Thursday, April 30, 2015

माथेरन में हर सैलानी को देना पड़ता है प्रवेश शुल्क

पहले टैक्स दें फिर आगे जाएं ...
माथेरन देश में एक ऐसा पहाड़ी शहर है जहां हर आने वाले सैलानी को प्रवेश शुल्क देना पड़ता है। आजकल हर बाहरी वयस्क के लिए 50 रुपये और बच्चों के लिए 25 रुपये लिए जाते हैं। ये कर माथेरन गिरिस्थान नगर परिषद वसूलती है। इसके वसूली काउंटर रेलवे स्टेशन और अमन लाज के पास टैक्सी स्टैंड में बने हुए हैं। टैक्स देने के बाद आप अगले कुछ दिन यहां निवास करने के अधिकारी बन जाते हैं। इस कर की राशि को शहर के ररखाव में खर्च किया जाता है। 

महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में स्थित माथेरन 800 मीटर से ज्यादा की ऊंचाई पर है। शहर की आबादी महज 7000 है। इसमें बड़ी संख्या में मुस्लिम लोग हैं। कई पारसियों की कोठियां भी माथेरन में है जो विरान पड़ी रहती हैं। कभी माथेरन मुंबई के अमीर पारसी लोगों का पसंदीदा हिल स्टेशन हुआ करता था। आजकल हर मुंबई वासी यहां सुकुन के कुछ दिन बीताने के लिए आना चाहता है। इसलिए शनिवार और रविवार को यहां खासी भीड़ हो जाती है। तो कभी माथेरन में प्रवेश का कर दो रुपये था जो बढ़ते हुए 50 रुपये हो गया। वैसे महाराष्ट्र के एक और हिल स्टेशन महाबलेश्वर में भी 20 रुपये का प्रवेश कर लगता है।


हमारा ठिकाना हुंजर हाउस - माथेरन में हमारा ठिकाना पहले से ही तय था। स्टेजिला डाट काम से हमने ऑनलाइन बुकिंग करा रखी थी। रेलवे स्टेशन के बगल में ही है हुंजर हाउस। रंगोली होटल के ठीक सामने। यह माथेरन का एक किफायती होटल है। यहां बाकी ज्यादातर होटल महंगे हैं। रेल से उतर कर हमलोग लोगों से रास्ता पूछकर टहलते हुए होटल पहुंचे तो होटल के प्रोपराइटर हमारा इंतजार कर रहे थे। यहां कई होटलों में खाना नास्ता के पैकेज के साथ बुकिंग होती है। पर हमारा हुंजर हाउस किफायती होने के बावजूद बेहतर है। इस होटल के कमरे से खिलौना ट्रेन हमेशा आती जाती दिखाई देती है। होटल के लान में दो झूले भी लगे हैं। यहां अनादि देर तक झूले पर झूलते रहे। होटल में कैंटीन नहीं है पर आप आसपास में निकट के रेस्टोरेंट में खाने के लिए जा सकते हैं। पहले दिन शाम ढल चुकी है इसलिए हमलोग एक रेस्टोरेंट में जाकर खाने के बाद सो गए। 


माथेरन में क्या देखें - छोटे से हिल स्टेशन माथेरन में घूमने लिए कई प्वाइंट हैं। माथेरन बाजार में राम मंदिर और माधवजी पार्क है। इसके अलावा एलेक्जेंडर प्वाइंट, खंडाला प्वाइंट, पिसरनाथ मंदिर, शॉरलेट लेक, लार्ड प्वाइंट, इको प्वाइंट, सनसेट प्वाइंट जा सकते हैं।
अगले दिन की सुबह से ही हमने माथेरन में घूमना शुरू कर दिया। माधव जी पार्क में हमें  फोटोग्राफर मुकीम शेख मिले जिन्होने अपने निकॉन कैमरे से हमारी तस्वीरें उतारी। ( फोन – 9423806509) मुकीम लखनऊ के हैं पर माथेरन को अपना ठिकाना बना लिया है। इस पार्क में ढेर से झूले हैं सो अनादि तो यहीं जमे रहना चाहते थे। पर हमलोग आगे चले। खंडाला प्वाइंट 

एलेक्जेंडर होटल के पास एलेक्जेंडर प्वाइंट। जंगलों के बीच से पदयात्रा करते हुए हमलोग पहुंच गए प्राचीन पिसरनाथ मंदिर। शिव का सुंदर सा मंदिर है झील के किनारे। रास्ते में बंदर बहुत हैं सो उनसे बचने के लिए हमने डंडे रख लिए थे। मंदिर के बगल में शॉरलेट लेक है। बारिश में ये झील और सुंदर हो जाती है। इसके बगल में हैं लार्ड प्वाइंट। झील से थोड़ा आगे चलने पर आ जाता है इको प्वाइंट। यहां पर क्रास द वैली के लिए रोपवे लगा है। किराया 300 रुपये प्रति फेरी। हम आगे बढ़ चले। भूख लगी थी सो जंगल में कच्ची कैरी और बड़ा पाव खाया। इसके बाद आइसक्रीम। दोपहर में होटल वापस।




शाम को सनसेट प्वाइंट जाने का कार्यक्रम बना। हां तो सन सेट तो शाम को ही देखेंगे न.. जाने के लिए तीन किलोमीटर जंगलों से पैदल रास्ता। रेलवे स्टेशन के बगल में दिवादकर होटल से सनसेट प्लाइंट के लिए रास्ता जाता है।

रास्ते में स्टेट बैंक होलीडे होम और अशोक होटल आते हैं। यहां भी खूब बंदर दिखाई देते हैं। पास में मंकी प्वाइंट भी है।
पर सनसेट प्वाइंट पर शाम को सैकड़ो सैलानी जुटते हैं। डूबते हुए सूर्य के सौंदर्य को निहारने। और ये बन जाती है माथेरन की यादगार शाम। अनादि को गोविंद जैसे दोस्त मिल गए। लौटते हुए रात हो जाती है पर जंगलों में रोशन का इंतजाम है। हमें लगा कि माथेरन में प्रवेश के लिए दिए गए 50 रुपये टैक्स का सदुपयोग हो रहा है।

vidyutp@gmail.com
( NERAL MATHERAN RAIL, SUNSET POINT, )

Tuesday, April 28, 2015

26 गुफाओं में बुद्ध का जीवन और दर्शन


अजंता में आप एक नंबर गुफा से घूमते हुए आगे की ओर बढ़ते हैं। गुफा नंबर 26 अजंता की आखिरी देखने वाली गुफा है। इनमें कई गुफाओं में बौद्ध चैत्यगृह और स्तूप बने हैं तो कई में पेंटिंग हैं। गुफा नंबर 17 में बुद्ध की जातक कथाओं से संबंधित चित्र बने हैं। न सिर् दीवारों पर बल्कि छत पर भी चित्र बनाए गए हैं। आप सारी गुफाएं देखते हुए आगे बढ़ें। कोई छोड़ने का मतलब नहीं बनता। अजंता की गुफा नंबर 27 से 30 तक जाने के लिए कोई रास्ता मौजूद नहीं है। रास्ता बनाया ही नहीं गया। पुरातत्व सर्वेक्षण का स्टाफ इन गुफाओं में रस्सी के सहारे सफाई के लिए जाते हैं। आम दर्शकों के लिए वहां पहुंचना मुश्किल है।

अजंता की कई गुफाओं में प्राकृतिक रोशनी नहीं जाती। यहां पर किसी जमाने में धूप में बड़े बड़े आइने लगाकर रोशनी रिफ्लेक्टर के माध्यम से भेजी जाती थी। पर कुछ साल पहले जापान सरकार ने यहां पर ऐसी एलइडी लाइटें लगवा दी हैं जिनसे मूर्तियों को कोई नुकसान नहीं होता।

बुजुर्ग लोग जो पैदल चलने में थक जाते हैं उनके घूमने के लिए अजंता में पालकी भी मौजूद है। पालकी किराया 1400 रुपये प्रति व्यक्ति है। आपको प्रवेश द्वार पर अजंता के गाइड मिलते हैं तो 300 रुपये या अधिक राशि की मांग करते हैं। आप समूह में हैं तो गाइडकर सकते हैं। अन्यथा आप अजंता का ब्रोशर ले लें। इस ब्रोशर के सहारे भी घूम सकते हैं। हर गुफा के बाहर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से चौकीदार तैनात हैं वे भी गुफा के बारे में बताते हैं। बाद में वे आपसे थोड़ी बक्शीश की अपेक्षा रखते हैं।

अजंता की गुफाएं देखकर लौटने के बाद थक गए हों तो खाने पीने के लिए आपको यहां एमटीडीसी का रेस्टोरेंट नजर आता है। पर ये रेस्टोरेंट ठेके पर चलाया जाता है। यहां खाना काफी महंगा भी है। अगर आप यहां न खाना चाहें तो शटल बस सेवा से वापस आप जब शापिंग प्लाजा पहुंचेंगे तो वहां भी खाने पीने के लिए दो समान्य से होटल हैं। यहां पर हमें मुरली कृष्ण होटल में सिर्फ 50 रुपये की थाली मिल गई, जिसका खाना संतोष जनक था। इस शापिंग प्लाजा से आप मूर्तियां खरीद सकते हैं। थोड़ा मोलभाव करके सस्ते में मूर्तियां खरीदी जा सकती हैं।


अगर आप अजंता में एक दिन से ज्यादा वक्त गुजारना चाहते हैं तो अजंता की गुफाओं से 3 किलोमीटर आगे जलगांव मार्ग पर फर्दापुर गांव में एमटीडीसी का रेस्ट हाउस है, जहां ठहरा जा सकता है। इसके अलावा अजंता से आठ किलोमीटर आगे पहाड़ी पार करने के बाद अजंता गांव में भी एक दो गेस्ट हाउस हैं।

अजंता घूमते समय सावधानियां  अजंता और एलोरा की गुफाओं में फोटोग्राफी करते समय फ्लैश का इस्तेमाल कत्तई नहीं करें। कलाकृतियों के संरक्षण के लिहाज से यहां फ्लैश का इस्तेमाल प्रतिबंधित है। अपने साथ पानी की बोतल लेकर चलें पर खाने पीने की सामग्री नहीं ले जाएं। ये पालीथीन मुक्त क्षेत्र है इसलिए यहां कचरा नहीं फैलाएं।



कर्मचारियों को महीनों से वेतन नहीं  मैं 31 मार्च 2015 को अजंता पहुंचा। गुफाओं में घूमते हुए कई चौकीदारों से बात हुई, पता चला कि इन चौकीदारों की नौकरी अस्थायी है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने सालों से इन्हे स्थायी नहीं किया है। 

ये भारत सरकार के दैनिक मजदूर  हैं। सबसे बुरी बात तो ये है कि इन्हे वेतन 5 से 6 माह बाद मिलता है। इन कर्मचारियों ने बताया कि दिसंबर के बाद से वेतन नहीं मिला है। इसी तरह यहां निजी कंपनी के सुरक्षा गार्ड लगाए गए हैं।
उन्हे भी छह माह बाद वेतन मिल पाता है। जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इनकी कंपनी को चेक जारी करता तब जाकर सुरक्षा गार्डों को वेतन मिल पाता है। भारत सरकार की इस संस्था में जो हो रहा है वह शर्मनाक है।


अजंता में गौतम बुद्ध 
चलों चलें अजंता की सैर करने..

अजंता - दीवारों पर चित्रकारी....





( WORLD HERITAGE SITE)  

( AJANTA, AURANGABAD, BUDDHA, CAVES, WORLD HERITAGE SITE)  




Monday, April 27, 2015

गीत गाया पत्थरों ने - अजंता


यहां पत्थरों में सुनाई देता है संगीत। अनवरत संगीत। प्राणों को झंकृत कर देने वाला संगीत। जो अन्यत्र दुर्लभ है। सैकड़ो साल हजारों कलाकारों की अनवरत तपस्या की परिणति है अजंता की गुफाएं।

अजंता की गुफाओं में बनी कलाकृतियों में हजारों शिल्पियों के श्रम और साधना को महसूस किया जा सकता है। यहां पत्थरों से निकलने वाले संगीत को तो यहां पहुंचकर ही महसूस किया जा सकता है। तभी तो अजंता की गुफाएं विश्व के सर्वश्रेष्ठ दर्शनीय स्थलों में एक हैं। दुनिया भर से लाखों सैलानी हर साल अजंता की गुफाओं में शांति
, आध्यात्म और ज्ञान की तलाश में पहुंचते हैं।आप जिस नजरिए से भी देखें आपको कुछ अदभुत दिखाई देगा यहां....  




काफी लोग ताजमहल को देखकर अद्भुत कहते हैं, पर अजंता की गुफाओं को देखने के बाद ये लगता है कि देश का दुनिया में ऐसी नायाब कृति कहीं नहीं हो सकती। वर्गुना नदी के तीन तरफ पहाड़ों की 20 मीटर गहराई तक काट कर गुफाएं बनाई गई हैं जिसमें गौतम बुद्ध का जीवन दर्शन कलाकृतियों और मूर्ति शिल्प में उतारा गया है। ऐसा लगता है मानो पत्थर गीत गा रहे हों। सारी गुफाएं देखते देखते आप आनंदित होते हैं, रोमांचित होते हैं, अचरज करते हैं, कब शाम ढलने लगती है पता भी नहीं चलता। अजंता की 30 गुफाओं का निर्माण पहली शताब्दी से सातवीं शताब्दी के बीच हुआ है। सह्याद्रि की पहाडि़यों पर स्थित इन 30 गुफाओं में लगभग 5 प्रार्थना भवन और 25 बौद्ध मठ हैं। 1819 से पहले ये गुफाएं सैकड़ो साल तक लोगों की नजरों से ओझल रही हैं।

इन गुफाओं की खोज आर्मी ऑफिसर जॉन स्मिथ व उनके दल द्वारा सन् 1819 में की गई थी। वे यहाँ शिकार करने आए थे, तभी उन्हें कतारबद्ध 29 गुफाओं की एक शृंखला नज़र आई और इस तरह ये गुफाएँ प्रसिद्ध हो गई। घोड़े की नाल के आकार में निर्मित ये गुफाएं अत्यन्त ही प्राचीन व ऐतिहासिक महत्त्व की है।


अजंता - गुफा नंबर 21 के इन स्तंभों पर थपकी देने से निकलता है संगीत। 

गीत गाया पत्थरों ने  इऩ गुफाओं का इस्तेमाल भगवान बुद्ध की शिक्षाओं का अध्‍ययन करने के लिए किया जाता था। एक गुफा ऐसी है जिसके स्तंभ को थपकाने पर संगीत की धुन निकलती है। गुफाओं की दीवारों तथा छतों पर बनाई गई ये तस्‍वीरें भगवान बुद्ध के जीवन की विभिन्‍न घटनाओं और विभिन्‍न बौद्ध देवत्‍व की घटनाओं का चित्रण करती हैं। इसमें से सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण चित्रों में जातक कथाएं हैं, जो बोधिसत्व के रूप में बुद्ध के पिछले जन्‍म से संबंधित विविध कहानियों का चित्रण करते हैं। यूनेस्‍को द्वारा 1983 में अजंता को विश्‍व विरासत स्‍थल घोषित किया गया। यह देश का पहला विश्व विरासत स्थल है।

कैसे पहुंचे  औरंगाबाद से अजंता की दूरी 110 किलोमीटर है। औरंगाबाद सेंट्रल बस स्टैंड से नियमित तौर पर जलगांव की तरफ जाने वाली बसें अजंता में रूकती हैं। पर अगर आपको सिर्फ अजंता जाना हो तो जलगांव में रूक कर भी जा सकते हैं। जलगांव से अजंता की दूरी महज 65 किलोमीटर है। अजंता की गुफाओं से पहले अजंता नामक एक गांव आता है। यहां पर एक दो गेस्ट हाउस बने हैं। इस गांव में भी एक किला नजर आता है।


बारिश में जाएं आनंद आएगा  बारिश के दिनों में अजंता का सौंदर्य बढ़ जाता है। आसपास के पहाड़ों से लगातार झरने बह रहे होते हैं। पहाड़ों की हरियाली कई गुना बढ़ जाती है। आप अपने साथ छाता रखें। गुफा के अंदर तो वैसे भी बारिश से बचाव होगा। बाहर का नजारा नयनाभिराम होगा।
अजंता के प्रवेश द्वार के पास सड़क पर कोई मार्क नहीं बना हुआ है। पर जलगांव औरंगाबाद के बीच चलने वाली बसें यहां रूक जाती हैं। गुफा का स्वागत कक्ष शानदार बना है। यहां पर 15 रुपये का शुल्क देना पड़ता है। यहां एक छोटा सा सुंदर सा बाजार है। जहां खाने पीने और उपहार खरीदने की सुविधा है। इस बाजार को पार करने के बाद एक बस स्टैंड आता है। यहां से अजंता के दूसरे प्रवेश द्वार के लिए बसें चलती हैं। 4 किलोमीटर की दूरी का किराया 15 रुपये है। एसी बस का किराया 20 रुपये है। मुख्य द्वार पर दुबारा प्रवेश का टिकट खरीदना पड़ता है। भारतीय लोगों का टिकट 10 रुपये का है। समूह में 5 रुपये का लाइटिंग का टिकट अलग से लेना पड़ता है। गुफाओं के बीच में जगह जगह पेयजल का इंतजाम किया गया है। 
vidyutp@gmail.com
अजंता में बुद्ध। 
अजंता में एमटीडीसी का रेस्टोरेंट 

तो लो हम पहुंच गए हैं अजंता....

     
चलते चलते कुछ खरीददारी हो जाए....

 आगे पढ़िए - अजंता - 26 गुफाओं में गौतम बुद्ध के दर्शन 


   ( AJANTA, AURANGABAD, BUDDHA, CAVES, WORLD HERITAGE SITE)  


Saturday, April 25, 2015

दौलताबाद का किला - जिसे बेधना था मुश्किल


देवगिरी यानी दौलतबाद का किला औरंगाबाद शहर से 11 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम दुर्जेय पहाड़ी पर स्थित है। यह किला की किसी तिलिस्म सा लगता है जिसे भेदना दुश्मन के लिए मुश्किल था। दौलताबाद नाम मुहम्‍मद बिन तुगलक द्वारा तब दिया गया था जब सन् 1327 में मुहम्मद बिन तुगलक ने यहां अपनी राजधानी यहां बसाई थी। यह भारत के सबसे मजबूत किलों में एक यह एक तीन मंजिला किला है जिसे जीत पाना टेढी खीर था।  688 फीट ऊंचे इस किले के मुख्य द्वार से सबसे ऊपर की चोटी तक जाने के लिए आपको दो किलोमीटर की मुश्किल पैदल ट्रैकिंग करनी पड़ती है। लिहाजा पानी की बोतलें अपने साथ रखें।

देवगिरी के शहर यादव राजा भिलण द्वारा 1187 ईस्वी में इस किले का निर्माण कराया गया। यह किला लगभग 200 मीटर की ऊंचाई तक के शंकु के आकार की पहाड़ी पर स्थित है। पहाड़ी के चारों ओर इसके नीचे की ओर खाइयां और ढलानें इसकी रक्षा करती थीं।  दुर्ग गढ़ की बड़ी संख्या के साथ रक्षात्मक दीवारों की तीन लाइनों का निर्माण किया गया है। किले की उल्लेखनीय सुविधाओं खाई, सीधी ढाल हैं। किले मे दुश्मन को रोकने के अनूठे इंतजाम हैं। किले में सात विशाल द्वार आते हैं जहां दुश्मनों से मुकाबले के लिए पर्याप्त इंतजाम हैं।



सभी दीवारों पर तोपें तैनात रहती थीं। आखिरी दरवाजे पर एक 16 फीट लंबी और दो फीट गोलाकार की मेंडा नामक तोप आज भी मौजूद है। जिसकी मारक क्षमता 3.5 किलोमीटर है और यह तोप अपनी जगह पर चारों ओर घूम सकती है। किले में चांद मीनार, चीनी महल और बारादरी भीतर की महत्वपूर्ण संरचनाएं हैं। किले के शीर्ष पर शाही निवास, मस्जिद, स्नान घर,  मनोरंज के कमरे आदि बने हैं। किले के पहले प्रवेश द्वार के बाद बायीं तरफ अंदर एक भारत माता मंदिर भी बनाया गया है।
किले के चारों ओर गहरी खाई बनाई गई है और उसमें पानी भर दिया जाता था जिसमें मगरमच्छ छोड़ दिए जाते थे। उस समय किले में जाने के लिए चमड़े का पुल बनाया गया था और जब युद्ध की आशंका होती थी तो पुल हटा लिया जाता था। कहा जाता है कि यदि दुश्मन की सेना किसी तरह सातों दरवाजे पर पहुंच भी गई तो उसे गहरी खाइयों का सामना करना पड़ता था जिसमें सैनिकों के उतरते हुए उनके स्वागत के लिए खतरनाक मगरमच्छ तैयार रहते थे।



शानदार चांद मीनार  चांद मीनार की ऊंचाई 63 मीटर है और इसे अलाउद्दीन बहमनी शाह ने 1435 में दौतलाबाद पर विजयी होने के उपलक्ष्य में बनाया था। इसके अंदर सीढ़ियां बनाई गई हैं जिससे ऊपर तक जाया जा सकता है। वर्ष 1986 में इसके अंदर भगदड़ मच गई जिसमें दो लोगों की मृत्यु हो गई थी उसके बाद से इसमें अंदर जाना और चढ़ना मना कर दिया गया है।

अंधेरा रास्ता यानी भूलभुलैया  अंधेरा रास्ता तकरीबन 150 फीट लंबा है। इसे लोग भूल भुलैया भी कहते हैं। इसे बिना मशाल, टार्च के पार नहीं किया जा सकता। ऊपर की ओर जाती हुई लंबी सुरंग खड़ी सीढियों द्वारा खड़ी और घुमाव खाती हुई बढ़ती रहती है। इसमें थोड़े-थोड़े अंतराल पर जो विवर आते हैं वे उन गार्डो के कक्ष हैं जिनके हाथ में सुरंग के इस मार्ग की कमान थी। सुरंग के मुख पर लोहे का एक शटर है जो छोटे पहियों पर क्षैतिजीय रूप में एक चोर दरवाजे की भांति विवर को खोलते-बंद करते हुए चलता है। इस सुरंग का एक सर्वाधिक प्रभावी रक्षा उपाय यह था कि इसमें धुएं के एक अवरोधक की व्‍यवस्‍था की गई थी। लगभग आधा रास्‍ता पार करके एक स्थान पर, जहां सुरंग चट्टान के ऊर्ध्‍वाधर मुख के पास से होकर गुजरती है, एक सुराख बनाया गया था ताकि लोहे की एक अंगीठी में आग के लिए हवा का प्रवाह बन सके। यह अंगीठी सुरंग में खुलने वाले एक छोटे कक्ष के विवर में स्‍थापित की गई थी और जब आग सुलगती थी तो सुराख से बहने वाली हवा धुएं को सुरंग में उड़ा देती थी और सुरंग के मार्ग को दुर्गम बना देती थी।


राजधानी दिल्ली से दौलताबाद  - 1325-1351 के बीच दिल्ली की गद्दी पर आसीन थे मुहम्मद बिन तुगलक। वह मध्यकालीन सभी सुल्तानों में सर्वाधिक शिक्षित, विद्वान एवं योग्य व्यक्ति था। पर अपनी सनक भरी योजनाओं के कारण इसे 'स्वप्नशील', और 'पागल' कहा गया है। तुग़लक़ ने 1327 में अपनी राजधानी को दिल्ली से देवगिरि स्थानान्तरित किया। सुल्तान कुतुबुद्दीन मुबारक ख़िलजी ने देवगिरि का नाम 'कुतुबाबादरखा था और मुहम्मद बिन तुगलक ने इसका नाम बदलकर दौलताबाद कर दिया। सुल्तान की इस योजना के लिए सर्वाधिक आलोचना की गई। अरब यात्री इब्न बतूता ने भी राजधानी परिवर्तन योजना का मजाक उड़ाया है। देवगिरि का भारत के मध्य स्थित होना, मंगोल आक्रमणकारियों के भय से सुरक्षित रहना, दक्षिण-भारत की सम्पन्नता की ओर खिंचाव आदि ऐसे कारण थे, जिनके कारण सुल्तान ने राजधानी परिवर्तित करने की बात सोची। पर तुगलक की यह योजना भी पूर्णतः असफल रही और उसने 1335 में दौलताबाद से लोगों को दिल्ली वापस आने की अनुमति दे दी। पर राजधानी परिवर्तन के परिणामस्वरूप दक्षिण में मुस्लिम संस्कृति का विकास हुआ।

फिल्मों में दौलताबाद का किला  - 1979 में आई सुनील दत्त की फिल्म अहिंसा के बड़े हिस्से की शूटिंग दौलताबाद के किले में की गई। ये फिल्म डाकू समस्या पर केंद्रित थी। कई साल बाद एक बार दौलताबाद का किला फिल्मो में देखने को मिला 2011 में आई फिल्म तेरी मेरी प्रेम कहानी में। इसके गीत अल्लाह जाने... की शूटिंग किले के पृष्ठ भूमि मे की गई। इस गाने में शाहिद कपूर और प्रियंका चोपड़ा का रोमांस देखा जा सकता है। किले तोप, दीवारें और रास्ते इस गाने में दिखाई देते हैं।



Friday, April 24, 2015

लेटे हुए हनुमान जी यानी भद्र मारुति


यहां भाव समाधि में हैं रामभक्त हनुमान

देश में बजरंग बली के लाखों मंदिर होंगे, पर इनमें खुल्ताबाद का भद्र मारुति मंदिर काफी अलग है। खुल्ताबाद गांव में स्थित इस मंदिर में लेटे हुए हनुमान जी की विशाल प्रतिमा है। इस तरह के लेटे हुए हनुमान जी की प्रतिमा देश में सिर्फ इलाहाबाद में हैं। एलोरा से भद्रा मारूति की दूरी तीन किलोमीटर है।
यहां पर खास तौर पर हनुमान जयंती और रामनवमी के समय भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। 
मधुर संगीत सुन सो गए हनुमान जी - कहा जाता है कभी खुल्ताबाद का नाम भद्रावती था। यहां के शासन का नाम भद्रसेन था। वह भगवान राम का अनन्य भक्त था। अक्सर वह राम धुन में डूबा रहता था। एक बार हनुमान जी ने भद्रसेन को राम की धुन में मगन होकर गाते हुए सुना। हनुमान जी को संगीत इतना अच्छा लगा कि वे वहीं पर सो गए। इसे हनुमान जी की भाव समाधि कहा जाता है। ये हनुमान जी का अदभुत रूप है जो अन्यत्र देखने को नहीं मिलता। जब भद्रसेन ने अपना गाना खत्म किया तो उसने पाया कि हनुमान जी उसके आगे सो रहे हैं। तब भद्रसेन ने हनुमान जी से आग्रह किया कि वे यहीं पर हमेशा के लिए विराजमान हों और भक्तों को आशीर्वाद दिया करें। इसलिए भद्र मारुति मंदिर का हनुमान भक्तों में खास महत्व है।

और भी हैं विलक्षण हनुमान मंदिर -  देश में और भी हनुमान जी के विलक्षण मंदिर हैं। इसी क्रम में इंदौर के उलटे हनुमान मंदिर है। यह भारत कि एक मात्र उलटे हनुमान कि प्रतिमा है। इसी तरह छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में रतनपुर के गिरिजाबंध हनुमान मंदिर में स्त्री रुप में हनुमान प्रतिमा है। इन सबसे अलग गुजरात के जामनगर के बाल हनुमान मंदिर है।

एलोरा गुफाओं के बाद हमारा अगला पड़ाव था भद्र मारूति। यहां पहुंचने पर हमें मंदिर के आसपास निर्माण कार्य चलता हुआ दिखाई दिया। मंदिर को और भव्य बनाने की तैयारी जारी है। हमारे बीएचयू  के दोस्त जीतेंद्र यादव जो आरपीएफ में पदस्थापित हैंने सलाह दी थी इस तरफ आएं तो भद्र मारूति के जरूर दर्शन करें। जय बजरंग बली...


( AURANGABAD, BHADRA MARUTI TEMPLE, KHULTABAD ) 


Thursday, April 23, 2015

औरंगाबाद - लड़कियों के लिए सस्ता खाना लड़कों के लिए महंगा

औरंगाबाद शहर के बंशीलाल नगर में खाने पीने के लिए होटल ढूंढते हुए हम जा पहुंचे महाराष्ट्रियन भोजनालय। इस भोजनालय में खास तौर पर आसपास में रहकर कोचिंग में पढ़ाई करने वाले छात्र छात्राएं खाने के लिए पहुंचते हैं। 

लड़के लड़कियों के लिए अलग अलग दरें 
पर यहां पर मासिक तौर पर खाने वाले लड़के और लड़कियों के लिए खाने की दरें अलग अलग है। इसके पीछे होटल के मैनेजर का तर्क था कि लड़कियां लड़कों की बनिस्पत कम खाती हैं। इसलिए हमने लड़कियों के लिए अलग दरें रखी हैं। मासिक तौर पर लड़कों से 3000 लिए जाते हैं तो लड़कियों से महज 2000 ही लिए जाते हैं। होटल एक महीने का कूपन जारी कर देता है पैसे लेने के बाद। आप जब खाएं तब एक कूपन जमा कर दें। तो लड़के और लड़कियों के कूपन का रंग अलग अलग रखा गया ताकि कोई गडबड़ी नहीं हो ।

होटल लालजी के रेस्टोरेंट में। 
खाने के मीनू की बात करें तो महाराष्ट्रियन भोजनालय का खाना सादा है। महाराष्ट्र में हैं तो थोड़ा मसालेदार जरूर है। पर ऐसा है कि आप खाकर बीमार नहीं पड़ेगें। सर्विस बहुत तेज है। खाना पैक कराकर भी ले जा सकते हैं। दाल, पनीर, चपाती जैसे रोज खाने वाले व्यंजन यहां बनते हैं।

 मुहल्ले में महाराष्ट्रियन भोजनालय इतना लोकप्रिय है कि इन्होंने अलग से अपना टेक अवे स्टाल भी खोला हुआ है जिसका नाम सुमन स्वंयपाक घर है। यहां से घरो में रहने वाले लोग पैक कराकर भोजन ले जाते हैं। महाराष्ट्रियन भोजनालय में मिनरल वाटर आदि की दरें भी दूसरी दुकानों से कम रखी गई हैं। इसके पास ही डाक्टर भापकर रोड पर रेनो शोरूम के बगल में आप हार्ट बीट की ओर भी रुख कर सकते हैं। बेसमेंट में स्थित इस रेस्टोरेंट के खाने का स्वाद शानदार है। थोडा महंगा है पर साज सज्जा के हिसाब से आपको निराशा नहीं मिलेगी। यह औरंगाबाद के बेस्ट रेस्टोरेंट में गिना जाता है।

होटल न्यू भारती, स्टेशन रोड। 
रेलवे स्टेशन के आसपास की बात करें तो एक दिन हमलोग होटल लालजी पहुंचे। ये एक आवासीय होटल है पर इनका डायनिंग हाल शानदार है। सफेद रंग की थीम पर बने डायनिंग हाल की सर्विस काफी अच्छी है। खाने के बाद इन्होंने फीडबैक फार्म भी भरवाया। लालजी के स्टेशन रोड पर ही दो होटल हैं। एक रेलवे स्टेशन के गेट के बिल्कुल बगल में है जो छोटा है, थोड़ा आगे चलकर इनका होटल है जो आवासीय है। ग्राउंड फ्लोर पर डायनिंग हाल है।  http://lalajishotel.com/index.html 

रेलवे स्टेशन के पास आप न्यू भारती में एक दिन स्वाद ले सकते हैं। इनका डायनिग हाल काफी बड़ा है। थाली 80 से 90 रुपये की है। पर यहां का मसाला डोसा काफी अच्छा है। हमारे टैक्सी वाले भाई साहब रफीक भाई ने भारती की अनुसंशा की थी। यहां जाकर भी हमें निराशा नहीं मिली। (http://www.hotelnewbharti.in/)  


स्टेशन रोड पर ही भारती के बगल में तिरुपति होटल है। इस आवासीय होटल में भी आधार तल पर रेस्टोरेंट है। यहां भी थाली 80 से 90 रुपये की है। मासाला डोसा विशाल आकार है जिसे खाकर आप खुश हो जाएंगे।

तिरुपति का अपना आवासीय होटल भी है। यह रेलवे स्टेशन के बिल्कुल ही बगल में स्थित है। माधवी को यहां का मसाला डोसा काफी पसंद आया। इनकी थाली में मिठाई भी होती है। ये चाहें तो मिठाई हटाकर थाली की कीमत कम भी कर सकते हैं। 

औरंगाबाद शहर में आप बाबा पेट्रोल पंप चौराहे के आसपास भी आपकी खाने पीने के कुछ अच्छे होटलों की तलाश पूरी हो सकती है। हलांकि हमें बस स्टेंड के सामने स्थित होटलों का भोजन कुछ खास नहीं जमा।
होटल तिरूपति की थाली। 

शहर के कई इलाकों में बड़ा पाव की अच्छी दुकाने खुल गई हैं जिनका डेकोरेशन अत्याधुनिक है। कई शहरों में अब बडा पाव की ब्रांडेड दुकानें खुलती जा रही है। गोली बड़ा पाव की तर्ज पर। यहां पर आप दिन भर कई किस्मों के बडा पाव का आनंद ले सकते हैं। आनादि को ऐसे ही एक स्टोर का बड़ा पाव  खूब पसंद आया। अब आप महाराष्ट्र में हैं और बड़ा पाव का स्वाद नहीं लिया तो भला क्या खाया...

औरंगाबाद के रेलवे स्टेशन के पास डाक्टर भापकर रोड पर एमटीडीसी का टूरिस्ट कांप्लेक्स भी स्थित है पर यह हर शहर की तरह ऊंची दुकान फीकी पकवान की तरह ही है।


(AURANGABAD CITY, MARATHWADA, FOOD, BADA PAW ) 

Wednesday, April 22, 2015

चलिए रफीक भाई के साथ देश की सैर पर चलें

औरंगाबाद के टैक्सी ड्राईवर रफीक भाई। वे कोई मामूली टैक्सी ड्राईवर नहीं है बल्कि वे एक चलता फिरता टूरिज्म का दफ्तर, वेबसाइट, टूर प्लानर सब कुछ हैं। उनकी जानकारी अदभुत है जो सैलानियों को रोमांचित करती है। पर इन सबके के बीच वे बड़े सहज और शांत हैं।

यह महज संयोग था कि हमने एलोरा और आसपास घूमने के लिए रफी भाई की इंडिका कार बुक की।उनकी गाड़ी हमें होटल श्रीमाया के स्वागत कक्ष के सौजन्य से मिली। तय समय के मुताबिक वे अपनी कार लेकर 30 मार्च को सुबह साढ़े छह बजे हमारे होटल पर पहुंच गए। हालांकि हमने दिन भर का प्लान पहले से तय कर लिया था।

 पर रफीक भाई ने शहर के बारे में हमें जानकारी देनी शुरू की। होटल से बाहर निकलते हैं चौड़ी सड़क पर आया वाकिंग प्लाजा। रफीक भाई बताते हैं कि शहर के लोग सुबह सुबह यहां टहलने आते हैं। जाते समय बाहर की अस्थायी दुकानों से ताजी सब्जियां लेकर जाते है। हमलोग कैंटोनमेंट एरिया पार कर शहर के बाहर मनमाड रोड पर आगे बढ़ रहे हैं। दोनों तरफ हरे भरे पेड़ हैं। वे हमे सुबह के नास्ते में बड़ा पाव खाने लिए बेहतरीन रेस्टोरेंट के बारे में बताते हैं। 

 हम पहले घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन करते हैं। उसके बाद कुछ घंटे एलोरा के लिए हैं। हम एलोरा में ही नास्ते में पूड़ी सब्जी, बड़ा पाव लेते हैं। उसके बाद आगे चल पड़ते हैं। रफी भाई हमें अंजीर(फिग) की खेती दिखाते हैं। भद्र मारूति के दर्शन के बाद हमलोग औरंगंजेब की मजार पर पहुंचे। हमारा अगला पड़ाव था दौलताबाद का किला। रफी भाई तमाम स्थलों के बारे में रोचक जानकारियां परोसते रहे।

रफीक भाई अपनी टैक्सी से देशी विदेशी सैलानियों को महाराष्ट्र का हर कोना, राजस्थान, मध्य प्रदेश और पूरा दक्षिण भारत घूमा चुके हैं। इसलिए उन्हें आधे देश के सड़क मार्ग की बहुत अच्छी जानकारी है। वे अपने साथ के सैलानियों को सबसे छोटे और सुविधाजनक मार्गों की जानकारी देते हैं। 

रफीक भाई ने अपने 20 साल के कैरियर में कभी किसी सैलानी को नाराज होने का मौका नहीं दिया। दुनिया के कई देशों के सैलानियों ने उनकी सेवा और ज्ञान से खुश होकर उनके बारे मे दुनिया के कई भाषाओं में लिखा है। आमतौर पर रफी भाई औरंगाबाद रेलवे स्टेशन बाहर आपको मिल जाएंगे। उनका फोन नंबर है – Md. RAFIK +91 98232 08932 ईमेल – md_rafik@rediff.com
एलोरा की गुफाओं में। 


 (AURANGABAD CITY, MARATHWADA, TRAVEL WITH RAFIK BHAI ) 

Monday, April 20, 2015

दर्शन से नष्ट होते हैं पाप- घूश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग ( 12)

महाराष्ट्र में औरंगाबाद के समीप ही प्रसिद्ध घृष्णेश्वर मंदिर है जो 12 ज्योतिर्लिगों में से एक है। शिव के ज्योर्तिलिंगों की सूची में ये 12वां और आखिरी है। यहां आकर एक विशेष प्रकार के शांत वातावरण का एहसास होता है। यह मंदिर दक्षिण भारत के तंजावुर के वृहदीश्वर मंदिर का लघु रूप सा दिखाई देता है। कला शिल्प की दृष्टि से ये अति सुंदर मंदिर है। इस मंदिर का जीर्णोद्धार सर्वप्रथम सोलहवीं शताब्दी में वेरुल के ही मालोजी राजे भोंसले (छत्रपति शिवाजी महाराज के दादा) के द्वारा कराया गया। फिर अट्ठारवीं शती में यह मंदिर इंदौर की महारानी देवी अहिल्याबाई होलकर द्वारा भव्य रूप प्रदान किया गया। पूरा मंदिर पाषाण का बना हुआ है। दीवारों पर सुंदर नक्कासी देखने को मिलती है।

कुछ लोग इसे घुश्मेश्वर के नाम से भी पुकारते हैं। बौद्ध भिक्षुओं द्वारा निर्मित एलोरा की प्रसिद्ध गुफाओं के प्रवेश द्वार से मंदिर की दूरी महज आधा किलोमीटर है। शहर से दूर स्थित यह मंदिर सादगी से परिपूर्ण है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में यह 12वां और अंतिम ज्योतिर्लिंग है। इसे घुश्मेश्वर, घुसृणेश्वर या घृष्णेश्वर भी कहा जाता है। यहां सोमवार को भारी भीड़ होती है।

 शिव महापुराण में घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग का वर्णन है। ज्योतिर्लिंग 'घुश्मेश' के समीप ही एक सरोवर भी है. जिसे शिवालय के नाम से जाना जाता है. कहा जाता है कि जो भी इस सरोवर का दर्शन करता है उसकी सभी इच्छाओं की पूर्ति होती है। मंदिर में दूध से शिवलिंग का अभिषेक किया जाता है।

ईदृशं चैव लिंग च दृष्ट्वा पापै: प्रमुच्यते।
सुखं संवर्धते पुंसां शुक्लपक्षे यथा शशी।।
अर्थात् घुश्मेश्वर महादेव के दर्शन करने से सभी प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं । मंदिर में प्रवेश के लिए तीन द्वार हैं। मंदिर का गर्भ गृह जहां शिवलिंग स्थित है वह सभा मंडप की तुलना में गहराई में है। गर्भगृह में जाने वाले पुरुषों को कमर के ऊपर का वस्त्र उतारना पड़ता है।

मोबाइल कैमरा प्रतिबंधित - मंदिर परिसर के अंदर फोटोग्राफी प्रतिबंधित है। मोबाइल फोन लेकर भी नहीं जा सकते। प्रवेश द्वारा पर मोबाइल फोन और कैमरा जमा करने का काउंटर बना हुआ है। इसके लिए मामूली किराया वसूला जाता है।

कैसे पहुंचे – औरंगाबाद शहर से वेरुल गांव की दूरी 29 किलोमीटर है। इसी वेरूल गांव में मुख्य सड़क पर ही मंदिर स्थित है। यह औरंगाबाद से मनमाड-पुणे जाने वाला मुख्यमार्ग है। इस मार्ग पर राज्य परिवहन की बसें हमेशा चलती रहती हैं। अगर आप ऐलोरा घूमने जा रहे हैं तो पहले ज्योतिर्लिंग के दर्शन करके एलोरा की गुफाएं देखने जा सकते हैं।

कथा - देवगिरि पर्वत के पास सुधर्मा नामक ब्राह्मण पत्नी सुदेहा के साथ रहता था। लेकिन उन्हें कोई संतान नहीं थी। ज्योतिषि ने बताया कि सुदेहा को संतान नहीं हो सकती। सुदेहा ने सुधर्मा को दूसरा विवाह अपनी छोटी बहन से करने को कहा। पत्नी की जिद के आगे उन्हें झुकना ही पड़ा। वह पत्नी की छोटी बहन घुश्मा से विवाह कर ले आए। घुश्मा भगवान शंकर की भक्त भी थी। रोज एक सौ एक पार्थिव शिवलिंग बनाकर पूजन करती थी। भगवान आशुतोष की कृपा से उसे एक सुंदर व स्वस्थ पुत्र हुआ। पर ईष्या वश सुदेहा ने पुत्र को मार डाला मगर परम शिवभक्त सती धुश्मा के आराध्य शिव ने उसे पुनर्जीवित कर दिया और स्वयं घुश्मेश्वर महादेव ज्योतिर्लिंग के नाम से विख्यात हुए।
शिव के बारहवें ज्योतिर्लिंग घुश्मेश्वर में 


Saturday, April 18, 2015

खुल्ताबाद - औरंगजेब की मजार पर

मुगल बादशाह औरंगजेब ऐसा शासक रहा है जिसका इतिहास में ज्यादातर नकारात्मक मूल्यांकन हुआ है। दिल्ली के इस सुल्तान की मजार है औरंगाबाद शहर से 30 किलोमीटर दूर खुल्ताबाद में। उसकी दिली तमन्ना थी कि उसे अपने गुरु के बगल में दफनाया जाए। इसलिए अहमदनगर में 23 मार्च 1707 को मौत होने के बाद उसे यहां लाकर दफनाया गया। औरंगंजेब की कब्र कच्ची है। कब्र के पास मौजूद सेवादार बताते हैं कि उसकी इच्छा थी कि कब्र को भव्य रूप नहीं दिया जाए।

अबुल मुज़फ्फर मुहिउद्दीन मुहम्मद औरंगज़ेब आलमगीर का जन्म 4 नवम्बर 1618 को गुजरात के दाहोद में हुआ था। वह शाहजहां और मुमताज की छठी संतान और तीसरा बेटा था। उसका शासन 1658 से लेकर 1707 तक रहा। इस प्रकार उसने 50 साल यानी मुगल शासकों में सबसे ज्यादा साल तक शासन किया। उसकी पहचान हिन्दुस्तान के इतिहास के सबसे जालिम राजा के तौर पर है। जिसने  अपने पिता को कैद किया, अपने सगे भाइयों और भतीजों की बेरहमी से ह्त्या की। गुरु तेग बहादुर का सिर कटवाया। गुरु गोबिंद सिंह के बच्चों को जिंदा दीवार में चुनवाया। पर उसकी सादगी के किस्से भी मशहूर हैं। 

औरंगजेब के अन्तिम समय में दक्षिण में मराठों का वर्चस्व बहुत बढ़ गया था। उन्हें दबाने में शाही सेना को सफलता नहीं मिल रही थी। इसलिए सन 1683 में औरंगजेब खुद सेना लेकर दक्षिण की ओर गया। वह राजधानी से दूर रहता हुआ, अपने शासन−काल के लगभग अंतिम 25 वर्ष तक इसी अभियान में व्यस्त रहा। उसकी मृत्यु महाराष्ट्र के अहमदनगर में 23 मार्च सन 1707 ई. में हो गई। उसकी इच्छा के ही मुताबिक दौलताबाद में स्थित फ़कीर सैय्यद जैनुद्दीन सिराजी रहमतुल्लाह की कब्र के अहाते में उसे दफना दिया गया। हालांकि उसकी नीति ने इतने विरोधी पैदा कर दिए थे जिस कारण मुगल साम्राज्य का अंत ही हो गया। औरगंजेब के बाद दिल्ली सल्तनत दिल्ली के आसपास ही सिमट कर रह गया था।

औरंंगजेब की कच्ची कब्र। 
खुल्ताबाद में औरंगजेब की मजार पर बहुत कम लोग ही पहुंचते हैं। ज्यादातर लोग जो एलोरा या दौलताबाद आते हैं वे लगे हाथ औरंगजेब की मजार पर भी दस्तक देने पहुंच जाते हैं। मजार के पास बाहर इत्र की दुकाने हैं। चूंकि मजार के बगल में फकीर बुरहानुद्दीन (शेख जैनुउद्दीन शिराजी-हक) की कब्र है इसलिए उनकी कब्र पर फूल चढ़ाने वाले और दुआएं मांगने वाले पहुंचते हैं।  अकबर के गुरु सलीम चिश्ती के परिवार से आते थे, हजरत ख्वाजा बुरहानुद्दीन फकीर शेख बुरहानुद्दीन के नाम पर मध्य प्रदेश का बुरहानपुर शहर बसा है।

औरंगजेब की सादगी - कहा जाता है औरंगजेब सादा जीवन जीता था। वह उन सब दुर्गुणों से सर्वत्र मुक्त था, जो आमतौर पर राजाओं में होती है। खाने-पीने, वेश-भूषा और जीवन की सभी-सुविधाओं में वह बेहद संयम बरतता था। प्रशासन के कार्यों में व्यस्त रहते हुए भी वह अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए टोपियां सीकर कुछ पैसा कमाने का समय निकाल लेता था। औरंगजेब पर नई दृष्टि से बात करने वाले इतिहासकार कहते हैं कि उसने सिर्फ उन्ही मंदिरों को तोड़वाया जहां से उसे भ्रष्टाचार की शिकायतें मिलीं। उसने अपने जीवन में कई मंदिरों को दान भी दिया था। 
vidyutp@gmail.com

( AURANGABAD, AURNGNJEB TOMB, KHULTABAD ) 

Thursday, April 16, 2015

जल योजना का अनूठा नमूना है 400 साल पुरानी पनचक्की

महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर में  एक बड़ा आकर्षण है पनचक्की। पन चक्की यानी पानी से चलने वाली चक्की। इस चक्की से कभी आटा पिसा जाता था। इस आटे से सूफी संत के दरबार में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए रोटियां बनती थीं। अब भी इस पनचक्की को देखने पर्यटक बड़ी संख्या में आते है।
ये पन चक्की जल संरक्षण का अनूठा उदाहरण है। इसे देखकर साइफन पद्धति का प्रयोग पता चलता है। पनचक्की से 8 किलोमीटर की दूरी पर जटवाड़ा की पहाड़ी है। इस पहाड़ी को खोदने पर 30 फीट के झरने का पता चला। इस पानी को इकट्टा करके नहर द्वारा पनचक्की वाले स्थान तक लाया गया। इस पानी को भूमिगत नहर द्वारा 8 किलोमीटर तक लाया गया है। यहां पर मिट्टी के विशाल पाइप से पानी को 20 फीट ऊंचाई पर उठाया गया है। यहां पर पानी झरने के रूप में हौज में गिरता हुआ आज भी दिखाई देता है।

इसे सूफी संत बाबा शाह मुसाफिर ने 1624 में बनवाना शुरू किया था। हजरत बाबा शाह मुसाफिर रूस से शहर राज्बदान ( बुखारा) से यहां पर आए थे। शाह मुसाफिर ने इस जगह को अपना तकिया ( ठिकाना) बनाया। ये पनचक्की उन्ही के खास प्रयास से बनवाई गई। ये ऐतिहासिक पनचक्की 1644 ई में बनकर तैयार हुई। यह चक्की आज भी पानी की सप्लाई सही होने पर चलती है। चक्की के ऊपर वाले कमरे में एक मिट्टी का चाक है जो चलता हुआ दिखाई देता है। इस चाक पर गेहूं से आटा पिसा जाता था। इस चक्की से पीसे जाने वाले आटे से तकिया पर आने वाले यतीमो के लिए रोटियां बनाई जाती थी। पनचक्की के बगल में बने पानी के हौज के बगल में एक विशाल बरगद का पेड़ है। इस पेड़ के साथ लिखा है कि 600 साल पुराना है। छोटे से सरोवर के पास ये पेड़ जहां राहियों को छाया प्रदान करता है वहीं ये सरोवर के सौंदर्य को और बढ़ा देता है। जल संरक्षण और प्रबंधन का इतना सुंदर नमूना बहुत कम जगह ही देखने को मिलता है।
 उत्तराखंड के पहाड़ों पर भी कई जगह पनचक्कियां चलाई जाती हैं। पर मैदानी इलाके में इस तरह का नमूना दुर्लभ है। पनचक्की में आया ज्यादा पानी आगे खाम नदी में चला जाता है। यह अपने समय के इंजीनियरिंग का अदभुत नमूना है।
औरंगाबाद शहर के महमूद गेट के पास स्थित बाबा शाह मुसाफिर के इस स्थान पर अंदर एक मसजिद है। यहां पर बाबा शाह मुसाफिर की कब्र है। साथ ही सूफी संत द्वारा इस्तेमाल की गई कई वस्तुएं भी देखी जा सकती हैं। इसी परिसर में सुनहरी महल, जामा मसजिद, औरंगजेब के समय के बगीचे भी हैं। पनचक्की के परिसर में महाराष्ट्र के वक्त बोर्ड का दफ्तर भी है।

यहां पर मेरी मुलाकात एक इस्लाम धर्म के प्रचारक से होती है जो मुझे इस्लाम पर हिंदी में एक पुस्तक उपहार में देते हैं। ये सज्जन हिंदी अंग्रेजी और संस्कृत के अच्छे जानकार थे। वे वेदों के कुछ श्लोंको और कुरान की आयतों में साम्यता का उदाहरण पेश करते हैं।
 vidyutp@gmail.com

( WATER, PANCHAKKI, AURANGABAD, MAHARASTRA )