Sunday, October 19, 2014

और छोड़ चले हम ये गलियां...

( जन्नत में जल प्रलय 34 )
09 सितंबर 2014 - चारों तरफ से पानी में घिरे रिट्ज होटल से निकल कर कहां जाएं से सोचते सोचते दोपहर हो गई थी। सरस मेले के 200 शिल्पी अभी होटल में बचे थे। 50 के करीब जा चुके थे। इस बीच कोनाखान रोड के होटल एसोसिएशन की बैठक हुई। इस बैठक में होटल मालिकों ने फैसला लिया कि सभी होटलों को पर्यटकों से खाली करा लेना चाहिए। ऐसा इसलिए कि होटल के भवन कई दिन से पानी में घिरे थे उनके किसी भी वक्त जमींदोज हो जाने का खतरा था। हमारे एजाज भाई होटल संगठन का संदेश लेकर आए कि हमें अब तो होटल खाली करना ही होगा।


अब अंतिम फैसला हो चुका था होटल खाली करने का। मैं और आफताब वानी होटल खाली करने को तैयार थे। हमने सारा सामान पैक कर लिया। अपने अपने बैग लेकर हम तीसरी मंजिल से दूसरी मंजिल स्थित वानी साहब के कमरे में आ गए। पर अभी भी सरस मेले के दर्जनों शिल्पी होटल छोड़ने को तैयार नहीं थे। अपना सामान बरबाद हो जाने से दुखी कुछ शिल्पी ने कहा, अगर इस होटल में दब कर मर भी गए तो परिवार के लोगों मुआवजा तो मिलेगा। मैंने कुछ शिल्पियों को सलाह दी कि अब सोचने का वक्त नहीं है होटल खतरे में है। हमें तुरंत होटल खाली कर ही देना चाहिए। पर होटल में जमे रहने को तैयार कुछ शिल्पी मेरी बात मानने को तैयार नहीं थे। पर थोड़ी देर बाद सहमति बन गई सभी लोग होटल छोड़ने को तैयार हो गए।

कच्चे चावल को दुबारा पका कर खाया - बच्चों ने सुबह से कुछ खाया नहीं था। एक दिन पहले रात को बने चावल कच्चे रह गए थे जिसे अनादि और माधवी ने नहीं खाया था। वानी साहब की पत्नी ने उन कच्चे चावल को बचा कर रख लिया था। आज दोपहर उन कच्चे चावल को दुबारा से पकाया गया। वानी परिवार के पास एक छोटा सा सिलेंडर था। इस दुबारा पकाए गए चावल को चलते चलते हमने चार चार कौर खाया। नौ सितंबर को हमारे शरीर में यही अन्न का दाना गया था।

अब एक एक करके सभी लोग नाव में बैठ बैठ कर रिट्ज होटल से बाहर सड़क तक निकलने लगे। हमें निकालने के लिए दो नावें लगी थी। एक नाव में 10 से 12 लोग आ सकते थे। एक नाव के चप्पू को एजाज भाई खुद चला रहे थे। पूरे होटल में 200 लोग बचे थे। हमें होटल को खाली करके सड़क पर आने में कुछ घंटे लग गए। कोनाखान रोड पर खड़े होकर हमने अपने होटल को बड़े भावुक होकर देखा जो तीन दिनों तक हमारा आसरा बना हुआ था। वानी साहब ने बताया कि होटल की पिछली दीवार से लगा हुआ एक नाला बहता है। मुझे ये बात मालूम थी पर मैंने किसी से चर्चा नहीं कि क्योंकि लोगों का डर और बढ़ जाता। वाकई हमने होटल छोड़कर सही फैसला किया था, क्योंकि हमारे होटल से आगे की एक इमारत टेढी हो चुकी थी। डल गेट के दायरे में आने वाली कई इमारतें खतरे में थीं। हालांकि कई दिनों बाद जब पानी उतर गया तो हमारी एजाज भाई से बात हुई तो पता चला कि होटल सुरक्षित है।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य

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