Saturday, March 14, 2015

कभी श्रीलंका तक थी रेल सेवा

रामेश्वरम के पास धनुष्कोडि का समुद्र। - फोटो - विद्युत
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 14 मार्च 2015 को कोलंबो से तालाईमनार तक जाने वालाी रेल सेवा को हरी झंडी दिखाई। यानी 1964 में ध्वस्त हुई रेलवे लाइन को श्रीलंका ने इरकान की मदद से फिर से चालू कर दिया है। अब अगर भारत की ओर से भी रामेश्वरम धनुष्कोडि लाइन को दुबारा चालू कर दिया जाए तो भारत श्रीलंका के बीच एक बार फिर रेल लिंक चालू हो सकता है। 

 आज भले ही श्रीलंका जाने के लिए हमें फ्लाइट की सेवा लेनी पड़ती हो पर कभी श्रीलंका जाना बहुत आसान हुआ करता था। चेन्नई से श्रीलंका के लिए ट्रेन और स्टीमर की शानदार कनेक्टिविटी हुआ करती थी।

चेन्नई के मद्रास इग्मोर स्टेशन से रामेश्वर द्वीप तक सफर करने के बाद लोगों को धनुष्कोडि जाना पड़ता था। आजकल रामेश्वरम तक ही रेल जाती है पर 1964 तक धनुष्कोडि तक रेल जाती थी। पर 18 दिसंबर 1964 को आए विनाशकारी तूफान में सब कुछ तबाह हो गया। 240 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से आए तूफान में रामेश्वरम से धनुष्कोडि की रेलवे लाइन तबाह हो गई। इस तूफान ने श्रीलंका में भी काफी तबाही मची। 100 पैसेंजरों को लेकर जा रही एक पैसेंजर ट्रेन भी इस तूफान में यात्रियों समेत समुद्र में समा गई थी।

1964 तक यात्री धनुष्कोडि रेलवे स्टेशन पर उतरते थे। यहां से श्रीलंका ( तब सिलोन) जाने के लिए स्टीमर सेवा मिलती थी। सिलोन सरकार ने 1914 में एक मार्च को पोलगावाला से तालाईमनार (Polgahawela to Talaimannar ) तक रेलवे लाइन का विस्तार कर दिया था। वहीं भारत के धनुष्कोडि से तालाईमलार के लिए नियमित स्टीमर सेवा चलाई जाती थी। धनुष्कोडि से तालाईमलार की कुल दूरी महज 22 मील ( 35 किलोमीटर) ही है।

हम जब 1931 में प्रकाशित इंडियन ब्राडशॉ का राष्ट्रीय रेलवे टाइम टेबल देखते हैं तो उसमें मद्रास इगमोर से सिलोन के बीच रेल संपर्क का जिक्र देखते हैं। देश के कई हिस्सों में जहां नदियों पर पुल नहीं थे वहां भी स्टीमर सेवाओं को रेलवे से लिंक किया गया था। ये स्टीमर सेवाएं रेलगाड़ी के आने के साथ चलती थीं। इसी तरह का उदाहरण पटना और पहलेजाघाट के बीच गंगा नदी में स्टीमर सेवा का भी मिलता है। पर मद्रास इगमोर से सिलोन के बीच शानदार अंतरराष्ट्रीय रेल स्टीमर लिंक था। तब बहुत सस्ती दरों पर ही सिलोन ( श्रीलंका) पहुंचा जा सकता था। इस सेवा का इस्तेमाल करने के लिए भारत, सिलोन और ब्रिटेन के नागरिकों को कोई पासपोर्ट की जरूरत नहीं थी। पर जो लोग इन देशों के अलावा कहीं और से आए हों उनके लिए पासपोर्ट और वीजा की जरूरत थी।

स्वास्थ्य जांच – सिलोन जाने वाले लोगों के लिए स्वास्थ्य जांच अनिवार्य था। पहले और दूसरे क्लास में सफर करने वाले लोगों की स्वास्थ्य जांच मंडपम ( सिलोन) में मेडिकल आफिसर करता था, जबकि तीसरे दर्जे में यात्रा करने वालों के स्वास्थ्य जांच मंडपम कैंप में की जाती थी।

सामानों की जांच – पहले दर्जे के यात्रियों के सामान की जांच मारादाना में, दूसरे दर्जे के यात्रियों के सामान की जांच तालाईमनार में और तीसरे दर्जे के लोगों को सामान की जांच मंडपम शिविर में की जाती थी।
टाइम टेबल में मद्रास ते तालाईमनार की दूरी 493 किलोमीटर बताई गई है। जबकि धनुष्कोडि तक की दूरी 422 किलोमीटर है। मंडपम रेलवे स्टेशन धनुष्कोडि से 20 किलोमीटर पहले आता था।

किराया – 1931 में मद्रास से तालाईमनार ( सिलोन) का किराया पहले दर्ज में 42 रुपये, दूसरे दर्जे में 25 रुपये और तीसरे दर्जे में महज 9 रुपये 13 पैसे हुआ करता था।


मंडपम कैंप रेलवे स्टेशन रामेश्वरम ( आजकल आखिरी रेलवे स्टेशन) से 19 किलोमीटर पहले पड़ता है। वहीं रामनाथपुरम ( जिला मुख्यालय) रेलवे स्टेशन से मंडपम कैंप की दूरी 36 किलोमीटर है। वहीं मंडपम स्टेशन मंडपम कैंप से दो किलोमीटर पहले ही स्थित है। मंडपम के ठीक बाद ऐतिहासिक पंबन समुद्री पुल की शुरूआत होती है जो पंबन टापू ( रामेश्वरम) को भारत भूमि से जोड़ता है।
सिलोन और भारत के बीच स्टीमर और रेल मार्ग से अंग्रेजी राज में बड़ी संख्या में प्रवासी श्रमिक भारत में रोजगार के लिए आते थे। मंडपम रेलवे स्टेशन स्थित मंडपम कैंप ऐसे श्रमिकों के लिए ही जाना जाता था।


भारत से श्रीलंका के बीच तूतीकोरीन से भी स्टीमर सेवा चलती थी। पर यह सेवा धनुष्कोडि की तुलना में लंबी थी। धनुष्कोडि से सिलोन का सफर महज दो घंटे का था जबकि तूतीकोरीन से कोलंबो का सफर 12 घंटे का था। 150 मील दूरी के लिए हफ्ते में दो दिन ही फेरी सेवा चलाई जाती थी। हर बुधवार और शनिवार को तूतीकोरीन से फेरी सेवा चलती थी। इसलिए धनुष्कोडि वाली सेवा ज्यादा लोकप्रिय थी।

कई बार धनुष्कोडि तक रेलवे लाइन को फिर से चालू करने की बात उठती है पर इसे अभी तक अंजाम नहीं दिया जा सका है।

-    -    विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com



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