Saturday, April 4, 2015

गुरुद्वारा नगीना घाट – जहां बंजारे को गुरुजी ने दिया ज्ञान


GURUDWARA NAGINA GHAT
कहा जाता है कि नांदेड़ में  गोदावरी नदी के तट पर दशमेश पिता के दर्शन के लिए एक बंजारा सिख आया। उसने गुरु जी एक बेशकीमती नगीना भेंट किया। गुरु जी ने उसे गोदावरी में फेंक दिया। इससे बंजारा ने नाराजगी जताई। तब गुरु जी ने कहा नदी से अपना नगीना पहचान कर निकाल ला। जब बंजारा नदी में गया तो उसे एक नहीं उसके दिए जैसे कई नगीने दिखाई दिए। इस घटना से उसका अहंकार दूर हो गया। उसने गुरु जी के तेज को पहचाना और वह आकर गुरु के चरणों में गिर पड़ा। इसी स्थान पर बना है गुरुद्वारा नगीना घाट। कहा जाता है इसी स्थान से तीर चलाकर गुरू जी ने सतयुगी तप स्थल सचखंड साहिब को प्रकट किया।

गुरुद्वारा बंदा घाट जहां बंदा बहादुर को दिया संदेश 

नगीना घाट से थोड़ी दूर पर बंदा घाट पर गुरुद्वारा बंदा बहादुर स्थित है। इसी स्थान पर गुरु गोबिंद सिंह जी ने बंदा बहादुर को संदेश दिया था। बंदा बहादुर का नाम सिख इतिहास में सम्मान से लिया जाता है। उन्होंने निम्न वर्ग के लोगों की उच्च पद दिलाया और हल वाहक किसान-मजदूरों को जमीन का मालिक बनाया। बन्दा सिंह बहादुर का जन्म  कश्मीर के राजौरी क्षेत्र में 1670 हुआ था। उसका वास्तविक नाम लक्ष्मणदेव था। 15 वर्ष की उम्र में वह एक बैरागी का शिष्य हो गया और उसका नाम माधोदास पड़ा। वे कुछ समय तक नासिक के पंचवटी में रहे। वहां एक औघड़नाथ से योग की शिक्षा प्राप्त कर नान्देड चले आए। यहां गोदावरी नदी के तट पर आश्रम की स्थापना की।  गुरु गोबिंद सिंह ने उन्हें सिक्ख बनाकर बन्दासिंह नाम दिया। 1710 में बंदा बहादुर ने सरहिंद को जीत लिया और सतुलज नगी के दक्षिण में सिख राज्य की स्थापना की। 

GURUDWARA LANGAR SAHIB
गुरुद्वारा लंगर साहिब – सचखंड साहिब के बाद दूसरा बड़ा गुरुद्वारा है जो श्रद्धालुओं के गुलजार रहता है। गुरुद्वारा लंगर साहिब वही जगह है जहां पर गुरुगोबिंद सिंह की फौज ने डेरा डाला था। यहां पर फौज का लंगर तैयार किया जाता था। सिख पंथ में लंगर की अनूठी परंपरा है जहां अमीर गरीब ऊंच नीच का भेदभाव भुलाकर लोग साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करते हैं।

 लंगर साहिब में भी श्रद्धालुओं के लिए विशाल आवास बनाया गया है। इस गुरुद्वारा तक पहुंचने के लिए रेलवे स्टेशन से बस सेवा भी चलती है। लंगर साहिब के बाहर टैक्सी वाले दिखाई देते हैं जो आपको कर्नाटक के बीदर स्थित ऐतिहासिक गुरुद्वारा और आसपास के दूसरे ऐतिहासिक गुरुद्वारों तक ले जाने के लिए पैकेज देते  हैं।


नांदेड़ को अलविदा कहने का वक्त आ गया -  
अब नांदेड़ से हमारी आगे जाने का वक्त हो गया था। गुरुग्रंथ साहिब भवन के सामने एक दुकान पर सुबह के नास्ते में गरमागरम पराठे दही के साथ खाए। नांदेड़ की सड़कों पर घूमते हुए यूं लगता है मानो पंजाब में ही हों। वहां से पदयात्रा करते हुए हमलोग रेलवे स्टेशन पहुंच गए। रास्ते में फूलों की मंडी नजर आई। ताजे गेंदे के फूल बिकने को तैयार थे।
पर स्टेशन पर मुंबई की ओर जाने वाली 17618- तपोवन एक्सप्रेस हमारा इंतजार कर रही थी। इसमें हमारा सिटिंग आरक्षण था।तकरीबन चार घंटे का सफर रहा औरंगाबाद का। पर इस इस दौरान भीषण गरमी ने खूब सताया।   


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