Thursday, February 12, 2015

छत्तीसगढ़ के गांधी पंडित सुंदर लाल शर्मा

राजिम शहर के चौराहे पर महान पत्रकार और स्वतंत्रता सेना पंडित सुंदरलाल शर्मा की प्रतिमा लगी है। इस प्रतिमा ने मुझे सहज रूप से उनके अवदान के बारे में जानने के लिए प्रेरित किया। वास्तव में पंडित सुंदरलाल शर्मा छत्तीसगढ़ के गांधी थे। 21 दिसंबर 1881 को जन्मे पंडित सुंदरलाल शर्मा  छत्तीसगढ़ में जन जागरण तथा सामाजिक क्रांति के अगुवा थे। सुंदरलाल शर्मा एक कविसमाजसेवक, इतिहासकार, स्वतंत्रता-संग्राम सेनानी थे। उनके सम्मान में बिलासपुर में पंडित सुंदर लाल शर्मा मुक्त विश्वविद्यालय की स्थापना की गई है। उनका निधन 28 दिसंबर 1940 में हुआ। सुंदरलाल शर्मा असहयोग आंदोलन के समय जेल जाने वाले प्रमुख सेनानियों में एक थे। शर्मा जी के प्रयासों से ही महात्मा गांधी 20 दिसंबर 1920 को पहली बार रायपुर पधारे थे।

श्यामसुंदर शर्मा को छत्तीसगढ़ी का अग्रणी कवि माना जाता है। उन्होंने हिंदी तथा छत्तीसगढ़ी में लगभग 18 ग्रंथों की रचना की, जिसमें छत्तीसगढ़ी दान-लीला चर्चित कृति है। छत्तीसगढ़ सरकार ने उनकी स्मृति में साहित्य/आंचिलेक साहित्य के लिए पं. सुंदरलाल शर्मा सम्मान स्थापित किया है।

राजीव लोचन मंदिर में अछूतों को दिलाया प्रवेश
1925 में पंडित सुंदर लाल शर्मा ने छत्तीसगढ़ के मंदिरों में अछूतों के प्रवेश को लेकर आंदोलन चलाया। इसके तहत राजिम के प्रसिद्ध राजीव लोचन मंदिर में अछूते के प्रवेश को लेकर योजना बनाई गई। यह बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर द्वारा नासिक के प्रसिद्ध कालेराम मंदिर में दलितों के प्रवेश के आंदोलन से पहले की घटना है। इस आंदोलन से तत्कालीन ब्राह्मण समाज में खलबली मच गई। हालांकि पंडित सुंदर लाल शर्मा स्वंय ब्राह्मण थे लेकिन वे जाति के आधार पर छूआछूत के प्रबल विरोधी थे।


8 नवंबर 1925 को अछूतोद्धार हिंदू सभा की एक विशाल बैठक राजिम में हुई। इसकी अध्यक्षता नारायण राव मेघावले कर रहे थे। बैठक में संत, महात्मा, राजनेता, समाजसुधारक मौजूद थे। कई घंटे चले मंथन के बाद ये प्रस्ताव पास किया गया कि मंदिर में अछूतों को प्रवेश का अधिकार दिया जाए। ये ऐलान हुआ कि 15 दिन के अंदर अछूत जातियों के लोग राजीव लोचन मंदिर में प्रवेश करेंगे।

25 नवंबर 1925 को पंडित सुंदरलाल शर्मा की अगुवाई में 1500 अछूत श्रद्धालु राजीव लोचन मंदिर पहुंचे। अछूतों ने 12 तोले के स्वर्णाभूषण भी बनवाए थे भगवान को अर्पित करने के लिए। लेकिन मंदिर प्रबंधन और अंग्रेज पुलिस ने उन्हें मंदिर में प्रवेश से रोका। पास के रामचंद्र मंदिर के पुजारी ने अछूतो के लिए अपने मंदिर का द्वार खोल दिया। सुंदरलाल शर्मा आर्य समाज के स्वामी श्रध्दानंद के कार्य से प्रभावित थे। उनकी प्रेरणा से ही उन्होंने हरिजनोध्दार एवं अस्पृश्यता निवारण को कार्यक्षेत्र बनाया।पंडित शर्मा पाराशर गोत्र के ब्राह्मण होते हुए भी दलित वर्ग के अधिकारों के हिमायती रहे। गुरु घासीदास के बताए सैनिक निष्ठा के नियमों के पालन व उपदेश देने एवं समाज के सभी दलित वर्गों में स्वाभिमान जगाने के लिए उन्होंने सतनामी पुराण नामक ग्रंथ की रचना की। 

महात्मा गांधी जब सन् 1933 में दूसरी बार छत्तीसगढ़ की यात्रा पर आये तब राजिम के पास नवापारा की सभा को संबोधित करते हुए कहा था कि सुंदरलाल शर्मा उम्र में तो मुझसे छोटे हैं परंतु हरिजनोध्दार के कार्य में मुझसे बड़े हैं।

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