Wednesday, June 3, 2015

भारत के सात अजूबों में एक है – कोणार्क का सूर्य मंदिर

अपने देश में कुछ गिने चुने ही सूर्य मंदिर हैं। इनमें ओडिशा के कोणार्क स्थित सूर्य मंदिर सबसे भव्य और प्राचीन है। अपनी सुंदरता और वैभव के लिए यह पूरी दुनिया में अनूठी पहचान रखता है।
देश का यह अनूठा सूर्य मंदिर 1984 में ही यूनोस्को के विश्व विरासत स्थलों में सूचीबद्ध हो चुका है। अद्भुत निर्माण के कारण इस सूर्य मंदिर को भारत के सात अजूबों में गिना जाता है। ये मंदिर कलिंग वास्तुकला का अदभुत नमूना है। मंदिर का परिसर 857 फीट लंबा 540 फीट चौड़ा है।

कोणार्क मतलब कोण धन अर्क। कोण माने कोना और अर्क माने सूर्य। इसकी बनावट इस तरह है कि हर कोण पर सूर्य की रोशनी पड़ती है। सूर्य मंदिर कोणार्क चंद्रभागा नदी के तट पर बना है। हालांकि अब चंद्रभागा नदी मंदिर से दूर चली गई है।


सूर्य मंदिर कोणार्क के परिसर में 1991 में परिवार के साथ। 
कोणार्क एक अधूरी कहानी - 13वीं सदी में बने इस मंदिर को ब्लैक पैगोडा भी कहते हैं। इस मंदिर का निर्माण 1250 में गंग वंश के राजा नरसिंह देव प्रथम ने करवाया था। राजा ने मंदिर निर्माण के लिए बिसु महाराणा नामक वास्तुविद की सेवाएं ली। मंदिर का निर्माण 12 साल में 12 हजार शिल्पियों ने मिलकर किया। पर मंदिर पूर्ण नहीं हो सका इससे राजा नाराज थे। हालांकि कहा जाता है कि बिसू महाराणा इस मंदिर का छत्र स्थापित करने में सफल नहीं हो सके थे। यह कार्य उनके बेटे 12 साल के धर्मपाद ने कर दिखाया पर इसके बाद उसकी रहस्यमय मौत हो गई।

पूरा मंदिर एक विशाल रथ के आकार का है। ये रथ सूर्य देव का है। इसमें पत्थरों से बने विशाल पहिए लगे हैं। इन पहियों पर शानदार नक्काशी देखी जा सकती है। रथ रूपि मंदिर में कुल 12 पहिए लगे हैं। इन पहियों का व्यास 3 मीटर का है। रथ के इन पहियों से सही समय का मापन किया जा सकता है। दिन हो या रात घंटा मिनट का अंदाजा लगाया जा सकता है। सूर्य के इस रथ को सात घोड़े खींच रहे हैं। इनमें चार घोड़े एक तरफ हैं तो बाकि तीन दूसरी तरफ।



साल 1837 में मंदिर का मुख्य हिस्सा जो 229 फीट ऊंचा था, ध्वस्त हो गया। इसके ध्वस्त होने को लेकर अलग अलग कथाएं हैं। हालांकि मंदिर का बड़ा हिस्सा आजकल खंडहर बन चुका है। पर दर्शक दीर्घा जिसे जगमोहन हाल कहते हैं वह 30 मीटर लंबा है, अभी भी बेहतर हालात में देखा जा सकता है। नट मंदिर ( नृत्यशाला) और भोग मंडप ( भोजन कक्ष ) भी देखा जा सकता है। सूर्य मंदिर के पास 11वीं सदी में बना मायादेवी का मंदिर स्थित है। इन्हें सूर्य की पत्नी माना जाता है। मंदिर के ध्वस्त हुए हिस्से को कोणार्क पुरातात्विक संग्रहालय में संरक्षित करके रखा गया है। 1894 में मंदिर से जुड़ी 13 कलाकृतियों को इंडियन म्यूजियम कोलकाता में रखा गया है। कोणार्क के सूर्य मंदिर के बारे में रविंद्रनाथ टैगोर लिखते हैं कि पत्थरों की भाषा इंसान की भाषा पर काफी भारी पड़ती है।

कहा जाता है कि वर्तमान सूर्य मंदिर से पहले भी यहां सूर्य मंदिर का अस्तित्व था। ओडिया लोग सूर्यको बिरंचि नारायण कहते हैं। सांब पुराण की कथा के मुताबिक कृष्ण के पुत्र सांब को कुष्ठ रोग हो गया था। उन्होंने ऋषि की सलाह पर 12 साल तक चंद्रभागा नदी के तट पर मित्रवन में सूर्य की तपस्या की और उनका कुष्ठ रोग दूर हो गया। तब सांब ने यहां सूर्य मंदिर का निर्माण कराया। पुराणों के मुताबिक तब तीन सूर्य मंदिर थे। पहला कोणार्क में, दूसरा मुल्तान में और तीसरा मथुरा में।

कैसे पहुंचे - कोणार्क आप ओडिशा के जगन्नाथ पुरी से पहुंच सकते हैं या फिर राजधानी भुवनेश्वर से। कोणार्क अपेक्षाकृत ये पूरी से निकट है। पुरी से 35 किलोमीटर और भुवनेश्वर से 65 किलोमीटर की दूरी पर है कोणार्क। ये मंदिर सुबह 6 बजे से शाम 8 बजे तक खुला रहता है। भारत के और सार्क देशों के लोगो के लिए प्रवेश शुल्क 10 रुपये है जबकि विदेशी नागरिकों के लिए 250 रुपये। पुरी से चलने वाली पर्यटक बसें कोणार्क का दौरा कराती हैं।

vidyutp@gmail.com   -   यहां भी देखें – www.konark.nic.in
( WORLD HERITAGE SITE listed in  1984 ) 




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