Saturday, January 24, 2015

जन जन की आस्था का प्रतीक मां नर्मदा

भारतीय संस्कृति में नर्मदा नदी का विशेष महत्त्व है। मध्य भारतमें नर्मदा नदी जन-जन की आस्था से जुडी हुई है। नर्मदा मध्य भारत के मध्य प्रदेश और गुजरात राज्य में बहने वाली एक प्रमुख नदी है। यह भारत की पांचवी बड़ी नदी है। महाकाल पर्वत के अमरकंटक शिखर से निकली नर्मदा की लम्बाई 1310 किलोमीटर है। यह नदी पश्चिम की तरफ जाकर खम्बात की खाड़ी में समंदर में गिरती है।

स्कंद पुराणके रेवाखंड में नर्मदाके माहात्म्य और इसके तटवर्ती तीर्थोंका वर्णन है । स्कंद पुराण के रेवा खण्ड के अनुसार, प्राचीन काल में चंद्रवंश में हिरण्यतेजा एक प्रसिद्ध राजर्षि ऋषितुल्य राजा हुए। उन्होंने पितरों की मुक्ति और भूलोक के कल्याण के लिए नर्मदा को पृथ्वी पर लानेका निश्चय किया। राजर्षि ने कठोर तप कर भगवान शंकर को प्रसन्न कर लिया। महादेव ने उन्हें नर्मदाके पृथ्वीपर अवतरण का वरदान दे दिया। इसके बाद नर्मदा धरा पर पधारीं। राजा हिरण्यतेजा ने नर्मदा में स्नान कर विधिपूर्वक अपने पितरोंका तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान किया।

नर्मदा के पत्थर के शिवलिंग नर्मदेश्वर के नाम से विख्यात हैं। शास्त्रों में नर्मदा में पाए जाने वाले नर्मदेश्वर को बाणलिंग भी कहा गया है। इसकी मुख्य विशेषता यह है कि नर्मदेश्वर को स्थापित करते समय इसमें प्राण-प्रतिष्ठा करने की आवश्यकता नहीं पडती। नर्मदेश्वर बाणलिंगको साक्षात शिव माना जाता है।

नर्मदा परिक्रमा -  देश में नर्मदा एकमात्र नदी है जिसकी परिक्रमा की जाती है। नर्मदा परिक्रमा किसी भी तीर्थ यात्रा कि तुलना में अत्यंत दुश्कर कार्य है। नर्मदा का परिक्रमा मार्ग अत्यंत सुंदर पहाड़ों और मैदानी इलाकों से होकर जाता है। मान्यता है कि नर्मदा परिक्रमा से जीवन में सुख- शांति आती है क्योंकि भगवान शिव प्रसन्न होते हैं। मां नर्मदा को भगवान शिव की पुत्री कहा गया है।

नर्मदा जी की कुल लम्बाई तो लगभग 1310 किलोमीटर है जिससे परिक्रमा मार्ग करीब 2600 किलोमीटर का हुआ करता है। परिक्रमा मतलब है नदी को बिना उलांघे पूरा फेरा लगाना और नदी के किनारे किनारे ही पदयात्रा करना। ये परिक्रमा अमरकंटक से आरंभ होकर खंभात जाकर वापसी में अमरकंटक में ही पूर्ण होती है। यात्रा के दौरान श्रद्धालु गांव के लोगों से श्रद्धापूर्वक भोजन ग्रहण करते हैं। कहीं भोजन नहीं मिलता तो यूं ही सो जाते हैं। यात्रा के दौरान नदी तट से 10 किलोमीटर से ज्यादा दूर नहीं जाना होता है।


गांव से जब श्रद्धालु नर्मदा परिक्रमा के लिए निकलते हैं तो अपने सरपंच से प्रमाण पत्र बनवाकर चलते हैं। इस प्रमाण पत्र के आधार पर अमरकंटक के कई आश्रमों में उन्हें आवास और भोजन की सुविधा मिलती है। साथ ही ये प्रमाण पत्र उन्हें मार्ग में भी काम आता है। कल्याण आश्रम के सेवक ने बताया कि हमारे यहां नर्मदा परिक्रमा करने वालों के लिए मुफ्त में भोजन और आवास का इंतजाम है।

व्रत और निष्ठापूर्वक की जाने वाली नर्मदा परिक्रमा 3 वर्ष 3 माह और 13 दिन में पूरा करने का विधान है, परन्तु कुछ लोग इसे 108 दिनों में भी पूरा कर लेते हैं । हर साल बड़ी संख्या में आस्थावान लोग नर्मदा परिक्रमा पर निकलते हैं। अमरंकटक कई आश्रमों में परिक्रमा पर जाने वालों के लिए आश्रम में रहने और भोजन का निशुल्क इंतजाम रहता है। वहीं परिक्रमा मार्ग में पड़ने वाले गांव के लोग ऐसे श्रद्धालुओं को सम्मान के निगाह से देखते हैं जो परिक्रमा पर निकलते हैं। आजकल सडक मार्ग से वाहन द्वारा काफी कम समय में भी परिक्रमा करने का चलन हो गया है।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य
( MAA NARMADA, AMARKANTAK, TEMPLE ) 


2 comments:

  1. माँ नर्मदा की सुन्दर जानकारी .. नमन है माँ के चरणों में ...

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