Sunday, October 12, 2014

श्रीनगर जो कभी शहर था....

हमारी गलतियों से ही आता है सैलाब

 ( जन्नत में जल प्रलय - 27 )
आखिर श्रीनगर और पूरे कश्मीर में सैलाब आया क्यों। ये प्रकृति का कोई कहर नहीं बल्कि हमारी ही गलतियों का नतीजा है। झेलम नदी की बात करें तो ये पूरी श्रीनगर शहर में जलेबी की तरह बहती है। हमने झेलम के किनारे लगातार अवैध कब्जा करके उसका डूब क्षेत्र करीब करीब खत्म कर दिया है। श्रीनगर शहर में झेलम नदी की चौड़ाई महज 30 मीटर यानी 100 फीट है। यह किसी चौड़ी सड़क के बराबर है। नदी के दोनों तरफ बांध जरूर बने हैं। पर बांध के किनारे बड़े बड़े होटल बने हैं। इनमें से कुछ होटल महंगे और कश्मीर की राजनीति के रसूखदार परिवारों के भी हैं। बंटवारा में केंद्रीय विद्यालय बिल्कुल नदी के किनारे है। बारिश के दिनों में कश्मीर घाटी का पूरा पानी इसी झेलम नदी में आता है। पर तो अपनी जगह बनाता है। जब पानी के सीधे आगे बढ़ने का रास्ता नहीं मिलता तो वह दाहिने और बांये और जगह ढूंढता है।

 श्रीनगर शहर में झेलम का डूब क्षेत्र बिल्कुल नहीं होने के कारण आखिर पानी जाएगा तो कहां। वह शहर के मुहल्लों में ही तो घुसेगा। पर कई बार आए बाढ़ के बावजूद हमने सबक नहीं लिया। जैसे उत्तराखंड में भागीरथी नदी के किनारे बड़े बड़े  होटल बना डाले उसी तरह श्रीनगर में भी नदी के किनारे झेलम व्य वाले होटल बना डाले हैं। जाहिर है हमारी गलतियों से ही ये सैलाब आता है। तो आइए हम अपनी कुछ गलतियों पर नजर फरमाते हैं।

वूलर झील की हो गई हत्या - अब हम कश्मीर की दूसरी बड़ी झील वूलर लेक की बात करें। इस मीठे पानी की झील का दायरा 20,200 हेक्टेयर में फैला हुआ करता था। पर महज 30 सालों के अंदर इसका दायरा सिमट कर महज 2400 हेक्टेयर रह गया है। यानी वूलर झील खत्म होने के कगार पर है। रिपोर्ट ये कहती है पिछले तीन दशक में कश्मीर के 30 फीसदी झील और वेटलैंड के क्षेत्र में अवैध कब्जा कर लिया गया है। इस कब्जे के कारण पानी के जाने के लिए कोई रास्ता नहीं बचा। यहां तक कि ब्रिटिश शासक और कश्मीर के पुराने महाराजा भी वूलर लेक को बाढ़ के दौरान पानी के बफर स्टाक करने वाली झील के तौर पर उसका महत्व समझते थे। पर अब हमने वूलर झील की तो हत्या कर दी डल झील पर कब्जा कर लिया।

वास्तव में बाढ़ के दौरान वेटलैंड के स्पाउंज की तरह काम करते हैं और अतिरिक्त जल को वे सोख लेते हैं और आसपास के इलाकों को सैलाब से बचाते हैं। वूलर झील पर कब्जा करने में तो सरकारी एजेंसियों का भी योगदान कम नहीं है। वन विभाग ने क्रिकेट के बल्ले बनाने के लिए कश्मीरी विलो के पौधों का रोपण वूलर झील के दायरे में कराया। इससे वूलर झील का दायरा कम होता चला गया।

कश्मीर घाटी में पानी की निकासी के लिए जो कैचमेंट क्षेत्र है उसका दायरा काफी छोटा है। ज्यादातर इलाके ऊंचे पहाड़ों से घिरे हुए हैं। इन पहाड़ों से बारिशका सारा पानी निकलकर झेलम दरिया में आता है। महाराजा के शासन काल में पानी की निकासी के लिए प्राकृतिक बहाव का ध्यान रखते हुए इंतजाम किए गए थे। पर हाल के दशकों इसकी पूरी तरह उपेक्षा की गई।
बांबे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी के निदेशक डॉक्टर असद रहमानी एक साक्षात्कार में कहते हैं, वास्तव में झीलों और वेटलैंड को बचाए रखना बाढ़ के खतरे को कम करने के लिए तो जरूरी है ही इसके अलावा हमारी धरती पानी से दुबारा रिचार्ज हो सके इसके लिए भी इनका संरक्षण जरूरी है।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य 

2 comments:

  1. सार्थक सामयिक चिंतन
    समय रहते चेत जाने में ही सबकी भलाई है ..

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    1. बिल्कुल सही फरमाया आपने, हम देश में कहीं भी रहते हों धरती को लेकर हमारा जागरूक होना जरूरी है।

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