Saturday, February 14, 2015

महाराष्ट्र का शहर जहां कोई मराठी नहीं बोलता

महाराष्ट्र का एक ऐसा शहर जो मराठी नहीं बोलता। शहर के सारे साइन बोर्ड हिंदी में दिखाई देते हैं। यह सौ फीसदी सच है। थोड़ा दिमाग दौड़ाइए। हम पहुंच गए हैं राइस सिटी के नाम से मशहूर गोंदिया में। गोंदिया विदर्भ क्षेत्र का जिला मुख्यालय है। एक बड़ा व्यापारिक शहर है। पर शहर की सीमा मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ के काफी करीब है। गोंदिया से मध्य प्रदेश की सीमा 22 किलोमीटर और छत्तीसगढ़ की सीमा 46 किलोमीटर है। दोनों राज्यों के लोग यहां बड़ी संख्या में व्यापार करने आते हैं।

रायपुर से शाम को 17.55 बजे चलने वाली नागपुर इंटरसिटी एक्सप्रेस कुछ मिनट लेट थी। रायपुर रेलवे प्लेटफार्म पर इस दौरान मुझे दुर्लभ पक्षी नीलकंठ के दर्शन हुए। हमारे साथ ट्रेन का इंतजार कर रहे भंडारा जाने वाले बुजुर्ग मराठी नीलकंठ देव को बार बार प्रणाम कर रहे थे। पर थोड़ी देर में नीलकंठ महाराज दर्शन देने के बाद उड़ गए। हमारी ट्रेन प्लेटफार्म पर लग गई। भिलाई, दुर्ग, राजनांदगांव के बाद डोंगरगढ़ आया। छत्तीसगढ़ का आखिरी रेलवे स्टेशन। महाराष्ट्र के पहले स्टेशन आमगांव के बाद गोंदिया जंक्शन। रात के साढ़े नौ बजे थे। मैं प्लेटफार्म नंबर एक से बाईं तरफ बाहर निकलता हूं। पतली सी सड़क शहर में प्रवेश कर रही है।

यहां मुझे गुजरात लॉज नजर आता है। मैं सीढ़िया चढ़ उपर पहुंचता हूं। एक कमरा 150 रुपये का। लकडी की दीवारें हैं। पुराने बड़े से घर को लॉज में तब्दील किया गया है। पहली मंजिल पर भोजनालय भी है लेकिन बंद है। उपर वाली मंजिल पर कमरा है लेकिन शौचालय नीचे वाली मंजिल पर। लॉज वाले ने सुबह नहाने के लिए गर्म पानी भी उपलब्ध करा दिया। पानी गर्म करने के लिए यहां देशी गीजर लगा था। स्टील का बड़ा सा लंबा बरतन जिसमें नीचे से लकड़ी की आग जलाकर गर्म पानी तैयार कर दी गई।

राइस सिटी गोंदिया – हिंदी और सिंधी

रात को भोजन के लिए मैं पड़ोस के जैन भोजनालय में जाता हूं। इसके मालिक 35 साल के प्रवीण जैन बताते हैं कि मैं जब व्यापार के सिलसिले में नागपुर जाता हूं और वहां के दुकानदारों से मराठी में नहीं बात कर पाता तो वे मुझे आश्चर्य से देखते हैं। उनका भोजनालय 75 साल से चल रहा है। दादाजी के जमाने से। तब सवा रूपये में भरपेट खिलाते थे। आज 70 रुपये में। खाने में ढेर सारी वेराइटी थी। तीन सब्जियां, दाल, 6 चपाती, ढेर सारा चावल। सलाद। इतना कुछ।


जैन बताते हैं कि गोंदिया शहर की आबादी दो लाख है। कभी राइस सिटी के नाम से मशहूर इस शहर में 300 से ज्यादा राइस मिलें थीं। लेकिन अब राइस का कारोबार कमजोर हो रहा है। आजकल सिर्फ 75 राइस मिलें बची हैं। यहां कभी बिहार झारखंड से व्यापारी सालों भर चावल खरीदने आते थे। अब कम आते हैं। जैन बताते हैं कि तब बिहार के व्यापारियों की मांग पर वे चावल और आलू का चोखा बनवाया करते थे।

सुबह में शहर में टहलने निकलता हूं। 5 रुपये में एक कप चाय पीता हूं। महाराष्ट्र के कई शहरों में चाय 10 की हो चुकी है। यहां अभी राहत है। शहर के गांधी प्रतिमा चौक तक पहुंच जाता हूं। यहां एक विशाल मां शारदा वाचनालय भी है। शहर का 80 फीसदी व्यापार सिंधी कारोबारियों के हवाले है। पंजाबी और मारवाड़ी भी हैं। शहर में मुझे एक भी साइनबोर्ड मराठी में नहीं दिखाई देता है। सब जगह हिंदी।

 एक साइनबोर्ड पर गौर फरमाता हूं। मुख्य बाजार में बोर्ड पर लिखा है- यात्री सुविधा लॉज, ठहरने की उत्तम व्यवस्था। लॉज मालिक का नाम है नंद किशोर शर्मा। परिचय के लिए कोष्ठक में गर्व से लिखा है- राजस्थानी ब्राह्मण। ये साफ होता है कि गोंदिया में बड़ी संख्या में राजस्थानी लोग भी हैं। और साईन बोर्ड सिंधी लोगों के भी होने का सबूत देते हैं। पर लॉज मालिक को अपनी जाति बताने की जरूरत क्यों है आखिर... ये नहीं समझ में आया।  

गोंदिया शहर का एक साइन बोर्ड।  
गोंदिया जंक्शन बड़ा रेलवे स्टेशन है। यहां से बालाघाट लाइन, बल्लारशाह लाइन, दुर्ग लाइन, नागपुर लाइन के लिए ट्रेनें चलती हैं। हमारी ट्रेन बालाघाट डेमू सुबह 8.40 बजे है। बिल्कुल साफ सुथरी ट्रेन. सीटें भी आरामदेह हैं। 

वैसे तो ये कटंगी तक जाती है। गोंदिया बालाघाट कंटगी लाइन के ब्राडगेज में बदले जाने के बाद ये डेमू चली है। सीटें आरामदाय हैं। इसमें टायलेट भी है। 40 किलोमीटर दूर बालाघाट का किराया 10 रुपये। ट्रेन समय पर खुली और बिल्कुल समय पर बालाघाट जंक्शन के प्लेटफार्म नंबर दो पर पहुंच गई।






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