Wednesday, February 25, 2015

प्रतापनगर - यहां देखिए नैरो गेज का इतिहास

प्रताप नगर  रेलवे स्टेशन की दूरी बड़ौदा रेलवे स्टेशन से 5 किलोमीटर है। हालांकि दोनों स्टेशन रेलवे लाइन से भी संपर्क में हैं। पर अगर आपको प्रताप नगर कभी भी पहुंचना हो तो वडोदरा रेलवे स्टेशन से आटो रिक्शा से जाना पड़ता है। सयाजीराव गायकवाड रेलवे ओवर ब्रिज के बाद लंबे लाल बाग उद्यान के बाद आता है प्रताप नगर रेलवे स्टेशन। इस रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक से नैरो गेज की रेलागाड़ियों का संचालन होता है। नैरोगेज यानी छोटी लाइन को गुजराती में नानी लाइन कहते हैं। जबकि प्लेटफार्म नंबर दो और तीन से बड़ी लाइन यानी मोटी लाइन की ट्रेन चलती हैं। प्रतापनगर में रेलवे स्टेशन के पास ही बडोदरा का डीआरएम आफिस और बड़ी रेलवे कालोनी है। प्लेटफार्म नंबर एक के पास ही बना है नैरो गेज का रोलिंग स्टाक पार्क। इस पार्क में गुजरात के नैरोगेज नेटवर्क से जुड़ी हुई ऐतिहासिक धरोहरों को सहेज कर रखा गया है।
  
इस पार्क में अलग अलग तरह के कोच, क्रेन, क्रांसिंग आदि के नमूने देखे जा सकते हैं। प्रतापनगर शेड में नैरो गेज पर चलने वाली रीलिफ वैन खड़ी दिखाई देती है। इसमें मेडिकल कंपार्टमेंट, स्टोर, स्ट्रेचर रखने की जगह और सहायता में जाने वाले स्टाफ के लिए बैठने की जगह होती थी। इस शेड में एक जेनरेटर वैन भी खड़ा है जो कभी इस्तेमाल में था।

किसी समय में गुजरात के नैरो गेज नेटवर्क पर मालगाड़ियां बड़ी संख्या में चलाई जाती थीं। बड़ी लाइन के नेटवर्क से आने वाले सामान को छोटी लाइन से गुजरात के तमाम शहरों तक पहुंचाया जाता था। यहां पुरानी मालगाड़ी के कोच भी संभाल कर रखा गया है। ये कोच 1961 का बना हुआ है। इसकी क्षमता 15.3 टन सामान ढोने की है। सिर्फ मालगाड़ियां ही नहीं नैरो गेज नेटवर्क डीजल पेट्रोल और दूसरे तेल को भी सप्लाई करने का काम ये नैरोगेज नेटवर्क करती थी। इस डिब्बे का निर्माण 1951 में हर्स्ट निल्सन एंड कंपनी ने किया था।
प्रतापनगर शेड में एक नैरोगेज का आयल टैंकर भी पटरियों पर आराम फरमा रहा है। कई बार ये डिब्बा पेयजल सप्लाई के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है। यहां पर प्रदर्शित किए गए इस डिब्बे का निर्माण 1907 में लीड्स फोर्स कंपनी लिमिटेड ने किया था। इसकी क्षमता 12 हजार लीटर पानी ढोने की है। यहां मालगाड़ी के साथ लगने वाला गार्ड का नन्हा सा डिब्बा भी देखा जा सकता है।

अनूठा हैंड क्रेन - प्रतापनगर शेड में 1883 का बना हुआ अनूठा हैंड क्रेन देखा जा सकता है। काउन शिल्डन एंड कंपनी, इंग्लैंड द्वारा निर्मित ये क्रेन 5 टन वजन का सामान इधर उधर कर सकता है। इसका दयारा 10 फीट का है। 1915 में इसे भरूच में लगाया गया था। यह ब्राड गेज और नैरो गेज के कोच से भारी सामान को उतारने का काम करता था।

इंजन के लिए रोटेटर - रेलगाड़ी के लोकोमोटिव को अपनी जगह पर घूमा कर वापस उल्टी दिशा में करने के लिए रोटेटर का इस्तेमाल किया जाता था। ऐसा ही एक रोटेटर प्रतापनगर में लगा हुआ दिखाई देता है। 

बीबी एंड सीआई रेलवे के लिए इस रोटेटर यंत्र का निर्माण 1874 में ओरेमरोड क्रिरेशन एंड कंपनी ने किया था। ये मैनचेस्टर, लंदन का बना हुआ है। नैरोगेज के तमाम नेटवर्क पर लोकोमोटिव की दिशा बदलने के लिए इस तकनीक का खूब इस्तेमाल किया जाता था। इस रोटेटर पर इंजन को लाकर खड़ा कर देने के बाद कुछ लोग मिलकर पूरे इंजन को दूसरी दिशा में आसानी से घूमा देते थे। 


डायमंड क्रासिंग  रेल को एक पटरी से दूसरी पटरी के बीच क्रास कराने के लिए क्रासिंग बनाई जाती थी।  ऐसी क्रासिंग की जरूरत अक्सर रेलवे जंक्शन पर पड़ती है, जहां दो मार्ग एक दूसरे को क्रास करते हैं। यहां पर जिस क्रासिंग को प्रदर्शित किया गया है वह टिंबा रेलवे स्टेशन पर 1919 में बनाया गया था। 

क्रासिंग वाली जगह पर पटरी में एंगल और दो पटरियों के बीच जगह का ध्यान रखना पड़ता है। क्योंकि गर्मियों में लोहा गर्म होता है तब पटरियां फैलती हैं। प्रतापनगर शेड में नैरो गेज की डायमंड क्रासिंग भी देखी जा सकती है। डायमंड क्रासिंग में ब्राड गेज और नैरो गेज की दो पटरियां एक दूसरे को किसी सड़क के चौराहे की तरह क्रास कर जाती हैं। रोलिंग स्टाक पार्क के सामने सड़क की दूसरी तरफ रेलवे हेरिटेज संग्रहालय का निर्माण किया गया है जो गुजरात में नैरो गेज के विकास की कहानी बयां करता है। 
-vidyutp@gmail.com

( GUJRAT, PRATAP NAGAR, NARROW GAUGE, RAIL ) 

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