Monday, April 20, 2015

दर्शन से नष्ट होते हैं पाप- घूश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग ( 12)

महाराष्ट्र में औरंगाबाद के समीप ही प्रसिद्ध घृष्णेश्वर मंदिर है जो 12 ज्योतिर्लिगों में से एक है। शिव के ज्योर्तिलिंगों की सूची में ये 12वां और आखिरी है। यहां आकर एक विशेष प्रकार के शांत वातावरण का एहसास होता है। यह मंदिर दक्षिण भारत के तंजावुर के वृहदीश्वर मंदिर का लघु रूप सा दिखाई देता है। कला शिल्प की दृष्टि से ये अति सुंदर मंदिर है। इस मंदिर का जीर्णोद्धार सर्वप्रथम सोलहवीं शताब्दी में वेरुल के ही मालोजी राजे भोंसले (छत्रपति शिवाजी महाराज के दादा) के द्वारा कराया गया। फिर अट्ठारवीं शती में यह मंदिर इंदौर की महारानी देवी अहिल्याबाई होलकर द्वारा भव्य रूप प्रदान किया गया। पूरा मंदिर पाषाण का बना हुआ है। दीवारों पर सुंदर नक्कासी देखने को मिलती है।

कुछ लोग इसे घुश्मेश्वर के नाम से भी पुकारते हैं। बौद्ध भिक्षुओं द्वारा निर्मित एलोरा की प्रसिद्ध गुफाओं के प्रवेश द्वार से मंदिर की दूरी महज आधा किलोमीटर है। शहर से दूर स्थित यह मंदिर सादगी से परिपूर्ण है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में यह 12वां और अंतिम ज्योतिर्लिंग है। इसे घुश्मेश्वर, घुसृणेश्वर या घृष्णेश्वर भी कहा जाता है। यहां सोमवार को भारी भीड़ होती है।

 शिव महापुराण में घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग का वर्णन है। ज्योतिर्लिंग 'घुश्मेश' के समीप ही एक सरोवर भी है. जिसे शिवालय के नाम से जाना जाता है. कहा जाता है कि जो भी इस सरोवर का दर्शन करता है उसकी सभी इच्छाओं की पूर्ति होती है। मंदिर में दूध से शिवलिंग का अभिषेक किया जाता है।

ईदृशं चैव लिंग च दृष्ट्वा पापै: प्रमुच्यते।
सुखं संवर्धते पुंसां शुक्लपक्षे यथा शशी।।
अर्थात् घुश्मेश्वर महादेव के दर्शन करने से सभी प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं । मंदिर में प्रवेश के लिए तीन द्वार हैं। मंदिर का गर्भ गृह जहां शिवलिंग स्थित है वह सभा मंडप की तुलना में गहराई में है। गर्भगृह में जाने वाले पुरुषों को कमर के ऊपर का वस्त्र उतारना पड़ता है।

मोबाइल कैमरा प्रतिबंधित - मंदिर परिसर के अंदर फोटोग्राफी प्रतिबंधित है। मोबाइल फोन लेकर भी नहीं जा सकते। प्रवेश द्वारा पर मोबाइल फोन और कैमरा जमा करने का काउंटर बना हुआ है। इसके लिए मामूली किराया वसूला जाता है।

कैसे पहुंचे – औरंगाबाद शहर से वेरुल गांव की दूरी 29 किलोमीटर है। इसी वेरूल गांव में मुख्य सड़क पर ही मंदिर स्थित है। यह औरंगाबाद से मनमाड-पुणे जाने वाला मुख्यमार्ग है। इस मार्ग पर राज्य परिवहन की बसें हमेशा चलती रहती हैं। अगर आप ऐलोरा घूमने जा रहे हैं तो पहले ज्योतिर्लिंग के दर्शन करके एलोरा की गुफाएं देखने जा सकते हैं।

कथा - देवगिरि पर्वत के पास सुधर्मा नामक ब्राह्मण पत्नी सुदेहा के साथ रहता था। लेकिन उन्हें कोई संतान नहीं थी। ज्योतिषि ने बताया कि सुदेहा को संतान नहीं हो सकती। सुदेहा ने सुधर्मा को दूसरा विवाह अपनी छोटी बहन से करने को कहा। पत्नी की जिद के आगे उन्हें झुकना ही पड़ा। वह पत्नी की छोटी बहन घुश्मा से विवाह कर ले आए। घुश्मा भगवान शंकर की भक्त भी थी। रोज एक सौ एक पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजन करती थी। भगवान आशुतोष की कृपा से उसे एक सुंदर व स्वस्थ पुत्र हुआ। पर ईष्या वश सुदेहा ने पुत्र को मार डाला मगर परम शिवभक्त सती धुश्मा के आराध्य शिव ने उसे पुनर्जीवित कर दिया और स्वयं घुश्मेश्वर महादेव ज्योतिर्लिंग के नाम से विख्यात हुए।
शिव के बारहवें ज्योतिर्लिंग घुश्मेश्वर में 


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