Sunday, November 23, 2014

दाल रोटी घर दी...दिवाली अमृतसर दी...

पूरे पंजाब में ये कहावत मशहूर है। दाल रोटी घर दी...दिवाली अमृतसर दी...और होता भी यही है हर साल दिवाली के दिन पंजाब के अलग अलग जिलों से लाखों लोग अमृतसर का रूख करते हैं।
अमृतसर का स्वर्ण मंदिर इस दिन साल के अन्य दिनों की तुलना में ज्यादा प्रकाशमान होता है। इसकी छटा देखने के लिए लोग रात भर जगकर स्वर्ण मंदिर का नजारा करते है। खासकर मंदिर के सरोवर के चारों तरफ भक्तगण मोमबत्तियों से रोशनी करते हैं। लाखों दीपक जल उठते हैं तो उनका अक्श मंदिर के सरोवर में दिखाई देता है जो बड़ा ही नयनाभिराम दृश्य प्रस्तुत करता है। 

वैसे तो देश भर में दिवाली पर रोशनी की जाती है। पर स्वर्ण मंदिर की दिवाली यादगार होती है। इस दिवाली को देखने के लिए देश भर से लोग पहुंचते हैं। वहीं बड़ी संख्या में विदेशी भी दिवाली देखने यहां पहुंचते हैं। 



लाखों लोगों का मेला स्वर्ण मंदिर के आसपास होता है। दिवाली के दिन आपको पंजाब के हर जिले के लोगों की जमघट स्वर्ण मंदिर परिसर में मिल जाएगी। मंदिर प्रशासन की ओर से भी दिवाली के आयोजन की कई दिन पहले तैयारी की जाती है।

सिख धर्म में दिवाली पर्व का खास महत्व है। ठीक उसी तरह जैसे हिंदू धर्म में। दिवाली के साथ स्वर्ण मंदिर की कई कथाएं जुड़ी हुई हैं। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में दिवाली का त्योहार दिवाली से दो दिन पूर्व आरम्भ होकर दो दिन पश्चात समाप्त होता है।


इसी दिन सन 1577 में अमृतसर में स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ था। वहीं दिवाली ही के दिन ही 1619 में सिक्खों के छठे गुरु हरगोबिन्द सिंह जी को कारागार से रिहा किया गया था। गुरु हरगोबिन्द जी गुरु नानक देव जी के विचारों को प्रफुल्लित करने में जुटे थे, जो मुगल बादशाह जहांगीर को बर्दाश्त नहीं था। गुरु जी की यश गाथा सुन कर जहांगीर ने गुरु हरगोबिन्द जी को ग्वालियर के किले में बन्दी बना लिया। 

श्री गुरु हरगोबिन्द जी मध्य प्रदेश के ग्वालियर के किले से 52 राजाओं के साथ रिहा हुए थे। सिक्ख इतिहास में गुरु अर्जुन देव जी के सुपुत्र गुरु हरगोबिन्द साहिब की दल-भंजन योद्धा कहकर प्रशंसा की गई है। 


गुरु हरगोबिन्द सिंह ने सिख धर्म को जरूरत के समय शस्त्र उठाने की ऐसी सीख दी जो आज भी सिख धर्म की पहचान है। उन्होंने अपने श्रद्धालुओं को न किसी से डरो ना किसी से डराओ की प्रेरणा देते हुए एक बहादुर कौम की स्थापना की थी।  गुरु हरगोबिंद सिंह ने ही सिखों को अस्त्र-शस्त्र का प्रशिक्षण लेने के लिए प्रेरित किया। 
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