Friday, February 13, 2015

बात छत्तीसगढ़ी जुबान की

अपनी बोली भला किसे भली नहीं लगती। तो छत्तीसगढ़ की बोली है छत्तीसगढ़ी। यहां के लोग इसे भाषा के तौर पर मान्यता दिलाने के लिए संघर्ष करते रहते हैं। पर मुझे छत्तीसगढ़ में सफर करते हुए रेलगाड़ियों के लिए स्टेशनों पर होने वाली उदघोषणा में छत्तीसगढ़ी जुबान में सुनाई दी। यहां के बड़े रेलवे स्टेशनों पर अंग्रेजी और हिंदी के अलावा छत्तीसगढ़ी जुबाने में आने जाने वाली गाड़ियों के बारे में जानकारी दी जाती है। यह सुनने में अच्छा लगता है। स्थानीय लोगों को भी एक हद तक सुविधा होती है। दो करोड़ लोगों की मातृभाषा है छत्तीसगढ़ी। यह राज्य के रायगढ़सरगुजा, बिलासपुररायपुरदुर्गजबलपुर और बस्तर आदि में बोली जाती है।

चांपा के रहने वाले प्रोफेसर अश्विनी केसरवानी के मुताबिक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और साहित्यकार पंडित सुन्दरलाल शर्मा छत्तीसगढ़ी काव्य के भारतेन्दु हरिश्चंद्र थे। सुन्दरलाल शर्मा छत्तीसगढ़ी काव्य के प्रवर्तक थे। उन्होंने छत्तीसगढ़ी काव्य में रचना करके ग्रामीण बोली की भाषा के रूप में प्रचलित किया।

स्थानीय समाचार चैनल छत्तीसगढ़ी में समाचार बुलेटिन निकाल रहे हैं। आईबीसी 24 दिन भर में 4 आधे आधे घंटे का समाचार बुलेटिन छत्तीसगढ़ी भाषा में प्रसारित करता है। हम्मर वानी हम्मर गोठ...लोकप्रिय भी हो रहा है। वहीं ईटीवी का छत्तीसगढ़ चैनल भी स्थानीय भाषा में समाचार बुलेटिन शुरू कर चुका है।

आब राज्य में अखबार छत्तीसगढ़ी साहित्य पर हप्ते में एक दिन पेज निकाल रहे हैं। दैनिक भास्कर और राजस्थान पत्रिका ने ऐसी पहल की है। हफ्ते में एक दिन साहित्य का पन्ना आता है छत्तीसगढ़ी में। मैं चांपा से रायपुर जाने के लिए जनशताब्दी एक्सप्रेस में बैठा हूं। छत्तीसगढ़ी साहित्य के पेज पर एक लेख छपा है जिसमें लेखक ने प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में दिए जाने की जबरदस्त वकालत की है। यानी स्कूली पढ़ाई छत्तीसगढ़ी जुबान में हो।

मेरे बगल में बैठे हैं रामायण पात्रे जो हिंदी के प्रोफेसर हैं छ्त्तीसगढ़ के ही मिनी माता कालेज में। वे छत्तीसगढ़ी भाषा को इस तरह वकालत किए जाने के खिलाफ हैं। कहते हैं, इसमें कोई भविष्य नहीं है। वे पूछते हैं क्या छत्तीसगढ़ी भाषा में स्कूली पढ़ाई करके कोई आगे इंजीनियर, डाक्टर या वैज्ञानिक बन सकता है। बोलचाल भर के लिए मातृभाषा ठीक है। उच्च अध्ययन में कारगर नहीं है। वास्तव में छत्तीसगढ़ी हिंदी की पूर्ववर्ती भाषा है जिससे खड़ी बोली (हिंदी) का विकास हुआ है। हिंदी की उसकी प्रगति है। हम भाषा में प्रगति कर रहे हैं तो फिर से वापस जाने की क्या जरूरत है। उनकी चिंता जायज भी लगती है। बोलचाल में छत्तीसगढ़ी हमारी भोजपुरी के काफी करीब ही लगती है। भोजपुरी की सगी बहन सी। इसी तरह की मांग कई बार भोजपुरी वाले भी करते हैं। पर दोनों ही भाषाएं बोलचाल के लिए सही हैं।


आजकल छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ी भाषा में फिल्में भी खूब बन रही हैं। मैं रायपुर स्टेशन पर उतरते ही रिक्सा के पीछे छत्तीसगढ़ी फिल्मों के बड़े बड़े विज्ञापन देखता हूं। राज्य के लोग इन फिल्मों को खूब देखते भी हैं।  अब तक सौ से ज्यादा छत्तीसगढ़ी फिल्में बन चुकी हैं। 2012 तक 84 फिल्में बन चुकी थीं।

 निर्माता अलक राय की बईरी के मया फिल्म को छत्तीसगढ़ी और भोजपुरी भाषाओं में एक साथ बनाया। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह संतोष जैन की अजब जिनगी-गजब जिनगी में अतिथि भूमिका भी निभा चुके हैं। शिवकुमार दीपक ऐसे अभिनेता है जो छत्तीसगढ़ी फिल्मों के पचास साल के सफर में अनवरत कार्यरत है। पहली छत्तीसगढ़ी फ़िल्म 1965 में बनी थी जिसका नाम था कही देबे संदेश। इस फ़िल्म के गानों को मोहम्मद रफ़ीमहेंद्र कपूर और मन्ना डे जैसे गायकों ने आवाज़ दी थी।

vidyutp@gmail.com





No comments:

Post a Comment