Friday, May 10, 2013

सोनपुर-वाराणसी पैसेंजर में पांच साल सफर

पांच साल काशी हिंदू विश्वविद्यालय का छात्र रहा। 1990 से 1995 के बीच पिताश्री की पोस्टिंग हाजीपुर में हुआ करती थी। हाजीपुर से वाराणसी आने का सबसे सस्ता तरीका हुआ करता था सोनपुर वाराणसी पैसेंजर (SONEPUR ALLAHABAD CITY PASSENGER) । तब ये ट्रेन मीटर गेज पर चलती थी। किराया था 16 रुपये। शाम 5 बजे सोनपुर से खुलने वाली पैसेंजर सुबह 5 बजे से पहले वाराणसी पहुंचा देती थी। पहली बार इस ट्रेन से बनारस आया था अपने एलएस कालेज के दोस्त विष्णु वैभव के साथ। सोनपुर से परमानंदपुर, शीतलपुर, दीघवारा होते हुए छपरा कचहरी।

 फिर छपरा, गौतम स्थान, मांझी का पुल बकुलहां और ट्रेन घुस गई यूपी में। मैं अपना बैग खोलता हूं, मां ने जो राह के लिए बनाकर दिया है, पूड़ियां और भुजिया उसे उदरस्थ करता हूं। इसके बाद भी सोने का तो कोई सवाल ही नहीं होता था। वाराणसी की ओर आगे बढ़ने के साथ ही पैसेंजर ट्रेन में भीड़ बढ़ती जाती थी। सुरेमनपुर, बलिया, चितबड़ागांव, फेफना जंक्शन, सागरपाली जैसे स्टेशनों के बाद आता था औरिहार जंक्शन। यहां से गोरखपुर के लिए लाइन अलग होती है। वाराणसी से पहले आता था ऐतिहास पर्यटन स्थली सारनाथ। ये सब स्टेशन रात में होते थे लेकिन भीड़ के कारण जागते रहना पड़ता था। कई बार मैं 20 रुपये अतिरिक्त देकर पैंसेजर में स्लीपर कोच में जाकर आरक्षण करा लेता था। तब सफर आरामदेह हो जाता था। पर उस समय 20 रुपये की भी बहुत कीमत थी। ये बच जाए को बनारस में कई बार लौंगलता खाया जा सकता था। लौंगलता बनारस की लोकप्रिय मिठाई है।
 वाराणसी सोनपुर पैंसेजर पहले सोनपुर से  इलाहाबाद सिटी तक जाती थी। तब वाराणसी से भुलनपुर (डीएलडब्लू) माधो सिंह होते हुए इलाहाबाद सिटी (रामबाग) के लिए मीटरगेज लाइन थी। मैं 1990 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा देने भी सोनपुर से इलाहाबाद मीटर गेज की पैसेंजर ट्रेन में ही बैठकर गया था। वह एक लबा और उबाऊ सफर था। हमारे पास पता था मालति प्रजापति का जो लाला की सराय में रहती थी। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एमए किया था। कविताएं भी लिखती थीं। उनके घर रहकर ही इलाहाबाद विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा दी थी। हालांकि मेरा चयन इलाहाबाद और बीएचयू दोनों जगह हो गया। पर बीएचयू का कैंपस और होस्टल मुझे भा गए थे इसलिए एडमिशन बीएचयू में लेना तय किया। यहां होस्टल मिलने की गारंटी थी क्योंकि प्रवेश परीक्षा में मैं सेकैंड टॉप था। इंडेक्स 250 में 222 आया था। 1990 के जुलाई में मैं वाराणसी आ गया।

वाराणसी सोनपुर पैसेंजर के अलावा हमारे पास विकल्प थी जीएल यान गौहाटी इलाहाबाद एक्सप्रेस। ये ट्रेन कभी गुवाहाटी से लखनऊ तक जाती थी इसलिए ये जीएल कहलाती थी। ये ट्रेन रात को 8 बजे हाजीपुर से ही मिल जाती थी। पर इसमें 50 रुपये के करीब टिकट का लग जाता था। पीछे से आने के कारण जीएल कई बार लेट भी जाती थी। 1993-94 में वाराणसी इलाहाबाद के बीच की मीटरगेज लाइन ब्राडगेज में बदल गई। तब जीएल को वाराणसी तक ही सीमित कर दिया गया।
ओटी मेल की याद
लखनऊ के चारबाग स्थित लखनऊ जंक्शन स्टेशन से उन दिनों सुबह आठ बजे पूर्वोत्तर रेलवे की प्रतिष्ठित ट्रेन लखनऊ-गुवाहाटी (तत्कालीन गौहाटी) अवध तिरहुत मेल ( OUDH TIRHUT MAIL) रवाना हुआ करती थी। यह ट्रेन ओटी मेल के संक्षिप्त नाम से लोकप्रिय थी। इस ट्रेन में शानदार डाइनिंग कार भी हुआ करता था। यह ट्रेन अपने समय देश की सबसे लंबी मीटर गेज ट्रेन थी। यह ट्रेन गुवाहाटी से लखनऊ के बीच 1427 किलोमीटर की दूरी तय करती थी। बाद में मीटर गेज का संभवतः पहला डीजल इंजन भी इसी ट्रेन को मिला था। तब लखनऊ जंक्शन स्टेशन पर सिर्फ मीटर गेज की ट्रेनें आती-जाती थीं। अस्सी के दशक में लखनऊ-गोरखपुर-बरौनी-गुवाहाटी रूट मीटर गेज से ब्रॉड गेज में बदले जाने के साथ ही इस प्रतिष्ठित ट्रेन का मार्ग बदल दिया गया। यह ट्रेन गेज गुवाहाटी से बरौनी, हाजीपुर, सोनपुर, छपरा, बलिया वाराणसी होकर इलाहाबाद के बीच चलने लगी। वाराणसी से इलाहाबाद के बीच आमान परिवर्तन हो जाने के बाद ये सीमित तौर पर वाराणसी से सिलिगुड़ी के बीच चलती रही। एक दिन ऐसा आया जब इस ट्रेन की पटिरयों विदाई हो गई। आज भारतीय रेलवे के यात्री डिब्बों के लिए जो नीला और आसमानी रंग सामान्यतः प्रयुक्त होता है वह बहुत पहले ही ओटी मेल के डिब्बों पर देखा जा सकता था। तब अन्य यात्री ट्रेनों में डिब्बे आमतौर पर लाल रंग के हुआ करते थे।  1996 में औरिहार छपरा खंड बड़ी लाइन में बदल गया। इसके साथ ही बलिया जिला छोटी लाइन इतिहास हो गई। हालांकि तब मैं वाराणसी छोड़कर दिल्ली आ गया था। बाद में ओटी मेल मीटरगेज पर लखनऊ से लालकुआं के बीच चल रही थी।

दिसंबर 2011 के आखिरी दिन के साथ ही बरेली से लालकुंआ तक जाने वाली मीटर गेज की रेलगाड़ी भी इतिहास बन गई। तकरीबन 126 साल का इस रेलगाड़ी का यह सफर 1 जनवरी 2012 से इतिहास में दर्ज हो गया। लाल कुंआ से चलने वाली  छोटी लाइन की सभी रेल गाड़ियां भी बंद हो गई। लालकुआं रेलवे स्टेशन से नवाबों के शहर लखनऊ तक, छोटी लाईन की यह रेल 23 अप्रैल 1882 को अवध तिरहुत मेल के नाम से शुरू हुई थी। भारत में पहली बार रेल का संचालन 16 अप्रैल 1853 को होने के लगभग 30 साल बाद रेल लाल कुंआ के रास्ते काठगोदाम पहुंची और काठगोदाम रेलवे स्टेशन पहुंचने वाली ये ट्रेन कभी पूर्वोत्तर के शहर गुवाहाटी तक का लंबा सफर तय करती थी।
vidyutp@gmail.com

(BHU, BIHAR, RAIL, UTTAR PRADESH, SONEPUR, VARANASI ) 


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