Friday, April 3, 2015

अदभुत, अनूठा - गोबिंद बाग का लेजर शो

एक घंटे में पूरे सिख इतिहास की कहानी। दस गुरुओं की कहानी। बलिदान की कहानी। ये सब कुछ देखा जा सकता है नांदेड़ के गोबिंदबाग में होने वाले लेजर और डांसिंग म्यूजिकल फाउंटेन शो में। ऐसा शानदार और सुंदर शो देश में और कहीं भी नहीं होता। हर रोज रात्रि आठ बजे ये शो शुरू होता है। नांदेड़ आने वाले श्रद्धालु इस शो को जरूर देखते हैं। गोबिंदबाग जाने के लिए सचखंड साहिब गुरुद्वार के गेट नंबर पांच से बाहर निकला जा सकता है। इस शो के लिए कोई टिकट नहीं है। हर रोज हजारों लोग इस शो को देखकर धन्य होते हैं।  
साल 2011 में शुरू हुआ ये शो प्रसिद्ध गजल गायक जगजीत सिंह का आखिरी बड़ा प्रोजेक्ट था। उन्होंने पूरे शो में पंजाबी कमेंटरी की है। इस शो की मूल पटकथा पंजाबी के जाने माने शायर सुरजीत पातर की है। शो में हिंदी कमेंटरी जाने माने फिल्मकार गुलजार ने की है। सुरजीत पातर बताते हैं कि जगजीत सिंह इस प्रोजेक्ट में गहरी रूचि ले रहे थे।
  


आज्ञा भई अकाल की, तबै चलायौ पंथ।
सब सिखन को हुक्म हैगुरु मान्यो ग्रन्थ।

इन पंक्तियों के साथ शुरू होने वाला शो अगले 55 मिनट में सिख पंथ का सार तत्व श्रद्धालुओं के परोस देता है। आसमान में ऊंचे उठते रंग बिरंगे फव्वारे, रोशनी और आवाज का ऐसा संगम कहीं और नहीं देखा जा सकता है।
इस शो में दसों गुरुओं, सिखों के पांच तख्त, गुरु ग्रंथ साहिब के बारे में जानकारी बड़े ही सहज ढंग से पेश की गई हैं। दशम पातशाह श्री गुरू गोबिन्द सिंह साहिब जी ने श्री आनन्दपुर साहिब जी छोड़ने के पश्चात् तलवंडी साबो में रैन-बसेरा बनाया तथा वहां श्री आदि ग्रंथ साहिब जी की सारी बाणी को लिखित रूप प्रदान किया। 


दस गुरुओं की कहानी 

1 गुरुनानक देव जी - सिख पंथ के प्रवर्तक गुरुनानक देव का जन्म 15 अप्रैल, 1469 में 'तलवंडी' नामक स्थान पर हुआ था। नानक जी के जन्म के बाद तलवंडी का नाम ननकाना पड़ा। जगह पाकिस्तान में है। उन्होंने करतापुर नामक एक नगर बसाया, जो अब पाकिस्तान में है। इसी स्थान पर सन् 1539 को गुरु नानक जी का देहांत हुआ था।
गुरु नानक की पहली 'उदासी' (विचरण यात्रा) 1507 ई. में 1515 ई. तक रही। इस यात्रा में उन्होंने हरिद्वार, अयोध्या, प्रयाग, काशी, गया, पटना, असम, जगन्नाथपुरी, रामेश्वर, सोमनाथ, द्वारका, नर्मदा तट, बीकानेर, पुष्कर तीर्थ, दिल्ली, पानीपत, कुरुक्षेत्र, मुल्तान, लाहौर आदि स्थानों में भ्रमण किया।

2 गुरु अंगद देव जी- गुरु अंगद देव सिखों के दूसरे गुरु थे। गुरु नानक देव ने अपने दोनों पुत्रों को छोड़कर उन्हें अपना उत्तराधिकारी बनाया था। उनका जन्म फिरोजपुर, पंजाब में 31 मार्च, 1504 को हुआ था। अंगद देव जी पंजाबी लिपि गुरुमुखीके जन्मदाता हैं।

3 गुरु अमर दास जी -  गुरु अमर दास सिख धर्म के तीसरे गुरु हुए। उन्होंने जाति प्रथा, ऊंच-नीच, कन्या-हत्या, सती प्रथा जैसी कुरीतियों को समाप्त करने में अहम योगदान किया। उनका जन्म 23 मई, 1479 को अमृतसर के एक गांव में हुआ।

4 गुरु रामदास जी – गुरु रामदास सिख धर्म के चौथे गुरु थे। वे 1574 से 1581 तक गुरु पद पर रहे। ये सिखों के तीसरे गुरु अमरदास के दामाद थे। इनका जन्म लाहौर में हुआ था। गुरु रामदास ने 1577 ई. में 'अमृत सरोवर' नामक एक नगर की स्थापना की थी, जो आगे चलकर अमृतसर के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
सचखंड साहिब गुरुद्वारे के प्रवेश द्वार पर सुबह से ही श्रद्धालुओं के दर्शन देने के लिए विराजमान होता हैं गुरु गोबिंद सिंह जी के प्यारे घोड़े दिलबाग के वंशज। लोग इस घोड़े के सामने खड़े होकर मुरादें मांगते हैं। 

5 गुरु अर्जुन देव जी- पांचवें गुरु अर्जुन देव जी 1581 ई. में गद्दी पर बैठे। सिख गुरुओं ने अपना बलिदान देकर मानवता की रक्षा करने की जो परंपरा स्थापित की, उनमें सिखों के पांचवें गुरु अर्जुन देव का बलिदान महान माना जाता है। उन्होंने 'अमृत सरोवर' का निर्माण कराकर उसमें 'हरमंदिर साहब' (स्वर्ण मंदिर) का निर्माण कराया।
6 गुरु हरगोबिन्द सिंह जी- छठे गुरु हरगोबिन्द सिंह गुरु अर्जन देव के पुत्र थे। गुरु हरगोबिन्द सिंह ने ही सिखों को अस्त्र-शस्त्र का प्रशिक्षण लेने के लिए ( मिरी-पीरी का सिद्धांत) प्रेरित किया। वे स्वयं एक क्रांतिकारी योद्धा थे।

7 गुरु हरराय जी - गुरु हरराय सिखों के सातवें गुरु थे। उनका जन्म 16 जनवरी, 1630 ई. में पंजाब में हुआ था। गुरु हरराय जी सिख धर्म के छठे गुरु के पुत्र बाबा गुरदिता जी के छोटे बेटे थे। वे प्रकृति प्रेमी थे।
8 गुरु हरकिशन साहिब जी - गुरु हरकिशन साहिब सिखों के आठवें गुरु हुए। गुरु हरकिशन जब दिल्ली पहुंचे, तो वहां हैजे की महामारी फैली हुई थी। उन्होंने सेवा कर सैकड़ो लोगों को स्वास्थ्य लाभ कराया। उनकी स्मृतियां दिल्ली के गुरुद्वारा बंग्ला साहिब में है।
नांदेड - गुुरुद्वारा गोबिंद बाग। 
9 गुरु तेग बहादुर सिंह जी – नौवें गुरु तेग बहादुर सिंह का जन्म 18 अप्रैल, 1621 को अमृतसर में हुआ था। गुरु तेग बहादर सिंह ने धर्म की रक्षा और धार्मिक स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया और सही अर्थों में 'हिन्द की चादर' कहलाए। औरंगजेब ने दिल्ली के चांदनी चौक पर गुरु तेग बहादुर जी का शीश काटने का हुक्म जारी कर दिया और गुरु जी ने 24 नवंवर, 1675 को धर्म की रक्षा के लिए बलिदान दे दिया।
10 गुरु गोबिन्द सिंह जी – 22 दिसंबर 1666 को पटना में जन्में गुरु गोबिन्द सिंह सिखों के दसवें और अंतिम गुरु थे। वह नौवें गुरु तेग बहादुर जी के पुत्र थे। उनको 9 वर्ष की उम्र में गुरुगद्दी मिली थी। गुरु गोबिन्द सिंह ने धर्म, संस्कृति व राष्ट्र की आन-बान और शान के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। 07 अक्तूबर 1708 को नांदेड़ में उन्होंने आखिरी सांस ली।

No comments:

Post a Comment