Thursday, January 29, 2015

पत्रकार माधवराव सप्रे का शहर पेंड्रा

एक बार फिर पेंड्रा रोड पर था। बिलासपुर पैसेंजर का इंतजार। सोचा थोड़ा पेंड्रा के बाजार में टहल आता हूं। एक मिठाई की दुकान नजर आती है। लिखा है- बेहतरीन गुणवत्ता वाली चीजें कभी सस्ते में नहीं मिल सकतीं। बिल्कुल सही बात है। गुणवत्ता हमेशा कीमत चुकाने से ही मिलती है।

पेंड्रा छोटा सा लेकिन ऐतिहासिक बाजार है। लेकिन पत्रकारिता में इसका अवदान बहुत बड़ा है। महान साहित्यकार और पत्रकार माधवराव सप्रे ने सन 1900 में जब समूचे  छत्तीसगढ़ एक भी प्रिंटिंग प्रेस नही था तब उन्होंने बिलासपुर जिले के एक छोटे से कस्बे पेंड्रा से छत्तीसगढ़ मित्रनामक मासिक पत्रिका निकाली यह पत्रिका  तीन साल तक सफलतापूर्वक चली। सप्रे का जन्म दामोह जिले में हुआ था आज उनके नाम पर भोपाल में विशाल संग्रहालय  है।  माधवराव सप्रे संग्रहालय।  http://www.sapresangrahalaya.com/index.htm उस महान आत्मा को नमन करते हुए फिर स्टेशन वापस आ जाता हूं। हमारी ट्रेन का समय हो गया है। पेंड्रा रोड से ट्रेन चलने के बाद ट्रेन खोडरी, भांवर टोंक, तेंगानमाडा,  बेलगहना, सालका रोड, करगीरोड, कलमीटार, घुटकू और उसलपुर में रूकती है। उसलपुर तो बिलासपुर शहर का बाहरी इलाका है। पेंड्रा के बाद खोडरी के आसपास वन क्षेत्र आता है। बताते हैं कि यहां सड़कों पर भालू आदि जंगलों से निकल कर आ जाते हैं।

जारी है लकड़ी की तस्करी


पेंड्रा के आसपास के जंगलों से लकड़ी की तस्करी का खेल सालों भर बदस्तूर चलता है। गरीब लोग जंगल से लकड़ियां तोड़कर लाते हैं। लकड़ियों के गट्ठर बनाकर शहर के होटलों को ढाबों के बेचते हैं। ये उनकी रोजी रोटी का साधन है। पर है तो वन विभाग के कानून के मुताबिक वनोपज की तस्करी। इसलिए वन विभाग ऐसे लोगों को गाहे बगाहे पकड़ता रहता है। मैंने अमरकंटक में देखा वहां सारे होटल और चाय की दुकानों की भट्ठी लकड़ी से ही चलती है। आसपास के जंगलों से लकड़ियां सस्ती मिल जाती हैं। अमरकंटक के होटल वाले लकड़ी का एक गट्ठर 50 रुपये में खरीदते हैं। बिलासपुर पैसेंजर में खोडरी और उसके बाद महिलाएं लकड़ी के गट्ठर लेकर ट्रेन में चढ़ने लगीं। पैसेंजर के दरवाजे और सभी टायलेट को अंदर बाहर लकड़ियों के गट्ठर से भर दिया। एक महिला ने बताया कि वह जंगल में दूसरे लोगों से लकड़ियां खरीदती है। एक गट्ठर 35 रुपये में। बिलासपुर शहर में होटलों को बेच आती हैं 70 रुपये में। पर हर गट्ठर पर 35 रुपये कमाई में काफी मेहनत है।

जंगल में जो लोग लकड़ियां तोड़ते हैं उन्हें जंगली जानवरों भालू आदि से खतरा रहता है। वहीं ट्रेन में लकड़ी की तस्करी में हमेशा सावधानी बरतनी पड़ती है। एक महिला ट्रेन में सारी लकड़ियां चढ़ा लेने के बाद घूम घूम कर मूंगफली बेचने लगी। यानी एक साथ दो दो कारोबार। पापी पेट के लिए सब कुछ करना पड़ता है। बताने लगी जब वन विभाग वाले लकड़ी पकड़ लेते हैं जो जुर्माना तो नहीं होता पर लकड़ी जब्त हो जाती है। महीने में तीन चार बार ऐसा हो ही जाता है। बिलासपुर आने पहले ये महिलाएं लकड़ियों को ताबडतोड़ रेल से सड़कों पर फेंकने लगीं। वहां उनके साथी इन बंडलों को उठाने से लिए पहले से ही मौजूद रहते हैं। ये रोज का कारोबार है। पर इस तस्करी के कारोबार में में मेहनत भी है और खतरा भी। पर पेट की आग बुझाने के लिए लकड़ी की आग तो जलानी ही पड़ती है।

---- विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com ( MADHAV RAO SAPRE, PENDRA ROAD, WOOD CUTTING FROM FOREST ) 



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