहां डाकू भी आते हैं मन्नत मांगने

राजस्थान के करौली जिले में शक्ति की देवी कैला देवी का मंदिर सुंदर है। इस मंदिर के प्रति राजस्थान, मध्य प्रदेश उत्तर प्रदेश के लोगों में अगाध आस्था है। यहां तक की चंबल के क्षेत्र में सक्रिय डाकू भी इस मंदिर में मां की आराधना करने आया करते थे।

कैला देवी को  जादौन राजपूत लोग अपनी कुल देवी मानते हैं। कैला देवी का मंदिर ये कैला देवी गांव में कालीसिल नदी के तट पर बना है। त्रिकूट की मनोरम पहाड़ियों की तलहटी में स्थित इस मंदिर का निर्माण राजा भोमपाल ने 1600 ई. में करवाया था। मुख्य मन्दिर संगमरमर से बना हुआ है  मंदिर पूरब मुख का है।  कैला देवी मंदिर में चांदी की चौकी और सोने की छतरियों के नीचे दो प्रतिमाएं हैं। इनमें एक बाईं ओर उसका मुंह कुछ टेढ़ा है, वही कैला देवी हैं।

मान्यतानुसार कैला देवी मां द्वापर युग में कंस की कारागार में उत्पन्न हुई कन्या है, जो राक्षसों से पीडि़त समाज की रक्षा के लिए एक तपस्वी द्वारा यहां बुलाई गई थीं।

एक कथा के अनुसार करौली के राज्य पर एक दानव बहुत अत्याचार करता था। वहां के राजा दो भाई थे। दोनों भाई दानव से परेशान थे। तो दोनों भाइयो ने मां कैला देवी की पूजा की ओर करोली में आकर दानव से मुत्ति के लिए प्रार्थना की। मां कैला देवी बाड़ी  से करोली पर आई और दानव का संहार किया। जिसका प्रमाण कलिशील नदी के किनारे मां और दानव के पैरो के चिन्ह आज भी देखे जा सकते हैं।

लंबी पदयात्रा करके दर्शन - राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कई जिलों के लोग लंबी पदयात्रा करके कैला देवी का दर्शन करने के लिए चैत महीने में आते हैं। लोग कैला देवी से संतान, लंबी उम्र की दुआ मांगते हैं। कहते हैं मां सबकी सुनती हैं।

चैत्र और आश्विन नवरात्रि के इन दोनों अवसरों पर इस क्षेत्र से लाखों श्रद्धालु कैला देवी के करौली स्थित मंदिर के दर्शन करने पहुंचते हैं। इस मौके पर विशाल मेला लगता है। मेले के समय आसपास के शहरों से कैला देवी के लिए 24 घंटे बसें चलती रहती हैं।

डकैत भी आते हैं दर्शन करने - 

मां कैला देवी के इस मंदिर में डकैत वेश बदलकर आते हैं और मां कैला देवी की साधना करते हैं। लक्ष्य की साधना के लिए मां से मन्नत मांगते हैं। मजे की बात इसकी जानकारी जासूसों के माध्यम से पुलिस को मिल जाती है। पर पुलिस लाख कोशिश कर मंदिर परिसर में उन्हें पकड़ नहीं पाती।

कहां ठहरें - कैला देवी मंदिर से पहले आधा किलोमीटर लंबा बाजार है। इसमें दोनों तरफ प्रसाद की दुकानें और भोजनालय है। कैला देवी में रात्रि विश्राम के लिए अतिथि गृह और धर्मशालाएं भी मौजूद हैं। एक विशाल धर्मशाला करौली के राजघराने द्वारा निर्मित है। मंदिर परिसर में भी एक भोजनालय है जहां रियायती दरों पर भोजन और नास्ता उपलब्ध रहता है।


कैसे पहुंचे – रेल मार्ग से जाने पर हिंडौन सिटी या फिर गंगापुर सिटी रेलवे स्टेशन उतर कर कैला देवी बस से जा सकते हैं। आप हिंडौन सिटी से बस से करौली पहुंचे। ( 33 किलोमीटर) करौली शहर से कैला देवी की दूरी 23 किलोमीटर है। हर आधे घंटे पर बसें और जीप मिलती हैं। सवाई माधोपुर जिले के रेलवे स्टेशन गंगापुर सिटी से भी अपने वाहन से कैला देवी पहुंच सकते हैं। गंगापुर सिटी से कैला देवी की दूरी 34 किलोमीटर है।वैसे बेहतर होगा कि आप जिला मुख्यालय करौली में रूकें और यहां से कैला देवी के दर्शन करने जाएं। करौली बस स्टैंड के पास रहने के लिए रियायती और बेहतर जगह है जगदंबा लॉज। अगर थोड़ा बेहतर और महंगी जगह में ठहरना हो तो होटल करौली अजय विकल्प हो सकता है। करौली अजय के साथ भोजनालय भी है।
-         जगदंबा लॉज, गुलाबबाग मार्ट, करौली (राज)- 322241 फोन  (07464) 220577- 07464220577

- vidyutp@gmail.com

Tuesday, September 8, 2015

24वें तीर्थंकर का अनूठा मंदिर- दिगंबर जैन मंदिर श्री महावीर जी

जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर श्री महावीर का अदभुत मंदिर राजस्थान के करौली जिले में स्थित है। इस मंदिर के नाम पर ही मथुरा सवाई माधोपुर के मध्य श्री महावीर जी नामक रेलवे स्टेशन है। यह मंदिर दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र के नाम से प्रसिद्ध है। देश भर के दिगंबर जैन मतावलंबियों की इस मंदिर में अगाध श्रद्धा है।

इस मंदिर के बारे एक कथा प्रचलित है। गांव चंदनपुर में मंदिर में स्थापित भगवान महावीर की मूर्ति 16वीं या 17वीं शताब्दी में मिली थीं। यह मूर्ति खुदाई के दौरान मिली थी। कहा जाता है कि एक गाय अपने घर से प्रतिदिन सुबह घास चरने के लिए निकलती थी और शाम को घर लौट आती थी। कुछ दिन बाद जब गाय घर लौटती थी तो उसके थन में दूध नहीं होता था। एक दिन उसके मालिक चर्मकार ने सुबह गाय का पीछा किया और पाया कि एक विशेष स्थान पर वह गाय अपना दूध गिरा देती थी। यह चमत्कार देखने के बाद चर्मकार ने इस टीले की खुदाई की। खुदाई में भगवान महावीर  की पाषाण प्रतिमा मिली। हालांकि ये मूर्ति गुप्तकालीन प्रतीत होती है। पर यह किसी टीले में मिट्टी के अंदर दब गई थी। इस मूर्ति का निर्माण बलुआ पत्थर से हुआ है। 


बाद में इसी स्थल पर भव्य मंदिर का निर्माण कराया गया। मंदिर के गर्भ गृह में स्थित भगवान महावीर की मूर्ति पद्मासन में है। ये मंदिर गंभीर नदी के किनारे स्थित है। हालांकि नदी आजकल ज्यादातर सूखी रहती है। नदी तट पर भव्य मंदिर का निर्माण अमर चंद बिलाला (बासवा, जयपुर) की ओर से कराया गया। मंदिर के गर्भ गृह में अति सुंदर नक्काशी की गई है। अब इस मंदिर की व्यवस्था प्रबंधन समिति देखती है।

मंदिर परिस में संदेश लिखा है। इस परिसर में आने के बाद रात में भोजन न करने और पानी को छान कर पीने का संकल्प लेकर जाएं। मंदिर परिसर में जैन धर्म का प्रसिद्ध जीओ और जीने दो संदेश लिखा गया है। मंदिर परिसर में आर्युवेदिक दवाओं का स्टाल भी है।
दिगंबर जैन महावीर मंदिर अतिशय क्षेत्र श्री महावीर जी। 
मेला – चैत्र शुक्ल एकादशी पर तीर्थंकर महावीर के जन्मदिन के समय यहां विशाल मेला लगता है। ये मेला पांच दिनों तक चलता है। इस मौके पर विशाल रथयात्रा का आयोजन होता है। इस मेले में राजस्थान के गुर्जर और मीणा समुदाय के लोग भी हिस्सा लेते हैं।

कैसे पहुंचे – श्री महावीर जी रेलवे स्टेशन से मंदिर की दूरी 7 किलोमीटर है। रेलवे स्टेशन से हर ट्रेन के आने के बाद टाटा मैजिक जैसे वाहन मंदिर के लिए जाते रहते हैं। मंदिर के पास राजस्थान रोडवेज का बस स्टैंड भी है। पर यहां के लिए बसें बहुत कम ही हैं। आपको लंबी दूरी की बसें खेड़ा से और ट्रेन श्री महावीर जी रेलवे स्टेशन से मिल सकेगी।

कहां ठहरें - मंदिर प्रबंधन की ओर से भोजनालय और आवासीय सुविधा उपलब्ध है। पर इसके लिए शुल्क देना पड़ता है। यहां 750 रुपये में वातानुकूलित कमरे उपलब्ध हैं। आप आवास की बुकिंग आनलाइन भी करा सकते हैं। मंदिर के भोजनालय में बिना लहसुन प्याज का जैन भोजन मिलता है। मंदिर के आसपास कुछ दुकाने हैं जहां भोजन नास्ता आदि उपलब्ध होता है।


Friday, September 4, 2015

केवलादेव - पानी बचाएं तभी बचेगी जिंदगी और बचेंगे परिंदे

कुदरत ने इंसान के ढेर सारी खूबियां बक्शी हैं पर उसे उड़ने का इल्म नहीं दिया। जिन पक्षियों को उड़ने को इल्म दिया है उन्हें प्रकृति से समन्वय बनाने की ताकत भी दी है। बदलते मौसम की मार से खुद को बचाए रखने के लिए पक्षी साल में कई महीने स्थान परिवर्तन करते हैं। ये परिवर्तन न सिर्फ मौसम से अनुकूलन के लिए होता है बल्कि प्रजनन के लिए भी होता है।

भरतपुर के केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी उद्यान में आने वाले परिंदे अपने चार महीने के प्रवास में न सिर्फ प्रजनन करते हैं बल्कि अपने बच्चों के उड़ना भी सिखाते हैं। जब इन पंक्षियों को उड़ना भली प्रकार आ जाता है तब वे उन्हें अपने साथ ले जाते हैं। यह क्रम हर साल चलता है। पक्षियों की इस दुनिया को जितना गहराई में समझने की कोशिश करें उतना ही रूचिकर लगता है।
केवलादेव की कहानी शुरू होती है साल 1726 के आसपास से। साल 1726 से 1763 के बीच भरतपुर के प्रतापी जाट राजा महाराजा सूरजमल ने अजान बांध का निर्माण कराया। तब ये इलाका नमभूमि (वेटलैंड) था और यहां परिंदों बसेरा करने आते थे। पर 1893 से 1900 के बीच भरतपुर के राजा राम सिंह ने यहां पक्षी उद्यान बनाने के बारे में सोचा। उन्हें ब्रिटेन प्रवास के दौरान बतखों के शिकार के दौरान इसकी प्रेरणा मिली। उसके बाद केवलादेव क्षेत्र का संरक्षण शुरू हो गया। मीठे पानी की झील होने के कारण यहां बड़ी संख्या में विदेशी और देशी मेहमान परिंदे आकर बसेरा करने लगे। 1956 में देश की आजादी के बाद महाराजा ने इस क्षेत्र को राजस्थान सरकार को सौंप दिया और इसे पक्षियों के संरक्षण क्षेत्र के रूप में विकसित किया जाने लगा।

पर सच्चाई है कि पक्षी वहीं बसेरा करने आते हैं जहां उन्हें नमभूमि और पानी मिलता है। ताल, चौर जैसे इलाके उनके लिए प्रिय होते हैं। राजस्थान के शेखावटी क्षेत्र में सूखा पड़ा रहता है पर भरतपुर जिले का इस क्षेत्र ताजे पानी का संकट नहीं रहा। लिहाजा हर साल यहां साइबेरियन क्रेन समेत कई विदेशी पक्षी आते थे। पर सन 2000 के आसपास यहां पानी का ऐसा संकट आया कि विदेशी मेहमान परिंदों का आवक घटने लगी। परिंदे कम आने लगे तो सैलानियों का आना भी कम होने लगा। एक समय तो ऐसा आया जब लगा कि केवलादेव से विश्व धरोहर स्थल ( जो दर्जा इसे 1985 में मिला था) छिन लिया जा सकता है।

केवलादेव की खासियत ऐसी है कि यहां न सिर्फ ताल तलैया बल्कि नम भूमि, वन क्षेत्र, दलदली भूमि सब कुछ हुआ करती है। पर पानी के संकट ने इस गुलशन को वीराना कर दिया था। पर वन विभाग के अधिकारियों और राज्य सरकार के प्रयास से यहां पानी लाने की कोशिश की गई। साल 2012 में यहां 44 करोड़ की ज्यादा लागात से गोवर्धन ड्रेन से पानी लाने के इंतजाम किया गया। इसके लिए अंडरग्राउंड पाइपलाइन बिछाई गई। इसके बाद से केवलादेव के वन क्षेत्र में पानी तो आने लगा है। एक बार फिर से मेहमान परिंदो की आवक शुरू हो गई है। सैलानी भी आने लगे हैं। बाग गुलजार हो उठा है। पर अभी तक साइबेरियन क्रेन नहीं आया।

पानी बचाएं तभी बचेगा जीवन पार्क के अंदर 2006 में सलीम अली पेवेलियन बनाया गया है। यहां पानी का महत्व बताते हुए कई रोचक जानकारियां दी गई हैं। कई ग्रहों के बीच हमारी पृथ्वी ही ऐसी है जहां पर पानी है। पानी है इसलिए यहां जीवन है। हमारी धरती का 70 फीसदी हिस्सा पानी है। इस पानी में 12 फीसदी भूजल है। पानी का 80 फीसदी से ज्यादा हिस्सा बर्फ के रूप में है। सिर्फ दो फीसदी ही मीठा पानी है जो पीने लायक है। हमें प्रकृति का दोहन इस तरीके से करना है कि हम पानी को बचाकर रख सकें , जिससे जिंदगी भी बची रहे।

आइए इन परिंदों से सीखें - केवला देव में आने वाले कई मेहमान परिंदे 5000 किलोमीटर से ज्यादा की उड़ान भर कर हर साल यहां पहुंचते हैं। कई परिंदे 200 किलोमीटर प्रतिघंटे की उड़ान भरते हैं। आसमान में 20 हजार फीट की ऊंचाई पर उड़ान भरने वाले परिंदे अपने रास्ते का पता सूरज और चांद को देखकर लगाते हैं। इन परिंदों की खासबात है कि वे पहले साल जिस शहर के जिस उद्दान में जाकर बसेरा करते हैं, अगले साल फिर वहीं पहुंचते हैं। वे स्थान और रास्ता याद रखते हैं। यहां तक की अपना पेड़ और अपना घोसला भी याद रखते हैं।

 गाइड सरदार राजू सिंह बताते हैं कि केवला देव में आने वाले 90 फीसदी विदेशी परिंदे शाकाहारी होते हैं। जबकि 90 फीसदी देशी परिंदे मांसाहारी। भला क्यों आते हैं परिंदे केवलादेव में। इतना सब कुछ भला किसलिए... क्योंकि यहां उन्हें जीवन के लिए जरूरी पानी मिलता है। तो आइए पानी बचाने का संकल्प लें। परिंदों को बचाने का संकल्प लें।
साइकिल रिक्शा की हो विदाई - केवलादेव पार्क में फिलहाल साइकिल रिक्शा से सैलानियों को घूमाने की अनुमति है। पर साइकिल रिक्शा से 12 किलोमीटर से ज्यादा सैर करवाना रिक्शा चालकों के लिए थका देने वाला है। इसलिए मांग की जा रही है कि इसकी जगह बैटरी रिक्शा का इस्तेमाल किया जाए। बैटरी रिक्शा का एक और लाभ है कि इसमें बैक गियर होता है। इससे बार बार सैलानियों को घूमाने के लिए साइकिल रिक्शा को पीछे मोड़ने में दिक्कत नहीं आएगी। पार्क में रिक्शा चलाने वाले 130 से ज्यादा चालकों में से ज्यादातर बैटरी रिक्शा लेने को तैयार हैं। जरूरत है कि इसके लिए राजस्थान का वन विभाग पहल करे। खासकर वे रिक्शा वाले जो अनुभवी हैं पर उनकी उम्र ज्यादा हो चुकी है उन्हें बैटरी रिक्शा आ जाने से राहत मिलेगी।

हर डीजल पेट्रोल वाहन पर रोक लगे-  साथ ही पार्क में किसी भी तरह के डीजल और पेट्रोल वाहन पर रोक लगाई जानी चाहिए। वन विभाग के अधिकारियों को भी चाहिए कि वे इलेक्ट्रिक स्कूटर से पार्क का दौरा करें। पार्क के पर्यावरण को बचाए रखने के लिए ये निहायत जरूरी है। राजस्थान के वन विभाग के इस मामले में सख्त नियम बनाना चाहिए। इसके अलावा पार्क के पास से गुरजने वाले नेशनल हाईवे को पूरी तरह नो हार्न जोन में तब्दील किया जाए। हार्न बजाने वालों पर भारी जुर्माना का प्रावधान किया जाए।



( WATER, BIRD, KEOLADEV, BHARATPUR, WETLAND, POND, JUNGLE, GRASSLAND)
( केवलादेव  राष्ट्रीय पक्षी उद्यान - 6 )