Friday, July 31, 2015

एक महान आत्मा से मुलाकात…

छह माह के अनादि सुब्बराव जी के साथ ( जनवरी 2006)
ये 1991 के फरवरी महीने की बात है। मैं काशी हिंदू विश्वविद्यालय में प्रथम वर्ष का छात्र था। राष्ट्रीय सेवा योजना का मैं सक्रिय स्वयंसेवक था। एक बार हमने अपने प्रोग्राम आफिसर आद्या प्रसाद पांडे जी से इच्छा जताई कि मैं किसी राष्ट्रीय शिविर में जाना चाहता हूं। उन्होंने कहा, एनएसएस के राष्ट्रीय शिविर तो कम ही होते हैं। आप महान गांधीवादी सुब्बराव जी द्वारा आयोजित राष्ट्रीय युवा योजना के किसी शिविर में जाना चाहो तो मैं बात करूं। मैंने हामी भर दी। उन्होंने मुझे अजय पांडे से मिलने को कहा। मैं साइकिल चलाता हुआ बनारस के लहरतारा रेलवे कालोनी अजय पांडे जी के घर पहुंचा। अजय जी ने बताया कि अप्रैल 1991 में जम्मू के पास राष्ट्रीय एकता शिविर होगा, आप बीएचयू के अपने पांच दोस्तों का समूह बनाएं और जाएं। मैं तैयार हो गया। पर वार्षिक परीक्षा निकट होने के कारण और कोई मित्र तैयार नहीं हुआ जाने को। इस बीच काशी हिंदू विश्वविद्यालय में उद्यमिता विकास कार्यक्रम का उदघाटन होना था। स्वतंत्रता भवन में होने वाले कार्यक्रम में सुब्बराव जी मुख्य अतिथि बन कर आने वाले थे। मैं इस कार्यक्रम में वालंटियर भी था। यहां सुब्बराव जी से मेरी पहली मुलाकात हुई।


पंजाब के डीएवी स्कूल बिलगा में। ( 2003)
 काशी हिंदू विश्वविद्यालय के तत्कालीन वाइस चांसलर डाक्टर रघुनाथ प्रसाद रस्तोगी ने एक खादी की बुशर्ट और खादी की निक्कर पहने हुए सज्जन का स्वागत किया। उनके चेहरे पर अप्रतिम आभा थी। वे सुब्बराव जी थे। जब उन्हें मंच पर बोलने के बुलाया गया तो उन्होंने संबोधन में कुछ भी कहने से पहले स्वतंत्रता भवन मे मौजूद दो हजार लोगों से कहा, आज के नौजवानों के होठों पर कैसा गीत होना चाहिए...सब लोग मेरे साथ गाएं...  उन्होंने ओजस्वी आवाज में गाना शुरू किया.... युग की जड़ता के खिलाफ एक इन्क्लाब है...हिंद के जवानों का सुनहरा ख्वाब है....भारतीय सांस्कृतिक क्रांति.... कार्यक्रम के दौरान सुब्बराव जी  से मेरा परिचय हुआ। उन्हें ये जानकर खुशी हुई कि मैं जम्मू शिविर में आ रहा हूं। पर मैं जम्मू नहीं जा सका। मई 1991 में वाराणसी में दुर्गा कुंड स्थित अंध विद्यालय में राष्ट्रीय शिविर का आयोजन हुआ। पर मेरी वार्षिक परीक्षाएं थी इसलिए मैं इसमें हिस्सा नहीं ले सका। एक दिन शिविर में गया जरूर। फिर सुब्बराव जी का सानिध्य मिला थोड़ी देर के लिए।

अक्तूबर 1991 में अलीगढ़ में राष्ट्रीय एकता एवं सांप्रदायिक सौहार्द शिविर हुआ जिसमें पहली बार पहुंचा। इस तरह अलीगढ़ मेरा पहला राष्ट्रीय शिविर था। यहां वाराणसी से मेरे साथ बिपिन चंद्र चतुर्वेदी, अजय कुमार सिंह, ओम हरि त्रिपाठी आदि गए थे। 
बूढ़ा केदार (टेहरी) में सुब्बराव जी के साथ। ( 1991)
इसके बाद 1991 के दिसंबर में उत्तराखंड के टेहरी में भूकंप राहत शिविर में जाने का अवसर मिला। इस शिविर में हमारे साथ मनोज कुमार बोस,  बिपिन चंद्र चतुर्वेदी, मुगलसराय के चंद्रभूषण मिश्रा कौशिक, संजय पाठक और मेरे रुम पार्टनर राजीव कुमार सिंह थे। इसके बाद बेंगलुरु में 1992 में आध्यात्मिक युवा शिविर में हमलोग पहुंचे। इस शिविर में मेरे साथ दिग्विजय नाथ सिंह थे। बीएचयू के दोस्तों में राजीव कुमार सिंह, अमिताभ सिंह, संदीप कुमार, आदित्य आदि थे। बेंगलुरु शिविर से पहले मैं बिहार के हाजीपुर शहर में राष्ट्रीय युवा योजना की इकाई शुरू करवा चुका था। हाजीपुर से बेंगलुरु शिविर में पंकज कुमार सिंह, राकेश पाठक, नवीन झा और मनीष चंद्र गांधी पहुंचे थे।

 1992 के जून महीने में मैं मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में संपूर्ण साक्षरता कार्यक्रम में योगदान करने दिग्विजय नाथ सिंह के साथ गया। हमलोग एक महीने से ज्यादा चंबल नदी के किनारे बगदिया गांव के पास कीर का झोपड़ा में रहे। वह अदभुत अनुभव था। इसके बाद अक्तूबर 1992 में यूथ वर्कर्स मीट में पंकज के साथ दिल्ली जाना हुआ। यह सम्मेलन एनवाईपी के सक्रिय कार्यकर्ताओं का था। 1993 में जब सदभावना रेल यात्रा चली तो आठ महीने की इस यात्रा में मैंने शुरुआत के तीन महीने योगदान किया। इस दौरान मेरे पास ऑफिस मैनेजमेंट की जिम्मेवारी थी। इसके बाद में किसी भी शिविर में नहीं जा सका।
दिसंबर 1995 में रेल यात्रा के दौरान जम्मू मे

 एमए और पत्रकारिता की पढ़ाई के बाद नौकरी में आ गया। लिहाजा कभी शिविर में जाने के लिए समय नहीं निकाल पाया। हां 1994 और 1995 में सदभावना रेल यात्रा के दूसरे और तीसरे चरण में थोड़े थोड़े दिनों के लिए जरूर पहुंचा पर पंजीकृत रेल यात्री के तौर पर नहीं। 1998 के जून महीने में महात्मा गांधी सेवा आश्रम जौरा में हुए सक्रिय कार्यकर्ता सम्मेलन में एक बार फिर मैं व भाई तड़ित प्रकाश गए। नौकरी में आने के बाद भले किसी शिविर में नहीं जा सका। पर तय किया कि अपने पेशे में रहकर एक सुंदर विश्व और एक सुंदर भारत के निर्माण के लिए जो कर सकता हूं करने की कोशिश करूंगा। ये कोशिश जारी है। नौकरी के सिलसेले में पटना, मेरठ, पानीपत, लुधियाना जालंधर और हैदराबाद में रहा। इस दौरान सुब्बराव जी से लगातार संपर्क में रहा। 2011 में सोनीपत में हुए बाल शिविर में एक दिन के लिए अपने बेटे अनादि के साथ गया। तब अनादि छह साल के थे। 
जनकपुर (नेपाल) जून 2015 

बेटे  अनादि को भाई जी का आशीर्वाद पालने में ही मिल गया था। जनवरी 2006 में अनादि छह माह के थे। पटना में नेहरु युवा केंद्र के राष्ट्रीय शिविर में सुब्बराव जी मुख्य मेहमान के तौर पर गए थे। पत्नी माधवी ने मेरी सलाह पर भाई जी से संपर्क किया कि आपसे मिलना चाहती हूं। इससे पूर्व वे मेरे विवाह के बाद जालंधर में 1993 में भाई जी से बिलगा गांव के डीएवी स्कूल में मिल चुकी थीं। भाई जी को जब पता चला कि माधवी विद्युत का छह माह का एक बेटा भी है तो उन्होंने कहा, तुम कहां इस भीड़ में आओगी मैं ही  तुम्हारे घर पहुंचता हूं। पटना के सुनील सेवक के साथ सुब्बराव जी मुसल्लहपुर हाट स्थित मेरे ससुराल हरि निवास पहुंचे और नन्हे अनादि को आशीर्वाद दिया। दो साल के अनादि को हैदराबाद में एक बार फिर भाई जी का आशीर्वाद प्राप्त करने का मौका मिला। सुब्बराव जी बच्चों से मुलाकात में उन्हें गुब्बारा देना नहीं भूलते। उनकी जेब में हमेशा कुछ गुब्बारे रहते हैं। आशीर्वाद में अनादि न जाने उनसे कितने गुब्बारे ले चुके हैं।
दिल्ली गांधी शांति प्रतिष्ठान - कमरा नंबर 11 ( साल 2013)

 दाना-पानी की तलाश में मैं शहर दर शहर बदलता रहा। भाई जी मुझसे हर मुलाकात में पूछते अब कौन से शहर में हो। हर बार मुझे अपनी डायरी में आपका पता बदलना पड़ता है। पर अब मैं 2007 से लगातार दिल्ली में हूं।  और ये बड़े सौभाग्य की बात है कि सुब्बराव जी जैसे महामानव की डायरी में मेरा पता है। वे जब मिलते हैं मेरे सारे भाई बहनों का हाल चाल पूछ लेते हैं। मैं ही क्या जिन लोगों ने भी सुब्बराव का जितना भी सानिध्य पाया है आने वाले दिनों में रश्क करेगे मैं कभी ऐसे महामानव के सानिध्य में था, जो एक सुंदर विश्व के निर्माण का सपना लगातार देखता था और लोगों को सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता रहता था।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com

(BHU, VARANASI, BILGA, PUNJAB, BIHAR, HAJIPUR, PATNA, DELHI, HYDRABAD ) 


Wednesday, July 29, 2015

12 मार्च 1993 - जब मुंबई दहल उठी...

12 मार्च 1993 को मुंबई में 13 सिलसिलेवार धमाके हुए जिसमें 257 लोग मारे गए और 700 से ज्यादा लोग घायल हुए। इसी दिन से मुंबई में राष्ट्रीय युवा योजना का राष्ट्रीय शिविर शुरू होना था। इस शिविर में मुझे भी जाना था पर मैं पारिवारिक कारणों से नहीं जा सका। पर मेरे बीएचयू के पांच दोस्त, हाजीपुर से राष्ट्रीय युवा योजना ईकाई से शिवपूजन कुमार की अगुवाई में सात लोगों की टीम गई थी। इस टीम में दो बहनें भी थीं। सोनपुर की रजनी और प्रियंका। जैसे सुबह 10 बजे हाजीपुर के साथियों की ट्रेन मुंबई पहुंची वहां धमाके होने लगे। यहां खास तौर पर लड़कियों के माता पिताओं की चिंता बढ़ गई। वे मेरे पास आए। तब फोन संपर्क का कोई साधन नहीं था। मैं सिर्फ आत्मविश्वास के आधार पर कह पा रहा था कि सभी भाई बहन सुरक्षित हैं। पर मुझे भी नहीं पता था कि वे मुंबई में किस हाल में हैं। उस समय पिताओं को दो दिन बाद एक साथी का फोन आने पर कुशल क्षेम पता चला। इसी समूह में वाराणसी से गए हमारे एएनडी होस्टल के साथी विद्या कुमार चौधरी ने मुंबई धमाके के दिन को याद किया है। पढ़िए... उन्ही की जुबानी....

बॉम्बे धमाका और मैं !

विद्या कुमार चौधरी  ( लेखक इन दिनों बिहार के एक सम्मानित कॉलेज में राजनीति विज्ञान के व्याख्ता हैं)

लगभग 24 घंटे की उबाऊ रेल यात्रा के बाद 12 मार्च 1993 को अपने दो बनारसी मित्रों के साथ मैं विक्टोरिया टर्मिनल स्टेशन पर सुबह 6 बजे पंहुचा। आल इंडिया कम्युनल हारमोनी कैंप में भाग लेना तो एक बहाना था असली मकसद था बॉम्बे घुमना। स्टेशन से कुछ ही दूर एक ख़ाली रेलवे गोदाम में राष्ट्रीय युवा योजना का कैंप लगा था। मैं अपने मित्रों के साथ BHU और बनारस का प्रतिनिधि बनकर गया था। भाई जी यानी सुब्बाराव जी से मिलकर यात्रा की सारी थकान छू मंतर हो गई और हम कैंप की विभिन्न गतिविधियों में शामिल हो गए । कैंप की शुरुआत में सर्व धर्म प्रार्थना हो रही थी शायद ...जब पहला धमाका हुआ........! 


कुछ ही अंतराल में कई धमाके हुए । भाई सुब्बाराव जी ने देश भर से आये लगभग 300 से ज्यादा युवाओं को स्थिति की गंभीरता से अवगत कराया और 10-10 लोगों का 20 ग्रुप बनाने का आदेश दिया। आधे घंटे के अंदर एक ग्रुप का हिस्सा बनकर मैं BSE (शेयर मार्किट) के उजड़े इमारत के सामने खड़ा था। क्या करना चाहिए ये सोच ही रहा था कि NYP का परिचय पत्र देखकर एक एम्बुलेंस वाले ने मुझे बुलाया। एम्बुलेंस के बगल में फायर ब्रिगेड वाले घायलों और लाशों को लाकर रख रहे थे। उसने मुझसे मराठी में कुछ करने को कहा....मेरी दिक्कत समझकर उसने बम्बइया हिंदी में कहा..."मुँह क्या देख रहे हो जो मर गए हैं उन्हें छोड़ दो जो ज़िंदा हैं उन्हें एम्बुलेंस में डालों।"
राजनीति विज्ञानं में स्नातक कर रहे 20 साल के एक लड़के के लिए यह जीवन का सबसे कठिन काम था।लगभग 20 जिन्दगियों का फैसला उस दिन मैंने किया। उनमे से कितने आज जिन्दा हैं मुझे पता नहीं ।लेकिन एक अपराधबोध की आशंका से मैं आज भी ग्रस्त हूँ... उस दिन घायलों को चुनकर एम्बुलेंस में डालने और लाशों को सड़क पर छोड़ने में मुझसे कोई गलती तो नहीं हुई थी ?
शायद कल सुबह से यह अपराधबोध मेरा पीछा छोड़ दे... बॉम्बे धमाके में एक और 'लाश' बढ़ने वाला जो हैं ।


कैंप कैसे पहुंचा -  होली की छुट्टी थी शायद....ज्यादातर लोग घर गए थे। जहाँ तक मुझे याद हैं कैंप में Vidyut Prakash Maurya को जाना था ...लेकिन उसे भी घर जाना था ....इसलिए उसने मुझे भेज दिया था ।  
( विद्या के फेसबुक वाल से साभार)  

(BHU, VARANASI, UTTAR PRADESH, NYP CAMP, MUMBAI ) 

Saturday, July 25, 2015

मुरादें पूरी करती हैं मां विंध्यवासिनी

शक्ति की देवी मां विंध्यवासिनी का मंदिर उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के विंध्याचल में स्थित है। यह स्थान मुगलसराय से इलाहाबाद रेल मार्ग पर पड़ता है। इसे जागृत शक्ति पीठ माना जाता है। यह देश के 51 शक्तिपीठों में से एक है। आद्य शक्ति भगवती विंध्यवासिनी का विंध्य पर्वत माला में हमेशा से निवास स्थान रहा है। महाभारत के विराट पर्व में धर्मराज युद्धिष्ठिर ने मां विंध्यवासिनी की स्तुति की है। उन्होंने कहा है कि पर्वतों में श्रेष्ठ विंध्याचल पर्वत पर आप सदैव विद्यमान रहती हैं। पद्म पुराण में देवी को मां विंध्यवासिनी कहा गया है। सृष्टि से आरंभ से ही मां विंध्यवासिनी की पूजा का आख्यान मिलता है। कहा जाता है कि त्रेता युग में भगवान राम भी सीता के साथ विंध्याचल आए थे। मार्केंडेय पुराण के दुर्गा सप्तशती के 11वें अध्याय में भी मां विंध्यवासिनी की कथा आती है। उन्होंने शुंभ और निशुंभ नामक दैत्यों का नाश किया।


हमेशा से ही विंध्य क्षेत्र में घने जंगल थे इसलिए देवी का नाम वन दुर्गा भी पड़ गया। वन को अरण्य भी कहा जाता है। इसलिए ज्येष्ठ मास के शुक्ल  पक्ष की षष्ठी तिथि को मां की विशेष पूजा की जाती है। इसे अरण्य षष्ठी भी कहा जाता है।
मां का मंदिर गंगा की जल धारा और विंध्य पर्वत श्रंखलाओं के बीच स्थित है। परिसर में बड़ा ही मनोरम वातावरण बन पड़ता है। कई भक्त मां गंगा के जल में स्नान के बाद विंध्यवासिनी के दर्शन करते हैं। मां विंध्यवासिनी के दरबार में लोग मन्नते मांगने दूर दूर से आते हैं। यहां लालू प्रसाद यादव , अमिताभ बच्चन जैसी हस्तियां हाजिरी लगाने पहुंच चुकी हैं।
नवरात्र के समय मां के दर्शन का विशेष प्रावधान है। इसलिए दोनों नवरात्र के नौ दिनों में मां विंध्यवासिनी के मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। नवरात्र के दिनों में मां के श्रंगार के लिए मंदिर के कपाट चार दिन बंद किए जाते हैं। इस दौरान बड़ी संख्या में ज्योतिष और तांत्रिक तंत्र-मंत्र की साधना के लिए भी इन दिनों मां विंध्यवासिनी देवी के मंदिर के आसपास डेरा डालते हैं।  यहां अष्टमी के दिन दक्षिण मार्गी और वाममार्गी तांत्रिकों का जमावड़ा लगता है।

पताका दर्शन - कहा जाता है कि नवरात्र में मां मंदिर छोड़कर आसमान मेंजाकर पताका में वास करती हैं। इसलिए इन दिनो श्रद्धालु पताका के दर्शन करके भी धन्य हो जाते हैं। मां मंदिर सुबह 4 बजे से रात्रि 12बजे तक खुला रहता है। रात्रि दर्शन में मां का सुंदर श्रंगार देखने को मिलता है।
काली खोह – विंध्याचल में थोड़े दायरे में तीन देवियों के मंदिर हैं। विंध्यवासिनी देवी के मंदिर से दो किलोमीटर की दूरी पर काली खोह गुफा में महाकाली और अष्टभुजा पहाड़ी पर मां अष्टभुजा देवी का मंदिर है। कालीखोह गुफा में जाने का रास्ता अत्यंत संकरा है।

कैसे पहुंचे - विंध्याचल शहर गंगा तट पर स्थित है। यहां विंध्याचल नाम से रेलवे स्टेशन भी है , जहां कुछ रेलगिड़यों का ठहराव है। आप वाराणसी या इलाहाबाद से चलने वाली नियमित बस सेवाओं से भी विंध्याचल पहुंच सकते हैं। वाराणसी से विंध्याचल की दूरी सड़क मार्ग से 65 किलोमीटर है। मिर्जापुर से विंध्याचल की दूरी तकरीबन 8 किलोमीटर है जबकि इलाहाबाद से विंध्याचल की दूरी 82 किलोमीटर है। आप मिर्जापुर में रुककर मां के दर्शन करने जा सकते हैं।


Friday, July 24, 2015

फूल खिले हैं गुलशन गुलशन - रोज गार्डन चंडीगढ़

स्वतंत्र भारत की खूबसूरत रचना है चंडीगढ़। इस शहरों को फ्रेंच वास्तुविद ला कारबुजिए ने डिजाइन किया। तमाम बाते हैं जो शहर को खास बनाती हैं। साल 2016 में इसके खास डिजाइन के कारण इसे विश्व विरासत स्थलों की सूची में यूनेस्को ने शामिल कर लिया है। खास तौर पर दो राज्यों पंजाब और हरियाणा राजधानी के भवनों की संरचना इसे नायब शहर बनाती है। पर चंडीगढ़ शहर रॉक गार्डेन के अलावा रोज गार्डेन यानी गुलाबों के उद्यान के लिए भी जाना जाता है। गुलाबों का ये उद्यान चंडीगढ़ बस स्टैंड से थोड़ी दूरी पर ही सेक्टर 16 में स्थित है। खासकर वसंत के मौसम में यहां गुलाबों की क्यारियां जन्नत सा नजारा पेश करती हैं।

रोज गार्डेन का नाम भारत के पूर्व राष्ट्रपति डाक्टर जाकिर हुसैन के नाम पर जाकिर हुसैन रोज गार्डेन रखा गया है। इस उद्यान का निर्माण 1967 में कराया गया। यह सिटी ब्यूटीफूल की खूबसूरती में चार चांद लगाता है। यह एशिया का सबसे बड़ा गुलाबों का उद्यान माना जाता है। यहां पर गुलाब की 1600 से ज्यादा वेराइटी मौजूद है। यहां गुलाब के 17 हजार से ज्यादा पौधे लगाए गए हैं। आप देखते देखते और गिनते गिनते थक जाएंगे। पर वेराइटी खत्म होने का नाम नहीं लेगी। 


ये उद्यान 27 एकड़ में फैला हुआ है। गुलाब उद्यान में कई प्राचीन किस्म के बड़े पेड़ भी हैं। उद्यान में कई औषधि महत्व वाले दरख्त भी लगाए गए हैं। हर साल फरवरी महीने में रोज गार्डन में उत्सव मनाया जाता है। तब वसंत की मादकता के साथ लाल गुलाब की सुंदरता चरम पर होती है। इस मौके पर आने वाले युवा उद्यान का सौंदर्य और बढ़ा देते हैं। उद्यान में आप गुलाब की कई ऐसी दुर्लभ किस्में भी देख सकते हैं जो आपने अभी तक नहीं देखी हों। अगर आप चंडीगढ़ जाएं तो थोडा वक्त फूलों के साथ गुजारने के लिए भी जरूर निकालें। किसी शायर ने कहा है-

जिंदगी है बहार फूलों की...दास्तां बेशुमार फूलों की...
तुम क्या आए तसवुर में..आई खूशबू हजार फूलों की

चंडीगढ का बस स्टैंड देश के जितने भी बस स्टैंड मैंने देखे है उनमें चंडीगढ़ का बस स्टैंड काफी बेहतर है। कैंपस में रेस्टोरेंट, होटल, दुकानें, सैलून, टायलेट, पार्किंग सब कुछ। अब हालांकि देश के कुछ और शहरों के बस स्टैंड बेहतर बनाए गए हैं। पर चंडीगढ़ का बस स्डैंड काफी पहले से बेहतर है। पहली बार 1993 में चंडीगढ़ यात्रा में मैंने इस बस स्टैंड को देखा था। यहां से हरियाणा, हिमाचल और पंजाब के हर शहर के लिए बसें मिलती हैं। यहां आप बड़े आराम से इंतजार के कुछ घंटे गुजार सकते हैं।

चंडीगढ़ में कहां ठहरें - सिटी ब्यूटीफुल में वैसे तो ठहरने के लिए तमाम विकल्प हैं। पर अगर आप सस्ते मे ठहरना चाहते हैं तो सूद धर्मशाला से अच्छी कोई जगह नहीं है। सूद धर्मशाला कहने को धर्मशाला है पर यहां पर फेमिली रूम कूलर वाले कमरे और एसी रूम भी मौजूद है। यहां हमेशा हाउसफुल जैसी स्थिति रहती है। हालांकि कोई एडवांस बुकिंग नहीं होती। धर्मशाला में नीचे एक अच्छा भोजनालय भी है। सूद धर्मशाला सेक्टर 22 में स्थित है।

सूद धर्मशाला - SOOD DHARMSHALA- 
फोन +(91)-9814704661 +(91)-172-2700223, 2703711, 4600223  किसान भवन के पास, सेक्टर 22 के मार्केट के पीछे से प्रवेश जन मार्ग, चंडीगढ़ – 160022

- vidyutp@gmail.com

Wednesday, July 22, 2015

गोल्डेन बीच चेन्नई की तिलिस्मी दुनिया

चेन्नई शहर के बाहरी इलाके में स्थित है गोल्डेन बीच की तिलिस्मी दुनिया.। चेन्नई घूमने वालों की यह खास पसंद है। गोल्डेन बीच को आप तमाम हिंदी और दक्षिण भारतीय फिल्मों में देख चुके हैं। यह निजी तौर पर विकसित किया गया समुद्र तट है जहां पर कई घंटे परिवार के साथ घूमने का आनंद लिया जा सकता है। यहां पर स्विमिंग पुल, गो कार्टिंग, वाटर गेम्स लाइव कल्चरल प्रोग्राम का आनंद आप ले सकते हैं। आजकल एक्वेरियम और जुरासिक पार्क जैसी चीजें भी गोल्डेन बीच में जोड दी गई हैं। चेन्नई के ईस्ट कोस्ट रोड पर स्थित है गोल्डेन बीच। बच्चों को गोल्डेन बीच बेइन्तहा पसंद आता है। बच्चे यहां आकर मस्ती में खो जाते हैं।


उड़ने दो परिंदों को शोख हवा में...

फिर लौटकर बचपन के दिन नहीं आते...

गोल्डेन बीच मुख्य शहर से कोई 30 किलोमीटर बाहर है। यहां जाने के लिए बसें और आटो रिक्सा आदि शहर के हर कोने से उपलब्ध रहते हैं। यह चेन्नई के सबसे सुरक्षित और साफ सुथरे समुद्र तट में गिना जाता है। यहां आप अपने परिवार के साथ यादगार पल बिता सकते हैं। बच्चे हों या फिर बड़े सबको यहां पर खूब आनंद आता है। मिलेनियम टावर, पनीर फोर्ट और आदमी की मूर्ति यहां के मुख्य आकर्षण है। एक आदमी है जो मूर्ति बना खड़ा रहता है। आप उसके कई मिनट तक देखते रहिए पर उसका पोस्चर नहीं बदलता। आंखों की पलकें भी नहीं झपकती। बड़ा अभ्यास है उसका। गोल्डेन बीच में आने वाले लोग इस आदमी को कौतूहल से देखत रहते हैं।

गोल्डेन बीच में पांच हजार से ज्यादा फिल्मों और टीवी सीरियलों की शूटिंग हो चुकी है। बॉलीवुड की कई फिल्मों की यहां शूटिंग हुई है। कई फिल्मकार तो गोल्डन बीच के दृश्य अपनी फिल्म में डालना बाक्स आफिस पर सफलता की गारंटी मानते हैं। खासतौर पर फिल्मकार यहां पर गाने की शूटिंग करते हैं। यहां अमिताभ बच्चन, जितेंद्र, गोविंदा, कमल हासन, रजनी कांत, नागार्जुन जैसे नामचीन सितारे शूटिंग करने आ चुके हैं। जब आप गोल्डन बीच का नजारा कर रहे होते हैं तो कई दृश्यों को देखकर आपको याद आता है कि आप इसे किसी फिल्म में देख चुके हैं। गोल्डन बीच में समुद्र के किनारे खड़ा एक नकली जहाज का विशाल माडल भी देखा जा सकता है।

गोल्डेन बीच  में डोसा - 1992 के जनवरी में सुनील सेवक और राजीव सिंह के साथ 
गोल्डेन बीच के प्रवेश द्वार पर दर्शकों के लिए क्लाक रूम का भी इंतजाम है जहां आप अपनी अतिरिक्त वस्तुएं रख सकते हैं। वास्तव में यह के बड़ा समुद्र तटीय रिजार्ट है। यहां पर खाने पीने के लिए रेस्टोरेंट भी है। पर खाना बाजार से थोड़ा महंगा है। मैं चेन्नई 1992 जनवरी में गया था तब अपने साथी सुनील सेवक और राजीव कुमार सिंह के साथ गोल्डेन बीच घूमने पहुंचा था।

खुलने का समय – गोल्डेन बीच सुबह 11 बजे से शाम 7.30 बजे तक सातों दिन खुला रहता है। यहां प्रवेश के लिए टिकट 295 रुपये प्रति व्यक्ति से आरंभ होता है। बच्चों का टिकट थोड़ा सा ही कम है। बच्चों का टिकट 245 रुपये से आरंभ होता है। आप इसके लिए टिकटें आनलाइन भी बुक करा सकते हैं। यहां आप अक्तूबर से फरवरी के बीच जाएं तो बेहतर है तब चेन्नई का मौसम अच्छा रहता है।
यहां करें ऑनलाइन टिकट बुकिंग - http://www.ticketnew.com/OnlineTheatre/online-movie-ticket-booking/Events/VGP-Universal-Kingdom.html


-vidyutp@gmail.com
( GOLDEN BEACH,  CHENNAI) 

Saturday, July 18, 2015

हिंदुस्तान के बेहतरीन नजारें देखें बाहुबली में

केरल के त्रिशूर जिले में स्थित अथिरापाली झरना। 
मनोरंजन के लिहाज से साल 2015 की शानदार फिल्म बाहुबली – द बिगनिंग की शूटिंग में हिंदुस्तान के बेहतरीन नजारों को देखा जा सकता है। फिल्म शुरू होती है एक नदी और झरने के बैकड्राप से। ये झरना भारत के केरल राज्य के त्रिशूर जिले में हैं। फिल्म में हीरो प्रभाष को पहाड़ों पर मुश्किल चढ़ाई करते हुए देखा जाता है। इसके लिए प्रभाष ने रॉक क्लाइंबिग का लंबा प्रशिक्षण भी लिया। फिल्म के इस हिस्से को ही शूट करने में 109 दिनों का समय लगा।यानी तकरीबन आधे घंटे के फिल्म के हिस्से की शूटिंग के लिए झरने के आसपास 109 दिनों तक फिल्म की क्रू यहां पर रही। तकनीक के कमाल से झरना फिल्म में और भी भव्य दिखाई दे रहा है। इस झरने को देखकर लोगों के मन में कौतूहल होता है कि आखिर ये झरना है कहां पर...लेकिन ये कोई विदेश का नजारा नहीं है...


तो हम बात कर रहे हैं अथिरापाली वाटर फाल की है। यहां पहाड़ से 80 फीट नीचे जलधाराएं गिरती हैं जो अत्यंत मनोरम दृश्य प्रस्तुत करती हैं। अथिरापाली को भारत का नियाग्रा भी कहा जाता है। ये जलधारा आगे चालकुडी नदी का रुप ले लेती है। यह केरल का लोकप्रिय पिकनिक स्पाट है। इसके पास में छारपा और वाजाचाल वाटर फाल भी पास में देखे जा सकते हैं। अथिरापाली से वाजाचाल की दूरी पांच किलोमीटर है। अथिरापली शोलायार संरक्षित वन क्षेत्र में पड़ता है। आप यहां शोलायार डैम देखने भी जा सकते हैं। अथिरापली में बर्ड वाचिंग और प्राकृतिक सौंदर्य देखने के प्रयाप्त मौके हैं। यहां ट्रैकिंग के अलावा वनऔषधि उद्यान भी देख सकते हैं। यहां आप हिरण, बंदर जैसे वन्य जीव भी देख सकते हैं। अथिरापाली में सैलानियों के लिए व्यू प्वाइंट बनाए गए हैं जहां से झरने का शानदार नजारा दिखाई देता है। पर पानी में उतरना खतरनाक हो सकता है। आप यहां दिए गए निर्देशों का पालन जरूर करें।
इस साइट पर जाकर देखें झरने का लाइव नजारा - https://www.youtube.com/watch?v=A15U9A3hiIY
कैसे पहुंचे – अथिरापाली का निकटतम शहर चलाकुडी है। चलाकुडी रेलवे स्टेशन से अथिरापाली की दूरी 35 किलोमीटर है। त्रिशूर से चलाकुडी की दूरी 30 किलोमीटर है तो एर्नाकुलम (कोचीन) से चलाकुडी की दूरी 43 किलोमीटर है। आप कोचीन में रुककर एक दिन में अथिरापली घूमने की योजना बना सकते हैं। घूमने का समय सुबह 8 बजे से शाम 6 बजे तक का है। टिकट 8 से 5 बजे तक प्राप्त किए जा सकते हैं। टिकट दरें 15 रुपये प्रति व्यक्ति है।
कहां ठहरें -  अथिरापाली में रहने के लिए डारमेटरी रेस्ट रूम भी उपलब्ध है। वैसे अथिरापाली में रहने के लिए कई लग्जरी होटल भी उपलब्धहैं। आप चाहें तो कोचीन, चलाकुडी या त्रिशूर में भी ठहर सकते हैं।  http://www.athirapallytourism.org/
करनूल के पास रॉक गार्डन। 

अब बात फिल्म के दूसरे शूटिंग लोकेशन की बादलों की शूटिंग के कुछ लोकेशन महाबलेश्वर से लिए गए हैं, जहां मानसून में बादल सड़कों पर उतर आते हैं। बाहुबली फिल्म में काफी दृश्य आंध्र प्रदेश के करनूल जिले के रॉक गार्डन के हैं। करनूल का रॉक गार्डन करनूल शहर से 20 किलोमीटर आगे एनएच 18 पर ओरवाकाल गांव में स्थित है। यह 100 एकड़ में फैला है। यहां प्राकृतिक रुप से पहाड़ियां हैं जिन्हें देखने लोग पहुंचते हैं। कई फिल्मों की पहले भी शूटिंग हो चुकी है। यहां पर एपटीडीसी की हरिता रेस्टोंरेंट स्थित है। यहां भी आप कुछ घंटे के लिए घूमने जा सकते हैं। प्राकृतिक सौंदर्य देखकर आनंद आएगा।
रामोजी फिल्मसिटी में बाहुबली का सेट। 
फिल्म का ज्यादातर हिस्से की शूटिंग हैदराबाद के रामोजी फिल्म सिटी में की गई है। एक गाना और महिष्मती सम्राज्य का सेट रामोजी फिल्मसिटी में लगाया गया था। वही रामोजी फिल्म सिटी  जहां मैंने साल 2007 में तकरीबन एक साल गुजारा। फिल्म में युद्ध का पूरा दृश्य रामोजी फिल्म सिटी में फिल्माया गया है। इस दौरान 2000 कलाकारों को शामिल किया गया था। हालांकि फिल्म के कुछ हिस्सों की शूटिंग बल्गारिया में भी की गई है, लेकिन ऐसा तमिलनाडु में फिल्म कलाकारों की हड़ताल के कारण करना पड़ा। फिल्म का अधिकतम पोस्ट प्रोडक्शन काम भी रामोजी फिल्मसिटी में हुआ है। यह संयोग ही है कि फिल्म के निर्दशक एस एस राजमौली ने अपना कैरियर भी इनाडू टेलीविजन के धारावाहिकों के निर्देशन के साथ ही शुरू किया था।
vidyutp@gmail.com

  


Friday, July 17, 2015

मस्त आटोरिक्शा है केएपीएल का क्रांति

शेखावटी क्षेत्र के शहर झुंझनू में जो आटो रिक्शा सबसे ज्यादा चलता दिखाई दिया था वह था केएपीएल का क्रांति। यह परंपरागत तीन पहिया की तुलना में थोड़ा लंबा है। पर देखने में चौड़ाई थोड़ी कम लगती है। इसमें एक सीट आगे की तरफ है तो दूसरा सीट पीछे की तरफ। पीछे की तरफ की सीट में लेग स्पेस ज्यादा दिया गया है। यहां चाहे तो सामान भी रखा जा सकता है। पीछे वाली सीट के सामने दो बड़े स्टील रॉड बांए और दाहिने तरफ लगाए गए हैं। इसे पीछे बैठने वाला आसानी से पकड़ कर बैठ सकता है। संतुलन बना रहता है। पीछे बैठने का दूसरा फायदा है कि आप पूरे शहर का दाहिने बाएं नजारा करते हुए आगे बढ़ते हैं। इस तरह के आटो रिक्शा सीकर शहर में भी चलते हुए नजर आए। थोड़ा शोध करने पर पता चला कि ये आटो रिक्शा कुरुक्षेत्र का बना हुआ है। शेखावटी के आटो वाले केएपीएल के क्रांति को अदभुत ढंग से सजा संवार कर रखते हैं। इस आटो को चारों तरफ से खूब फूलपत्तियों से संवार कर रखा गया है। कंपनी से आने वाली मूल चेसिस को आटो रिक्शा वाले अपने मनमाफिक सजा संवार कर तैयार कराते हैं। आटो वाले सवारी का ज्यादा इंतजार नहीं करते। दो आगे की सीट पर और दो पीछे की सीट पर लोग बैठे नहीं की आटो चल पड़ा मंजिल की ओर। सीटें आरामदेह है। दिल्ली के टाटा मैजिक की तरह कोई कसम कस नहीं। महिंद्रा के आटो रिक्शा की तुलना में क्रांति पतला है पर लंबा है। ये गुजरात के छकड़ा की तरह देखने में ग्लैमरस लगता है। आटो वालों ने इसे जिस तरह से सजाया हुआ है उसे देखकर इसका सौंदर्य और बढ़ जाता है। हालांकि डीजल चलित होने के कारण यह तेज आवाज करता है।

केएपीएल द्वारा निर्मित आटो रिक्शा हैं। केएपीएल यानी कुरुक्षेत्र आटोमोबाइल्स प्राइवेट लिमिटेड। इसका लोकप्रिय माडल है क्रांति 435 सीएल। इसमें ग्रीव्ज का डीजल इंजन लगा है। इसका फ्रंट कम चौड़ा दिखाई देता है। बनावट में ये तीन पहिया पतला और लंबा है। इस कंपनी का निर्माण केंद्र हिमाचल प्रदेश के सिरमौर में है, जबकि मुख्यालय कुरूक्षेत्र में है। कंपनी के संचालक जेएस सैनी हैं। ( http://kaplvehicles.com/ ) हालांकि क्रांति जैसा आटो रिक्शा एपीआई भी बनाती है पर शेखावटी में क्रांति की धूम है।
हालांकि शेखावटी के शहरों में केएपीएल के क्रांति के अलावा एपीआई के बने हुए भी इसी माडल के आटोरिक्शा दिखाई दे जाते हैं। पर क्रांति का जवाब नहीं। आटो वाले बताते हैं कि क्रांति का रखरखाव सस्ता पड़ता है और यह माइलेज भी बेहतर दे जाता है। गाड़ी का चेसिस मजबूत है सालों साल साथ निभाता है। तो चलें आटो रिक्शा में...आजा मेरी गाड़ी में बैठ जा...



Thursday, July 16, 2015

शेखावटी में लें मारवाड़ी खाने का स्वाद

जयपुर की एक सुबह। सिंधी कैंप के बाहर एक होटल मे नास्ते में एक पराठा लेकर आगे के सफर पर चल पड़ता हूं। वैसे राजस्थान में लोग मिर्ची खूब खाते हैं। सुबह में यहां पर मिर्च के बड़े-बड़े पकौड़े मिलते हैं। दुकानदार इसे काटकर कई टुकड़े कर प्लेट में पेश करते हैं। पर मुझे मिर्च पसंद नहीं है। मिठास पसंद है। 

दोपहर हो गई है तो खाटू श्याम में लस्सी पीना पसंद करता हूं। मिट्टी के करूआ में लस्सी। महज 20 रुपये में। स्वाद भी काफी कुछ बनारस की लस्सी के ही जैसा। गन्ने का जूस तो हर जगह मिलता है जो गर्मियों में प्यास बुझाता है।
खाटू श्याम से सीकर के लिए बस लेता हूं। बस ग्रामीण इलाकों से होती हुई पलसाना पहुंचती है। यहां पर रींगस सीकर एक्सप्रेस वे आता है। यहां पर शेक मिल रहा है। इसमें मैंगो के साथ खरबूजा भी मिला हुआ है। इसका अपना अलग स्वाद है। गरमी में तरावट तो देता ही है। रानौली, रैवासा धाम होते हुए बस सीकर पहुंचती है।

दोपहर हो गई लिहाजा भूख लगी है। सीकर बस स्टैंड  के एक भोजनालय में 50 रुपये की थाली है। इसमें राजस्थानी घी चुपड़े फुलके हैं। दाल और दो सब्जी के साथ। फुलके की गिनती नहीं है चाहे जितनी खाओ।
खाने के बाद मैं अगली बस लेता हूं सालासर के लिए। चैलासी, सेवद बड़ी, कछावा, सुतोद होते हुए बस सालासर पहुंचती है लगभग दो घंटे में। दूरी है 55 किलोमीटर। सालासर में बालाजी के दर्शन के साथ रात्रि विश्राम करना है। रात के भोजन के लिए पहुंचता हूं गंगानगर सेवा सदन में। यहां 50 रुपये की थाली है। मारवाडी बासा की तरह नीचे बैठकर जीमने का इंतजाम। यहां भी चपाती चाहे जितनी भी खाओ। सालासर के कई सेवा सदनों में शाकाहारी भोजनालय संचालित होते हैं। जहां आप पेटभर खा सकते हैं।
अगले दिन सालासर से आगे बढ़ता हूं। यहां झूंझनू ने के लिए सीधी बस नहीं मिलती। बस स्टैंड से मुंकुदगढ़ की बस मिलती है। रास्ते में नांगलूणा, जाजोद के बाद लक्ष्मणगढ़ नामक कस्बा आता है। यहां एक किला दिखाई देता है। शहर के बीच में मुरली मनोहर मंदिर के पास बस रुकती है। लक्ष्मणगढ़ में निजी क्षेत्र का मोदी विश्वविद्यालय खुल गया है। http://www.modyuniversity.ac.in/ 

फिलहाल लक्ष्मणगढ़ मीटरगेज रेलवे लाइन पर है। बस यहां से आगे बढ़ती है। बराला के बाद मुकुंदगढ़ चौराहे पर बस मुझे उतार देती है। यहां से दूसरी बस मिलती है झुंझनू के लिए। मुकुंदगढ़ से कोई 30 किलोमीटर दूरी है झुंझनू की। झुंझनू में मोरारका कालेज समेत कई शिक्षण संस्थान है। अब वहां जेजेटीयू यानी जगदीश प्रसाद झाबरमल टीबडेवाला यूनीवर्सिटी खुल गई है। (http://jjtu.ac.in/) ये विश्वविद्यालय चुडाला में चुरू रोड पर ( स्टेट हाईवे नंबर 37) स्थित है।

झुंझनू में रानी सती मंदिर के दर्शन के बाद वहां के प्रसाद गृह (भोजनालय) का कूपन खरीदता हूं। 70 रुपये का कूपन है। मंदिर के मुख्य द्वार से प्रवेश के बाद बायीं तरफ भोजनालय है। चप्पल निकालकर भोजनालय में प्रवेश के बाद गर्म पानी के नल पर हाथ धोने की सलाह दी जाती है। खाने की थाली सामने है। भिंडी की सब्जी, दो और सब्जियां, दाल, रायता, घी चुपडी चपातियां और चावल। सब कुछ चाहे जितना खाओ। विशुद्ध मारवाडी खाना। स्वाद ऐसा कि लंबे समय तक न भूले।

तो राणीसती मंदिर का दिव्य प्रसाद लेकर हम आगे बढ़े। झुंझनू से दिल्ली की बस में। बागड धाम के बाद आता है चिड़ावा। यहां के पेड़े खूब मशहूर हैं। हालांकि हमने खरीदे नहीं। इसके बाद आता है सिंघाना। फिर पचेड़ी। ये हरियाणा की सीमा है। यहां पर खुली है निजी क्षेत्र की सिंघानिया यूनीवर्सिटी। http://singhaniauniversity.co.in/ इसके बाद बस नारनौल की ओर दौड़ रही है। हरियाणा के शहर नारनौल में कई जगह जल कुटीर दिखाई दिए लोग यहां निःशुल्क पानी पिलाते हैं।

Wednesday, July 15, 2015

रानी सती का मंदिर झुंझनू

राजस्थान के झुंझनू में स्थित है रानी सती का मंदिर। शह के बीचों बीच स्थित मंदिर झुंझनू शहर का प्रमुख दर्शनीय स्थल है। बाहर से देखने में ये मंदिर किसी राजमहल सा दिखाई देता है। पूरा मंदिर  संगमरमर से निर्मित है। इसकी बाहरी दीवारों पर शानदार रंगीन चित्रकारी की गई है। मंदिर में शनिवार और रविवार को खास तौर पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।

रानी सती जी को समर्पित झुंझुनू का ये मंदिर 400 साल पुराना है। यह मंदिर सम्मान, ममता और स्त्री शक्ति का प्रतीक है। देश भर से भक्त  रानी सती मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं। भक्त यहां विशेष प्रार्थना करने के साथ ही भाद्रपद माह के अमावस्या पर आयोजित होने वाले धार्मिक अनुष्ठान में भी हिस्सा लेते हैं। रानी सती मंदिर के परिसर में कई और  मंदिर हैं, जो भगवान शिव,  भगवान गणेश माता सीता और श्रीराम के परम भक्त हनुमान को समर्पित हैं। मंदिर परिसर में षोडष माता का सुंदर मंदिर है, जिसकी 16 देवियों की मूर्तियां लगी हैं। परिसर में सुंदर लक्ष्मीनारायण मंदिर भी बना है।

राजस्थान के मारवाड़ी लोगों का दृढ़ विश्वास है कि रानी सतीजी, स्त्री शक्ति की प्रतीक और मां दुर्गा का अवतार  थीं। उन्होंने अपने पति के हत्यारे को मारकर बदला लिया और फिर अपने सती होने की इच्छा पूरी की। हालांकि पूरे देश में सती प्रथा से जुड़े होने के कारण सती मंदिरों का काफ़ी विरोध हुआ।

 पर रानी सती मंदिर भारत के सबसे अमीर मंदिरों में से एक है। इस मंदिर को देश के कोने कोने में फैले मारवाडी समाज के लोगों की आस्था है। उनसे मंदिर को नियमित दान भी मिलता है। अब मंदिर का प्रबंधन सती प्रथा का विरोध करता है। मंदिर के गर्भ गृह के बाहर बड़े अक्षरों में लिखा है- हम सती प्रथा का विरोध करते हैं।

मंदिर परिसर में विशाल अतिथि गृह - मंदिर में श्रद्धालुओं के लिए विशाल आवास बना है जहां पर 100 रुपये लेकर 700 रुपये तक के कमरे उपलब्ध  है। मंदिर में एक कैंटीन और एक भोजनालय भी है। कैंटीन में दक्षिण भारतीय भोजन भी उपलब्ध है। इस भोजनालय में भोजन 
दिन में 11 से 1 बजे और शाम 8 से 11 बजे तक उपलब्ध रहता है। पर भोजन के लिए कूपन लेना पड़ता है। स्थानीय लोगों को कूपन जारी नहीं होता। 
मंदिर सुबह 5 बजे से दोपहर एक बजे तक और शाम 3 बजे से रात्रि 10 बजे तक खुला रहता है। मंदिर के गर्भ गृह में निकर बारमुडा पहने लोगों का प्रवेश वर्जित है। मंदिर का दफ्तर सुबह 9 बजे से शाम 8 बजे तक खुला रहता है।

कैसे पहुंचे – झुंझनू बस स्टैंड से राणी सत्ती मंदिर के लिए आटो रिक्शा ले सकते हैं। बस स्टैंड से दूरी तीन किलोमीटर है। आटो रिक्शा वाले 10 रुपये किराया लेते हैं। रेलवे स्टेशन से मंदिर की दूरी 2 किलोमीटर है। वहीं शहर के गांधी चौक से मंदिर की दूरी महज एक किलोमीटर है। 

 आप आटो आरक्षित करके भी मंदिर जा सकते हैं। अगर एक दिन रुकना है तो राणी सती मंदिर के स्वागत कक्ष पर आवास के लिए भी अाग्रह कर सकते हैं। रविवार को राणी सती मंदिर में दिल्ली से जाने वाले श्रद्धालुओं की काफी भीड़ होती है। 
- vidyutp@gmail.com

(RANI SATI TEMPLE, JHUNJHUNU, RAJSTHAN ) 

Tuesday, July 14, 2015

देश का आठवां आश्चर्य है शेखावटी की हवेलियां

होटल में तब्दील झुंझनू की एक हवेली। 
राजस्थान का शेखावटी इलाका अपनी हवेलियों के लिए जाना जाता है। शेखावाटी राजस्थान के सीकर, झुंझनू और चुरू  ज़िले आते हैं। वहीं ये इलाका देश में शिक्षा के बड़े केंद्र के तौर पर भी जाना जाता है। अर्ध-रेगिस्तानी शेखावटी इलाका राव शेखाजी (1433-1488 ईस्वी) के नाम पर अस्तित्व में आया। झुंझुनूं जिले के नवलगढ़ शहर की स्थापना राव शेखाजी के वंशज ठाकुर नवल सिंह जी ने की थी। यहां सेकसरिया की हवेली और मोरारका की हवेली देखी जा सकती है।

शेखावटी की हवेलियों को राजस्थान की ओपन आर्ट गैलरी के नाम से भी पुकारा जाता है। शेखावटी की हवेलियों में रंग-बिरंगे भित्तिचित्र देखे जा सकते हैं। ज्यादातर हवेलियां 18 वीं से 20 वीं शताब्दी के बीच बनी हैं। इन हवेलियों के भित्तिचित्र बहुत-से ऐतिहासिक और पौराणिक प्रसंगों का चित्रण किया गया है। कई लोग इन हवेलियों को भारत का आठवां आश्चर्य भी मानते हैं।  सीकर, झुंझनूं, चुरूमुकंदगढ़, चिड़ावा, नवलगढ़, रामगढ़, महनसर, मंडावा, मंड्रेला डूंडलोदसूरजगढ़, फतेहपुर आदि में ऐसी हवेलियां देखी जा सकती हैं। शेखावटी में भले ही हरियाली नहीं नजर आती है, पर रंग बिरंगी हवेलियों को देखने के लिए सैलानी यहां सालों भर पहुंचते हैं। कई हवेलियां तो होटलों में बदल दी गई हैं, जहां सैलानी रुकना शान समझते हैं। दो शताब्दियों के बीच यहां के भित्ति चित्रकारों ने अपनी कूची का कमाल दिखाया। ज्यादातर भित्तिचित्र 1750 से 1930 के बीच बने हैं। झुंझनूं जिले के नवलगढ़ की हवेलियों की भित्तियों पर बारह मासे का भी सुंदर चित्रांकन मिलता है। कहीं देवी-देवताओं के चित्र बने हैं तो कहीं पर विवाह संबंधी या फिर लोक पर्वों के साथ युद्ध, शिकार, कामसूत्र और संस्कारों के चित्र भी देखे जा सकते हैं। इन हवेलियों में विशाल चौक,बड़ी बैठकें, तहखाने आदि का भी निर्माण किया गया है।
हवेली की शक्ल में लक्ष्मणगढ़ का मुरली मनोहर मंदिर। 

झंझनूं में टीबडे वालों की हवेली एवं ईसरदास मोदी की सैकड़ों खिड़कियों वाली हवेली भव्य इमारतें हैं। चुरू में भी मालजी का कमरा सुराणों का हवामहल, रामविलास गोयनका की हवेली, मंत्रियों की बड़ी हवेली और कन्हैयालाल बागला की हवेलियां देखी जा सकती हैं।

मांडवा की हवेली को अब रिसॉर्ट बना दिया गया है। जयपुर से 190 किलो मीटर की दूर यह कस्बा राजस्थान के झुंझुनू जिले में आता है। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार इसे शेखावटी का दिल भी कहा जाता है। यह कस्बा शेखावटी के राजपूतों द्वारा 18 वीं सदी में बनवाया गया था। 

शिक्षा का बड़ा केंद्र – शेखावटी के झुंझनू जिले में बिट्स, पिलानी शिक्षा का बहुत पुराना केंद्र है। अब सीकर और चुरू जिले में कई आवासीय स्कूल, तकनीकी संस्थान और विश्वविद्यालय खुल गए हैं। शेखावटी शिक्षा का भी बड़ा केंद्र बनता जा रहा है। सिंघानिया विश्वविद्लाय का परिसर पचेरी बारी में नजर आता है। ये विश्वविद्यालय झुंझनू से नारनौल के रास्ते में पड़ता है। वहीं लक्षमणगढ़ में मोदी विश्वविद्यालय खुल गया है। निजी क्षेत्र में कई नए संस्थान पिछले दो दशक में खुले हैं। क्षेत्र में आवासीय विद्यालयों की भी भरमार है।
 - vidyutp@gmail.com

(SHEKHAWATI, HAWELI, SIKAR, JHUNJHNU, RAJASTHAN ) 


Monday, July 13, 2015

बोतलबंद पानी के नाम पर भारी लूट

सीकर बस स्टैंड पर 5 रुपये में एक लीटर पानी। 
आप सफर में होते हैं तो पीने के पानी के लिए अक्सर बोतलबंद पानी खरीदते हैं। रेलवे में रेल नीर 15 रुपये में तो बाकी जगह पर एक लीटर पानी 20 रुपये में मिलता है। क्या आपने कभी सोचा है कि इस पानी के नाम पर आपकी कितनी जेब काटी जा रही है। एक लीटर प्यूरीफाई किया हुआ पानी महज एक से दो रुपये का पड़ता है। पर हम इसकी एवज में चुकाते हैं कई गुना कीमत।

पांच रुपये में एक लीटर शुद्ध पानी 

हाल के राजस्थान के दौरे में मैंने देखा कि वहां के कई बस स्टैंड में जीरो बी कंपनी ओर से पानी की मशीने लगाई गई हैं। यहां पर एक लीटर शीतल आरओ वाटर पांच रुपये में खरीदा जा सकता है। इसमें बोतल आपको देना होगा। अगर आप बोतल समेत खरीदना चाहते हैं दो 10 रुपये देने होंगे।

आप एक रुपये में गिलास भर पानी और तीन रुपये में आधा लीटर पानी भी खरीद सकते हैं। राजस्थान के झुंझनू, सीकर, चुरू जैसे बस स्टैंड में जीरोबी के स्टाल लगे हैं। जहां से गरीब तबके लोग भी पानी खरीद पाते हैं। इस तरह की व्यवस्था देश भर में लागू होनी चाहिए। देश के हर कोने में लोग पानी खरीदने के नाम पर लूटे जाते हैं। टूरिस्ट प्लेस और पहाड़ों पर तो पानी और भी महंगा बिकता है। अगर जगह जगह इस तरह की वाटर मशीनें लगा दी जाएं तो पानी को लेकर चल रही मुनाफाखोरी पर लगाम लग सकता है।

बारिश के पानी का इस्तेमाल - राजस्थान के चुरू जिले के तीर्थ स्थल सालासर में पीने के पानी की काफी दिक्कत है। यहा की तमाम धर्मशालाओं में वर्षा जल संचय का इंतजाम है। बारिश के पानी को संग्रह करने के बाद सालों भर पीने के काम में लाया जाता है।

जाजोदिया धर्मशाला के संचालक बताते हैं कि पहली बारिश के पानी को नहीं जमा करते हैं। क्योंकि इस पानी में गंदगी रहती है। पहली बारिश से छत साफ हो जाता है। उसके बाद होने वाली बारिश के पानी के संग्रह करके अंडरग्राउंड टैंक में जमा कर लिया जाता है। जल का ये संकट पूरे शेखावटी इलाके में है। इसलिए शेखावटी के लोग पानी की कीमत जानते हैं।


प्लास्टिक की बोतलें हैं बड़ा संकट-  
भारतीय रेलवे की भी योजना देश भर में रेलवे स्टेशनों पर पानी के लिए आरओ मशीनें लगाने की है, जिससे लोग अपने बोतल में मुफ्त में पानी भर सकेंगे। दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन स्टेशन पर इसकी शुरुआत भी हो गई है। रेलवे के सामने एक बड़ा संकट पानी पीने के बाद फेंकी जाने वाली प्लास्टिक की बोतलें है।

ये बोतलें कचरा के तौर पर बड़ा संकट बनती जा रही हैं। अगर पानी लोग वाटर एटीएम से ले लेंगे और अपनी बोतल लेकर आएंगे तो प्लास्टिक के कचरे से भी निपटा जा सकेगा। पर पानी के इस इंतजाम में हमे अभी मीलों का सफर करना है। 
- vidyutp@gmail.com

(SIKAR, JAL KUTIR, PURE WATER, RAJSTHAN ) 

Sunday, July 12, 2015

सालासर बालाजी- यहां स्वयं प्रकट हुए थे हनुमान जी

सालासर के बालाजी भगवान यानी हनुमान जी देश भर के बजरंगबली के भक्तों में काफी लोकप्रिय हैं। कहा जाता है कि यहां स्वयं हनुमान जी प्रकट हुए थे। सालासर बालाजी का मंदिर राजस्थान के चूरु (CHURU) जिले में स्थित है। वर्ष भर में लाखों भारतीय भक्त दर्शन के लिए सालासर धाम जाते हैं। सालासर बालाजी की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मंदिर के आसपास भक्तों के आवास के लिए 180 से ज्यादा धर्मशालाएं, सेवा सदन और होटल बने हैं।

सालासर में बाला जी का मंदिर का परिसर अति विशाल है। मंदिर में बालाजी की प्रतिमा पूर्व मुखी है। मंदिर में प्रवेश के लिए तीन द्वार बने हैं। मुख्य द्वार से प्रवेश के बाद आपको लंबी लाइन में लगकर बाला जी के दर्शन प्राप्त होते हैं। मंदिर में मंगलवार और शनिवार को ज्यादा श्रद्धालु पहुंचते हैं।
कहा जाता है कि यहां स्थापित होने की इच्छा स्वयं बजरंगबली ने प्रकट की थी। तब करीब ढाई सौ साल पहले बालाजी के परम भक्त बाबा मोहनदास ने यहां बालाजी की स्थापना की।

बालाजी की कथा - शक्ति पीठ का इतिहास सन् 1754 ई. में नागौर के असोटा निवासी साखा जाट को घिटोला के खेत में हल जोतते समय एक मूर्ति मिली। रात को स्वप्न में श्री हनुमान ने प्रकट होकर मूर्ति को सालासर पहुंचाने का आदेश दिया। उसी रात सालासर में भक्त मोहनदास जी को भी हनुमान जी ने दर्शन देकर कहा कि असोटा ठाकुर द्वारा भेजी गई काले पत्थर की मूर्ति को धोरे (टीले) पर ठाकुर सालमसिंह की उपस्थिति में स्थापित कर देना। धोरे पर जहां बैल चलते-चलते रुक जाएंवहीं श्री बालाजी की प्रतिमा स्थापित करना। वह बैलगाड़ी (रेड़ा) आज भी सालासर धाम में दक्षिण पोल पर दर्शनार्थ रखी हुई है। 
हर पूर्णिमा के दिन सालासर में मेला लगता है। श्रद्धालुओं की भीड़  बढ़ जाती है। इसके अलावा हर वर्ष चैत्र पूर्णिमा और अश्विन पूर्णिमा पर बड़े मेले लगते हैं जो कई दिनों तक चलते हैं। इन मेलों के समय 6 लाख से ज्यादा लोग सालासर पहुंच जाते हैं। मेला और मंदिर का प्रबंधन हनुमान सेवा समिति देखती है।

खुलने के समय---  मंदिर सुबह 5 बजे प्रातः आरती के साथ खुलता है। शाम को 8 बजे संध्या आरती और रात 11 बजे शयन आरती होती है। दिन भर मंदिर में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते रहते हैं।

मोहनदास की धुनी- मंदिर के आग्नेय क्षेत्र में बाबा मोहनदास की धूनी है। कई साल से यहां अखंड धूनी जल रही है। श्रद्धालु इस अखंड धूनी से राख लेकर जाते हैं। इसके बाद आता है बाबा मोहनदास की समाधि। आमतौर पर श्रद्धालु बाबा मोहनदास के भक्त की समाधि के दर्शन करके ही भक्त बालाजी के दर्शनों के लिए आगे बढ़ते हैं।

मोहन मंदिर - मोहन मंदिर, बालाजी मंदिर के पास स्थित है। यहां मोहनदास जी के पैरों के निशान यहां आज भी मौजूद हैं। इस स्थान को इन दोनों पवित्र भक्तों का समाधि स्थल माना जाता है। पिछले आठ सालों से यहां निरंतर रामायण का पाठ किया जा रहा है। 



अंजनी माता मंदिर   बालाजी मंदिर के दो किलोमीटर पूरब तरफ चलने पर अंजनी माता का मंदिर है। इस मंदिर का श्रंगार अति सुंदर है। अंजनी माता भगवान हनुमान या बालाजी की मां थी। अंजनी माता का मन्दिर सालासर धाम से लक्षमणगढ जाने वाली सड़क पर स्थित है। यह मंदिर ग्राम जुलियासर में पड़ता है।

कैसे पहुंचे -  दिल्ली से जोधपुर जाने वाली ट्रेन से सुजानगढ़ उतरें। यहां से 25 किलोमीटर है सालासर। अगर बीकानेर जाने वाली ट्रेन हो तो रतनगढ़ उतरें। रतनगढ़ से सालासर 55 किलोमीटर है। दिल्ली से सीकर जाने वाली ब्राडगेज लाइन के ट्रेन से जा रहे हैं मुंकुदगढ़ स्टेशन उतरें। यहां से सालासर लक्ष्मणगढ़ होते हुए 61 किलोमीटर दूर है। 
अगर जयपुर से आ रहे हैं तो मीटरगेज लाइन पर लक्ष्मणगढ़ उतरें। यहां से सालासर 30 किलोमीटर है। इन सभी शहरों से बस सेवा उपलब्ध है। दिल्ली से सीधे बस से जा सकते हैं। बस रेवाड़ी, नारनौल, सिंघाना, चिड़ावा, मुकंदगढ़ होते हुए जाती है। चुरु और सीकर और जयपुर शहर से भी सालासर के लिए सीधी बसें मिल जाती हैं। जिला मुख्यालय चुरु से सालासार की दूरी 83 किलोमीटर है।

सालासर में मुरलीधर मानसिंह धर्मशाला
कहां ठहरें –  सालासर में 180 से ज्यादा होटल, धर्मशाला और सेवा सदन हैं। ये सेवा सदन सितारा होटलों की तरह भव्य बने हैं। यहां 500 रुपये में डबलबेड एसी रुम मिल जाता है। मंदिर के पास मुरलीधर मानसिंह धर्मशाला में 100, 200 के अटैच टायलेट वाले कमरे उपलब्ध हैं। यहां 600 रुपये में एसी कमरा है जिसकी एडवांस बुकिंग भी कराई जा सकती है। ( फोन नंबर – 01568-252953 और 01568 252067) सालासर में कई सेवा सदन में भोजनालय भी हैं। जींद सेवा सदन, गंगा नगर बाबा मोहनदास में शाकाहारी भोजनालय हैं। गंगानगर में 50 रुपये में अनलिमिटेड थाली मिलती है। हनुमत धाम में 70 रुपये की थाली है। यहां 24 घंटे भोजन मिलता है।
vidyutp@gmail.com

(SALASAR BALAJEE, CHURU, RAJSTHAN, HANUMAN TEMPLE , SUJANGARH, RATANGARH, MUKUNDGARH )