Wednesday, April 8, 2015

जल योजना का अनूठा नमूना है 400 साल पुरानी पनचक्की

महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर में  एक बड़ा आकर्षण है पनचक्की। पन चक्की यानी पानी से चलने वाली चक्की। इस चक्की से कभी आटा पिसा जाता था। इस आटे से सूफी संत के दरबार में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए रोटियां बनती थीं। अब भी इस पनचक्की को देखने पर्यटक बड़ी संख्या में आते है।
ये पन चक्की जल संरक्षण का अनूठा उदाहरण है। इसे देखकर साइफन पद्धति का प्रयोग पता चलता है। पनचक्की से 8 किलोमीटर की दूरी पर जटवाड़ा की पहाड़ी है। इस पहाड़ी को खोदने पर 30 फीट के झरने का पता चला। इस पानी को इकट्टा करके नहर द्वारा पनचक्की वाले स्थान तक लाया गया। इस पानी को भूमिगत नहर द्वारा 8 किलोमीटर तक लाया गया है। यहां पर मिट्टी के विशाल पाइप से पानी को 20 फीट ऊंचाई पर उठाया गया है। यहां पर पानी झरने के रूप में हौज में गिरता हुआ आज भी दिखाई देता है।

इसे सूफी संत बाबा शाह मुसाफिर ने 1624 में बनवाना शुरू किया था। हजरत बाबा शाह मुसाफिर रूस से शहर राज्बदान ( बुखारा) से यहां पर आए थे। शाह मुसाफिर ने इस जगह को अपना तकिया ( ठिकाना) बनाया। ये पनचक्की उन्ही के खास प्रयास से बनवाई गई। ये ऐतिहासिक पनचक्की 1644 ई में बनकर तैयार हुई। यह चक्की आज भी पानी की सप्लाई सही होने पर चलती है। चक्की के ऊपर वाले कमरे में एक मिट्टी का चाक है जो चलता हुआ दिखाई देता है। इस चाक पर गेहूं से आटा पिसा जाता था। इस चक्की से पीसे जाने वाले आटे से तकिया पर आने वाले यतीमो के लिए रोटियां बनाई जाती थी। पनचक्की के बगल में बने पानी के हौज के बगल में एक विशाल बरगद का पेड़ है। इस पेड़ के साथ लिखा है कि 600 साल पुराना है। छोटे से सरोवर के पास ये पेड़ जहां राहियों को छाया प्रदान करता है वहीं ये सरोवर के सौंदर्य को और बढ़ा देता है। जल संरक्षण और प्रबंधन का इतना सुंदर नमूना बहुत कम जगह ही देखने को मिलता है।
 उत्तराखंड के पहाड़ों पर भी कई जगह पनचक्कियां चलाई जाती हैं। पर मैदानी इलाके में इस तरह का नमूना दुर्लभ है। पनचक्की में आया ज्यादा पानी आगे खाम नदी में चला जाता है। यह अपने समय के इंजीनियरिंग का अदभुत नमूना है।
औरंगाबाद शहर के महमूद गेट के पास स्थित बाबा शाह मुसाफिर के इस स्थान पर अंदर एक मसजिद है। यहां पर बाबा शाह मुसाफिर की कब्र है। साथ ही सूफी संत द्वारा इस्तेमाल की गई कई वस्तुएं भी देखी जा सकती हैं। इसी परिसर में सुनहरी महल, जामा मसजिद, औरंगजेब के समय के बगीचे भी हैं। पनचक्की के परिसर में महाराष्ट्र के वक्त बोर्ड का दफ्तर भी है।

यहां पर मेरी मुलाकात एक इस्लाम धर्म के प्रचारक से होती है जो मुझे इस्लाम पर हिंदी में एक पुस्तक उपहार में देते हैं। ये सज्जन हिंदी अंग्रेजी और संस्कृत के अच्छे जानकार थे। वे वेदों के कुछ श्लोंको और कुरान की आयतों में साम्यता का उदाहरण पेश करते हैं।
 vidyutp@gmail.com

( WATER, PANCHAKKI, AURANGABAD, MAHARASTRA ) 



1 comment:

  1. आपका ब्लॉग शामिल कर लिया गया है.
    शुभकामनाओं सहित,
    http://samvadjunction.blogspot.in/

    ReplyDelete