Saturday, March 14, 2015

याद आती है रामोजी फिल्म सिटी की कैंटीन

जब में ईटीवी में साक्षात्कार दे रहा था, तो आखिरी चरण में वहां मिलने वाले कम वेतन पर मैंने थोड़ा संकोच जताया। तपाक से बोर्ड में मौजूद प्रसेनजीत जी ने कहा, हम आपको यहां कैंटीन में इतना सस्ता खाना खिलाते हैं। जो खाना हम 12.50 में खिलाते हैं वह बाजार में 50 रुपये में भी नहीं मिलता। वाकई गेस्ट हाउस में रुक कर दो दिन से मैं उनकी कैंटीन का सुस्वादु भोजन खा रहा था, इसलिए बातो में आ ही गया। इसके बाद जितने समय मैंने  रामोजी फिल्म सिटी स्थित ईटीवी के मध्य प्रदेश चैनल में नौकरी की दोपहर या रात का एक बार खाना हमेशा कैंटीन में ही खाया। 2007 में यहां खाने की प्लेट का रेट 12 रुपये 50 पैसे था। खाने की थाली में मिलती थी 10 से ज्यादा वेराइटी। तो मैं अपनी पत्नी से कहता था घर से टिफिन लेकर जाने की भला जरूरत ही क्या है।

चपाती, तीन सब्जियां, दो दाल, सांबर, रस्म, दही, तीन किस्म की चटनी, दही, चीनी, कई बार मिठाई। आरएफसी कैंटीन की थाली वास्तव में दक्षिण भारतीय और उत्तर भारतीय खाने का मिश्रण है। बड़ी संख्या उत्तर भारतीय स्टाफ की मांग पर यहां चपाती भी बनती है। चपाती बनाने के लिए गुरुद्वारों की तरह मशीने लगाई गई हैं। हर  रोज खाने में जो तीन तरह की चटनी बनती है उसके लिए भी बड़ी बड़ी मशीने लगाई गई हैं। खास मौकों पर थाली में विशेष डिश भी खाने को मिल जाती है।
ईटीवी की कैंटीन ( फोटो सौ - शाहबाज अंसारी) 
स्टाफ कैंटीन में खाने के लिए रुपये देने की जरूरत नहीं है। आप अपने आई कार्ड पर प्रीपेड कार्ड की तरह रिचार्ज करा लिजिए। इस राशि से हर बार स्वैप कर कूपन निकालें और राशि आपके खाते से कम होती जाती है। यानी पैसे देने के लिए हाईटेक इंतजाम। लंच, डिनर और नास्ता का समय तय है। जब 12.50 का खाना था तब नास्ता महज 4.50 रुपये में मिलता था। नास्ते में डोसा, इडली, पराठा या समोसा का विकल्प रहता था।

दक्षिण भारत के साथ चावल जमकर खाते तो उत्तर भारत के लोग रोटी। दुबारा तिबारा चाहे जितना भी लेकर खाओ कोई रोट टोक नहीं। हमारे कई साथी कैंटीन का खाना जमकर खाते थे। इतना खाते थे कि खाने के बाद नींद आने लगती। कई बार काम करने की इच्छा नहीं होती। लेकिन काम तो करना ही है। कई लोगों का इस कैंटीन का खाना खाने के बाद वजन बढ़ जाता था।

जो लोग रामोजी फिल्म सिटी छोड़ चुके हैं उन्हें भी यहां की कैंटीन बार बार याद आती है। विशाल डायनिंग हाल में एक साथ 400 लोगों के बैठने का इंतजाम है। सर्विस काउंटर इतने ज्यादा होते थे कि कभी भीड़ का सामना नहीं करना पड़ा। एक साथ 11 टीवी चैनलों का स्टाफ जब यहां खाने के लिए पहुंचता है तो हिंदुस्तान कई राज्यों के लोग एक साथ होते हैं। उड़िया, बंगाली, गुजराती, कन्नड, आंध्रा, बिहारी और यूपी वाले सभी साथ। यानी लघु भारत। कैंटीन दो हिस्सों में बंटा  है। अधिकारियों का डायनिंग हाल अलग है और आम कर्मचारियों का अलग। पर किचेन और दरें एक जैसी ही हैं।

समय समय पर कैंटीन के खाने की क्वालिटी में सुधार के लिए लोगों से फीडबैक भी लिया जाता है। एक कर्मचारी खास तौर पर काउंटर खोल कर बैठता और बड़े मुस्कुराते हुए अपना फीडबैक देने का आग्रह करता। मैंने कई बार रोटी की गुणवत्ता सुधारने के लिए फीडबैक दिया। पर रोटी तो मशीन से बनती है। वैसी ही बनेगी ना। फिर भी उस कैंटीन के खाने का स्वाद बार बार याद आता है।
-vidyutp@gmail.com


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