Saturday, January 3, 2015

कभी रक्सौल से नेपाल में अमलेखगंज तक जाती थी रेल

भारत नेपाल के बीच किसी समय में एक रेल संपर्क हुआ करता था। भारत के सीमांत शहर रक्सौल से नेपाल के अमलेखगंज के बीच 47 किलोमीटर लंबी रेलवे लाइन का संचालन 1927 से 1965 तक होता रहा। ये लाइन 2 फीट 6 ईंच ( 762 एमएम) की नैरोगेज लाइन थी। इस लाइन को नेपाल गवर्नमेंट रेलवे ( एनजीआर) ने भारत में कई नैरो गेज नेटवर्क चलाने वाली कंपनी मार्टिन एंड कंपनी के सहयोग से बिछवाया था।

लंबे समय तक भारत से नेपाल की राजधानी काठमांडू जाने के लिए ये नैरो गेज लाइन साधन के तौर पर काम करती थी। यात्री पहले रक्सौल से नैरोगेज ट्रेन से अमलेखगंज जाते थे। फिर वहां से लॉरी( बसें) पकड़ कर काठमांडू। पर 1956 में जब नेपाल सरकार ने त्रिभुवन हाईवे का निर्माण करवा दिया तब बीरगंज ( नेपाल में रक्सौल से लगा हुआ शहर) से काठमांडू के लिए सीधा सड़क संपर्क बहाल हो गया।
रक्सौल अमलेखगंज का स्टीम लोको ( 1950)। 

पहली बार 1923 में जे वी कॉलियर नामक कंपनी ने एक छोटी दूरी की रेलवे लाइन भारत के जंगलों में बिछाई थी। इसका उद्देश्य नेपाल से लकड़ी को भारत में लाना था। इस कंपनी को नेपाली शासक राना ने नेपाल की लकड़ियों की बिक्री के लिए बहाल किया था। 1924 की सर्दियों में नेपाल के शासक ने कोलकाता की कंपनी मार्टिन एंड कंपनी को नेपाल में नैरो गेज लाइन बिछाने के लिए आमंत्रित किया। इस कंपनी ने भारत सीमा से अमलेखगंज तक रेलवे लाइन बिछाने के लिए सर्वे का काम आरंभ किया।

मार्च 1926 में इस रेलवे लाइन के निर्माण का काम आरंभ हो गया। 16 फरवरी 1927 को नेपाल सरकार ने इस मार्ग पर रेलगाड़ियों का परिचालन शुरू कर दिया। कंपनी का नाम नेपाल गवर्नमेंट रेलवे था। रक्सौल से अमलेख गंज का ये मार्ग नेपाल का प्रमुख रेल मार्ग बन गया। इस मार्ग पर माल ढुलाई के साथ बड़ी संख्या में यात्री परिवहन भी होने लगा।

मार्ग पर सुचारू रेल संचालन के लिए 7 स्टीम लोकोमोटिव्स की खरीद की गई। यात्री परिवहन के लिए 12 कोच खरीदे गए। वहीं माल ढुलाई के लिए 82 वैगन भी इस रेल नेटवर्क के पास मौजूद थे। जो स्टीम लोकोमोटिव इस्तेमाल किए जा रहे थे वे गैरेट मॉडल के थे जिनका निर्माण  बायर, पीकॉक एंड कंपनी ने किया था। कई दशक तक नेपाल में ये रेल सेवा काफी लोकप्रिय रही।

पर 1965 में नेपाल में त्रिभुवन हाईवे के बाद भी कई और सड़के बन जाने के बाद धीमी गति के इस रेल की लोकप्रियता कम होने लगी। तब नेपाल सरकार ने इस रेलवे लाइन को बंद करने का फैसला लिया। 1959 ने रक्सौल के पास बीरगंज से काठमांडु के लिए सीधी बस सेवा चलने लगी थी, इसलिए लोग अब इस रेल मार्ग से कम सफर करते थे। निजी कंपनी नेपाल ट्रांसपोर्ट सर्विस की बसें इस रेल सेवा पर भारी पड़ने लगी थीं। लिहाजा इस घाटे की ट्रेन को 1965 में बंद कर दिया गया।

नेपाली फिल्म - आमा-  में नेपाल नैरोगेज रेल। 
रक्सौल अमलेखगंज नैरो गेज ट्रेन सेवा की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि नेपाली भाषा में बनी पहली फिल्म में इस ट्रेन के शाट लिए गए। नेपाली की पहली फिल्म आमा ( मां) थी जो 1964 में प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म के दृश्य में दिखाया गया है कि एक गोरखा सिपाही जो नेपाल अपने गांव छुट्टियों पर लौट रहा है वह इस नैरो गेज रेलवे से यात्रा कर रहा है। फिल्म के पहले ही दृश्य में नेपाल स्टेट रेलवे को पहाडो के बीच दौड़ती हुई दिखाई गई है। ये फिल्म ब्लैक एंड ह्वाइट थी जिसमें शिवशंकर, भुवन और चैत्या देवी ने प्रमुख भूमिकाएं की थी। प्रोड्यूसर डाइरेक्टर हीरा सिंह की इस फिल्म के शुरुआती 8 मिनट के दृश्य नेपाल की इस नैरोगेज रेल के साथ ही फिल्माए गए हैं। इससे ये अंदाजा लगाया जा सकता है कि कभी ये रेल नेटवर्क नेपाल की शान और पहचान हुआ करता था। इस फिल्म का निर्माण फिल्म्स डिविजन नेपाल सरकार ने किया था। कदाचित इसलिए भी फिल्म में नेपाल रेलवे को प्रमुखता दी गई हो।

रक्सौल बीरगंज के मध्य नेपाल का प्रवेश द्वार। 
विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक इस रेलवे नेटवर्क का प्रबंधन बहुत ढीला ढाला था। माल ढुलाई वाली एजेंसियों को अमलेखगंज में सामान उतारने के बाद कुली से लेकर आगे उसे काठमांडू ले जाने के लिए ट्रकों का इंतजाम भी खुद ही करना पड़ता था। सेवाओं में प्रोफेसनलिज्म की काफी कमी थी। कामकाज में कागजी कार्रवाई ज्यादा थी। बदलते समय के अनुसार रेलवे में तकनीकी सुधार के भी कोई उपाय नहीं किए गए।

2008 में भारत सरकार ने भारत के रक्सौल ने बीरगंज होते हुए काठमांडू तक ब्राडगेज रेलवे लाइन बनाए जाने के को लेकर एक अध्ययन कराया। पर इस लाइन पर बात आगे नहीं बढ़ सकी है। बीरगंज से काठमांडू की सड़क मार्ग से दूरी 220 किलोमीटर की है। पर पहाड़ो को काटकर बनाई जाने वाली रेलवे लाइन से ये दूरी घटकर 80 से 120 किलोमीटर हो सकती है। फिलहाल रक्सौल से नेपाल की सीमा सिरसिया तक 5.3 किलोमीटर लंबी ब्राडगेज लाइन है जो नेपाल के शुष्क बंदरगाह तक मालगाड़ी परिवहन के काम आती है। सिरसिया तक यात्री गाड़ियां नहीं जाती हैं।

अमलेखगंज रेलवे स्टेशन ( 1982) 
1982 में कैलफोर्निया ( अमेरिका) के एक भ्रमणशील जीव विज्ञानी कोजर ने अमलेखगंज रेलवे स्टेशन का दौरा किया। उन्होंने पाया कि रेलवे स्टेशन का भवन सलामत था। उस भवन में स्थानीय व्यापारी धान रख रहे थे। वहीं रेल लाइन की पटरियां दिखाई दे रही थीं। पर फिश प्लेटें जो लकड़ी की थीं, उसे निकाल कर स्थानीय लोग जलावन के तौर पर प्रयोग कर रहे थे।




माल ढुलाई के लिए बनी थी कोसी बैराज रेलवे 
1957 में कोसी बैराज तक माल ढुलाई के लिए एक नैरो गेज लाइन ( 2 फीट 6 इंच) बिछाई गई। कई हिस्सों में बंटी ये लाइन फारिबसगंज से भीमनगर श्रनेपाल) के बीच बिछाई गई थी। ये प्रोजेक्ट दूसरे विश्वयुद्ध से पहले शुरू किया गया था। मीटरगेज की लाइन से फारबिसगंज से बैराज के लिए सामग्री की सप्लाई इस लाइन से की जा रही थी। लेकिन इस लाइन को बैराज बन जाने के बाद चालू नहीं रखा गया। माल ढुलाई के लिए इस मार्ग पर 20 स्टीम लोकोमोटिव का इस्तेमाल किया जा रहा था। इस परियोजना को 1962 में पूरा हो जाना था। पर ये 1982 तक जाकर पूरी हो सकी। इस लाइन के कुछ हिस्सों पर 1987 तक परिवहन जारी रहा। इसके बाद ये लाइन बंद हो गई। वहीं इस लाइन के कुछ हिस्सों पर 1982 में ही माल ढुलाई का काम बंद हो चुका था।

- vidyutp@gmail.com 

 ( NARROW GAUGE IN NEPAL, AMLEKHGANJ, RAXAUL ) 

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