Saturday, January 31, 2015

रायपुर में स्वामी विवेकानंद

विवेकानंद सरोवर शहर के बीचो-बीच स्थित है। बूढापारा तालाब का नया नाम विवेकानंद सरोवर है। कहा जाता है कि यह झील इस शहर के जितनी ही पुरानी है। इसे बूढा झील भी कहा जाता है जिसका मतलब है पुरानी झील। यह रायपुर की सबसे बड़ी झील भी है। तालाब को 600 वर्ष पहले कल्चुरी वंश के राजाओं द्वारा खुदवाया गया था। इतिहासकारों के मुताबिक यह पहले 150 एकड़ में था जो अब मात्र लगभग 60 एकड़ में ही सीमित हो गया है।

इस झील में स्वामी विवेकानंद की 37 फीट ऊँची प्रतिमा बनी हुई है जिसका नाम मूर्तियों का सबसे बड़ा नमूना होने के कारण लिम्का बुक में दर्ज किया गया है। इसका निर्माण 2004 से 2006 के बीच हुआ। इसके वास्तुकार हैं पद्मश्री जे एस नेल्सन।

झील में बोटिंग का मजा
यहां तालाब में आप नौका विहार का आनंद भी ले सकते हैं। नौका विहार की दरें भी काफी सस्ती हैं। महज 40 रुपये में आधे घंटे। एक बोट पर सवार हो सकते हैं चार लोग। शाम के समय तालाब में उभरती दूधिया रोशनी यहां की सुंदरता को बढ़ा देती है। वैसे रायपुर शहर में और भी कई तालाब हैं। शहर में तेलीबंधा तालाब, राजा तालाब, पुराना तालाब, टीकापारा तालाब, महाराजाबंद तालाब हैं। पर इन सबका दायरा अब सिकुड़ता जा रहा है।

विवेकानंद ने गुजारे थे यहां डेढ साल
रायपुर इस बात का गौरव अनुभव करता है कि स्वामी विवेकानंद ने यहां डेढ़ वर्ष से अधिक का समय गुजारे।  हालांकि तब वे स्वामी विवेकानंद नहीं थे बल्कि किशोरवय के नरेन्द्रनाथ दत्त थे जो अपने परिवार के साथ रायपुर आये थे. यहां रहते हुये उनके भीतर जो संस्कार उत्पन्न हुये और उनके ज्ञान का लोहा माना गया जिसने बाद में उन्हें स्वामी विवेकानंद के रूप में संसार में प्रतिष्ठापित किया। 

विवेकानंद के कुछ जीवनीकारों ने लिखा है कि नरेन्द्र एवं उनके घर के लोग नागपुर से बैलगाड़ी द्वारा रायपुर गये, पर नरेन्द्र को इस यात्रा में जो एक अलौकिक अनुभव हुआ। तब रायपुर में अच्छा विद्यालय नहीं था। इसलिए नरेन्द्रनाथ पिता से ही पढ़ा करते थे। डेढ़ वर्ष रायपुर में रहकर विश्वनाथ सपरिवार कलकत्ता लौट आये। तब तक नरेन्द्र का शरीर स्वस्थ, सबल और हृष्ट-पुष्ट हो गया और मन उन्नत। यानी नरेंद्र के विवेकानंद बनने में रायपुर की बड़ी भूमिका है। स्वामी विवेकानंद की याद में रायपुर के एयरपोर्ट का नाम स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट रखा गया है।

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