Friday, October 17, 2014

त्रासदी से लें सबक – पहले से नहीं थे पुख्ता इंतजाम

( जन्नत में जल प्रलय – 32)
आपदा की घड़ी में सबसे बड़ी जरूरत होती है कि हमारी संचार प्रणाली सुचारू ढंग से काम कर रही हो। अगर संचार प्रणाली काम कर रही है तो हजारों लोगों की जान बचाई जा सकती है। किसी भी जगह फंसे हुए लोग अपने बारे में संदेश भिजवा सकते हैं। पर देश की सबसे खूबसूरत राजधानी में शुमार श्रीनगर जहां सालों भर विदेशी सैलानियों का भी जमावड़ा लगा रहता है, वहां का संचार तंत्र पूरी तरह सात सितंबर की सुबह में धारासायी हो गया। 


हमने देश में पिछले दो दशक में आए आपदा से कोई सबक नहीं लिया था। हमारे पास अब गांव गांव में मोबाइल फोन सेवा का शानदार नेटवर्क है। पर ये आपदा में ये नेटवर्क कैसे काम करता रहे इसके पुख्ता इंतजाम नहीं थे। गुजरात में 2001 में आए विनाशकारी भूकंप में संचार नेटवर्क फेल हो गया था। मुंबई में 2005 में आए बाढ़ में शहर में अलग अलग जगहों पर लोग फंस गए थे। उस वक्त भी कई इलाकों की बिजली चली गई थी और मोबाइल नेटवर्क ने कई जगह साथ छोड़ दिया था। बिहार में कोसी नदी के कहर से 2008 में विनाशकारी बाढ़ का प्रकोप लोगों ने झेला था। इस बार भी मोबाइल फोन का स्थैतिक नेटवर्क पंगु हो गया था। पर हमने इन सब घटनाओं से कोई सबक नहीं लिया।

आपदा की घड़ी में जिस क्षेत्र में संचार नेटवर्क फेल हो जाता है वहां पर इमरजेंसी जीएसएम तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। इस घड़ी में मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनियां इमरजेंसी जीएसएम सेटेलाइट पोर्टेबल टर्मिनल का इस्तेमाल कर संचार व्यवस्था को संचालित करती हैं। पर श्रीनगर में इस तरह के उपाय करने में कई दिनों की देर हो गई। जीएसएम  या सीडीएमए तकनीक की मोबाइल सेवा स्थैतिक नेटवर्क से काम करता है। आपका फोन सबसे निकट के स्थैतिक टावर को सिग्नल भेजता या प्राप्त करता है। अगर वह निकट का टावर पानी में डूब गया हो या फिर उसको संचालित करने के लिए मिलने वाली बिजली का स्रोत खत्म हो गया हो तो उस क्षेत्र के मोबाइल फोन में सिग्नल नहीं आएंगे, यानी बातचीत नहीं हो सकेगी। इसलिए आपदा की घड़ी में सेटेलाइट जीएसएम टर्मिनल का इस्तेमाल किया जाता है। आजकल कई देशों में समान्य स्थितियों में भी सेटेलाइट जीएसएम टर्मिनल का इस्तेमाल किया जाता है। इसके बदौलत ही काफी ऊंचाई पर आसमान में उड़ रहे विमान में मोबाइल फोन की सेवाएं दे पाना संभव हो सका है।


आपदा की घड़ी में एम्मारसेट सेटेलाइट फोन का इस्तेमाल किया जाता है। पर जम्मू एवं कश्मीर की राज्य सरकार के पास ऐसे कितने फोन थे और क्या वे काम कर रहे थे इसकी कोई जानकारी नहीं है।

एयरसेल कंपनी इन बातों को लेकर पहले से सचेत थी इसलिए उसने श्रीनगर शहर में ज्यादातर टावर ऊंचाई पर लगाए थे। पर बाकी कंपनियां इस मामले में फिसड्डी साबित हुईं। कुछ कंपनियों कादावा है कि उन्होंने जितनी जल्दी हो सके नेटवर्क ठीक करने की कोशिश की। पर सच्चाई इससे इतर है।

अखबारों का प्रकाशन रहा बंद – सात तारीख की सुबह से श्रीनगर शहर में समाचार पत्रों का प्रकाशन ठप्प हो गया था। शहर के प्रेस एरिया में अखबारों के दफ्तरों में पानी घुस आया था। यह पानी 10 दिनों के बाद निकल सका। बिजली व्यवस्था भी ठप्प थी।सारे पत्रकार और गैर पत्रकार कर्मचारी भी फंसे हुए थे। ऐसे में समाचार पत्रों का प्रकाशन संभव नहीं था। सरकारी प्रसारक आकाशवाणी और दूरदर्शन के श्रीनगर केंद्र का प्रसारण भी कई दिनों तक ठप्प रहा।
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