Tuesday, April 14, 2015

ऐलोरा का अदभुत कैलाश मंदिर – सृजन का चरमोत्कर्ष

कैलाश मंदिर के प्रवेश द्वार पर हाथी। 
एलोरा की 34 गुफाओं में सबसे अदभुत है कैलाश मंदिर गुफा। एलोरा का विशाल कैलाश मंदिर (गुफा 16) के निर्माण का श्रेय राष्ट्रकूट शासक कृष्‍णा- प्रथम (लगभग 757-783 ई ) को जाता है। वह दंतिदुर्ग का उत्‍तराधिकारी एवं चाचा था। हालांकि माना जाता है कि इसका निर्माण कई पीढ़ियों में हुआ है। पर  इसका काम कृष्णा प्रथम के शासनकाल में पूरा हुआ। कैलाश मंदिर में अति विशाल शिवलिंग देखा जा सकता है। मंदिर में एक विशाल हाथी की प्रतिमा भी है जो अब खंडित हो चुकी है। ऐलोरा की ज्यादातर गुफाओ में प्राकृतिक प्रकाश पहुंचता है। लेकिन कुछ गुफाओं को देखने के लिए बैटरी वाले टार्च की जरूरत होती है। यहां पुरातत्व विभाग के कर्मचारी आपकी मदद के लिए मौजूद होते हैं। अजन्‍ता से अलग एलोरा गुफाओं की विशेषता यह है कि अलग अलग ऐतिहासिक कालखंड में व्‍यापार मार्ग के अत्‍यन्‍त निकट होने के कारण इनकी कभी भी उपेक्षा नहीं हुई। इन गुफाओं को देखने के लिए उत्‍साही यात्रियों के साथ-साथ राजसी व्‍यक्ति नियमित रूप से आते रहे।
एलोरा की कैलाश मंदिर गुफा की छत से तस्वीर। 

एलोरा की 16 नंबर गुफा सबसे बड़ी है, जो कैलाश के स्‍वामी भगवान शिव को समर्पित है। इसमें सबसे ज़्यादा खुदाई काम किया गया है। बाहर से मूर्ति की तरह समूचे पर्वत को ही तराश कर इसे द्रविड़ शैली के मंदिर का रूप दिया गया है। मंदिर केवल एक चट्टान को काटकर बनाया गया है। इसकी नक्काशी अत्यंत विशाल और भव्‍य है। विशाल गोपुरम से प्रवेश करते ही सामने खुले मंडप में नंदी की प्रतिमा नजर आती है तो उसके दोनों ओर विशालकाय हाथी और स्तंभ बने हैं।

 एलोरा के वास्तुकारों ने कैलाश मंदिर को हिमालय के कैलाश का रूप देने की कोशिश की है। कैलाश के भैरव की मूर्ति भयकारक दिखाई देती हैपार्वती की मूर्ति स्नेहिल नजर आती है। शिव तो यहां ऐसे वेग में तांडव करते नजर आते हैं जैसा कहीं और दिखाई नहीं देता।

एलोरा- कैलाश मंदिर के भित्ति चित्र में नृत्यरत शिव। 
 शिव-पार्वती का परिणय भावी चित्रित करने में कलाकारों ने मानो अपनी कल्पनाशीलता का चरमोत्कर्ष देने की कोशिश की है। शिव पार्वती का विवाह, विष्णु का नरसिंहाअवतार, रावण द्वारा कैलाश पर्वत उठाया जाना आदि चित्र यहां दीवारों में उकेरे गए हैं। वास्तव में यह देश के ही सात अजूबों में नहीं बल्कि दुनिया के सात अजूबों में शामिल होने लायक है। उस दौर में जब जेसीबी मशीनें नहीं थी। पत्थरों को काटने के लिए डायनामाइट नहीं थे ये काम कैसे संभव हुआ होगा सोच कर अचरज होता है। कई बार ऐसा लगता है कि ये इन्सान के वश की बात नहीं।

मंदिर में पूजा नहीं - कैलाश मंदिर का प्रवेश द्वार पश्चिम की ओर है। हालांकि देश भर में शिव मंदिरों का प्रवेश द्वार आम तौर पर पश्चिम की ओर नहीं होता। इस मंदिर में कभी पूजा किए जाने का प्रमाण नहीं मिलता।  आज भी इस मंदिर में कोई पुजारी नहीं है। कोई नियमित पूजा पाठ का कोई सिलसिला नहीं चलता।
कैलाश मंदिर, एलोरा 
40 हजार टन भार के पत्थारों को चट्टान से हटाया गया कैलाश मंदिर के निर्माण में

90 फीट है इस अनूठे मंदिर की ऊंचाई, दरवाजा है पश्चिम की तरफ। 

276 फीट लम्बा , 154  फीट चौड़ा है यह गुफा मंदिर

200 साल लगे इस मंदिर के निर्माण में, दस पीढ़ियां लगीं

7000 शिल्पियों ने लगातार काम करके तैयार किया है ये मंदिर

हिंदू, बौद्ध और जैन विरासत का संगम है एलोरा
अगर आप देश का इतिहास, विरासत, संस्कृति से साक्षात्कार करना चाहते हों तो ऐलोरा से अच्छी कोई जगह नहीं हो सकती। यहां एक साथ हिंदू, बौद्ध और जैन संस्कृति की समृद्ध परंपरा का दीदार किया जा सकता है। ये गुफाएं अदभुत और अकल्पनीय हैं।  औरंगाबाद शहर से 30 किलोमीटर आगे मनमाड मार्ग पर वेरुल गांव में स्थित हैं ऐलोरा की गुफाएं। ये गुफाएं 7वीं से नौवीं सदी के बीच बनी हैं।  एलोरा में कुल 100 के करीब गुफाएं हैं, जिनमें से 34 गुफाएं ही सुप्रसिद्ध हैं। इन गुफाओं में से 1 से 12 गुफाएं बौद्ध धर्म से संबंधित है, 13 से 19 गुफाएं ब्राह्मण धर्म से जुड़ी हैं। वहीं 30 से 34 गुफाएं जैन धर्म से संबंधित हैं।


पहला यात्री अल मसूदी - दसवीं सदी ईसवी के अरब भूगोलवेत्‍ता, अल-मसूदी को ऐलोरा का सर्वप्रथम आगन्‍तुक माना जाता है। 19वीं सदी के दौरान इन गुफाओं पर इन्‍दौर के होल्‍करों का नियंत्रण हो गया था जिन्‍होंने पूजा के अधिकार के लिए इनकी नीलामी की तथा धार्मिक और प्रवेश शुल्‍क के लिए इन्‍हें पट्टे पर दे दिया। होल्‍करों के बाद, इनका नियंत्रण हैदराबाद के निजाम को अंतरित कर दिया गया जिसने भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण के मार्गदर्शन में अपने विभाग के माध्यम से गुफाओं की व्‍यापक मरम्‍मत एवं रखरखाव करवाया। 

एलोरा को कैसे देखें – यदि आपके के पास तीन से चार घण्‍टे हैं तो गुफा संख्‍या 10 (विश्वकर्मा गुफा) 16 (कैलाश), 21 (रामेश्‍वर) एवं 32 तथा 34 (जैन धर्म गुफा समूह) को अवश्य देखें। इन गुफाओं का भ्रमण कर कोई भी व्‍यक्‍ति बौद्ध धर्म, ब्राह्मण धर्म एवं जैन धर्म की झलक पा सकता है। यदि सारा दिन समय है तो बौद्ध धर्म की गुफा संख्‍या 2, 5, 10, एवं 12, ब्राह्मणी समूह गुफा संख्या 14, 15, 16, 21 एवं 29 तथा जैन धर्म गुफा संख्‍या 32 से 34 को देखें।

जैन गुफाओं की दूरी मुख्य गुफा के प्रवेश द्वार से एक किलोमीटर आगे है। यदि आप औरंगाबाद से गाड़ी आरक्षित करके आए हैं तो गाड़ी वाला आपको वहां तक ले जाएगा। अन्यथा आपको पैदल या स्थानीय वाहन से जाना होगा।


प्रवेश शुल्क : भारतीय नागरिक और सार्क देशों के लोग 10/-रुपए  प्रति व्यक्ति। अन्य देश के लिए - 250/- रुपए प्रति व्यक्ति , 15 साल तक के बच्चे  - नि:शुल्क। कार पार्किग – 20 रुपये। याद रखें हर मंगलवार को एलोरा की गुफाएं बंद रहती हैं।

बारिश में शबाब पर होता है एलोरा का सौंदर्य - वैसे तो ऐलोरा की गुफाएं सालों भर देखी जा सकती हैं। पर अगर आप यहां बारिश के दिनों में पहुंचे तो अदभुत हरितिमा के बीच एलोरा का सौंदर्य कई गुना बढ़ जाता है। पास में बहने वाली एलगंगा नदी मानसून के मौसम में अपने पूरे यौवन पर होती है। जब महिषमती के निकट की प्रतिकूल धारा में बैराज के ऊपर से बहने वाला पानी धमाके से गिरने वाले जलप्रताप के रूप में गुफा नंबर 29 के निकट सीता की नहानीपर पहुंच जाता है तब का नजारा देखने लायक होता है।
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एलोरा की जैन गुफाओं के बाहर।
( ELORA, KAILASH TEMPLE, RASHTRAKUT KINGS, VERUIL LENI, WORLD HERITAGE SITE)  




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