Sunday, February 16, 2014

बरौनी जंक्शन से हाथीदह वाया राजेंद्र पुल

अवध अासाम एक्सप्रेस से बरौनी जंक्शन पर दोपहर के बाद उतर चुका हूं। ये बरौनी जंक्शन है। पूर्व मध्य रेलवे का महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशन। कभी ये पूर्वोत्तर का प्रवेश द्वार हुआ करता था। क्योंकि ब्राडगेज से देश भर से आने वाले लोग पूर्वोत्तर की तरफ जाने के लिए यहां से मीटर गेज की ट्रेन पकड़ते थे। 1883 से संचालन में है रेलवे स्टेशन। ये रेलवे स्टेशन बरौनी जंक्शन उत्तर बिहार और दक्षिण बिहार को भी जोड़ता है।
गुवाहाटी से लौटते हुए मेरी ट्रेन नियत समय पर बरौनी जंक्शन पहुंच गई। मेरे पास हालांकि टिकट हाजीपुर तक का था। पर हाजीपुर से पटना के बीच आजकल महात्मा गांधी सेतु पर लगने वाले जाम के कारण मैंने सोचा बरौनी उतरकर पटना चला जाऊं तो जल्दी पहुंच जाउंगा। इसलिए बरौनी में ही अवध आसाम एक्सप्रेस को अलविदा कह दिया। 
सिमरिया घाट पर उगता सूर्य, पृष्ठ भाग में राजेंद्र पुल। 
बरौनी जंक्शन काफी खुला खुला है। स्टेशन पर ज्यादा भीड़भाड़ नहीं है। कुल नौ प्लेटफार्म हैं स्टेशन पर। फुट ओवर ब्रिज भी बना है। प्लेटफार्म पर सुधा मिल्क पार्लर भी नजर आया। यहं से दो किलोमीटर आगे बरौनी फ्लैग नामक रेलवे स्टेशन भी है। मुख्य रेलवे स्टेशन से आधा किलोमीटर आगे से बरौनी जंक्शन की बाईपास लाइन है। मोकामा से समस्तीपुर जाने वाली कुछ ट्रेनें बाईपास लाइन से ही गुजर जाती हैं।


खैर मेरी मुश्किल तब बढी जब पता चला कि फिलहाल बरौनी से पटना के लिए कोई ट्रेन नहीं है। रविवार होने के कारण इंटरसिटी नहीं थी। अब दूसरा उपाय था सड़क मार्ग से हाथीदह जाकर पटना के लिए ट्रेन ली जाए। रेलवे स्टेशन  के बाहर से बडी वाली जीप जिसे बिहार में टेकर कहते हैं हाथीदह जा रही थी।

 कुल 12 किलोमीटर की दूरी का किराया बीस रुपये। देखते देखते जीप ठसाठस भर गई। कई लोग छत के ऊपर भी बैठ गए। एक सज्जन साथ थे। देखने में अच्छे घर के लग रहे थे। सीट खाली होने पर भी जीप में नहीं बैठे। जब जीप चल पड़ी तो पीछे लटक गए। सफर पूरा होने पर पता चला कि लटक कर सफर करने वाले से ड्राइवर 10 रुपये ही लेता है। इस तरह उन सज्जन ने 10 रुपये बचा लिए। रास्ते में मलहीपुर गांव आया। मेरे आईआईएमसी के दोस्त नलिन कुमार का गांव। जो लंबे समय तक बीबीसी लंदन में रहे। मुझे यहां से गुजरते हुए नलिन की बहुत याद आई। सालों से उनसे संपर्क टूटा हुआ है।
गंगा नदी पर राजेंद्र पुल - 
बरौनी से कुछ दूरी पर ही हाथीदह में गंगा नदी पर राजेंद्र पुल है जो रोड कम रेल ब्रिज है। ये उत्तर बिहार और दक्षिण बिहार को जोड़ने वाला 1984 से पहले एकमात्र पुल हुआ करता था। 1959 में इस पुल का निर्माण ब्राइटवे बर्न एंड जोसेप ने किया था। पुल की लंबाई दो किलोमीटर है। इस पुल पर फोर लेन की सड़क और सिंगल लाइन का रेलवे ट्रैक है। राजेंद्र पुल के ऊपर ऊपर सड़क मार्ग है और नीचे से गुजरती है रेल लाइन। 



बरौनी से हावड़ा दिल्ली मार्ग के हाथीदह जंक्शन जाने के लिए गंगा में बने राजेंद्र पुल को पार करना पड़ता है। जब ये पुल नहीं बना था तब माल की आवाजाही मोकामा घाट से एलसीटी सर्विस से बरौनी के लिए होती थी। बरौनी से चलने के बाद गड़हरा , सेमरिया (दिनकर ग्राम), चकिया थर्मल, राजेंद्र पुल, हाथीदह रेलवे स्टेशन रास्ते में आते हैं। बरौनी के बाद आने वाले गड़हरा हाल्ट पर रेलवे का बहुत बड़ा यार्ड और फ्रेट डिपो है। यहां विशाल रेलवे कालोनी और केंद्रीय विद्यालय भी है।


हमारे जीप वाले रास्ते में लोगों को उतारते हुए धीरे धीरे राजेंद्र पुल की ओर बढ़ रहे थे। भीड़ के कारण जीप का सफर काफी घुटन भरा था। थोड़ी देर में सिमरिया घाट दिखाई दिया। गंगा नदी के दर्शन हुए। भाई लोगों ने कुछ सालों से सिमरिया घाट पर कुंभ मेला लगाना शुरू कर दिया है। बिहार का रहने वाला होकर भी मैं पहली बार ऐतिहासिक राजेंद्र पुल से गुजर रहा था। इस पुल पर आजकल वाहनों की आवाजाही सीमित कर दी गई है। कुछ साल पहले पुल में दरार की खबरें आई थीं। जैसे ही पुल खत्म हुआ जीप अचानक रुक गई। सबको उतरने को कहा। मुझे बताया गया कि हाथीदह आ गया। मुझे कहीं स्टेशन दिखाई नहीं दे रहा था। तब सहयात्रियों ने बताया कि सीढ़ियों से नीचे उतरने पर स्टेशन के दर्शन होंगे। ( आगे पढ़िए - नीचे रेल, ऊपर रेल मतलब हाथीदह जंक्शन ) 
- विद्युत प्रकाश मौर्य  vidyutp@gmail.com 



3 comments:

  1. वाह भाई वाह, क्या वर्णन किया है! बिल्कुल सजीव चित्रण। मैं उसी इलाके का हूं (आपने जिसका जिक्र करना जरूरी समझा ;) लेकिन मैंने भी कई तथ्यों पर ध्यान नहीं दिया था। जैसे- बरौनी स्टेशन 1883 से संचालन में है, या हाथीदह स्टेशन दो मंजिला है।

    ReplyDelete