Tuesday, February 10, 2015

पूरे छत्तीसगढ़ की झांकी यहां देखें - रायपुर का घासीदास संग्रहालय

अगर आप पूरे हरे भरे छत्तीसगढ़ को नहीं देख सके हैं तो उसकी एक झांकी रायपुर के महंथ घासीदास संग्रहालय में देख सकते हैं। ये राज्य के बेहतरीन संग्रहालयों में से एक है। महंत घासीदास संग्रहालय रायपुर का एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल हो सकता है। यह संग्रहालय 1875 में राजा महंत घासीदास ने बनवाया था।

इसका नामकरण नांदगांव रियासत के राजा महंत घासीदास के नाम से किया गया है। यह सन 1953 से संस्कृति एवं पुरातत्व के संचालनालय में स्थापित है । 21 मार्च 1953 को देस के प्रथम राष्ट्रपति डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद ने इसका लोकार्पण किया। संग्रहालय रायपुर नगर में जिला न्यायालय और कमिश्नर दफ्तर के बीच जीई रोड पर स्थित है। 


संग्रहालय शहर के लोकप्रिय घड़ी चौक से पांच मिनट के पैदल चलकर पहुंचा जा सकता है। हालांकि महंत घासीदास संग्रहालय दर्शकों और पर्यटकों के लिए तरसता रहता है। प्रचार कम होने के कारण कम लोग ही यहां पहुंचते हैं। यहां प्रवेश शुल्क प्रति व्यक्ति महज एक रुपया है। बावजूद इसके दर्शक बहुत कम आते हैं। अगर आंतरिक फोटोग्राफी करना चाहते हैं तो 5 रुपये शुल्क है। मैंने खुशी से फोटोग्राफी के लिए 5 रुपये का टिकट लिया। संग्रहालय के बाहर बड़ा ही खूबसूरत उद्यान है। उद्यान में बैठने के लिए बेंच है। परिसर में एक मुक्ताकाश थियेटर भी है। 

संग्रहालय की कलाकृतियों को तीन दर्शक दीर्घाओं में विभक्त किया गया है। पुरातत्व दीर्घा में मृण्मूर्तियाँ, मिट्टी के बरतन, पत्थर और मिट्टी की मुद्राएं हैं। यहां सिरपुर और पसेवा की खुदाई में मिली 8वीं सदी की ईंटें व लगभग 2300ई  पूर्व काल के मिट्टी के बरतन देखे जा सकते हैं। सिरपुर की खुदाई में मिट्टी की कई मुद्राएं मिली हैं, जो 7वीं-8वी सदी की हैं। यहां तरह-तरह के उपकरण और औजार भी हैं, जो 8वीं से लेकर 12वीं सदी तक के हैं। प्रतिमाओ में कारीतलाई जबलपुर से संबंधित विभिन्न देवी-देवताओं एवं नायक-नायिकाओं की कलाकृतिओं को प्रदर्शित किया गया है। ये कलाकृतियाँ सोमवंशियों एवं कलचुरियों के काल की हैं। संग्रहालय की मानव शास्त्रीय दीर्घा में माड़िया, गोंड़, कोरकू, उरांव और बंजारा जनजातियों के उपयोग में आने वाले कपड़े, गहने, बरतन, शस्त्र, वाद्य एवं अन्य दैनिक उपयोग की वस्तुएं संग्रहित हैं।



उमा महेश्वर की अदभुत प्रतिमा – यहां उमा महेश्वर की तीन प्रतिमाएं देखी जा सकती हैं। शिव और पार्वती के एक साथ होने की ऐसी भाव भंगिमा वाली प्रतिमाएं बहुत कम ही देखने को मिलती हैं। दसवीं सदी में जबलपुर से प्राप्त उमा  पर यहां एक नहीं तीन उमा महेश्वर की प्रतिमाएं है। ये प्रतिमाएं रति मुद्रा में हैं।  कहा जाता है कि उमा महेश्वर का व्रत करने से इच्छित वस्तुएं प्राप्त होती हैं। उमा महेश्वर स्तोत्र - नमः शिवाभ्यां नवयौवनाभ्यां परस्पराश्लिष्टवपुर्धराभ्याम् । नगॆन्द्रकन्यावृषकॆतनाभ्यां नमॊ नमः शङ्करपार्वतीभ्याम् ॥ 1

संग्रहालय में किरारी से प्राप्त काष्ट स्तंभ लेख भी विलक्षण है। आमतौर पर पत्थरों पर स्तंभ लेख देखने को मिलते हैं। पर लकड़ी पर बहुत कम देखने को में आता है। संग्रहालय में देवनागरी लिपि के विकास को भी सहज ढंग से दिखाया गया है।
घासीदास संग्रहालय में प्रदर्शित आदिवासी समुदाय के लोगों के वाद्य यंत्र । - फोटो - विद्युत


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